Saturday, 19 January 2008

कविता

झूठ : चार दृश्य
(१ )
जब मैं झूठ बोलता हूँ
तो
लोग कहते हैं -
यह आदमी बडा अच्छा है ।


(२ )
जब मैं झूठ बोलता हूँ
तो
मेरी भाषा में प्रवाह होता है ,
मन में विश्वास ,
स्वर में ओजस्विता
एवं मिठास का
विचित्र सा एहसास
होता है ।
(३)
झूठ के पाँव नहीं होते ,
इसके
पंख होते हैं ,
झूठ उड़ता है ।
(४ )
झूठ :
सच का सौतेला भाई
माँ की कृपा से
प्रगति कर गया है ।

4 comments:

  1. अरे महराज इ तो लग रहा है कि आपके ऊपर त्रिलोचन जी का भूतवा चढ़ गया है। वइसे अच्छा है। इसे रहने ही दीजिए। आगे और भी इंतजार रहेगा।

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  2. महराज भुतवा के ऊपर अब और भुतवा का चढ़ेगा? बिना भूत बने ई सब होता है का ? फिर भी धन्यवाद .

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  3. maharaj Bhutwa par paretwa to chad hi sakta hai, waise main to paret hoon hi, awasyak ho to ....
    ashok

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  4. it is nice but one thing is not clear who is the father of both the truth and the false
    alok

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