Wednesday, 28 November 2007

मुझको मालूम है अदालत की हकीकत ....


इष्ट देव सांकृत्यायन

अभी-अभी एक ब्लोग पर नजर गई. कोई गज़ब के मेहनती महापुरुष हैं. हाथ धोकर अदालत के पीछे पड़े हैं. ऐसे जैसे भारत की सारी राजनीतिक पार्टियाँ पड़ गई हैं धर्मनिरपेक्षता के पीछे. कोई हिन्दुओं का तुष्टीकरण कर रहा है और इसे ही असली धर्मनिरपेक्षता बता रहा है. कोई मुसलमानों का तुष्टीकरण कर रहा है और इसे ही असली धर्मनिरपेक्षता बता रहा है. कोई सिखों का तुष्टीकरण कर रहा है और इसे ही असली धर्मनिरपेक्षता बता रहा है. गजब. ऐसा लगता है की जब तक भी लोग दोनों की पूरी तरह ऎसी-तैसी ही नहीं कर डालेंगे, चैन नहीं लेंगे.
तो साहब ये साहब भी ऐसे ही अदालत के पीछे पड़ गए हैं. पहले मैंने इनकी एक खबर पढी
कोर्ट के आदेश के बावजूद जमीन वापस लेने में लगे 35 साल. मैंने कहा अच्छा जी चलो, 35 साल बाद सही. बेचारे को मिल तो गई जमीन. यहाँ तो ऐसे लोगों के भी नाम-पते मालूम हैं जो मुक़दमे लड़ते-लड़ते और अदालत में जीत-जीत कर मर भी गए, पर हकीकत में जमीन न मिली तो नहीं ही मिली. उनकी इस खबर पर मुझे याद आती है अपने गाँव के दुर्गा काका की एक सीख. वह कहा करते थे कि जर-जोरू-जमीन सारे फसाद इनके ही चलते होते हैं और ये उनकी ही होती हैं जिनमें दम होता है. पुराने जमाने के दर्जा तीन तक पढे-लिखे थे. उनको राधेश्याम बाबा की रामायण बांचनी आती थी. उनका हवाला देकर कहते थे कि इन तीनो की चाल-चलन भैंस जैसी होती है, वो उसी की होती है जिसकी लाठी होती है.
कृपया इसे अन्यथा न लें. मेरी न सही, पर दुर्गा काका की भावनाओं की कद्र जरूर करें. असल में उनका सारा वक्त भैसों के बीच ही गुजरा और भैंसों के प्रति वह ऐसे समर्पित थे जैसे आज के कांग्रेसी नेहरू परिवार के प्रति भी नहीं होंगे. एक बार काकी ने अपने किसी सिरफिरे लहुरे देवर को बताया था कि जब वह नई-नई आईं तब काका ने उनके लहराते रेशमी बालों की तारीफ़ करते हुए कहा था - अरे ई त भुअरी भईंसिया के पोंछियो से सुन्नर बा. आपको इस बात पर हँसी तो आ सकती है, लेकिन आप भैंस के प्रति काका का समर्पण भाव देखिए. शायद इसीलिए उन्हें किसी भी काम के लिए लाठी से आगे किसी चीज की कोई जरूरत न पडी. अदालत-वदालत को वह तब तो कुछ न समझते थे, अब होते तो समझते कि नहीं, यह कहना असंभव ही है.
खैर, मुझे हैरत है कि जो बात दुर्गा काका इतनी आसानी से समझते थे हमारे ये ब्लॉगर मित्र इतने पढे-लिखे होकर भी यह बात समझ नहीं पाए. पत्रकार तो खैर होता ही नासमझ है. उसकी तो मजबूरी है मुर्दे से बाईट लाना और यह पूछना कि भाई मर कर आपको कैसा लग रहा है. पर ब्लॉगर की भी ऎसी कोई मजबूरी होती है, यह बात मेरी समझ में नहीं आती. आज कल कौन नहीं जानता कि कब्जे अदालती हुक्म से नहीं ताकत और पव्वे से मिलते हैं. ताकत और पव्वा कैसे आता है, यह सार्वजनिक रूप से बताया नहीं जा सकता. हो किसी में दम तो करवा न ले जजों से उनकी सम्पत्ति का खुलासा? पर नहीं साहब वह फिर भी माने. एक और खबर दे दी है
सिक्के उछाल फैसला करने वाले जज. यह खबर अमेरिका की है. वहाँ के लिए हो नई बात तो हो, हमारे यहाँ तो जी सरकार ही सिक्के उछाल कर बनती है. और तो और कानून भी सिक्का-उछाल सिद्धांत ही पर काम करता है. पर क्या करिएगा, कुछ लोग जान ही नहीं पाते जन्नत की हकीकत. तो वे जिन्दगी भर नेकी करते और अपनी व अपने बाल-बच्चों की जिन्दगी दरिया में डालते रहते हैं. चचा गालिब ने ये हकीकत समझ ली थी. इसीलिए वे इन सब चक्करों में नहीं पड़े और वजीफाख्वार बन शाह को दुआएं देते रहे. में सोच रहा हूँ कि अगर वे आज होते तो क्या लिखते? यही न -
मुझको मालूम है अदालत की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है.

Monday, 26 November 2007

ठोकरें राहों में मेरे कम नहीं।
फिर भी देखो आँख मेरी नम नहीं।

जख्म वो क्या जख्म जिसका हो इलाज-
जख्म वो जिसका कोई मरहम नहीं।

भाप बन उड़ जाऊंगा तू ये न सोच-
मैं तो शोला हूँ कोई शबनम नहीं।

गम से क्यों कर है परीशाँ इस क़दर -
कौन सा दिल है कि जिसमें ग़म नहीं।

चंद लम्हों में सँवर जाए जो दुनिया -
ये तेरी जुल्फों का पेंचो-ख़म नहीं।

दाद के काबिल है स्नेहिल की गज़ल-
कौन सा मिसरा है जिसमें दम नहीं।

-विनय ओझा ' स्नेहिल'

Saturday, 24 November 2007

अभी तक आपको केले से डर नहीं लगा होगा। कभी पैर के नीचे पड़ा होगा, आप गिरे होंगे तो थोड़ा डर जरूर लगा होगा। लेकिन अब जरा इधर गौर फरमाइये, हो सकता है आपको केले का खौफ भी सताने लगे।





Friday, 23 November 2007

कोर्ट पर हमला क्यों?


सत्येन्द्र प्रताप
वाराणसी में हुए संकटमोचन और रेलवे स्टेशनों पर विस्फोट के बाद जोरदार आंदोलन चला. भारत में दहशतगर्दी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था जब गांव-गिराव से आई महिलाओं के एक दल ने आतंकवादियों के खिलाफ फतवा जारी किए जाने की मांग उठा दी थी. बाद में तो विरोध का अनूठा दौर चल पड़ा था। संकटमोचन मंदिर में मुस्लिमों ने हनुमानचालीसा का पाठ किया और जबर्दस्त एकता दिखाई. मुस्लिम उलेमाओं ने एक कदम आगे बढ़कर दहशतगर्दों के खिलाफ़ फतवा जारी कर दिया.

इसी क्रम में न्यायालयों में पेश किए जाने वाले संदिग्धों के विरोध का भी दौर चला और वकीलों ने इसकी शुरुआत की। लखनऊ, वाराणसी और फैजाबाद में वकीलों ने अलग-अलग मौकों पर आतंकवादियों की पिटाई की थी।शुरुआत वाराणसी से हुई. अधिवक्ताओं ने पिछले साल सात मार्च को आरोपियों के साथ हाथापाई की और उसकी टोपी छीनकर जला डाली। आरोपी को न्यायालय में पेश करने में पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ी. फैजाबाद में वकीलों ने अयोध्या में अस्थायी राम मंदिर पर हमले के आरोपियों का मुकदमा लड़ने से इनकार कर दिया। कुछ दिन पहले लखनऊ कचहरी में जैश ए मोहम्मद से संबद्ध आतंकियों की पिटाई की थी.
राजधानी लखनऊ के अलावा काशी तथा फैजाबाद के कचहरी परिसर बम विस्फोटों से थर्रा उठे हैं। यह सीधा हमला है आतंकियों का विरोध करने वालों पर। कश्मीर के बाद यह परम्परा देश के अन्य भागों में भी फैलती जा रही है. नीति-निर्धारकों और चरमपंथियों का समर्थन करने वालों को एक बार फिर सोचा होगा कि वे देश में क्या हालात बनाना चाह रहे हैं.

Wednesday, 21 November 2007

....या कि पूरा देश गिरा?


इष्ट देव सांकृत्यायन
येद्दयुरप्पा ..... ओह! बड़ी कोशिश के बाद मैं ठीक-ठीक उच्चारण कर पाया हूँ इस नाम का. तीन दिन से दुहरा रहा हूँ इस नाम को, तब जाकर अभी-अभी सही-सही बोल सका हूँ. सही-सही बोल के मुझे बड़ी खुशी हो रही है. लगभग उतनी ही जितनी किसी बच्चे को होती है पहली बार अपने पैरों पर खडे हो जाने पर. जैसे बच्चा कई बार खडे होते-होते रह जाता है यानी लुढ़क जाता है वैसे में भी कई बार यह नाम बोलते-बोलते रह गया. खडे होने की भाषा में कहें तो लुढ़क गया.
-हालांकि अब मेरी यह कोशिश लुढ़क चुकी है. क्या कहा - क्यों? अरे भाई उनकी सरकार लुढ़क गई है इसलिए. और क्यों?
-फिर इतनी मेहनत ही क्यों की?
-अरे भाई वो तो मेरा फ़र्ज़ था. मुझे तो मेहनत करनी ही थी हर हाल में. पत्रकार हूँ, कहीं कोई पूछ पड़ता कि कर्नाटक का मुख्यमन्त्री कौन है तो मैं क्या जवाब देता? कोई नेता तो हूँ नहीं की आने-जाने वाली सात पुश्तों का इल्म से कोई मतलब न रहा हो तो भी वजीर-ए-तालीम बन जाऊं! अपनी जिन्दगी भले ही टैक्सों की चोरी और हेराफेरी में गुजारी हो, पर सरकार में मौका मिलते ही वजीर-ए-खारिजा बन जाऊं. ये सब सियासत में होता है, सहाफत और शराफत में नहीं हुआ करता.
-पर तुम्हारे इतना कोशिश करने का अब क्या फायदा हुआ? आखिर वो जो थे, जिनका तुम नाम रात रहे थे, वो मुख्य मंत्री तो बने नहीं?
हांजी वही तो! इसी बात का तो मुझे अफ़सोस है.
- अरे तो बन न जाने देते, तब रटते. तुमको ऎसी भी क्या जल्दी पडी थी.
- अरे भाई तुम वकीलों के साथ यही बड़ी गड़बड़ है. तुम्हारा हर काम घटना हो जाने बाद शुरू हो जाता है और फैसला पीडित व आरोपित पक्ष के मर जाने के बाद. लेकिन हमें तो पहले से पता रखना पड़ता है कि कब कहाँ क्या होने वाला है और कौन मरने वाला है. यहाँ तक कि पुलिस भी हमसे ऎसी ही उम्मीद रखती है. ऐसा न करें तो नौकरी चलनी मुश्किल हो जाए.
- तो क्या? तो अब भुगतो.
- क्या भुगतूं?
- यही मेहनत जाया करने का रोना रोओ. और क्या?
- अब यार, इतना तो अगर सोचते तो वे तो सरकार ही न बनाते.
- कौन?
- अरे वही जिन्होंने बनाया था, और कौन?
- अरे नाम तो बताओ!
- अब यार नाम-वाम लेने को मत कहो. बस ये समझ लो की जिनकी लुढ़क गई.
- अब यार इतनी मेहनत की है तो उसे कुछ तो सार्थक कर लो. चलो बोलो एक बार प्रेम से - येद्दयुरप्पा.
- हाँ चल यार, ठीक है. बोल दिया - येद्दयुरप्पा.
(और मैं एक बार फिर बच्चे की तरह खुश हो लिया)
- लेकिन यार एक बात बता!
- पूछ!
- क्या तुमको सचमुच लगता है कि उनकी सरकार गिर गई?
- तू भी यार वकील है या वकील की दुम?
- क्यों?
- अब यार जो बात हिन्दी फिल्मों की हीरोइनों के कपडों की तरह पारदर्शी है, उसमें भी तुम हुज्जत करते हो. सरे अखबार छाप चुके, रेडियो और टीवी वाले बोल चुके. अब भी तुमको शुबहा है कि सरकार गिरी या नहीं?
- नहीं, वो बात नहीं है.
- फिर?
- में असल में ये सोच रहा हूँ कि उनकी सरकार बनी ही कब थी जो गिर गई.
- क्यों तुम्हारे सामने बनी थी! पाच-छः दिन तक चली भी.
- अब यार जिसकी स्ट्रेंग्थ ही न हो उस सरकार का बनना क्या?
- अब यूं तो यार जो एमपी ही न हो उसका पीएम होना क्या?
- हाँ, ये बात भी ठीक है.
- लेकिन यार एक बात बता!
- बोल!
- मैं ये नहीं समझ पा रहा हूँ की गिरा कौन?
- क्या मतलब?
- मतलब ये कि येद्दयुरप्पा गिरे, या उनकी सरकार गिरी, या उनकी पार्टी गिरी, या उनका गठबंधन गिरा, या उनका भरोसा गिरा, या फिर उन पर से राज्य का भरोसा गिरा, या उनका चरित्र गिरा, या इनकी पार्टी के सदर गिरे ....... यार मैं बहुत कनफुजिया गया हूँ.
- क्यों पार्टी के सदर के गिरने का सुबह तुमको क्यों होने लगा भाई?
- अरे वो आज उन्होने कहा है न कि देवेगौडा सबसे बडे विश्वासघाती हैं!
- हाँ तो ?
- मैं सोच रहा हूँ उन्होने पार्टी के भीतर तो विश्वासघात नहीं किया, जबकि इनकी पार्टी में तो ऐसे लोग भरे पड़े हैं!
- हूँ! लेकिन यार एक बात है. तेरी मेहनत रंग लाएगी. देखना, जब येद्दयुरप्पा सचमुच मुख्यमन्त्री बनेंगे तब तुमको फिरसे उनका नाम नहीं रटना पड़ेगा.
- पर यार वो अब दुबारा बनेंगे कहाँ?
- नहीं-नहीं, पक्का है बन जाएंगे.
- वो कैसे?
- याद कर 1996 जब इनकी 13 दिन की सरकार बनी थी। तब एक बार गिरे. फिर 13 महीने सरकार बनी. फिर गिरी और फिर पूरे पांच साल तक चली.
- सो तो ठीक है. लेकिन तब ये वाले अध्यक्ष भी इनकी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं थे.
- लेकिन उससे क्या हुआ?
- हुआ न! याद करो जब वे यूं पी में भाजपा अध्यक्ष हुए तो वहाँ से भाजपा की छुट्टी हो गई. अब राष्ट्रीय अध्यक्ष हुए हैं तो उनके लाल ने ही उनके दिए पार्टी टिकट पर हरे होने से मना कर दिया. अरे क्या मतलब है भाई? यही न कि ये या तो कांग्रेस के तर्ज पर चल रहे हैं. अभी टिकट प्रपोज कराएंगे, फिर इनकार करेंगे, फिर एक दिन धीरे से ले लेंगे. यानी पार्टी को धीरे-धीरे कर के अपने कार्यकर्ताओं और जनता की डिमांड पर एंड संस कम्पनी बना देंगे. या फिर यह कि बेटे को पता है की बाप क्या गुल खिलाएंगे. शायद इसीलिए वो किसी दुसरे पार्टी में अपना सियासी भविष्य खोजने की कोशिश में जुट गया है. वैसे जैसे कांग्रेस का भतीजा चला आया ...........
- ए भाई! तुम तो बड़ी खतरनाक बात कर रहे हो. बेगम ने मुझे सब्जी लेने भेजा था. देर हो गई तो मार भी पड़ेगी.

(वैधानिक सवाल : यह मेरी और मेरे और मेरे वकील मित्र सलाहू की आपसी और गोपनीय बातचीत है. कहीं इसे आपने सुन तो नहीं लिया?)

Tuesday, 20 November 2007

हाय! पीले पड़े कामरेड



इष्ट देव सांकृत्यायन
कामरेड आज बाजार में मिले तो हमने आदतन उनको लाल सलाम ठोंका. लेकिन बदले में पहले वो जैसी गर्मजोशी के साथ सलाम का जवाब सलाम से दिया करते थे आज वैसा उन्होने बिलकुल नहीं किया. वैसे तो उनके बात-व्यवहार में बदलाव में कई रोज से महसूस कर रहा हूँ, लेकिन इतनी बड़ी तब्दीली होगी कि वे बस खीसे निपोर के जल्दी से आगे बढ़ लेंगे ये उम्मीद हमको नहीं थी. कहाँ तो एकदम खून से भी ज्यादा लाल रंग के हुआ करते थे कामरेड और कहाँ करीब पीले पड़ गए.
हालांकि एकदम पीले भी नहीं पड़े हैं. अभी वो जिस रंग में दिख रहे हैं, वो लाल और पीले के बीच का कोई रंग है. करीब-करीब नारंगी जैसा कुछ. हमने देखा है, अक्सर जब कामरेड लोग का लाल रंग छूटता है तो कुछ ऐसा ही रंग हो जाता है उन लोगों का. बचपन में हमारे आर्ट वाले मास्टर साहब बताए भी थे कि नारंगी कोई असली रंग नहीं होता है. वो जब लाल और पीला रंग को एक में मिला दिया जाता है तब कुछ ऐसा ही रंग बन जाता है. भगवा रंग कैसे बनता होगा ये तो में नहीं जानता, लेकिन मुझे लगता है कि शायद इसी में जब पीला रंग थोडा बढ़ जाता होगा तब वो भगवा बन जाता होगा.
मैंने बडे-बूढों से सुना भी है कि कामरेड लोग जब लाल रंग छोड़ते हैं तो लोग भगवे बूकने लगते हैं. हो न हो, इस बात में कुछ दम जरूर है. ये तो हमने खुद देखा है कि जो कामरेड लोग की हाँ में हाँ मिलाने से चूका, यानी आम को आम और इमली को कहने की ग़लती किया या उनके किसी टुच्चे से भी तर्क को काटने के लिए कोई दमदार तर्क लाया, उसे वो लोग तुरंत संघी घोषित करते हैं. मतलब तो यही हुआ न कि अपने बाद वह अगर किसी विचारधारा को मान्यता देते हैं तो वह संघ ही है. भले संघ का विचारधारा जैसी किसी चीज से कोई लेना-देना न हो. पर कामरेड लोग लाल और भगवे के अलावा बाकी किसी रंग को कोई मान्यता नहीं देते.
इसकी मुझे एक और वजह लगती है. एक तो यह कि कामरेड लोग अपने को सर्वहारा बताते हैं, जिसके पास हरने के लिए कुछ नहीं है और जीतने के लिए पूरी दुनिया. हम देखते हैं भगवाधारी बाबा लोग भी कुछ ऐसही बोलते हैं- ऐ मेरा क्या ले लेगा, क्या है मेरे पास. कामरेड लोग बम-बंदूक की बात करते हैं और बाबा लोग चिमटा-फरसा की. तेवर और तरीका दूनो का एक ही होता है. रही बात भाषा की तो अब कामरेड लोग भी तनी-तनी संस्कृत बोलने लगे हैं और बाबा लोग भी तनी-तनी अन्गरेंजी.
इसके बावजूद एक बात जो मेरी समझ में नहीं आ रही है वह है इस रंग परिवर्तन की रासायनिक प्रक्रिया. ये अलग बात है कि इधर दो-तीन साल से वो लोग अखबार-मैगजीन में थोडा छपने लगे थे, टीवी पर भी दिखने लगे थे. पर उनसे इनका कोई रेगुलर सम्पर्क नहीं था. अव्वल तो ये तवज्जो भी किसी और से सम्पर्क के नाते मिलने लगी थी. जिनके नाते इनको यह तवज्जो मिलने लगी थी उनका रंग है झक सफ़ेद. वैसे ये सच्चाई है कि उस सफ़ेद रंग से उनका समझौता शुरू से ही है, पर वह अन्दरखाते है. हालांकि ये जब-तब जाहिर भी होता रहा है. मसलन कमेटियों, परिषदों, अकादमियों या कमीशनों में मनोनयन और चुनावों, सरकारी खर्चे पर विदेश यात्राओं या फिर इमरजेंसी जैसे मौकों पर. फिर भी इतना खुल्लम-खुला खेल फरुक्खाबादी इन दोनों के बीच कभी नहीं चला.
हो न हो, ई मामला कुछ यूरोप-यूरोप है. इनकी इम्पोर्टेड विचारधारा और उनकी इम्पोर्टेड नेता. क्या गजब इत्तेफाक है! साझा सरकारों के अन्दर ऐसा तालमेल भी संजोग से ही मिलता है. अब देखिए सफेद्की पाल्टी के बापू की धोती सरे-बाजार उतार ली गई और जनता चेंचिया के रह गई, पर कामरेड लोग ऊंह तक नही किए. इसके पहले की जनता का भरोसा उनसे उठता एक और कमाल हुआ. पता नहीं क्या परमाणु-वर्माणु को लेकर भारत-अमेरिका के बीच समझौता होने लगा. बस अब अड़ गए कामरेड और खूब ठनी दो बांकों में. ये कहे समझौता हुआ तो हम सरकार गिरा देंगे. वे कहे हम समझौता करेंगे और सरकार गिरा लेंगे. ये तो बाद में पता चला कि असल में ये असली नहीं नूरा कुश्ती थी. देखिए न! आज तक न तो कोई गिरा और न कोई गिराया.
अब सबसे जोरदार मामला तो ऊ लग रहा है जो
नंदीग्राम में हो रहा है। अस्सी के दशक में कौनो सिनेमा ऐसा आया होता तो लोग टूट ही पड़ते हाल पर. बिना कौनो प्रचार के हर शो हाउसफुल जाता जी! मार-धाड़-बम-बंदूक-सस्पेंस-थ्रिल अरे का नहीं है जी उसमें. अगर कौनो दूसरे पार्टी की गौरमेंट बंगाल में रही होती तो अब तक उसको सिपुर्दे-खाक तो कर ही दिया गया होता और वहाँ राष्ट्रपति महोदया का शासन भी लग गया होता. पर देखिए न! कामरेड लोगों का पुण्य प्रताप! है कोई माई का लाल जो उनकी लाल सरकार को हाथ लगा के देखे? लेकिन लगता है की अपने कामरेड सफ़ेद रंग के इतने सघन संग के बावजूद अभी इतनी सफेदी नहीं सोख पाए हैं की उनके खून का रंग सफ़ेद हो गया हो. पर क्या करें ये बात सबसे कह भी तो नहीं सकते हैं न! शायद इसीलिए .....

Monday, 19 November 2007

बोलो कुर्सी माता की - जय



इष्ट देव सांकृत्यायन
अधनींदा था. न तो आँख पूरी तरह बंद हुई थी और न खुली ही रह गई थी. बस कुछ यूं समझिए कि जागरण और नींद के बीच वाली अवस्था थी. जिसे कई बार घर से भागे बाबा लोग समाधि वाली अवस्था समझ लेते हैं और उसी समय अगर कुछ सपना-वपना देख लेते हैं तो उसे सीधे ऊपर से आया फरमान मान लेते हैं. बहरहाल में चूंकि अभी घर से भगा नहीं हूँ और न बाबा ही हुआ हूँ, लिहाजा में न तो अपनी उस अवस्था को समाधि समझ सकता हूँ और उस घटना को ऊपर से आया फरमान ही मान सकता हूँ. वैसे भी दस-पंद्रह साल पत्रकारिता कर लेने के बाद शरीफ आदमी भी इतना तो घाघ हो ही जाता है कि वह हाथ में लिए जीओ पर शक करने लगता है. पता नहीं कब सरकार इसे वापस ले ले या इस बात से ही इंकार कर दे कि उसने कभी ऐसा कोई हुक्म जारी किया था!
बहरहाल मैंने देखा कि एक भव्य और दिव्य व्यक्तित्व मेरे सामने खडा था. यूरोप की किसी फैक्ट्री से निकल कर सीधे भारत के किसी शो रूम में पहुँची किसी करोड़टाकिया कार की तरह. झक सफ़ेद चमचमाते कपडों में. ऐसे सफ़ेद कपडे जैसे 'तेरी कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफ़ेद क्यों?' टाईप के विज्ञापनों में भी नहीं दिखाई देते. कुरते से ज्यादा सफ़ेद पायजामा, पायजामे से ज्यादा सफ़ेद कुरता और इन दोनों से ज्यादा सफ़ेद टोपी. गजब सफेदी थी, इस देश के दरिद्रों के चरित्र की तरह. में तो अभिभूत हो गया यह सफेदी देख कर ही.
अब इसके पहले की भूत हो जाऊं मैंने पूछ लेना ही मुनासिब समझा, "आपकी तारीफ़?" "जी मुझे नेता कहते हैं. मैं इस देश का कर्णधार हूँ." इतनी मधुर आवाज आई की लगा आकाशवाणी हो रही हो. आकाशवाणी की याद आते ही लगा जैसे समाचार सुन रहा होऊं और फिर मैं लगा प्राईवेट रेडियो-टीवी चैनलों को कोसने. ये चाहे कितनी सुन्दर लड़कियों को बतौर जोकी और एंकर रख लें, पर इतनी मधुर आवाज उनसे कभी नहीं सुनी जा सकती.
"क्यों? क्या हुआ? कहाँ खो गए वत्स?" शायद सपने में भी मुद्दे से भटकते मेरे ध्यान को नेताजी ने ताड़ लिया था. नेताजी की दुबारा से आई और भी ज्यादा मधुर आवाज ने मुझे नए सिरे से सचेत किया और मैं हदबदाया हुआ घर के भीतर भागा. इस ग्लानिबोध के साथ कि अपने द्वार पर खडे इतने बडे शख्स की मैं ढंग से अगवानी तक नहीं कर पा रहा हूँ. बहरहाल जैसे-तैसे ढूंढ कर अपनी इकलौती टुटही कुर्सी लेकर हाजिर हुआ.
मैं उसे पोछने ही जा रहा था कि नेताजी ने बडे आग्रह के साथ मेरे हाथ पकड़ लिए, "अरे-अरे ये क्या कर रहे हैं आप? में इसी पर बैठ लूंगा." नेताजी की वाणी ने एक बार फिर मेरे कानों में मिश्री की मिठास घोल दी.
"अरे नहीं. कई दिनों से रखी-रखी बहुत गंदी हो गई है और टुटही तो है ही. कहीं आप को किरचें-विराचें गड़ गईं तो ...."
"ही-ही-ही ........ आप पत्रकार लोग भी गजब होते हैं!" कल्कलाते झरने सी नेताजी की वह हँसी हिन्दी सिनेमा की किस हिरोईन जैसी थी, मैं याद नहीं कर पा रहा हूँ. "भला हमें कुर्सी की किरच भी कभी गड़ सकती है?"
नेताजी की इस बात का मर्म मैं सचमुच नहीं समझ पाया. मैं उन्हें वैसे ही भकुआया हुआ ताकता रह गया जैसे पिछडे हुए गाँव तकते हैं नई आयी सरकारी योजनाओं को. नेताजी ने लगता है मेरी नजर को ताड़ लिया. तभी तो उन्होने मुझे समझाने वाले अंदाज में बडे प्यार से कहा, "अरे भाई इतना तो आप जानते ही हैं की कुर्सी ही हमारा ईमान है. फिर भला कुर्सी की किरच हमें कैसे चुभ सकती है?
"थोडा अर्था कर कहें महराज!" आखिरकार मैंने हिम्मत करके बिनती कर ही दी.
"नहीं समझे" उन्होने अलजेबरा के मास्टरों की तरह समझाने वाले लहजे में कहा, "अब देखिए, वैसे तो कहने को हम धर्मनिरपेक्ष हैं. यानी हमारा कोई धर्म नहीं है. लेकिन असल में यही हमारा धर्म है. और कुर्सी उस धर्म का मर्म है. बस यह समझ लो ऑक्सीजन के बगैर तो हम दो-चार दिन जी सकते हैं, लेकिन कुर्सी के बगैर हमारी आत्मा एक पल के लिए भी हमारे शरीर में ठहर नहीं सकती. कुर्सी के लिए हम उल्लू को हंस और हंस को उल्लू तो क्या, गधे को बाप और बाप को गधा कह सकते हैं. कुर्सी के लिए हम दंगे करवा सकते है और दंगे के लिए जिम्मेदार लोगों को फांसी के तख्ते पर चढ़ जाने के बाद भी वहाँ से उतार सकते हैं."
"लेकिन ऐसा आप क्यों करते हैं?" आखिरकार हर पत्रकार की तरह मैंने भी अपने मूर्ख होने का परिचय दे ही दिया.
"अरे भाई इतना भी नहीं समझते! अगर हम उन्हें नहीं बचाएंगे आगे हमें दंगे करवाने के लिए लोग कहाँ से मिलेंगे? भला कौन बुरा आदमी हमारी भलमनसी पर भरोसा करेगा? और कैसे हम जमाए रख पाएंगे कुर्सी पर अपना कब्जा?"
"लेकिन हमने तो आपकी महान कुल परम्परा के बारे में कुछ और ही सुना था?"
"क्या सुना था वत्स?"
"यही कि आप लोग अत्यंत देशभक्त हैं और देश के लिए आपके कई पुरखों ने तो अपनी जान तक न्यौछावर कर दी है!"
"बिलकुल ठीक सुना है. इसमें गलत क्या है. लेकिन बताओ क्या इस देश की आत्मा एक कुर्सी में ही नहीं बसी हुई है? क्या पूरा भारत ही एक कुर्सी नहीं है और क्या एक कुर्सी ही पूरा भारत नहीं है? और टैब अगर एक कुर्सी में pइछाली कई पीढियों से हमारी इतनी गहरी आस्था है तो इसमें बुरा क्या है? अगर हम कुर्सी के लिए अपनी जान दे सकते हैं तो दूसरों की ले लेने में भी हमारे लिए क्या हर्ज है?"
में एकदम चकरघिन्नी हो गया था। नेताजी के ये मधुर वचन और गीता का कर्मयोग मेरे दिमाग में ऐसे खुदुर-बुदुर हो रहे थे जैसे अलमुनियम की पतीली में तेज आंच पर रखे चावल और उड़द होते हैं. इसके पहले कि मैं मामले को कुछ समझ पाता भीड़ से नारों की ऊंची आवाज मेरे कान में आने लगी - बोलो कुर्सी माता की जय, बोलो कुर्सी माता की जय, बोलो कुर्सी माता की जय.......

Thursday, 15 November 2007

अब वह नहीं डरेगा


इष्ट देव सांकृत्यायन
मैडम आज सख्त नाराज हैं. उनकी मानें तो नाराजगी की वजह बिल्कुल जायज है. उन्होने घोषणा कर दी है कि अब घोर कलयुग आ गया है. मेरी मति मारी गई थी जो मैने कह दिया कि यह बात तो मैं तबसे सुनता आ रहा हूँ जब मैं ठीक से सुनना भी सीख नहीं पाया था. कहा जाता था बेईमान तो मैं समझता था बेम्बान. गाया जाता था - "दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए" तो मैं समझता था "दिल चीत क्या है आप मेरी जान लीजिए" और वो जान भी लाइफ वाली नहीं केएनओडब्लू नो वाली. हालांकि तब उसे मैं पढ़ता था कनऊ. अब जब मैं चारों युगों के बारे में जान गया हूँ, जान गया हूँ कि सतयुग में हरिश्चंद्र के सत्यवादी होने का नतीजा क्या हुआ, त्रेतामें श्रवण कुमार और शम्बूक का क्या हुआ, द्वापर में बर्बरीक और अश्वत्थामा के साथ क्या हुआ तो मुझे कलयुग में आजाद, भगत सिंह या सुभाष के हाल पर कोई अफ़सोस नहीं होता.
ये अलग बात है कि मैंने कलयुग को न तो किसी तरफ से आते देखा और न जाते देख रहा हूँ. पर नहीं साहब मैडम का साफ मानना है कि कलयुग आया है और वो जिस तरह इसका दावा कर रहीं हैं उससे तो ऐसा लगता है गोया वो अभी थोड़ी देर पहले कहीं से घूमता-घामता चला आया है. करीब-करीब वैसे ही जैसे किसी वारदात की जगह पर रिपोर्टर पहुंच जाते हैं. अब करीब एक दशक से भी ज्यादा पुराने पति की भला ये बिसात कहाँ है कि इससे ज्यादा जोर दे ! पर बेवजह इस नाचीज को कलयुग लाने के लिए दोषी ठहरा दिया गया है, इस तमगे के साथ कि तुमसे सब्जी तक तो लाई नहीं जाती. पर साहब यह आरोप तो सिद्ध हो गया कि कलयुग को मैं ही लाया और वह भी पांच साल के बालक को उलटी सीधी बातें सिखा कर. दरअसल हुआ यह है कि बालक ने डरने से मना कर दिया है. उसने साफ कह दिया है कि अब वह किसी चीज से नहीं डरेगा. बन्दर से, भालू से, कुत्ते से, बिल्ली से, गन से, कैनन से और यहाँ तक कि आपसे यानी अपनी मम्मी से भी नहीं. मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि जो बात कहने की हिम्मत मैं तेरह साल में नहीं जुटा सका वह उसने पांच साल में कह दी. इसके पहले कि मैं इस बात को लेकर अपने खिलाफ हुए एकतरफा फैसले पर कुछ सोच पाता सलाहू आ धमका है. पेशे से वकील होने के नाते यह तो उसका कर्मसिद्ध अधिकार है ही कि जहाँ भी फटा देखे वहाँ टांग अड़ा दे. यह अलग बात है नाम सलाहुद्दीन होने के बावजूद सलाह कभी मुफ्त में न दे. सो सलाहू ने आते ही भांप लिया कि आज मामला कुछ टेंस है. लिहाजा उसने सवाल भी दाग ही दिया, 'क्या बात है भाई! तुम तो ऐसे मुंह लटकाए बैठे हो गोया मुंह न हुआ गठबंधन सरकार हो गई. कोई खास वजह?'
वजह मुझे बताने की नौबत नहीं आई. मैडम ही शुरू हो गईं, 'ये क्या बताएंगे वजह? बच्चे को ऐसा बिगाड़ दिया है कि अब वह किसी भी चीज से डरने से मना करने लगा है.'
'क्या मतलब?' असल में ऎसी वजह के नाते मुंह लटकाने की बात सलाहू की समझ में नहीं आई, 'अरे बच्चा डरने से मना कर दे तो इसके लिए तो उसकी हिम्मत को दाद दी जानी चाहिए. इसमें भला इसका क्या कसूर हो सकता है भाभी. यह तो खुद आपसे इतना डरता है?' सलाहू ने बचाव पक्ष के सधे हुए वकील की तरह दलील दी. मुझे भी लगा कि चलो साले से दोस्ती किसी दिन तो काम आई. पर मैडम ने बगैर किसी मरव्वत के विद्वान जज की तरह यह दलील खारिज कर दी. 'कसूर है इनका' मैडम ने कहा, 'ऐसे कि पहले जब बच्चा कुछ खाना नहीं खाता था तो में उसे बन्दर आने का डर दिखा कर खाना खिला देती थी. वह बन्दर से डरता था. एक दिन ये उसे जू ले गए. बन्दर दिखाया, लंगूर दिखाया और वन-मानुष दिखाया. आखिरकार ये भी बता दिया कि बन्दर आदमी के पूर्वज हैं. बन्दर से डरने की कोई जरूरत नहीं है. अब अगर कभी छत पर बन्दर आ जाता है तो मैं तो डर के मारे भाग जाती हूँ और मुन्ना उसे फल दे आता है. अब में उसे कैसे डराऊँ?'
सलाहू को मेरे बचाव में अपनी दलील देने का मौका नहीं मिल रहा था. मैडम बूके जा रहीं थीं, 'खैर मैंने उसे कुत्ते से डराना शुरू किया तो वह भी इन्होने ख़त्म कर दिया. फिर मैंने उसे बिल्ली से डराना शुरू किया तो इन्होने उसे घंटी बांधने वाली कहानी सुना दी और समझा दिया कि बिल्ली से सिर्फ चूहे डरा करते हैं. बच्चों को डरने की जरूरत नहीं है. बच्चों की तो वह मौसी होती है. तो अब उसने बिल्ली से भी डरना छोड़ दिया. मैंने सोचा कि ये तो हर चीज से निडर होता जा रहा है तो मैंने इसे ऎसी चीज से डराने की सोच ली जो दिखे ही नहीं. तो मैंने उसे डराने के लिए एक काले कोट वाले बाबा को ईजाद किया. दो-चार दिन डरा, पर आज जब मैं उसे पढ़ने के लिए डरा रही थी तो उसने एकदम से मना कर दिया. बोल दिया कि अब मैं काले कोट वाले बाबा से नहीं डरूंगा. अब मैं किसी भी चीज से नहीं डरूंगा. तब से मैं भालू, गैंडा, शेर जाने क्या-क्या बता चुकी, पर यह नहीं डर रहा है.'
'पर भाभी इसने तो इसे सिर्फ जानवरों से डरने से मना किया था. अब बाबे से अगर बच्चा नहीं डरता और उसने किसी से भी डरने से इनकार कर दिया, यानी चन्द्रशेखर आजाद या भगत सिंह के रास्ते पर चल पडा है तो इसमें मेरे यार की क्या गलती हो सकती है?'
'उसका यह डर गया कैसे है, मालूम है?' मैडम ने त्योरियां चढाए हुए ही सलाहू से पूछा.
सलाहू ने भी सधे हुए वकील की तरह जवाब दिया, 'बता ही दीजिए.'
'हुआ यह की आज सुबह इसने पूछा की पापा ये काले कोट वाला बाबा क्या होता है? तो अब इनको पहले से कुछ पता तो था नहीं. सो इन्होने बताया कि वो तुम्हारे सलाहू अंकल हैं न, वो काला कोट पहनते हैं न! तो उन्हें काले कोट वाला बाबा कहा जाता है. उसने पूछा तो क्या उनसे डरना चाहिए. तो इन्होने बताया कि बिलकुल नहीं. बच्चे कहीं अपने अंकल से डरते हैं! फिर उसने पूछा कि अगर कहीं वो पकड़ लें तो क्या करेंगे? तो इन्होने बता दिया कि तुमको चोकलेट खिलाएंगे और क्या करेंगे. तब से उसने मान लिया है कि मैं हर चीज से उसे झूठ-मूठ में ही डराती हूँ और अब वह किसी भी चीज से नहीं डरेगा.'
'वाह क्या बात है भाभी, आपको तो खुश होना चाहिए. इस बच्चे का विकास तो इस देश की जनता की तरह हो रहा है.' सलाहू ने बहुत भौकाली अंदाज में यह बात कही और मैडम पैर पटकती हुई बेगम सलाहू के साथ किचन की ओर चल पडीं. मुझे भी अपनी जान बख्शी हुई सी लगी. मैं सलाहू की ओर नमूदार हुआ, 'क्यों बे! तू मुन्ने के विकास को जनता के विकास से क्यों जोड़ रहा है?'
'देख भाई!' सलाहू बोला, 'पहले उन्नीसवीं सदी में जब बच्चे डरते थे तो माताएं उन्हें हिम्मत बंधातीं थीं. कोई और सहारा न होने पर खुदा को याद करने या हनुमान जी का नाम लेने के लिए कहती थीं. तब देश में अंग्रेजों की हुकूमत थी. देश में डर ही डर था. सरकार का डर, ठगों का डर, पुलिस का डर, साहूकार का डर, जमींदार का डर ..... सिर्फ डर ही डर था. तो माताएँ डर से मुक्त करने के लिए देवी-देवताओं या वीरों-वीरांगनाओं की याद दिलातीं थीं. फिर देश आजाद हो गया. लोकतंत्र आ गया. डर भाग गया तो हमारे हुक्मरानों को लगा कि ऐसे कैसे काम चलेगा. तो उन्होने नए-नए डर बनाने शुरू किए. ऐसे कि जिनसे आम आदमी तो डरे पर उनकी सेहत पर कोई फर्क न पड़े. सो उन्होने डराने की नई-नई तरकीबें ईजाद कीं और उसके लिए मशीनरी बनाई. जनता बहुत दिनों तक उससे डरती रही. उसी दौरान माताओं ने भी डर की अहमियत को समझते हुए बच्चों को डराना शुरू किया .... बेटा सो जा नहीं तौ गब्बर आ जाएगा. फिर बच्चा डरने लगा.
लेकिन डरने का यह दौर बहुत दिन चला नहीं, न तो बच्चों पर और न जनता पर. जनता ने देखा कि उनके लिए जो सिपाही हैं नेताओं के लिए बिजूके हैं. बडे लोग जब अपराध करते हैं तो उनको यही बचाते हैं और जनता को डराते हैं. फिर हम क्यों डरें? लिहाजा उसने डरने से एक दिन इनकार कर दिया. वैसे ही जैसे किसी दिन आजाद, मंगल, भगत ने कर दिया था. अब बच्चे को अगर मां डराती है तो वह कहता है की- अच्छा तो मुझे जल्दी से पिज्जा दिलाओ. नहीं तौ में पापा को बता दूंगा की रोज रात को यहाँ गब्बर आता है. इसी तरह नेताजी जब जनता को डराते हैं कि पुलिस बुला दूंगा तौ वह जूता उठा लेती है. नेता वोट मांगने जाते हैं तौ वह डिग्री मांगने लगती है. जनरल साहब इमरजेंसी लगाते हैं तौ वह बगावत पर उतर आती है. अरे भाई अब अगर बच्चा बोल पडा कि में तो नहीं डरूँगा तो इसमें हैरत की बात क्या है? आखिर एक न एक दिन तो यह होना ही था, वैसे जैसे देश की जनता ........

Tuesday, 13 November 2007

कंडोम से बन रहे हैं रबर बैंड्स



शुक्र है कि यह खबर भारत से नहीं है। कंडोम से रबरबैंड और हेयरबैंड बन रहे हैं। इसके प्रयोग से एड्स सहित तमाम रोगों का खतरा है। चिकित्सकों ने इस पर चिंता जाहिर की है। चीन के ग्वांगदांग प्रांत में इस्तेमाल किए गए कंडोम से बने रबरबैंड और हेयरबैंड की बिक्री बढ़ रही है। स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ने के कारण लोगों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई है। चाइना डेली ने प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दोंग गुआंग शहर में रिसाइकिल्ड कंडोम न केवल बेंचे जा रहे हैं, बल्कि ब्यूटीपार्लरों तक में पहुंचाए जा रहै हैं। दैनिक ने लिखा है कि इन सस्ते और रंग-बिरंगे हेयरबैंडों तथा रबरबैंडों की शहर में अच्छी खासी बिक्री हो रही है। इससे स्थानीय लोगों और पर्यटकों के स्वास्थ्य का भी खतरा पैदा हो गया है। स्थानीय डॉक्टरों के हवाले से कहा गया है कि इससे यौन संक्रमित बीमारियों और एड्स के प्रसार का खतरा बढ़ गया है। इस हेयरबैंड में बहुत से विषाणु होते हैं। बालों की चोटी बनाते समय या उन्हें बांधते समय इन रबड़बैंड्स को मुंह में पकड़ने से संबंधित व्यक्ति या महिला एड्स या किसी अन्य यौन संचारी रोग की चपेट में आ सकते हैं।

कता

उम्मीद की किरण लिए अंधियारे में भी चल।
बिस्तर पे लेट कर ना यूँ करवटें बदल।

सूरज से रौशनी की भीख चाँद सा न मांग,
जुगनू की तरह जगमगा दिए की तरह जल ॥

-विनय ओझा स्नेहिल

मौत की घाटी नहीं है मेरा देश

-दिलीप मंडल

नंदीग्राम एक प्रतीक है। ठीक उसी तरह जैसा प्रतीक गुजरात में 2002 के दंगे हैं। जिस कालखंड में हम जी रहे हैं, उस दौरान जब कुछ ऐसा हो तो क्या हम कुछ कर सकते हैं? एक मिसाल इराक पर हुए अमेरिकी हमले के समय की है। जब इराक पर हमला होना तय हो चुका था तो एक खास दिन हजारों की संख्या में युद्धविरोधी अमेरिकी अपनी अपनी जगह पर एक तय समय पर खड़े हो गए। उन्होंने आसमान की ओर हाथ उठाया और कहा- रोको। अमेरिकी हमला तो इसके बावजूद हुआ। लेकिन विरोध का जो स्वर उस समय उठा, उसका ऐतिहासिक महत्व है।

नंदीग्राम के संदर्भ में मेरा कहना है- आइए मिलकर कहें, उनका नाश हो!ऐसा कहने भर से उनका नाश नहीं होगा। फिर भी कहिए कि वो इतिहास के कूड़ेदान में दफन हो जाएं। ये अपील जनवादी लेखक संघ और प्रगतिशील लेखक संघ वालों से भी है। नंदीग्राम में और सिंगुर में और पश्चिम बंगाल के हजारों गावों, कस्बों में सीपीएम अपने शासन को बचाए रखने के लिए जिस तरह के धतकरम कर रही है, उसे रोकने के लिए आपका ये महत्वपूर्ण योगदान होगा। आपको और हम सबको ये कहना चाहिए कि "मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश।"

सीपीएम ने जुल्मो-सितम ढाने का जो मॉडल पेश किया है, उसकी मिसाल कम ही है। विकासहीनता की जो राजनीति वाम मोर्चा ने पश्चिम बंगाल में की है, उसके बावजूद तीस साल से उसका शासन बना हुआ है। लोग नाराज हैं, पर उसका नतीजा वोट में नजर नहीं आता।

दरअसल सीपीएम ने राजकाज को एक माफिया तंत्र की तरह फाइनट्यून कर लिया है। शासन और विकास के लिए आने वाले पैसों से लेकर नौकरयों की लूट में पार्टी तंत्र की हिस्सेदारों के जरिए, प्रभावशाली जातियों और समुदाय के लोगों को सत्ता में स्टेकहोल्डर बना लिया गया है। लेकन पश्चिम बंगाल का वो किला दरक रहा है। खासकर मुसलमानों में मोहभंग गहरा है। क्या आप ये देख रहे हैं कि नंदीग्राम में मरने वालों के जो नाम सामने आ रहे हैं, उनमें लगभग सभी मुसलमान और दलित उपनाम वाले हैं। 25 फीसदी मुसलमानों की सरकारी नौकरियों में 2 फीसदी हिस्सेदारी की जो बात सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में सामने आई है, उसकी कोई सफाई सीपीएम के पास नहीं है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति करवट ले रही है। लेकिन बाकी राज्यों की तरह यहां का परिवर्तन शांति से निबटने वाला नहीं है। ये बेहद तकलीफदेह प्रक्रिया साबित होने वाली है। नंदीग्राम में आप इसकी मिसाल देख चुके हैं।

नीचे पढ़िए पश्चिम बंगाल सरकार की असलियत बयान करता एक आलेख-

वामपंथी राज में रिजवान के परिवार को न्याय मिलेगा क्या

रिजवान-उर-रहमान की मौत/हत्या के बाद के घटनाक्रम से पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री और सीपीएम पोलिट ब्यूरो के सदस्य ज्योति बसु चिंतित हैं। ज्योति बसु सरकार में शामिल नहीं हैं , इसलिए अपनी चिंता इतने साफ शब्दों में जाहिर कर पाते हैं। उनका बयान छपा है कि रिजवान केस में जिन पुलिस अफसरों के नाम आए हैं उनके तबादले का आदेश देर से आया है। इससे सीपीएम पर बुरा असर पड़ सकता है।रिजवान जैसी दर्जनों हत्याओं को पचा जाने में अब तक सक्षम रही पश्चिम बंगाल के वामपंथी शासन के सबसे वरिष्ठ सदस्य की ये चिंता खुद में गहरे राजनीतिक अर्थ समेटे हुए है।

रिजवान कोलकाता में रहने वाला 30 साल का कंप्यूटर ग्राफिक्स इंजीनियर था, जिसकी लाश 21 सितंबर को रेलवे ट्रैक के किनारे मिली। इस घटना से एक महीने पहले रिजवान ने कोलकाता के एक बड़े उद्योगपति अशोक तोदी की बेची प्रियंका तोदी से शादी की थी। शादी के बाद से ही रिजवान पर इस बात के लिए दबाव डाला जा रहा था कि वो प्रियंका को उसके पिता के घर पहुंचा आए। लेकिन इसके लिए जब प्रियंका और रिजवान राजी नहीं हुए तो पुलिस के डीसीपी रेंक के दो अफसरों ज्ञानवंत सिंह और अजय कुमार ने पुलिस हेडक्वार्टर बुलाकर रिजवान को धमकाया। आखिर रिजवान को इस बात पर राजी होना पड़ा कि प्रियंका एक हफ्ते के लिए अपने पिता के घर जाएगी। जब प्रियंका को रिजवान के पास नहीं लौटने दिया गया तो रिजवान मानवाधिकार संगठन की मदद लेने की कोशिश कर रहा था। उसी दौरान एक दिन उसकी लाश मिली।

रिजवान की हत्या के मामले में पश्चिम बंगाल सरकार और सीपीएम ने शुरुआत में काफी ढिलाई बरती। पुलिस के जिन अफसरों पर रजवान को धमकाने के आरोप थे, उन्हें बचाने की कोशिश की गई। पूरा प्रशासन ये साबित करने में लगा रहा कि रिजवान ने आत्महत्या की है। राज्य सरकार ने मामले की सीआईडी जांच बिठा दी और एक न्यायिक जांच आयोग का भी गठन कर दिया गया। इन आयोगों और जांच को रिजवान के परिवार वालों ने लीपापोती की कोशिश कह कर नकार दिया। आखिरकार कोलकाता हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार को सीबीआई जांच के लिए तैयार होना पड़ा। कोलकाता के पुलिस कमिश्नर और दो डीसीपी को उनके मौजूदा पदों से हटा दिया गया और आखिरकार मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य खुद रिजवान के परिवारवालों से मिलने पहुंचे, क्योंकि रिजवान की मां उनसे मिलने के लिए नहीं आई। राज्य सरकार ने परिवार वालों की मांग के आगे झुकते हुए न्यायिक जांच भी वापस ले ली है।

सवाल ये उठता है कि इस विवाद से राज्य सरकार इस तरह हिल क्यों गई है। दरअसल ये घटना ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम बंगाल के मुसलमानों में वाममोर्चा के खिलाफ व्यापक स्तर पर मोहभंग शुरू हो गया है। पश्चिम बंगाल देश के उन राज्यों में है, जहां मुसलमानों की आबादी चुनाव नतीजों को प्रभावित करती है। 25 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले इस राज्य में मुसलमानों की हालत देश में सबसे बुरी है। ये बात काफी समय से कही जाती थी, लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा गठित सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का प्रमाण जगजाहिर कर दिया है। राज्य सरकार से मिले आंकड़ों के आधार पर सच्चर कमेटी ने बताया है कि पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार की नौकरयों में सिर्फ 2 फीसदी मुसलमान हैं। जबक केरल में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत लगभग बराबर है पर वहां राज्य सरकार की नौकरियों में साढ़े दस फीसदी मुसलमान हैं। पश्चिम बंगाल में मुसलमानों का पिछड़ापन सिर्फ नौकरियों और न्यायिक सेवा में नहीं बल्कि शिक्षा, बैंकों में जमा रकम, बैंकों से मिलने वाले कर्ज जैसे तमाम क्षेत्रों में है।

साथ ही पश्चिम बंगाल देश के उन राज्यों में है, जहां सबसे कम रिजर्वेशन दिया जाता है। पश्चिम बंगाल में दलित, आदिवासी और ओबीसी को मिलाकर 35 प्रतिशत आरक्षण है। वहां ओबीसी के लिए सिर्फ सात फीसदी आरक्षण है। मौजूदा कानूनों के मुताबिक, मुसलमानों को आरक्षण इसी ओबीसी कोटे के तहत मिलता है।
सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद से ही पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बौद्धिक जगत में हलचल मची हुई है। इस हलचल से सीपीएम नावाकिफ नहीं है। कांग्रेस का तो यहां तक दावा है कि 30 साल पहले जब कांग्रेस का शासन था तो सरकारी नौकरियों में इससे दोगुना मुसलमान हुआ करते थे। सेकुलरवाद के नाम पर अब तक मुसलमानों का वोट लेती रही सीपीएम के लिए ये विचित्र स्थिति है। उसके लिए ये समझाना भारी पड़ रहा है कि राज्य सरकार की नौकरियों में मुसलमान गायब क्यों हैं।

अक्टूबर महीने में ही राज्य के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने प्रदेश के सचिवालय में मुस्लिम संगठनों की एक बैठक बुलाई। बैठक में मिल्ली काउंसिल, जमीयत उलेमा-ए-बांग्ला, जमीयत उलेमा-ए-हिंद, पश्चिम बंगाल सरकार के दो मुस्लिम मंत्री और एक मुस्लिम सांसद शामिल हुए। बैठक की जो रिपोर्टिंग सीपीएम की पत्रिका पीपुल्स डेमोक्रेसी के 21 अक्टूबर के अंक में छपी है उसके मुताबिक मुख्यमंत्री ने कहा कि सच्चर कमेटी ने राज्य में भूमि सुधार की चर्चा नहीं की। उनका ये कहना आश्चर्यजनक है क्योंकि सच्चर कमेटी भूमि सुधारों का अध्ययन नहीं कर रही थी। उसे तो देश में अल्पसंख्यकों की नौकरियों और शिक्षा और बैंकिग में हिस्सेदारी का अध्ययन करना था। बुद्धदेव भट्टाचार्य ने आगे कहा- "ये तो मानना होगा कि सरकारी और प्राइवेट नौकरियों में उतने मुसलमान नहीं हैं, जितने होने चाहिए। इसका ध्यान रखा जा रहा है और आने वाले वर्षों में हालात बेहतर होंगे। " अपने भाषण के अंत में बुद्धदेव भट्टाचार्य ने मुसलमानों को शांति और सुऱक्षा का भरोसा दिलाया। दरअसल वाममोर्चा सरकार पिछले तीस साल में मुसलमानों को विकास की कीमत पर सुरक्षा का भरोसा ही दे रही है।

रिजवान के मामले में सुरक्षा का भरोसा भी टूटा है। इस वजह से मुसलमान नाराज न हो जाएं, इसलिए सीपीएम चिंतित है। सीपीएम की मजबूरी बन गई है कि इस केस में वो न्याय के पक्ष में दिखने की कोशिश करे। रिजवान पश्चिम बंगाल में एक प्रतीक बन गया है और प्रतीकों की राजनीति में सीपीएम की महारत है। अगर पूरा मुस्लिम समुदाय ये मांग करता कि राज्य की नौकरियों में हमारा हिस्सा कहां गया तो ये सीपीएम के लिए ज्यादा मुश्किल स्थिति होती। लेकिन रिजवान की मौत से जुड़ी मांगों को पूरा करना सरकार के लिए मुश्किल नहीं है। आने वाले कुछ दिनों में आपको पश्चिम बंगाल में प्रतीकवाद का ही खेल नजर आएगा।

Monday, 12 November 2007

निशानी नहीं थी

हरि शंकर राढ़ी
किसने कहा कि वो रानी नहीं थी.
दुष्यंत की बस निशानी नहीं थी.

तन में टूटन थी न मन में चुभन थी
सच में सुबह वो सुहानी नहीं थी.

लहरों सी उसमें लचक ही लचक थी
पानी भी था और पानी नहीं थी.

जल्दी से कलियों ने आँचल हटाया
हालांकि उनपर जवानी नहीं थी.

कैसे सुनाता वफ़ा की इबारत
दिल पर लिखी थी जुबानी नहीं थी.

फूलों के रस डुबाकर लिखी जो
राढ़ी वो सच्ची कहानी नहीं थी.

Thursday, 8 November 2007

अब खुला समलैंगिकों का पांच सितारा होटल


सत्येन्द्र प्रताप
दुनिया भी अजीब है। अमीर लोगों के शौक। पहले तो समलैंगिकों के लिए विवाह करने के लिए छूट मांगी गई और अब उनके लिए पांच सितारा होटल भी खुल गया।
कोई गरीब आदमी रोटी मांगता है, मुफ्त शिक्षा की माँग करता है, उद्योगपतियों द्वारा कब्जियाई गई जमीन के लिए मुआवजा मांगता है तो देश चाहे जो हो, उसे गोली ही खानी पड़ती है। लेकिन इन विकृत मानसिकता वालों के लिए आंदोलन चले, उनकी मांगों को माना भी गया और होटल खुला, वो भी पांच सितारा। अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस-आयर्स मे समलैंगिकों के होटल खोला गया है! पांच सितारा होटल। ४८ कमरे हैं। पारदर्शी तल वाला स्विमिंग पुल है, साथ ही बार, रेस्टोरेंट भी. यह होटल शहर के सबसे पुराने इलाके san telmo मे खोला गया है।

Saturday, 3 November 2007

तीस-पैंतीस बार


एक सज्जन रास्ते पर चले जा रहे थे. बीच में कोई जरूरत पड़ने पर उन्हें एक दुकान पर रुकना पडा. वहाँ एक और सज्जन पहले से खडे थे. उनकी दाढी काफी बढी हुई थी. देखते ही राहगीर सज्जन ने मजाक उडाने के अंदाज में पूछा, 'क्यों भाई! आप दिन में कितनी बार दाढी बना लेते हैं?'
'ज्यादा नहीं! यही कोई तीस-पैंतीस बार.' दढियल सजान का जवाब था.
'अरे वाह! आप टू अनूठे हैं.'
'जी नहीं, में अनूठा-वनूठा नहीं. सिर्फ नाई हूँ.' उन्होने स्पष्ट किया.