इष्ट देव सांकृत्यायन राजकुमार सिद्धार्थ पहली बार अपने मंत्री पिता के सरकारी बंगले से बाहर निकले थे. साथ में था केवल उनका कार ड्राइवर. चूंकि बंगले से बाहर निकले नहीं, लिहाजा दिल्ली शहर के तौर-तरीक़े उन्हें पता नहीं चल सके थे. कार के बंगले से बाहर निकलते ही, कुछ दूर चलते ही रस्ते में मिला एक साईकिल सवार. हवा से बातें करती उनके कार के ड्राईवर ने जोर का हार्न लगाया पर इसके पहले कि वह साईड-वाईड ले पाता बन्दे ने गंदे पानी का छर्रा मारा ....ओये और 'बीडी जलाई ले जिगर से पिया ........' का वाल्यूम थोडा और बढ़ा दिया. इसके पहले कि राजकुमार कुछ कहते-सुनते ड्राईवर ने उन्हें बता दिया, 'इस शहर में सड़क पर चलने का यही रिवाज है बेबी.'
'मतलब?' जिज्ञासु राजकुमार ने पूछा.
'मतलब यह कि अगर आपके पास कार है तो आप चाहे जितने पैदल, साइकिल और बाइक सवारों को चाहें रौंद सकते हैं.' ड्राइवर ने राजकुमार को बताया. कार थोड़ी और आगे बढ़ी. ड्राइवर थोडा डरा. उसने जल्दी से गाडी किनारे कर ली. मामला राजकुमार की समझ में नहीं आया.
'क्या हुआ?' उन्होने ड्राइवर से पूछा.
'अरे कुछ नहीं राजकुमार, बस एक ब्लू लें आ रही है.'
'क्या ब्लू लाइन? ये कौन सी चीज है भाई?' वह अचकचाए.
'ये चीज नहीं है बेबी. धरती पर यमराज के साक्षात प्रतिनिधि हैं. साक्षात मौत.'
'मैं कुछ समझा नहीं?'
'बात दरअसल ये है कि धरती पर जब भी लोगों को यह घमंड हो जाता है कि अब मनुष्य ने बीमारियों का इलाज ढूँढ कर मृत्यु को जीत लिया है तो यमराज कोई नई बीमारी भेज देते हैं. दिल्ली में उसी का नाम ब्लू लाइन है. पहले इसे रेड लाइन कहते थे. इसके भीतर अगर कभी जाने का सौभाग्य आपको मिले तो आपको पता चलेगा कि वहाँ एक पूरा रेड लाईट एरिया होता है.'
'ये रेड लाईट एरिया क्या होता है?'
'ये वो एरिया होता है जहाँ सिर्फ वही लोग जा सकते हैं जिन्हे अपने मान-सम्मान और जीवन-मृत्यु की कोई परवाह न हो.'
'अच्छा! पर हम इसके भीतर तो जा नहीं रहे थे. तुम इसे देख कर डर क्यों गए?'
'वो क्या है राजकुमार कि अगर ब्लू लाइन बसों को इस बात का पूरा हक है कि ये जब चाहें कार वालों को भी रौंद सकती हैं. चूंकि यहाँ सडकों पर ट्रेनें और प्लेनें अभी चलती नहीं हैं, इसलिए इनका आप कुछ नहीं बिगाड़ सकते.'
थोडा और आगे बढ़े तो एक चौराहा दिखा. चौराहे पर लाल-पीली-हरी बत्तियां दिखीं. चारों तरफ चिल्ल-पों की फालतू आवाजों के साथ बेतरतीब आते-जाते गाड़ियों से गाड़ियों के बीच एक तरह की धक्का-मुक्की करते लोग दिखे. राजकुमार को पीछे चले संदर्भ याद आ गए. उन्होने फिर पूछा, 'क्या यही रेड लाईट एरिया है?'
'नहीं ये एरिया नहीं, सिर्फ रेड लाईट है. एरिया थोडा अलग मामला है. वहाँ जाने से आप बच भी सकते हैं. पर यहाँ तो आपको आना ही पड़ेगा. सबको आना पड़ता है.'
'ओह! और यह जो लाल-पीली बत्तियां लगीं हैं, ये किसलिए हैं?'
'किताबों में लिखा तो यह गया है कि ये ट्रैफिक कण्ट्रोल के लिए हैं. पर असल में ऐसा कुछ है नहीं. वास्तव में ये सिर्फ सजाने के लिए लगाई गईं हैं.'
कार को थोडा और आगे बढते ही एक खाकी वर्दीधारी ने रोका. राजकुमार ने देखा कि गितिर-पितिर अन्ग्रेज़ी बोलती एक अल्पवसना युवती उससे पहले ही भिडी हुई थी. पर राजकुमार के ड्राईवर ने कार का शीशा उतारा. डंडाधारी को कुछ कहा और आगे बढ़ गया. राजकुमार को फिर जिज्ञासा हुई. उन्होने पूछा,'क्या मामला था? वह युवती क्यों भिडी हुई है?'
'उसके पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं है.'
'ये क्या होता है?'
'ये एक प्रकार का कार्ड होता है, जिसके बग़ैर गाडी नहीं चलाई जा सकती है.'
'ओह! तो तुम्हारे पास था वो कार्ड?'
'नहीं. मेरे पास तो गाडी का आरसी भी नहीं है.'
'फिर तुमसे उसने कुछ कहा क्यों नहीं?'
'मैने उसे बता दिया कि ये मंत्री जी की गाडी है.'
'ओह! तो क्या मंत्री जी की गाडियां चलाने के लिए लाइसेंस की जरूरत नहीं होती?'
'हाँ. उनके लिए कोई नियम नहीं होता. ब्लू लाइन बसें इसीलिए तो सबको रौंदते हुए चलती हैं.'
'अच्छा! तो क्या ये ब्लू लाइन बसें मंत्री जी की हैं?'
'जी हाँ! आपके पिताजी की भी कई हैं. पर कागजों में इनका मालिक घुरहुआ है और मंत्री जी इन्हें चलवाते भी खुद नहीं हैं. सारी बसें ठेके पर चलती हैं.'
'ऐसा क्यों?'
'अब आपको क्या बताएं बेबी?' ड्राइवर अचानक से दार्शनिक हो गया, 'व्यवस्था ऐसे ही चलती है.'
हालांकि राजकुमार समझ नहीं पाए कि व्यवस्था क्या चीज है. पर उन्हें अब ड्राइवर से पूछना भी मुफीद नहीं लगा. आखिर वह क्या सोचता? यही न! कि राजकुमार इतना भी नहीं समझ सकते. लिहाजा वे अपने मौन में खो गए और सोचने लगे कि शायद यह कार है. या शायद ब्लू लाइन बस है. या शायद रेड लाईट है. या शायद वह एरिया है. या शायद ...............
और वह ध्यान मग्न हो गए. शायद उन्हें पहला आर्यसत्य मिल गया था.