Wednesday, 31 October 2007

अगर औरत की शक्ल में कार हो




सत्येन्द्र प्रताप
संयुक्त राज्य अमेरिका के नेवादा में सेमा नाम से कार की प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है। यह दुनिया की सबसे बड़ी प्रदर्शनी मानी जाती है। हालांकि मनुष्य के हर रूप को बाजार ने भली भांति पहचाना है, लेकिन अगर कार के रुप में किसी महिला को देखा जाए तो तस्बीर कुछ इसी स्टेच्यू की तरह उभरेगी। शायद इसी सोच के साथ प्रदर्शनी के आयोजकों ने कार के पार्टस से महिला की स्टेच्यू बना डाली। आप भी औरत के विभिन्न अंगों की तुलना कार-पार्टस् से करके लुफ्त उठा सकते हैं???

Saturday, 27 October 2007

देख लो भइया, ये हाल है तुम्हारी दुनिया का




चीन के बीजिंग शहर में प्रदूषण का धुंध इस कदर छा गया है कि सड़क पर खड़े होकर बहुमंिजली इमारत का ऊपरी हिस्सा देखना मुश्किल हो गया है। चीन में अगले साल ओलंपिक खेल होने जा रहा है और उससे जुड़े अधिकारियों ने उद्योगों से होने वाले वायु प्रदूषण पर चेतावनी भी दी है।

Friday, 26 October 2007

सबूत लपेटकर फांसी पर लटकाया





सीरियाः अलेपो के उत्तरी शहर में १८ से २३ साल के पांच युवकों को सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटकाया गया।ये टुवक हत्या के मामले में दोशी पाए गए थे। फांसी पर लटकाए गए युवकों के शरीर पर उनके अपराधों के बारे में विस्तृत रूप से लिखकर लपेट दिया गया था।

Tuesday, 23 October 2007

बीड़ी जलइले िजगर से पिया....






शिक्षा के निजीकरण के िवरोध में सड़कों पर उतरे छात्र-छात्राओं का अनोखा विरोध

आजा, आ....... लड़ेगा क्या


स्लोवािकय का छह सप्ताह का बिल्ली का बच्चा , खेलते हुए

Monday, 22 October 2007

पत्रकार का प्रेमपत्र

सत्येन्द्र प्रताप
सामान्यतया प्रेमपत्रों में लड़के -लड़िकयां साथ में जीने और मरने की कसमें खाते हैं, वादे करते हैं और वीभत्स तो तब होता है जब पत्र इतना लंबा होता है िक प्रेमी या प्रेिमका उसकी गंभीरता नहीं समझते और लंबे पत्र पर अिधक समय न देने के कारण जोड़े में से एक भगवान को प्यारा हो जाता है.
अगर पत्रकार की प्रेिमका हो तो वह कैसे समझाए। सच पूछें तो वह अपने व्यावसाियक कौशल का प्रयोग करके कम शब्दों में सारी बातें कह देगा और अगर शब्द ज्यादा भी लिखने पड़े तो खास-खास बातें तो वह पढ़वाने में सफल तो हो ही जाएगा.

पहले की पत्रकािरता करने वाले लोग अपने प्रेमपत्र में पहले पैराग्राफ में इंट्रो जरुर िलखेंगे. साथ ही पत्र को सजाने के िलए कैची हेिडंग, उसके बाद क्रासर, अगर क्रासर भी लुभाने में सफल नहीं हुआ तो िकसी पार्क में गलबिहयां डाले प्रेमिका के साथ का फोटो हो तो वह ज्यादा प्रभावी सािबत होगा और प्रेमिका के इमोशन को झकझोर कर रख देगा.
नया अखबारनवीस होगा तो उसमें कुछ मूलभूत परिवर्तन कर देगा. पहला, वह कुछ अंगऱेजी के शब्द डालेगा िजससे प्रेमिका को अपनी बात समझा सके. समस्या अभी खत्म नहीं हुई क्योंिक वक्त की भी कमी है और पढ़ने के िलए ज्यादा समय भी नहीं है. फोटो तो बड़ा सा डालना होगा िजससे पत्र हाथ में आते ही भावनाएं जाग जाएं. अगर फोटो का अभाव है तो इंट्रो कसा हुआ हो, साथ ही टेक्स्ट कम होना बेहद जरुरी है.

अलग अलग अखबारों के पत्रकार अलग अलग तरीके से प्रेमपत्र िलखेंगे. िहन्दुस्तान में होगा तो बाबा कामदेव का प्रभाव, भास्कर में हुआ तो फांट से अलग िदखने की कोिशश, जागरण का हुआ तो ठूंसकर टेक्स्ट भरेगा, नवभारत टाइम्स का हुआ तो अंगऱेजी झाड़कर अपनी बेचारगी दशाॆएगा, अगर आज समाज का हुआ तो हेिडंग के नीचे जंप हेड जरूर मारेगा, चाहे डबल कालम का लव लेटर हो या चार कालम का.

आम आदमी भी प्रेम पत्र िलखने के इन नुस्खों को अपना सकते हैं, िजससे प्रेमी प्रेमिका की आपसी समझ बढ़ेगी और प्यार में लव लेटर के खतरे से पूरी तरह से बचा जा सकेगा.

तो कामदेव की आराधना के साथ शुरु करिये प्रेमपत्र लिखना. सफलता के िलए शुभकामनाएं.

Friday, 19 October 2007

चलना है

रतन
उम्र भर रात-दिन औ सुबहो-शाम चलना है
ये जिन्दगी है सफर याँ मुदाम चलना है

ये हैं तकदीर की बातें नसीब का लिखा
किसी को तेज किसी को खिराम चलना है

लाख रोके से रुकेगा नहीं इंसान यहाँ
जब भी आया है खुदा का पयाम चलना है
नहीं है एक कोई दुनिया से जाने वाला
आज मैं कल वो इस तरह तमाम चलना है
गलत किया है नहीं गर खता हुई हो कभी
माफ़ करना मुझे सब राम-राम चलना है
ज्यों यहाँ हम रहे खुशहाल वहाँ भी यों रहें
लबों पे लेके खुशनुमा कलाम चलना है

रतन हैं साथ सफर होगी हंसी अहले-जहाँ
कुबूल कीजिए मेरा सलाम चलना है

Wednesday, 17 October 2007

पहला आर्यसत्य

इष्ट देव सांकृत्यायन
राजकुमार सिद्धार्थ पहली बार अपने मंत्री पिता के सरकारी बंगले से बाहर निकले थे. साथ में था केवल उनका कार ड्राइवर. चूंकि बंगले से बाहर निकले नहीं, लिहाजा दिल्ली शहर के तौर-तरीक़े उन्हें पता नहीं चल सके थे. कार के बंगले से बाहर निकलते ही, कुछ दूर चलते ही रस्ते में मिला एक साईकिल सवार. हवा से बातें करती उनके कार के ड्राईवर ने जोर का हार्न लगाया पर इसके पहले कि वह साईड-वाईड ले पाता बन्दे ने गंदे पानी का छर्रा मारा ....ओये और 'बीडी जलाई ले जिगर से पिया ........' का वाल्यूम थोडा और बढ़ा दिया. इसके पहले कि राजकुमार कुछ कहते-सुनते ड्राईवर ने उन्हें बता दिया, 'इस शहर में सड़क पर चलने का यही रिवाज है बेबी.'

'मतलब?' जिज्ञासु राजकुमार ने पूछा.
'मतलब यह कि अगर आपके पास कार है तो आप चाहे जितने पैदल, साइकिल और बाइक सवारों को चाहें रौंद सकते हैं.' ड्राइवर ने राजकुमार को बताया. कार थोड़ी और आगे बढ़ी. ड्राइवर थोडा डरा. उसने जल्दी से गाडी किनारे कर ली. मामला राजकुमार की समझ में नहीं आया.
'क्या हुआ?' उन्होने ड्राइवर से पूछा.
'अरे कुछ नहीं राजकुमार, बस एक ब्लू लें आ रही है.'
'क्या ब्लू लाइन? ये कौन सी चीज है भाई?' वह अचकचाए.
'ये चीज नहीं है बेबी. धरती पर यमराज के साक्षात प्रतिनिधि हैं. साक्षात मौत.'
'मैं कुछ समझा नहीं?'
'बात दरअसल ये है कि धरती पर जब भी लोगों को यह घमंड हो जाता है कि अब मनुष्य ने बीमारियों का इलाज ढूँढ कर मृत्यु को जीत लिया है तो यमराज कोई नई बीमारी भेज देते हैं. दिल्ली में उसी का नाम ब्लू लाइन है. पहले इसे रेड लाइन कहते थे. इसके भीतर अगर कभी जाने का सौभाग्य आपको मिले तो आपको पता चलेगा कि वहाँ एक पूरा रेड लाईट एरिया होता है.'
'ये रेड लाईट एरिया क्या होता है?'
'ये वो एरिया होता है जहाँ सिर्फ वही लोग जा सकते हैं जिन्हे अपने मान-सम्मान और जीवन-मृत्यु की कोई परवाह न हो.'
'अच्छा! पर हम इसके भीतर तो जा नहीं रहे थे. तुम इसे देख कर डर क्यों गए?'
'वो क्या है राजकुमार कि अगर ब्लू लाइन बसों को इस बात का पूरा हक है कि ये जब चाहें कार वालों को भी रौंद सकती हैं. चूंकि यहाँ सडकों पर ट्रेनें और प्लेनें अभी चलती नहीं हैं, इसलिए इनका आप कुछ नहीं बिगाड़ सकते.'
थोडा और आगे बढ़े तो एक चौराहा दिखा. चौराहे पर लाल-पीली-हरी बत्तियां दिखीं. चारों तरफ चिल्ल-पों की फालतू आवाजों के साथ बेतरतीब आते-जाते गाड़ियों से गाड़ियों के बीच एक तरह की धक्का-मुक्की करते लोग दिखे. राजकुमार को पीछे चले संदर्भ याद आ गए. उन्होने फिर पूछा, 'क्या यही रेड लाईट एरिया है?'
'नहीं ये एरिया नहीं, सिर्फ रेड लाईट है. एरिया थोडा अलग मामला है. वहाँ जाने से आप बच भी सकते हैं. पर यहाँ तो आपको आना ही पड़ेगा. सबको आना पड़ता है.'
'ओह! और यह जो लाल-पीली बत्तियां लगीं हैं, ये किसलिए हैं?'
'किताबों में लिखा तो यह गया है कि ये ट्रैफिक कण्ट्रोल के लिए हैं. पर असल में ऐसा कुछ है नहीं. वास्तव में ये सिर्फ सजाने के लिए लगाई गईं हैं.'
कार को थोडा और आगे बढते ही एक खाकी वर्दीधारी ने रोका. राजकुमार ने देखा कि गितिर-पितिर अन्ग्रेज़ी बोलती एक अल्पवसना युवती उससे पहले ही भिडी हुई थी. पर राजकुमार के ड्राईवर ने कार का शीशा उतारा. डंडाधारी को कुछ कहा और आगे बढ़ गया. राजकुमार को फिर जिज्ञासा हुई. उन्होने पूछा,'क्या मामला था? वह युवती क्यों भिडी हुई है?'
'उसके पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं है.'
'ये क्या होता है?'
'ये एक प्रकार का कार्ड होता है, जिसके बग़ैर गाडी नहीं चलाई जा सकती है.'
'ओह! तो तुम्हारे पास था वो कार्ड?'
'नहीं. मेरे पास तो गाडी का आरसी भी नहीं है.'
'फिर तुमसे उसने कुछ कहा क्यों नहीं?'
'मैने उसे बता दिया कि ये मंत्री जी की गाडी है.'
'ओह! तो क्या मंत्री जी की गाडियां चलाने के लिए लाइसेंस की जरूरत नहीं होती?'
'हाँ. उनके लिए कोई नियम नहीं होता. ब्लू लाइन बसें इसीलिए तो सबको रौंदते हुए चलती हैं.'
'अच्छा! तो क्या ये ब्लू लाइन बसें मंत्री जी की हैं?'
'जी हाँ! आपके पिताजी की भी कई हैं. पर कागजों में इनका मालिक घुरहुआ है और मंत्री जी इन्हें चलवाते भी खुद नहीं हैं. सारी बसें ठेके पर चलती हैं.'
'ऐसा क्यों?'
'अब आपको क्या बताएं बेबी?' ड्राइवर अचानक से दार्शनिक हो गया, 'व्यवस्था ऐसे ही चलती है.'
हालांकि राजकुमार समझ नहीं पाए कि व्यवस्था क्या चीज है. पर उन्हें अब ड्राइवर से पूछना भी मुफीद नहीं लगा. आखिर वह क्या सोचता? यही न! कि राजकुमार इतना भी नहीं समझ सकते. लिहाजा वे अपने मौन में खो गए और सोचने लगे कि शायद यह कार है. या शायद ब्लू लाइन बस है. या शायद रेड लाईट है. या शायद वह एरिया है. या शायद ...............
और वह ध्यान मग्न हो गए. शायद उन्हें पहला आर्यसत्य मिल गया था.

Tuesday, 16 October 2007

दीवार की काई की तरह

- विनय ओझा 'स्नेहिल'
अपनी उम्मीद है दीवार की काई की तरह।
फिर भी ज़िन्दा है खौफ़नाक सचाई की तरह॥

पेट घुटनों से सटा करके फटी सी चादर -
ओढ़ लेता हूँ सर्दियों में रजाई की तरह ॥

आँधियाँ गम की और अश्कों की उसपर बारिश -
साँस अब चलती है सावन की पुरवाई की तरह ॥

जाने यह कौन सी तहज़ीब का दौर आया है-
बात अब अच्छी भी लगती है बुराई की तरह ॥

सारी जनता तो उपेक्षित है बरातीयों सी -
और नेताओं की खातिर है जमाई की तरह ॥

Monday, 8 October 2007

अशआर


-विनय ओझा स्नेहिल


मुस्कराहट पाल कर होंठों पे देखो दोस्तों-
मुस्करा देगा यकीनन गम भी तुमको देखकर.

थाम लेगा एकदिन दामान तुम्हारा आस्मां -
थोड़ा थोड़ा रोज़ तुम ऊँचा अगर उठते रहे.

यह और है कि हसीनों के मुँह नहीं लगते-
वरना रखते हैं जिगर हम भी अपने सीने में.

पाँव में ज़ोर है तो मिल के रहेगी मंज़िल -
रोक ले पाँव जो ऐसा कोई पत्थर ही नहीं.

Sunday, 7 October 2007

कहाँ मिलता है!



विनय ओझा स्नेहिल
हर एक शख्स बेज़ुबान यहाँ मिलता है.
सभी के क़त्ल का बयान कहाँ मिलता है.
यह और बात है उड़ सकते हैं सभी पंछी
फिर भी हर एक को आसमान कहाँ मिलता है.
सात दिन हो गए पर नींद ही नहीं आयी
दिल को दंगों में इत्मीनान कहाँ मिलता है.
न जाने कितनी रोज़ चील कौवे खाते हैं
हर एक लाश को शमशान कहाँ मिलता है.

Saturday, 6 October 2007

ट्रांस्पैरेंसी इंटरनेशनल की हेराफेरी

इष्ट देव सांकृत्यायन
व्यंग्य चित्र : श्याम जगोता
मास्टर एकदम से फायर है. सलाहू से उसने पूछा है कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में मानहानि के मुकदमों की सुनवाई कहाँ होती है और इनके लिए याचिका कैसे लगाई जा सकती है. बेचारा सलाहू अभी हाई कोर्ट से आगे तो जा नहीं पाया. सुप्रीम कोर्ट का मुँह तो जरूर देखा है लेकिन भीतर घुसने की अभी तक तो उसे अनुमति मिली नहीं. सोच रहा है कैसे समझाए मास्टर को. सलाहू उसे समझाने की वैसे तो बहुतेरी कोशिशें कर चुका है कि इन सब झमेलों में मत पड़ो. पर जो समझ ही जाए वो मास्टर भला किस बात का?
असल में राष्ट्रीयता की भावना मास्टर में कूट-कूट कर भरी है और यह भावना उसमें भरी है उसके परमपूज्य पिताश्री ने, जो तहसील के मुलाजिम हुआ करते थे। वे पूरे देश की सम्पत्ति को अपनी सम्पत्ति समझते थे। सरकारी जमीनों को तो धेले के भाव किसी के भी नाम करते उन्हें कभी डर लगा ही नहीं, कमजोर लोगों की जमीन दबंगों और दबंगों की जमीन उनसे ज्यादा दबंगों या समझदार लोगों की लोचेदार जमीन बेवकूफों के नाम करने में भी वे कभी हिचकिचाए नहीं। दूसरे हलकों के लोग भी अभी तक बच्कन लाल पटवारी का उदाहरण देते नहीं थकते और कानूंनगो-तहसीलदार तो नए आए पटवारियों को बच्कन लाल से प्रेरणा लेने की सलाह देते हैं.
इतने महान पिता की संतान होकर मास्टर राष्ट्र का अपमान बर्दाश्त कर ले ऐसा ऐसा कैसे हो सकता है! ट्रांसपैरेंसी इन्टरनेशनल ने अभी हाल में भ्रष्ट मुल्कों की जो सूची जारीः की हमारी हालत क्या उसे घोर आपत्ति है। उसे अंदेशा है कि हो न हो ट्रांसपैरेंसी वालों ने रैंकिंग में घपला किया है। अगर ऐसा न होता तो क्या वास्तव में हम इतने गिर गए हैं.
ट्रांसपेरेंसी वालों की ये मजाल कि उन्होने हमें 138 वें नंबर पर डाल दिया? हमारे राजनैतिक-प्रशासनिक पुरखों की शताब्दियों की सारी मेहनत पर पानी फेर दिया!
ज़रा बताइए तो किस साले देश में इतना दमख़म है जो आतंकवादियों को इज्जत से बैठा कर मुर्ग-मुसल्लम खिला सके? है कोई माई का लाल जो एक व्यक्ति के हत्या के दोषी की दया की अर्जी तो खारिज कर दे पर सैकड़ों की हत्या के पेशेवर अपराधी की दया की अर्जी कबूल ले और उस पर फैसला शताब्दियों के लिए लटका दे? है कोई ऐसा मुल्क जहाँ सारे उच्चतम पदों पर ऐसे लोग बैठे हों जिसका उस मुल्क में धेले का भी योगदान न हो?
जाने भी दीजिए, ये सब तो ऊंचे स्तर का मामला है. ज़रा नीचे देखिए. बताइए कोई ऐसा मुल्क जहाँ बच्चे के जन्म से लेकर बुड्ढे की मृत्यु तक का प्रमाणपत्र लेने के लिए चढावा चढ़ना पड़ता हो और चढावे को इतना पवित्र माना जाता हो कि उसके बग़ैर भगवान से भी कुछ सुनने की उम्मीद न की जा सके. बताइए ऐसा मुल्क जहाँ चुनाव से पहले असंभव टाईप के वाडे किए जाते हों और जीतने के बाद में उनके बारे में सोचना भी गुनाह समझा जाता हो? है कोई मुल्क जहाँ परीक्षा से पहले ही पर्चे लीक हो जाते हों और इम्तहान से पहले परीक्षार्थी को ये पता होता हो कि कापी किसके पास जाएगी?
कौन सा मुल्क है जहाँ जमीन के कागजात में घपले के लिए बेचने वाला और लिखत-पढ़त करने वाला सरकारी मुलाजिम नहीं, बेचारा खरीदार होता हो? उस मुल्क का नाम बताइए तो जहाँ मिलावट परम्परा बन चुकी हो और निरीह राहगीरों को रौंदना ट्रकों और बसों का जन्मसिद्ध अधिकार. कोई बता सकता है ऐसा मुल्क जहाँ थानेदार अपराधी के बजाय पीडित को सजा देता हो? अगर यह सब नहीं पता है तो क्या ख़ाक सर्वे कर रहे हो? हिंदी की प्रतिष्टित पत्रिकाओं की तरह सेक्स सर्वे कर हो या टेलीविजन चैनलों की टीआरपी रेटिंग?
मास्टर सुबह ही से बिफर रहा है, 'एक बार बस पता चल जाए कि कहाँ होती है मानहानि के अंतर राष्ट्रीय मामलों की सुनवाई! भूल जाएँगे साले ये रिपोर्ट-उपोर्ट जारीः करना और रैंक बनाना भी. पक्का है इस रिपोर्ट के बनाने में बडे पैमाने पर भ्रष्टाचार हुआ है. वरना पहला नंबर तो हमारा ही था. भ्रष्टाचार का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा कि जो आदमी सैकड़ों बच्चों-बच्चियों को मार कर खा गया और उनके शरीर के विभिन्न हिस्सों को देश-विदेश में पार्सल कर चूका हो उसके खिलाफ किसी को कोई सबूत भी न मिले? अब कौन सा मानक बचता है जिस पर कोई दूसरा देश टापर घोषित किया जाए?'
मास्टर इस समय यक्ष हो गया है. जेठमलानी से भी ज्यादा खतरनाक. उसके सवालों का जवाब देना युधिष्ठिर के बूते की भी बात नहीं रह गई है और समझा पाना कृष्ण के बूते की भी बात नहीं है. फिलहाल वह सलाहू को ढूँढ रहा है और बेचारा सलाहू भगा फिर रहा है. अगर आपको पता भी चले तो प्लीज़ बताइएगा मत!

Friday, 5 October 2007

आस्था का सवाल


हरिशंकर राढ़ी
एक बार आस्था फिर बाहर आ गयी है. लड़ने का मूड है उसका इस बार. इस बार उसकी लडाई इतिहास से है. यों तो इतिहास लडाई एवं षड्यंत्र का ही दूसरा नाम है, पर यह लडाई कुछ अलग है. लड़ने चली तो आई पर हथियार के नाम पर बेहया का एक डंडा भी नहीं है. यहाँ तक कि यदि पिट-पिटा गई तो ऍफ़आईआर दर्ज़ कराने के लिए एक किता चश्मदीद गवाह भी नहीं है. उसकी ओर से खड़ा होकर कोई यह भी कहने वाला नहीं है कि मैने राम को देखा है. उन्होने समुद्र में सेतु बनाया ,यह तो दूर की बात है.
सच भी है. पहले तो उन्हें देखने की किसी ने कोशिश ही नहीं की, अगर किसी ने दावा कर भी दिया तो लोग उसे पागल समझेंगे. दूसरी तरफ इतिहास है. वैज्ञानिक दृष्टिकोण लेकर आया है. विदेशी है सो अच्छा होगा ही. उसके चलन-कलन मे कोई गलती हो ही नहीं सकती. गलती हो भी जाए तो परिहार है -सॉरी. अभी गलती से अमेरिका आस्था की गवाही में बोल पड़ा कि समुन्दर के अन्दर एक पुराना पुल पड़ा हुआ है. उसे पता नहीं था कि राम सेतु की पक्षधर पार्टियां सत्ता में नहीं हैं. सो जल्दी से सॉरी बोल दिया। इस टीप के साथ कि पुल मानव निर्मित नहीं है.
यही बात तुलसी बाबा भी बोले, भारत की गवार जनता भी यही बोलती है कि राम मानव नहीं थे. पर तुलसी बाबा का क्या? इतना बड़ा पोथन्ना लिख गए, दो अक्षर इतिहास नही लिखा. अपना और अपने देस का इतिहास वैसे भी मकबरा काल से शुरू होता है. एक-दो शिलालेख या स्तूप भी मिल जाता तो कुछ बोल सकते थे. एक शिला मिली भी तो आपने उसका उद्धार कर दिया. मेरी तो समझ मे नहीं आता कि क्या खाकर आस्था इतिहास का मुक़ाबला करेगी और जिनकी आस्था बाहर आ रही है उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि आस्था उनकी भी है जो इतिहास वाले हैं. जिन्होंने दो-दो हलफनामे दायर किए. आस्था रावण की भी थी.
राजनैतिक आस्था होती ही ऐसे है. जो भी मानो, दिखाओ मत. फिर राम ने भक्ति के तरीके भी नौ बताए और भी बताया कि - भाव कुभाव अनख आलसहूँ. नाम जपत मंगल दिसी दसहू. रावन ने अनख यानी शत्रु भाव से आस्था रखी. विद्वान था, राजनेता था. उसका भी मंगल हुआ, पर कैसा आप जानते हैं. इनका भी मंगल होना चाहिए. अब ये राम को माफ़ करने वाले नही. इतना बड़ा पुल बिना अनुमति के बनवाया कैसे? अनापत्ति प्रमाण पत्र लिया क्या? कमीशन तक नहीं पंहुचाया. हद तो तब हो गयी जब शिलान्यास- उद्घाटन तक के लिए नहीं बुलाया. अगर इन्होने शिलापट्ट का अनावरण भी कर दिया होता तो आज राम सेतु के ऐतिहासिक होने मे कोई संदेह नहीं होता.

बर्मा में ब्लॉगर्स पर पहरा और हमारे लिए इसका मतलब?

-दिलीप मंडल

बर्मा यानी म्यांमार में सरकार ने इंटरनेट कनेक्शन बंद कर दिए हैंइससे पहले वहां की सबसे बड़ी और सरकारीइंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर कंपनी बागान साइबरटेक ने इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड इतनी कम कर दी थी कि फोटोअपलोड और डाउनलोड करना नामुमकिन हो गयासाथ ही साइबर कैफे बंद करा दिए गए हैंबर्मा के ब्लॉग केबारे में ये खबर जरूर देखें- Myanmar's blogs of bloodshed

बर्मा में फौजी तानाशाही को विभत्स चेहरा अगर दुनियाके सामने पाया तो इसका श्रेय वहां के ब्लॉगर्स को हीजाता हैवहां की खबरें, दमन की तस्वीरें बर्मा के ब्लॉगर्सके जरिए ही हम तक पहुंचींबर्मा में एक फीसदी से भीकम आबादी की इंटरनेट तक पहुंच हैफिर भी ऐसे समयमें जब संचार के बाकी माध्यम या तो सरकारी कब्जे में हैंया फिर किसी किसी तरह से उन्हें चुप करा दिया गयाहै, तब बर्मा के ब्लॉगर्स ने सूचना महामार्ग पर अपनीदमदार मौजूदगी दर्ज कराईअमेरिका में युद्ध विरोधीआंदोलन के बाद ब्लॉग का विश्व राजनीति में ये शायदसबसे बड़ा हस्तक्षेप हैब्लॉग की लोकतांत्रिक क्षमता कोइन घटनाओं ने साबित किया है

लेकिन भारतीय ब्लॉगर्स के लिए भी क्या इन घटनाओं काकोई मतलब है? आप अपने लिए इसका जो भी मतलबनिकालें उससे पहले कृपया इन तथ्यों पर विचार कर लें

-जिस समय बर्मा में दमन चल रहा है, उसी दौरान भारत के पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा बर्मा का दौरा कर आएहैंभारत को बर्मा का नैचुरल गैस चाहिएइसके लिए अगर विश्व स्तर पर थू-थू झेलनी पड़े तो इसकी परवाहकिसे हैफिर चीन को भी तो बर्मी नैचुरल गैस चाहिए
-भारत सरकार सिर्फ बर्मा के सैनिक शासन को मान्यता देता है और उससे व्यापारिक और राजनयिक संबंधरखता है, बल्कि इन संबंधों को और मजबूत भी करना चाहता है
-भारत में सुचना प्रवाह पर पहरे लगाने के कई प्रयोग हो चुके हैंइमरजेंसी उसमें सबसे बदनाम हैलेकिनइमरजेंसी के बगैर भी बोलने और अपनी बात औरों तक पहुंचाने की आजादी पर कई बार नियंत्रण लगाने कीसफल और असफल कोशिश हो चुकी है
-इसके लिए एक कानून बनने ही वाला हैसरकार वैसे भी केबल एक्ट के तहत चैनल को बैन करने का अधिकारअपने हाथ में ले चुकी है और इसका इस्तेमाल करने लगी है
-पसंद आने वाली किताब से लेकर पेंटिंग और फिल्मों तक को लोगों तक पहुंचने देने से रोकने में कांग्रेस औरबीजेपी दोनों किसी से कम नहीं हैलोकतंत्र दोनों के स्वभाव में नहीं है

और बात ब्लॉग की

-अभी शायद भारतीय ब्लॉग की ताकत इतनी नहीं बन पाई है कि सरकार का ध्यान इस ओर जाए
-ब्लॉग के कंटेट में भी गपशप ज्यादा और प्रतिरोध का स्वर कम हैहम इस मामले में बर्मा के ब्लॉगर्स से पीछे हैं
-ब्लॉग पर सेंसर लगाने का कानूनी अधिकार सरकार के पास हैइसके लिए उसे कोई नया कानून नहीं बनानाहोगा
-आईपी एड्रेस के जरिए ब्लॉगर तक पहुंचने का तरीका हमारी पुलिस जानती है

इसलिए ब्लॉगिंग करते समय इस गलतफहमी में रहें कि किसे परवाह हैअगर आप परवाह करने लायक लिखरहे हैं तो परवाह करने वाले मौजूद हैंऔर फिर जो लोग आजादी की कीमत नहीं जानते वो अपनी आजादी खो देनेके लिए अभिशप्त होते हैं

Thursday, 4 October 2007

कोई कहाँ है अपना

रतन
सभी अपने हैं मगर कोई कहॉ है अपना
यों तो कहने के लिए सारा जहाँ है अपना
लोग कहते हैं कि तुम दिल में मेरे रहते हो
सच यही है कि नहीं कोई मकां है अपना
लोग जो करते हैं ओ जानें करम है उनका
यह जनम अगला जनम उनपे फ़ना है अपना
वो न समझें वो न जानें कोई गुस्ताखी नहीं
ग़लत-सही हो जान उनपे फ़िदा है अपना
आपसा हमने उन्हें माना जो थे आपके लोग
जिनके बारे में बताया कि फलां है अपना
भूल जाये ये जहाँ खत्म हो जाये दुनिया
ख़त्म होगा नहीं वो नामो-निशां है अपना
यकीन तुम न करो पर है यही सच्चाई
कि रतन अलग सा अंदाजे बयाँ है अपना


Wednesday, 3 October 2007

मोगाम्बो खुश हुआ!

इष्ट देव सांकृत्यायन
कई दिनों पहले की बात है मैने एक ब्लॉगर भाई अनिल रघुराज के ब्लॉग पर एक पोस्ट पढी थी. पोस्ट बहुत महत्वपूर्ण जानकारी से भरा था. जानकारी यह थी कि अपना यूंपी यानी उल्टा प्रदेश ... माफ़ कीजिए ...सरकारी कागज़-पत्तर में उत्तर प्रदेश पढाई-लिखाई में भले फिसड्डी हो, लेकिन पढे-लिखे अपराधियों के मामले में अव्वल है। अपनी साक्षरता दर के मामले में यह देश के 30 राज्यों में छब्बीसवें नंबर पर है, लेकिन पढे-लिखे अपराधियों के मामले में अली दा पहला नंबर है.
भाई अनिल रघुराज का पोस्ट पढ़ कर तो ऐसा लग रहा था जैसे वो कुछ-कुछ खिन्न से हों. बेशक मुझ जैसे तमाम ब्लागरों ने वह पोस्ट पढी होगी और जैसी कि रीति है लेखक से प्रभावित होते हुए वे भी दुखी हुए होंगे. लेकिन भाई, कोई जरूरी तो है नहीं कि हर आदमी परम्परा के अनुसार ही चले. कुछ लोग परम्परा के विपरीत चलने के लिए ही बने होते हैं तो क्या करें? असल में ऐसा मैं कोई जान-बूझ कर नहीं हूँ. बाई डिफाल्ट हूँ. आप चाहें तो कह सकते हैं मैनुफैक्चरिंग डिफेक्ट हैं. तो सबसे पहले तो इस डिफेक्ट के लिए मैं अनिल भाई से माफी चाहता हूँ.
अब ईमानदारी से कबूल करता हूँ कि मैने जब यह बात पढी थी तब भी मुझे ईश्वर की अनुकम्पा से अपार प्रसन्नता हुई थी और अब जबकि मैं इस मुद्दे पर काफी कुछ सोच चुका हूँ तो और ज्यादा यानी अपरम्पार प्रसन्नता हो रही है. पढ़ने के बाद फौरी ख़ुशी की वजह यह थी कि मुझे एक नई जानकारी मिली थी. बिल्कुल ब्रह्मज्ञान की तरह अछूती और अनूठी, साथ ही उपयोगी भी. अब जो ख़ुशी हो रही है उसकी एक वजह यह है कि बाई डिफाल्ट मैं भी उसी उल्टा प्रदेश यानी तथाकथित उत्तर प्रदेश से हूँ, जहाँ से भाई अनिल जी हैं. अब अपनी मातृभूमि की कुछ गौरव गाथा सुनता हूँ तो प्रसन्नता होनी स्वाभाविक ही है. मैं उसे जो उल्टा प्रदेश कह रहा हूँ वह कोई ऐसे-वैसे नहीं. सोच-समझकर और पुख्ता सबूतों के साथ कह रहा हूँ.
इसके उलटा प्रदेश होने का सबसे पहला प्रमाण तो यह तथ्य ही है जो इस पोस्ट के मूल में है. आप देखिए, हमारे यहाँ कहावत कही जाती है - खेलोगे-कूदोगे होगे ख़राब, पढोगे-लिखोगे बनोगे नवाब. अब खेलने कूदने से तो हमें रोक दिया गया और नवाब इस जमाने रहे नहीं. अपने को नवाबों के खानदान से बताने वाले कई महान लोगों को मैने लखनऊ की भूल-भुलैया में गाइडगिरी करते और सौ-पचास रुपये के लिए झीकते देखा है. तो वह बनने में अब अपना कोई रस तो रहा नहीं और खेलने-कूदने दिया ही नहीं गया. जाहिर है, खराब बनने का चांस भी हाथ से जाता रहा. यह सोच कर कि अब नवाबों की जगह बाबुओं-साहबों ने ले ली, थोड़े दिन साहब, फिर बाबू बनने की कोशिश भी की और कुछ नहीं कर पाया तो जैसे-तैसे कलम घिस कर गाडी खींचने लगा. कुछ दोंस्तों की खोपडी प्रकृति ने सीधी बनाई, सो वे इस लायक भी नहीं हुए और अब तक कुछ बनने की कोशिश में अपनी जिन्दगी बिगाड़े ही चले जा रहे हैं.
अगर मुझे यह जानकारी पहले मिल गई होती तो शायद मैंने अपने बेकार दोस्तो तक यह बात पहुँचा दी होती और वे अब तक अपनी कोशिशें शुरू कर चुके होते. खैर कोई बात नहीं. देर आयद दुरुस्त आयद या कहें जब तू जगे तभी सवेरा. इस जानकारी से मुझे अचानक ज्ञान हुआ है और एक रास्ता खुलता दिखा है. अब चूंकि राजनीति यानी शासन में पढे-लिखों का वर्चस्व नहीं रहा, शायद इसीलिए प्रशासन भी पढे-लिखों से खाली कराया जा रहा है. इसी अभियान के तहत जाती-धर्म-सम्प्रदाय से जो जगहें बच जा रही हैं उन्हें रिश्वत और शिफारिस से भरा जा रहा है. मंचों पर बैठ कर ऐसे-ऐसे लोग चार वेद-छः शास्त्र के ज्ञाता होने के दावे के साथ ऎसी-ऎसी बातें कर रहे हैं, जिन्हे एक वेद का ठीक-ठीक नाम भी नहीं बता सकते. थोक के भाव से पढे-लिखे लोग उनके चेले बन कर यह साबित करने में लगे हैं कि उन्होने पढ़-लिख कर गलती की है. नहीं क्या?
वैसे सच पूछिए तो पढना-लिखने अपने-आप में एक अपराध है. आख़िर जिस कवायद का कोई मतलब न हो, जानते हुए भी उसमें सालों तक अपना वक़्त और माँ-बाप का धन बरबाद करते चले जाना अगर अपराध नहीं तो और क्या है. खास तौर से ऐसे वक़्त में जबकि हम देख रहे हों कि पढ़-लिख कर चपरासी बनाना मुश्किल है और बिना पढे-लिखे मंत्री हुआ जा सकता है. यहाँ तक कि हाई कमान की कृपा हो जाए तो बिना चुनाव लड़े प्रधानमंत्री भी हुआ जा सकता है. हमारे देश में वैसे यह बात पहले से ही मानी जाती है कि जो कुछ भी होता है सब साहब से होता है और बन्दे से कुछ भी नहीं हो सकता. इसके बाद भी कुछ मूर्ख हैं जो कुछ करने का भ्रम पाले हुए हैं और पढने-लिखने की बेवकूफी किए जा रहे हैं.
बहरहाल, अब उनके लिए भी खुशखबरी है. यह कि अपने उल्टा प्रदेश में पढाई-लिखाई का सीधा इस्तेमाल होने लगा है. यानी वहाँ अपराधियों में पढे-लिखे लोगों की तादाद बढ़ गई है. इससे इस संभावना को बल मिल है कि अब अपराध जगत में पढे-लिखे लोगों की पूछ बढेगी. उनके लिए संभावनाओं के नए द्वार खुलेंगे. जब इस क्षेत्र में पढे लिखे लोग आएंगे तो जाहिर है, थोड़े दिनों में यह क्षेत्र योजनाबद्ध तरीक़े से काम करने लगेगा और तब असंगठित क्षेत्र के संगठित रुप लेने में देर नहीं लगेगी. कोई उदार सरकार आ गई तो हो सकता है कि इसे उद्योग का दर्जा भी मिल जाए. तब अपराध उद्योग को आसानी से लोन वगैरह भी मिलने लगेगा और अगर अमेरिका-इटली की कृपा हम पर ऐसे ही बनी रही तो आने वाले दिनों में इस उद्योग में ऍफ़ दीं आई का मार्ग भी प्रशस्त हो जाएगा. सोचिए तब इस सेक्टर में आने का कितना क्रेज होगा?
अभी वक़्त है. जो आना चाहें आ जाएँ. बाद में प्रवेश मुश्किल हो जाएगा. क्योंकि पहले आओ-पहले पाओ का सिद्धांत हर जगह लागू होता है. लिहाजा जिन्हे यह संकोच हो कि अब पढ़ लिख कर अपराध क्या करें, वे कृपया निम्न प्रश्नों का जवाब स्वयम को दे लें:
1. यह कि अगर वे अपराध नहीं करेंगे तो क्या करेंगे?
2. जो लोग आज सीधे अपराध नहीं करके कहीँ नौकरी-व्यापार या कुछ और कर रहे हैं, क्या वे यह सब करके अपराध नहीं कर रहे हैं?
3. जो रिश्वत भी नहीं ले रहे, हेराफेरी भी नहीं कर रहे, गद्दारी और हरामखोरी भी नहीं कर रहे; क्या यह सब करके आप हरामखोरी नहीं कर रहे? खुद अपने और अपने परिवार के साथ?
4. क्या आप कुछ न करते हुए भी उनका सहयोग नहीं कर रहे, जो भांति-भांति के अपराधों के लिए जिम्मेदार हैं?
5. क्या यह अपने आप में एक अपराध नहीं है?
मेरा ख़याल है कि अब तक आप समझ गए होंगे और अगर समझदार ही होंगे तो रास्ता भी तय कर लिया होगा. ज्यादा से ज्यादा यही तय करना बचा होगा कि किधर और अपराध उद्योग की किस कम्पनी में ज्वाईन करें. चिन्ता न करें. जल्दी ही कोई ब्लॉगर मित्र लोक सभा, विधान सभा या विधान परिषद की सूची भी भेजेंगे. नजर रखिएगा और चुन लीजिएगा. अगर उनमें से कोई पसंद न आए तो भी कोई बात नहीं. हम थानों से भी सूची मंगवा लेंगे. वैसे बेहतर यही होगा कि संसद या विधान सभा वाली सूची से ही अपना रास्ता चुन लीजिएगा. थानों में तो नौसिखियों के नाम ही रह जाते हैं.

Monday, 1 October 2007

स्कूप से कम नहीं रामकहानी सीताराम

सत्येन्द्र प्रताप
मधुकर उपाध्याय की 'राम कहानी सीताराम' एक ऐसे सिपाही की आत्मकथा है जिसने ब्रिटिश हुकूमत की ४८ साल तक सेवा की. अंगऱेजी हुकूमत का विस्तार देखा और आपस में लड़ती स्थानीय रियासतों का पराभव. सिपाही से सूबेदार बने सीताराम ने अपनी आत्मकथा अवधी मूल में सन १८६० के आसपास लिखी थी जिसमें उसने तत्कालीन समाज, अपनी समझ के मुताबिक़ अंग्रेजों की विस्तार नीति, ठगी प्रथा, अफगान युद्ध और १८५७ के गदर के बारे में लिखा है. अवधी में लिखी गई आत्मकथा का अंग्रेजी में अनुवाद एक ब्रिटिश अधिकारी जेम्स नारगेट ने किया और १८६३ में प्रकाशित कराया.
अंग्रेजी में लिखी गई पुस्तक फ्राम सिपाय टु सूबेदार के पहले सीताराम की अवधी में लिखी गई आत्मकथा इस मायने में महत्वपूर्ण है कि गद्य साहित्य में आत्मकथा है जो भारतीय लेखन में उस जमाने के लिहाज से नई विधा है. सीताराम ने अपनी किताब की शुरुआत उस समय से की है जब वह अंग्रेजों की फौज में काम करने वाले अपने मामा के आभामंडल से प्रभावित होकर सेना में शािमल हुआ। फैजाबाद के तिलोई गांव में जन्मे सीताराम ने सेना में शामिल होने की इच्छा से लेकर सूबेदार के रूप में पेंशनर बनने के अपने अड़तालीस साल के जीवनकाल की कथा या कहें गाथा लिखी है जिसमें उसने अपने सैन्य अभियानों के बारे में विस्तार से वर्णन किया है.
सीताराम बहुत ही कम पढ़ा लिखा था लेकिन जिस तरह उसने घटनाओं का वर्णन िकया है, एक साहित्यकार भी उसकी लेखनी का कायल हो जाए. भाषा सरस और सरल के साथ गवईं किस्से की तरह पूरी किताब में प्रवाहित है. एक उदाहरण देिखए...
सबेरे आसमान िबल्कुल साफ था। दूर दूर तक बादल दिखाई नहीं दे रहे थे। मुझे याद है, वह १० अक्टूबर १९१२ का िदन था। सबेरे छह बजे मैं मामा के साथ िनकला,एक ऐसी दुनिया में जाने के िलए, जो मेरे लिए बिल्कुल अनजान थी. हम िनकलने वाले थे तो अम्मा ने मुझे िलपटा िलया, चूमा और कपड़े के थैले में रखकर सोने की छह मोहरें पकड़ा दीं. अम्मा ने मान िलया था िक मुझसे अलग होना उनकी किस्मत में लिखा है और वह िबना कुछ बोले चुपचाप खड़ी रहीं. सिसक-सिसक कर रोती रहीं. घर से चला तो मेरे पास सामान के नाम पर घोड़ी, मोहरों वाली थैली, कांसे का एक गहरा बर्तन, रस्सी -बाल्टी, तीन कटोिरयां, लोहे का एक बर्तन और एक चम्मच, दो जोड़ी कपड़े, नई पगड़ी, छोटा गंड़ासा और एक जोड़ी जूते थे.
सीताराम की आत्मकथा में किताब में अंग्रेजों के नाम भी भारतीय उच्चारण के साथ ही बदले-बदले नजर आते हैं, मसलन अजूटन साहब,अडम्स साहब, बर्रमपील साहब, मरतिंदल साहब... आिद आिद. हालांिक कथाक्रम और खासकर अफगान और ठगों के िखलाफ अभियान के बारे में िजस तरह पुख्ता और ऐितहािसक जानकारी दी गई है उसे पढ़कर यह संदेह होता है कि एक कम पढ़े िलखे और िसपाही के पद पर काम करने वाला आदमी ऐसी िकताब सकता है.
आलोचकों ने इस पुस्तक के बारे में यहां तक कहा है कि यह Fabricated & False है. इस िकताब में तमाम ऐसे तथ्य हैं जो यह िसद्ध करते हैं िक लेखक की स्थानीय संस्कृति में गहरी पैठ थी। मसलन समाज में छुआछूत और शुद्धि का प्रकरण..इस तरह का वर्णन सीताराम ने कई बार किया है...
एक रोज शाम को मैं अपने घायल होने का िकस्सा सुना रहा था. उसी में जंगल में भैंस चराने वाली लड़की का जिक्र आया, जिसने पानी पिलाकर मेरी जान बचाई थी. पुजारी जी मेरी बात सुन रहे थे। बोले िक मैनें जैसा बताया, लगता है वह लड़की बहुत नीची जाति की थी और उसका िनकाला पानी पीने से मेरा धर्म भ्रष्ट हो गया।मैने बहुत समझाया कि बर्तन मेरा था लेिकन वह जोर-जोर से बोलने लगे और बहुत सी उल्टी-सीधी बातें कही. देखते-देखते बात पूरे गांव में फैल गई. हर आदमी मुझसे कटकर रहने लगा। कोई साथ हुक्का पीने को तैयार नहीं. मैं पुजारी पंडित दिलीपराम के पास गया। उन्होंने भी बात सुनने के बाद कहा कि मेरा धर्म भ्रष्ट हो गयाऔर मैं जात से गिर गया. वह मेरी बात सुनने को तैयार नहीं थे. मुझपर अपने ही घर में घुसने पर पाबंदी लगा दी गई. मैं दुखी हो गया. बाबू ने बहुत जोर लगाकर पंचायत बुलाई और कहा कि फैसला पंचों को करना चािहए. बाद में पंडित जी लोगों ने पूजा-पाठ किया, कई दिन उपवास कराया और तब जाकर मुझे शुद्ध माना गया। ब्राहमणों को भोज-भात कराने और दक्षिणा देने में सारे पैसे खत्म हो गए जो मैने चार साल में कमाए थे.
यह वर्णन उस समय का है जब सीताराम िपंडारियों से युद्ध करते हुए घायल होने के बाद घर लौटा था. संभवतया इस तरह का बर्णन वही व्यक्ति कर सकता है िजसने उस समाज को जिया हो. ( मुझे अपने गांव में १९८५ में हुई एक घटना याद आती है जब मैं दस साल का था और महज पांचवीं कक्षा का छात्र था। गांव के ही दुखरन शुक्ल की िबटिया, बिट्टू मुझसे दो साल वरिष्ठ। महज सातवीं कक्षा की छात्रा थी. उसकी एक प्रिय बछिया थी जो बीमारी के चलते घास नहीं चर रही थी. उसने गुस्से में आकर बछिया को मुंगरी से मार िदया. बाद में उसने वह घटना मुझे भी बताई. वह बहुत दुखी थी कि आिखर उसने अपनी प्रिय बछिया को क्यों मारा. बाद में उसने कुछ और बच्चों से कह िदया। छह महीने बाद बछिया मर गई. धीरे धीरे गांव में यह चर्चा फैली कि ...िबट्टुआ बछिया का मुंगरी से मारे रही यही से बछिया मरि गै है... पहले बच्चे उसे अशुद्ध मानकर तरजनी पर मध्यमा उंगली चढाते थे िक उसके छूने से अपवित्र न हो जाएं. बाद में समाज ने बिट्टू का हुक्का पानी बंद कर दिया. मैने अम्मा से पूछा था िक वो तो हुक्का पीती ही नहीं तो उसका हुक्का कैसे बंद किया? मुझे बताया गया िक उसे पाप का भागी मानकर समाज से वहिष्कृत कर िदया गया है. जब उसके पिता से कहा गया कि उसको शुद्ध करने के िलए भोज करें तो वे भोज देने की हालत में नहीं थे. समाज ने दुखरन सुकुल के पूरे परिवार का हुक्का पानी बंद कर दिया. लड़की की शादी की बात आई. समाज ने उस परिवार का बहिष्कार कर दिया था. पंडित जी को मजबूरन हुक्का पानी खोलवाने के िलए भोज देना पड़ा। मुझे याद है िक भोज के िलए पैसा कमाने वे पंजाब के िकसी िजले में मजदूरी करने गए थे.)
िकताब में अंग्रेजों की फौज और उनके िनयमों की भूिर-भूिर प्रशंसा की गई है. सीताराम ने खुद भी कहा है िक उसने वह िकताब नारगेट के कहने पर िलखी थी. साथ ही भारत में नमक का कर्ज अदा करने की परम्परा रही है. ऐसे में भले ही उसका बेटा िवद्रोह के चलते गोिलयों का िशकार हुआ लेिकन सीताराम उसे ही रास्ते से भटका हुआ बताता है. हालांिक अपनी आत्मकथा में उसने तीन बार इस बात पर आश्चर्य जताया है िक अंग्रेज बहादुर िकसी दुश्मन को जान से नहीं मारते ऐसी लड़ाई से क्या फायदा.
रामकहानी सीताराम, भारतीय समाज और संस्कृित, तत्कालीन इितहास के बारे में एक आम िसपाही की सोच को व्यक्त करती है। पुस्तक इस मायने में भी महत्वपूर्ण हो जाती है िक यह अवधी भाषा में िलखी गई आत्मकथा की पहली पुस्तक है.
इस िकताब के लेखक की िवद्वत्ता के बारे में अगर िवचार िकया जाए तो भारतीय समाज में ऐसे तमाम किव, लेखक हुए हैं िजन्होंने मामूली िशक्षा हािसल की थी लेिकन समाज के बारे में शसक्त िंचंतन िकया. अवधी भाषा में कृष्ण लीला के बारे में गाया जाने वाला वह किवत्त मुझे याद है जो बचपन में मैने सुनी थी.
हम जात रिहन अगरी-डगरी,
िफर लउिट पिरन मथुरा नगरी.
मथुरा के लोग बड़े रगरी,
वै फोरत हैं िसर की गगरी..
आम लोगों द्वारा गाई जाने वाली यह किवता भी शायद िकसी कम पढ़े िलखे व्यिक्त ने की होगी, लेिकन ग्राह्य और गूढ़ अथॆ वाली हैं ये पंिक्तया.
सीताराम ने इस पुस्तक में अंग्रेजों द्वारा िहन्दुस्तािनयों से दुर्व्यवहार का भी वर्णन िकया है। साथ ही वह पदोन्नित न िदए जाने को भी लेकर खासा दुखी नजर आता है। अंितम अध्याय में तो उसने न्यायप्रिय कहे जाने वाले अंग्रेजी शासन की बिखया उधेड़ दी है. उसने कारण भी बताया है िक भारतीय अिधकारी क्यों भ्रष्ट हैं. िकताब में एक जगह लेखक ने अंग्रेजों के उस िरवाज का वर्णन िकया है िजसमें दो अंग्रेजों के बीच झगड़ा होने पर वे एक दूसरे पर गोली चलाते हैं. यह िकताब सािहत्य जगत, समाजशास्त्र और इितहास तीनों िवधाओं के िलए महत्वपूर्ण है.
पुस्तक में मधुकर जी ने बहुत ही ग्राह्य िहंदी का पऱयोग िकया है जो पढ़ने और समझने में आसान है.
पुस्तक : रामकहानी सीताराम
लेखक : मधुकर उपाध्याय
मूल्य : ६० रुपये
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन