Sunday, 30 September 2007

और भाग चले बापू

इष्ट देव सांकृत्यायन
अभी कल ही मैने एक कविता पढी है. चूंकि कविता मुझे अच्छी लगी, इसलिए मैने उस पर टिप्पणी भी की है। कवि ने कहा है कि उनका मन एक शाश्वत टाईप का नाला है. उससे लगातार सड़ांध आती है. हालांकि उस मन यानी नाले का कोई ओर-छोर नहीं है. उसका छोर क्या है यह तो मुझे भी नहीं दिखा, लेकिन ओर क्या है वह मुझे तुरंत दिख गया. असल में मैं कलियुग का संजय हूँ न, तो मेरे पास एक दिव्यदृष्टि है. अपने कुछ सुपरहिट टाइप भाई बंधुओं की तरह चूंकि मुझे उस दिव्यदृष्टि का असली सदुपयोग करना नहीं आता, इसलिए मैं उसका इसी तरह से फालतू इस्तेमाल करता रहता हूँ. लोग मेरी बेवकूफी को बेवकूफी के बजाय महानता समझें, इसके लिए अपनी उस दृष्टि के फालतू उपयोग के अलावा कुछ और फालतू काम करके मैं यह साबित करने की कोशिश भी करता रहता हूँ मैं उनके जैसा नहीं हूँ. उनसे अलग हूँ.
ये अलग बात है कि कई बार तो मुझे खुद अपनी इस बेवकूफी पर हँसी आती है। अरे भाई दुनिया जानती है कि बेवकूफ समझदारों से अलग होते हैं. इसमें बताने और साबित करने की क्या बात है? हाथ कंगन को आरसी क्या, पढे-लिखे को फारसी क्या? साबित तो हमेशा उलटी बातें होती हैं. और हों भी क्यों न! जो लोग देश-विदेश के बडे-बडे सौदों में दलाली के सबूत जेब में लेकर घूमते हैं मुकदमे की सुनवाई के लिए जब वही कचहरी पहुँचते हैं तो उनकी जेब ही कट जाती है. अब बताइए ऎसी स्थिति में दलाली ही क्यों, क़त्ल का भी जुर्म भला कैसे साबित होगा? वैसे भी जल्दी ही दो अक्टूबर आने वाला है और बापू ने कहा है कि घृणा पाप से करो, पापी से नहीं. अब बताइए, जब बापू की बात पूरी दुनिया मानती है तो हम कैसे न मानें?

इसीलिए हम कमीशन खाने या क़त्ल करने वालों को सजा नहीं देते. उन्हें मंत्री बनाते हैं. दे देते हैं उन्हें पूरा मौका कि खा लो और जितना चाहो कमीशन. आखिर कब तक नहीं भरेगा तुम्हारा पेट? कर लो और जितने चाहो क़त्ल या अपहरण, एक दिन तुम भी अंगुलिमाल की तरह बदल जाओगे. ये अलग बात है कि उनके आज तक बदलने की बात कौन कहे, वे अपने परम्परागत संस्कारों को ही और ज्यादा पुख्ता करते चले गए हैं. फिर भी हम हिम्मत नहीं हारे हैं और न ऊबे ही हैं. इसकी प्रेरणा भी हमें अपनी परम्परा से ही मिली है. बापू से भी पहले से हमारे पूर्वज 'दीर्घसूत्री होने' यानी लंबी रेस के घोड़े बनने पर जोर देते आए हैं.
इसीलिए देखिए, अपनी आजादी के सठिया जाने के बाद भी हम धैर्यपूर्वक देख रहे हैं और बार-बार उन्हें सत्ता में बने रहने का मौका देते जा रहे हैं.
लेकिन उस कविता पर टिप्पणी करते हुए मुझसे एक गलती हो गई. अखबार की नौकरी और वह भी लंबे समय तक पहले पन्ने की तारबाबूगिरी करने का नतीजा यह हुआ है कि मेरा पूरा व्यक्तित्व ही अख्बरिया गया है. थोडा जल्दबाजी का शिकार हो गया हूँ. तो टिप्पणी करने में भी जल्दबाजी कर दी. ज्यादा सोचा नहीं. बस तुरंत जो दिखा वही लिख दिया. महाभारत के संजय की तरह. नए दौर के अपने दूरंदेश साथियों की तरह उसका फालो अप पहले से सोच कर नहीं रखा. बता दिया कि भाई आपके ऐसे बस्सैने मन का अंत चाहे जहाँ हो, पर उसकी आदि भारत की संसद है.
बस इसी बात पर रात मुझे बापू यानी गान्ही बाबा ने घेर लिया. पहले तो अपने उपदेशों की लंबी सी झाड़ पिलाई. मैं तो डर ही गया कि कहीँ यह सत्याग्रह या आमरण अनशन ही न करने लगें. पर उन्होने ऐसा कुछ किया नहीं. जैसे पुलिस वाले किसी निरीह प्राणी को भरपूर पीट लेने के बाद उससे पूछते हैं कि बोल तुमने चोरी की थी न? अब बेचारा मरे, क्या न करे? या तो बेचारा पिटे या फिर बिन किए कबूल ले कि हाँ मैने चोरी की थी.
बहरहाल, बापू ने मुझसे सवाल किया कि बेटा तुमने संसद ही क्यों लिखा? मुझे तुरंत युधिष्ठिर याद आए, जिन्हे मैने द्वापर में यक्ष के पांच सवाल झेलते देखा था। मुझे लगा कि कहीँ मुझे भी बापू के पांच सवाल न झेलने पड़ें. बल्कि एक बार को तो मुझे लगा कि कहीँ यही द्वापर में यक्ष का रूप लेकर तो नहीं बैठ गए थे. लेकिन जल्दी ही इस शंका का समाधान हो गया. मैने अपने ध्यान की धारा थोड़ी गहरी की तो यक्ष की जगह मुझे राम जेठमलानी बैठे दिखे और बापू ने डांटा भी, 'तुमने सोच कैसे लिया कि ऐसे फालतू के सवाल मैं कर सकता हूँ?'

आख़िरकार मैंने थोड़ी हिम्मत बाँधी और डरते-डरते जवाब दिया, 'बापू क्या बताऊँ। असल में मुझे सारी गंदगी वहीं से निकलती दिखाई देती है. सो लिख दिया. अगर ग़लती हो गई हो तो कृपया माफ़ करें.' 'अरे माफ कैसे कर दूं?' बापू गरजे. जैसे रामायण सीरियल में अरविंद त्रिवेदी गरजा करते थे. 'तुम कभी तहसील के दफ्तर में गए हो?' मैं कहता क्या! बस हाँ में मुंडी हिला दी. बापू तरेरे, 'क्या देखा वहाँ मूर्ख? घुरहू की जमीन निरहू बेच देते हैं और वह भी बीस साल पहले मर चुके मोलहू के नाम. सौ रुपये दिए बग़ैर तुमको अपनी ही जमीन का इंतखाप नहीं मिल सकता और हजार रुपये खर्च कर दो तो सरकार की जमीन तुम्हारे नाम. बताओ इससे ज्यादा गंदगी कहाँ हो सकती है?' मैं क्या करता! फिर से आत्मसमर्पण कर दिया. बापू बोले, 'चल मैं बताता हूँ. कभी अस्पताल गया है?'
इस सवाल का जवाब सोचते ही मैं सिर से पैर तक काँप उठा। में फिर अपनी दिव्य दृष्टि से देख रहा था. सफ़ेद कोट पहने और गले में स्टेथस्कोप लटकाए कुछ गिद्ध एक मर चुके मनुष्य के जिंदा परिजनों को नोच रहे थे. मैं जुगुप्सा और भय से काँपता बापू के पैरों पर पड़ता इससे पहले ही बापू ने लगाई मुझे एक लाठी. बोले, 'चल अभी मैं तुझे मैं तुझे नए जमाने के शिक्षा मंदिर दिखाता हूँ.' मैंने आंख बंद की तो सामने एक चमाचम इंटरनेशनल स्कूल था और दूसरी तरफ एक टुटही इन्वर्सिटी. स्कूल में सुन्दर-सुन्दर कपडे पहने मोटे-मोटे जोंक प्लास्टिक के गुद्दों जैसे सुन्दर-सुन्दर बच्चों के हांफते-कांपते अभिभावकों के शरीर पर लिपटे पडे थे. जोंक अंगरेजी झाड़ रहे थे और अभिभावक बेचारे भीतर ही भीतर कराहते हुए उज्बकों की तरह यस् सिर यस् मैम किए जा रहे थे. उधर इन्वर्सिटी में एक वीसी नाम के प्राणी एक हाथ से नेताजी के चरण चंपने और दूसरे हाथ से विद्यार्थियों और सेवार्थियों से नोट बटोरने में लगे थे. वहीं कुछ आज्ञाकारी विद्यार्थी नेता एक निरीह टाइप प्रोफेसर, जो केवल अपना विषय पढ़ाना ही जानता था, उसे ठोंकने में लगे थे. इसके आगे मुझसे देखा नहीं जा रहा था. मैं गिड़गिड़ाया, 'बस बापू.'

पर बापू कहाँ मानने वाले थे. वह गरजे, 'चुप बे. अभी तूने कचहरी कहाँ देखी?' वह दृश्य सोच कर ही मैं काँप उठा. मैंने सपने में भी अपनी आँखें किचकिचा कर बंद कर लीं. मैं सपने में ही गिड़गिड़ाया, 'नहीं बापू. अब रहने दीजिए. मैं तो यह सोच कर काँप रहा हूँ कि इतनी सारी जगहों से निकलने वाले गंदगी के हजारों नाले-परलाने-नद-महानद सब जाते होंगे?'
अब बापू खुद रुआंसे हो गए थे. करुणा से भरे स्वर में उन्होने कहा, 'कैसी विडम्बना है कि अब बच्चे अपना घर भी नहीं पहचानते. अरे मूर्ख देख जहाँ तू जी रहा है. मीडिया, साहित्य, सिनेमा ....... इतने तो महासागर हैं इन नालों-महानदों के गंतव्य. और कहाँ जाएंगे.' नींद में ही जो सड़ांध मुझे आई कि मैं असमय जाग उठा. फिर मैंने उस सड़ांध को धन्यवाद दिया. क्योंकि, जैसा कि कहा जाता है, अंग्रेजों से भी न डरने वाले बापू शायद उस सड़ांध के ही भय से भाग चुके थे. मैं आश्वस्त था कि अब वे दुबारा मेरे पास फटकने वाले नहीं थे.

1857 के शहीदों का सरकार ने अपमान होने दिया


क्या हम ये सब भुला देंगे
-दिलीप मंडल
वो आए हैं 1857 की जंग लड़ने वाले अंग्रेज बहादुरों की जीत का जश्न मनाने। वो आए। मेरठ, दिल्ली, लखनऊ गए। गदर में अंग्रेजों ने जो जुल्म ढाए थे, उसका उन्हें कोई अफसोस न था। मेरठ में वो पत्थर पर बना प्रतीक चिह्न लगाना चाहते थे जिस पर लिखा था- 60वी किंग्स रॉयल राइफल कोर की पहली बटालियन ने 10 मई और 20 सितंबर 1857 के दौरान जो साहसिक और अभूतपूर्व साहस दिखाया, उसके नाम।

1857 के दौरान लखनऊ में कहर ढाने वाले कुख्यात सर हेनरी हेवलॉक का एक वंशज भी उस टोली में है, जो गदर के समय अंग्रेजों की बहादुरी को याद करने भारत आयी है। उसके मुताबिक- अंग्रेजी राज भारत के लिए अच्छा था, और भारत में लोकतंत्र इसलिए चल रहा है क्योंकि यहां अंग्रेजी राज रहा।

क्या आपको ये सुनकर कुछ याद आ रहा है। हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ब्रिटेन यात्रा के दौरान ठीक यही बात तो कही थी।

ऐसे में इस बात पर आश्चर्य नही होना चाहिए, कि 1857 के दौरान अंग्रेजों की बहादुरी का जश्न मनाने के लिए भारत आने वालों को सरकार वीसा देती है और उन्हें लोगो के गुस्से से बचाने के लिए उन्हें सुरक्षा दी जाती है।

वैसे मेरठ से खबर है कि ये अंग्रेज जिस चर्च में अपना स्मृति चिह्न लगाना चाहते थे, वहां के पादरी ने इसकी इजाजत नही दी।

Saturday, 29 September 2007

बादल घिरे हुए


हरिशंकर राढ़ी
कितने दिनों के बाद हैं बादल घिरे हुए .
जिनको निहारते हैं चातक मरे हुए.

उनकी गली से लौट के आए तो कोई क्यों
जाते ही हैं वहाँ पे पापी तरे हुए.

पशुओं का झुंड कोई गुजरा था रात में
खुर के निशान शबनम पे दिखते पडे हुए.

मरने पे उनके आख़िर आंसू बहाए कौन
दिखते हैं चारो ओर ही चेहरे मरे हुए.

लगता है कोई आज भी रस्ता भटक गया
और आ रहा है झूठ की उंगली धरे हुए.


इस मर्ज की दवा क्या है?


सत्येन्द्र प्रताप
एक अखबार केस्थानीय संपादक के बारे में खबर आई कि वे रंगरेलियां बनाते हुए देखे गए. कहा जा रहा है कि एक स्थानीय अखबार के रिपोर्टर ने खबर भी फाइल कर दी थी. हालांकि इस तरह की खबरें अखबार और चैनल की दुनिया में आम है और आए दिन आती रही हैं. लेकिन दिल्ली और बड़े महानगरों से जाकर छोटे शहरों में पत्रकारिता के गुर सिखाने वाले स्थानीय संपादकों ने ये खेल शुरु कर दिया है. राष्ट्रीय चैनलों के कुछ नामी गिरामी हस्तियों के तो अपने जूनियर और ट्रेनी लड़कियों के एबार्शन कराए जाने तक की कनफुसकी होती रहती है.
खबर की दुिनया में जब अखबार में किसी लड़के और लड़की के बारे में रंगरेिलयां मनाते हुए धरे गए, खबर लगती है तो उन्हें बहुत हेय दृष्टि से देखा जाता है. लेिकन उन िविद्वानों का क्या िकया जाए जो नौकरी देने की स्थिति में रहते हैं और जब कोई लड़की उनसे नौकरी मांगने आती है तो उसके सौन्दर्य को योग्यता का मानदंड बनाया जाता है और अगर वह लड़की समझौता करने को तैयार हो जाती है तो उसे प्रोन्नति मिलने और बड़ी पत्रकार बनने में देर नहीं लगती.
एक नामी िगरामी तेज - तर्रार और युवा स्थानीय संपादक के बारे में सभी पत्रकार कहते हैं िक वह ले-आउट डिजाइन के निर्विवाद रुप से िवशेषग्य हैं. लेिकन साथ ही यह भी जोड़ा जाता है िक वह बहुत ही रंगीन िमजाज थे, पुरबिया अंदाज में कहा जाए तो, लंगोट के कच्चे थे.
महिलाओं के प्रति यौन िंहसा की खबर तमाम प्राइवेट और सरकारी सेक्टर से आती है. न्यायालय से लेकर संसद तक इस मुद्दे पर बहस भी होती है. लेिकन नतीजा कुछ भी नहीं. अगर कुंिठत व्यक्ति उच्च पदासीन है तो मामले दब जाते हैं और अगर कोई छोटा आदमी है तो उसे पुिलस भी पकड़ती है और अपमािनत भी होना पड़ता है.
अगर पत्रकारिता की बात करें तो जैसे ही हम िदल्ली मुंबई जैसे महानगरों से बाहर िनकलते हैं तो खबरों के प्रति लोगों का नजरिया बहुत ही पवित्र होता है. लोग अखबार में भी खबरें ही पढ़ना चाहते हैं जो उनके जीवन और उनके िहतों से जुड़ी हों, सनसनी फैलाने वाली सामग्री कोई भी पसंद नहीं करता। पत्रकारों के प्रति लोगों का नजिरया भी अच्छा है और अखबार के माध्यम से वे अपनी समस्याओं का समाधान चाहते हैं. अगर रंगरेिलयां जैसी खबरें वे अपने पूज्य संपादकों या पत्रकारों के बारे में सुनते या पढ़ते हैं तो उनका नजरिया भी बदल जाता है. हालांिक महानगरों में िहक्की गजट टाइप के ही अखबार छपते हैं जिसमें फिल्मी नायक नायिकाओं के प्रसंग छपते हैं.
उच्चपदों पर बैठे यौनकुंिठत वरिष्ठ पत्रकारों की कुंठा का कोई हल नजर नहीं आता. बार बार कहा जा रहा है कि प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है , योग्य लोगों की जरुरत है, लेकिन वहीं बड़े पदों पर शराब और शबाब के शौकीन वृद्ध रंगीलों के िकस्से बढ़ते ही जा रहे हैं.

Friday, 28 September 2007

वो नही चाहते कि कोई इसे पढ़े, इसलिए आपका धर्म है कि इसे गाएं, गुनगुनाएं

-दिलीप मंडल

याद
है आपको वो कविता। झांसी की रानी। देश के अमूमन हर राज्य की स्कूली किताबों में सुभद्रा कुमारी चौहान की ये कविता पढ़ाई जाती है। लेकिन राजस्थान बीजेपी को इसकी कुछ पंक्तियां अश्लील लगती है। इसलिए कविता तो छपती है लेकिन आपत्तिजनक लाइनें उसमें से हटा दी जाती हैं। पहले ये देखिए कि वो लाइनें कौन सी हैं, जिन्हें बीजेपी आपकी स्मृति से हटाना चाहती है।


अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी

बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

विजय मिली पर अंग्रेज़ों की, फिर सेना घिर आई थी
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी
काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी
युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी

पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय घिरी अब रानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार
किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार
घोड़ा अड़ा नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार
रानी एक शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार

घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीरगति पानी थी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

http://www.prayogshala.com/poems/subhadra-khoob-ladi-murdani-woh-to

पूरी कविता लिंक पर क्लिक करके पढ़ें, अपने बच्चों को पढ़ाएँ, क्योंकि कांग्रेस और बीजेपी दोनों जगह सिंधिया परिवार का जो रूतबा है, उसे देखते हुए आश्चचर्य नहीं होना चाहिए कि एक नया इतिहास लिखा जाए, जिसमें सिंधिया खानदान को अंग्रेजों से लड़ने वाला देशभक्त साबित कर दिया जाए।

वैसे अंग्रेजो के शासन में देशभक्त और अंग्रेजभक्त की पहचान करने का एक आसान सा फॉर्मूला है। दिल्ली, कोलकाता और मुंबई में आपको जिस राजपरिवार और रियासत का भवन या हाउस दिख जाए, उसे अंग्रेज बहादुर का वफादार समझ लीजिए। अब बनाइए लिस्ट- सिंधिया हाउस, कपूरथला हाउस, मंडी हाउस, बीकानेर हाउस, पौड़ी गढ़वाल हाउस (बीजेपी सांसद दिवंगत मानवेंद्र शाह के पुरखो की रियासत), धौलपुर हाउस, जोधपुर हाउस, त्रावणकोर हाउस, नाभा हाउस, पटियाला (अमरिंदर सिह के पुरखों की रियासत)हाउस, बड़ौदा हाउस, कोटा हाउस, जामनगर हाउस, दरभंगा हाउस ... गिनते चले जाइए, गिनाते चले जाइए। क्या आपको किसी शहर में झांसी हाउस, आरा हाउस, बिठूर हाउस दिखा है?

दोस्तों वतन पर मरने वालों का निशां बाकी है, या वतन से गद्दारी करने वालो का? वतनपरस्तों का नाम बचा रहे इसलिए सस्वर गाइए-

अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

ये क्या क्रिकेट-क्रिकेट लगा रखा है?


सत्येन्द्र प्रताप
पहले टेस्ट मैच बहुत ही झेलाऊ था, फिर पचास ओवर का मैच शुरु हुआ, वह भी झेलाऊ साबित हुआ तो २०-२० आ गया. क्या खेल है भाई! भारत पाकिस्तान का मैच जोहान्सबर्ग में और सन्नाटा दिल्ली की सड़कों पर. मुझे तो इस बत की खुशी हुई कि आफिस से निकला तो खाली बस मिल गई, सड़क पर सन्नाटा पसरा था. मोहल्ले में पहुंचा तो पटाखों के कागज से सड़कें पट गईं थीं और लोग पटाखे पर पटाखे दागे जा रहे थे.
अरे भाई कोई मुझे भी तो बताए कि आखिर इस खेल में क्या मजा है? कहने को तो इस खेल में २२ खिलाडी होते हैं, लेकिन खेलते दो ही हैं. उसमें भी एक लड़का जो गेंद फेकता है वह कुछ मेहनत करता है, दूसरा पटरा नुमा एक उपकरण लेकर खड़ा रहता है. फील्ड में ग्यारह खिलाडी बल्लेबाजी कर रहे खिलाडी का मुंह ताकते रहते हैं कि कुछ तो रोजगार दो.
खेल का टाइम भी क्या खाक कम किया गया है? हाकी और फुटबाल एक से डेढ़ घंटे में निपट जाता है और उसपर भी जो खेलता है उसका एंड़ी का पसीना माथे पर आ जाता है. यहां तो भाई लोग मौज करते हैं. हां, धूप मेंखड़े होकर पसीना जरुर बहाते हैं. वैसे अगर जाड़े का वक्त हुआ तो धूप में खड़े होना भी मजेदार अनुभव हो जाता है. बस खड़े रहो और लोगों का मुंह निहारते रहो. हालांकि रिकी पॉन्टिंग जैसे खिलाडी जब खड़े-खड़े बोर हो जाते हैं तो वहीं अपनी जगह पर कूदने लगते हैं.
खिलाडी भी अजीब-अजीब होते हैं. पहले वाल्श और एंब्रोज थे, दोनों मिलाकर बारह ओवर फेंक देते थे और रोजगार देते थे विकेट कीपर को. बैटिंग करने वाला बंदा तो अपना मुंह-हाथ-पैर बचाने में ही लगा रहता था. राबिन भाई को कैसे भुलाया जा सकता था, अगर कभी गलती से पचास रन बना दिया मुंह से झाग फेंक देते थे. लगता था कि बेचारे ने मेहनत की है. पाकिस्तान के एक भाई साहब थे इंजमाम, क्या कहने! उन्हें तो दौड़ने में भी आलस आता था. ज्यादातर वे आधी पिच तक पहुंचते और उन्हें मुआ अंपायर उंगली कर देता था. वो भी समझ नहीं पाते कि आखिर क्या दुश्मनी है उनसे.
अब तो विज्ञापन कंपनियों की बांछें खिल गई हैं. क्योंकि तीन घंटे के क्रिकेट का बुखार भारत के युवकों पर चढ़ गया है. विश्वकप में भारत पाकिस्तान की दुर्दशा से तो उनका दिवाला निकल गया था. अब आर्थिक अखबारों में सर्वे पर सर्वे आ रहा है कि बड़ा मजा है इस क्रिकेट में. कंपनियों की भी बल्ले-बल्ले है.
हालांकि अगर क्रिकेट को २०-२० की जगह पर दो खिलाडियों का मैच कर दिया जाए तो मजा दुगुना हो जाए. अगर सामने लांग आन और लांगआफ पर गेंद जाए तो गेंदवाज उसे पकड़ कर लाए और अगर लेग आन लेग आफ और पीछे की ओर गेंद जाए तो बल्लेबाज उसे पकड़ कर लाए. ये मैच पांच ओवर में ही निपट जाएगा और खिलाडी खेलते हुए भी लगेंगे. दस-बीस हजार का टिकट लगाकर क्रिकेट के दीवानों को फील्ड के बाहरी हिस्से पर फील्डिंग के लिए भी लगाया जा सकता है. साथ ही नियमों में भी बदलाव की जरुरत है. पीछे गेंद जाने पर बालर को रन मिले और आगे की ओर गेंद जाने पर बैट्समैन को ... वगैरा वगैरा. अगर इस तरह का क्रिकेट होने लगे तो सही बताएं गुरु मुझे भी देखने में मजा आ जाए.
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आम जनता की आस्था

इष्ट देव सांकृत्यायन
दिलली हाईकोर्ट ने जस्टिस सभरवाल के मसले को लेकर जिन चार पत्रकारों को सजा सुनाई थी, सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा पर रोक लगा दी है. हाईकोर्ट ने उन्हें यह सजा इसलिए दी थी क्योंकि उसे ऐसा लगा था कि मिड डे में छापे लेख से कोर्ट की छवि धूमिल हो रही थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस सजा के खिलाफ पत्रकारों की याचिका किस आधार पर स्वीकारी और किस कारण से हाईकोर्ट द्वारा दी गई सजा पर रोक लगाई, यह बात तो अभी स्पष्ट नहीं हो सकी है लेकिन पत्रकार बिरादरी और आम जन का मानना है कि इससे भारत की न्यायिक प्रणाली में आम जनता का विश्वास बहाल होता है. आस्था और विश्वास की बहाली का उपाय सच का गला दबाना नहीं उसकी पड़ताल करना है. यह जानना है कि अगर मीडिया ने किसी पर कोई आरोप लगाया है तो ऐसा उसने क्यों किया है? आखिर इस आरोप के क्या आधार हैं उसके पास? उन आधारों पर गौर किया जाना चाहिए. उसके तर्कों को समय और अनुभव की कसौटी पर कसा जाना चाहिए. इसके बाद अगर लगे कि यह तर्क माने जाने लायक हैं, तभी माना जाना चाहिए. तमाम पत्रकारों की ओर से विरोध के बावजूद मैं यह मानता हूँ कि मीडिया के आचार संहिता लाई जानी चाहिए. लेकिन यह आचार संहिता सच का गला घोंटने वाली नहीं होनी चाहिए. यह आचार संहिता सत्ता के हितों की रक्षा के लिए नहीं, आम जनता के हितों की रक्षा करने वाली होनी चाहिए. क्योंकि लोकतंत्र में व्यवस्था का कोई भी अंग जनता के लिए है. चाहे वह विधायिका हो या कार्यपालिका या फिर न्यायपालिका या मीडिया; भारत की संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत सभी जनता के लिए हैं न कि जनता इनके लिए है. इसीलिए हमारे संविधान ने व्यवस्था के जिस किसी भी अंग या पद को जो विशेषाधिकार दिए हैं वह आम जनता के हितों की रक्षा के लिए हैं. आम जनता इनमें से किसी के हितों की रक्षा के लिए नहीं है. मीडिया को भी इस तरह के जो घोषित-अघोषित विशेषाधिकार हैं, जिनके अंतर्गत वह महीनों अपराधियों के इंटरव्यू दिखाता है, किसी सेलेब्रिटी की शादी की खबर महीनों चलाता है और भूत-प्रेत के किस्से सुना-सुना कर उबाता रहता है या सनसनी फैलता रहता है, ये अधिकार छीने जाने चाहिए.
लेकिन भाई अगर व्यवस्था के शीर्ष पर आसीन लोग भ्रष्ट हो रहे हों, और अपने स्वार्थों में इस क़दर अंधे हो गए हों कि धृतराष्ट्र को भी मात दे रहे हों तो उनके विशेषाधिकार के नाजायज पंख भी काटे जाने चाहिए. व्यवस्था अगर यह काम नहीं करेगी तो फिर यह काम जनता को करना पड़ेगा. और भारत की जनता ऐसा कुछ करने में हिचकती नहीं है. इसके कई उदाहरण हमारे सामने हैं.
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट का यह कदम न्याय में आम जनता की आस्था बहाल करने वाला है. इसके लिए सर्वोच्च न्यायालय धन्यवाद और बधाई दोनों का पात्र है. धन्यवाद इसलिए कि उसने अपना दायित्व निभाया. न्याय की व्यवस्था को न्याय की तरह देखा. और बधाई इसलिए कि वह न्यायिक प्रणाली में जनता की आस्था बनाए रखने में सफल रहा.

वे हमारे साथ सदैव रहना चाहते है!

-दिलीप मंडल

उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी कैंपस इलाके में लड़कियों के साथ छेड़खानी की। उन्होंने लड़कियो के साथ जबर्दस्ती की कोशिश की। लेकिन वो हमारी आपकी सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस में भर्ती होंगे। सरकार उनके साथ है। इसलिए आप चाहें या न चाहें, वो हमारी सुरक्षा करेंगे। वो हमारे लिए हमारे साथ सदैव रहना चाहते हैं।

डीयू की लड़कियां कितनी गैरवाजिब मांग उठा रही हैं। वो चाहती है कि छेड़खानी करने वाले लफंगे जिस बैच में शामिल हों, उस बैच को नौकरी पर न रखा जाए। वो चाहती है कि दिल्ली पुलिस और केंद्रीय गृह मंत्री शिवराज पाटिल उनकी मांग मान लें। जिस एनएसयूआई को डीयू ने खूबसूरत पोस्टर और संगठन का जलवा देखकर हाल ही मे जिताया है और जिसके नेताओं ने सोनिया गाधी के साथ तस्वीरे खिचाई थी, वो खामोशी साधे हुए है। डीयू स्टूडेंट यूनियन की प्रेसिडेट लड़की, दिल्ली की मुख्यमंत्री महिला, देश चलाने वाली एक महिला - और सभी कांग्रेसी, जिसका हाथ आम आदमी के साथ है, लेकिन डीयू की लड़कियों की एक मामूली सी और बिल्कुल सही मांग के समर्थन में कोई नही आ रहा है।

आप किस ओर खड़ें है?

Wednesday, 26 September 2007

दूर आसमान रहे

रतन
उडो तो ऐसे कि पीछे हर इक उडान रहे
इतना आगे बढ़ो कि दूर आसमान रहे
हद हो इतना कि कोई बात भी न हो पाए
फासला ऐसा तेरे मेरे दरमियान रहे
न ही माजी न ही आगे की बात हो कोई
न कुछ न संग तेरी यादों का सामान रहे
हुए हो दूर मगर मेरी सदा रखना याद
कभी न हम मिलें दिल में यही गुमान रहे
भूल से मिल गए कहीँ भी एक पल के लिए
निगाह बात करे लब ये बेजुबान रहे
पाक तुम भी रहो और पाक हमें भी रखना
चाक न दिल हो न तन ही लहूलुहान रहे
हंसी दुनियाँ है मेरी तुम न इसे नर्क बना
पान हो मुँह में तो हाथों में पीकदान रहे
अगर करोगे ग़लत बद्दुआ करेंगे सभी
कि परेशान मैं ज्यों तू भी परेशान रहे
ए रतन कर दुआ कि सारा जहां रोशन हो
और मेरे सिर पे भी खुदा का साईबान रहे

Tuesday, 25 September 2007

कृपया इनसे मुग्ध न हों

-दिलीप मण्डल
क्या आप उन लोगों में हैं जो लालू यादव के भदेसपन के दीवाने हैं? क्या मुलायम सिंह आपकी नजर में समाजवादी नेता हैं? क्या उत्तर भारत की ओबीसी पॉलिटिक्स से आपको अब भी किसी चमत्कार की उम्मीद है? क्या आप उन लोगों में हैं, जिन्हें लगता है कि इन जातियों का उभार सांप्रदायिकता को रोक सकता है? अगर आप ऐसे भ्रमों के बीच जी रहे हैं तो आपके लिए ये जाग जाने का समय है।

1960 के दशक से चली आ रही उत्तर भारत की सबसे मजबूत और प्रभावशाली राजनीतिक धारा के अस्त होने का समय आ गया है। ये धारा समाजवाद, लोहियावाद और कांग्रेस विरोध से शुरू होकर अब आरजेडी, समाजवादी पार्टी, इंडियन नेशनल लोकदल, समता पार्टी आदि समूहों में खंड खंड हो चुकी है। गैर-कांग्रेसवाद का अंत वैसे ही हो चुका है। टुकड़े टुकड़े में बंट जाना इस राजनीति के अंत का कारण नहीं है। पिछड़ा राजनीति शुरुआत से ही खंड-खंड ही रही है। बुरी बात ये है कि पिछड़ावाद अब अपनी सकारात्मक ऊर्जा यानी समाज और राजनीति को अच्छे के लिए बदलने की क्षमता लगभग खो चुका है। पिछड़ा राजनीति के पतन में दोष किसका है, इसका हिसाब इतिहास लेखक जरूर करेंगे। लेकिन इस मामले में सारा दोष क्या व्यक्तियों का है ? उत्तर भारत के पिछड़े नेता इस मामले में अपने पाप से मुक्त नहीं हो सकते हैं, लेकिन राजनीति की इस महत्वपूर्ण धारा के अन्त के लिए सामाजिक-आर्थिक स्थितियां भी जिम्मेदार हैं।

दरअसल जिसे हम पिछड़ा या गैर-द्विज राजनीति मानते या कहते हैं, वो तमाम पिछड़ी जातियों को समेटने वाली धारा कभी नहीं रही है। खासकर इस राजनीति का नेतृत्व हमेशा ही पिछड़ों में से अगड़ी जातियों ने किया है। कर्पूरी ठाकुर जैसे चंद प्रतीकात्मक अपवादों को छोड़ दें तो इस राजनीति के शिखर पर आपको हमेशा कोई यादव, कोई कुर्मी या कोयरी, कोई जाट, कोई लोध ही नजर आएगा। दरअसल पिछड़ा राजनीति एक ऐसी धारा है जिसका जन्म इसलिए हुआ क्योंकि आजादी के बात पिछड़ी जातियों को राजनीतिक सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिल पा रही थी।


जबकि इन जातियों के राजनीतिक सशक्तिकरण का काम लगभग पूरा हो चुका है, तो इन जातियों में मौजूदा शक्ति संतुलन को बदलने की न ऊर्जा है, न इच्छा और न ही जरूरत। इस मामले में पिछड़ा राजनीति अब यथास्थिति की समर्थक ताकत है। इसलिए आश्चर्य नहीं है कि दलित उत्पीड़न से लेकर मुसलमानों के खिलाफ दंगों में पिछड़ी जातियां बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती दिखती हैं। ऐसा गुजरात में हुआ है, उत्तर प्रदेश में हुआ है और बिहार से लेकर हरियाणा और मध्यप्रदेश तक में आपको ऐसे केस दिख जाएंगे।

1990 का पूरा दशक उत्तर भारत में पिछड़े नेताओं के वर्चस्व के कारण याद रखा जाएगा। मुलायम सिंह यादव, लालू यादव, नीतीश कुमार, शरद यादव, देवीलाल (दिवंगत), ओम प्रकाश चौटाला, कल्याण सिंह, उमा भारती, अजित सिंह जैसे नेता पूरे दशक और आगे-पीछे के कुछ वर्षों में राजनीति के शिखर पर चमकते रहे हैं। इस दौरान खासकर प्रशासन में और सरकारी ठेके और सप्लाई से लेकर ट्रांसपोर्ट और कारोबार तक में पिछड़ों में से अगड़ी जातियों को उनका हिस्सा या उससे ज्यादा मिल गया है। ट्रांसफर पोस्टिंग में इन जातियों के अफसरों को अच्छी और मालदार जगहों पर रखा गया। विकास के लिए ब्लॉक से लेकर पंचायत तक पहुंचने वाले विकास के पैसे की लूट में अब इन जातियों के प्रभावशाली लोग पूरा हिस्सा ले रहे हैं।

इन जातियों के प्रभावशाली होने में एक बड़ी कमी रह गई है। वो ये कि शिक्षा के मामले में इन जातियों और उनके नेताओं ने आम तौर पर कोई काम नहीं किया है। इस मामले में उत्तर भारत की पिछड़ा राजनीति, दक्षिण भारत या महाराष्ट्र की पिछड़ा राजनीति से दरिद्र साबित हुई है।

विंध्याचल से दक्षिण के लगभग हर पिछड़ा नेता ने स्कूल कॉलेज से लेकर यूनिवर्सिटी खोलने में दिलचस्पी ली थी और ये सिलसिला अब भी जारी है। लेकिन उत्तर भारत के ज्यादातर पिछड़ा नेता अपने आचरण में शिक्षा विरोधी साबित हुए हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार आदि राज्यों के अच्छे शिक्षा संस्थान पिछड़ा उभार के इसी दौर में बर्बाद हो गए। इन नेताओं से नए शिक्षा संस्थान बनाने और चलाने की तो आप कल्पना भी नहीं कर सकते। शिक्षा को लेकर उत्तर भारत के पिछड़े नेताओं में एक अजीब सी वितृष्णा आपको साफ नजर आएगी।

इसका असर आपको पिछले साल चले आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान दिखा होगा। अपनी सीटें कम होने की चिंता को लेकर जब सवर्ण छात्र सड़कों पर थे और एम्स जैसे संस्थान तक बंद करा दिए गए, तब पिछड़ी जाति के छात्रों में कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। जब सरकार ने आंदोलन के दबाव में ओबीसी रिजर्वेशन को संस्थानों में सीटें बढ़ाने से जोड़ दिया और फिर आरक्षण को तीन साल की किस्तों में लागू करने की घोषणा की, तब भी पिछड़ी जाति के नेताओं से लेकर छात्रों तक में कोई प्रतिक्रिया होती नहीं दिखी। और फिर जब अदालत में सरकार ओबीसी आरक्षण का बचाव नहीं कर पाई और आरक्षण का लागू होना टल गया, तब भी पिछड़ों के खेमे में खोमोशी ही दिखी।

इसकी वजह शायद ये है कि पिछड़ी जातियों में कामयाबी के ज्यादातर मॉडल शिक्षा में कामयाबी हासिल करने वाले नहीं हैं। पिछड़ी जातियों में समृद्धि के जो मॉडल आपको दिखेंगे उनमें ज्यादातर ने जमीन बेचकर, ठेकेदार करके, सप्लायर्स बनकर, नेतागिरी करके, या फिर कारोबार करके कामयाबी हासिल की है। दो तीन दशक तक तो ये मॉडल सफल साबित हुआ। लेकिन अब समय तेजी से बदला है। नॉलेज इकॉनॉमी में शिक्षा का महत्व चमत्कारिक रूप से बढ़ा है। आईटी से लेकर मैनेजमेंट और हॉस्पिटालिटी से लेकर डिजाइनिंग, एनिमेशन और ऐसे ही तमाम स्ट्रीम की अच्छी पढ़ाई करने वाले आज सबसे तेजी से अमीर बन रहे हैं। इस रेस में पिछड़े युवा तेजी से पिछड़ रहे हैं। उत्तर प्रदेश के नोएडा और हरियाणा के गुड़गांव के हरियाणा में आपको पढ़े लिखे लोगों की समृद्धि और जमीन बेचकर करोड़ों कमाने वालों की लाइफस्टाइल का फर्क साफ नजर आएगा। ऐसे भी वाकए हैं जब जमीन बेचकर लाखों रुपए कमाने वाला कोई शख्स किसी एक्जिक्यूटिव की कार चला रहा है। अगली पीढ़ी तक ये फासला और बढ़ेगा।

ऐसे में उम्मीद की किरण कहां है? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए आपको इस सवाल का जवाब तलाशना होगा कि समाज में बदलाव की जरूरत किसे है। उत्तर भारतीय समाज को देखें तो उम्मीद की रोशनी आपको दलित, अति पिछड़ी जातियों और मुसलमानों के बीच नजर आएगी। भारतीय लोकतंत्र में ये समुदाय अब भी वंचित हैं। यथास्थिति उनके हितों के खिलाफ है। संख्या के हिसाब से भी ये बहुत बड़े समूह हैं और चुनाव नतीजों के प्रभावित करने की इनकी क्षमता भी है। वैसे जाति और मजहबी पहचान की राजनीति की बात करते हुए हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि आने वाले समय में शहरीकरण की प्रक्रिया तेज होने के साथ शायद आदिम पहचान के दम पर चल रहे भारतीय लोकतंत्र का भी चेहरा भी बदलेगा। वैसे भी लोकतंत्र जैसी आधुनिक शासन व्यवस्था का जाति और कबीलाई पहचान के साथ तालमेल स्वाभाविक नहीं है।

Monday, 24 September 2007

सत्यमेव जयते का सच

इष्ट देव सांकृत्यायन
इससे ज्यादा बेशर्मी की बात और क्या हो सकती है कि 'सत्यमेव जयते' का उद्घोष करने और देश भर को न्याय देने का दंभ भरने वाली न्यायपालिका खुद ही अन्याय का गढ़ बन जाए. वैसे यह कोई नई बात नहीं है. हिंदी साहित्य और फिल्मों में यह बात बार-बार कही गई है. श्रीलाल शुक्ल की अमर कृति
'राग दरबारी' का लंगड़ और 'अंधा कानून' जैसी फिल्में घुमा-फिरा कर यही बात कहना चाहती रहीं हैं। न्याय की मूर्तियों को उस अपराधी साबित करने वाला कोई सबूत जंचता ही नहीं जो उनकी कृपा खरीद लेता है. न्याय खरीदा-बेचा जाता है, इसका इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि अकेले जस्टिस सब्बरवाल ही नहीं कई और जस्टिस अरबों की सम्पत्ति के मालिक हैं.
इसी सिलसिले में हाल ही में
समकालीन जनमत पर आए दिलीप मंडल के पोस्ट पर कहीं और किसी सज्जन ने यह सवाल उठाया है कि पत्रकार कौन से दूध के धुले हैं. लेकिन मित्र सवाल किसी पेशे, पेशेवर या व्यक्ति के दूध या शराब के धुले होने का नहीं है. सवाल कर्म और कुकर्म का है. पत्रकार भी ऐसे हैं जो रिश्वत लेते हैं, ब्लैकमेलिंग करते हैं और दलाली करते हैं. यह देश की व्यवस्था का दोष है कि और पेशों की तरह पत्रकारिता में भी ईमानदार और प्रतिभाशाली लोग कई बार दलालों और भ्रष्ट पत्रकारों की ही चाटुकारिता के लिए मजबूर होते हैं. लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हम उन्हें छोड़ने की वकालत कर रहे हैं. दुर्भाग्य की बात यह है कि इस पेशे में भी आम तौर पर सारी सुविधाएं अधिकतर भ्रष्ट लोगों के ही पास हैं और योग्य पत्रकार जैसे-तैसे जीवनयापन के अलावा कुछ और कर पाने की हैसियत में नहीं हैं. पत्रकार आए दिन अपने बीच के ऐसे लोगों के खिलाफ आवाज भी उठाते हैं. ये अलग बात है कि वह नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित होती है.
अगर ऐसे किसी पत्रकार या प्रकाशन के खिलाफ फैसला हुआ होता तो किसी को कोई गुरेज नहीं होती. उमा खुराना के मसले पर टीवी चैनल और सम्बंधित पत्रकार के खिलाफ हुआ फैसला इसका ज्वलंत उदाहरण है. मीडिया की बढती दुष्प्रवृत्तियों पर सबसे ज्यादा मुखर पत्रकार ही हैं. कोई भी समाजविरोधी कार्य करने या उसमें सहयोग देने वाले पत्रकारों के खिलाफ कोई भी फैसला कहीँ से भी आए, मीडिया से जुडे अधिकतर लोग उसका स्वागत करते हैं और आगे भी करते रहेंगे. लेकिन यह क्या बात हुई कि आप किसी को उसकी ईमानदारी की सजा दें और ऊपर से यह तर्क कि 'जस्टिस इन चीजों से ऊपर होता है'. ऐसा तो राजतंत्र में भी नहीं होता साहब और यह लोकतंत्र है.

क्या ऐसा कभी आपने किसी अखबार में पढा या किसी टीवी चैनल पर सुना कि पत्रकार सत्य-असत्य या न्याय-अन्याय से ऊपर होता है? जस्टिस सब्बरवाल और यह फैसला सुनाने वाले अन्य अन्यायमूर्ति भी सिर्फ पत्रकारों और मीडिया हाउस के खिलाफ सजा सुनाने के ही नहीं आम जनता के भी दोषी हैं. असल में यह खबर पीएनएन ने दी थी. और पीएनएन इसके लिए साधुवाद का पात्र है। आप चाहें तो वहाँ यह पूरी खबर पढ़ें और विस्तृत जानकारी हासिल करें.
यह मानने की जरूरत बिल्कुल नहीं है मिड डे यापीएनएन ही सही हैं। अपनी आय से बहुत अधिक अकूत सम्पत्ति के मालिक होने के बावजूद जस्टिस सब्बरवाल के बारे में मैं यह मान सकता हूँ और चाहें तो आप भी मान लें कि वह सही हो सकते हैं. लेकिन सिर्फ इसलिए कि वह जस्टिस हैं लिहाजा उनके खिलाफ कोई मामला ही न बनाया जाए और चाहे जो हो उनके कार्यों पर सवाल न उठाया जाए, यह तो लोकतंत्र की बुनियादी अवधारणा के खिलाफ है. इस तरह तो न्यायपालिका भी भटक जाएगी अपने मूलभूत उद्देश्य से ही.
सब्बरवाल सही हैं या गलत, यह बात सबूतों और उनके परीक्षण के आधार पर तय की जानी चाहिए. किसी के जस्टिस या पत्रकार होने के आधार पर नहीं. ऐसे समय में जबकि देश में लोकपाल और सूचना के अधिकार की बात की जा रही हो, तब अगर इस तरह की बात की होने का ही नहीं, समाजविरोधी होने जैसी बात है. इसके शमित मुखर्जी और अरुंधती राय के मामले में हम देख चुके हैं. इसलिए हमें उम्मीद है कि हाईकोर्ट ने चाहे जो किया सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर वास्तविक नजरिया अपनाएगी. लेकिन अगर तब जस्टिस सब्बरवाल गलत पाए जाते हैं तो वह सिर्फ पत्रकारों के नहीं, देश और जनता के दोषी होंगे.

इससे ज्यादा जनविरोधी और क्या हो सकता है कि कोई अपने बेटों के निजी लाभ के लिए एक शहर तबाह करने पर तुल जाए? यह ह्त्या से बड़ा अपराध होगा. अब अगर इसके बाद भी हम चुप रहे तो हम मुर्दा राष्ट्र के मुर्दा नागरिक कहे जाएंगे. लिहाजा उठें, बोलें और अन्याय के विरुद्ध जहाँ से और जैसे भी हो सके अपनी आवाज बुलंद करें.
सत्यमेव जयते-शुभमेव जयते.


Friday, 21 September 2007

ध्यान का इतिहास है जरूरी

इष्ट देव सांकृत्यायन
तिथि : 19 सितंबर 2007, बुधवार
मुकाम : दिल्ली में लोदी रोड स्थित श्री सत्य साईँ सेंटर का ऑडिटोरियम
लंबे समय बाद स्वामी वेद भारती का साथ था. दशमेश एजुकेशनल चैरिटेबल ट्रस्ट ने यह आयोजन किया था और इसके कर्णधार थे राय साहब. राय साहब यानी वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय. जब मैं पहुँचा तब तक 'ध्यान का वैश्विक प्रभाव' विषय पर केंद्रित इस व्याख्यान की औपचारिक शुरुआत हो चुकी थी. राय साहब बता रहे थे स्वामी वेद भारती के बारे में. निश्चित रुप से मेरे जैसे लोगों के लिए इसमें कोई रूचिकर बात नहीं थी, जो पहले से ही स्वामी जी के बारे में काफी कुछ जानते थे. लेकिन उन तमाम लोगों के लिए यह दिलचस्प था जो पहले से ज्यादा कुछ नहीं जानते थे.
स्वामी जी से मेरा परिचय 'योग इंटरनेशनल' पत्रिका के मार्फ़त हुआ था. अमेरिका से छपने वाली इस पत्रिका में स्वामी जी की योजनाओं के बारे में जानकारी दी गई थी और उनका भारत का पूरा पता भी उसमें था. बाद में दिल्ली से छपने वाली लाइफ पोजिटिव में भी मैंने स्वामी जी पर एक पूरा लेख पढा और फिर मेरे माना में उनका एक इंटरव्यू करने की इच्छा हुई. ऋषिकेश स्थित उनके आश्रम से टेलीफोन पर सम्पर्क किया तो भोला शंकर से बात हुई. उन्होने एक महीने बाद स्वामी जी के भारत आने और तभी मुलाक़ात करा पाने की बात कही. खैर, मैंने उस वक़्त इसे हरी इच्छा मान कर भविष्य में कभी के लिए मुल्तवी कर दिया था. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. एक महीना बीतते ही भोला ने फिर मुझसे स्वयम सम्पर्क किया और मुफीद समय पूछा. आखिरकार समय तय हुआ और मैं ऋषिकेश पहुँचा. पूरे दिन विभिन्न गतिविधियों में व्यस्तता और आश्रम की कार्यप्रणाली के अवलोकन के बाद रात 12 बजे स्वामी जी के साथ मेरी बैठक शुरू हुई.
हमारी चर्चा अध्यात्म कम दुनिया भर में योग और उसकी दुर्दशा पर अधिक केंद्रित रही. रात दो बजे तक हमारी चर्चा चलती रही और इस दौरान ध्यान की तमाम विधियों, नए दौर में इसकी प्रासंगिकता, इसे लेकर चल रहे सर्कसों के अलावा स्वामी जी के व्यक्तिगत जीवन से जुडे कई सवाल भी मैंने किए और उन्होने बिना हिचके मेरे सवालों के जवाब दिए. मुझे सुखद आश्चर्य हो रहा था कि स्वामी जी पूरे दिन की व्यस्तता के बावजूद इस वक़्त भी पूरी त्वरा के साथ बातचीत में लगे थे.
क्षमा करें, मैं फ्लैश बैक में चला गया. हालांकि हमें अभी की बात करनी थी. तो अभी 2005 के बाद 2007 में स्वामी जी में मैं वही त्वरा और वही शांति देख रहा था. राय साहब के बाद थोड़ी देर के लिए बीच में शेष नारायण सिंह आए और फिर स्वामी जी सीधे मुखातिब थे अपने श्रोताओं से. शुरुआत ध्यान से. यह ध्यान तो नहीं, हाँ ध्यान की छोटी सी झलक भर थी. पर जिसने भी मनोयोग से इसमें हिस्सा लिया होगा उसका संकल्पबद्ध होना मैं तय मानता हूँ. क्षमा करें, इसका आनंद लगभग वैसा ही है जैसे गूंगे के लिए गुड़ का स्वाद. मैं यह अनुभूति कैसे बांटू आपसे? हालांकि इस बीच भी कुछ लोगों के मोबाइल फोन बजे और तब कुछ लोगों के मन में तालिबानी ख़्याल भी आए. पर क्या करिएगा? हमारे देश में एक ही चीज की तो सबसे ज्यादा कमी है और वो है सिविक सेन्स. चूंकि यह चीज यहाँ कहीं नहीं पाई जाती, लिहाजा यहाँ भी इसकी उम्मीद व्यर्थ ही थी.
विषय पर आते हुए स्वामी जी ने शुरुआत ही संस्कृति और राष्ट्रवाद के फर्क से की. उन्होने कहा, 'जब भी भारतीय संस्कृति की बात की जाती है उसे आम तौर पर राष्ट्रवाद से जोड़ दिया जाता है. लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं. मैं काई संस्कृतियों में रहा हूँ और मुझे सबसे प्यार है. तमाम देशों में गया हूँ. मुझे वहाँ के लोगों से, उनके धर्मग्रंथों से प्यार है. मैं नहीं मानता कि धर्म बदलवा कर किसी व्यक्ति को परम सत्ता के दर्शन कराए जा सकते हैं या उसे आध्यात्मिक बनाया जा सकता है. भगवान ने स्वयं कहा है कि जो जिस मार्ग से मेरे पास आता है, मैं उसी मार्ग से उसे भक्ति और सत्य की ओर बढाता हूँ.
यह एक संयोग ही है कि ध्यान के दर्शन पर तो बहुत कार्य हुआ लेकिन उसके इतिहास पर कोई काम नहीं हुआ. हालांकि इस पर कार्य बहुत जरूरी है. मैं चाहता हूँ कि इस पर कार्य हो. अगर इस कार्य किया जाए तो शायद पता चले कि दुनिया भर में जहाँ कहीं भी ध्यान है हर जगह उसका व्याकरण एक ही है. सबमें श्वांस पर ही अवधान लाने के लिए कहा जाता है.'
उनहोंने चीन, कम्बोडिया, थाईलैंड, नोर्वे, इंडोनेशिया आदि कई देशों की संस्कृतियों, वहाँ के संतों-भाषाओं-ध्यान परम्पराओं का जिक्र करते हुए कहा, 'एशिया की कम से कम 50 लिपियाँ ब्राह्मी से निकली हैं. चीन में जब बौद्ध धर्म पहुँचा और वहाँ मंत्रों के लिखने की बात आई तो पता चला कि चीनी लिपि में तो किसी दूसरी भाषा के वर्ण लिखे ही नहीं जा सकते. तब वहाँ ब्राह्मी से जुडी एक दूसरी लिपि का आविष्कार बौद्ध योगियों ने किया. यह लिपि है सिद्धम, जिसका प्रयोग आज भी वहाँ मंत्रों को लिखने के लिए किया जाता है.'
यह दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पहले मैंने स्वामी जी को जितना जाना था, आज उससे थोडा ज्यादा जाना. राहुल और रजनीश के बाद जिन लोगों ने मुझे प्रभावित किया उनमें स्वामी वेद भारती एक हैं. केवल भाषा और विचारधारा ज्ञान नहीं दुनिया भर की विभिन्न संस्कृतियों के सम्मान के लिए भी. राहुल नास्तिक थे और रजनीश का अपना धर्म था. स्वामी वेद भारती ने अपना कोई धर्म नहीं चलाया. वह सनातन धर्म की मर्यादाओं से बंधे हैं. फिर भी दुनिया के सभी धर्मों, सभी संस्कृतियों और सभी दर्शन धाराओं के प्रति उनके मन में पूरा सम्मान है. वरना तो इस तल पर ज्यादातर धर्माधिकारी जूता कंपनियों के एजेंटों से अलग नहीं हैं. राहुल-रजनीश और वेद में एक साम्य और है और वह है चरैवेति-चरैवेति. स्वामी जी कहते हैं कि कर्ण कवच-कुंडल पहन कर पैदा हुए थे और में पैरों में चक्कर पहन कर पैदा हुआ हूँ. बहरहाल इन बातों की चर्चा फिर कभी.
मुझे बेहद प्रभावित किया स्वामी जी की इस बात ने - 'सेकुलरिज्म की बात आज की जा रही है. भारत में कम से कम चार शताब्दियों से दरगाहों पर हिंदू और मुसलमान दोनों सम्प्रदायों के लोग जा रहे हैं और चादर चढ़ा रहे हैं. मन्नतें मान रहे हैं. सीरिया में मुस्लिम महिलाएं कोप्टिक चर्च में जाकर आशीर्वाद लेती हैं. तबसे जब सेकुलरिज्म शब्द का आविष्कार नहीं हुआ था.
दुनिया का कोई भी धर्म हो, ध्यान का एक ही व्याकरण है। क्या बात है भाई? जरूर कोई इंटरनेशनल कोंफ्रेंन्स हुई होगी और उसमें ये एग्रीमेंट हुई होगी. (बीच में हंसने लगते हैं). यह बात जाने कितने हजार सालों से चली आ रही है.' देश-विदेश में भारतीयता के हाल का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, 'भारतीयों ने योग का मतलब चमत्कार समझ लिया है और योगी का मतलब ज्योतिषी. जबकि ऐसा है नहीं. योग सिद्धियों को नहीं कहते हैं. घुटने तक को नाक को ले आने या 5 मिनट तक सांस रोके रखने को भी योग नहीं कहते. योग धर्म बदलने के लिए भी आपको नहीं कहता. वह आपको आपके अपने धर्म में रहते हुए शांति की साधना का मार्ग देता है. योग का मतलब है कि कोई तनाव और क्रोध से भरा हुआ आपके पास आए, लेकिन जाए तो मुस्कराता हुआ, बिल्कुल शान्त भाव से लौटे.' समारोह का समापन फिर से ध्यान और एमएस सिद्धू के धन्यवाद ज्ञापन से हुआ. बाद में मेरी मुलाक़ात केएन गोविंदाचार्य, राय साहब, राजेश कटियार, अवधेश कुमार और संजय तिवारी से भी हुई. आख़िर में चाय पानी पिए और चले आए. और क्या?

Thursday, 20 September 2007

गठबंधन के देवता

इष्ट देव सांकृत्यायन
बहुत पहले एक कवि मित्र ने एक दार्शनिक मित्र से सवाल किया था. मैं भी वहाँ मौजूद था, लेकिन उन दिनों अपनी दिलचस्पी का विषय न होने के नाते पचड़े में पड़ना मैंने जरूरी नहीं समझा. फिर भी जब दार्शनिक मित्र की घिग्घी बंधती देखी तो मजा आने लगा और मैं भी उसमें रूचि लेने लगा. असल में ऐसा कोई सवाल होता नहीं था जिसका ठीक-ठीक जवाब हमारे दार्शनिक मित्र के पास न होता रहा हो। योग के गुरुओं की तरह. जैसे वे क़मर में दर्द से लेकर कैंसर और एड्स तक का इलाज बता देते हैं, ऐसे ही हमारे दार्शनिक मित्र के पास भारत-पाकिस्तान-नेपाल ही नहीं इथिओपिया से लेकर ईस्ट तिमोर तक की सभी समस्याओं के शर्तिया हल होते थे. ईश्वर के होने - न होने का सवाल ही नहीं उसका पता-ठिकाना तक वो बता देते थे. दुर्भाग्य से इमेल और मोबाइल के बारे में तब तक उन्हें पता नहीं चला था, वरना शायद वे वह सब भी बता देते.
असल में कवि मित्र इस बात पर अड़ा था कि जब हर रुप में ईश्वर एक ही है तो इतने सारे भगवान बनाने और उन्हें अलग-अलग पूजने की जरूरत क्या थी? यह तो हमारे हिंदू धर्म की एकरूपता पर, हमारी आस्था की एकनिष्ठता पर सवाल है. दार्शनिक मित्र ने पहले तो जवाब दिया कि भई किसी ने कहा है कि सबको पूजो. तुम जिसको चाहो पूजो. जिसे तुम मानो वही तुम्हारा भगवान. लेकिन ये तो ऐसे हुआ कि जिसे तुम मानो वही पार्टी अध्यक्ष. अगर ऎसी सुविधा दे दी जाए तो एक-एक दल के कितने अध्यक्ष हो जाएँ ज़रा सोचिए तो! कम से कम भारत की कोई पार्टी तो ऐसा सिर फोडू लोकतंत्र मानने से रही. व्यक्ति क्या पार्टियों के मामले में तो बहुमत का मत भी इस मामले में नहीं चल सकता. अध्यक्ष वह जिसे सुप्रीमो यानी पुराने चलन की भाषा में मालिक या मालकिन चाहे.
कवि मित्र ने इसे मानने से इंकार कर दिया. उल्टा? जाने कहॉ से एक और तर्क ले आया. बोला - भई हमारे यहाँ तो यह भी कहा गया है कि गृहस्थ को एक देवता पर आश्रित नहीं रहना चाहिए. उसे कई-कई देवताओं की पूजा करनी चाहिए. सबसे पहले गणेश जी की (माई फ्रेंड गनेशा तब नहीं आई थी), फिर गौरी माता की और फिर और अन्य देवताओं की. दार्शनिक मित्र ने पहले तो इसे धर्म में लोकतंत्र का असर बताने की कोशिश की, लेकिन जब फेल हो गया तो धर्मशास्त्र के वैश्वीकरण में जुट गया . लगा उदाहरण देने चीन से रोम, अफ्रीका, यूनान और जाने कहॉ-कहॉ के, कि सभी बडे और पुराने धर्मों में कई-कई देवता पूजे जाते हैं. पर मेरा कवि मित्र इससे सन्तुष्ट नहीं था. मैं भी नहीं हो पाया था. क्योंकि हमने यह तो पूछा नहीं था कि कहाँ-कहाँ बहुत सारे देवता पूजे जाते हैं. हमने तो यह पूछा था कि जहाँ भी ऐसा होता है, क्यों होता है?
लंबे समय तक मगजपच्ची के बावजूद हमें उस वक़्त इस सवाल का जवाब नहीं मिला था. हालांकि हमारा दार्शनिक मित्र प्राइवेट बैंको की बिजनेस डेस्क पर सुशोभित सुमधुरभाषिणी कन्याओं की तरह हमारे हर सवाल का संतोषजनक जवाब देने की जीं तोड़ कोशिश में लगा था. पर इस फेर में वह उन्ही की तरह अंड-बंड जवाब दिए जा रहा था और हम थे कि हर जवाब नकारे जा रहे थे. हालांकि ऐसा भी नहीं था कि इनकार हम इरादतन करते रहे हों, पर भाई जवाब ही सही नहीं होगा तो क्या करेगा? आख़िर हमें कोई सवाल पूछने के लिए पैसा तो मिला नहीं था कि जितना पैसा उतना सवाल और न हम इनवर्सिटी के इग्जामिनर ही थे, जिसका मजबूरी हो कैसे भी जवाब को स्वीकार करना. खैर, उस सवाल का जवाब मुझे मिल गया. मुझे हैरत हुई अचानक उस सवाल का जवाब पाकर. बहुत अच्छा भी इसलिए लगा कि वह जवाब मुझे कोई देने नहीं आया. मैंने खुद ही पा लिया. पा क्या लिया, समझिए मेरे हाथ बटेर लग गई. हुआ यूँ कि मैं अखबार पलट रहा था और अचानक मेरी नजर पड़ गई झारखंड सरकार के एक विज्ञापन पर. अब विज्ञापनों को लोग चाहे जो कह लें, पर भाई मैं तो उनका मुरीद हूँ. जरा सोचिए अगर विज्ञापन न होते तो हमें कैसे ये पता चलता कि कौन सा टीवी हमारे घर में होने से पड़ोसी जलेगा, या कौन सा टूथपेस्ट मरने के बाद भी हमारे दांतों को सही-सलामत रखेगा, या कौन सी क्रीम मुझ कव्वे को भी हंस बना देगी .....आदि-आदि. तो मैं विज्ञापन पढ़ता भी हूँ और विज्ञापन देखते ही मेरे ज्ञानचक्षु ऐसे खुले जैसे रत्ना की फटकार से तुलसीदास के खुल गए थे. ये अलग बात है कि अपनी रत्ना की रोज-रोज की फटकार भी मेरी आँखें नहीं खोल पाई. झारखण्ड सरकार के उस विज्ञापन ने ढ़ेर सारे भगवान लोगों की उपयोगिता के प्रति मुझे वैसे ही चौकन्ना कर दिया जैसे देशव्यापी जाम ने कांग्रेस सुप्रीमो को राम के अस्तित्व के प्रति कर दिया था. पूरे पन्ने के उस विज्ञापन में नीचे बड़ा सा कट आउट लगा था मधु कौडा यानी वहाँ के मुख्य मंत्री का और ऊपर शो केस में सजे कई अदद बडे नेताओं के चित्र थे. एक बार तो मुझे संदेह हुआ. जीं में डर सा गया कि कहीं कुछ हो तो नहीं गया. आख़िर क्यों बेचारे शो केस में चले गए? लेकिन जल्दी ही मामला संभल भी गया. मैंने उन्ही में से एक चहरे को टीवी पर बहस करते देख लिया. तय हो गया कि यह हैं और यह हैं तो बाकी भी होंगे ही. आख़िर जाएंगे कहॉ?
शो केस में सजने वालों में सोनिया गांधी थीं तो मनमोहन सिंह भी थे. गुरुजी थे तो लालू जी भी थे. अब कोई पूछे कि भाई जब पार्टी अध्यक्ष हैये हैं तो प्रधानमंत्री की क्या जरूरत? भाई यह तो आप भी जानते हैं कि मधु कौडा कांग्रेस के नहीं, झामुमो के नेता हैं. अब सवाल यह है कि तब झारखण्ड सरकार की उपलब्धियाँ बताने वाले इश्तहार में कांग्रेस और राजद सुप्रीमो का फोटो लगाने की क्या जरूरत? अब मैंने बिना किसी शिविर-सत्र-गुफा-उफा में गए चिन्तन करना शुरू किया तो मालूम हुआ कि उसकी भी वजह है. एक ज़माना हुआ करता था जब प्रधानमंत्री इस देश में सबसे शक्तिशाली समझा जाता था. वैसे ही जैसे वेदों के जमाने में इन्द्र सबसे बडे देवता थे. तब वही पार्टी अध्यक्ष भी हुआ करता था. पर प्रधानमंत्री का पद कुनबे के बाहर गया तो पार्टी अध्यक्ष वह कैसे रह सकता था? लिहाजा सत्ता के विकेंद्रीकरण के लिए ये वाली व्यवस्था बनाई गई.
पर अब? अब इन्द्र पानी बरसाने के अलावा किसी और काम के लिए याद नहीं किए जाते. इसी तरह प्रधानमंत्री अब फीता काटने और दस्त से ख़त करने के अलावा किसी और काम के लिए याद नहीं किए जाते. फैसले तो लोग भूल ही गए कि प्रधानमंत्री करता है. यह सारे काम अब पार्टी सुप्रीमो के जिम्मे हैं. पर फिर भी संविधान में दीं गई व्यवस्था के मुताबिक हमारा मुखिया तो प्रधानमंत्री ही है. चाहे वह भला हो - बुरा हो, जैसा भी हो. सो प्रधानमंत्री को बुरा नहीं लगना चाहिए, वरना राज्य के विकास के लिए धन कहॉ से आएगा? इसलिए प्रधानमंत्री की फोटो तो लगानी पडेगी. कम से कम अभी तो ये कर्टेसी निभानी पडेगी. लेकिन भाई ये बात तो अब पूरा हिंदुस्तान जानता है कि बेचारा प्रधानमंत्री अब फैसले लेने की झंझट से मुक्त कर दिया गया है. अब वह सिर्फ दस्तखत करने के लिए है. मैडम के हुक्म की तामील के लिए. वैसे ही जैसे पहले इस देश में राष्ट्रपति नाम का एक जीव होता था. और हाँ, इस पद के लिए अब ऐसे जीव ढूंढें जाने लगे हैं जो दस्तखत तक की झंझट से मुक्त रह सकें.
तो साहब यह सारी जिम्मेदारियां आ गई हैं अकेली मैडम पर. तो अब मैडम की फोटो लगाए बग़ैर काम कैसे चल सकता है? बेचारे कौडा यह भी जानते हैं कि बतौर सीएम उनकी हैसियत भी कुछ अलग तो है नहीं. सारे फैसले गुरुजी के हाथ हैं. भला गुरू के इतर चेला कैसे चल सकता है. यह तो हमारे देश की परम्परा के भी खिलाफ है. सुना ही होगा आपने कबीर तक कह गए है - बलिहारी गुरू आपने .......... तो गुरुजी की फोटो तो उन्होने लगाई ही है और यह भी जानते हैं कि गुरुजी की जिन्दगी जेल से बाहर उतने ही दिन है जितने दिन मैडम से उनकी पटरी है. और पटरी उतने ही दिन है जितने दिन रेल की पटरी पर लालू भैया का हक है. लिहाजा दूसरे दल के और एक जमाने में प्रतिस्पर्धी होने के बावजूद लालू जी की फोटो भी लगाई गई.
अब कल्पना करिए कि जब साठ साल के लोकतांत्रिक इतिहास में हम सातवीं बार गठबंधन की सरकार चला रहे हैं तो हजारों साल के इतिहास में हिंदू धर्म को यह झंझट कितनी बार झेलनी पडी होगी? अब हमारे देश के विद्वान भले यह मानने से इनकार कर दें, लेकिन इसकी प्राचीनता से तो इनकार अंगरेज विद्वान भी नहीं कर सके थे. तो साहब जाहिर है, इस धर्म में इतने सारे देवी-देवताओं का होना किसी दर्शन की नहीं गठबंधन की जरूरत रही होगी. पका है कि कभी न कभी हिंदू धर्म को गठबंधन की सरकार बनानी पडी होगी. और वैसे भी देखिए समुदायों-सम्प्रदायों की तमाम शाखाओं-प्रशाखाओं को समेटे हुए यह एक संघ ही तो है. राष्ट्रीय और स्वंयसेवक हुए बग़ैर. कई बार तो मुझे इसकी स्थिति संयुक्त मोर्चा सरकार जैसी लगती है - जिसमें वाम मोर्चा और भाजपा दोनों शामिल हैं. ग़ैर कांग्रेसवाद के नाम पर. ये अलग बात है कि आज वाम मोर्चा कांग्रेस की बैसाखी बाना है तो राजा साहब रानी साहब के कंधे से कन्धा मिला रहे हैं. पता नहीं कौन सी साम्प्रदायिक शक्तियों को रोकने के नाम पर.
जाहिर है कि यह धर्म के पूजा-पाठ नहीं गठबंधन सिद्धांत का मामला है. सच्चाई तो ये है कि हमको भी ये आत्मज्ञान ही हुआ है, लेकिन हम कोई रिशी मुनी तो हैं नहीं और आलोक पुराणिक की तरह पोर्फेसरे हैं. तो हम ई घोषणा कैसे कर सकते हैं. वैसे अगर आप हमको आत्मज्ञानी मान लें तो हमको कौनो एतराज भी नहीं होगा.

दमन का दौर और ईरान में मानवाधिकार

सत्येन्द्र प्रताप
नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित शीरीन ऐबादी ने आजदेह मोआवेनी के साथ मिलकर "आज का इरान - क्रान्ति और आशा की दास्तान" नामक पुस्तक मे इरान के चार शासन कालों का वर्णन किया है . शीरीन ने ईरान में शासन के विभिन्न दौर देखे हैं।वास्तव में यह पुस्तव उनकी आत्मकथा है, जिसने महिला स्वतंत्रता के साथ ईरान के शासकों द्वारा थोपे गए इस्लामी कानून के दंश को झेला है. विद्रोह का दौर और जनता की आशा के विपरीत चल रही सरकार औऱ ईराकी हमले के साथ-साथ पश्चिमी देशों के हस्तक्षेप का खेल, ईरान में चलता रहा है. कभी जिंदा रहने की घुटन तो कभी इस्लामी कानूनों के माध्यम से ही मानवाधिकारों के लिए संघर्ष का एक लंबा दौर देखा और विश्व के विभिन्न देशों के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का सम्मान पाते हुए एबादी को विश्व का सबसे सम्मानपूर्ण ...नोबेल शान्ति पुरस्कार... मिला.
किताब की शुरुआत उन्नीस अगस्त १९५३ से हुई है जब लोकप्रिय मुसादेघ की जनवादी सरकार का तख्ता पलट कर शाह के समर्थकों ने राष्ट्रीय रेडियो नेटवर्क पर कब्जा जमा लिया. एबादी का कहना है कि इसके पीछे अमेरिका की तेल राजनीति का हाथ था. एबादी ने धनी माता पिता और उनके खुले विचारों का लाभ उठाया और मात्र तेइस साल की उम्र में कानून की डिग्री पूरी करके जज बनने में सफल रहीं. उस दौर में शाह की सरकार का विरोध चल रहा था और खुफिया पुलिस ...सावाक... का जनता के आम जीवन में जबर्दस्त हस्तक्षेप था. हर आदमी खुफिया पुलिस की नज़र में महसूस करता था.
सन उन्नीस सौ सत्तर के बाद शाह के शासन का विरोध बढ़ता जा रहा था और लोग खुलकर सत्ता के विरोध में आने लगे थे. १९७८ की गर्मियों में शाह का विरोध इतना बढ़ा कि रमजान के अंत तक दस लाख लोग सड़कों पर उतर आए. विरोधियों का नेतृत्व करने वाले अयातुल्ला खोमैनी ने बयान दिया कि लोग सरकारी मंत्रालय में जाकर मंत्रियों को खदेड़ दें. एबादी कहती हैं कि एक जज होने के बावजूद जब वे विरोधियों के पक्ष में आईं तो कानून मंत्री ने गुस्से से कहा कि तुम्हे मालूम है कि आज तुम जिनका साथ दे रही हो वे कल अगर सत्ता में आते हैं तो तुम्हारी नौकरी छीन लेंगे? शीरीन ने कहा था कि ... मैं एक मुक्त ईरानी जिन्दगी जीना चाहूंगी, गुलाम बनाए वकील की नहीं... हालात खराब होते देखकर १६ जनवरी १९७९ की सुबह शाह देश के बाहर चले गए औऱ साथ में एक छोटे से बक्से में ईरान की मिट्टी भी ले गए. खुशियां मनाते ईरानियों के बीच शाह के चले जाने के सोलह दिन बाद १ फरवरी १९७९ को अयातुल्ला खोमैनी ने एयर फ्रांस से चलकर ईरान की धरती पर पांव रखा. क्रांति का पहला कड़वा स्वाद ईरान की महिलाओं ने उस समय चखा जब नए सत्ताधारियों ने स्कार्फ से सिर ढ़कने का आह्वान किया. यह चेतावनी थी कि क्रांति अपनी बहनों को खा सकती है (क्रांति के दौर में औरतें एक दूसरे को बहन कहकर पुकारती थीं). शीरीन को भी कुछ ही दिनों में क्रांति का दंश झेलना पड़ा, क्योंकि सत्तासीन सरकार ईरान में महिला जजों को बर्दाश्त नहीं कर सकती थी. उन्हें न्याय की कुर्सी से हटाकर मंत्रालय में क्लर्क की भांति बैठा दिया गया. खोमैनी के शासन में ही ईराक ने साम्राज्यवादी विस्तार का उद्देश्य लेकर इरान पर हमला किया और ईरान ने बचाव करने के लिए जंग छेड़ी. लंबे चले इस युद्ध में धर्म के नाम पर छोटे-छोटे बच्चों को भी युद्ध में झोंका गया. विदेशी हमला तो एक तरफ था, अपनी ही सरकार ने मुजाहिदीन ए खलग आरगेनाइजेशन (एम के ओ) के नाम से खोमैनी सरकार का विरोध कर रहे लोगों को कुचलने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी. सरकार द्वारा एम के ओ के सदस्यों के संदेह में हजारों लोगों को मौत के घाट उतार दिया, हर तरह से कानून की धज्जियां उड़ाई जाती रहीं. शीरीन कहती हैं कि उस दौर में भी उन्होंने इस्लामी कानून के हवाले से ही ईरान की खोमैनी सरकार का विरोध किया. बिना मुकदमा चलाए शीरीन के नाबालिग भतीजे को एमकेओ का सदस्य बताकर फांसी पर चढ़ा दिया गया. जजों की कुर्सियों पर अनपढ़ धर्माधिकारियों का कब्जा हो चुका था.
इस बीच शीरीन, अपने खिलाफ चल रहे षड़यंत्रों और फंसाने की कोशिशों का भी जिक्र करती हैं जो पुस्तक को जीवंत औऱ पठनीय बनाता है. मानवाधिकारों की रक्षा करने की कोशिशों के दौरान उनके पास इस्लामी गणतंत्र के एजेंट भेजे जाते रहे. घुटन के माहौल और दमन के दौर के बीच तेईस मई १९९७ को इस्लामी गणतंत्र को दूसरा मौका देने के लिए इरानी जनता ने मतदान किया. राष्ट्रपति के चुनाव में मोहम्मद खातमी को चुनाव लड़ने के लिए किसी तरह मुल्लाओं ने स्वीकृति दे दी. ईरान की जनता ने शान्ति से इसे उत्सव के रुप में लिया औऱ अस्सी फीसदी लोगों ने खातमी के पक्ष में मतदान कर सुधारों की जरुऱत पर मुहर लगा दी. हालांकि खातमी सुधारवादी हैं लेकिन इसके बावजूद आम लोगों की आशाओं के मुताबिक सुधार कर पाने में सक्षम नहीं हैं. शीरीन का कहना है कि पहले की तुलना में आम लोगों का दमन कुछ कम जरुर हुआ है लेकिन तानाशाह परम्परावादी विभिन्न षड़यंत्रों के माध्यम सुधार की रफ्तार को पीछे ढ़केलने से नहीं चूकते. इस पुस्तक में बड़ी साफगोई से शीरीन ने न केवल निजी जीवन, बल्कि सत्ता के परिवर्तनों को नज़दीक से देखते हुए साफगोई से देश के हालात पेश करने की कोशिश की है. मीडिया के स्थानीयकरण के इस दौर में निकट पड़ोसी ईरान के बदलते दौर को देखने में ये किताब पाठकों के लिए सहायक साबित होगी. साथ ही आतंकवाद औऱ स्वतंत्रता पर इस्लामी रवैये और मुस्लिम कानूनों में मानवाधिकारों की रक्षा के अध्याय की पूरी जानकारी देती है.
पुस्तक परिचय
किताब- आज का ईरान, लेखिकाः शीरीन एबादी

Monday, 17 September 2007

राम न थे, न हैं और न होंगे कभी


इष्ट देव सांकृत्यायन
बेचारी केंद्र सरकार ने गलती से एक सही हलफनामा क्या दे दिया मुसीबत हो गई. इस देश में सबसे ज्यादा संकट सच बोलने पर ही है. आप सच के साथ प्रयोग के नाम पर सच की बारहां कचूमर निकालते रहिए, किसी को कोई दर्द नहीं होगा. और तो और, लोग आपकी पूजा ही करने लगेंगे। झूठ पर झूठ बोलते जाइए, किसी को कोई आपत्ति नहीं होगी. पिछली सरकार के बजट घाटे को आप फिस्कल घाटे की तरह पेश करिए, समिति बैठाकर उससे कहवाइए कि ट्रेन में आग दंगाई भीड़ ने नहीं यात्रियों ने खुद लगाई..... या फिर कुछ भी जो मन आए बकिए; किसी को कोई एतराज नहीं होगा. एतराज अगर होगा तो तभी जब आप सच बोलेंगे.
जैसे केंद्र सरकार ने सच बोला. केंद्र सरकार ने अपने इतने लंबे कार्यकाल में पहली बार सच बोला और मुसीबत हो गई. भाजपा अलग अपनी जंग लग गई तलवारें निकालने लग गई. दादा कामरेड अलग गोलमोल बोलने लग गए. विहिप ने अलग गोले दागने शुरू कर दिए. ये अलग बात है कि सारे गोले बरसात का सीजन होने के नाते पिछले १५ सालों से सीलन ग्रस्त पडे हैं, वरना मैं सोच रहा हूँ कि फूट जाते तो क्या होता. अरे और तो और, साठ पैसे का नमक नौ रूपए किलो बिकने लगा, सवा रूपए का आलू तीस रूपए हो गया, प्याज सवा सौ रूपए किलो पहुच गई, नौकरियाँ खत्म हो गईं, जनता के घरों के मालिक बिल्डर और प्रोपर्टी डीलर हो गए ..... जाने क्या से क्या हो गया, पर हमारे देश की सहनशील जनता एक गाल पर चाटा खाकर दूसरा गाल घुमाती रही. पहले भारतीय राजाओं के ही इतिहासकार, फिर मुग़ल इतिहासकार और फिर अंगरेजों के इतिहासकार ..... सारे के सारे इतिहासकार उसके इतिहास को उपहास बनाते रहे. रही-सही कसर अपने को लबडहत्थी कहने वाले इतिहासकारों ने भी निकाल ली. इसने उफ़ तक न की. वह सत्य की ऎसी-तैसी होते देखती रही और अहिंसा की पुजारी बनी रही.
अब ज़रा सा सच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण वालों ने क्या बोल दिया कि मुसीबत हो गई. ज़रा सा सच संस्कृति विभाग वालों ने क्या बोल दिया आफत आ गई. इन्ही दोनों की सच्चाई को आधार बना कर अदालत के सामने लिखत-पढ़त में एक सच सरकार ने क्या बोल दिया कि जनता ने पूरा देश ही जाम कर दिया. अरे भाई अगर इतने झूठ तुम झेल सकते हो तो एक सच भी झेलने की हिम्मत रखो!
हे जनता जनार्दन, अगर तुम ऐसे ही नाराज होते रहे तो कैसे काम चलेगा? लेकिन अब जनता जनार्दन की भी क्या गलती कही जाए. भला बताइए सच कहीं अदालत में बोले जाने के लिए होता है. अदालत में सच बोलना तो बिल्कुल वैसी ही बात हुई जैसे क्लास में काम की चीज पढ़ाना. जैसे सरकारी दफ्तर में बाबू का काम करना या जैसे प्राइवेट बैंक या मोबाइल कम्पनी का अपने ग्राहकों से किए वादे निभाना. यह बात तो सरकार को समझनी ही होगी कि जैसे गीता सिर्फ सौत के बच्चे की तरह सिर पर हाथ रख कर क़सम खाने के लिए होती है उसी तरह हलफनामा भी सिर्फ झूठ बोले जाने के लिए होता है. हलफनामे में उसे झूठ ही बोलना चाहिए था.
वैसे सरकार अक्सर इस बात का ख़्याल रखती है. चाहे किसानों की जमीन कब्जियानी हो या युवाओं को रोजगार देने की बात हो, महंगाई रोकनी हो या कोई और चुनावी वादा निभाना हो; वह हमेशा सतर्क रहती है कि कहीं गलती से भी कोई बात सही न निकल जाए. पर इस बार रावण जाने ऐसा क्या हुआ (राम नहीं, क्योंकि राम तो थे ही नहीं तो वह जानेंगे कैसे?) कि बेचारी सरकार की मति मारी गई. जरूर यह किसी मंथरा (कैकेयी नहीं, क्योंकि कैकेयी तो राम की सौतेली माँ थीं और अगर माँ थीं तो बेटे के होने की बात भी माननी पडेगी) की चाल होगी.
केंद्र सरकार को अब परमाणु करार की ही तरह इस मुद्दे पर भी एक समिति बना कर बैठा देनी चाहिए। इससे और चाहे कुछ हो या न हो, पर इतना तो होगा ही कि कई बैठे-ठाले सांसदों को कुछ दिनों के लिए रोजगार मिल जाएगा. ये अलग बात है कि सरकार ने माफी मांग ली, पर जनता अभी उसे माफी देने के मूड में है नहीं. भला बताइए कहीं ऐसा होता है कि सरकार ग़लती करे और इतनी जल्दी मान भी जाए? परमाणु करार वाले मुद्दे पर सरकार आज तक डटी है. उदारीकरण के तमाम खतरों को भुगतते हुए भी सरकार आज तक डटी है. आरक्षण का मसला हो या तुष्टीकरण का, हमारी सरकारें पिछले साठ सालों से डटी हैं. आखिर इस मुद्दे में ऐसा क्या था कि सरकार ने इतनी जल्दी मान लिया और सरकार तो क्या! सरकार की मालकिन ने भी माफी मांग ली? मुझे तो अब इस मुद्दे से साजिश की बू आने लगी है.
अरे तुम्हारी समझ में अगर नहीं आ रहा था तो मुझसे पूछा होता. मैने बताया होता। इसमें कोई दो राय नहीं है कि राम नहीं हैं। असल तो बात यह है कि राम कभी थे भी नहीं और कभी होंगे भी नहीं। हे विहिप और भाजपा के बहकावे में आई हुई जनता जनार्दन! क्या आपको इसके लिए प्रमाण चाहिए कि राम नहीं हैं.
अरे साहब राम नहीं हैं इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि यह सरकार है. एक ऐसे देश में एक ऎसी सरकार जिसमें किसी वैधानिक पद की कोई गरिमा न रह गयी हो, हर बडे पद पर बैठा आदमी अपने को उस पद पर बहुत-बहुत बौना महसूस कर रहा हो, हर पद धारक को उसका पद वैसे ही बे साइज लग रहा हो जैसे दो साल के बच्चे को चाचा चौधरी के साबू का कपडा, देश के सारे बडे पदों पर बैठे लोग अपने को राज्यपाल की सी हैसियत में पा रहे हों और बेचारा राष्ट्रपति खुद हंटर वाली के प्रसादपर्यंत अपने पद पर बने रहने को मजबूर हो ...... तो हे जनता जनार्दन! क्या आपको लगता है कि हमारे देश में एक ऎसी ही सरकार है? अगर हाँ, तब तो तय है कि राम नहीं हैं. इस सरकार का होना यह साबित करता है कि राम नहीं हैं. राम कभी थे भी नहीं और कभी होंगे भी नहीं.
राम नहीं थे, इस बात का प्रमाण वैसे तो भाजपा ने भी दे दिया था. अरे राम अगर रहे होते तो रामसेतु परियोजना को मंजूरी भाजपा कैसे देती? क्या आप भूल गए कि इस परियोजना को मंजूरी वाजपेई जी की सरकार ने ही दिया था? ये अलग बात है कि अब उस पर राजनीती की रोटी भी वही सेंक रहे हैं. और वैसे राम के न होने के सबसे ज्यादा भौतिक प्रमाण तो भाजपा और विहिप ही देती है. भला बताइए राम के नाम उन्होने दंगे कराए और राज्य से लेकर केंद्र तक अपनी सरकारें बना लीं. आप ही से ये वादे कर के कि राम का मंदिर बनाएंगे. कहीं बनाया भी क्या? आपने भले पूछा हो, पर राम ने यह बात आज तक किसी से कभी नहीं पूछी. हे जनता जनार्दन! अगर आपको बदनाम करके कोई बार-बार फायदा उठाता रहे और आपको धेला भी न दे तो बताइए आप क्या करिएगा? ................. खैर आप जो भी करना चाहें मैंने यह रिक्त स्थान उसी लिए छोड दिया है. अपनी इच्छानुसार भर लें. पर बताइए कि क्या राम ने कुछ किया? कुछ नहीं न! फिर बताइए आप कैसे मान सकते हैं कि राम थे। और वो फिर राम के नाम पर अपनी राजनीतिक दाल गलाने में जुट गए.
हे जनता जनार्दन! प्लीज़ मान जाइए अब आप मेरी बात। राम न थे, न हैं और न होंगे कभी. अरे वो तो रावण थे जिनके नाते हम राम को जानते हैं और बताइए रावण न होते तो इस पुल की चर्चा भी होती क्या? अब तो मुझे लगने लगा है कि रावण ने ही किसी राजनीतिक फ़ायदे के लिए राम की कल्पना की होगी और वाल्मीकि महराज को कुछ खिला-पिला कर ये राम कहानी लिखवाई होगी.
बहरहाल इस पर चर्चा आगे करेंगे. फिर कभी. फ़िलहाल तो आप बस ये मानें कि राम न थे, न हैं और न होंगे. हाँ रावण थे, हैं और बने रहेंगे. तो आइए और बोलिए आप भी मेरे साथ - जय रावण.

Saturday, 15 September 2007

पाकिस्तान में खुफिया एजेंसी आई एस आई की समानान्तर सरकार चलती है- नवाज

सत्येन्द्र प्रताप
पाकिस्तान के अखबार दैनिक जंग के राजनीतिक संपादक सुहैल वड़ाएच ने.. गद्दार कौन - नवाज शरीफ की कहानी उनकी जुबानी.. पुस्तक में पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनके करीबियों के साक्षात्कारों को संकलित किया है. इस पुस्तक में नवाज शरीफ ,उनके छोटे भाई और पंजाब के मुख्यमंत्री रहे शहबाज शरीफ, नवाज की बेगम कुलसुम नवाज ,पुत्र हुसैन नवाज छोटे बेटे हसन नवाज, नवाज के करीबी सेनाधिकारी- सेना सचिव ब्रिगेडियर जावेद मलिक और दामाद कैप्टन सफदर के साछात्कार शामिल हैं.
पुस्तक में बड़ी बेबाकी से पाकिस्तान की आंतरिक स्थिति और विदेशी संबंधों में झांकने की कोशिश की गई है. साथ ही भारत से अलग होने और पाकिस्तान के निर्माण से लेकर आज तक, सत्ता और विदेशनीति में आई एस आई की भूमिका के बारे में पूर्व प्रधानमंत्री की राय जानने की कोशिश है. नवाज पर संपत्ति अर्जित करने और सत्ता के दुरुपयोग पर भी उनकी राय जानने की स्पस्ट कोशिश की गई है । ये साछात्कार उस समय लिए गए हैं जब नवाज, जद्दा और लंदन में निर्वासित जीवन बिता रहे थे.
पुस्तक के पहले अध्याय में नवाज शरीफ द्वारा पाकिस्तान में परमाणु परीक्षण किए जाने के फैसले पर सवाल किए गए हैं. उस समय सेना के चीफ आफ आर्मी स्टाफ जनरल जहांगीर करामत थे. नवाज ने परमाणु विस्फोट करने से पहले उनसे राय मांगी थी. नवाज का कहना है कि जनरल जहांगीर इस मामले में काफी उहापोह की हालत में थे और प्रतिबंधों को लेकर खासे चिंतित थे. वावजूद इसके, नवाज ने धमाके करने का निर्णय लिया.
भारत- पाक संबंधों पर नवाज का कहना है कि उन्होंने भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से बैकडोर चैनल बनाकर बातचीत शुरु की थी और वातचीत के सकारात्मक परिणाम थे लेकिन इसमें भी सेना और आई एस आई ने खासी अडंगेबाजी की ।उनका मानना है कि युद्ध से भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहा कश्मीर विवाद कभी नहीं सुलझ सकता है.
परमाणु विस्फोटों के बाद जनरल जहांगीर करामत को हटाकर परवेज मुशर्रफ को चीफ आफ आर्मी स्टाफ बनाने का फैसला भी नवाज का ही था. सत्ता से हटाए जाने के बाद नवाज स्वीकार करते हैं कि परवेज मुशर्रफ को सेना प्रमुख बनाया जाना जल्दबाजी में किया गया फैसला था, जिसमें तीन सेनाधिकारियों की वरिष्ठता का ध्यान न रखते हुए उन्होने मुशर्रफ को सेना प्रमुख बना दिया था.
नवाज शरीफ का कहना है कि मुशर्रफ को सेना प्रमुख पद से हटाए जाने के समय स्थितियां बेहद प्रतिकूल थीं। सेना ने उन्हें जानकारी दिए बिना कश्मीर में सेनाएं भेज दीं और करगिल की चोटियों पर सेना ने कब्जा जमा लिया. नवाज का कहना है कि कारिगल में सेना के भारतीय सेना से लड़ाई के बारे में सूचना उन्हें भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी से मिली थी।इसके पहले हमें यही बताया जाता रहा कि वहां मुजाहिदीन लड़ रहे हैं. जब भारतीय सेनाओ ने बमबारी शुरु की तो मुशर्रफ भागे-भागे आए और कहा कि हमें बचा लीजिए। इसके बाद ही उन्हें प्रोत्साहन देने के लिए मोर्चे पर जाना पड़ा और युद्ध को रोकने के लिए अमेरिका के राष्टपति के पास जाना पड़ा। पाकिस्तानी सेना लगातार चौकियां खो रही थी और उनके पास कोई संसाधन नहीं थे. इस हालात में भी भारत को युद्ध रोकना पड़ा. हमने उस समय अटल बिहारी वाजपेयी को नीचा दिखाया ( इसी साक्षात्कार के बाद भारत में विपक्षी दलों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री का कड़ा विरोध किया था).
नवाज शरीफ ने अपने एक साछात्कार में बड़ी बेबाकी से कहा है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आई एस आई बेलगाम हो गई है और राजनीतिक नेतृत्व से किसी तरह का राय नहीं लेती. पाकिस्तान में गलत काम तो खुफिया एजेंसियां करती हैं और उसका जबाब सरकार को देना पड़ता है. जिस भी देश में पाकिस्तान का नेता जाता है, उससे यही कहा जाता है कि आई एस आई विभिन्न हरकतें कर रही है. आई एस आई की मीटिंग में तो एक वरिष्ठ अधिकारी ने ये भी राय दे डाली कि देश की आर्थिक हालात को सुधारने के लिए सरकार की सरपरस्ती में ड्रग्स विदेशों में भेजी जाएं. सैनिक सत्ताओं के बार-बार सत्ता हथियाने के चलते ऐसा हुआ है. इस प्रवृत्ति को खत्म करने की जरुरत है.
नवाज के छोटे भाईशहबाज शरीफ ने बातचीत के दौरान पाकिस्तान से बाहर जाने,सउदी अरब से डील और पंजाब प्रांत का मुख्यमंत्री बनाए जाने सहित विभिन्न मुद्दों पर बातचीत हुई. इसमें पंजाब प्रांत के नेता और नवाज के पारिवारिक मित्र चौधरी सुजात हुसेन से मतभेदों का मुद्दा शामिल रहा. साथ ही मुस्लिम कानूनों और उसपर मौलवियों से मतभेदों के बारे में भी बेबाकी से बातचीत हुई है.
इस किताब में बेगम कुलसुम नवाज से लिए गए वे इंटरव्यू शामिल हैं जो २००० में लाहौर,२००१ में जद्दा और २००६ में लंदन प्रवास के दौरान किए गए. कुलसुम ने उस समय मोर्चा संभाला था जब नवाज शरीफ को जेल में बंद कर दिया गया। कुलसुम का राजनीति में कभी हस्तछेप नहीं रहा और आज भी वे इस पर कायम हैं कि वे राजनीति में नहीं आएंगी. हालांकि सेना के दमन के दौर में उन्होंने अपनी पार्टी की कमान संभाली और जनता को बखूबी समझाया कि सेना ने टेकओवर कर के गलत किया है.
नवाज शरीफ के पुत्र हुसेन नवाज ने अपने साक्षात्कार के दौरान कहा है कि वे सेना द्वारा टेकओवर किए जाने के समय अपने पिता के साथ मौजूद थे. उन्होने मुशर्रफ को हटाए जाने वाले पत्र के मसौदे में भी अपनी राय दी थी. छोटे भाई हसन नवाज उन दिनों लंदन में पढ़ाई कर रहा था. जब उसे टेकओवर की सूचना मिली कि टेकओवर हो गया है और नवाज को बंदी बना लिया गया है जो सउदी अरब सहित नवाज के सभी मित्र देशों में तत्काल संपकर्क किया और पूरे मामले को मीजिया के सामने ले आए.
ब्रिगेडियर जावेद मलिक, नवाज सरकार में सेना सचिव के पद पर काम कर रहे थे। वे भी नवाज सरकार की जर नीतियों का बचाव करते नजर आते हैं।। कारिगल के बारे में उन्होने कहा कि जबनवाज शरीफ नेवाजपेयी के साथ लाहौर घोषणापत्र पर हस्ताछर किया तो पाकिस्तान की सेना ने दराज और कारिगल पर कब्जा जमा लिया था या कब्जे की तैयारी में थे. उनके मुताबिक सेना का ये फैसला मूर्खतापूर्ण था।पाकिस्तान की सेना का मानना है कि अगर वे दराज कारगिल का रास्ता रोक देंगे तो भारत को दबाव में लेना आसान हो जाएगा लेकिन ये तर्क मूर्खतापूर्ण था. साथ ही उन्होंने कहा कि सेना, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की जासूसी भी करती रहती है. नवाज के सुर में सुर मिलाते हुए उन्होंने कहाकि कारगिल में जांच के डर से सेना प्रमुख ने टेकओवर कर लिया. इस किताब में दामाद कैप्टन सफदर का भी साक्षात्कार दर्ज है जिसमें उन्होंने नवाज को बेद नरमदिल और देश की चिंता करने वाला प्रधानमंत्री बताया है.
कुल मिलाकर इस किताब में साछात्कारों के माध्यम से नवाज ने सेना सरकार के आरोपों से खुद का जोरदार बचाव तो किया ही है। सेना के स्टेबलिशमेंट सेल की तानाशाही, बेलगाम आई एस आई, और विदेश नीति पर खुलकर चर्चा की है. पाकिस्तान की राजनीति का एक पहलू जानने के लिए ये किताब बेहद उपयोगी है जिसमें नवाज शरीफ की ओर से शासन में सेना के हस्तछेप और उससे होने वाली हानियों कीबेबाक चर्चा की गई है. पुस्तक से सुहैल वडाएच की पत्रकारीय छमता भी उभरकर सामने आई है और उन्होंने सैकड़ों सवालों के माध्यम से हर पहलू को छूने की कोशिश की है.


(किताब : पुस्तक समीक्षा गद्दार कौन - नवाज शरीफ की कहानी उनकी जुबानी)

Thursday, 13 September 2007

ग़ज़ल

विनय ओझा स्नेहिल
हर एक शख्स बेज़ुबान यहाँ मिलता है.
सभी के क़त्ल का बयान कहाँ मिलता है..

यह और बात है उड़ सकते हैं सभी पंछी -
फिर भी हर एक को आसमान कहाँ मिलता है..

सात दिन हो गए पर नींद ही नहीं आयी -
दिल को दंगों में इत्मीनान कहाँ मिलता है..

न जाने कितनी रोज़ चील कौवे खाते हैं -
हर एक लाश को शमशान कहाँ मिलता है..

मौत का एक दिन ....


हरिशंकर राढ़ी
मौत और मनुष्य का पारस्परिक संबंध विश्वविख्यात है. मृत्यु जैसा समर्पण मानवमात्र के प्रति और किसी का हो ही नहीं सकता. मनुष्य कितना भी भागे, कितना भी दुत्कारे पर मृत्यु का प्रेम उसके प्रति लेशमात्र भी कम नहीं. विश्व साहित्य मे प्रेम के ऐसे उदहारण इक्के-दुक्के ही मिलते हैं. जिस प्रकार चकोर का एकंनिष्ठ प्रेम चंद्रमा के प्रति होता है, रावण का राम के प्रति था, सूर्पनखा का लक्ष्मन के प्रति था, उसी प्रकार मृत्यु का एकांग प्रेम प्राणिमात्र के प्रति होता है.
जीवन भर आप सुविधानुसार चाहे कितने ही लोंगो से प्रेम कर लें, पर कुमारी मृत्यु देवी का बाहुपाश मिलने के बाद आप किसी और से प्रेम नहीं कर सकते हैं. उन्हें सौतन कतई स्वीकार नहीं है. अपना देस तो महान है. सो आप जानते ही हैं, यहाँ की उदारता का कोई जवाब नहीं है. मौत से कन्नी काटने के जब सभी जुगाड़ ठप हो जाते हैं तो बुजुर्ग इसे प्रेमिका मान लेते हैं.
उन्हें मालूम है कि अब टांगो मे भागने का दम नहीं है. इस उम्र में कोई प्रेमिका अव्वल तो मिलेगी नहीं, खुदा-न- खास्ता मिल भी गयी तो वह किसी कोण से मृत्यु से कम खतरनाक नहीं होगी. कब गच्चा दे जाये, कोई भरोसा नहीं. इससे अच्छी तो मौत ही है. कम से कम गच्चा तो नहीं देगी.
कुछ दार्शनिक भाई मौत को रहस्य मानते हैं. इस विचारधारा को कोई चुनौती नहीं दे सकता है. कोई प्रतिवाद नहीं करता है. जब आज तक दार्शनिक भाई ही समझ में नहीं आये तो उनकी परिभाषा कैसे समझ आ सकती है? शर्माजी भाषा विज्ञानी हैं. पूछा - मौत क्या है? बोले - भाव वाचक संज्ञा. सन्तुष्ट नहीं हुआ. मन पुनः प्रश्न कर बैठा-जिसके नाम से बडे बडे संज्ञा शून्य हो जाते हैं, वह संज्ञा कैसे हो सकती है? शर्माजी डर गए. कुछ तो डर से मर जाते हैं. सभी नही डरते. नचिकेता ऐसे ही थे.
पिताजी ने कहा कि यमराज के पास जाओ तो चल दिए. उनकी तरफ एकतरफा यातायात है. आप जा तो सकते हैं पर आ नहीं सकते. पर नचिकेता गए. यमराज महोदय कहीं बाहर दौरे पर थे. बड़ी प्रतीक्षा की. बोले-यमराज भी कोई भारत सरकार के मंत्री हैं कि नही मिलेंगे? पहली बार तो एक सदस्यीय शिष्ट मंडल मिलने आया है. नहीं मिलेंगे. हूँ. यमराज भी डर गए. मौत भी डर गयी. हाँथ-पाँव जोड़कर जैसे-तैसे वापस किया. हिंदुस्तान का आदमी है. कहीं सुख सुविधा देखकर ठहर गया तो खैर नहीं. तबसे मौत की प्रतिष्ठा गिर गयी. बन्दर घुड़की देती है. रही सही कसर सावित्री ने पूरी कर दी.
मौत कभी सीधी नहीं आती है। बहाने ढूँढ कर आती है. इसलिये मैं ज्ञानियों के उस वर्ग का सम्मान करता हूँ जो मौत को प्रेमिका मानते हैं. मौत और प्रेमिका मे यहाँ विकट साम्य है. दोनो ही मिलने के बहाने ढूँढती हैं. कभी नोट्स के बहाने तो कभी नींबू मांगने के बहाने. मौत को भी कभी नजला-जुकाम का बहाना मिलता है, तो कभी महामारी का. मगर आयेगी बहाने से ही. अब देखिए किसे बहाना लगता है, किसे नहीं.

Saturday, 8 September 2007

ये कैसा प्यार?


और भी सुंदरता है इस दुनियां में कुत्ते के सिवा

Thursday, 6 September 2007

हीनभावना कर रही है हिंदी की दुर्दशा

सत्येन्द्र प्रताप
आजकल अखबारनवीसों की ये सोच बन गई है कि सभी लोग अंग्रेजी ही जानते हैं, हिंदी के हर शब्द कठिन होते हैं और वे आम लोगों की समझ से परे है. दिल्ली के हिंदी पत्रकारों में ये भावना सिर चढ़कर बोल रही है. हिंदी लिखने में वे हिंदी और अन्ग्रेज़ी की खिचड़ी तैयार करते हैं और हिंदी पाठकों को परोस देते हैं. नगर निगम को एम सी डी, झुग्गी झोपड़ी को जे जे घोटाले को स्कैम , और जाने क्या क्या.
यह सही है कि देश के ढाई िजलों में ही खड़ी बाली प्रचलित थी और वह भी दिल्ली के आसपास के इलाकों में. उससे आगे बढने पर कौरवी, ब्रज,अवधी, भोजपुरी, मैथिली सहित कोस कोस पर बानी और पानी बदलता रहता है.
लम्बी कोशिश के बाद भारतेंदु बाबू, मुंशी प्रेमचंद,आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, जयशंकर प्रसाद जैसे गैर हिंदी भाषियों ने हिंदी को नया आयाम दिया और उम्मीद थी कि पूरा देश उसे स्वीकार कर लेगा. जब भाषाविद् कहते थे कि हिंदी के पास शब्द नहीं है, कोई निबंध नहीं है , उन दिनों आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने क्लिष्ट निबंध लिखे, जयशंकर प्रसाद ने उद्देश्यपरक कविताएं लिखीं, निराला ने राम की शक्ति पूजा जैसी कविता लिखी, आज अखबार के संपादक शिवप्रसाद गुप्त के नेत्रित्व में काम करने वाली टीम ने नये शब्द ढूंढे, प्रेसीडेंट के लिए राष्ट्रपति शब्द का प्रयोग उनमे से एक है. अगर हिंदी के पत्रकार , उर्दू सहित अन्य देशी भाषाओं का प्रयोग कर हिंदी को आसान बनाने की कोशिश करते तो बात कुछ समझ में आने वाली थी, लेकिन अंग्रेजी का प्रयोग कर हिंदी को आसान बनाने का तरीका कहीं से गले नहीं उतरता. एक बात जरूर है कि स्वतंत्रता के बाद भी शासकों की भाषा रही अंग्रेजी को आम भारतीयों में जो सीखने की ललक है, उसे जरूर भुनाया जा रहा है. डेढ़ सौ साल की लंबी कोशिश के बाद हिंदी, एक संपन्न भाषा के रूप में िबकसित हो सकी है लेिकन अब इसी की कमाई खाने वाले हिंदी के पत्रकार इसे नष्ट करने की कोिशश में लगे हैं। आने वाले दिनों में अखबार का पंजीकरण करने वाली संस्था, किसी अखबार का हिंदी भाषा में पंजीकरण भी नहीं करेगी.
हिंदी भाषा के पत्रकारों के लिए राष्ट्रपति शब्द वेरी टिपिकल एन्ड हार्ड है, इसके प्लेस पर वन्स अगेन प्रेसीडेंट लिखना स्टार्ट कर दें, हिंदी के रीडर्स को सुविधा होगी.