Saturday, 25 August 2007

परमाणु करार का सच - 1


माकपा के पोलित ब्यूरो ने पार्टी नेतृत्व को यह फैसला लेने का हक दे दिया कि यूपीए सरकार को मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए. क्या होगा यह तो बाद की बात है, लेकिन यह बात गौर किए जाने की है कि पार्टी नेतृत्व ने पोलित ब्यूरो से तब ऐसा कोई हक मांगने की जरूरत नहीं समझी जब उसकी सहानुभूति का केंद्रीय वर्ग (लक्ष्य समूह इसलिए नहीं कह रहा हूँ क्योंकि यह पूंजीवादी कोष का शब्द है) यानी सर्वहारा अपने को सबसे ज्यादा तबाह, थका-हरा और सर्वहारा महसूस कर रहा था. महंगाई और बेकारी, ये दो ऎसी मुसीबतें हैं जो इस वर्ग को जमींदोज कर देने के लिए काफी हैं और यूपीए सरकार के कार्यकाल में ये दोनों चीजें बेहिसाब बढ़ी हैं. ऐसा नहीं है कि अब ये घट गई हैं या नहीं बढ़ रही हैं, पर कामरेड लोगों ने इन मसलों पर थोडा-बहुत फूं-फां करने के अलावा और कुछ किया नहीं. यह बात भी सुनिश्चित हो गई कि परमाणु करार वाले मसले पर भी ये लोग इससे ज्यादा कुछ करेंगे नहीं. प्रकाश करात ने कह दिया है कि हम सरकार अस्थिर करने के पक्ष में नहीं है, लेकिन इसके बाद भी सरकार को करार पर कदम बढाने से पहले अपने भविष्य का भी फैसला करना होगा. सवाल यह है कि जब आप सरकार अस्थिर करने के पक्ष में नहीं ही हैं तो सरकार को अपने भविष्य का फैसला करने की धमकी देने का क्या मतलब है? भाषा की जलेबी छानना इसे ही कहते हैं. ऐसा नहीं है कि मैं कामरेड लोगों की नीयत पर शक कर रहा हूँ. मेरा शक सरकार की नीयत पर भी नहीं है. बस कुछ छोटे-छोटे सवाल हैं, जिनसे मैं जूझ रहा हूँ और चाहता हूँ कि आप भी जूझें. क्योंकि भारत जितना मेरा है, उतना ही आपका भी है और उतना ही मनमोहन सिंह का भी है. सरकार का तर्क है कि वह यह करार इसलिए कर रही है कि इससे भारत में ऊर्जा उत्पादन बढ़ जाएगा. मान लिया, पर सवाल यह है कि उस बढ़े हुए ऊर्जा उत्पादन का हम क्या करेंगे? यह बात गौर करने की है कि भारत क्या वास्तव में ऊर्जा संकट से जूझ रहा है या ऊर्जा के कुप्रबंधन से जूझ रहा है? इस मसले पर नए सिरे से और गंभीरतापूर्वक विचार किया जाना चाहिए. ध्यान रहे भारत में तीस प्रतिशत से ज्यादा बिजली सिर्फ लाईन फाल्ट के चलते नष्ट हो जाती है. इस समझौते की जो कीमत भारत को चुकानी पडेगी उसकी तुलना में यह फाल्ट ठीक कराने पर बहुत मामूली लागत आएगी.
यह कौन नहीं जानता कि हमारे देश में बिजली को बरबाद करने की ही तरह उसकी चोरी भी एक शगल है. इस चोरी के लिए आम जनता और उनमें भी खास तौर से मलिन और दलित बस्तियों में रहने वाले गरीब लोग ज्यादा बदनाम हैं. हकीकत यह है कि यह चोरी सफेदपोश लोगों की बस्तियों में ज्यादा होती है. इस काम में कोई और नहीं बिजली विभाग और बदले परिदृश्य में कंपनियों के कर्मचारी ही सहयोग करते हैं. अव्वल तो बात यह है कि घरेलू कामकाज में बिजली की जो चोरी होती है वह भारत में होने वाली बिजली चोरी का दसवां हिस्सा भी नहीं है. बिजली की इससे ज्यादा चोरी सरकारी सेक्टर में होती है. कौन नहीं जानता कई सरकारी संस्थानों पर विभिन्न राज्यों में बिजली बोर्डों के अरबों रुपये बकाया पडे हैं. इस बकाये के चलते बोर्ड ग्रिडो को भुगतान नहीं कर पाते, ग्रिड बिजली घरों को भुगतान नहीं कर पाते, बिजली घर ऊर्जा स्रोतों का इंतजाम नहीं कर पाते और अंततः देशवासियों को बिजली नहीं मिल पाती.
क्या वर्षों से चला आ रहा अरबों रुपये का यह बकाया जिसके लौटने की अब कोई उम्मीद भी बेमानी है, चोरी से कम है. यह सरकारें देशवासियों से लेकिन नहीं कैसे करती हैं कि वे इसकी बकाया रकम का भुगतान कर दें? लेकिन नहीं बिजली की सरकारी चोरी भी बहुत बड़ी चोरी नहीं है. बिजली की सबसे ज्यादा चोरी दरअसल औद्योगिक क्षेत्र में हो रही है. यह चोरी छोटे-छोटे कर्मचारियों के जरिये नहीं हो रही है. इसमें बिजली विभाग के बडे अफसर शामिल होते हैं. औद्योगिक आस्थानों में बिजली चोरी की जांच-पड़ताल के लिए अगर कभी रेड भी पडी होती है तो उन्हें हफ्ता भर पहले से पता होता है और इस दौरान वे अपनी खाता बही तक सब कुछ दुरुस्त कर चुके होते हैं. जहाँ चोरी का यह आलम हो वहाँ कोई यह उम्मीद कैसे कर सकता है कि ऊर्जा का उत्पादन बढ़ जाने भर से ही उसका संकट हल हो जाएगा?

और तो और, केंद्र सरकार भारत में ऊर्जा संकट को लेकर कितनी गम्भीर है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ऊर्जा क्षेत्र के लिए नियामक का पद पिछले एक साल से भी ज्यादा समय से खाली पड़ा है. जहाँ तक सवाल बिजली उत्पादन का है, इस पर ज़द (यू) नेता दिग्विजय सिंह की बात गौरतलब है. वह कहते हैं कि अगर यह समझौता हुआ तो 2020 तक देश में 20 हजार मेगावाट बिजली पैदा की जा सकेगी. लेकिन अगर सिर्फ नेपाल से आने वाली नदियों को बाँध कर जल विद्युत परियोजनाओं को दुरुस्त कर लिया जाए तो 60 हजार मेगावाट बिजली पैदा की जा सकती है. इससे हम बिहार और उत्तर प्रदेश को बढ़ की तबाही से बचाने के साथ-साथ अपने पड़ोसी देश नेपाल की गरीबी भी दूर कर सकेंगे.

मेरा ख़्याल यह है कि आप बिजली उत्पादन बढ़ा कर भी क्या करेंगे, अगर आप उसके पारेषण और वितरण की व्यवस्था दुरुस्त नहीं कर सकते हैं तो? यह बात तो जगजाहिर है कि केवल यूपीए ही नहीं, हमारे देश की किसी भी पार्टी या गठबंधन की सरकार में किसी भी सेक्टर की व्यवस्था सुधारने के प्रति कोई इच्छाशक्ति नहीं है. अगर होता तो अब तक ऊर्जा संकट जैसी कोई बात ही भारत में नहीं बची होती. अब अगर केवल इतनी सी बात के लिए यह समझौता किया जा रहा हो, तब तो बहुत बुरी बात है. सच यह है कि उत्पादन बढाने के नाटक से ज्यादा जरूरी व्यवस्था में सुधार है और व्यवस्था में सुधार का मतलब किलो चोरों को परेशान कर सस्ती लोकप्रियता अर्जित करना नहीं, टन डकैतों को पकड़ कर जनता के हक पर डकैती को रोकना है. पर ऐसा कोई सरकार क्यों करे?
(फिलहाल आप इस मुद्दे पर सोचें. परमाणु करार से जुडे अन्य मसलों का सच अगली कडी में)
इष्ट देव सांकृत्यायन

Thursday, 23 August 2007

हम ठहरे विश्वगुरू


चाय की गुमटी पर बैठे-बैठे ही अच्छी-खासी बहस छिड़ गई और सलाहू एकदम फायर. सारे बवेले की जड़ में हमेशा की तरह इस बार भी मौजूद था मास्टर. कभी-कभी तो मुझे लगता है इस देश में विवादों की ढ़ेर की वजह यहाँ मास्टरों की बहुतायत ही है. ज्यादा विवाद हमारे यहाँ इसीलिए हैं क्योंकि यहाँ मास्टर बहुत ज्यादा हैं. एक ढूँढो हजार मिलते हैं. केवल स्कूल मास्टर ही नहीं, ट्यूशन मास्टर, दर्जी मास्टर, बैंड मास्टर, बिजली मास्टर ..... अरे कौन-कौन से मास्टर कहें! जहाँ देखिए वहीँ मास्टर और इतने मास्टरों के होने के बावजूद पढ़ाई रोजगार की तरह बिल्कुल नदारद. तुर्रा यह कि इसके बाद भी भारत का विश्वगुरू का तमगा अपनी जगह बरकरार. ये अलग बात है कि मेरे अलावा और कोई इस बात को मानने के लिए तैयार न हो, पर चाहूँ तो मैं खुद भी अपने को विश्वगुरू मान सकता हूँ. अरे भाई मैं अपने को कुछ मानूं या कहूं, कोई क्या कर लेगा? हमारे यहाँ तो केकेएमएफ (खींच-खांच के मेट्रिक फेल) लोग भी अपने को एमडी बताते हैं और कैंसर से लेकर एड्स तक का इलाज करते हैं और कोई उनकी डिग्री चेक करने की जरूरत भी नहीं समझता. तो विश्वगुरू बनने की तो कोई डिग्री भी नहीं होती. बहरहाल विवाद की जड़ अपने को विश्वगुरू से एक दर्जा ऊपर मानने वाले मास्टर की एक स्थापना थी. स्थापना थी नेताजी की पिटाई के संदर्भ में, जिसे वह वैधानिक, संसदीय, नैतिक, पुण्यकार्य और यहाँ तक कि वक़्त की सबसे जरूरी जरूरत बता रहा था. जबकि सलाहू की मान्यता इसके ठीक विपरीत थी. मास्टर कह रहा था कि वह दिन दूर नहीं जब देश के सारे नेता पीटे जाएँगे और सलाहू कह रहा था कि वह दिन दूर नहीं जब देश की सारी जनता पीटी जाएगी. मैं ठहरा एक अदद अदना कलमघिस्सू जिसकी औकात में कभी कुछ तय करना रहा ही नहीं. सामने घटी घटना और जगजाहिर हालात के बारे में लिखने के लिए भी जिसे विश्वसनीय, जानकार और उच्चपदस्थ सूत्रों के हवाले का सहारा लेना पड़ता है. पहले से ही संपादक से लेकर पाठक तक के भय से आक्रांत और उस पर भी यह भरोसा नहीं कि कब कौन सा नया कानून लाकर इसके सिर लाद दिया जाए. लिहाजा अपन ने कोई राय देने-मानने के बजाय चुपचाप सुनने और गुनने में ही भलाई समझी. मास्टर फिरंट था. पक्के तौर पर यह माने बैठा था कि देश की सारी समस्याओं की जड़ में नेता हैं. सलाहू ने पूछा भाई वह कैसे? मास्टर शुरू हो गया - भाई देखो झूठे वादे जनता से ये करते हैं. कफ़न से लेकर तोप खरीदने तक के सौदों में दलाली ये खाते हैं. आरक्षण से लेकर अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक तुष्टीकरण तक के नाम पर जनता को ये बरगलाते हैं ......
'बस-बस-बस' वाली तर्ज पर बात पूरी होने से पहले ही सलाहू बोल पड़ा, 'यही तो मैं भी कहता हूँ. जनता क्या दूध पीती बच्ची है जो उसे कोई बरगलाए और वह बरगला जाए? आख़िर क्यों बरगला जाती है वह?'
'बरगला इसलिए जाती है कि उसे बनाया ही इस तरह गया है कि वह बरगला जाती रहे.'
'वाह जी वाह! तुम्हारा मतलब यह कि वह पैदा ही बरगलाए जाने के लिए होती है !'
'कम से कम हिंदुस्तान की तो सच्चाई यही है.' 'जब यही सच्चाई है तो फिर कष्ट क्यों है भाई? फिर तो उसे बरगलाया ही जाना चाहिए.'
'तुम्हारे जैसे वकील तो कहेंगे ही यही.'
'हाँ, और यह भी कहेंगे कि यह देन है तुम्हारे जैसे मास्टरों की.'
'तुम्हारी तो भाई आदत है मास्टरों को कोसना. अपराधी को महापुरुष साबित करने का काम तुम करो और बदनाम हों मास्टर.' 'कभी यह भी सोचा सलाहू ने ऐसे घूर जैसे ?'
'मास्टर अपराधी नहीं बनाता समझे' मास्टर गाँव की बिजली की तरह फ्लक्चुएट होने लगा था, 'मास्टर जिन बच्चों को पढाता है उन्ही में से कुछ अफसर भी बनते हैं, कुछ डॉक्टर और इंजीनियर भी बनते हैं ...........'
'अरे बस कर यार' सलाहू वकील से अचानक थानेदार बन गया था, 'आख़िर सब बन कर सब करते क्या हैं, घपले-घोटाले और जनता के हक पर डकैती ही तो ....'
'और उन्हें इस बात के लिए मजबूर कौन करता है?'
'अब तो मन करता है कि कह दूं वकील.'
'तुम्हारे कहने से क्या होता है? कौन मानता है तुम्हारी बात?'
'क्या?' एक बारगी तो मास्टर का चेहरा बिल्कुल फक्क पड़ गया. शायद उसे लगा कि कहीं सलाहू घर की बात बाहर न करने लगे. बीवी की याद आते ही उस बेचारे बीस साला पति के पास हथियार डालने के अलावा कोई चारा नहीं बचता. सलाहू इस बात को जानता है कि बीवी का जिक्र मास्टर पर वैसे ही काम करता है जैसे गठबंधन सरकार पर समर्थन वापसी की धमकी. पर वह भी कामरेड लोगों की तरह अपनी ताकत का सिर्फ एहसास ही देता है, हथियार का इस्तेमाल नहीं करता. sadhe हुए वकील का अगला वाक्य था, 'स्कूल के बच्चे तक तो तुम्हारी बात मानते नहीं.'
पर मास्टर मौका नहीं चूका. उसने तुरंत एक्का फेंका, 'हाँ! अगर सारे बच्चे मास्टरों की बात मान जाते तो नेता और वकील कहॉ से आते?'
'नहीं, आते तो तब भी. लेकिन तब इनमें भी ईमानदार लोग आते.' सलाहू ने सुधार किया, 'पर सवाल यह है कि वे मानें क्यों? जो देख रहा है कि गुरुजी क्लास में पढाने के बजाय सोते हैं, कहते हैं सच बोलने को और खुद बोलते हैं झूठ .......'
'मतलब यह कि स्कूल की किताबें भी कानून की किताबों की तरह हो गई हैं.' यह नया निष्कर्ष शर्मा जी का था.
सलाहू ने ऐसे घूरा जैसे अभी 'आर्डर-आर्डर' करने जा रहा हो. बिना पैसे लिए उसने सवाल उठा दिया, 'जहाँ जनता खुद कानून का सम्मान न करती हो वहाँ भला कानून की किताबों का इसके अलावा और क्या हाल होगा?'
'जनता को कानून का सम्मान करने लायक छोड़ा कहॉ गया है?' मास्टर ने यह सवाल वैसे ही किया था जैसे सलाहू कोर्ट में दलीलें देता है. 'अब क्या सड़क पर चलने, लाल बत्ती पर थोड़ी देर रुकने, कूड़ा गली में न फेंकने, अपना काम सलीके से न करने और अपना वोट जाति-धर्म से प्रभावित होकर न देने से भी हमें रोका गया है?'
'पर एक के यह सब करने से क्या होता है?'
'यह बात कानून तोड़ते समय क्यों नहीं सोचते गुरू ? एक तोड़ता है तोड़े, पर उसे क्यों तोडें? खास तौर से तब जब इसके लिए सिर्फ थोड़े से धैर्य की जरूरत होती है? हम जैसे हैं हमारे नेता भी वैसे ही तो होंगे!जब कानून का सम्मान नहीं करेंगे तो संसद और विधान सभाओं में भेजेंगे भी क्यों? वे तो हमारे लिए ही परेशानी के सबब बन जाएंगे.' मास्टर के पास इस बात का जवाब शायद नहीं था. वह वैसे ही खिसक लिया जैसे किसी सवाल का जवाब न आने पर अपनी क्लास से खिसक लेता है.
मैं सोच रहा था कि बात तो ठीक है, पर हम विश्वगुरू जो ठहरे. गुरू का काम उपदेश देना है, उस पर अमल करना थोड़े ही. अगले ही क्षण सलाहू भी उठा. उसने अद्दलत के चिन्ह वाले स्टीकर से युक्त बिना नंबर वाली अपनी गाड़ी उठाई और आगे बढ़ गया.
इष्ट देव सांकृत्यायन

Tuesday, 21 August 2007

अखबार की बातें


है मन में इनकार की बातें

ऊपर से इकरार की बातें

मतलब की है दुनिया सारी

हर जगहा व्यापार की बातें

हो भद्दी सी गाली कहते
हैं प्यारी सरकार की बातें

हत्या लूट डकैती चोरी

यह सब है अखबार की बातें

आये सुकूं जो बातें सुनकर

मुद्दत हो गईं यार की बातें

गुल गुलशन गुलफ़ाम की बातें

आओ कर लें प्यार की बातें

रतन

फिर क्या कहना ?


लोकतंत्र में अपराधी को माल्यार्पण फिर क्या कहना ?
जेल से आकर जनसेवा का शपथग्रहण फिर क्या कहना ?

जिनके हाथ मे ख़ून के धब्बे चौरासी के दंगो के-
बापू की प्रतिमा का उनसे अनावरण फिर क्या कहना ?

एक
विधेयक लाभों के पद पर बैठाने की खातिर।
लाभरहित सूची मे उसका नामकरण फिर क्या कहना ?

फाँसी पर झूले थे कितने जिस आज़ादी की खातिर -
सिर्फ दाबती खादी ही के आज चरण फिर क्या कहना ?

बार बार मैं दिखलाता हूँ अपने हाथों मे लेकर -
नहीं देखते अपना चेहरा ले दर्पण फिर क्या कहना ?

विनय ओझा स्नेहिल

Sunday, 19 August 2007

बन टांगिया मजदूरों की दुर्दशा

सरकारें देश भर में वृक्षारोपण के लिए करोडो रुपये खर्च करती है, लेकिन वन समाप्त होते जा रहे हैं. वनों को लगाने वाले बन टांगिया मजदूरों का आज बुरा हाल है जिन्होंने अंग्रेजों के ज़माने मे गोरखपुर मंडल को पेड लगाकर हरा भरा किया था. मंडल मे ३५ हजार से अधिक बन टांगिया मजदूर अपने ही देश मे निर्वासित जीवन जीने को विवश हैं. उन्हें राशनकार्ड, बेसिक शिक्षा,पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नही हैं.आख़िर स्वतंत्र भारत में भी ये परतंत्र हैं.
घर के मारल बन मे गइली, बन में लागल आग.
बन बेचारा का करे , करमवे फूटल बाय.
ये अभिव्यक्ति एक बन टांगिया किसान की सहज अभिव्यक्ति है। महाराजगंज और गोरखपुर जिले के ४५१५ परिवारों के ३५ हजार बन टांगिया किसान दोनो जिलों के जंगलों मे आबाद हैं. नौ दशक पहले इनके पुरखों ने जंगल लगाने के लिए यहाँ डेरा डाला था. इस समय इनकी चौथी पीढ़ी चल रही है. सुविधाविहिन हालत मे घने जंगलों कि छाव मे इनकी तीन पीढी गुजर चुकी है. इनके गाव राजस्व गावं नही हैं इसलिये इन्हें सरकार की किसी योजना का लाभ नही मिलता है. हम स्वतंत्रता की ६० वी वर्षगांठ मना चुके , लेकिन अपने ही देश मे बन टांगिया मजदूरों की त्रासदी देख रहे हैं. आख़िर इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
ये मजदूर अपने गावं मे पक्का या स्थाई निर्माण नही करा सकते, न तो हन्द्पम्प न पक्का चबूतरा -- फूस की झोपड़ी ही डाल सकते हैं. सरकारी स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र के बारे मे तो सोचा भी नही जा सकता है. आज ये उन अधिकारों से भी वंचित हैं जो इन्हें देश का सामान्य नागरिक होने के नाते मिलना चाहिए. बैंक मे इनका खाता नही खुलता, तहसील से अधिवास प्रमाण पत्र नही मिलता,जाति प्रमाण पत्र भी नही मिलता जिससे इन्हें पिछड़े या अनुसूचित होने का लाभ मिल सके.
हालांकि राजनीतिक दलों ने वोट के लिए कुछ इलाक़ों मे इन्हें मतदाता सूची मे दर्ज करा दिया है, लेकिन कुछ इलाक़ों मे वे वोटर भी नही बन पाए हैं. इनके साथ एक समस्या ये भी है की बन टांगिया विभिन्न जातियों के हैं इसलिये इनका कोई वोटबैंक नही है और ना ही ये संगठित हैं.गोरखपुर के तिन्कोनिया रेंज मे ५ महाराजगंज के लक्ष्मीपुर, निचलोल ,मिठौरा ,कम्पिअरगंज ,फरेंदा,श्याम्दयूरवा व पनियारा विकासखंड मे बन टांगिया मजदूरों के गावं आबाद हैं. इसमे ५६% केवट व मल्लाह ,१५ % अनुसूचित जाति व १०% पिछडी जाति के लोग हैं. ये लोकसभा व विधान सभा मे तो वोट दे सकते हैं लेकिन अपनी ग्राम पंचायत नही चुन सकते हैं.
आख़िर ये कब गुलामी से मुक्त होंगे और कब मिलेगी इन्हें भारत की नागरिकता ? ७० साल के जयराम कहते हैं की उन्हें तो पता भी नही की देश और दुनिया की प्रगति क्या है ? जवान लड़के लडकियां मजदूरी करते हैं जिससे पेट की आग बुझ जाती है लेकिन दुखों का कोई अंत नही दिखाई देता लेकिन इनकी उमीदें अभी भी बरकरार हैं कि कही दो गज जमीन मिल जाये जिसे ये अपना कह सकें. अख़्तर "वामिक" ने सही ही कहा है :
ख्वाबों को अपनी आखों से कैसे जुदा करें?
जो जिंदगी से खौफजदा हो वो क्या करे?
सत्येंद्र प्रताप

Saturday, 18 August 2007

रू-ब-रू पाया


तुमको अपने है चारसू पाया
पल में इन्सान और जादू पाया
मौत तुमको भी है पसंद नहीं
जींद की तुझमें आरजू पाया
सबकी खातिर है तेरे दिल में जगह
न जुबां पर है दू-ब-दू पाया
सीधे कहते हैं सब तुम्हें लेकिन
मैंने तुझमें वो जन्गजू पाया
बताएं किसको तेरे बारे में
हर मुसीबत में चाह्जू पाया
बदल चुकी है ये सारी दुनिया
पर तुम्हें मैंने हू-ब-हू पाया
मैं जानता हूँ कि हो योजन दूर
यार तुमको है कू-ब-कू पाया
सभी कहते हैं तुम जहाँ में नहीं
याद जब आई रू-ब-रू पाया
रतन

Friday, 17 August 2007

ख्वाहिश


सिर्फ चाहे से पूरी कोई भी ख्वाहिश नहीं होती.
जैसे तपते मरुस्थल के कहे बारिश नहीं होती..

हमारे हौसलों की जड़ें यूँ मज़बूत न होतीं -
मेरे ऊपर जो तूफानों की नवाज़िश नहीं होती..

हमे मालूम है फिर भी सँजोकर दिल मे रखते हैं-
जहाँ मे पूरी हर एक दिल की फरमाइश नहीं होती..

कामयाबी का सेहरा आज उनके सिर नहीं बंधता -
पास जिनके कोई ऊँची सी सिफारिश नहीं होती..

हज़ारों आंसुओं के वो समंदर लाँघ डाले हैं-
दूर तक तैरने की जिनमे गुंजाइश नहीं होती..

खुदा जब नापता है तो वो फीता दिल पे रखता है-
उससे इन्सान की जेबों से पैमाइश नहीं होती..
-विनय ओझा स्नेहिल

Thursday, 16 August 2007

ऐसे पत्थर ख़ूब हैं



खो गए वीरानियों में ऐसे भी घर ख़ूब हैं
कट रहे रानाई में दिन वो मुकद्दर ख़ूब हैं
आना है जाना है सबको देख कर कुछ सीख लो
खंडहर हैं कुछ महल दीवार जर्जर ख़ूब हैं
राह दिखलाने की बातें लेखनी करती ही है
जो सियासत को हिला दे ऐसे आखर ख़ूब हैं
कहते हैं हर कोई देखो हम सिकंदर हम सिकंदर

है खबर उनको नहीं ईश्वर पयम्बर ख़ूब हैं
हो तसल्ली आंख को तस्वीर ऐसी तो दिखा
देखने को दुनिया भर में यों तो मंजर ख़ूब हैं
कांच के घर में बसें हो मत भुला इस बात को
तोड़ जो डालेंगे पल में ऐसे पत्थर ख़ूब हैं
साथ तेरे हमकदम जो गौर कर उन पर नजर
शकुनी मामा ख़ूब हैं और मीर जाफ़र ख़ूब हैं
है कवच सीने पे लेकिन रखना इसका भी ख़्याल
पीठ में घुस जाने वाले यारों खंजर ख़ूब हैं
रतन

Wednesday, 15 August 2007

गधा आजाद है चरने को




आज सुबहे-सुबह हमको एक बार फिर एहसास हुआ कि हम आजाद हो गए हैं. पिछले कई साल से यह एहसास हो रहा है. क़रीब-क़रीब तबसे जबसे हम होस संभाले. हालांकि अइसा बिल्कुल नहीं है कि आजाद होने का ई एहसास हमको एक्के दिन होता हो. सही कहें तो रोजे हो जाता है. रस्ते में चलते हुए, दुकान में समान खरीदते हुए, स्कूलों में पढाई-लिखाई देखते हुए, न्यूज चैनलों पर ख़बरें देखते और अखबार पढते हुए ........ और जहाँ-जहाँ चाहें, वहाँ-वहाँ. देस तो हमारा आजाद हई है, इसमें कौनो दो राय नहीं है. कुछ हमारे मितऊ लोग हैं, जो बार-बार जाने क्यों और किससे जल-भुन के कहते हैं कि देस अजादे कहॉ हुआ. उन लोगों का असर है, कि कुछ अपनों दिल्जलापन है, कई बार हमहूँ अइसने सोच लेते हैं. कह भी देते हैं. पर आज हमको इस बात का बड़ा पक्का एहसास हुआ, एक जनी का मेल मिलने के बाद. ऊ मेल अंगरेजी में है और उसमें कहा गया है कि हम देसी-बिदेसी त्योहारी दिन तो ख़ूब मनाते हैं. इन दिनों पर एसेज-मेसेज भी भेजते हैं. एडवांस में सारा काम चलता है. पर ई जो अपना इन्डी-पिंडी-इन्सी डे है, इसको एडवांस में सेलेब्रेट करना अकसरे भूल जाते हैं. कौनो अधाई-बधाई नहीं देते हैं. पहिले तो मितवन सबका असर हुआ. तुरंते सवाल उठा मन में, कि भाई हमरा देस आजाद होबे कहाँ किया है कि आजादी की बात करें?
लेकिन फिर हमने गौर किया उस मेल पर. भीतर बड़ा जोरदार माल भरा था. अइसा कि उसने हमें सारे मसले पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर दिया. अइसे कि जइसे किसी की समझ में न आने वाली कविताएं हिंदी के गोलबंद आलोचकों को नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर देती हैं. ठीके बात है भाई! जब कुछ समझ में आ जाएगा तब सोचने की मजबूरी भी कईसी? सोचने की मजबूरी वहीं होती है जहाँ कुछ समझने लायक नहीं होता है. ऊ मेल देख के हमको मालुम हुआ कि हम सच्मुचे नासमझ हैं. असल में था क्या कि उसमें नीचे मोटे-मोटे अच्छरों में लिखा था - सम्हाल के ले जाइएगा. अउर नीचे देखा तो ए ठो फोटो बना था. फोटो क्या था, तीन ठो झोला था. तीनों तीन रंग में था. पहिलका केसरिया - आप चाहैं तो भगवा कह लें. दुसरका उज्जर अउर तिसरका हरियर.
ई फोटो देखते ही संदेस हमरे समझ में आ गया. जाहिर है इस झोले में तौने भरा होगा जौन सूटकेस में भरा जाता है. लेकिन देखिए कितना सादगी से भरा है. सूटकेस में तनी तड़क-भड़क होता है न, तो सबकी नजर लग जाती है. हल्ला मचता है. ऐसहूँ गरीब देस की गरीब जनता का धन आप इतने सउक से तड़क-भड़क के साथ ले जाइएगा, जो देखेगा उसको बुरा तो लगबे करेगा. गान्ही बाबा एही नाते अपने चेलन को कहे होंगे कि खादी पहनो. एक जन की बात पर पूरा भरोसा करो. ओका भगवान मान लो. बात भले बिल्कुल बेमतलब अउर ग़लत लगे, पर कब्बो तरक मत करो. काहें से कि संस्किरित में लिखा है - संशयात्मा विनश्यते.
देखिए न! गान्ही बाबा के चेला लोग आज तक ई बात पर पक्का भरोसा करते आ रहे हैं. उनके जमाने से लेकर आज तक लोग पहली तो बात ई कि काज-परोजन में हमेसा खादी पहिन रहा है. अब इतना तो आप जन्बे करते हैं कि हम लोग जिन्दगी भर पैंट-बूसट पहिनते हैं, लेकिन बियाह-सादी के काम पियरी धोतिए में होता है. अइसे साढे-चार साल उनके चेला लोग भले सूट-बूट में रहे, पर चुनाव के समय खादिये में आ जाते हैं. तियाग देखिए उन लोगन का. हमरे देस में कन्या लोग के भ्रूण हत्या हो रहा है. लड़की लोग के कमी है. देस के नौजवानों को दिक्कत न हो इसलिए ऊ लोग अपने लिए बिदेस से बहुरिया ला रहे हैं.
अउर-त-अउर खाने-पीने में भी देखिए लोग केतना सादगी पसंद हो गए हैं! चार सौ साल पहिले राणा परताप अकबर महान की महानता के क़दर में घास की रोटी खाए थे. उनका हम आज तक जस गाते हैं. आज हमारे नेता लोग सीधे जानवर के चरवे खा रहे हैं. उनका जस गाने के बजाय, उनको लोग बदनाम कर रहे हैं. पुलिस, सीबीआई, कोर्ट-कचहरी सब झेल रहे हैं बेचारे. अगर मंत्री की तरह उकील भी बिना पढे-लिखे बन पाते त नेताजी की उकालत हम करते अउर कहते हाईकोर्ट के जज से - मी लॉर्ड! पहिले राणा परताप की जांच कराई जाए. बाकी अकबर त महान रहबे किए. हमारे नेताजी को कायदे से तो सादगी के लिए कौनो इनाम-उनाम मिलना चाहिए.


जहाँ तक बात सादगी का है, त जौन लोग गान्ही बाबा के सलाह माने उनके कबो कौनो कष्ट नहीं हुआ. एकदम सतनरायन बाबा के कथा के जैसन गारंटी है ई. देखिए न, हमरे चारा खाने वाले नेताजी को भी इनाम मिलिए गया. जनता भले उनको धकिया दी, पर सेंटर में मनिस्टर हैं आजकल. अरे एके ठो नहीं कई ठो मिसाल हैं, सादगी अउर सादगी के इनाम के. खैर छोडिए. तुलसी बाबा भी कह गए हैं - जहाँ सुमति तहं संपत नाना. हमरे गुरूजी त इसका अर्थ ई बताए थे कि तुलसीदास की नानी का नाम सुमति था अउर उनके नाना थे संपत. हम एही सब लिखे भी थे अपने इंतहान में अउर अच्छे नम्मर से पास भी हो गए थे. पर हाले में पुराणिक मास्साब से चर्चा हो रही थी त ऊ इसका कुछ कमर्शियल अर्थ बताने लगे.


ओही अर्थ के आलोक में हम इसको रख के देखे त मालुम हुआ कि गान्ही बाबा काहें आत्मा के आवाज पर इतना जोर देते थे. देखिए न! बेद-पुरान-बाइबिल-कुरान-तिर्पिटक अउर इहां तक कि साक्षात भगवान .... कहू के बात ग़लती हो सकता है. लेकिन कंगरेस मुखिया के फूंक भी ग़लती होना नामुमकिन है. कौनो गान्हिए न रहे त बात दीगर है, नहीं त ऊ होगा वही जिसके नाम में गान्ही लगा रहे. चाहे तड़के भर के सही. केतना बढिया फरमूला है! मंगल-बुध-बिर्हस्पती या कौनो दूसरे अकास्गंगा से भी आ के कौनो एलियन भी अगर अपने नामे में गान्ही लगा ले त ई पक्का है कि ऊ भारत देस के इतिहास, भूगोल,अर्थ्सास्त्र, संस्कृति, राजनीति अउर लोगन के जरूरत ...... सब कुछ बिल्कुल ठीक-ठीक समझ जाएगा. अगर नहियों समझेगा त हमरे कामरेड लोग उसको समझा लेंगे अउर स्वयमसेवक लोग सिखा भी देंगे. अरे ऊ देस के पिता के मूल खानदान में सामिल हो जाएगा भाई, कौनो मजाक बात है क्या? भारत देस आज तक सही पूछिए तो गन्ही बाबा के बताए रस्ते पर ही चल रहा है. बाबा के तीन बन्दरन ने ही देस सम्हाल रखा है. तीनों आज तक हर हाल में बाबा के उपदेस निभा रहे हैं. पहिलका जौन बुरा न देखने का संकलप लिए था, ऊ बुरा नहीं देखता तो नहिये देखता. सूरज पछिम से उगें, पूरा देस अपने देह में आग लगा के घूमे, बेकारी बढ़े कि महंगाई आ कि भ्रष्टाचार ओ चहे देस की सबसे बड़की पंचैत में जूता-चप्पल चले .... ऊ न देखता है न देखेगा. कौनो लुच्चा-लफंगा है का कि सब देखता रहे? दुसरका जौन न सुनाने का संकलप लिया था उसके कान पे जून नहीं चहे त अजगर रेंग जाए, ऊ नाहीं सुनता त नहिये सुनता. ऊ सुनता है त केवल अपने बडे भाई के बात. ओ बड़का उहे देखता है जौन ई दिखाता है.
रह गई बात तिसरका के त ओके बुरा बोल त देना पड़ता है कभी-कभी. लेकिन उसके बुरा फैसले से बुरा हो नीं सकता कभी ई गारंटी बड़का देता है, बुरा न देखने वाला. एक त जेतना बड़ा अपराध ओतने देर से फैसिला. अगर एतनों देर में कौनो गदहा साक्ष्य नहिंये मिटा पावे त फांसी के माफी पर महामहिम के मंशा आते-आते तक तो ऊ भगवान क प्यारा होइए जाएगा. बाबा के चेला सब उनके उपदेस पर अमल के मामले में उनसे भी दस कदम आगे बढ़ गए. बाबा कहे थे - पाप से घृणा करना पापी से नहीं. चेला सब पाप तक से घृणा करना छोड़ दिए. इहे न ह उपदेस के सार्थकता!
एक ठो ससुर चौथका भर तनी बिगाड़ गया, बाबा के घर के बच्चन की तरह. लेकिन क्या करिएगा, बिगड़ने का खामियाजा भी भुगत रहा है. गल्ली-गल्ली दौड़ रहा है. ठोकर खा रहा है. खबर जुटा रहा है. कुछ छाप रहा है त कबो स्टिंग आपरेसन कर रहा है. बस गोसाईं जी के बात सही साबित कर रहा है - कपि चंचल सबहीं गुन हीना. आख़िर इससे हो का रहा है? बाकिर उनमें भी जौन ई समझ लिया ऊ त मलाई काट रहा है. दिक्कत ई है कि हमरे अधिकतर मितवे सब ओही चौथका वाले बन्दर्वन में हैं सब. उनका दिमाग त खराब हैये है, हमारा भी खराब कर देते हैं सब.
कहते हैं सब आजादी कहाँ है? अरे भाई सड़क पर चलो त जहाँ चाहो बीच सड़क पर गाडी रोक के खडे हो जाओ. करती रहे पब्लिक पी-पीं-पीं.............................. का कर लेगा कोई? दुकान चला रहे हो, बेच लो सौ रुपिया किलो पियाज, बाबू हो ले लो सुविधा शुल्क जितना चाहो, गुंडा हो ले लो किसी की भी जान, राजनेता हो करो जनता से अनाप-शनाप वादे ............. का कर लेगा कोई माई का लाल? भाई इहे तो आजादी है न! जहाँ खेत आजाद हो पूरा बढ़ने के लिए और गदहा आजाद हो पूरा चरने के लिए. आजादी और का है?
त भई अगर आपको लगता हो, सहिए में आपका देस आजाद है त आपके मुबारकबाद ई गंवार के तरफ से. मन करे त एक्सेप्टिये आ नाहीं त .....
इष्ट देव सांकृत्यायन

Tuesday, 14 August 2007

तकदीर ले आना मेरी


मुस्कुराऊँ ख्वाब की ताबीर ले आना मेरी
जो खबर सबको करे ताईर ले आना मेरी
कर न पाओ ग़र भला तो क्यों बुरा हो सोचते
है खलल मुझसे अगर शमशीर ले आना मेरी
देख
कर जिनको मेरे गुजरे ज़माने याद आये

पास
तेरे हैं जो वो तस्वीर ले आना मेरी

सांस उखड़ी जा रही है धड़कनें भी मन्द हैं
बाँध कर रखे इन्हें जंजीर ले आना मेरी
लूट कर जो ले गए परछाई भी तनहाई में
बोझ तो कुछ होगी ओ जागीर ले आना मेरी
ग़र खुदा के पास जाना तो करम करना रतन
मेरी खातिर भी थोड़ी तकदीर ले आना मेरी
रतन

...अहले दुनिया होएगा


सबका होना या न होना यह जरूरी है नहीं
मेरे होने की इयत्ता अहले दुनिया होएगा
आसमान भी होएगा सागर, जमीं भी होएगी
हम अभी से क्यों बताएं, और क्या-क्या होएगा
होंगी सब रंगीनियाँ, जन्नत-जहन्नुम होएँगे
आने-जाने के लिए वां साजो-सामां होएगा
तुम रहोगे, हम रहेंगे, फिर वही दुनिया हुई
फिर वही साकी रहेगी और पैमां होएगा
हो गए दुनिया से रुखसत जो सिकंदर लोग थे
संग उनके ऐ जमाने अपना अफसां होएगा
रतन

Monday, 13 August 2007

...यूं ही कभू लब खोलें हैं


आने वाली नसलें तुम पे रश्क करेंगी हमअसरों
जब उनको ये ध्यान आयेगा तुमने फिराक को देखा था
इसे आप चाहें तो नार्सिसिया की इंतहां कह सकते हैं. जैसा मैने लोगों से सुना है अगर उस भरोसा कर सकूं तो मानना होगा वास्तव में
फिराक साहब आत्ममुग्धता के बहुत हद तक शिकार थे भी. यूँ इसमें कितना सच है और कितना फ़साना, यह तो मैं नहीं जानता और इस पर कोई टिप्पणी भी नहीं करूंगा कि आत्ममुग्ध होना सही है या ग़लत, पर हाँ इस बात का मलाल मुझे जरूर है कि मैं फिराक को नहीं देख सका. हालांकि चाहता तो देख सकता था क्या? शायद हाँ, शायद नहीं.... ये अलग है कि फिराक उन थोड़े से लोगों मैं शामिल हैं जो अपने जीते जी किंवदंती बन गए,पर फिराक के बारे में मैं जान ही तब पाया जब उनका निधन हुआ। 1982 में जब फिराक साहब का निधन हुआ तब मैं छठे दर्जे में पढता था. सुबह-सुबह आकाशवाणी के प्रादेशिक समाचार में उनके निधन की खबर जानकर पिताजी बहुत दुखी हुए थे। यूँ रेडियो बहुत लोगों के मरने-जीने की बात किया करता था, पर उस पर पिताजी पर कोई फर्क पड़ते मैं नहीं देखता था. आखिर ऐसा क्या था कि वह फिराक साहब के निधन से दुखी हुए. मेरे बालमन में यह कुतूहल उठना स्वाभाविक था. पिताजी दुखी हुए इसका मतलब यह था कि फिराक साहब सिर्फ बडे नहीं, कुछ खास आदमी थे. पूछने पर पिताजी ने बातें तो तमाम बताएँ, पर मेरी समझ में कम ही आईं. लब्बो-लुआब जो मैं समझ पाया वह यह था कि फिराक गोरखपुरी एक बडे शायर थे और उर्दू व अन्ग्रेज़ी के बडे विद्वान भी थे. मूलतः वह गोरखपुर जिले की बांसगाँव तहसील के रहने वाले थे. बावजूद इसके पिताजी ने भी उन्हें देखा नहीं था. यूँ फिराक साहब का गुल-ए-नगमा पिताजी के पास था और उसके शेर वह अक्सर सुनाते रहते थे. बात-बात पर वह उससे उद्धरण देते थे और शायद इसीलिए फिराक को न जानते हुए भी उनके कई शेर मुझे तभी याद हो गए थे. इनमें एक शेर मुझे खासा पसंद था और वह है :
किसी का कौन हुआ यूँ तो उम्र भर फिर भी
ये हुस्न-ओ-इश्क सब तो धोका है मगर फिर भी.
ये अलग बात है कि तब इसके अर्थ की कोई परछाईं भी मेरी पकड़ में नहीं आने वाली थी. फिराक साहब और उनका गुल-ए-नगमा मुझे समझ में आना शुरू हुआ तब जब मैने दसवीं पर कर गया. जैसे-जैसे बड़ा होता गया फिराक साहब अपनी शायरी के जरिए मेरे भी ज्यादा अजीज होते गए. फिराक, उनकी शायरी, उनके क्रांतिकारी कारनामे और उनसे जुडे तमाम सच्चे-झूठे किस्से. खास तौर से कॉलेज के दिनों में तो हम लोगों ने फिराक के असल अशआर की जगह उनकी पैरोदियाँ ख़ूब बनाईं. पैरोडियों के बनाने में जैसा मनमानापन सभी करते हैं हमने भी किया.
पर अब सोचते हैं तो लगता है कि जिन्दगी की जैसी गहरी समझ फिराक को थी, कम रचनाकारों को ही हो सकती है. कहने को लोग कुछ भी कहें, पर यही नार्सिसिया फिराक की शायरी जान भी है. जब वह कहते हैं :
क़ैद क्या रिहाई क्या है हमीं में हर आलम
चल पडे तो सेहरा है रूक गए तो जिंदां है.

वैसे फिराक की यह नार्सिसिया ठहराव की नहीं है. यह मुक्ति, अपने से पर किसी और अस्तित्व के तलाश की और उससे जुडाव की ओर ले जाने की नार्सिसिया है. यह वह रास्ता है जो अस्तित्ववाद की ओर ले जाता है. वह शायद अस्ति की तलाश से उपजी बेचैनी ही है जो उन्हें यह कहने को मजबूर करती है:
शामें किसी को मांगती हैं आज भी 'फिराक'
गो ज़िंदगी में यूं तो मुझे कोई कमी नहीं

अस्ति की खोज उनकी शायरी लक्ष्य है तो प्रेम शायद उसका रास्ता. ऐसा मुझे लगता है. कदम-कदम पर वह अपनी तासीर में अस्तित्ववाद की ओर बढते दिखाई देते हैं :
तुम मुखातिब भी हो करीब भी हो
तुमको देखूं कि तुमसे बात करूं
या फिर जब वह कहते हैं :
आज उन्हें मेहरबां पा कर
खुश हुए और जी में डर भी गए.

द्वंद्व का यह आलम फिराक में हर तरफ है. तभी तो प्रेम का साफ-साफ जिक्र आने पर भी वह कहते हैं:
मासूम है मुहब्बत लेकिन इसी के हाथों
ऐ जान-ए-इश्क मैने तेरा बुरा भी चाहा
फिर वही फिराक यह भी कहते हैं :
हम से क्या हो सका मुहब्बत में
खैर तुमने तो बेवफाई की.

व्यवहार में फिराक जो भी रहें हों, पर यकीनन शायरी में तो वह मुझे आत्ममुग्धता के शिकार नहीं, आत्मविश्लेषण और आत्मानुसंधान के आग्रही नजर आते हैं.
लीजिए इस अलाहदा शायर की एक गजल आपके लिए भी :
अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं यूं ही कभू लब खोलें हैं
पहले "फिराक" को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं
दिन में हम को देखने वालो अपने अपने हैं ओकात
जाओ ना तुम इन खुश्क आंखों पर हम रातों को रो ले हैं
फितरत मेरी इश्क-ओ-मुहब्बत किस्मत मेरी तनहाई
कहने की नौबत ही ना आई हम भी कसू के हो ले हैं
बाग़ में वो ख्वाब-आवर आलम मौज-ए-सबा के इशारों पर
डाली डाली नौरस पत्ते सहस सहज जब डोले हैं
उफ़ वो लबों पर मौज-ए-तबस्सुम जैसे करवटें लें कौंधें
हाय वो आलम जुम्बिश-ए-मिज़गां जब फित्ने पर तोले हैं
इन रातों को हरीम-ए-नाज़ का इक आलम होए है नदीम
खल्वत में वो नर्म उंगलियां बंद-ए-काबा जब खोलें हैं
गम का फ़साना सुनाने वालो आख़िर-ए-शब् आराम करो
कल ये कहानी फिर छेडेंगे हम भी ज़रा अब सो ले हैं
हम लोग अब तो पराए से हैं कुछ तो बताओ हाल-ए-"फिराक"
अब तो तुम्हीं को प्यार करे हैं अब तो तुम्हीं से बोले हैं.
इष्ट देव सांकृत्यायन

Saturday, 11 August 2007

मैं तो बनूगा आकंत्वादी


छोटू पंडित जिद पर अड़ गए हैं. अब वह बिल्कुल कुछ भी मानने के लिए तैयार नहीं हैं. ऐसे जैसे भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस के अध्यक्ष हो गए हों. देश कहा करे उसे जो कहना हो, पर मैं तो वही करूंगा जो मुझे करना है.
अभी तीन दिन पहले तक वह पाइलट बनना चाहते थे, पर अब नहीं बनना चाहते वह पाइलट. आसमान में ऊंचे, और ऊंचे, और-और ऊंचे उड़ते एरोप्लेन आजकल उन्हें बिल्कुल नहीं लुभा रहे हैं. अब वह बादल से भी बडे भी नहीं होना चाहते. अब वह सिर्फ और सिर्फ आकंत्वादी बनना चाहते हैं. उनकी इस चाहत के पीछे बडे ठोस कारण हैं. करीब-करीब उतने ही ठोस जितने कि अमेरिका के साथ हुई भारत की परमाणु अप्रसार संधि, नंदीग्राम में किसानों की कुटाई, समुद्र में मौजूद पुल की तुडाई और जम्बूद्वीप के भारतखण्ड के कई राज्यों में सेज बिछाए जाने के पीछे हैं. शुरुआत कुछ यूँ हुई थी कि टीवी पर कोई कार्यक्रम आ रहा था बच्चों का. मास्टर और सलाहू मेरे साथ चाय पी रहे थे और छोटू पंडित मगन होकर देखे जा रहे थे प्रोग्राम. बिल्कुल खल्वाट खोपडीधारी और हीरो कहे जाने वाले एक सज्जन बच्चों से सवाल कर रहे थे. एक बच्चे से उन्होने पूछा, "बडे होकार आप क्या बनेंगे बेटे?"
"पुलिछ अंकल", बेटे ने बताया.
"अरे वाह-वाह! आप तो बहुत बहादुर लगते हैं." अंकल जी टिप्पणी कर रहे थे. फिर पूछा उन्होने, "अच्छा ये बताइए आप पुलिछ ही क्यों बनाना चाहते हैं."
बच्चा थोड़ी देर तो इधर-उधर ताकता रहा. फिर उसने जवाब दिया, "वो मेरे कोलोनी में न एक बार एक चोर आया था. उसे मार तो दिया लोगों ने. पर जब वो मर के जमीन पर पड़ा था तो फिर पुलिछ आई. उछ चोर की जेब में जो कुछ भी था न वो छब पुलिछ ने निकाल लिया. फिर चोर का छारा पैचा पुलिछ का हो गया."
बेचारे अंकल जी की अकल अब ठिकाने लग गई थी. बगलें झाँकने लगे. हार कर वो हें-हें-हें करने लगे और उधर पब्लिक हां-हां-हां करने लगी. इधर मास्टर को खुराफात सूझ गई. वो छोटू पंडित के मुँह लग बैठा. "क्यों भाई छोटू जी बताइए आप क्या बनेंगे?" "मैं", छोटू जी कूदे जोर से, "मैं तो आकंत्वादी बनूँगा बच्छ."
आकंत्वादी यानी आतंकवादी. यह जान कर सबकी हालत वही हुई जो अमेरिका के तेवर जान कर पाकिस्तान के राष्ट्रपति की होती है. सभी सन्न. पर मास्टर को थोड़ी ही देर में चुहल सूझने लगी. जैसे बाढ़पीड़ितों को देख कर सरकारी इंजीनियरों को सूझती है. "अच्छा ये बताओ भाई तुम क्यों बनना चाहते हो आकंत्वादी?"
"वो आप नहीं जानते? वो जो आकंत्वादी होता है न, उच्छे छ्बी दलते हैं. पुलिछ भी." ये छोटू जी का जवाब था.
"तो तुम सबको डराना चाहते हो?" मास्टर का सवाल था.
"हाँ तब ओल क्या?"
"लेकिन तुम क्यों सबको डरना चाहते हो भाई?"
"अले बिना दले कोई कुछ कलता ही नीं है."
"ऐसा तुमने कैसे जान लिया भाई?" मास्टर को मजा आने लगा था.
"अब जैछे देखिए अमेलिका है न, उच्छे छब दलते हैं. तो छब उछ्की बात भी मानते हैं."
"हाँ देखिए. पाकिस्तान इंडिया की बात मानता ही नहीं है. अमेरिका की बात तुरंत मान जाते हैं." यह बडे मियां थे.
"पर अमेरिका कोई आतंकवादी थोड़े है. वो तो एक बड़ा देश है बेटा."
"आतंकवादी भी कोई अलग चीज थोड़े होता है. वो भी तो आदमी होता है. आदमी में जिसके पास ज्यादा ताक़त हो जाती है वो आतंकवादी हो जाता है."
बडे मियां की इस व्यावहारिक परिभाषा ने हमें वैसे ही हिला दिया जैसे मैडम की त्यौरी हिला देती है पीएम को. सलाहू ने बच्चों के खतरनाक इरादे भांप लिए थे. लिहाजा उसने समझाने की कोशिश की, "एक बात जानते हो बेटा?"
"क्या?"
"आंतकवादी जब पकडे जाते हैं तो उनको बहुत मार पड़ती है."
"अले सब झूठ-झूठ बोलते हैं."
हम सब हक्के-बक्के रह गए थे. सलाहू बडे मियां से मुखातिब हुआ, "क्यों भाई! समझाओ अपने भाई को."
"वो ठीक तो कह रहा है अंकल" बडे मियां ने और चौका दिया, "आपको मालुम है कोई भी जब पकडा जाता है तो पहले उसको कोर्ट में ले जाया जाता है. "
यूँ तो सलाहू को अपनी वकालत डगमगाती दिखने लगी थी, फिर भी उसने पूछा,"वहाँ जानते हो क्या होता है?"
"हाँ"
"अच्छा तो बताओ."
"पहले फांसी की सजा सुनाई जाती है. फिर वो राष्प्रत्टती से माफी मांग लेता है."
"तो तुम क्या समझते हो वो माफ़ कर देते हैं?"
"ओल क्या?" ये छोटू पंडित थे.
"अरे नहीं भाई! राष्ट्रपति उन्हें माफ़ नहीं करते." सलाहू ने थोडा डपटकर समझाया.
"लेकिन वो उन्हें सजा भी नहीं होने देते. वो क्या अफजल गुरू को देखिए." बडे मियां ने फिर अपने बडे होने का परिचय दिया.
इसके पहले कि सलाहू कुछ और समझाता छोटू पंडित हय्या-हो वाले अंदाज में दोनों हाथ ऊपर उठाए कूदते हुए बोले, "हाँ, मैं तो बड़ी छी बंदूक लूँगा और बन जाऊँगा आकंत्वादी."
"बंदूक लेने का नतीजा जानते हो क्या होता है?" सलाहू ने पूछा.
"अरे कुछ नहीं होता अंकल. पहले पकडा जाता है, फिर छोड दिया जाता है." ये बडे मियां थे. सलाहू ने कोई और तर्क काम करते न देख कर आखिरकार घुड़की दी. "यही सिखा रहे हो तुम अपने छोटे भाई को? पता है ये सब गंदे काम हैं. और गंदे काम करने वालों का क्या होता है, जानते हो?"
बडे मियां सकपका गए थे. लिहाजा वह छोटू पंडित को समझाने लगे, "हाँ छोटू ऎसी बात नहीं करते हैं." वाममोर्चे की तरह. भीतर हर फैसले पर दस्तखत के बाद बाहर पब्लिक में ये तेवर कि यूपीए सरकार के कामकाज और नीतियों से हम सहमत नहीं हैं.
पर छोटू पंडित किसी से डरें तब न, उन्हें तो सबको डराना है. वह बोले जा रहे हैं, "अरे छब झूठ बोलते हैं. जैछे मुझे मालूम ही नहीं है. पहले छब पकड़े जाते हैं, फिर छब छूट जाते हैं. कल आप ही तो बता रहे थे अंकल ......" वह सीधे सलाहू से मुखातिब थे और सलाहू बगलें झांक रहा था.
अब हमारे पास कोई तर्क नहीं बचा है. कोई चारा भी नहीं दिख रहा है, भारत की जनता की तरह. आपको कुछ सूझ रहा है क्या? सूझे तो बताएं जरूर.
इष्ट देव सांकृत्यायन

Friday, 10 August 2007

दोषी कौन?


काशी जीवंत शहर है, देश में कुछ भी होता है तो काशी मे प्रतिक्रिया जरूर होती है. खासकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लिए तो खबरें मैनेज होती हैं, इसमे कोई दो राय नही है. लेकिन क्या मौत को भी मैनेज किया जा सकता है? क्या किसी टीवी के अदने से स्ट्रिंगर के कहने पर कोई मरने के लिए तैयार हो सकता है? ये भी बहस का विषय है कि आख़िर काशी में ही ज्यादातर ऐसी घटनाएं क्यों होती हैं?
पिछले साल घूरेलाल सोनकर ने लंका थाने के सामने आत्मदाह कर लिया था. इतेफाक से उन दिनों मैं बनारस में ही कार्यरत था. उसके आत्मदाह करने की धमकी संध्याकालीन दैनिक 'सन्मार्ग' मे छपी थी. उसी को पढ़कर CNN-IBN मे काम करने वाला लड़का लंका थाने पंहुचा था. घूरेलाल ने अन्य अखबारों को भी विज्ञप्ति भेजी थी. घूरेलाल ने आग लगा ली. वो मर गया. किसी चैनल ने वो खबर नहीं ली, लेकिन अखबार मे पहले पन्ने पर जलते हुए आदमी कि तसबीर आयी. उस समय भी उंगलिया चैनल पर ही उठी थीं.
बनारस मे खबरें मैनेज होती हैं, इसमे कोई दो राय नहीं. लेकिन सवाल ये उठता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? टीवी और अखबार के लोग अपनी नौकरी के लिए खबर कवर करते हैं. जहाँ तक टीवी चैनल की बात है, सारा कुछ कवर करने के बाद अगर खबर को चैनल वाले लेते हैं तो ५०० से १००० रुपये मिलते हैं. इतने कम पैसे के लिए कोई किसी की हत्या की जोखिम नहीं लेने वाला है. तमाम लोग हैं जो सिस्टम से परेशान हैं और उनकी कोई सुनने वाला नहीं है. वाराणसी मे विकलांगों द्वारा आत्महत्या की कोशिश इसी दुख का परिणाम है.
स्टार न्यूज़ में वाराणसी में बतौर स्ट्रिंगर काम करने वाले शैलेष कहते हैं कि उन्होने विकलांगों की मंशा भांप ली थी और एसएसपी को फोन कर के जानकारी भी दी, लेकिन उसका खमियाजा उन्हें भुगतना पड़ा और एसएसपी ने स्टार न्यूज़ के खिलाफ ऍफ़आईआर करा दी. साथ ही उनका कहना था कि ये मामला अखबारों मे बहुत दिनों से चल रहा था और एलआइयू ने रिपोर्ट भी दीं थी, लेकिन प्रशासन अपना मुह छुपाने के लिए घटना को दूसरी ओर मोड़ रहा है. इस घटना के लिए सिर्फ दो चैनल के संवाददाता कैसे जिम्मेदार हो सकते हैं? जबकि घटनास्थल पर तो ज्यादा लोग मौजूद थे ही, पूरे शहर को जानकारी थी कि विकलांगों ने आत्महत्या की घोषणा कर रखी है.
ये जरूर है कि इस घटना के बाद प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया की लडाई खुलकर सामने आ गई. अखबार मे खबर तो आई ही, सम्पादकीय भी लिखा गया जिसमे इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लोगों को शैशवावस्था में बताया गया। प्रिंट मीडिया को परिपक्व बताया गया. लेकिन सम्पादकीय लिखने वाले शायद ये नही जानते कि इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लिए काम करने वाले कई लोगों का एक दशक से भी अधिक का प्रिंट मीडिया का कैरियर रहा है!
सारी बहस के बाद भी समस्या वही कि वहीं रह गई कि बनारस के नगर निगम द्वारा बेदखल किए गए विकलांगों का क्या होगा? जो मर गए उनका क्या होगा और रोजी रोटी के लिए वरसों से आंदोलन कर रहे उन विकलांगों का क्या होगा जो जिंदा बच गए हैं?
सत्येंद्र प्रताप

Monday, 6 August 2007

नेता के सिर बारिश जूतों की

अभी हाल की बात है. एक नेताजी पीट दिए गए. पिटे वह जम्मू-कश्मीर में. वाह क्या नजारे हैं! कहा जाता है कि धरती पर स्वर्ग अगर कहीँ है तो वहीं है. तो जनाब कल्पना करिये. इन खूबसूरत वादियों में पिटने का मजा भी अहा क्या मजा है!
आइए अब अपको साफ-साफ बताते हैं. वह नेताजी थे बिलावर इलाके के सांसद लाल सिंह और जगह थी बिलावर. दिन मंगलवार था, यानी ३१ जुलाई २००७ को। बिजली कटौती से आजिज पब्लिक ने बिलावर बंद कर रखा था. संजोग से उसी बीच नेताजी पहुंच गए. प्रदर्शनकारियों ने उन्हें घेर लिया. अब यह कोई चुनाव का समय तो था नहीं कि नेताजी किसी की बात सुनते. चुनाव हो तो बात और होती है. तब तो नेताजी सुनने-सुनाने के लिए जनता जनार्दन को ढूँढते फिरते हैं. पर बेमतलब यानी ग़ैर चुनावी दौर में बेचारी पब्लिक की कौन सुनता है. जरूरत ही क्या है कि उसे सुना जाए.
लिहाजा नेताजी ने नहीं सुनी. लेकिन पब्लिक भी कोई प्रवचन सुनने आई श्रद्धालु तो रह नहीं गई है अब. उसने घेर लिया और नेताजी को अपने दल-बल समेत जाना था गेस्ट हाउस. उन्होने पहले तो विनम्रतापूर्वक रास्ता मांगने की कोशिश की, लेकिन पब्लिक ने वह दिया नहीं. अब यह कोई चुनाव का समय तो था नहीं कि पब्लिक कुछ भी करे, उसे बर्दाश्त कर लिया जाए. लिहाजा नेताजी आ गए ताव में और देने लगे गलियां. पर पब्लिक भी कुछ कम तो है नहीं. वह भी आ गयी ताव में और बदले में बरसाने लगी जूते और चप्पल. नेताजी ने खैर जैसे-तैसे भाग कर जान बचाई. इसके बाद क्या हुआ, यह बात तो मुझे पता चल नहीं पाई. क्योंकि दैनिक जागरण के जम्मू एडीशन में मैंने यहीं तक की बात पढी. तो यह जानना अभी मेरे लिए भी बाक़ी है कि नेताजी ने किसी थाने में इस घटना की रपट-वपट दर्ज कराई या नहीं! जनता जनार्दन में से दो-चार लोगों को झूठे मुकदमे में फंसाया-वसाया या नहीं. खैर हो सकता है कि यह सब कैसे-कैसे और कब-कब करना है, यह बात उन्होने किसी थानेदार को समझा दी हो. वह बाद में धीरे-धीरे मौका देख कर बेचारी पब्लिक से कसर निकालता रहे. आख़िर उसे भी तो नौकरी करनी है। प्रमोशन-इन्क्रीमेंट चाहिए, अच्छी जगह पोस्टिंग चाहिए. वह सब नेताजी की कृपा के बग़ैर तो होगा नहीं! लिहाजा हो सकता है कि वह बाद में करता रहे.
बहरहाल और जो भी हो, पर एक बात तो तय है. वह है नेताजी का भविष्य, कम से कम अगले चुनाव के लिए. अगर बूथ कैप्चर या घालमेल न हुआ तो उनके भविष्य का आकलन हुआ ही समझिए. पर बात यहीं तक नहीं है. अव्वल तो बात यह है कि यह घटना तो सिर्फ संकेत है. संकेत है उन नेताओं के लिए जो अभी यह मानकर चल रहे हैं कि बेचारी पब्लिक जाएगी कहॉ! नाग नाथ नहीं तो सांप नाथ - इन्ही दोनों में से बदल-बदल कर उसे ले आना है बार-बार. बहुत गुस्साएगी तो यह करेगी कि हमारे उस भाई को राजगद्दी पर बैठेगी जिसे हम अभी गाली देते हैं. और जब समझौता यहाँ तक पहुंच ही गया कि राजनीति की दुनिया के बाघ और बकरी एक घाट पर पानी पीने लगे तो थोडा और आगे बढ कर हम नेता-नेता आपस के गिले-शिकवे भी मिटा लेंगे. फिर पांच-पांच साल बाद हम आराम से अदल-बदल कर आते-जाते रहेंगे. लेकिन नहीं जनाब!
पब्लिक यह कहना चाहती है कि इस खुशफहमी में आप मत रहिए. अभी तो बिजली जैसी छोटी सी बात पर लोग एकजुट हुए हैं, सिर्फ एक इलाके में. आगे महंगाई, बेकारी, कानून-व्यवस्था, गुंडागर्दी, जन सुविधाएं, भ्रष्टाचार ....... आदि-आदि बडे मुद्दों पर लोग जुटेंगे. पूरे देश के लोग. आपकी तुष्टीकरण और फूट डालो राज करो की नीति भी सबकी समझ में आ गई है. वे आपके बांटने से बाँटेंगे भी नहीं. फिर सोचिए, क्या होगा?
इब्तदा-ए-इश्क है रोता है क्या?
आगे-आगे देखिए होता है क्या?
और यह बात केवल लाल सिंह के लिए ही नहीं है. लाल सिंह, पीले लाल, काले चंद, हरा कुमार ......... जो भी कोई राजनीति की दुनिया है और बेचारी पब्लिक को बेवकूफ बनाने में लगा हुआ है, उन सभी महान आत्माओं के लिए है यह संकेत. तो कहिए आपकी समझ में कुछ आया नेताजी, या नहीं अभी?
इष्ट देव सांकृत्यायन

Saturday, 4 August 2007

भोजन की ख़ुशी

पूरे देश से भुखमरी की खबरें आती रहती हैं. कालाहांडी पुरानी बात हो चली. महाराष्ट्र में किसान आत्महत्या कर रहे हैं. बुंदेलखंड में खेती का बुरा हाल है. ऐसे में भूख क्यों न बिके! एक राष्ट्रीय हिंदी दैनिक के दिल्ली संस्करण में राशिफल निकला। लिखा था कि आज कुम्भ राशि वालों को बढ़िया भोजन मिलेगा. अब हालत यहाँ तक पहुच गई कि ज्योतिषियों को बताना पड़ रहा है कि हिंदी अखबार पढने वालों में कुम्भ राशि वालों को खुश होना चाहिए, क्योंकि आज उन्हें भरपेट बढ़िया भोजन मिलने कि उम्मीद है. अब तक तो सरकारों पर ये आरोप लगते थे कि असन्तुलित विकास के चलते महानगरों की ओर पलायन हो रहा है. अब सरकार क्या करे जब देश के सारे भुक्खड़ राजधानी मे ही पहुच गए हैं.
ज्योतिषियों की समस्या ये है कि पहले तो तोते से कागज उठ्वाते थे जिसमे लिखा होता था कि आप करोड़पति बनने वाले हैं. कचहरी के नजदीक का तोता मुकदमे जीतने की भविष्यवाणी करता था, लेकिन अब वो दिल्ली वालों को बतायेगा कि आज तुम्हे भरपेट भोजन मिल जायेगा. ये अलग बात है कि दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला जीं भी उत्तर प्रदेश की हैं. इन्हें बुरा लगता है कि लोग दिल्ली आते हैं और दिल्ली को भुक्खड़ बनाते हैं. क्या करें? विदेशी भारत को भूखा नंगा देश कहते हैं और दिल्ली वाले उत्तर प्रदेश और बिहार को, और उत्तर प्रदेश और बिहार वाले कुछ जिलों को. लेकिन भविष्य बताने वालों को तो अपनी दुकान बचाने के लिए अब दिल्ली के हिंदी अखबारों मे यही बताना पड़ेगा कि आज तुम्हे भरपेट भोजन मिल जायेगा. तभी चलेगी दुकानदारी. किसी शायर ने दिल्ली के लिए ही शायद खास लिखा था ....
मेरी खता मुआफ, मैं भूले से आ गया यहां.
वरना मुझे भी है खबर, मेरा नही है ये जहाँ..

सत्येंद्र प्रताप

Thursday, 2 August 2007

केसर-केसर रूप तुम्हारा

केसर-केसर रूप तुम्हारा, चंदन-चंदन सांसें
इन नैनों में बसी हुई हैं कुछ सपनीली आशें...

मुझ में तुम हो, तुम में मैं हूं, तन-मन रमे हुए हैं,
प्रेम सुधा बरसाती रहतीं अपनी दिन और रातें...


मिलन हमारा जब भी होता अधर मौन रह जाते,
नाजुक अधरों की चुप्पी भी कहतीं ढेरों बातें...

दर्श तुम्हारा पाकर मन में कई गुलाब खिल जाते,
फिर बहकी-बहकी बातें कहतीं मेरी दोनों आँखें...

जब से दूर गई हो प्रिय, सुध-बुध उजड़ गई है,
याद तुम्हारी सांझ सवेरे, अंखियों में बरसातें...

दर्पण मेरा रुप तुम्हारा यह कैसा जादू है,
जब भी सोचूं, तुमको सोचूं, हरदम तेरी यादें... --

अनिल आर्य