Tuesday, 31 July 2007

मीडिया का संकट

पत्रकारिता पर इधर ख़ूब लिखा जा रहा है. अविनाश भाई की सदारत वाला मोहल्ला इन दिनों मीडिया को ही लेकर हल्ले का केंद्र बन गया है. इस हल्ले की शुरुआत वैसे तो काफी पहले हो चुकी थी, पर इसे गति दीं दिलीप मंडल के एक पोस्ट ने. दिलीप ने इसमें मीडिया के अतीत का कच्चा चिटठा खोलते हुए कहना चाहा है कि आज दिखाई दे रही यह मूल्यहीनता कोई नई बात नहीं है और इसलिए युवा पत्रकारों को किसी हीनताग्रंथि का शिकार होने की जरूरत नहीं है. दूसरी बात यह कि मीडिया के इस पतितपने के पीछे कुछ मजबूरियां हैं उन्हें भी समझा जाना चाहिए. तीसरी बात यह कि मीडिया अगर इधर बिगडा है तो वह कई मायनों में बहुत कुछ सुधरा भी है और वह सुधर भी देखा जाना चाहिए. बस. मेरी समझ से उनका मंतव्य यहीं तक था. इसके बाद मोहल्ले में बहुत लोगों ने बहुत कुछ प्रतिक्रियाएँ कीं. मामला मोहल्ले से कस्बे तक पहुंच गया. आखिरकार टाउन एरिया चेयरमैन रवीश भाई को बोलना पड़ा. उनहोंने नए दौर को हिंदी पत्रकारिता का प्रश्न काल कहा और बताया कि मीडिया आज अपनी आलोचना के संदर्भ में जितनी अंतर्मुखी है उतनी कभी नहीं थी. यह बात सौ फीसदी सच है.
एक ऐसे दौर में जबकि इस लोकतंत्र के भ्रष्ट तंत्र में कोई पाया अपने गिरेबान में झांकने के लिए तैयार नहीं है, चौथा खम्बा तब भी बार-बार अपने ही आईने में खुद को बार-बार देख रहा है. आत्मनिरीक्षण कर रहा है. यह तथ्य ही काफी है यह साबित करने के लिए कि बाकी तंत्रों की तुलना में (तुलना के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले दर्ज कर लें कि तुलना से कुछ भी मुक्त नहीं है. यहाँ तक कि दार्शनिक सिद्धांतों की प्रासंगिकता आंकने के लिए भी कई समकालीन सिद्धांतों को एक तल पर रखा जाता है) यह आज भी बहुत नैतिक और मूल्यकेंद्रित है. बाहर-भीतर हजार तरह से लात-जूते खाकर और कुढ़ कर भी. चूंकि हम खुद बार-बार अपने गिरेबान में झांक रहे हैं, लिहाजा यह तय है कि हम पूरी तरह पतित कभी नहीं हो सकेंगे. और एक विरोधाभासी बात यह कि लगातार बिगड़ते हुए भी लगातार सुधरते रहेंगे. रही बात भूत-प्रेत-गड्ढे और गन्ने के खेत वाली पत्रकारिता की, तो उसके दिन अब बहुत दिन शेष नहीं हैं. आज जिस बाजार के इशारे पर मीडिया नाच रही है और जिसके लिए वह यह सब टोटके कर रही है, वह बाजार ही इसे मजबूर करेगा इस खाके से बाहर आने के लिए.
यह किन बातों का नतीजा हैं, इस पर फिर कभी. लेकिन एक बात हम भूल रहे हैं और वह है पत्रकारों पर बढ़ते खतरों की. दुनिया भर की बातों में खोए हम खुद को भूल चुके हैं. हम गड्ढे में गिरे प्रिंस की बात तो करते हैं लेकिन अपने कर्तव्य निर्वहन के दौरान सीआरपीएफ की लाठियों से लहूलुहान हुए निखिल और संजीव टोनी की बात नहीं करते. इन्हें केवल इसलिए लिटा-लिटा कर मारा गया कि इन्होने जबरिया मुफ़्त की शराब पी कर सड़क पर ग़दर काटते सीआरपीएफ जवानों की तसवीरें खींचने की कोशिश की. पंजाब के जालंधर शहर की इस घटना में फोटोग्राफर संजीव टोनी का कैमरा भी तोड़ दिया गया और मोटरसाइकिल भी चौपट कर दी गयी. वहाँ खडी पंजाब पुलिस और उनका एक एसपी तमाशबीन बने रहे.
इन प्रेसकर्मियों को बचाने सिर्फ आम जनता आयी और जाहिर है ऐसा उसने सिर्फ इसीलिए किया कि हम कहीं न कहीं उसके विश्वासों की रक्षा करते हैं. उसके हितों से जुडे हैं. इस अच्छी कोशिश का खमियाजा जालंधर के दो आम नौजवानों को भुगतना पड़ा. एक व्यक्ति की तो आँखें ही निकाल ली गईं. सीआरपीएफ के जांबाज जवानों ने इस महान काम को युवकों का अपहरण करके उन्हें एक थाने में ले जाकर अंजाम दिया. यानी पुलिस लगातार मूक दर्शक बनी रही और सीआरपीएफ अपनी ड्यूटी (?) बजाती रही.
मुझे हैरत हुई यह देखकर कि हमारी दिल्ली की मीडिया (केवल टीवी चैनल ही नहीं अखबारों तक) ने इस घटना को कोई खास तवज्जो नहीं दीं. अरे भाई कभी-कभी तो टीआरपी और सर्कुलेशन के प्रेत प्रभाव से मुक्त हो जाओ. और फिर यह मसला तो आम जनता से भी जुड़ा है. सवाल यह है कि अगर हम खुद अपने प्रति ही जिम्मेदार साबित न हो सके तो किसी और के प्रति हमारी जिम्मेदारी का मतलब ही क्या बचेगा? क्या आप यह उम्मीद करते हैं कि यह जिम्मेदारी कोई और निभाएगा? बताइए कौन से खंभे से उम्मीद है आपको?
यह घटना यह स्पष्ट करने के लिए काफी है कि पत्रकारिता आज भी तलवार की धर पर नंगे पैर चलने जैसा ही पेशा है. इस नट्गीरी का जो मेहनताना मिलता है वह भी किसी से छिपा नहीं है. यह तो आप सब जानते ही होंगे कि पूरे देश में पत्रकारों की स्थिति (आर्थिक मामलों में) दिल्ली - मुम्बई के टीवी चैनलों के सीनियर प्रोड्यूसरों जैसी नहीं है. यह आपके गर्व से फूल कर कुप्पा हो जाने वाली बात नहीं है. अपनी दुनिया की जमीनी सच्चाई से अगर आज आप वाकिफ न भी हों तो कल हो जाएंगे. इसलिए अब यह सोचना जरूरी हो गया है कि इन हालत में सच्ची कैसे जिंदा रहेगी? परिवार-अख़बार-सरकार-बाजार के चौतरफा दबावों के बीच पिस्ता एक पत्रकार सच कहने की जोखिम कितने दिन मोल ले सकेगा? क्या यह सोचना हमारा कर्तव्य नहीं है और क्या यह भी आत्मनिरीक्षण का एक सार्थक प्रयास नहीं होगा?
इष्ट देव सांकृत्यायन

Friday, 27 July 2007

सवाल है प्राथमिकताओं का

पिछले दिनों वरिष्ठ टीवी पत्रकार दिलीप मंडल ने एक लेख लिखा था "एड्स का अर्थशास्त्र और राजनीति". नवभारत टाइम्स के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित इस लेख को दिलीप जी की अनुमति से इयत्ता पर लिया गया था. लेख पढा गया और हमारे प्रबुद्ध ब्लोगरों ने अपनी प्रतिक्रियाएँ भी दर्ज कराईं. संजय मिश्रा और दर्द हिंदुस्तानी तो जमीनी हकीकत से वाकिफ होने के नाते दिलीप से सहमत थे, लेकिन इनमें एक प्रतिक्रिया रवि मिश्र की भी थी. रवि मिश्र ने अपनी यह प्रतिक्रिया अपने ब्लोग पर भी दी थी. दिलीप जी ने तुरंत उसका जवाब भी मुझे भेज दिया था. लेकिन मैं चाहता था कि रवि मिश्र की प्रतिक्रिया का हिंदी में अनुवाद कर उसे ब्लोग पर एक पोस्ट की ही तरह दिया जाए. इस बीच अन्यत्र व्यस्तताओं के कारण समय की कमी के नाते मैं यह कार्य नहीं कर सका था, पर अब यह सब इकट्ठे दे रहे हैं.
रवि मिश्र पेशे से चिकित्सक हैं. उनका आग्रह यह है कि एचआईवी/एड्स के नाम पर जो खर्च किया जा रहा है, उस पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए. हाँ, अगर उसका उपयोग सही तरीके से न हो रहा हो तो जरूर आपत्ति दर्ज कराएं. बेशक वह एक चिकित्सक के नजरिए से सही सोच रहे हो सकते हैं, लेकिन भारत जैसे जटिल स्थितियों वाले देश को केवल चिकित्सकीय नजरिए से समझना मुश्किल है. एक ऐसे देश में जहाँ आधे से ज्यादा आबादी पोषक तत्वों की कमी के कारण कुपोषण से ग्रस्त हो, वहाँ एक फीसदी आबादी का मोटापे से परेशान होना सरकार की परेशानी का सबब नहीं होना चाहिए. दिलीप का आग्रह एचआईवी/एड्स संबंधी अभियान रोकने का नहीं है, लेकिन यह जरूर है कि इस फेर में जिन बीमारियों की उपेक्षा की जा रही है वह भी कम त्रासद नहीं हैं और सरकार उन पर ध्यान दे. असली सवाल जमा-खर्च का नहीं, बल्कि गलत प्राथमिकताएँ तय करने का है.


रवि मिश्र की प्रतिक्रिया
मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ, इसलिए मैं इस बात पर कोई टिप्पणी नहीं करूंगा कि कौन क्या लाभ कमा रहा है.
लेकिन एक बाल रोग विशेषज्ञ होने के नाते मैं यह जानता हूँ कि ब्लड प्रेशर या टीबी की तुलना में एचआईवी एक खतरनाक बीमारी है. क्योंकि इसने कई देशों में कहर बरपाया है, लोगों के पीछे सिर्फ अनाथ छूटे हैं। हम भारत में वह स्थिति आने तक इंतज़ार नहीं कर सकते. हाँ, संख्या में कमी-बेसी हो सकती है, लेकिन वह अलग-अलग तरह की आबादी में किए गए अध्ययन के कारण है. पहले आए आंकडे हाई रिस्क ग्रुप से हैं. मसलन वेश्यालयकर्मियों के बीच इसका असर ज्यादा देखा गया. मौजूदा आंकडे जनसामान्य पर किए किए गए अध्ययन का नतीजा हैं. इसके लिए ज्यादा नमूने लिए गए हैं और संभव है कि यह वास्तविक स्थिति बयान कर रहा हो. हालांकि यह कोई संतोषजनक जवाब नहीं है, क्योंकि इस दिशा में कुछ ज्यादा किए जाने की जरूरत है.
क्यों?
इसका कारण शिक्षा और जागरूकता की कमी है और यह खुशफहमी है कि इसका असर आप तक नहीं पहुंच सकता है.
उदाहरण के लिए, बिहार में ७८ प्रतिशत जच्चगी घर पर ही होती है. और अफ़सोस की बात है कि ७८ प्रतिशत यही नहीं जानती हैं कि कंडोम एच आई वी/एड्स से बचाव का एक उपाय है. (राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण २००६, वही आंकड़ा जिसमें एच आई वी संक्रमण का प्रकोप घटा हुआ बताया गया है). इसी तरह युवा पुरुषों का एक बड़ा वर्ग मेहनत-मजदूरी करने और स्त्रियों का बड़ा वर्ग घरेलू नौकरानियों के तौर पर काम करने बाहर बडे शहरों में जाता है. इनमें कई अपने साथ एच आई वी लेकर वापस बिहार जाते हैं. अब ऐसे किसी व्यक्ति को अपने घर में बतौर नौकर या नौकरानी रखना कितना सुरक्षित समझेंगे, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि एच आई वी संक्रमण का असर वर्षों तक स्पष्ट नहीं दिखाई देता? विभिन्न राज्यों में ट्रक ड्राइवरों की स्थिति भी यही है.
यह भी दर्ज करें कि एच आई वी के संक्रमण का माध्यम केवल सेक्स ही नहीं है.
उनके बारे में सोचिए जिन्हे प्रसव, या किसी दुर्घटना के दौरान रक्त की जरूरत पडी और उन्हें किसी अस्पताल या निजी क्लिनिक में या किसी अनजान आदमी से खरीद कर एच आई वी संबंधी जांच किए बग़ैर ही ख़ून चढ़ा दिया गया. उस छोटे बच्चे के बारे में सोचिए जो किसी मैदान में खेल रहा हो और अचानक उसे किसी ड्रग एडिक्ट की इस्तेमाल की हुई सुई चुभ जाए. विवाह पूर्व यौन संबंधों के बारे में आप क्या सोचते हैं? (एनडीटीवी के अनुसार १८ वर्ष से कम उम्र के ४० प्रतिशत बच्चे यौन संबंध बना चुके होते हैं. इस आंकडे में अतिशयोक्ति हो सकती है, लेकिन टीवी, केबिल, मोबाइल और बोलीवुड की बदन उघाडू संस्कृति इसे बढावा तो दे रही है)
हाँ, हमें उस राशि को लेकर कोई अचम्भा नहीं होता जो अभिनेत्रियों को स्क्रीन पर शोबाजी के लिए दिया जाता है, लेकिन मुफ़्त उपचार पर कुछ लोगों को अफ़सोस है.
यह कारुणिक है.
टीबी और मलेरिया के बजाय पश्चिम एचआईवी और एड्स के लिए क्यों धन दे रहा है?
यह सही नहीं है. क्योंकि बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन टीबी और मलेरिया जैसी उपचारयोग्य बीमारियों के लिए दुनिया भर में बड़ी राशि खर्च कर रहा है. लेकिन इससे ज्यादा वे इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि अगर इस बीमारी को नहीं रोका गया तो यह दुनिया भर में फैल सकती है. और चूंकि एचआईवी/एड्स का कोई समुचित इलाज अभी तक नहीं संभव है इसलिए इससे बचने के उपायों की शिक्षा ही इससे लड़ने का एकमात्र उपाय है.
आंकडे कहते हैं कि किसी व्यक्ति के एचआईवी से संक्रमित होने की आशंका ३०० में से केवल १ के अनुपात में है. पर इससे क्या? उस व्यक्ति और उसके परिवार के लिए तो यह सौ प्रतिशत बर्बादी है.
मेरा ख़्याल है कि आपत्ति फंडिंग पर नहीं होनी चाहिए, बल्कि हमारी कोशिश यह होनी चाहिए कि इस फंड का समुचित उपयोग हो. इसका जहाँ-जिस रुप में प्रयोग हो रहा है वह जाहिर हो और इसके लिए हर स्तर पर सूचना के अधिकार का इस्तेमाल किया जाए. जरूरतमन्द शख्स को बाहर का रास्ता न दिखाएँ, उसे यह बताएं कि उसके लिए जांच और उपचार के केंद्र सक्रिय हैं और यह सब केवल कागज़ों में नहीं है. स्थानीय केंद्रों के कार्य के आंकडे आम जानता को उपलब्ध कराए जाएँ. अखबार अगर इस तरह मदद करें तो यह ज्यादा सही होगा बनिस्बत ध्यान दूसरी अप्रासंगिक जगह हटाने के.
ऐसा अकारण नहीं है. मैंने यह महसूस किया है कि एचआईवी-एड्स के संदर्भ में जानकारी उपलब्ध कराने के लिए हिंदी में एक अच्छी वेबसाईट भी नहीं है.
धन्यवाद
रवि मिश्र, एमडी, ऍफ़एएपी

http://hivcare.blogspot.कॉम


दिलीप मंडल का जवाब

डॉक्टर रवि मिश्रा,
लोगों की सेहत को लेकर आपकी चिंता जायज है और मैं इसकी कद्र करता हूं. लेकिन आपने अपने कमेंट में कहीं भी उन फैक्ट्स को गलत नहीं बताया, जिसके आधार पर मैं ये संदेह जता रहा हूं कि एड्स से लड़ाई के नाम पर एक साजिश रची गई है.
- आपने लिखा है कि बिल और मिलेंडा गेट्स फाउंडेशन सिर्फ एड्स के लिए एनजीओ को पैसे नहीं देता। टीबी और मलेरिया जैसी बीमारियों के लिए भी वो ढेर सारी रकम खर्च करता है. अगर ऐसा है तो कृपया बताएं कि वो रकम कितनी है? और भारत में अगर आप टीबी के इलाज के लिए एक एनजीओ खोलें तो क्या आपको इस फाउंडेशन से पैसे मिलेंगे?
- देश के सभी बड़े हॉस्पिटल ऑपरेशन से पहले सभी मरीजों की एचआईवी इनफेक्शन के लिए स्क्रीनिंग करते हैं. इस मुद्दे में दिलचस्पी रखने वालों को क्या आप बताएंगे कि इस स्क्रीनिंग में कितने पॉजीटिव केस सामने आते हैं। मैं दिल्ली के बड़े हॉस्पीटल्स के अपने मित्रों के अनुभव के आधार पर बता सकता हूं कि ऐसे मामले ना के बराबर आते हैं.
- और फिर सवाल ये भी नहीं है कि एड्स कितनी खतरनाक बीमारी है। मैं ये मुद्दा उठा रहा हूं कि एड्स से लड़ने के नाम पर देश का बढ़िया टेलेंट और बदलाव लाने में सक्षम युवाओं की ऊर्जा नष्ट हो रही है। खासकर लेफ्ट पॉलिटिक्स करने वाले युवाओं को एड्स वाले एनजीओ जिस तरह से अपने घेरे में ले रहे हैं, वो बात मुझे विचलित करती है.
-मुझे ये बात भी चिंतित करती है कि भारत जैसे गरीब देश में केंद्र सरकार हर साल एक हजार करोड़ रुपए ऐसी बीमारी पर खर्च कर रही है जिसे बेहद खतरनाक बताते हुए ये आंकड़ा दिया जा रहा है कि इससे 20 साल में साढ़े दस हजार लोगों की जान गई है। यानी हर साल 500 मौतें.
- और फिर सवाल हेल्थ सेक्टर में गलत प्रायोरिटी तय किए जाने का है. लेकिन ये गलत प्रायोरिटी सरकारी अफसरों, दवा कंपनियों, कुछ हेल्थ प्रोफेशनल्स, कुछ मीडिया प्रोफेशनल्स और एनजीओ के लिए फायदे का सौदा है.
-दिलीप मंडल

Monday, 23 July 2007

तुम नहीं हो दूर मुझ से

मन तुम्हारा जब भरे तब नयन मेरे भीग जाते ,
शूल चुभता जब तुम्हें तब पांव मेरे टीस पाते,
तुम नहीं हो दूर मुझ से मुझ में ही हो तुम समाये,
तुम हंसो जब खिलखिलाकर जन्म कई गीत जाते.
अनिल आर्य

बस कुछ नहीं

कहती हो हर बात में कि कुछ नहीं,
कुछ मन कहे पर होंठ कहते कुछ नहीं,
गुनगुनाती मन ही मन पर पूछ लूं तो,
कुछ नहीं, बस कुछ नहीं, बस कुछ नहीं।
अनिल आर्य

Sunday, 22 July 2007

कोर्स में सेक्स

शर्मा जी और सलाहू भाई को एक ही बेंच पर बैठे होने के बावजूद पिले पडे देख कर अपने कदम भी ठहर गए. सोच लिया कि वाक् तो रोज ही करते हैं, आज का दिन सिर्फ मोर्निंग पर ही संतोष कर लेते हैं. बहुत हुआ तो बाद में थोडा हाथ-पैर आगे-पीछे, ऊपर-नीचे कर लेंगे. मुल्ला जी से मुखातिब हुआ और पूछ ही पड़ा, 'क्या बात है भाई? बरसात तो अभी रात में ही हुई है, फिर क्यों दोनों लाल-पीले हुए जा रहे हो सुबह-सुबह?'
मालूम पड़ा शर्मा जी को एक टीनएजर जोडे की हरकतें नागवार गुजरीं हैं. 'हालांकि उनने इसके साथ कुछ भी नहीं किया. जो किया आपस में किया. पर ये सज्जन उन्हें डांट भी आए और उससे भी मन नहीं भरा तो अब यहाँ बैठ कर सरकार पर बिसूर रहे हैं.' यह सलाहू थे.
जोडे को डांट आए सो तो चलिए बात थोड़ी-बहुत समझ में आती है, पर अब सरकार पर बिसूर रहे हैं; शर्मा जी का यह स्टैंड मेरे भी समझ में नहीं आ रहा था. मान लीजिए अगर मुंडे-मुंडी ने कुछ किया भी हो उल्टा-सीधा तो इसमें सरकार कहॉ से आ गयी भाई. लेकिन नहीं साहब लोकतंत्र की यही तो मुसीबत है. बीवी ने दाल में नमक ज्यादा डाल दिया आफत सरकार की. बेटे ने दो-चार सौ रुपये फालतू मांग लिए आफत सरकार की. दूध वाले ने दाम अचानक पांच रुपये फी किलो बढ़ा दिए या रामबीर की भैंस आपके गमले में लगे फूल चर गयी, जीं आफत सरकार की. बेचारी सरकार की किसी भी तरह से खैर नहीं है. लेकिन शर्मा जी इस बात पर अड़े थे कि उनकी बात जिनुइन है, बशर्ते उसे समझा तो जाए. मैंने कहा, 'ठीक है भाई. माना मुल्ला समझने के लिए तैयार नहीं हैं, तो आप मुझे ही समझाइए.' 'अब देखो, जब आजकल के लड़के-लडकी ऐसे ही सिनेमा देख-देख कर इतने चंट हो गए हैं तो उन्हें और सेक्स एजुकेशन देने की क्या जरूरत है? पर सरकार उन्हें और बिगाड़ रही है सेक्स एजुकेशन देकर.' शर्मा जी बिल्कुल दार्शनिक मुद्रा में थे, 'क्या जरूरत है भाई स्कूलों में यह सब पढाने की?'
शर्मा जी की बात मुझे ठीक लगी. लिहाजा मैं सलाहू से ही मुखातिब हुआ, 'क्यों भाई सलाहू! माना कि अभी नहीं शुरू हुआ है, पर जब सरकार ने प्रस्ताव रख दिया है तो अब उसे तो शुरू करके ही मानेगी. आखिर सरकार तो सरकार है!'
'अरे मैं तो कहता हूँ कि अगर कल शुरू होनी हो तो आज शुरू हो जाए।' सलाहू बिल्कुल ताल ठोंकने वाले अंदाज में थे और उनकी यह उलटबांसी मेरे समझ में कहीँ से भी अंटने को तैयार नहीं थी। पूछ ही बैठा, 'क्यों भाई! इसके शुरू हो जाने से तुम्हे क्या फायदा है?' 'फ़ायदा है। केवल मुझे नहीं सारे माँ-बापों को फ़ायदा है।' सलाहू की यह मान्यता मुझे हैरत में डाल रही थी और वह कोई वजह बताए बग़ैर जारी थे. बिल्कुल वैसे ही जैसे लोक या विधान सभाओं में होनहार नेता सिर्फ अपनी बात कहने पर तुले होते हैं, दुसरे की कुछ भी सुने बग़ैर, 'मेरा तो मानना यह है कि सरकार को इसका इम्तहान भी लेना चाहिए।'
एकबारगी तो मुझे लगा कि कहीँ सलाहू का दिमाग तो नहीं फिर गया. मैं हक्का-बक्का सा एक टक ताकने लगा उनको. जैसे वोट दे चुके होने के बाद पब्लिक सरकार को ताकती है. 'ऐसे क्या ताक रहे हो भाई! कल मास्टर को सुना था क्या कह रहा था?'
मास्टर ने अभी हाल ही में एक इक्ज़ाम दिया है, संस्कृत में एमए का. बता रहे थे कि मेघदूत और वासवदत्ता में स्त्रियों के सौंदर्य और कामक्रीडा का जैसा वर्णन है, वैसा कर पाना तो आजकल के फिल्म प्रोड्यूसरों और फिल्मी गीतकारों के भी बस की बात नहीं है. अगर उसे सिर्फ पढना-पढना हो तो इतना मजा आए कि पूछो नहीं. 'तो फिर पढो, तुम्हे रोका किसने है?' सलाहू ने ही पूछा था, 'पढो जीं भर के'.
'अरे तुम्हारी परीक्षा व्यवस्था ने भाई और क्लासकोर्स ने। दूसरा कौन रोकेगा?' मास्टर आगे पूछे बग़ैर ही बोले जा रहा था, 'इन दो चीजों ने मिलकर हर चीज को इतना उबाऊ बना रखा है कि कालिदास से लेकर बिहारी तक सभी असह्य लगने लगते हैं. अच्छी-भली कविता कोर्स में आते ही पीड़ाहारी बाम का विज्ञापन लगने लगती है, जो सिरदर्द ठीक करने के नाम पर और बढ़ाने लगता है.'
मुझे याद आए वो दिन जब मैं खुद पढाई किया करता था. पढने-लिखने में तब मन बिल्कुल नहीं लगता था. इतिहास और भूगोल की किताबें तो कटाने दौड़ती थीं. सूर-कबीर-निराला तब बोझ लगते थे, क्योंकि इनकी जीवनी रटनी पडती थी. मेरा मन तो खैर कविता के कीटाड़ुओं से बचपन में ही संक्रमित हो गया था, लिहाजा मैंने कभी कवियों को गालियाँ नहीं दीं. लेकिन मुझे आज भी बखूबी याद है मेरे कई श्रद्धालु साथी जीं भर गलियां दिया करते थे कवियों-लेखकों को. वजह फकत इतनी थी कि उन्होने लिखा हमें पढना पड़ा. बात यहीं तक होती तो भी ठीक था. मुसीबत यह कि अब इनकी जीवनी भी रटनी पड़ती है. अरे वे कब पैदा हुए और कब मर गए, या उनके बाप या माँ के नाम क्या थे, इससे हमें क्या भाई. लेकिन नहीं साहब रटना पड़ता था. लिहाजा गली भी देनी ही पडती थी. अब सोचिए अगर उन्होने न लिखा होता तो क्या घट जाता! कम से कम हमें ये मुसीबत तो न झेलनी पडती. तब मैं सोचता था कि अगर कहीँ मेरा लिखना चल गया और हम क्लास में पढाए जाने लगे और बच्चों को हमारी जीवनी रटनी पडी तो ऎसी ही गालियाँ ............

ये अलग बात है कि बाद में हमने खुद रूचि ले-लेकर कई लेखकों-कवियों की जीवनियाँ ढूँढ -ढूँढ कर खुद रूचि लेकर पढी. यहाँ तक सलाहू ने भी. यही नहीं बाबर से लेकर औरंगजेब, समुद्रगुप्त से लेकर अशोक और अरुणाचल से लेकर अफ्रीका तक सब कुछ जाना और जानने में मजा भी आया. लेकिन तब नहीं आता था. क्यों? क्योंकि साहब हमारे यहाँ क्लास वाली किताबें बनाते समय इस बात का पूरा ख़याल रखा जाता है कि कहीँ बच्चों की इनमें रूचि न जग जाए. अगर फिर भी बच्चों ने पढने की बेवकूफी कर दी तो मास्टर ऐसे रख दिए जाएँगे जो पढाने के नाम पर अपनी फालतू बकवास से उनकी सारी रूचि निकाल दें. बकौल मास्टर सरकार ने ऎसी व्यवस्था इसलिए बना रखी है ताकी बच्चों का मन एक ही क्लास में न लगा रहे और हर साल नई क्लास में जाते रहें. जरा सोचिए, अगर क्लास वाली किताबें अच्छी यानी पढने लायक हो गईं तो ऐसा हो सकेगा क्या?
पर नहीं साहब कुछ बेवकूफ होते हैं जिन्हे लगता है कि पढ़-लिख कर वो नवाब बन जाएंगे. पढने-लिखने के नतीजे साल दर साल देखते रहने के बावजूद वो पढ़ते रहते हैं. वही लोग बाद में मास्टर या पत्रकार टाइप के कुछ हो जाते हैं और पूरी उम्र झेलते व झेलाते रहते हैं. तो उनका मन भी पढाई नमें न लगाने पाए, इसीलिए हमारे देश में परीक्षाओं की व्यवस्था की गयी है और उनका जबर्दस्त फोबिया बनाया गया है. ताकि अगर गलती से भी किसी का लगे तो उसे इक्जाम के नाम पर उबाया जा सके. उसका मन पढाई के बजाय परीक्षा की तैयारी में ही लगा रहे.
'अब बताओ, क्या अब भी तुम्हे लगता है कि कोर्स में शामिल किए जाने के बाद भी लड़के-लड़कियों की कोई रूचि सेक्स में बचती तुम्हें दिखती है?' सलाहू अब सलाह देने के मूड में आ गए थे, 'अरे मेरी मनो तो भई इसे लगा ही दिया जाना चाहिए कोर्स में. इसके लगते ही कई समस्याएँ हल हो जाएंगी. छेड़छाड़ से लेकर आबादी की तेज बढत तक.'
अब मैं सोच नहीं पा रहा हूँ कि मुझे किधर खङा होना चाहिए था. आप ही बताइए अगर कहीँ मेरी जगह आप ही होते तो क्या फैसला लेते? किधर खडे होते?
इष्ट देव सांकृत्यायन

Thursday, 19 July 2007

एड्स का अर्थशास्त्र और राजनीति

एड्स कोई बीमारी नहीं है. बल्कि यह सिर्फ एक स्थिति है. एक ऎसी स्थिति जिसमें शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है. यह संक्रामक है और फैलता है शरीर के कुछ खास द्रवों के माध्यम से. यह बात आज देश का बच्चा जानता है. इसी साल जून तक बताया जाता रहा है कि हमारे देश के हर सौ में एक आदमी एचआईवी पोजिटिव है. इस बात पर भरोसा करें तो हमारे आसपास ऐसे लोगों की भीड़ होनी चाहिए, जो नहीं है. फिर भी संयम में विश्वास और उस पर अमल करने वाले देश के नागरिकों को हर चौराहे पर बोर्ड लगाकर बताया जा रहा है कि वह चलें कंडोम के साथ. यानी स्वयं अपने चरित्र-अपने ईमान पर भरोसा करना छोड़ दें. गोया पूरा देश राजनेता हो गया हो. आखिर ऐसा क्यों किया जा रहा है? मलेरिया, डायरिया, टीबी, कैंसर, एनीमिया जैसी बीमारियों के बजाय एड्स पर हम अरबों रुपये की रकम हर साल फूंक रहे हैं. आख़िर क्यों? इस सवाल का जवाब तलाश रहे हैं टीवी पत्रकार दिलीप मंडल. उनका यह लेख आज ही नवभारत टाइम्स में छपा है. इयत्ता में उसे यथावत लिया जा रहा है दिलीप जी की अनुमति से.

एड्स और एचआईवी इनफेक्शन अजीब बीमारी है. इसके बीमार आपको शायद ही कहीं नजर आएंगे, लेकिन इससे लड़ने की कोशिश आपको हर जगह दिखेगी. कहीं सरकारी एजेंसियां पोस्टर बांट रही हैं, तो कहीं एनजीओ नुक्कड़ नाटक खेल रहे हैं तो कहीं कंडोम बांटने की मशीनें लगाई जा रही हैं तो कोई रेड लाइट एरिया में पर्चे बांट रहा है. इस कोशिश का असर ये है कि देश का बच्चा-बच्चा इस बीमारी का नाम जानता है, और ये बता सकता है कि ये एक जानलेवा बीमारी है. ये बात हमें इतनी बार और इतने तरीके से बताई जा रही है कि इससे अनजान रहना संभव ही नहीं है.
और ऐसी ही खतरनाक बीमारी से संक्रमित लोगों की संख्या एक साल में आधी से कम रह गई. इस साल जून महीने तक सरकार से लेकर एनजीओ तक हमें ये बताते रहे कि देश के हर सौ में एक आदमी एचआईवी पॉजिटिव है. अब देश के स्वास्थ्य मंत्री अम्बुमणि रामदॉस कह रहे हैं कि देश के 300 में से एक आदमी ही एचआईवी पॉजीटिव है. आंकड़ों के इस खेल का देश के ज्यादातर लोगों के लिए कोई मतलब नहीं है क्योंकि हम और आप अपने अनुभव से जानते हैं कि हमारे आस पास लोग कैंसर , टीबी, दिल के दौरे जैसी बीमारियों से मरते हैं, एड्स या एचआईवी इनफेक्शन से नहीं। लेकिन इन आंकड़ों से देश के कुछ हेल्थ प्रोफेशनल्स और एड्स पर काम करने वाले सारे एनजीओ एक सुर में हाय तौबा मचा रहे हैं. हंगामा ऐसा , मानों एचआईवी पॉजिटिव लोगों का आंकड़ा कम बताए जाने से आसमान फट पड़ेगा.
वैसे आसमान फटने की उनकी आशंका बेबुनियाद नहीं है. देश-विदेश की दवा कंपनियों से लेकर हजारों एनजीओ और स्वास्थ्य मंत्रालय में बैठे अधिकारियों के लिए ये एक शानदार रोजगार या फिर कहें व्यवसाय है. आखिर ये कोई ऐसी-वैसी बीमारी नहीं है. इस पर केंद्र सरकार हर साल एक हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करती है. राज्य सरकारों का खर्च इससे अलग है. विदेशी फंडिंग एजेंसियों से सैकड़ों करोड़ रुपए इसके अलावा आ रहे हैं.
लेकिन ये रुपए आखिर आ क्यों रहे हैं? आखिर हर देसी-विदेशी एजेंसी इतनी दरियादिल क्यों बनी हुई है? इसके लिए ये जानना जरूरी है कि क्या ये बीमारी दरअसल उतनी खतरनाक है, जितना कि हल्ला मचा हुआ है. अगर आपकी जानकारी में - आपके मोहल्ले में, या आपके परिचित लोगो में दो-चार लोग भी इस बीमारी से मरे हैं, तो इस बारे में शक करने का कोई कारण नहीं है. अगर ऐसा नहीं है तो इस बात पर हम सबकों सवाल उठाना चाहिए कि सरकार जिस बीमारी पर हजारों करोड़ रुपए खर्च कर रही है, उसकी वजह क्या है.
सरकार कहती तो ये है कि एड्स खतरनाक बीमारी है. लेकिन सरकार के अपने आंकड़े इससे उल्टी तस्वीर पेश करते हैं. इस सिलसिले में आप 22 नवंबर 2006 को हुई लोकसभा की कार्रवाई के अंश लोकसभा की साइट पर देख सकते हैं. इस रोज एक सवाल के जवाब में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री अंबुमनि रामदॉस ने बताया कि 1986 से लेकर अब तक देश में 10, 170 लोगों की मौत एड्स से हुई है. यानी हर साल लगभग 500 लोग एड्स से मरे हैं. जबकि देश में हर साल साढ़े तीन लाख से ज्यादा लोग टीबी का इलाज न हो पाने की वजह से दम तोड़ देते हैं। कैंसर से भी हर साल लगभग इतनी ही मौतें होती हैं. एड्स से मौत का जो आंकड़ा सरकार पेश कर रही है, उसमें साल दर साल कोई बढ़ोतरी नहीं हो रही है. लेकिन 2005-2006 के आंकड़ो को देखें तो सरकार ने एक साल में एड्स नियंत्रण पर 533 करोड़ रुपए खर्च किए, जबकि टीबी नियंत्रण पर 186 करोड़ और कैंसर नियंत्रण पर सिर्फ 69 करोड़ रुपए खर्च किए गए। एड्स नियंत्रण का एक साल का सिर्फ केंद्र सरकार का खर्च एक हजार करोड़ रुपए को पार कर चुका है.
आखिर इस पहली का राज क्या है? स्वास्थ्य क्षेत्र की ऐसी गुत्थी है, जिसका हम सबसे वास्ता है. इसके दो संभावित जवाब हो सकते हैं. या तो सरकार सचमुच समझती है कि एड्स एक गंभीर समस्या है और स्वास्थ्य बजट का सबसे बड़ा हिस्सा खर्च करना चाहिए। या फिर ये किसी षड्यंत्र का नतीजा है, जिसमें सरकार जाने या अनजाने में हिस्सा बन गई है. एड्स और एचआईवी को लेकर दुनिया भर में जो बहस चल रही है, उसमें एक आरोप लगता रहा है कि ये दवा कंपनियों का खेल है. इस बीमारी के फर्स्ट लाइन ट्रीटमेंट पर हर महीने 60 रुपए का खर्च आता है जबकि सेकेंड लाइन ट्रीटमेंट पर हर महीने 8,000 रुपए खर्च होते हैं. एड्स नियंत्रण के तीसरे चरण पर भारत सरकार 6806 करोड़ रुपए खर्च करेगी जिसका 17 फीसदी इलाज पर खर्च होगा. इस पैसे का बड़ा हिस्सा दवा कंपनियों के पास पहुंचेगा.
लेकिन इस रकम का बाकी हिस्सा लोगों में एड्स को लेकर जागरूकता बढ़ाने और बीमारी के नियंत्रण जैसे कामो पर खर्च होगा. इस काम में सरकार की मदद करेंगे देश के हजारों एनजीओ. दरअसल एड्स नियंत्रण के पूरे जंजाल में एनजीओ की भूमिका बेहद रोचक है. 23 अगस्त 2006 को लोकसभा में दिए गए जवाब में स्वास्थ्य मंत्री ने बताया कि 2005-2006 में सरकार ने 103 करोड़ रुपए एनजीओ को दिए. ये रकम वर्ल्ड बैंक, डीएफआईडी और यूएसएड से जुटाई गई. इसके अलावा बिल और मिलेंडा गेट्स फाउंडेशन ने 180 करोड़ रुपए एनजीओ को दिए. दूसरी अंतरराष्ट्रीय एजेसियों ने भी इसके अलावा 150 करोड़ रुपए से ज्यादा रकम एजीओ को दी. इस रकम का एक मामूली हिस्सा भी अगर गर्भवती महिलाओं को आयरन टेबलेट देने पर खर्च किया जाए तो हर साल कई लाख गर्भवती महिलाओं की मौत टाली जा सकती है. एड्स नियंत्रण में जुटी एनजीओ को मदद पहुंचाने में अंतरराष्ट्रीय एजेसिंयों के उत्साह का कारण समझ पाना मुश्किल है.
वैसे कई बुद्धिजीवी अरसे से ये कह रहे हैं कि दुनिया भर में एनजीओ तंत्र को बनाने और बढ़ाने के पीछे एक बड़ा षड्यंत्र है. इस बारे में कई रिपोर्ट और किताबें आ चुकी हैं. खासकर दक्षिण अमेरिका में एनजीओ की भूमिका पर काफी शोध हुआ है. भारतीय संदर्भ में एनजीओ में जुड़े लोगों की पृष्ठभूमि को देखें तो उसमें वामपंथी और समाजवादी पृष्ठभूमि के लोग ज्यादा हैं. कुछ लोग स्वदेशी आंदोलन वाले भी हैं. ऐसा ही लैटिन अमेरिका में भी हुआ है. लैटिन अमेरिका में ये आरोप लगते रहे हैं कि जो भी लोग बदलाव की बात करते हैं उनका नेतृत्त्व करने वालों के एक हिस्से को एनजीओ के दायरे में समेट लेने की कोशिश हो रही है, ताकि बदलाव की ताकतें कमजोर हों. क्या भारत में भी यही हो रहा है? ये सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि अगर विदेशी एजेसिंयों की दिलचस्पी भारतीय नागरिकों की सेहत में होती तो ज्यादा रकम टीबी, कैंसर, मलेरिया और डायरिया कंट्रोल के लिए आती. इन बीमारियों के नाम पर एक एनजीओ बनाकर आप सरकार या विदेशी एजेंसियों से मदद लेने की कोशिश करें तो आपके लिए कोई भी अपनी थैली नहीं खोलेगा. लेकिन एड्स और एचआईवी के लिए पैसा देने को सरकार भी तैयार है और विदेशी एजेंसियां भी. बदलाव का हथियार बनने की क्षमता रखने वाले युवा दीवारों पर एड्स की जागरूकता के पोस्टर चिपकाएं, पर्चे बांटे, नुक्कड़ नाटक करें और कंडोम बांटे, ये हमारी सरकार को भी बुरा नहीं लग रहा होगा.

-दिलीप मंडल

संदर्भ :
INFO:
LOK SABHA
the second line treatment for HIV/AIDS costs nearly Rs. 8,000/- per patient per month as compared to first line treatment which costs Rs. 650/- per patient per month.

LOK SABHAUNSTARRED QUESTION NO 1205TO BE ANSWERED ON 07.03.2007

(d) The core strategy of National AIDS Control Programme continues to be prevention. IEC campaigns through mass media and inter personnel channels are being used with a special focus on youth for propagating abstinence and delay of sexual debut, being faithful to their partner and correct & consistent condom use. The focus is also on the life skill development among youth to protect themselves.
Yes, Sir. In order to control the spread of HIV/AIDS in the country, NACO is focusing on up-scaling the targeted intervention approach among high risk population groups, mass awareness for behavior change particularly among youth and women groups, expanding care, support and treatment to needy patients including the opportunistic infection management and provision of free antiretroviral drugs and mainstreaming the HIV intervention strategies. Rs. 6806 crore has been budgeted for implementing the programme with 75% for prevention, 17% for treatment and the rest for training, capacity building, monitoring and evaluation.
Prime focus is on strengthening condom access by increasing the number of outlets selling condoms to 30 lakhs, an increase from 6 lakhs at present.

UNSTARRED QUESTION NO 3050TO BE ANSWERED ON 23.08.2006
Under the National AIDS Control Programme, financial support of Rs. 103.99 crore was provided to the NGOs during the financial year 2005-06. These funds are mobilized from World Bank, DFID and USAID as detailed below:
Donor Agency
Amount (Rupees in Crore)
NACO 33.63(World Bank support)
DFID41.36
USAID 29.00
Total 103.99
In addition, as per information available with NACO, an amount of Rs.180.01 crore was released to NGOs directly by Bill and Melinda Gates Foundation, Rs. 126.18 crore by DFID, approx. Rs.13.95 crore by USAID and approx. Rs.12.59 crore by CDC, Atlanta.

Wednesday, 18 July 2007

चुलबुली यादें

हम और बिरना खेलें एक संग मैया, पढ़ें इक संग, बिरना कलेवा मैया ख़ुशी -ख़ुशी दीनों, हमरा कलेवा मैया दीयो रिसियाए . मुझे याद है कन्या भ्रूण की सुरक्षा हेतु और बालक-बालिकाओं को सम।नता का दर्जा देने के लिए उन दिनों दूरदर्शन पर इक बड़ा ही प्यारा विज्ञापन आता था. जिसके जरिये पूरा संदेश भी था और वो इस क़दर मन में बसा जो हूबहू मुझे आज तक याद है. तब शायद चैनलों की बाढ़ नहीं आयी थी. तभी तो अश्लीता की गुंजाइशें भी नहीं होती थीं. खैर अब तमाम चैनलों के चलते दूरदर्शन का एंटीना कहीं कुचल गया. क्योंकि इसको लगा डाला तो लाइफ झींगालाला. इतने चैनलों को देखने के लिए बस बटन दबाते रहो, कुछ दिखे तो वहीं रोक दो वरना आगे बढ जाओ. खैर इसमें बढने की कोई कोशिश नहीं करनी होती क्योंकि इसमें एक के साथ एक फ्री जो मिल जाता है. हम वापस पुराने विज्ञापनों की बात करें तो एक और याद आ रहा है हॉकिंस की सीटी बजी खुशबू ही खुशबू उड़ी......... उस वकत सौम्यता का जामा पहने ऐसे न जाने कितने विज्ञापन होंगे. आपको शायद याद हो एक छोटी सी डाँक्युमेंटरी फिल्म आती थी बच्चों के लिए प्रायोजित कार्यक्रम था " सूरज एक चन्दा एक, एक-एक करके तारे भये अनेक, एक तितली, अनेक तितलियाँ, देखो देखो एक गिलहरी पीछे- पीछे अनेक गिलहरियाँ" इतने सुन्दर अक्षरो से बना यह गीत बच्चों को बेहद खूबसूरत तरीके से एक और अनेक में भेद करना सिखा गया था. ऐसा नही है कि अब मेहनत नहीं की जाती, पर उस मेहनत का उद्देश्य सबकी समझ से बाहर होता है. दरअसल अब ऐसी डाँक्युमेंटरी फ़िल्में बनती ही नहीं. डिजनी के मिकी मूस और बिल्लियों से ही फुरसत नही मिलती. पहले और अब में फ़र्क इतना है कि पहले इन्सान के बच्चों को शिक्षा देने के लिए इन्सान का ही प्रयोग होता था, उसी की तस्वीरों के ज़रिये सन्देश देने का प्रयास होता था लेकिन अब इन्सान के बच्चों को समझाने के लिए डिजनी के चूहे-बिलौटों का इस्तेमाल होता है. तब भी आज के बच्चों को जल्दी समझ में नहीं आता. बहुत पहले बच्चों की एक फिल्म दूरदर्शन पर कई बार आती थी जिसमे गरीबी के कारण छोटे भाई-बहन को जब भूख लगती है तो वो गाना गाते थे " सोनी बहना खाना दो पेट में चूहे कूद रहें है, ची-ची बोल रहें है, सोनी बहना खाना दो ...... फिर दूरदर्शन पर सईँ परांजपे का धारावाहिक अड़ोस -पड़ोस आया. फिर अमोल पालेकर का धारावाहिक आया " कच्ची धूप" जिसने भी अपने समय मे इसे देखा होगा कि बिना किसी अश्लीलता के यह तीन बहनों की कहानी जिसका टाइटल सांग था - " कच्ची धूप अच्छी धूप, मीठी और चुलबुली धूप, जिन्दगी के आंगन मे उम्र की दहलीज़ पर आ खडी होती है इक बार. इस तरह की हमारी पसंद को विराम लगा '' जंगल की कहानी मोंगली पर'' जिसमें चढ्ढी पहन कर फूल खिला है फूल खिला है, काफी प्रचलित हुआ. शायद मैं आपको कई साल पीछे ले जाने में थोडा सफल हो सकूं. लेकिन मैंने सभी कार्यक्रमों का ज़िक्र नही किया वोः आपके लिए छोड़ दिया। ताकि आप भी दरिया में डुबकी लगाए और हम पर भी गंगाजल छिडके.
इला श्रीवास्तव

Monday, 16 July 2007

प्रधानमंत्री का लतीफा

सुबह-सुबह अख़बार के पहले ही पन्ने पर एक जोरदार लतीफा पढ़ कर तबीयत हरी हो गई. लतीफा पढने से भी ज्यादा ख़ुशी यह जान कर हुई कि हमेशा गम्भीर से दिखने वाले अपने अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री इतना बढ़िया मजाक भी कर लेते हैं. मैं शर्तिया कह सकता हूँ कि कई लोगों ने तो उनके लतीफे को भी सच्ची बात समझ लिया होगा. निश्चित रुप से वे उनकी इस बात के प्रति उतने ही गम्भीर भी हुए होंगे जितने कि उनके प्रधानमंत्री होने के प्रति. खास तौर से वे लोग जिनका लिखने-पढने से कुछ संबंध है और उनमें भी वे जो हिंदी में लिखते हैं, तो इतने गम्भीर हुए होंगे कि पूछिए मत. औरों को क्या कहूं, मैं खुद ही थोड़ी देर के लिए संशय में फंस गया. तय ही नहीं कर प रहा था कि इसे क्या मानूं. 'ख्वाब है तू या कोई हकीकत ....' टाइप का मामला हो गया था.
बड़ी देर तक गहरे संशय में फंसा रहा मैं कि आखिर इसे मानूं क्या? भीतर बैठा लेखक मन बार-बार कह रहा था, मान लो भाई, सच ही कहा जा रहा है. दूसरा दुनियादार मन कहता, बेवकूफ हो क्या? पागल हो गए हो? इतना तो प्री नर्सरी का बच्चा भी जानता है कि ऎसी बातें सच हो ही नहीं सकतीं. कुछ बातें होती हैं ऐसे ही कुछ खास अवसरों पर कहने के लिए, सो कह दी जाती हैं. यही नहीं, कुछ अवसर भी ऐसे ही बनाए जाते हैं कुछ खास बातें कहने के लिए. जब बडे लोग एक जगह रहते-रहते या एक तरह की बात करते-करते ऊब जाते हैं तो ऐसे ही कुछ सभा-सम्मेलनों का इंतजाम बनाते हैं. इसी बहाने वे घूम भी आते हैं और कुछ अच्छी बातें भी कर लेते हैं.इनके साथ-साथ कुछ मीडिया वाले भी चले जाते हैं. उनका भी घूमना-लिखना दोनों साथ-साथ हो जाता है. इसलिए हे वत्स, लालच छोड़ और सच्चाई को स्वीकार कर!
'सच्चाई है क्या भाई इसकी और मैं कौन से लालच में हूँ भला? किस बात का लालच मुझे छोड़ना है?'
मेरा यह बचकाना सवाल सुन कर यथार्थवादी मन जोर से ठठा कर हंसा. जैसे किसी जमाने में अमरीश पुरी हंसा करते थे. 'तुम हिंदी लेखकों के साथ यही दिक्कत है. जो बात जानते हो उसमें अनजान बनते हो और जो बिल्कुल नहीं जानते उसी विषय के मर्मज्ञ बनते हो. जो मानते हो उसका विरोध करते हो और जिस बात में रत्ती भर भी भरोसा नहीं होता उसी में विश्वास जताते हो.'
उसका लेक्चर सुन कर मेरी अच्कचाहट और बढ गयी थी. मैंने कहा, 'भाई तू तो जानता ही है. अमीर खुसरो को मैंने ज्यादा नहीं पढा है. बुझौवल मत बुझाओ मुझे. साफ-साफ बात कह दो.'
'अरे मूर्ख!' वह गरजा, 'बहुत बनता है तू अपने आपको मजाक करने और समझने वाला. क्या खाक समझते हो तुम मजाक? प्रधानमंत्री का एक छोटा सा मजाक भी नहीं समझ सका तू?'
'क्या मजाक?'
'हाँ, मजाक!'
'क्या मजाक करते हो यार! मजाक क्या पहले पन्ने पर छपा जाता है?'
'अरे प्रधानमंत्री का फिसलना, हिलना-डुलना, छींकना तक अगर पहले पन्ने की खबर बन सकती है तो उसका मजाक पहले पन्ने की खबर क्यों नहीं बन सकता भाई?'
मेरे दिमाग की बत्ती अब जल गयी थी. लिहाजा मैं उसे भकुआ कर ताकने लगा. बिल्कुल ऐसे जैसे कोई गाँव का नौजवान ताकता है किसी महानगरीय आधुनिका को. मुझे इस तरह ताकते देख मन ने अपना ज्ञान थोडा और बघारा, 'प्रधानमंत्री तो फिर भी प्रधानमंत्री है बच्चू, चाहे डमी ही क्यों न हो. तुम लोग तो नचनिए के लौंडे की शादी की खबर भी साल भर पहले पन्ने पर छापते रह सकते हो.'
अपनी बिरादरी की ऎसी कड़वी आलोचना सुन कर मुझे बुरा तो जरुर लगा, लेकिन चूंकि बात वह सही कह रहा था लिहाजा मुझसे कुछ खास कहते न बना. बड़ी मुश्किल से बस इतना कह पाया, 'अच्छा-अच्छा चलो, बस करो अब!'
'अरे बस क्यों करूं भाई? कहो तो तुम्हारे लालच के बारे में भी बता दूं?'
अब मेरा लालच तो कुछ था नहीं, तो मैं क्यों डरता! लिहाजा मैंने ताल ठोंकने के से अंदाज में कहा, 'हाँ-हाँ, जरा बता दो तो क्या लालच है मुझे.'
'अरे वही जो सरे हिंदी वालों को हुआ करती है. हिंदी अगर संयुक्त राष्ट्र की भाषा बन गयी तो भैया हो सकता है तुमको भी विदेश मंत्रालय के खर्चे पर एकाध विदेशयात्रा का मौका मिल जाए. कोई पीठ-वीठ किसी यूनिवर्सिटी में नई बने तो क्या पता उसकी अध्यक्षी ही तुमको मिल जाए. नई तो कोई फेलोशिप ही मिल जाएगी. हिंदी को अगर संयुक्त राष्ट्र में जगह मिल गयी तो जाहिर है दो-चार पुरस्कार-सम्मान भी बढी जाएँगे. इसमें कहीँ न कहीँ तो तुम्हरो नाम शामिल होई जाएगा बाबू.'
'अच्छा-अच्छा चल अब रहने दे' अपनी खाल कोई बिल्कुल उतरते तो देख नहीं सकता. लिहाजा मैंने जल्दी से उससे पिंड छुडाया. हालांकि मामले की असलियत अब मेरे सामने फिल्मी हीरोइनों की तरह बिल्कुल खुल कर आ गयी थी. मामला समझ में आते ही जैसा कि लतीफों के मामले में हमारे देश में रिवाज है, मैं जोर से हंसा.
अब शादी के तेरह साल बाद भी कोई आदमी खुल कर हंसने की कूवत रखता हो, तो यह बात हैरतअंगेज तो लगती ही है. खास तौर से ऐसे समय में जबकि आटे से लेकर कीटनाशकों तक के दाम आसमान छू रहे हों, तब तो यह तथाकथित विश्व सुंदरियों के सौंदर्य से भी ज्यादा कृत्रिम लगने लगता है. बीवियां जानती हैं कि ऐसा सिर्फ दो ही स्थितियों में हो सकता है. एक तो यह कि आदमी का दिमाग चल गया हो और दूसरा यह कि उसका चरित्र भारतीय राजनेताओं की तरह संदिग्ध हो गया हो. वर्ना तो आदमी के ब्लू लाईन बसों की तरह बहकने की कोई दूसरी वजह नहीं हो सकती. लिहाजा मेरी जोर की हँसी सुनते ही श्रीमती जी किचेन छोड़ कमरे में नमूदार हुईं. ताका तो उन्होने मुझे ऐसे जैसे सरकारी अस्पताल का डाक्टर ताकता है किसी सोर्सविहीन मरीज को.
'क्या हुआ, क्यों हंसने लगे इस तरह?'
'अरे कुछ नहीं, बस अख़बार में एक चुटकुला पढ़ लिया था.'
'तो इसमें ऎसी क्या बात हो गयी? क्या पहली बार चुटकुला पढ़ रहे हो?'
'नहीं-नहीं, यह बात नहीं है.'
'फिर क्या बात है?'
'असल बात ये है कि ये चुटकुला पहले पन्ने पर छपा है.'
'कौन सा चुटकुला है, जरा मैं भी तो देखूं' श्रीमती जी ने भी अपनी आंख अख़बार पर गडा दी.

मैंने खबर दिखाई - हिंदी को संयक्त राष्ट्र की भाषा बनाएँगे : प्रधानमंत्री. मैंने कहा देखिए जी. ये रही.
'हुंह' उन्होने बिल्कुल ४४० वोल्ट का झटका मारा. 'ये तुम्हे लतीफा दिखता है?'
'तो' मैंने पूछा, 'खबर के पन्ने पे क्या समझाती हो सब खबर ही छपती है. जरा तार्किक ढंग से सोच के देखो. कल शर्मा जी के बेटे के बारे में क्या बता रही थी?
अभी कल ही उन्होने बताया था. पड़ोस के शर्मा जी के मुन्ने के स्कूल में हिंदी बोलने पर रोक लग गयी है. अगर किसी बच्चे ने गलती से बोल दिया तो उसे एक शब्द पर पांच रुपये जुर्माना भरना पड़ेगा. इसी बात को लेकर वह मुझे हडकाए जा रही थीं कि एक तुमने अपने बच्चों का एडमिशन करवाया है. जहाँ आपस में तो बच्चे पूरे दिन हिंदी ही बोलते रहते हैं. यहाँ तक कि मैडमों से भी कई बार हिंदी में बात कर लेते हैं. ऐसे स्कूल में बच्चों का भविष्य क्या खाक बनेगा? वो तो भला हो अपनी औकात का जिसकी दुहाई देकर मैंने जैसे-तैसे श्रीमती जी के कोप से अपनी जान बचाई. और अब आज सुबह-सुबह प्रधानमंत्री का ऐसा बयान! मामले की असलियत जैसे ही श्रीमती जी की समझ में आई, उनकी भी हँसी फूट पडी. अब हम दोनों हंस रहे थे. खुल कर और बेधड़क, आख़िर प्रधानमंत्री ने लतीफा सुनाया था. यह राष्ट्रीय तमीज का विषय है कि उनके लतीफों पर खुल कर हंसा जाए, चाहे वो लाफ्टर चलेंज में सुनाए जाने वाले लतीफों से भी घटिया क्यों न हों. हम लोग हंस रहे हैं - हे-हेह-हे-हे-हे....
आइए हमारी हे-हे में आप भी अपनी हे-हे मिलाइए. हमारे साथ मिलकर आप भी खुल कर हंसिये. आख़िर प्रधानमंत्री का लतीफा है भाई.
इष्ट देव सांकृत्यायन

Friday, 13 July 2007

जालिब की गज़लें

हबीब जालिब वाली पोस्ट पर प्रतिक्रिया करते हुए उड़न तश्तरी वाले भाई समीर जी ने अनुरोध किया है कि हो सके कुछ पूरी कविताएँ पढ़वाएं. वैसे उनकी एक कविता 'पाकिस्तान का मतलब क्या' पहले ही इयत्ता पर पोस्ट की जा चुकी है. यहाँ मैं जालिब साहब की कुछ गजलें दे रहा हूँ, जो मुझे. बहुत पसंद आईं.

......गली में ना आएं हम

ये और बात तेरी गली में ना आएं हम
लेकिन ये क्या कि शहर तेरा छोड़ जाएँ हम
मुद्दत हुई है कू-ए-बुताँ की तरफ गए
आवारगी से दिल को कहाँ तक बचाएं
हम शायद बाक़ैद-ए-ज़ीस्त ये साअत ना आ सके
तुम दास्ताँ-ए-शौक़ सुनो और सुनाएं हम
बेनूर हो चुकी है बहुत शहर की फजा
तारीक रास्तों में कहीँ खो ना जाएँ हम
उस के बग़ैर आज बहुत जी उदास है
'जालिब' चलो कहीं से उसे ढूँढ लाएं हम

इस शहर-ए-खराबी में ......
इस शहर-ए-खराबी में गम-ए-इश्क के मारे
ज़िंदा हैं यही बात बड़ी बात है प्यारे
ये हंसता हुआ लिखना ये पुरनूर सितारे
ताबिंदा-ओ-पा_इन्दा हैं ज़र्रों के सहारे
हसरत है कोई गुंचा हमें प्यार से देखे
अरमां है कोई फूल हमें दिल से पुकारे
हर सुबह मेरी सुबह पे रोती रही शबनम
हर रात मेरी रात पे हँसते रहे तारे
कुछ और भी हैं काम हमें ए गम-ए-जानां
कब तक कोई उलझी हुई ज़ुल्फ़ों को सँवारे


.......हर्फ़-ए-सदाकत लिखना
और सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाकत लिखना
रह गया काम हमारा ही बगावत लिखना
लाख कहते रहें ज़ुल्मत को ना ज़ुल्मत लिखना
हमने सीखा ही नहीं प्यारे बाइजाज़त लिखना
ना सिले की ना सिताइश की तमन्ना हमको
हक में लोगों के हमारी तो है आदत लिखना
हमने जो भूल के भी शाह का कसीदा ना लिखा
शायद आया इसी खूबी की बदौलत लिखना
उस से बढ कर मेरी तहसीन भला क्या होगी
पढ़ के नाखुश हैं मेरा साहब-ए-सर्वत लिखना
दहर के गम से हुआ रब्त तो हम भूल गए
सर्व कामत की जवानी को क़यामत लिखना
कुछ भी कहते हैं कहें शाह के मसाहिब
'जालिब' रंग रखना यही अपना इसी सूरत लिखना

Thursday, 12 July 2007

...इसी सूरत लिखना

अपने सारे दर्द भुला कर औरों के दुःख सहता था.
हम जब गज़लें कहते थे वो अक्सर जेल में रहता था.
आख़िरकार चला ही वो रूठ कर हम फर्जानों से
वो दीवाना जिसको ज़माना जालिब जालिब कहता था.


हबीब जालिब का परिचय देने के लिए कतील शिफाई की ये पंक्तियां मेरे ख़याल से काफी हैं. आज ही दिन में मैंने जालिब साहब की एक रचना 'पाकिस्तान का मतलब क्या' इयत्ता पर पोस्ट की है. यह रचना मुझे इंदिरा जी ने पढाई. वह उस वक़्त गूगल से कुछ सर्च रहीं थीं, जब उन्हें अनायास ही वह कविता दिखी. अच्छी लगी, अपने माना जैसी बात लगी. लिहाजा उन्होने यह कविता मुझसे शेयर की. रिवोल्यूशनरी डेमोक्रेसी नामक साईट पर है यह रचना. हमने वह साईट और खंगाली. उस पर जालिब साहब की कुल दस रचनाएँ मिलीं, लेकिन उनके बारे में वहां कोई जानकारी उपलब्ध नहीं थी. संयोग कि इसके पहले तक मैं जालिब साहब के बारे में जानता भी नहीं था. इसे आप चाहे मेरी कम-अक्ली कह लें या बेखयाली, पर ये सच है कि मैंने अब तक उनका नाम भी नहीं सुना था. आज उनकी कुछ कविताएँ देखीं तो लगा कि गलती हुई. अफ़सोस हुआ. जो भी हो इस रचनाकार के बारे में जानना चाहिए. लिहाजा हम फिर गूगल के दरवाजे पहुंच गए. और जालिब के बारे में विकीपीडिया तथा कुछ और साइटों से पर्याप्त जानकारी हासिल हो गई.
बेशक वह अपने समय के एक महत्वपूर्ण रचनाकार थे. निहायत तंगदिल हुक्मरानों वाले पाकिस्तान जैसे देश में साफगोई के नतीजे क्या हो सकते हैं, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. शायद इसका ही नतीजा था जो उनकी उम्र का ज़्यादातर हिस्सा पाकिस्तान की जेलों में गुजरा. जेलों से बची ज़िंदगी उन्होने फुटपाथों पर गुजारी. आप पूछेंगे जनाब ऐसा क्यों? तो साहब जानिए. वैचारिक तल पर कम्युनिस्टों से बेहद करीबी के बावजूद व्यावहारिक तल पर वे उनसे बहुत समय तक जुडे नहीं रह सके. यही वजह थी जो पाकिस्तान के तमाम तरक्कीपसंद सियासत्दां और अदीब जब मलाई काटने में जुटे थे तब वह केवल ग़रीबों के हक की लड़ाई लड़ने में लगे हुए थे. अब ऐसे शायर को भला क्या मिलता, सिवा ग़ुरबत और जलालत के? तो कहा जाना चाहिए कि हबीब जालिब ने अपने लिए मुसीबतों का वरण खुद किया था. मुझे लगता है कि जालिब ने और जो भी किया हो, पर एक काम कभी नहीं किया होगा. वह है अपने शायर होने की बुनियादी शर्त से समझौता.
इस बात के दो प्रमाण हैं.पहला तो उनकी ज़िंदगी का असल सफ़रनामा (जितना और जैसा मैं जान सका हूँ) और दूसरा उनकी शायरी. उनकी साफगोई का किस्सा बयान करने के लिए मैं फिर उनका ही एक शेर उठा रहा हूँ-
सर सर को सबा

ज़ुल्मत को जिया
बन्दे को खुदा
क्या लिखना ?
पाकिस्तान के संविधान के प्रति उनके माना में कितना सम्मान था, इसका अंदाजा आप उनकी इन पंक्तियों से लगा सकते हैं-
ऐसे दस्तूर को

सुब्ह-ए- बयनूर को
मैं नहीं मानता
मैं नहीं जानता
कहना न होगा कि कमोबेश दुनिया के हर देश के संविधान की सच्चाई यही है. इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण लोक का अनुभव ही है कि कानून और इतिहास हमेशा सत्ता के साथ ही रहे हैं. वह चाहे भारत का हो या चीन का, या फिर रूस ही क्यों न हो. कोई भी संविधान हमेशा सत्ता के लिए, सत्ता के द्वारा, सत्ता का होता है. जनता संविधान के लिए सिर्फ एक झुनझुना है, जिसे बजाना बधिया लगता है. इसलिए वह इसे बजाता रहता है. हुक्मरानों के लिए आम आदमी की औकात मुहर से ज्यादा कुछ है नहीं. इस बात को बहुत लोगों ने बहुत तरह से समझा और महसूस किया है. जब आदमी कोई चीज महसूस करेगा तो भला उसे अभिव्यक्ति वह क्यों न देगा! यही बात थी जो प्रेमजी ने इस तरह कही है :
गरीबों और दुखियों के नाम पर न जाने कितने महान बनते रहे किंतु आज तक दुनिया से गरीबी नहीं गयी।- श्रीप्रेम
कानपुर यात्रा के दौरान राष्ट्रीय सहारा में मैंने यही बात पढी तो फुरसतिया जी से तुरंत ब्लागिया देने के लिए कहा था. यह बात शायर जालिब ने अपने ढंग से कही है :
हाल अब तक वही हैं ग़रीबों के.

दिन फिरे हैं फकत वजीरों के.
मकरूज़ है देस का हर बिलावल
पांव नंगे हैं बेनज़ीरोँ के.
जालिब सिर्फ उन अदीबों के लिए ही मिसाल नहीं हैं जिन्होंने हुक्मरानों से समझौते किए हैं, वह उनके लिए भी नजीर हैं जो कहीं की भी राजनीति के तथाकथित विपक्ष के साथ भी खडे हैं. क्योंकि राजनीति और खास तौर से संसदीय राजनीति में पक्ष-विपक्ष छलावे के अलावा कुछ और होते नहीं. भारतीय राजनीति में पिछले बीस वर्षों का इतिहास देख लेना ही यह बात समझने के लिए काफी होगा. सियासत का लक्ष्य कभी जनता का हित नहीं होता है. उनका चरमलक्ष्य सत्ता है और सत्ता का एकमात्र लक्ष्य स्वयम सुख.
अपना सुख हासिल करने के लिए जो करोड़ों की संख्या वाली जनता के हित-अहित और बौद्धिक-भावनात्मक आघात के बारे में भी सोचने की जरूरत नहीं समझता, उसे चार लेखकों-कवियों-कलाकारों के माना-सम्मान और भावनाओं की क्या परवाह हो सकती है? रचनाकारों से उनकी अपेक्षा सिर्फ वही होती है, जो गुलामों से मालिकों की हुआ करती थी. वह नहीं चाहते कि कोई अपने ढंग से सोचे. यह बात दुनिया की कोई सियासत बर्दाश्त कर ही नहीं सकती कि कोई आम को आम और इमली को इमली कहे. सियासत कातिल पर नहीं, कतील के खिलाफ मुकदमा चलाए जाने का नाम है. मेरा ख़याल है कि जालिब ने इस हकीकत को बहुत करीब से समझ लिया था.
शायद इसीलिए उन्हें अपने समकालीनों पर यह तंज करना पड़ा :

और सब भूल गए हर्फ़-ए-सदाकत लिखना
रह गया काम हमारा ही बगावत लिखना

लेकिन जालिब को इस बात पर भी कोई पछतावा नहीं है. न विफलता पर, नहीं मुहिम की विफलता पर और न अपनी जाती मुश्किलों पर. अलबत्ता उन्हें नाज है अपने शायर की खुदी को बचाए रखने का। तभी वह कहते हैं :
कुछ भी कहते हैं कहे शाह के मुसाहिब 'जालिब'
रंग रखना यही अपना इसी सूरत लिखना.
तो साहब मैं जानता हूँ कि ब्लोगिन्ग की दुनिया का लेखक डबल रोल निभा रहा है. लेखक-पाठक दोनों वही है. लिहाजा ये आख़िर वाला शेर हमारे-आपके लिए.

इष्ट देव सांकृत्यायन

पाकिस्तान का मतलब क्या?

रोटी, कपड़ा और दवा
घर रहने को छोटा सा
मुफ़्त मुझे तालीम दिला
में भी मुसलमान हूँ वल्लाह
पाकिस्तान का मतलब क्या
ला इलाह इल्लल्लाह …



अमरीका से मांग ना भीख
मतकर लोगों की तजहीक
रोक ना जम्हूरी तहरीक
छोड़ ना आज़ादी की राह
पाकिस्तान का मतलब है क्या
ला इलाह इल्लल्लाह…


खेत वदेरों से ले लो
मिलें लुटेरों से ले लो
मुल्क अंधेरों से ले लो
रहे ना कोई आलीजाह
पाकिस्तान का मतलब क्या
ला इलाह इल्लल्लाह…


सरहद, सिंध, बलूचिस्तान
तीनों हैं पंजाब कि जान
और बंगाल है सब कि आन
आई ना उन के लब पर आह
पाकिस्तान का मतलब क्या
ला इलाह इल्लल्लाह…



बात यही है बुनियादी
घसिब कि हो बर्बादी
हक कहते हैं हक आगाह
पाकिस्तान का मतलब क्या
ला इलाह इल्लल्लाह …

हबीब जालिब

Wednesday, 11 July 2007

परत-दर-परत

परत दर परत
छिपा आदमी-
परत डर परत
खुल रहा है कहीं.

प्याज की झिल्लियों से
सृष्टी के राज-
खुल रहे हैं अभी.
अलग हो-हो कर
कहीं ना कहीं -
मिल रहे हैं सभी.

आसमानों
हवाओं में
बादल -
परत दर परत
घुल रहा है कहीं.

अजब खेल है
अँधेरा-उजाला
उजाला-अँधेरा.
मौत के साथ
क्यों
न जाने है
ज़िंदगी का बसेरा.

हजार परतों में
सूखा हुआ
मन-
परत दर परत
धुल
रहा है कहीं.


भाई अनामदास जी कृपया नोटियाएं. मैं ईमानदारी से अक्सेप्टिया रहा हूँ. लिहाजा कापीराईट का मुकदमा न ठोंकेंगे. वरना आगे से अक्सेप्टियाऊंगा ही नहीं. वैसे यह सच है कि यह गीत उनके ही एक चिठारस से प्रेरित है.

इष्ट देव सांकृत्यायन

Tuesday, 10 July 2007

शास्त्री जी और उनका 'आवश्यक' आनंद

पिछले दिनों भाई मसिजीवी ने अपने चिट्ठे पर एक पोस्ट किया था. शास्त्री जे सी फिलिप के चिट्ठे सारथी के बारे में उन्होने कुछ अंदेशे जताए थे. जाने क्यों उन्हें लगा कि यह मामला कुछ अतिमानवीय टाईप का हो रहा है। उसमें उन्होने शास्त्री जी के बारे में संक्षेप में पर्याप्त जानकारी दीं है और साथ ही यह सवाल भी उठाया है-
100000 से ज्‍यादा वितरित प्रतियों वाली ईपुस्‍तक के लेखक शास्‍त्रीजी पुरातत्‍व पर डाक्‍टरल शोध करते हुए हर चिटृठा पढ़ लेते हैं- इतने ट्रेफिक को मैनेज कर लेते हैं- हरेक को उत्‍तर दे देते हैं- इतने सारे टूलोंकी समीक्षा कर पाते हैं- अमरीकी विश्‍वविद्यालय के मानद कुलपति के दायित्‍व निवाह ले जाते हैं- अपने अराध्‍य के प्रति उपासना दायित्‍व पूरे कर लेते हैं- अन्‍य अनुशासनो के प्रति अपने अकादमिक दायित्‍व भी पूरे कर लेते हैं....कुछ कुछ दैवीय हो रहा है बंधु। हमारा शक है कि सारथी कोई निजी चिटृठा नहीं है।

शास्त्री जी से इसके पहले तक मेरा परिचय बस चिट्ठेबाजी तक सीमित था. चिट्ठेबाजी के दौरान शुरुआत में मुझे मुश्किलें बहुत झेलनी पडती थीं. शास्त्री जी के सारथी पर चूंकि मैंने कई बार तकनीकी लेख भी देखे हैं, लिहाजा मैंने अपनी एक समस्या के समाधान के लिए उन्हें ई चिट्ठी भी लिखी थी. शास्त्री जी ने उसका जवाब तुरंत दिया था और बाद में दूसरे संदर्भों में भी हमारी चिट्ठी-पत्री होती रही. आमने-सामने की मेल-मुलाक़ात न होने के बावजूद शास्त्री जी के प्रति मेरे मन में गहन सम्मान है. इसके तीन कारण हैं. पहला यह कि वह मुझसे वयःवरिष्ठ हैं, दूसरे विद्धान हैं और तीसरा यह कि आध्यात्मिक हैं. ऐसे व्यक्ति के लिए सीमाओं-दुराग्रहों का कोई अर्थ नहीं होता है. यह जानकारी मुझे मसिजीवी के लेख से हुई कि शास्त्री जी वस्तुतः वैज्ञानिक हैं और वह किसी यूनिवर्सिटी के मानद कुलपति भी हैं. यह भी कि पुरातत्व में रूचि रखते हैं और कई विषयों में जाने क्या-क्या कर रहे हैं. जहाँ तक शास्त्री जी की सक्रियता का सवाल है वह मेरे लिए सम्मान्य है, अविश्वसनीय नहीं. इतना सारा कार्य तो किया जा सकता है और बहुत लोग कर रहे हैं. इसके लिए केवल श्रम, संसाधन और समय के सही प्रबंधन की जरूरत होती है. यह समझ जिसकी जितनी विकसित है, वह दुनिया को उतना ज्यादा हैरान किए हुए है . हाँ कर्म सामूहिक हो सकता है, लेकिन इसके कारण वह व्यक्ति के सोच या प्रभाव से अलग नहीं हो जाता और इसका यह मतलब भी नहीं होता कि वह किसी दूसरे के श्रम या बुद्धि का शोषण कर रहे हैं. मैं नहीं समझता कि अगर किसी दूसरे व्यक्ति का लिखा हुआ लेख या कोई अन्य कार्य शास्त्री जी सारथी पर लें तो उन्हें उसकी क्रेडिटलाइन देने में कोई कष्ट होगा. उन्होने खुद मुझे एक पत्र हिंदी कविताओं पर लिखने के लिए लिखा और इस ताकीद के साथ कि वह सारथी पर आपके नाम से जाएगा. इससे ज्यादा हिंदी ब्लोगिन्ग की दुनिया में और अभी उपलब्ध ही क्या है?
पुनश्च, मुझे यह तो कभी लगा ही नहीं कि ज्ञान की दुनिया में कभी किसी का व्यक्तिगत कुछ हो सकता है. व्यक्तिगत कोई धारणा सिर्फ तब तक है जब तक कि वह विचार के स्तर पर आपके मन में है. लेकिन जैसे ही वह कागज़ पर उतरा या वाणी को उपलब्ध हुआ, सार्वजनिक हो जाता है. क्योंकि अभिव्यक्ति और कुछ है नहीं, वह विचार को लोक को अर्पित करने की प्रक्रिया है. मन की साझेदारी है. बस, और कुछ नहीं. यह बात मैंने मसिजीवी के पिछले पोस्ट की प्रतिक्रिया में ही लिख दी थी.
बहरहाल, बहुत अच्छा हुआ कि बात वहां थमी नहीं. वरना गाली-गलौच वाले निरर्थक विवादों में उलझा हिंदी ब्लोग जगत एक अत्यंत जरूरी और सार्थक संवाद से वंचित रह जाता. शास्त्री जी ने मसिजीवी का जवाब भी दिया. पूरी विनम्रतापूर्वक:
आपने इस लेख में मेरे बारे में जो कुछ लिखा है वह मेरी दैनिक सक्रियता का सिर्फ 10% है। यह सब कैसे कर लेता हूं। क्या मेरे साथ मदद के लिये एक पूरी टीम है। अच्छे प्रश्न हैं। यदि आप अपने चिट्ठे पर 1000 शब्द का एक लेख छापने की आजादी देंगे तो मैं इस विषय पर एक मौलिक लेख भेज दूंगा। इसके द्वारा मरे नाम को और प्रचार मिलेगा, उधर आपको फोकट में एक उपयोगी लेख मिल जायगा।
बहरहाल अपने संदेहजीवी भाई मसिजीवी भी कुछ कम तो हैं नहीं. उन्होने लेख मांग भी लिया और शास्त्री जी ने वह भेज भी दिया. शास्त्री जी ने इसमें वह सारे गुर बताए हैं जिससे वह यह सब आसानी से कर पाते हैं. इस विस्तृत लेखीले जवाब में उन्होने जो कुछ भी कहा है वह सौ प्रतिशत व्यावहारिक और सही बात है. हाँ खुद को भी और व्यवस्थित कर सकूं इसके लिए उनके अगले लेख की प्रतीक्षा रहेगी. लेकिन इस संदर्भ में मेरी मुश्किल बढ़ा दी आलोक पुराणिक ने. पेशे से जो भी हों, पर वेशे से व्यंग्यकार हैं. उन्होने शास्त्री जी के पोस्ट पर प्रतिक्रिया करते हुए लिखा:
भईया मसिजीवीजी, शास्त्रीजी को नमन है, पर उनकी राह पर गमन न करें। इत्ती अनुशासित और अच्छी जिंदगी बहूत बोरिंग हो जाती है। अपना मानना है कि अच्छे सदाचारी आदर्श अनुकरणीय आचरण बहुत बोरिंग हो जाते हैं। क्या करना है बोरिंग जिंदगी का।
हद ये कि फुरसतिया भाई अनूप शुक्ल ने भी आलोक का समर्थन किया.
अच्छा है। आलोक पुराणिक भी सही कह रहे हैं।
और कहूं कि चाहकर भी मैं आलोक पुराणिक और अनूप जी से असहमत नहीं हो पा रहा हूँ। पर अफ़सोस कि शास्त्री जी ने अपनी असहमति जता दी है। वह कहते हैं:
मेरे जीवन में हर तरह के आवश्यक आनंद के लिये पर्याप्त समय है। बीबी बच्चों के भी बहुत समय दे पाता हूं। अनुशासित जीवन का मतलब हर तरह से अनुशासित जीवन है -- जहां धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, एवं परमानंद की गुंजाईश है -- यांत्रिक जीवन नहीं।
लेकिन शास्त्री जी! क्षमा चाहता हूँ. मैं यहाँ आपसे सहमत नहीं हो पा रहा हूँ. आनंद एक आवश्यकता है, यहाँ तक तो सच है, लेकिन जब 'आनंद' के पहले 'आवश्यक' विशेषण लगाना पडे, तब तो भाई वह आनंद नहीं रह जाता. ऐसा आनंद तो झंझट हो जाता है. बिल्कुल वैसे ही जैसे पढाई के बाद परीक्षा देना या स्वादिष्ट भोजन के बाद बरतन मांजना. अरे भाई, जब आवश्यक हो गया तब आनंद कैसा? आप तो जानते ही हैं आवश्यकता आविष्कार की जननी है और आविष्कार मुसीबत की जड़ हैं। (संदर्भ : एटम बम) .
वैसे इसके पहले आप खुद ही कह चुके हैं :
पिछले 20 साल से मैं समय-नियंत्रण के बारे में बहुत जागरूक हूं। घर में आज भी टीवी नहीं है। आवश्यक सारी जानकारी एवं खबर अखबार, पुस्तकों एवं जाल से लेता हूं। मित्रों के साथ राजनीति, क्रिकेट, परनिन्दा में समय नहीं बर्बाद करता। हर तरह के अनावश्यक गतिविधि, कार्यक्रम, आदि से दूर रहता हूं।
हे ऋषिकल्प मनीषी ऐसा जीवन जीना किसी सामान्य मनुष्य के बस की बात नहीं है. आप बताइए जब आप यह सब कुछ भी नहीं करते तो आनंद प्राप्त करने का जीवन में और क्या माध्यम बचता है. आप की इस बात पर मुझे एक लतीफा याद आ रहा है. एक सज्जन को जीने की बड़ी चाह थी. गए डाक्टर के पास. डाक्टर को उन्होने अपनी इच्छा बताई और उपाय पूछा. डाक्टर ने कहा - देखिए सिगरेट-शराब छोड़ दीजिए. लफंदरबाजी छोड़ दीजिए. लड़कियों का पीछा करना छोड़ दीजिए. मटरगश्ती छोड़ दीजिए. उन सज्जन ने बीच में ही डाक्टर को रोक कर बोला बस-बस-बस डाक्टर साहब. जब यह सब छोड़ ही देना है तो यह सौ साल जीने का ख़याल भी रख कर मैं क्या करूंगा? मैं यह ख़्याल ही छोड़ दे रहा हूँ. आदरणीय शास्त्री जी! क्षमा चाहता हूँ पर मुझे कहना पड़ रहा है कि आज की तारीख में अगर मुझसे भी कोई यह बात कहे तो मैं भी 'सौ साल जीने का ख़याल' ही छोड़ना पसंद करूंगा. अगर आपके पास कोई ऐसा रसायन हो जिससे यह सब न करते हुये भी आनंद प्राप्त किया जा सके (और वह आवश्यक वाला न हो) तो कृपया हमें बताएं. हम उसे जरूर जानना चाहते हैं. और याद रखें, अभी वह सफलता के गुणों वाला आपका पोस्ट भी पूरा नहीं हुआ है. हम युवाओं के लिए उसे जानना कितना जरूरी है यह तो आप जानते ही हैं. तो उस संदर्भ में भी हम पर अपनी कृपा बनाए रखिएगा. और हाँ लेखन के संदर्भ में मेरा मनाना आज भी वही है जो कल तक था. मतलब यह कि रचना आपकी सिर्फ तब तक है जब तक कि वह विचार के स्तर पर है. इसके जरा सा आगे बढ़ते यानी उसके कृति बनते ही वह आपकी नहीं रह जाती. फिर उसे आप लोक को अर्पित कर चुके होते हैं. तो एक मुमुक्षु की भांति शास्त्री जी से फिर मेरा विनम्र अनुरोध है कि वह इन रहस्यों का (खास तौर से आवश्यक आनंद वाले), लोकार्पण करें. और हाँ, इस रचनात्मक संदेह के लिए भाई मसिजीवी और इसे गति देने के लिए जी मेरा धन्यवाद स्वीकारें. इस संदेह में रचनाधर्मिता की तलाश के लिए भाई आलोक पुराणिक और फुरसतिया सुकुल जी के अलावा और जो भी सज्जन-देवी शामिल हो रहे हैं या होंगे, उन सबको मेरी ओर से शुकराने की पेशगी बतौर बयाना हाजिर है. अभी रख लें. जमा-खर्च का हिसाब-किताब बाद में होता रहेगा.
इष्ट देव सांकृत्यायन

Monday, 9 July 2007

एक चेहरा ज़िंदगी का


उस वक़्त मैं गाजियाबाद के प्रताप विहार में था, जब 'सारे जहाँ से अच्छा' की धुन सुनायी पडी. मैंने मोबाइल निकला तो पता चला संस्थान का नंबर था. पहले तो लगा कि भला रविवार को किसे मेरी जरूरत पड़ गई और क्यों? उठाया तो उधर से एक चिर-परिचित और बिल्कुल अनौपचारिक आवाज थी. फिर पूछा आपने सखी में बहुत पहले चंद्रशेखर जी पर कुचह लिखा था. मैंने कहा हाँ. 'उसकी एस्टीवाई फ़ाइल चाहिए.' उधर से आवाज आयी. 'वह तो अब नहीं मिल सकती' मैंने उन्हें तकनीकी समस्या बताई और उसे जागरण डॉट कॉम से उठा लेने को कहा. उन्होने बताया कि असल में चंद्र शेखर जी नहीं रहे. जान कर अचानक धक्का सा लगा. बीमार तो वह काफी दिनों से चल रहे थे, पर अचानक यह दुखद खबर मिलेगी ऐसा सोचा नहीं था. आम तौर पर राजनेताओं के निधन की खबर मुझे दुखी नहीं कर पाती. पर यह खबर मुझे हिला सी गई. इसलिए नहीं कि चंद्रशेखर से मेरी कोई बड़ी घनिष्ठता थी, इसलिए कि उन्हें इस देश की गरीब जनता की आख़िरी उम्मीद के तौर पर देखा जा सकता था. धनकुबेरों और रईसजदों द्वारा अपहृत भारतीय राजनीति के इस दौर में वह एक ऎसी शख्सियत थे जिसे भारतीय जनता के जीवन का सच पता था. जो यह जानता था कि आटा खेत में पैदा नहीं होता. गेहूं पैदा होता है और पिसा कर आटा बनाया जाता है. जिसे मालूम था भारत के ज़्यादातर गांवों में अभी भी सड़क, बिजली, टेलीफोन और सिंचाई के लिए नहर तक नहीं है. जिसे मालुम था कि इस देश के अधिकतर अभिभावक निजी स्कूलों की फ़ीस भरने लायक नहीं है. अब वैसा कौन दिखता है. अब प्रधानमंत्री पद के जो दावेदार बनाए जा रहे हैं, उनके हाथों में देश का भविष्य क्या होगा, इसका अंदाजा अभी ही लगाया जा सकता है. बेशक चंद्रशेखर महान लोगों में नहीं थे, लेकिन वह काबिल लोगों में जरूर शुमार थे. वैसे भी राजनीति में सिर्फ ओढा हुआ लबादा ही होता है. चंद्रशेखर ने कभी भी वह लबादा नहीं ओढा, पर उन्होने कभी कोई ओछी टिप्पणी की हो, या कभी कोई अर्थराहित या तर्कराहित बात की हो ऐसा मुझे याद नहीं आता. महानता का लबादा ओढ़े बग़ैर भी वह कभी राजनीति के मसखरों की जमात में भी शामिल नहीं हुए. उन्होने अपनी और अपनी बात की गरिमा हमेशा बनाए रखी. लालबहादुर शास्त्री और नरसिंह राव के बाद एक बार फिर यह कहना सिर्फ औपचारिकता होगी कि चंद्रशेखर का निधन देश की बड़ी क्षति है. मेरे जैसे बहुत से लोग इस बात को अपने भीतर महसूस कर रहे होंगे. ऐसा लग रहा है गोया भारतीय राजनीति से आम आदमी का चेहरा इश्वर ने हमेशा के लिए डिलीट कर दिया हो.
ईश्वर चंद्रशेखर की आत्मा को शांति प्रदान करे.
इष्ट देव सांकृत्यायन

Sunday, 8 July 2007

सात अजूबे हमने देखे

भाई नितिन बागला ने आज ही ताज वाले सवाल को लेकर अपने इन्द्रधनुष पर सात नए अजूबे गिनाए हैं। उनके सातों अजूबे मुझे सही लगे हैं. पर कुछ अजूबे मुझे भी सूझ रहे हैं. मैं उन्हें गिना रहा हूँ.
१. अपने को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बताने वाले देश में प्रधानमंत्री पद पर एक ऐसा व्यक्ति बैठा है जो कभी ग्राम प्रधान का चुनाव भी नहीं जीत सका.
२. राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी एक ऐसे व्यक्ति को बनाया जा चुका है और पूरी संभावना है कि वह राष्ट्रपति हो भी जाए, जिसके ईमान पर सवाल उठ चुके हैं.
३. गरीबी की जो रेखा निर्धारित की गई है उसके नीचे के एक भी व्यक्ति के लिए एक जून की रोटी का भी जुगाड़ मुश्किल है. उस पर तुर्रा यह कि उनके बच्चे हाई-फाई स्कूलों में पढेंगे.
४. भारत में हिंदी पढने वालों के लिए रोटी जुटानी मुश्किल है पर हम अमेरिका में जाकर हिंदी सम्मेलन कर रहे हैं.

५. हर कोई अच्छी फिल्मों, अच्छे साहित्य की कमी का रोना रोता है पर अच्छी चीजें बाजार में आते ही औंधे मुँह गिर जाती हैं।
६. फांसी की सजा पाए अपराधी को माफ़ किया जाए या नहीं, इस फैसले में भी वर्षों लग जाते हैं.
7. और साहब साहित्य से दुनिया बदलने का मुगालता है उनको जो नहीं जानते उन्हें पढा क्यों जाए.


बहरहाल साहब बात चूंकि ताज से चली थी लिहाजा फिर ताज पर आते हैं. इस मामले में भाई संजय बेंगानी ने सबको खुश कर दिया है. अपने तरकश पर जो दे उसका भी भला और जो न दे उसका भी भला वाले अंदाज में. बकौल संजय के किसी को भी परेशान होने या अपराध बोध से ग्रस्त होने की कोई जरूरत नहीं है. अरे जिस देश में अपराधी घोषित होने तक पर राजनेता अपराध बोध से ग्रस्त न होते हों वहाँ भला ताज को वोट देने या न देने को लेकर अगर कोई अपराध बोध से ग्रस्त हो तो यह भी तो एक अजूबा ही होगा न. हमारा दुर्भाग्य है कि हम नहीं पढ़ सके वर्ना रवि रतलामी जीं ने तो अपने तरकश से निकाल कर तीर काफी पहले ही चला दिए थे. बहरहाल आप जिस किसी भी कोटी में शामिल हों चिन्ता करने जरूरत बिल्कुल नहीं है. क्योंकि ताज सात अजूबों में शामिल हो या ना हो हमारे देश में सचमुच के अजूबों की वैसे भी कोई कमी नहीं है. आप बताइए, आप की नजर में भी तो कुछ अजूबे होंगे. क्यों नहीं गिनवाते उनको?
इष्ट देव सांकृत्यायन



Friday, 6 July 2007

... तो मैं समझदार हूँ?

मैंने ग्रेजुएशन के दौरान एक निबंध पढा था 'ऑफ़ ताज'. इसे अंगरेजी मानसिकता से प्रभावित होने का नतीजा न माना जाए, लेकिन यह सच है कि मैं उस लेखक के तर्कों से प्रभावित हुआ था और ताज को लेकर मेरे मन में जो भी रूमानी ख़याल थे वे सारे दूर हो गए. यह भी सच है इन सामंती चोंचलों से मेरी कोई सहमति पहले भी नहीं थी. भूख और गरीबी से बेहाल एक देश का बादशाह जनता की गाढी कमाई के करोड़ों रुपये खर्च कर एक कब्र बनवाए, इससे बड़ी अश्लीलता मुझे नहीं लगता कि कुछ हो सकती है.
संयोग से उसी दौरान मुझे ताज देखने का अवसर मिला और मुझे कहना पड़ेगा कि मुझे उस लेखक के तर्कों से सहमत होना पड़ा. स्थापत्य के नाम पर मुझे वहाँ कुछ खास नहीं दिखा. उससे बेहतर राजस्थान की छतरियाँ हैं और अगर इसे धर्मनिरपेक्षता का अतिक्रमण न माना जाए तो कोणार्क, खजुराहो के मंदिर हैं, भोपाल की बेगमों की बनवाई मस्जिदें हैं. गोवा के चर्च हैं और पंजाब व दिल्ली के गुरूद्वारे हैं. देश के सैकड़ों किले हैं. वहाँ अगर कुछ खास है तो वह सिर्फ शाहजहाँ के आंसू हैं. अगर मुझे आंसू ही देखने हों तो यहाँ करोड़ों ग़रीबों के आंसू क्या कम हैं, जो एक बादशाह के घड़ियाली आंसू देखने में हम वक़्त जाया करें?

यही नहीं, लंबे दौर तक टूरिजम बीट देखने के नाते मैं यह भी पहले से जानता था कि इस दुनिया में सिर्फ बहुराष्ट्रीय पूजी का बोलबाला है और वह भी ऐसा कि वे आपके देश के किसी ओद्योगिक-व्यापारिक घराने को उसमें एक पैसे का हिस्सा देना नहीं चाहते. ज़्यादा से ज़्यादा कृपा करते हैं तो बस यह कि उन्हें अपने जनसंपर्क का कार्य सौंप देते हैं और उस मामूली रकम के लिए हमारी देसी कम्पनियाँ न्योछावर हो जाती हैं. मुझे इस बात की पक्की जानकारी तो नहीं, पर इतना जरूर पता था कि यह सब बहुराष्ट्रीय पूंजी की मृगमरीचिका के लिए ही किया जा रहा है. यही वजह थी जो तमाम दोस्तो के बार-बार कहने और बच्चों की जिद के बावजूद मैं तथाकथित ताज कैम्पेन के झांसे का शिकार नहीं हुआ.
अभी एक हिंदुस्तानी की डायरी पर भाई अनिल रघुराज से यह जानकर मुझे संतोष का अनुभव हुआ कि मैं एक विश्वव्यापी पूंजीवादी दुश्चक्र का शिकार होने से बच गया.
आमीन!!

इष्ट देव सांकृत्यायन

उजले कपडों वाले लोग

वैद्य राज नमस्तुभ्यम
यमराज सहोदरः.
एकः हरति प्राणं
अपरः प्राणानि धनानि च..
पिछले दिनों सामान्य बातचीत में यह श्लोक डा. देवेन्द्र शुक्ल ने सुनाया था. उन्होने ही बताया कि यह पंचतंत्र की किसी कहानी में किसी संदर्भ में आया है. अब पंचतन्त्रकार यानी विष्णु शर्मा ने भले ही यह बात मजाक में कही हो, पर पुराण इस मामले में साक्ष्य हैं कि यह बात है सही. ऐतिहासिक न सही, पर पौराणिक तथ्य तो है ही. यमराज और वैद्यराज अगर सगे न भी सही तो सौतेले भाई जरूर हैं, ऐसा पुराणों में वर्णित है. आप कहेंगे कैसे? तो साहब जान लीजिए. सूर्य की पत्नी संज्ञा उनके तेज से घबरा कर भाग गयी थीं और जंगल में छिपी थीं. इतना तो आप जानते ही होंगे. उन्ही दिनों छाया सूर्य के घर में संज्ञा का रुप लेकर रहीं. इस बीच उनके दो पुत्र हुए- शनि और यम. लेकिन जल्दी ही सूर्य को यह आभास हो गया कि यह संज्ञा नहीं हैं और फिर वह चले संज्ञा को तलाशने. वह जंगल में मिलीं, अश्विनी यानी घोड़ी के रुप में. वहाँ सूर्य ने उनके साथ रमण किया और उनसे भी उनके दो पुत्र हुए. ये थे अश्विनी कुमार. आयुर्वेद में सर्जरी की हैंडबुक के तौर पर अब सुश्रुत संहिता जरूर प्रतिष्ठित है, लेकिन पहले सफल सर्जन अश्विनी कुमार ही माने जाते हैं. अब आप ही बताइए, ये यमराज के सहोदर न सही पर भाई तो हैं ही. और इनके ही नए संस्करण हमारे नए दौर के सर्जन हैं, एलोपैथ वाले. अब अगर यह सिरदर्द का इलाज कराने गए आदमी का गुर्दा काटकर बेच देते हैं तो कौन सा गुनाह करते हैं ? बहरहाल पिछले दिनों दिल्ली के एक स्वनामधन्य सर्जन पर कुछ ऐसे ही आरोप लगे थे. उसी से प्रेरित हो कर लिखा गया यह गीत आपकी अदालत में :


उजले कपडों वाले लोग-
दरअसल दिल के काले लोग.
हमें पता है,
तुम भी जानो!

हम इन्हें खुदा मान कर जाते हैं,
ये हमें खोद कर खाते हैं.
पसली पर चोट लगी हो तो-
ये दिल का मर्ज बताते हैं.

छुरा तुम्हारे तन पर रक्खा और
भोंक रहे हैं
जेब पर भले लोग.

हमें पता है,
तुम भी जानो!

नजर जेब तक होती
तो कोई बात नहीं.
ऐसा क्या है जिस पर इनकी घात नहीं!
इनके लिए
हर अंग तुम्हारा रोकड़ है,
दिन में नोच रहे हैं -
जोहें रात नहीं.

गिद्ध भी इनसे बचते हैं
जाने कितने घर घाले लोग.
हमें पता है,
तुम भी जानो!


कहीँ विज्ञान
न संभव कर दे

प्राणों का प्रत्यारोपण.
वरना ये
प्राण निकालेंगे
और
खडे करेंगे रोकड़ .

तुम्हे मार कर
बन जाएँगे
स्वयम अरबपति
बैठे-ठाले लोग।
हमें पता है,
तुम भी जानो!


इष्ट देव सांकृत्यायन


Wednesday, 4 July 2007

देख लो अब भैया

सच की खिंचती खाल देख लो अब भैया.
झूठ है मालामाल देख लो अब भैया..

आगजनी ही जिसने सीखा जीवन में ,
उनके हाथ मशाल देख लो अब भैया..

चोरी लूट तश्करी जिनका पेशा है,
वही हैं द्वारपाल देख लो अब भैया..

माली ही जब रात में पेड़ों पर मिलता है ,
किसे करें रखवाल देख लो अब भैया..

बंदूकों से छीन के ही जब खाना हो-
भांजे कौन कुदाल देख लो अब भैया..

-विनय ओझा स्नेहिल

Sunday, 1 July 2007

वही होगा जो .....

एक बार मैं घूमते-घूमते एक अनजाने कस्बे में पहुंच गया. छोटी सी पहाड़ी पर बसे इस कस्बे की आबो-हवा मुझे बहुत अच्छी लगी और पास ही कस्बे के बाहर एक ऊंची जगह पर एक खाली घर भी दिख गया. फिर क्या था, मैं वहीं ठहर गया. चूंकि यह जगह शहर से बाहर थी और वहां कोई खेती भी नहीं होती थी, इसलिए वहां तक पहुंचने का पूरा रास्ता कंटीली झाडि़यों से भर गया था. कुछ दिनों तक तो मेरे वहाँ होने के बारे में किसी को पता ही नहीं चला. मैं चुपचाप अल्लाह की इबादत में लगा रहा. पर आखिरकार लोगों को पता चल ही गया और फिर लोग मेरे पास पहुंचने भी लगे. पहुंचा हुआ फकीर मानने के नाते लोग तरह-तरह से मेरी खुशामद भी करते, पर मैं कुछ बोलता ही नहीं था. एक दिन हुआ यह कि कस्बे के लोगों द्वारा पाले गए सारे मुर्गे मर गए. तब गांव के तमाम लोग भागे हुए मेरे पास पहुंचे और मुझे यह हाल बताया. मैंने उन्हें कहा, 'कोई बात नहीं। समझो कि खुदा की यही मर्जी थी.' खैर लोग लौट गए. थोड़े दिनों बाद कस्बे में मौजूद सारी आग भी बुझ गई. उनके पास खाना पकाने तक के लिए भी आग नहीं बची. कस्बे के लोग फिर मेरे पास आए और मैंने फिर वही जवाब दिया. कुछ दिनों बाद वहां के सारे कुत्ते भी मर गए और तब भी मेरा जवाब वही रहा. इस पर लोगों को जरा गुस्सा भी आ गया. उन्होंने कहा, 'अब जब कुत्ते नहीं रहे जंगली जानवरों और चोरों से बचाने के लिए हमारे घरों और फसलों की रखवाली कौन करेगा?' मैंने कहा, 'जी, मैं तो एक ही बात जानता हूं. खुदा जो चाहेगा, वही होगा.' कुछ दिनों बाद कस्बे में लुटेरों का गिरोह आया. वे पूरे कस्बे में घूमे. लोग अपने-अपने घरों में दुबके रहे. कोई कुछ नहीं बोला. यहां तक कि कुत्ते भी नहीं बोले. लुटेरों ने निष्कर्ष निकाला, 'कहीं न तो आग जलती दिखती है, न कहीं मुर्गे बोलते हैं और न कुत्ते ही भौंकते हैं. ऐसा लगता है कि लोग यह कस्बा छोड़कर कहीं और चले गए हैं। छोड़ो, जब लोग ही नहीं हैं तो घरों में क्या रखा होगा? वापस चलते हैं.' लुटेरे बिना कुछ लूटपाट किए ही लौट गए और कस्बे के लोग मेरी बात का मर्म समझ गए थे.