Thursday, 31 May 2007

अशआर

सैर कर दुनिया की गाफिल, जिंदगानी फिर कहॉ
जिंदगी ग़र कुछ रही तो नौजवानी फिर कहॉ.
इस्माइल मेरठी

गीतों से

हम नए हैं
नए थे भी
नए आगे भी रहेंगे

यह हमारा गीत होना
सुनो समयातीत होना है
बन सदाशिव
जहर से अमृत बिलोना है
कल दहे थे
दह रहे हैं
कंठ आगे भी दहेंगे

हम नए हैं
नए थे भी
नए आगे भी रहेंगे
कुमार रवीन्द्र

Wednesday, 30 May 2007

अशआर

अब यकीनन ठोस है धरती हकीकत की तरह
ये हकीकत देख लेकिन खौफ के मारे न देख.

रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है.
दुष्यंत कुमार

चुप रहिए

देख रहे हैं जो भी, किसी से मत कहिए,
मौसम ठीक नहीं है, आजकल चुप रहिए.

फुलवारी में फूलों से भी ज्यादा साँपों के पहरे हैं,
रंगों के शौक़ीन आजकल जलते जंगल में ठहरे हैं.
जिनके लिए समंदर छोड़ा वे बदल भी काम न आए,
नई सुबह का वादा करके लोग अंधेरों तक ले आए.

भूलो यह भी दर्द चलो कुछ और जिएँ,
जाने कब रूक जाएँ जिंदगी के पहिए.
रमानाथ अवस्थी

Saturday, 26 May 2007

अशआर

अपना कशकोल छिपा लो तो सभी हातिम हैं
वरना हर शख्स भिखारी है, जिधर जाओगे.


मैदां की हार-जीत तो किस्मत की बात है
टूटी है किसके हाथ में तलवार देखना.
हरेक आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी
जिसको भी देखना, कई बार देखना.


Friday, 25 May 2007

बेचारे प्रधानमंत्री और मजबूर जनता

भारत के प्रधानमंत्री डॉ॰ मनमोहन सिंह ने उद्योगपतियों की बैठक में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर गहरी चिंताएँ जताई हैं. सबसे ज्यादा चिन्ता उन्होने इस समय की सबसे मौजू समस्या महंगाई पर जताई है. उद्योगपतियों से उन्होने अपेक्षा की है कि वे काकस बाना कर चीजों के दाम न बढ़ाएं. आर्थिक विकास का लाभ देश के आम आदमी को मिले, इसके लिए उन्होने भारतीय उद्योग जगत के सामने एक दस सूत्रीय एजेंडा भी रखा है. इस एजेंडे में वंचित वर्गों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को रोजगार के अधिक अवसर देना, प्रतिभाशाली युवाओं को स्काँलरशिप देना आदि बातें शामिल हैं. भारतीय उद्योग परिसंघ की बैठक में उन्होने उद्योगपतियों को यह उपदेश भी दिया है कि वे अपनी शान बघारने के लिए अपने वैभव का भोंडा प्रदर्शन न करें.
डॉ॰ सिंह ने यह जो बातें कही हैं, इनसे किसी को असहमति नहीं हो सकती है. रोजगार के अवसर वंचित वर्गों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं को ही नहीं, समाज के सभी वर्गों को मिलने चाहिए. आख़िर रोजगार के अवसरों की जरूरत किसे नहीं है? बिना रोजगार के तो किसी का जीवन चल नहीं सकता है! प्रतिभाशाली युवाओं को स्कालरशिप दिए जाने की बात भी सही है. इस बात से भी किसी को नाइत्तफाकी नहीं हो सकती है कि शेखी बघारने के लिए धन-वैभव का भोंडा प्रदर्शन नहीं होना चाहिए. और यह तो पूरा देश चाहता ही है कि उद्योगपति काकस बना कर चीजों की कीमतें न बढाएं. लेकिन बडे दुर्भाग्य की बात यह है कि इनमें से कोई भी बात हो नहीं रही है.
देश का प्रधानमंत्री कोई बात कहे और वह हो न रही हो तो देशवासियों के लिए इससे ज्यादा हताशाजनक बात और क्या हो सकती है? खास तौर से एक ऐसा प्रधानमंत्री जो तीन साल सरकार चला चुका हो और अर्थशास्त्र का माहिर हो, इससे बड़ी विफलता और क्या हो सकती है कि उसके शासन में महंगाई लगातार बढ रही हो. इसके लिए वह और उसकी सरकार चौतरफा सिर्फ आलोचना नहीं बल्कि निंदा झेल रही हो तथा फिर भी कुछ न कर पा रहा हो. समझा जा सकता है कि जहाँ सत्ता के शीर्ष पर बैठा हुआ व्यक्ति इस हद तक मजबूर हो, वहाँ जनता कितनी लाचार और मजबूर होगी. लेकिन क्या यह बात सचमुच सच है? क्या वास्तव में मनमोहन सिंह की सरकार महंगाई और बेकारी जैसी समस्याओं पर चाहकर भी काबू नहीं कर पा रही है और यह वास्तव में उसकी लाचारी ही है? या फिर इसके मूल में कुछ और भी है?
इस संदर्भ में सही निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए जरूरी है कि हम यूंपीए सरकार के पिछले तीन साल के कार्यकाल का एक सिंहावलोकन करें. एक बात और कि किसी सरकार के कार्यकाल का सिंहावलोकन करते हुए इस बात का ध्यान जरूर रखें कि सरकार के हाथ में बहुत सारी शक्तियां तो होती हैं, पर कोई जादू की छड़ी नहीं होती है. वह समस्याओं का निपटारा कर सकती है, लेकिन इसके लिए उसे समय, सहयोग और संसाधन चाहिए होते हैं. पुनश्च, यह बात भी हमें ध्यान में रखनी होगी कि कुछ समस्याएँ तो ऐसी हैं जिनके कारण देश के भीतर ही होते हैं, लेकिन कई समस्याओं के कारण वैश्विक होते हैं. जब कोई समस्या विश्व स्तर पर होती है तो देश के भीतर हम उस पर बहुत ज्यादा नहीं कर सकते. लेकिन हाँ, इन कारणों के साथ-साथ एक मुद्दा इच्छाशक्ति का भी होता है. इतिहास में ऐसा कई बार देखा गया है कि राजनेता जब चाहता है तो परिस्थितियों के लाख विपरीत होने के बावजूद अपनी मनमानी कर ही लेता है. इस संदर्भ में उदाहरण गिनाने की जरूरत नहीं है. इस देश की जनता इमरजेंसी से लेकर मंडल कमीशन और अयोध्या काण्ड तक सरकार प्रोयोजित कई मुसीबतों की भुक्तभोगी रह चुकी है.
यह गौर करने की बात है कि जब यह सरकार सत्ता में आई थी उस समय तक ऐसी कोई बात यहाँ नहीं थी. तेल-गैस से लेकर चावल-दाल तक सभी चीजें बाजारों में आसानी से उपलब्ध थीं और लोग इत्मीनान से ख़रीद रहे थे. संप्रग सरकार के ही देश या दुनिया पर कोई बड़ी आपदा आ गई हो, ऐसा मुझे याद नहीं आता है.
संप्रग सरकार ने सत्ता सँभालने के बाद सबसे पहला काम दाम बढ़ाने का ही किया है. पहले तो पेट्रोल- डीजल की कीमतें बढाई गईं, फिर गैस की. इसके बाद सुनियोजित साजिश के तहत गैस को बाजार से गायब करा दिया गया. तब से लेकर आज तक गैस आम आदमी के लिए बाजार से ग़ायब ही चली आ रही है. इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है कि इसके पीछे सरकारी तंत्र का ही हाथ था. अगर ऐसा नहीं था तो फिर ऐसा क्यों हुआ कि ठीक उसी समय गैस की डिलीवरी पर नए सिरे से कोटा-परमिट का झमेला क्यों लाद दिया गया जब कि गैस पूरे बाजार से ग़ायब थी. उस समय सम्बंधित मंत्री ने इसके पीछे तर्क यह दिया था कि घरेलू गैस का प्रयोग व्यावसायिक कार्यों के लिए किया जा रहा है। उसे रोकने के लिए यह व्यवस्था की जा रही है. क्या अब यह प्रक्रिया बंद हो गयी है? केवल जनता ही नहीं मंत्री और यहाँ तक कि प्रधानमंत्री भी इस बात को जानते हैं कि घरेलू सिलिंडरों के व्यावसायिक इस्तेमाल की प्रक्रिया बिल्कुल नहीं रुकी है. अगर कोई मंत्री यह बात नहीं जनता है तो इस गरीब देश में उसे राजनीति करने का ही कोई हक नहीं है. इसके बावजूद और चाहे जो हो गया हो, लेकिन एक काम नहीं हुआ तो नहीं ही हुआ और वह है गैस से कोटा-परमिट का चक्कर हटाने का आदेश. क्यों? क्योंकि इससे एक वर्ग का फायदा है और वह ऐसा वर्ग है जिसके फायदे का फायदा पार्टियों को मिलता है.
जाहिर है उसके फायदे को यह नजरअंदाज नहीं कर सकते. ध्यान से देखें तो पाएँगे कि लगातार किसी न किसी तरह से उसी के फायदे का ख़याल यह सरकार हमेशा से रखती आ रही है. किसान के घर से तीन रुपये किलो के रेट से चला आलू बाजार में २५ रुपये किलो बिका, चार रुपये किलो की दर से चले गेहूं का आटा २० रुपये किलो बिका. पिछले तीन सालों से सारी चीजों के दाम सिर्फ बढते ही रहे और अब तक प्रधानमंत्री को न तो किसी से कुछ कहने कि जरूरत महसूस हुई और न ही कुछ करने की. अब वह कह रहे हैं उद्योगपतियों से कि वे काकस बना कर कीमतें न बढाएं, शान बघारने के लिए फिजूलखर्ची न करें. उद्योगपति तो फिर भी अपना धन खर्च कर रहे हैं. फिजूलखर्ची कम करने की बात वे अपने मंत्रियों से क्यों नहीं करते जो सरकार यानी जनता के पैसे पर ऐयाशी की सारी हदें तोड़ते चले आ रहे हैं. अगर केवल केंद्र सरकार के मंत्री अपनी ऐयाशी में मात्र दस प्रतिशत की कमी कर दें तो निश्चित रूप से हजारों युवाओं को रोजगार दिया जा सकता है. आखिर प्रधानमंत्री इन पर लगाम क्यों नहीं लगा रहे हैं?

सवाल यह भी है कि इस सरकार ने युवाओं को रोजगार के अवसर देने के लिए क्या किया है? एक ऐसे देश में जहाँ पहले से ही बेकारी मुँह बाए खड़ी है, वहाँ रोजगार के अवसर सिर्फ घटाए गए हैं. क्या इसके बाद भी यह कहने की गलती की जा सकती है कि इस सरकार का जनता के हितों से कोई वास्ता है? क्या यही इसके सामाजिक सरोकार हैं? देश का बच्चा-बच्चा जानता है कि माननीय प्रधानमंत्री के लिए देश का मतलब भारत नहीं सोनिया गाँधी है. इसके बाद भी वह ऐसी बातें किसे सुनाने के लिए कर रहे हैं? क्या उन्हें मालूम नहीं है कि इस देश में वोट देने का हक सिर्फ उन्हें ही है जिनकी उम्र १८ साल से अधिक हो चुकी है? या फिर वे यह मान कर चल रहे हैं कि यहाँ के लोग ६० साल के बाद ही बालिग होते हैं? अगर ऐसा है तो निश्चित रुप से इस तरह की दिखावटी बातें कर के वह जनता की बुद्धि का अपमान कर रहे हैं। जिसका उन्हें कोई हक नहीं है। ध्यान रखें जिस तरह आज वह यह सोच रहे हैं कि उनका कोई विकल्प नहीं है, ऐसे ही तीन साल पहले राजग के नेता भी यही सोचते थे कि उनका इस देश के पास कोई विकल्प नहीं है. उन्हें सोचना चाहिए कि दो साल बाद उनका क्या होगा. यह बात ध्यान में रखते हुए कि भारत की जनता उतनी मजबूर नहीं है जितने कि वह हैं. जनता के पास उनके और सोनिया गाँधी के अलावा भी कई और विकल्प हैं. वह लाचार भले होन पर भारत की जनता मजबूर नहीं है.
इष्ट देव सांकृत्यायन



Thursday, 17 May 2007

कुनबे की महिमा का सच

यह तो आप जानते ही हैं कि परमपूज्या राजमाता और माननीय श्रीमंत राजकुमार के मुँह बहुत कम ही खुल पाते हैं. बमुश्किल कभी-कभी ही. सिर्फ तब जब बहुत जरूरी हो जाता है. तब वह इस गरीब देश की दरिद्र जनता पर यह महती कृपा करते हैं. इसीलिए वे जब भी बोलते हैं पूरे देश की हिंदी और अंग्रेजी प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया उनके बयान को लोकने के लिए ऐसे टूटती है जैसे सिद्ध संतों द्वारा फेंके गए प्रसाद को लोकने के लिए उनके भक्त टूटते हैं. ऐसा लगता है जैसे इस दुनिया में अब इसके अलावा कोई और परमसत्य बचा ही ना हो. हाल ही में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान राजकुमार का मुँह एक बार खुला था और तब जहाँ एक तरफ तमाम कांग्रेसी कृतकृत्य हो गए थे वहीं देश-दुनिया के इतिहास की थोड़ी सी भी समझ रखने वाला हर शख्स एक दुखद आश्चर्य से भर उठा था. सबने एक सिरे से यही सोचा कि राजकुमार ने यह क्या कह दिया. अपने को जानकर मानाने वाले कुछ लेखकों-पत्रकारों-राजनेताओं ने तो थोड़ी हाय-तौबा मचाने की रस्म अदायगी भी की. पर अब वह बयान केवल राजकुमार तक सीमित नहीं रह गया है. परमपूज्या राजमाता ने भी राजकुमार के सुर से सुर मिला दिया है. राजकुमार ने तो अपने बयान से यह जता दिया था कि नेहरू-गाँधी परिवार नही तो देश नहीं और अब राजमाता ने इसे और ज्यादा विश्वसनीय बना दिया है यह जता कर कि उनका कुनबा नही तो कॉंग्रेस नहीं. आपने कल पढा और सुना ही होगा वह बयान जिसमे उन्होने बताया है कि उत्तर प्रदेश में संगठन की कमजोरी के नाते हारी है कॉंग्रेस. जाहिर है हमेशा की तरह इस बात पर भी कांग्रेसियों को कोइ शर्म तो आयी नहीं होगी अपने अन्नदाताओं के बयान पर.
यह बात और साबित हो गयी तब जब उत्तर प्रदेश कॉंग्रेस के अध्यक्ष सलमान खुर्शीद का यह बयान आया कि संगठन की गलती से ही हुई है राज्य में कॉंग्रेस की हार. खुर्शीद साहब के इस बयान ने उस दौर को हमारे सामने ला खड़ा किया जब पूरे दिन श्रम करने के बाद भी बेचारे मजदूरों को जमींदारों और उनके गुर्गों की मार मिलती थी. इसके बाद भी जमींदार के सामने पड़ने पर उन्हें कहना पड़ता था कि जीं हाँ हुजूर हम इसी लायक थे, इसी लायक हैं, और इसी लायक बने रहेंगे. जनाधार विहीन और ट्रिनोपाल छाप लोगों के हाथों में जब तक राजनीतिक पार्टियों का नेतृत्व रहेगा, तब तक पार्टियों के प्रदेश अध्यक्षों की हैसियत इससे आगे नहीं बढ पाएगी.
गौर करने की बात है कि कॉंग्रेस में इससे ज्यादा कभी किसी प्रदेश अध्यक्ष, राष्ट्रीय महासचिव या किसी भी अन्य पदाधिकारी की हैसियत रही भी है क्या? लोकतंत्र का मखौल किसे कहते हैं यह अगर किसी को जानना हो तो निश्चित रुप से उसे कॉंग्रेस का इतिहास जरूर जानना चाहिए. जमाना चाहे महात्मा गाँधी का रहा हो चाहे इंदिरा गाँधी का या फिर अब सोनिया गाँधी का, इस दल में चलती हमेशा किसी एक व्यक्ति की ही रही है. यह अलग बात है कि तरीके सबके अलग-अलग रहे हैं. कोई अनशन करके जबरदस्ती पूरे देश पर अपनी इच्छा थोप देता था तो कोई इमरजेंसी लगा कर और कोई एक ऐसे लाचार आदमी को प्रधानमंत्री बनाकर जो ग्रामप्रधानी का चुनाव भी नहीं जीत सकता है.
यह सब आख़िर किसलिए? सिर्फ इसीलिए न कि कोई काबिल राजनैतिक व्यक्ति सिंहासन तक न पहुँचाने पाए और वह राजकुमार के बडे होने तक उसके लिए सुरक्षित बचा रहे. यह कोई आज की नई बात नहीं है. बौरम प्रोत्साहन सिद्वांत ही कॉंग्रेस का मूलभूत सिद्वांत है. यह बात तो दुनिया जानती है न कि आजादी के तुरंत बाद देश की बागडोर कॉंग्रेस के हाथ में ही आयी थी. अनपढ़ोँ को शिक्षामंत्री, अपाहिजों को रक्षामंत्री, बीमारों को स्वास्थ्य मंत्री बनने और तकनीकी पदों पर इतिहास, भूगोल के रटते मार कर आई ए एस बने भैंसों को थोपने का क्रम तो वहीँ से शुरू हुआ न! आखिर क्यों? सिर्फ इसलिए कि इस तथाकथित लोकतंत्र को नेहरू परिवार के राजतन्त्र में बदला जा सके. कम से कम अपने होश में जहाँ से मैं कॉंग्रेस का शासन देख रहा हूँ, वहाँ से कॉंग्रेस नेतृत्व वाली सरकारों में हर पद पर खडाऊं ही बैठे दिख रहे हैं. अगर गलती से भी कहीँ किसी पद पर कोई सही व्यक्ति आ गया तो उसकी चरित्र हत्या का इंतजाम तुरंत शुरू हो जाता है.
विधान सभा चुनाव के दौरान पहली बार जब राजकुमार का मुँह खुला था तो जो वाक्य उनके मुखारविंद से बाहर निकला उसका उद्देश्य दरअसल यही था. लाल बहादुर शास्त्री के बाद पहली बार ऐसा हुआ था कि एक व्यक्ति अपने दम पर देश का प्रधानमंत्री बन गया था, कॉंग्रेस के भीतर और नेहरू परिवार के बाहर होने के बावजूद. देश नरसिंह राव को जिस कंगाल हाल में मिला था वह सभी जानते हैं. राव ने उस हॉल से देश को उबारा ही नहीं, इसे हैसियत वाले देशों की पांत में ले जाकर खड़ा कर दिया. तब जब कि नेहरू परिवार के पिट्ठू लगातार उसकी टाँगें खींचने में जुटे रहे. दक्षिण भारतीय होने के नाते वह अलग सबकी आंखों की किरकिरी बना रहा.

बेशक उस व्यक्ति की आलोचना होनी चाहिए. उन घपलों-घोटालों और सांसदों की खरीद-फरोख्त के लिए जो उसके शासन काल में हुए. लेकिन यह कहने के पहले कि "यदि गाँधी परिवार का कोई ...." अपनी गिरेबान में एक बार झांकना जरूरी हो जाता है. आख़िर रामजन्मभूमि का ताला किसके समय में खुला था और भिंडरावाले को संत किसने बनाया? और छोड़ दीजिए अभी आपने अपने घराने से बाहर के जिस शख्स को प्रधानमंत्री बना रखा है उसकी प्रतिभा की खोज भी उसी व्यक्ति ने की थी. आख़िर राजकुमार क्या बताना चाहते हैं यही न कि उनके परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति देश की बागडोर सँभालने लायक नहीं है और गलती से कोई वहाँ बैठ ही तो भी वह है तो नालायक ही.
यह कहते हुए राजकुमार यह भी भूल जाते हैं कि यह जनादेश का अपमान है या शायद वह जनता को उसकी औकात ही बताना चाहते हों. आख़िर राजकुमार हैं, वह कुछ भी कर सकते हैं. उनका उद्देश्य देश और जनता के लिए कुछ करना नहीं, अपने लिए सिर्फ कुर्सी बचाना है. पिछली पीढी तक के लोगों का अंदाज विनम्रता वाला था, पर नई पीढी का अंदाज जरा अग्रेसिव है. वैसे ही जैसे नए दौर के विज्ञापनों का हो गया है. अगर आपके घर में ये वाली ती वी है तभी आप आदमी हैं और नही तो गधे हैं. ठीक इसी तर्ज पर बताया जा रहा है कि अगर गाँधी परिवार का व्यक्ति प्रधानमंत्री है, तब तो देश देश है और नहीं तो ............. अब यह आप तय करिये कि आप क्या समझना चाहते हैं- वह जो वे आपको समझाना चाहते हैं या वह जो आपके लिए उन्हें समझाना जरूरी हो गया है।
इष्ट देव सांकृत्यायन

Monday, 14 May 2007

इनसे मिलें


जब कभी
हो जाएँ
अनमन,
इनसे मिलें -


पेड-चिड़िया
हवा-बादल.
नदी-झरने
और

गंगाजल.
शिशु चपल की
किलक निर्मल.
रुनझुनाती हुई
पायल.

जब कभी
हो जाएँ
अनमन,

इनसे मिलें.

जब कभी
हो जाए
अनबन,

इनसे मिलें -

फूल-फलियाँ
दूब-जंगल
भौंरे और
तितलियाँ चंचल,
खेत-फसलें
कूप-नहरें
किवाड़-आंगन और
सांकल.

जब कभी
हो जाए
अनबन,
इनसे मिलें.


जब कभी
हो जाएँ
अनमन,
इनसे मिलें.


इष्ट देव सांकृत्यायन


Sunday, 6 May 2007

इन आंखो में

पूरब से
आती है
या
आती है
पश्चिम से -
एक किरण
सूरज की
दिखती है
इन आंखों में.

मैं संकल्पित
जाह्नवी से

कन्धों पर है
कांवर.
आना चाहो

तो
आ जाना
तुम स्वयं
विवर्त से बाहर.

तुमको ढूढूं
मंजरिओं में
तो
पाऊँ शाखों में.
इन आंखों में.

सपने जैसा
शील तुम्हारा
और खयालों सा
रुप.
पानी जीने वाली
मछली ही
पी पाती है
धूप.

तुम तो
बस तुम ही हो
किंचित उपमेय नहीं-
कैसे गिन लूं
तुमको
मैं
लाखों में.
इन आंखों में।

इष्ट देव सांकृत्यायन

Thursday, 3 May 2007

विश्वविजेता बन जाऊं

उस दिल का
परवान नहीं है.
जिसका
कुछ

उनवान नहीं है .

आंख नहीं तो
मन पर
बनता.
अक्स मेरा

छतरी बन तनता.

ग़ैर के गम से
जो न
भरे दिल
कुछ भी हो
इन्सान नहीं है.

सबके होंठों
पर
मुस्कानें.
देखें तो
खुद को
पहचानें.

विश्वविजेता
बन जाऊं
यह
मेरा ही
अरमान नहीं है.


इष्ट देव सांकृत्यायन

Wednesday, 2 May 2007

बचपन

न डरना शेर की दहाड़ से और बकरी
के मिमियाने से डर जाना. गिर पड़ना
आंगन में ठुमकते हुए, हौसला रखना
फिर भी एवरेस्ट के शिखरों पर फतह की.

न समझ पाना छोटी-छोटी बातें और
बेझिझक सुझाना बेहद मुश्किल मसलों
के हल. सूखे हुए पौधों वाले गमलों
में डालना पानी, नोच लेना नए बौर.

रूठ जाना बेबात और फिर न मानना
किसी के मनाने से. खुश हो जाना

ऐसे ही किसी भी बात से. डूब जाना
किसी भी सोच में, वैसे बिल्कुल न समझना

दादी किसकी चिन्ता करती हैं बेकार,
दादा क्या सोचते रहते हैं लगातार?

इष्ट देव सांकृत्यायन






बच्चे

इनकी दुनिया में अभी शेष है प्रेम और
घृणा भी, करुणा और पृहा भी, तृप्ति और तृषा
भी, क्रोध और क्षमा भी, विस्मय और जिज्ञासा
भी, अन्धकार और प्रभा भी, अति संवेद और


निर्वेद भी. इनके लघु गात में है एक
ऐसा दिल जो धड़कने की खानापूरी
नहीं करता. दरअसल धड़कता है पूरी
मुस्तैदी से और उसमें होता है अतिरेक

भावनाओं का. भावनाएँ ही करती
हैं इनके फैसले. बुद्धि के दास नहीं हुए
हैं अभी ये. समझौता शब्द इनके लिए
अबूझ है अभी. क्योंकि ये अनादि सत्यव्रती

जिनने नहीं संभाला अभी अपना होश,
ही हैं निर्गुण, निष्कलुष, निर्विकार और निर्दोष.

इष्ट देव सांकृत्यायन

जगाने मत आना

सोया हूँ
मुझे
जगाने मत आना.
बादल हूँ
मुझ पर
छाने मत आना.

उमड़-घुमड़ कर
और-और सघन
होता जाता हूँ.
किस-किस से
मिलकर
क्या-क्या
खोता-पाता हूँ!

फट जाऊं तो
बह जाएँगे
गिरि-शिखर
न जाने कितने,
इसीलिए उफन-उफन कर भी
मैं कभी नहीं
रोता-गाता हूँ.

अगणित पीड़ाएँ
छिपी हुई हैं
कोनों में,
गिरी यवनिका
आज
उठाने मत आना.

केंद्र वृत्त का
कालाहांडी
और
परिधि पर
चौपाटी है.
बंद-बंद रहने वाला
यह
मेरा मन
बुधना की
पाती है.
दबा-ढका है
जाने क्या-क्या
पर
कुछ भी
छिपा नहीं है,
मेरा खुलना मुश्किल है,
पर
खुलता हूँ
तो मुश्किल हो जाती है.

अपने मन की
अँधेरी बंद गुफा में -
खोया हूँ,
मुझको पाने मत आना.

इष्ट देव सांकृत्यायन

Tuesday, 1 May 2007

बहुत दिनों तक

बहुत दिनों तक
रहा
हमारे जीवन में,
घंटों फिरना बेमतलब
रूमानी होना
दुनिया भर के
मसलों का
बेमानी होना

रहा
हमारे जीवन में

बहुत दिनों तक.


बहुत दिनों तक
रहा
हमारे जीवन में,

साथ हवा के
पत्तों जैसे
हिलना-डुलना.
किस्सों वाली

परियों से
मिलना-जुलना.

हर मुश्किल की
छाती पर
आसानी बोना
रहा हमारे जीवन में
बहुत दिनों तक.


बहुत दिनों तक
रहा
हमारे जीवन में,
आखों में
घिरना बादल
तिरना मोती का.
रोटी के संग
आगे-पीछे
फिरना धोती का.

और अंत में
पाना
सब नादानी होना
रहा
हमारे जीवन में

बहुत दिनों तक.

बहुत दिनों तक
रहा
हमारे जीवन में.



इष्ट देव सांकृत्यायन

बाबा ऊंचे

वह तो
ऐसे ही
कुछ कहता है.
कभी नहीं
सच
लिखता है.

उनके केवल
बाबा ऊंचे

बाबा आदम भी
बौने हैं.
रिश्तों की तो
बात निरर्थक
जंगल के
मृगछौने हैं.

विध्वंस सृजन

और
सृजन विनाश
उनको झूठा ही
सच
दिखता है.

उनका काल
पखेरू बेघर-
उड़ता ऊपर
सिर
नीचे कर.
नई व्यवस्था

वे देंगे
मंगल से फिर
जंगल आकर.


उनकी पूरी दुनिया हाट
ख़ून-पसीना

सब कुछ
बिकता है.

इष्ट देव सांकृत्यायन

कौन गया

मेरे
आंगन के
तुलसीचौरे पर -
दीप जला कर
कौन गया?
शालिग्राम पर
श्रध्दा के
फूल
चढ़ा कर
कौन गया?

टिमटिम करता दिया
न जाने
क्या-क्या
कह जाता है.
सब कुछ
कह कर भी
वह
चुप ही
रह जाता है.

अनमनपन की
चादर ताने
सोया था
मधुमास-
जगा कर
कौन गया?

मैंने ले लिया
न जाने
कैसे
अश्वमेध का संकल्प.
अग्निहोत्र से
बचने का
अब
कोई नहीं
विकल्प.

इस थाली में
कुमकुम
अक्षत
दूब
सजा कर
कौन गया?

इष्ट देव सांकृत्यायन