Thursday, 15 November 2007

अब वह नहीं डरेगा


इष्ट देव सांकृत्यायन
मैडम आज सख्त नाराज हैं. उनकी मानें तो नाराजगी की वजह बिल्कुल जायज है. उन्होने घोषणा कर दी है कि अब घोर कलयुग आ गया है. मेरी मति मारी गई थी जो मैने कह दिया कि यह बात तो मैं तबसे सुनता आ रहा हूँ जब मैं ठीक से सुनना भी सीख नहीं पाया था. कहा जाता था बेईमान तो मैं समझता था बेम्बान. गाया जाता था - "दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए" तो मैं समझता था "दिल चीत क्या है आप मेरी जान लीजिए" और वो जान भी लाइफ वाली नहीं केएनओडब्लू नो वाली. हालांकि तब उसे मैं पढ़ता था कनऊ. अब जब मैं चारों युगों के बारे में जान गया हूँ, जान गया हूँ कि सतयुग में हरिश्चंद्र के सत्यवादी होने का नतीजा क्या हुआ, त्रेतामें श्रवण कुमार और शम्बूक का क्या हुआ, द्वापर में बर्बरीक और अश्वत्थामा के साथ क्या हुआ तो मुझे कलयुग में आजाद, भगत सिंह या सुभाष के हाल पर कोई अफ़सोस नहीं होता.
ये अलग बात है कि मैंने कलयुग को न तो किसी तरफ से आते देखा और न जाते देख रहा हूँ. पर नहीं साहब मैडम का साफ मानना है कि कलयुग आया है और वो जिस तरह इसका दावा कर रहीं हैं उससे तो ऐसा लगता है गोया वो अभी थोड़ी देर पहले कहीं से घूमता-घामता चला आया है. करीब-करीब वैसे ही जैसे किसी वारदात की जगह पर रिपोर्टर पहुंच जाते हैं. अब करीब एक दशक से भी ज्यादा पुराने पति की भला ये बिसात कहाँ है कि इससे ज्यादा जोर दे ! पर बेवजह इस नाचीज को कलयुग लाने के लिए दोषी ठहरा दिया गया है, इस तमगे के साथ कि तुमसे सब्जी तक तो लाई नहीं जाती. पर साहब यह आरोप तो सिद्ध हो गया कि कलयुग को मैं ही लाया और वह भी पांच साल के बालक को उलटी सीधी बातें सिखा कर. दरअसल हुआ यह है कि बालक ने डरने से मना कर दिया है. उसने साफ कह दिया है कि अब वह किसी चीज से नहीं डरेगा. बन्दर से, भालू से, कुत्ते से, बिल्ली से, गन से, कैनन से और यहाँ तक कि आपसे यानी अपनी मम्मी से भी नहीं. मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि जो बात कहने की हिम्मत मैं तेरह साल में नहीं जुटा सका वह उसने पांच साल में कह दी. इसके पहले कि मैं इस बात को लेकर अपने खिलाफ हुए एकतरफा फैसले पर कुछ सोच पाता सलाहू आ धमका है. पेशे से वकील होने के नाते यह तो उसका कर्मसिद्ध अधिकार है ही कि जहाँ भी फटा देखे वहाँ टांग अड़ा दे. यह अलग बात है नाम सलाहुद्दीन होने के बावजूद सलाह कभी मुफ्त में न दे. सो सलाहू ने आते ही भांप लिया कि आज मामला कुछ टेंस है. लिहाजा उसने सवाल भी दाग ही दिया, 'क्या बात है भाई! तुम तो ऐसे मुंह लटकाए बैठे हो गोया मुंह न हुआ गठबंधन सरकार हो गई. कोई खास वजह?'
वजह मुझे बताने की नौबत नहीं आई. मैडम ही शुरू हो गईं, 'ये क्या बताएंगे वजह? बच्चे को ऐसा बिगाड़ दिया है कि अब वह किसी भी चीज से डरने से मना करने लगा है.'
'क्या मतलब?' असल में ऎसी वजह के नाते मुंह लटकाने की बात सलाहू की समझ में नहीं आई, 'अरे बच्चा डरने से मना कर दे तो इसके लिए तो उसकी हिम्मत को दाद दी जानी चाहिए. इसमें भला इसका क्या कसूर हो सकता है भाभी. यह तो खुद आपसे इतना डरता है?' सलाहू ने बचाव पक्ष के सधे हुए वकील की तरह दलील दी. मुझे भी लगा कि चलो साले से दोस्ती किसी दिन तो काम आई. पर मैडम ने बगैर किसी मरव्वत के विद्वान जज की तरह यह दलील खारिज कर दी. 'कसूर है इनका' मैडम ने कहा, 'ऐसे कि पहले जब बच्चा कुछ खाना नहीं खाता था तो में उसे बन्दर आने का डर दिखा कर खाना खिला देती थी. वह बन्दर से डरता था. एक दिन ये उसे जू ले गए. बन्दर दिखाया, लंगूर दिखाया और वन-मानुष दिखाया. आखिरकार ये भी बता दिया कि बन्दर आदमी के पूर्वज हैं. बन्दर से डरने की कोई जरूरत नहीं है. अब अगर कभी छत पर बन्दर आ जाता है तो मैं तो डर के मारे भाग जाती हूँ और मुन्ना उसे फल दे आता है. अब में उसे कैसे डराऊँ?'
सलाहू को मेरे बचाव में अपनी दलील देने का मौका नहीं मिल रहा था. मैडम बूके जा रहीं थीं, 'खैर मैंने उसे कुत्ते से डराना शुरू किया तो वह भी इन्होने ख़त्म कर दिया. फिर मैंने उसे बिल्ली से डराना शुरू किया तो इन्होने उसे घंटी बांधने वाली कहानी सुना दी और समझा दिया कि बिल्ली से सिर्फ चूहे डरा करते हैं. बच्चों को डरने की जरूरत नहीं है. बच्चों की तो वह मौसी होती है. तो अब उसने बिल्ली से भी डरना छोड़ दिया. मैंने सोचा कि ये तो हर चीज से निडर होता जा रहा है तो मैंने इसे ऎसी चीज से डराने की सोच ली जो दिखे ही नहीं. तो मैंने उसे डराने के लिए एक काले कोट वाले बाबा को ईजाद किया. दो-चार दिन डरा, पर आज जब मैं उसे पढ़ने के लिए डरा रही थी तो उसने एकदम से मना कर दिया. बोल दिया कि अब मैं काले कोट वाले बाबा से नहीं डरूंगा. अब मैं किसी भी चीज से नहीं डरूंगा. तब से मैं भालू, गैंडा, शेर जाने क्या-क्या बता चुकी, पर यह नहीं डर रहा है.'
'पर भाभी इसने तो इसे सिर्फ जानवरों से डरने से मना किया था. अब बाबे से अगर बच्चा नहीं डरता और उसने किसी से भी डरने से इनकार कर दिया, यानी चन्द्रशेखर आजाद या भगत सिंह के रास्ते पर चल पडा है तो इसमें मेरे यार की क्या गलती हो सकती है?'
'उसका यह डर गया कैसे है, मालूम है?' मैडम ने त्योरियां चढाए हुए ही सलाहू से पूछा.
सलाहू ने भी सधे हुए वकील की तरह जवाब दिया, 'बता ही दीजिए.'
'हुआ यह की आज सुबह इसने पूछा की पापा ये काले कोट वाला बाबा क्या होता है? तो अब इनको पहले से कुछ पता तो था नहीं. सो इन्होने बताया कि वो तुम्हारे सलाहू अंकल हैं न, वो काला कोट पहनते हैं न! तो उन्हें काले कोट वाला बाबा कहा जाता है. उसने पूछा तो क्या उनसे डरना चाहिए. तो इन्होने बताया कि बिलकुल नहीं. बच्चे कहीं अपने अंकल से डरते हैं! फिर उसने पूछा कि अगर कहीं वो पकड़ लें तो क्या करेंगे? तो इन्होने बता दिया कि तुमको चोकलेट खिलाएंगे और क्या करेंगे. तब से उसने मान लिया है कि मैं हर चीज से उसे झूठ-मूठ में ही डराती हूँ और अब वह किसी भी चीज से नहीं डरेगा.'
'वाह क्या बात है भाभी, आपको तो खुश होना चाहिए. इस बच्चे का विकास तो इस देश की जनता की तरह हो रहा है.' सलाहू ने बहुत भौकाली अंदाज में यह बात कही और मैडम पैर पटकती हुई बेगम सलाहू के साथ किचन की ओर चल पडीं. मुझे भी अपनी जान बख्शी हुई सी लगी. मैं सलाहू की ओर नमूदार हुआ, 'क्यों बे! तू मुन्ने के विकास को जनता के विकास से क्यों जोड़ रहा है?'
'देख भाई!' सलाहू बोला, 'पहले उन्नीसवीं सदी में जब बच्चे डरते थे तो माताएं उन्हें हिम्मत बंधातीं थीं. कोई और सहारा न होने पर खुदा को याद करने या हनुमान जी का नाम लेने के लिए कहती थीं. तब देश में अंग्रेजों की हुकूमत थी. देश में डर ही डर था. सरकार का डर, ठगों का डर, पुलिस का डर, साहूकार का डर, जमींदार का डर ..... सिर्फ डर ही डर था. तो माताएँ डर से मुक्त करने के लिए देवी-देवताओं या वीरों-वीरांगनाओं की याद दिलातीं थीं. फिर देश आजाद हो गया. लोकतंत्र आ गया. डर भाग गया तो हमारे हुक्मरानों को लगा कि ऐसे कैसे काम चलेगा. तो उन्होने नए-नए डर बनाने शुरू किए. ऐसे कि जिनसे आम आदमी तो डरे पर उनकी सेहत पर कोई फर्क न पड़े. सो उन्होने डराने की नई-नई तरकीबें ईजाद कीं और उसके लिए मशीनरी बनाई. जनता बहुत दिनों तक उससे डरती रही. उसी दौरान माताओं ने भी डर की अहमियत को समझते हुए बच्चों को डराना शुरू किया .... बेटा सो जा नहीं तौ गब्बर आ जाएगा. फिर बच्चा डरने लगा.
लेकिन डरने का यह दौर बहुत दिन चला नहीं, न तो बच्चों पर और न जनता पर. जनता ने देखा कि उनके लिए जो सिपाही हैं नेताओं के लिए बिजूके हैं. बडे लोग जब अपराध करते हैं तो उनको यही बचाते हैं और जनता को डराते हैं. फिर हम क्यों डरें? लिहाजा उसने डरने से एक दिन इनकार कर दिया. वैसे ही जैसे किसी दिन आजाद, मंगल, भगत ने कर दिया था. अब बच्चे को अगर मां डराती है तो वह कहता है की- अच्छा तो मुझे जल्दी से पिज्जा दिलाओ. नहीं तौ में पापा को बता दूंगा की रोज रात को यहाँ गब्बर आता है. इसी तरह नेताजी जब जनता को डराते हैं कि पुलिस बुला दूंगा तौ वह जूता उठा लेती है. नेता वोट मांगने जाते हैं तौ वह डिग्री मांगने लगती है. जनरल साहब इमरजेंसी लगाते हैं तौ वह बगावत पर उतर आती है. अरे भाई अब अगर बच्चा बोल पडा कि में तो नहीं डरूँगा तो इसमें हैरत की बात क्या है? आखिर एक न एक दिन तो यह होना ही था, वैसे जैसे देश की जनता ........

2 comments:

  1. बहुत बढिया लगा लेख। आज कोई किसी से डरना नही चाहता।...अब डराने वालों को, डरानें के लिए कोई नयी खोज करनी पड़ेगी।

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  2. भाभी जी नाराज हो गई हैं क्या? सीधे-सीधे कहिए। अगर नाराज हैं तो मनाने की कोशिश करिए। ई लेख और पोथा लिखने से नहीं चलेगा।
    व्यंग्य बढ़िया है। आम लोगों में से डर निकालकर ही तो गांधी ने विकलांग हो चुके देशवासियों को अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा कर दिया था। अब डर तो कम है। लेकिन देश के लोग गुलामीपसंद टाइप के है। स्वतंत्रता के समय अपने देवी-देवताओं और वीरों का आह्वान करते हुए कुछ नेताओं के पीछे -पीछे चलते रहे। आम लोग खुद को बेहतर या खुद को नेता नहीं सोच सकता । एक खानदान या एक व्यक्तित्व के पीछे दौड़ता है।
    डर निकालने के साथ ही आम जनता के मन से गुलामी की मानसिकता भी निकालने की जरूरत है जो उसके मन में दो हजार साल पहले शुरु हुए राजशाही के समय से ही बसी है।
    उम्मीद है कि आप नहीं तो आपके सलाहू यह काम करेंगे।

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