Friday, 19 October 2007

चलना है

रतन
उम्र भर रात-दिन औ सुबहो-शाम चलना है
ये जिन्दगी है सफर याँ मुदाम चलना है

ये हैं तकदीर की बातें नसीब का लिखा
किसी को तेज किसी को खिराम चलना है

लाख रोके से रुकेगा नहीं इंसान यहाँ
जब भी आया है खुदा का पयाम चलना है
नहीं है एक कोई दुनिया से जाने वाला
आज मैं कल वो इस तरह तमाम चलना है
गलत किया है नहीं गर खता हुई हो कभी
माफ़ करना मुझे सब राम-राम चलना है
ज्यों यहाँ हम रहे खुशहाल वहाँ भी यों रहें
लबों पे लेके खुशनुमा कलाम चलना है

रतन हैं साथ सफर होगी हंसी अहले-जहाँ
कुबूल कीजिए मेरा सलाम चलना है

1 comment:

  1. रतन हैं साथ सफर होगी हंसी अहले-जहाँ
    कुबूल कीजिए मेरा सलाम चलना है


    -कबूल भी किया और आपको दाद भी दी. बहुत उम्दा गज़ल.

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