Monday, 8 October 2007

अशआर


-विनय ओझा स्नेहिल


मुस्कराहट पाल कर होंठों पे देखो दोस्तों-
मुस्करा देगा यकीनन गम भी तुमको देखकर.

थाम लेगा एकदिन दामान तुम्हारा आस्मां -
थोड़ा थोड़ा रोज़ तुम ऊँचा अगर उठते रहे.

यह और है कि हसीनों के मुँह नहीं लगते-
वरना रखते हैं जिगर हम भी अपने सीने में.

पाँव में ज़ोर है तो मिल के रहेगी मंज़िल -
रोक ले पाँव जो ऐसा कोई पत्थर ही नहीं.

1 comment:

  1. थाम लेगा एकदिन दामान तुम्हारा आस्मां -
    थोड़ा थोड़ा रोज़ तुम ऊँचा अगर उठते रहे.

    nice one....

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