Friday, 5 October 2007

बर्मा में ब्लॉगर्स पर पहरा और हमारे लिए इसका मतलब?

-दिलीप मंडल

बर्मा यानी म्यांमार में सरकार ने इंटरनेट कनेक्शन बंद कर दिए हैंइससे पहले वहां की सबसे बड़ी और सरकारीइंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर कंपनी बागान साइबरटेक ने इंटरनेट कनेक्शन की स्पीड इतनी कम कर दी थी कि फोटोअपलोड और डाउनलोड करना नामुमकिन हो गयासाथ ही साइबर कैफे बंद करा दिए गए हैंबर्मा के ब्लॉग केबारे में ये खबर जरूर देखें- Myanmar's blogs of bloodshed

बर्मा में फौजी तानाशाही को विभत्स चेहरा अगर दुनियाके सामने पाया तो इसका श्रेय वहां के ब्लॉगर्स को हीजाता हैवहां की खबरें, दमन की तस्वीरें बर्मा के ब्लॉगर्सके जरिए ही हम तक पहुंचींबर्मा में एक फीसदी से भीकम आबादी की इंटरनेट तक पहुंच हैफिर भी ऐसे समयमें जब संचार के बाकी माध्यम या तो सरकारी कब्जे में हैंया फिर किसी किसी तरह से उन्हें चुप करा दिया गयाहै, तब बर्मा के ब्लॉगर्स ने सूचना महामार्ग पर अपनीदमदार मौजूदगी दर्ज कराईअमेरिका में युद्ध विरोधीआंदोलन के बाद ब्लॉग का विश्व राजनीति में ये शायदसबसे बड़ा हस्तक्षेप हैब्लॉग की लोकतांत्रिक क्षमता कोइन घटनाओं ने साबित किया है

लेकिन भारतीय ब्लॉगर्स के लिए भी क्या इन घटनाओं काकोई मतलब है? आप अपने लिए इसका जो भी मतलबनिकालें उससे पहले कृपया इन तथ्यों पर विचार कर लें

-जिस समय बर्मा में दमन चल रहा है, उसी दौरान भारत के पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा बर्मा का दौरा कर आएहैंभारत को बर्मा का नैचुरल गैस चाहिएइसके लिए अगर विश्व स्तर पर थू-थू झेलनी पड़े तो इसकी परवाहकिसे हैफिर चीन को भी तो बर्मी नैचुरल गैस चाहिए
-भारत सरकार सिर्फ बर्मा के सैनिक शासन को मान्यता देता है और उससे व्यापारिक और राजनयिक संबंधरखता है, बल्कि इन संबंधों को और मजबूत भी करना चाहता है
-भारत में सुचना प्रवाह पर पहरे लगाने के कई प्रयोग हो चुके हैंइमरजेंसी उसमें सबसे बदनाम हैलेकिनइमरजेंसी के बगैर भी बोलने और अपनी बात औरों तक पहुंचाने की आजादी पर कई बार नियंत्रण लगाने कीसफल और असफल कोशिश हो चुकी है
-इसके लिए एक कानून बनने ही वाला हैसरकार वैसे भी केबल एक्ट के तहत चैनल को बैन करने का अधिकारअपने हाथ में ले चुकी है और इसका इस्तेमाल करने लगी है
-पसंद आने वाली किताब से लेकर पेंटिंग और फिल्मों तक को लोगों तक पहुंचने देने से रोकने में कांग्रेस औरबीजेपी दोनों किसी से कम नहीं हैलोकतंत्र दोनों के स्वभाव में नहीं है

और बात ब्लॉग की

-अभी शायद भारतीय ब्लॉग की ताकत इतनी नहीं बन पाई है कि सरकार का ध्यान इस ओर जाए
-ब्लॉग के कंटेट में भी गपशप ज्यादा और प्रतिरोध का स्वर कम हैहम इस मामले में बर्मा के ब्लॉगर्स से पीछे हैं
-ब्लॉग पर सेंसर लगाने का कानूनी अधिकार सरकार के पास हैइसके लिए उसे कोई नया कानून नहीं बनानाहोगा
-आईपी एड्रेस के जरिए ब्लॉगर तक पहुंचने का तरीका हमारी पुलिस जानती है

इसलिए ब्लॉगिंग करते समय इस गलतफहमी में रहें कि किसे परवाह हैअगर आप परवाह करने लायक लिखरहे हैं तो परवाह करने वाले मौजूद हैंऔर फिर जो लोग आजादी की कीमत नहीं जानते वो अपनी आजादी खो देनेके लिए अभिशप्त होते हैं

5 comments:

  1. हिन्दी ब्लॉगर को अभी से अपनी एकता का परिचय देना होगा। नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब भारतीय ब्लॉगर भी इस लपेटे से दूर रह सकें।

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  2. अभिव्यक्ति के खतरे उठाने होंगे।

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  3. जी हां, यह बात मैं कब से बार-बार कह रहा हूं, अपने चिट्ठाकार साथियों से।

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  4. दिलीप भाई! मैं शुरू से ही ब्लागिंग की इस संभावना और खतरे को जानता हूँ. हमारे जैसे तमाम लोग इसी इरादे से ब्लागिंग की दुनिया में आए भी हैं. आज नहीं तो कल, यहाँ भी ब्लॉग पूजीवादी मीडिया का विकल्प बन जाएगा. एक ऐसे समय में जबकि पत्रकारिता ही नहीं अभिव्यक्ति के सरे माध्यम उद्योग बन गए हों और तथाकथित प्रगतिशील किताबी साहित्य केवल पुस्तकालयों में दफन हो कर रह गया हो, ब्लॉग मजबूत विकल्प के रूप में उभरेगा ही. इसकी शुरुआत भी करीब-करीब हो ही चुकी है.

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