Thursday, 13 September 2007

ग़ज़ल

विनय ओझा स्नेहिल
हर एक शख्स बेज़ुबान यहाँ मिलता है.
सभी के क़त्ल का बयान कहाँ मिलता है..

यह और बात है उड़ सकते हैं सभी पंछी -
फिर भी हर एक को आसमान कहाँ मिलता है..

सात दिन हो गए पर नींद ही नहीं आयी -
दिल को दंगों में इत्मीनान कहाँ मिलता है..

न जाने कितनी रोज़ चील कौवे खाते हैं -
हर एक लाश को शमशान कहाँ मिलता है..

4 comments:

  1. वाह विनय भाई!! बहुत खूब!!

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  2. शब्द ऐसे बाँधे हैं कि बहुत प्रभावित करते हैं।

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  3. न जाने कितनी रोज़ चील कौवे खाते हैं -
    हर एक लाश को शमशान कहाँ मिलता है..

    बहुत खूब

    कुछ इसी तरह कभी मैने लिखा था,

    कौन कह रहा हर मिट्टी को मिल जाते हैं काँधे चार,
    लावारिस बैरक में इतनी लाशें सड़तीं क्यों आखिर?

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