Sunday, 30 September 2007

और भाग चले बापू

इष्ट देव सांकृत्यायन
अभी कल ही मैने एक कविता पढी है. चूंकि कविता मुझे अच्छी लगी, इसलिए मैने उस पर टिप्पणी भी की है। कवि ने कहा है कि उनका मन एक शाश्वत टाईप का नाला है. उससे लगातार सड़ांध आती है. हालांकि उस मन यानी नाले का कोई ओर-छोर नहीं है. उसका छोर क्या है यह तो मुझे भी नहीं दिखा, लेकिन ओर क्या है वह मुझे तुरंत दिख गया. असल में मैं कलियुग का संजय हूँ न, तो मेरे पास एक दिव्यदृष्टि है. अपने कुछ सुपरहिट टाइप भाई बंधुओं की तरह चूंकि मुझे उस दिव्यदृष्टि का असली सदुपयोग करना नहीं आता, इसलिए मैं उसका इसी तरह से फालतू इस्तेमाल करता रहता हूँ. लोग मेरी बेवकूफी को बेवकूफी के बजाय महानता समझें, इसके लिए अपनी उस दृष्टि के फालतू उपयोग के अलावा कुछ और फालतू काम करके मैं यह साबित करने की कोशिश भी करता रहता हूँ मैं उनके जैसा नहीं हूँ. उनसे अलग हूँ.
ये अलग बात है कि कई बार तो मुझे खुद अपनी इस बेवकूफी पर हँसी आती है। अरे भाई दुनिया जानती है कि बेवकूफ समझदारों से अलग होते हैं. इसमें बताने और साबित करने की क्या बात है? हाथ कंगन को आरसी क्या, पढे-लिखे को फारसी क्या? साबित तो हमेशा उलटी बातें होती हैं. और हों भी क्यों न! जो लोग देश-विदेश के बडे-बडे सौदों में दलाली के सबूत जेब में लेकर घूमते हैं मुकदमे की सुनवाई के लिए जब वही कचहरी पहुँचते हैं तो उनकी जेब ही कट जाती है. अब बताइए ऎसी स्थिति में दलाली ही क्यों, क़त्ल का भी जुर्म भला कैसे साबित होगा? वैसे भी जल्दी ही दो अक्टूबर आने वाला है और बापू ने कहा है कि घृणा पाप से करो, पापी से नहीं. अब बताइए, जब बापू की बात पूरी दुनिया मानती है तो हम कैसे न मानें?

इसीलिए हम कमीशन खाने या क़त्ल करने वालों को सजा नहीं देते. उन्हें मंत्री बनाते हैं. दे देते हैं उन्हें पूरा मौका कि खा लो और जितना चाहो कमीशन. आखिर कब तक नहीं भरेगा तुम्हारा पेट? कर लो और जितने चाहो क़त्ल या अपहरण, एक दिन तुम भी अंगुलिमाल की तरह बदल जाओगे. ये अलग बात है कि उनके आज तक बदलने की बात कौन कहे, वे अपने परम्परागत संस्कारों को ही और ज्यादा पुख्ता करते चले गए हैं. फिर भी हम हिम्मत नहीं हारे हैं और न ऊबे ही हैं. इसकी प्रेरणा भी हमें अपनी परम्परा से ही मिली है. बापू से भी पहले से हमारे पूर्वज 'दीर्घसूत्री होने' यानी लंबी रेस के घोड़े बनने पर जोर देते आए हैं.
इसीलिए देखिए, अपनी आजादी के सठिया जाने के बाद भी हम धैर्यपूर्वक देख रहे हैं और बार-बार उन्हें सत्ता में बने रहने का मौका देते जा रहे हैं.
लेकिन उस कविता पर टिप्पणी करते हुए मुझसे एक गलती हो गई. अखबार की नौकरी और वह भी लंबे समय तक पहले पन्ने की तारबाबूगिरी करने का नतीजा यह हुआ है कि मेरा पूरा व्यक्तित्व ही अख्बरिया गया है. थोडा जल्दबाजी का शिकार हो गया हूँ. तो टिप्पणी करने में भी जल्दबाजी कर दी. ज्यादा सोचा नहीं. बस तुरंत जो दिखा वही लिख दिया. महाभारत के संजय की तरह. नए दौर के अपने दूरंदेश साथियों की तरह उसका फालो अप पहले से सोच कर नहीं रखा. बता दिया कि भाई आपके ऐसे बस्सैने मन का अंत चाहे जहाँ हो, पर उसकी आदि भारत की संसद है.
बस इसी बात पर रात मुझे बापू यानी गान्ही बाबा ने घेर लिया. पहले तो अपने उपदेशों की लंबी सी झाड़ पिलाई. मैं तो डर ही गया कि कहीँ यह सत्याग्रह या आमरण अनशन ही न करने लगें. पर उन्होने ऐसा कुछ किया नहीं. जैसे पुलिस वाले किसी निरीह प्राणी को भरपूर पीट लेने के बाद उससे पूछते हैं कि बोल तुमने चोरी की थी न? अब बेचारा मरे, क्या न करे? या तो बेचारा पिटे या फिर बिन किए कबूल ले कि हाँ मैने चोरी की थी.
बहरहाल, बापू ने मुझसे सवाल किया कि बेटा तुमने संसद ही क्यों लिखा? मुझे तुरंत युधिष्ठिर याद आए, जिन्हे मैने द्वापर में यक्ष के पांच सवाल झेलते देखा था। मुझे लगा कि कहीँ मुझे भी बापू के पांच सवाल न झेलने पड़ें. बल्कि एक बार को तो मुझे लगा कि कहीँ यही द्वापर में यक्ष का रूप लेकर तो नहीं बैठ गए थे. लेकिन जल्दी ही इस शंका का समाधान हो गया. मैने अपने ध्यान की धारा थोड़ी गहरी की तो यक्ष की जगह मुझे राम जेठमलानी बैठे दिखे और बापू ने डांटा भी, 'तुमने सोच कैसे लिया कि ऐसे फालतू के सवाल मैं कर सकता हूँ?'

आख़िरकार मैंने थोड़ी हिम्मत बाँधी और डरते-डरते जवाब दिया, 'बापू क्या बताऊँ। असल में मुझे सारी गंदगी वहीं से निकलती दिखाई देती है. सो लिख दिया. अगर ग़लती हो गई हो तो कृपया माफ़ करें.' 'अरे माफ कैसे कर दूं?' बापू गरजे. जैसे रामायण सीरियल में अरविंद त्रिवेदी गरजा करते थे. 'तुम कभी तहसील के दफ्तर में गए हो?' मैं कहता क्या! बस हाँ में मुंडी हिला दी. बापू तरेरे, 'क्या देखा वहाँ मूर्ख? घुरहू की जमीन निरहू बेच देते हैं और वह भी बीस साल पहले मर चुके मोलहू के नाम. सौ रुपये दिए बग़ैर तुमको अपनी ही जमीन का इंतखाप नहीं मिल सकता और हजार रुपये खर्च कर दो तो सरकार की जमीन तुम्हारे नाम. बताओ इससे ज्यादा गंदगी कहाँ हो सकती है?' मैं क्या करता! फिर से आत्मसमर्पण कर दिया. बापू बोले, 'चल मैं बताता हूँ. कभी अस्पताल गया है?'
इस सवाल का जवाब सोचते ही मैं सिर से पैर तक काँप उठा। में फिर अपनी दिव्य दृष्टि से देख रहा था. सफ़ेद कोट पहने और गले में स्टेथस्कोप लटकाए कुछ गिद्ध एक मर चुके मनुष्य के जिंदा परिजनों को नोच रहे थे. मैं जुगुप्सा और भय से काँपता बापू के पैरों पर पड़ता इससे पहले ही बापू ने लगाई मुझे एक लाठी. बोले, 'चल अभी मैं तुझे मैं तुझे नए जमाने के शिक्षा मंदिर दिखाता हूँ.' मैंने आंख बंद की तो सामने एक चमाचम इंटरनेशनल स्कूल था और दूसरी तरफ एक टुटही इन्वर्सिटी. स्कूल में सुन्दर-सुन्दर कपडे पहने मोटे-मोटे जोंक प्लास्टिक के गुद्दों जैसे सुन्दर-सुन्दर बच्चों के हांफते-कांपते अभिभावकों के शरीर पर लिपटे पडे थे. जोंक अंगरेजी झाड़ रहे थे और अभिभावक बेचारे भीतर ही भीतर कराहते हुए उज्बकों की तरह यस् सिर यस् मैम किए जा रहे थे. उधर इन्वर्सिटी में एक वीसी नाम के प्राणी एक हाथ से नेताजी के चरण चंपने और दूसरे हाथ से विद्यार्थियों और सेवार्थियों से नोट बटोरने में लगे थे. वहीं कुछ आज्ञाकारी विद्यार्थी नेता एक निरीह टाइप प्रोफेसर, जो केवल अपना विषय पढ़ाना ही जानता था, उसे ठोंकने में लगे थे. इसके आगे मुझसे देखा नहीं जा रहा था. मैं गिड़गिड़ाया, 'बस बापू.'

पर बापू कहाँ मानने वाले थे. वह गरजे, 'चुप बे. अभी तूने कचहरी कहाँ देखी?' वह दृश्य सोच कर ही मैं काँप उठा. मैंने सपने में भी अपनी आँखें किचकिचा कर बंद कर लीं. मैं सपने में ही गिड़गिड़ाया, 'नहीं बापू. अब रहने दीजिए. मैं तो यह सोच कर काँप रहा हूँ कि इतनी सारी जगहों से निकलने वाले गंदगी के हजारों नाले-परलाने-नद-महानद सब जाते होंगे?'
अब बापू खुद रुआंसे हो गए थे. करुणा से भरे स्वर में उन्होने कहा, 'कैसी विडम्बना है कि अब बच्चे अपना घर भी नहीं पहचानते. अरे मूर्ख देख जहाँ तू जी रहा है. मीडिया, साहित्य, सिनेमा ....... इतने तो महासागर हैं इन नालों-महानदों के गंतव्य. और कहाँ जाएंगे.' नींद में ही जो सड़ांध मुझे आई कि मैं असमय जाग उठा. फिर मैंने उस सड़ांध को धन्यवाद दिया. क्योंकि, जैसा कि कहा जाता है, अंग्रेजों से भी न डरने वाले बापू शायद उस सड़ांध के ही भय से भाग चुके थे. मैं आश्वस्त था कि अब वे दुबारा मेरे पास फटकने वाले नहीं थे.

4 comments:

  1. वैसे विकास बाबू की कविता पर आपकी टिप्पणी देखकर लग गया था कि कहीं कुछ लफड़ा जरुर फंसेगा-और देखिये, बापू आकर घेर लिये. हा हा!!


    --बहुत बढ़िया लिखा है. अब नहीं आयेंगे. फिर से निश्चिंत होकर टीपना शुरु करें. :)

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  2. ये तो मुन्नाभाई की सीक्वल हो गई। गांधी के बहाने अच्छी बात कही है। मौका भी अच्छा था। कल बापू की जयंती जो है।

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  3. अपने आप पर गर्व हो रहा है. जिस सड़ंध को बापू नहीं झेल पाये और एक गोली खा सटक लिये, वह हम सतत झेले जा रहे हैं और सटकने का विचार तक नहीं ला रहे मन में.
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    बहुत बढ़िया लिखा है.

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  4. मेरी कविता अच्छी लगी :O
    उसे आपने कविता कह के सम्मानित किया, इसी बोझ से मरा जा रहा हूँ.

    इतना अच्छा लेख पढ़ाने के लिये धन्यवाद!

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