Thursday, 13 September 2007

मौत का एक दिन ....


हरिशंकर राढ़ी
मौत और मनुष्य का पारस्परिक संबंध विश्वविख्यात है. मृत्यु जैसा समर्पण मानवमात्र के प्रति और किसी का हो ही नहीं सकता. मनुष्य कितना भी भागे, कितना भी दुत्कारे पर मृत्यु का प्रेम उसके प्रति लेशमात्र भी कम नहीं. विश्व साहित्य मे प्रेम के ऐसे उदहारण इक्के-दुक्के ही मिलते हैं. जिस प्रकार चकोर का एकंनिष्ठ प्रेम चंद्रमा के प्रति होता है, रावण का राम के प्रति था, सूर्पनखा का लक्ष्मन के प्रति था, उसी प्रकार मृत्यु का एकांग प्रेम प्राणिमात्र के प्रति होता है.
जीवन भर आप सुविधानुसार चाहे कितने ही लोंगो से प्रेम कर लें, पर कुमारी मृत्यु देवी का बाहुपाश मिलने के बाद आप किसी और से प्रेम नहीं कर सकते हैं. उन्हें सौतन कतई स्वीकार नहीं है. अपना देस तो महान है. सो आप जानते ही हैं, यहाँ की उदारता का कोई जवाब नहीं है. मौत से कन्नी काटने के जब सभी जुगाड़ ठप हो जाते हैं तो बुजुर्ग इसे प्रेमिका मान लेते हैं.
उन्हें मालूम है कि अब टांगो मे भागने का दम नहीं है. इस उम्र में कोई प्रेमिका अव्वल तो मिलेगी नहीं, खुदा-न- खास्ता मिल भी गयी तो वह किसी कोण से मृत्यु से कम खतरनाक नहीं होगी. कब गच्चा दे जाये, कोई भरोसा नहीं. इससे अच्छी तो मौत ही है. कम से कम गच्चा तो नहीं देगी.
कुछ दार्शनिक भाई मौत को रहस्य मानते हैं. इस विचारधारा को कोई चुनौती नहीं दे सकता है. कोई प्रतिवाद नहीं करता है. जब आज तक दार्शनिक भाई ही समझ में नहीं आये तो उनकी परिभाषा कैसे समझ आ सकती है? शर्माजी भाषा विज्ञानी हैं. पूछा - मौत क्या है? बोले - भाव वाचक संज्ञा. सन्तुष्ट नहीं हुआ. मन पुनः प्रश्न कर बैठा-जिसके नाम से बडे बडे संज्ञा शून्य हो जाते हैं, वह संज्ञा कैसे हो सकती है? शर्माजी डर गए. कुछ तो डर से मर जाते हैं. सभी नही डरते. नचिकेता ऐसे ही थे.
पिताजी ने कहा कि यमराज के पास जाओ तो चल दिए. उनकी तरफ एकतरफा यातायात है. आप जा तो सकते हैं पर आ नहीं सकते. पर नचिकेता गए. यमराज महोदय कहीं बाहर दौरे पर थे. बड़ी प्रतीक्षा की. बोले-यमराज भी कोई भारत सरकार के मंत्री हैं कि नही मिलेंगे? पहली बार तो एक सदस्यीय शिष्ट मंडल मिलने आया है. नहीं मिलेंगे. हूँ. यमराज भी डर गए. मौत भी डर गयी. हाँथ-पाँव जोड़कर जैसे-तैसे वापस किया. हिंदुस्तान का आदमी है. कहीं सुख सुविधा देखकर ठहर गया तो खैर नहीं. तबसे मौत की प्रतिष्ठा गिर गयी. बन्दर घुड़की देती है. रही सही कसर सावित्री ने पूरी कर दी.
मौत कभी सीधी नहीं आती है। बहाने ढूँढ कर आती है. इसलिये मैं ज्ञानियों के उस वर्ग का सम्मान करता हूँ जो मौत को प्रेमिका मानते हैं. मौत और प्रेमिका मे यहाँ विकट साम्य है. दोनो ही मिलने के बहाने ढूँढती हैं. कभी नोट्स के बहाने तो कभी नींबू मांगने के बहाने. मौत को भी कभी नजला-जुकाम का बहाना मिलता है, तो कभी महामारी का. मगर आयेगी बहाने से ही. अब देखिए किसे बहाना लगता है, किसे नहीं.

2 comments:

  1. मृत्यु तो शेरनी है. हमसे प्रेम करेगी तो हम क्या करेंगे. जो करना है वह शेरनी ही करेगी! :)

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  2. साँसों की आदत ना ड़ाल
    यह मौत ने किश्तों में बाँटी है
    बहानों की इसे क्या जरूरत
    सच्ची वफादार साथी है

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