Tuesday, 14 August 2007

...अहले दुनिया होएगा


सबका होना या न होना यह जरूरी है नहीं
मेरे होने की इयत्ता अहले दुनिया होएगा
आसमान भी होएगा सागर, जमीं भी होएगी
हम अभी से क्यों बताएं, और क्या-क्या होएगा
होंगी सब रंगीनियाँ, जन्नत-जहन्नुम होएँगे
आने-जाने के लिए वां साजो-सामां होएगा
तुम रहोगे, हम रहेंगे, फिर वही दुनिया हुई
फिर वही साकी रहेगी और पैमां होएगा
हो गए दुनिया से रुखसत जो सिकंदर लोग थे
संग उनके ऐ जमाने अपना अफसां होएगा
रतन

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