Tuesday, 21 August 2007

फिर क्या कहना ?


लोकतंत्र में अपराधी को माल्यार्पण फिर क्या कहना ?
जेल से आकर जनसेवा का शपथग्रहण फिर क्या कहना ?

जिनके हाथ मे ख़ून के धब्बे चौरासी के दंगो के-
बापू की प्रतिमा का उनसे अनावरण फिर क्या कहना ?

एक
विधेयक लाभों के पद पर बैठाने की खातिर।
लाभरहित सूची मे उसका नामकरण फिर क्या कहना ?

फाँसी पर झूले थे कितने जिस आज़ादी की खातिर -
सिर्फ दाबती खादी ही के आज चरण फिर क्या कहना ?

बार बार मैं दिखलाता हूँ अपने हाथों मे लेकर -
नहीं देखते अपना चेहरा ले दर्पण फिर क्या कहना ?

विनय ओझा स्नेहिल

1 comment:

  1. कह दिया कुल सात वाक्य में
    आपने,
    जो हम कह पाते सत्तर में.
    दे दिये आपने सात तथ्य
    जिस पर हम सोचेंगे कम
    से कम पूरे हफ्ते !
    फिर भी
    शायद समझ में ना आये
    पूरी तरह कि,
    कैसी प्रभु यह है
    विडंबना !!

    -- शास्त्री जे सी फिलिप

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info

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