Saturday, 11 August 2007

मैं तो बनूगा आकंत्वादी


छोटू पंडित जिद पर अड़ गए हैं. अब वह बिल्कुल कुछ भी मानने के लिए तैयार नहीं हैं. ऐसे जैसे भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस के अध्यक्ष हो गए हों. देश कहा करे उसे जो कहना हो, पर मैं तो वही करूंगा जो मुझे करना है.
अभी तीन दिन पहले तक वह पाइलट बनना चाहते थे, पर अब नहीं बनना चाहते वह पाइलट. आसमान में ऊंचे, और ऊंचे, और-और ऊंचे उड़ते एरोप्लेन आजकल उन्हें बिल्कुल नहीं लुभा रहे हैं. अब वह बादल से भी बडे भी नहीं होना चाहते. अब वह सिर्फ और सिर्फ आकंत्वादी बनना चाहते हैं. उनकी इस चाहत के पीछे बडे ठोस कारण हैं. करीब-करीब उतने ही ठोस जितने कि अमेरिका के साथ हुई भारत की परमाणु अप्रसार संधि, नंदीग्राम में किसानों की कुटाई, समुद्र में मौजूद पुल की तुडाई और जम्बूद्वीप के भारतखण्ड के कई राज्यों में सेज बिछाए जाने के पीछे हैं. शुरुआत कुछ यूँ हुई थी कि टीवी पर कोई कार्यक्रम आ रहा था बच्चों का. मास्टर और सलाहू मेरे साथ चाय पी रहे थे और छोटू पंडित मगन होकर देखे जा रहे थे प्रोग्राम. बिल्कुल खल्वाट खोपडीधारी और हीरो कहे जाने वाले एक सज्जन बच्चों से सवाल कर रहे थे. एक बच्चे से उन्होने पूछा, "बडे होकार आप क्या बनेंगे बेटे?"
"पुलिछ अंकल", बेटे ने बताया.
"अरे वाह-वाह! आप तो बहुत बहादुर लगते हैं." अंकल जी टिप्पणी कर रहे थे. फिर पूछा उन्होने, "अच्छा ये बताइए आप पुलिछ ही क्यों बनाना चाहते हैं."
बच्चा थोड़ी देर तो इधर-उधर ताकता रहा. फिर उसने जवाब दिया, "वो मेरे कोलोनी में न एक बार एक चोर आया था. उसे मार तो दिया लोगों ने. पर जब वो मर के जमीन पर पड़ा था तो फिर पुलिछ आई. उछ चोर की जेब में जो कुछ भी था न वो छब पुलिछ ने निकाल लिया. फिर चोर का छारा पैचा पुलिछ का हो गया."
बेचारे अंकल जी की अकल अब ठिकाने लग गई थी. बगलें झाँकने लगे. हार कर वो हें-हें-हें करने लगे और उधर पब्लिक हां-हां-हां करने लगी. इधर मास्टर को खुराफात सूझ गई. वो छोटू पंडित के मुँह लग बैठा. "क्यों भाई छोटू जी बताइए आप क्या बनेंगे?" "मैं", छोटू जी कूदे जोर से, "मैं तो आकंत्वादी बनूँगा बच्छ."
आकंत्वादी यानी आतंकवादी. यह जान कर सबकी हालत वही हुई जो अमेरिका के तेवर जान कर पाकिस्तान के राष्ट्रपति की होती है. सभी सन्न. पर मास्टर को थोड़ी ही देर में चुहल सूझने लगी. जैसे बाढ़पीड़ितों को देख कर सरकारी इंजीनियरों को सूझती है. "अच्छा ये बताओ भाई तुम क्यों बनना चाहते हो आकंत्वादी?"
"वो आप नहीं जानते? वो जो आकंत्वादी होता है न, उच्छे छ्बी दलते हैं. पुलिछ भी." ये छोटू जी का जवाब था.
"तो तुम सबको डराना चाहते हो?" मास्टर का सवाल था.
"हाँ तब ओल क्या?"
"लेकिन तुम क्यों सबको डरना चाहते हो भाई?"
"अले बिना दले कोई कुछ कलता ही नीं है."
"ऐसा तुमने कैसे जान लिया भाई?" मास्टर को मजा आने लगा था.
"अब जैछे देखिए अमेलिका है न, उच्छे छब दलते हैं. तो छब उछ्की बात भी मानते हैं."
"हाँ देखिए. पाकिस्तान इंडिया की बात मानता ही नहीं है. अमेरिका की बात तुरंत मान जाते हैं." यह बडे मियां थे.
"पर अमेरिका कोई आतंकवादी थोड़े है. वो तो एक बड़ा देश है बेटा."
"आतंकवादी भी कोई अलग चीज थोड़े होता है. वो भी तो आदमी होता है. आदमी में जिसके पास ज्यादा ताक़त हो जाती है वो आतंकवादी हो जाता है."
बडे मियां की इस व्यावहारिक परिभाषा ने हमें वैसे ही हिला दिया जैसे मैडम की त्यौरी हिला देती है पीएम को. सलाहू ने बच्चों के खतरनाक इरादे भांप लिए थे. लिहाजा उसने समझाने की कोशिश की, "एक बात जानते हो बेटा?"
"क्या?"
"आंतकवादी जब पकडे जाते हैं तो उनको बहुत मार पड़ती है."
"अले सब झूठ-झूठ बोलते हैं."
हम सब हक्के-बक्के रह गए थे. सलाहू बडे मियां से मुखातिब हुआ, "क्यों भाई! समझाओ अपने भाई को."
"वो ठीक तो कह रहा है अंकल" बडे मियां ने और चौका दिया, "आपको मालुम है कोई भी जब पकडा जाता है तो पहले उसको कोर्ट में ले जाया जाता है. "
यूँ तो सलाहू को अपनी वकालत डगमगाती दिखने लगी थी, फिर भी उसने पूछा,"वहाँ जानते हो क्या होता है?"
"हाँ"
"अच्छा तो बताओ."
"पहले फांसी की सजा सुनाई जाती है. फिर वो राष्प्रत्टती से माफी मांग लेता है."
"तो तुम क्या समझते हो वो माफ़ कर देते हैं?"
"ओल क्या?" ये छोटू पंडित थे.
"अरे नहीं भाई! राष्ट्रपति उन्हें माफ़ नहीं करते." सलाहू ने थोडा डपटकर समझाया.
"लेकिन वो उन्हें सजा भी नहीं होने देते. वो क्या अफजल गुरू को देखिए." बडे मियां ने फिर अपने बडे होने का परिचय दिया.
इसके पहले कि सलाहू कुछ और समझाता छोटू पंडित हय्या-हो वाले अंदाज में दोनों हाथ ऊपर उठाए कूदते हुए बोले, "हाँ, मैं तो बड़ी छी बंदूक लूँगा और बन जाऊँगा आकंत्वादी."
"बंदूक लेने का नतीजा जानते हो क्या होता है?" सलाहू ने पूछा.
"अरे कुछ नहीं होता अंकल. पहले पकडा जाता है, फिर छोड दिया जाता है." ये बडे मियां थे. सलाहू ने कोई और तर्क काम करते न देख कर आखिरकार घुड़की दी. "यही सिखा रहे हो तुम अपने छोटे भाई को? पता है ये सब गंदे काम हैं. और गंदे काम करने वालों का क्या होता है, जानते हो?"
बडे मियां सकपका गए थे. लिहाजा वह छोटू पंडित को समझाने लगे, "हाँ छोटू ऎसी बात नहीं करते हैं." वाममोर्चे की तरह. भीतर हर फैसले पर दस्तखत के बाद बाहर पब्लिक में ये तेवर कि यूपीए सरकार के कामकाज और नीतियों से हम सहमत नहीं हैं.
पर छोटू पंडित किसी से डरें तब न, उन्हें तो सबको डराना है. वह बोले जा रहे हैं, "अरे छब झूठ बोलते हैं. जैछे मुझे मालूम ही नहीं है. पहले छब पकड़े जाते हैं, फिर छब छूट जाते हैं. कल आप ही तो बता रहे थे अंकल ......" वह सीधे सलाहू से मुखातिब थे और सलाहू बगलें झांक रहा था.
अब हमारे पास कोई तर्क नहीं बचा है. कोई चारा भी नहीं दिख रहा है, भारत की जनता की तरह. आपको कुछ सूझ रहा है क्या? सूझे तो बताएं जरूर.
इष्ट देव सांकृत्यायन

9 comments:

  1. अब क्या बतायें??

    -हम भी उसी भारत की जनता में से एक हैं. :)

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  2. बहूत समझदार है जी छोटू।
    ऐसे तो सारे बच्चे सिर्फ हमारी क्लास में होते है।
    हमारी क्लास के बच्चे पार कर रहे हैं आप।
    ये अच्छी बात नहीं है,
    पर बात आपकी सच्ची है।

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  3. आज भिंसारे आपने हमें गच्च (गदगदायमान) कर दिया यह पढ़ा कर. रोज लिखें ऐसा तो पुराणिक की दुकान ही बन्द हो जाये! :)

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  4. पुराणिक जी की क्लास से एक बच्चा भागा है अभी, लगता है वही आपके पास है। :)

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  5. कुछ भी नया नहीं है आतंकवादी बनने की चाह रखने में । बहुत पुराने जमाने में , यानि लगभग १९६९ में हमारी कक्षा का एक छात्र भी नकसलवादी बनना चाहता था । हाल में मित्रों से उसके बारे में समाचार मिला । एक साधारण गृहस्थ की तरह रोटी पानी के जुगाड़ में बांकी सबकी तरह लगा हुआ है । यह बबुआ भी समय आने पर लाइन में लग जायेगा ।
    घुघूती बासूती

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  6. भाई आलोक जी और श्रीश जी
    पहले तो अंदेशा मुझे भी यही हुआ था, बल्कि मैं तो और दूर तक सोच गया था. फिर मैंने सोचा कि आप तो बड़ी क्लासों में पढ़ते हैं. जब्ल्की छोटू पंडित केजीं वाले हैं. इसीलिए मैंने आपके सिर दोष नहीं मढ़ा. चलिए अच्छा हुआ जो आपने खुद ही एक्सेप्टिया लिया. इतनी ईमानदारी तो अब सिर्फ व्यंग्यकारों में ही बची है.
    भाई ज्ञान जी
    पुराणिक भाई मेरे बडे भाई हैं. आपकी ही तरह. आपकी शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद. लेकिन मैं यह कभी नहीं चाहूँगा कि उनकी दुकान बंद हो. क्योंकि चलते रहने में ही हम सब का फायदा है.

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  7. biwee ka atankbad bhool gae ya zikra karne kee himmat nahin hai? uska hathiyaar hai ghadiyaalee aansu aur tamasha bannne kee kala.

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  8. अरे भाई काहे धुन्वाना चाहते हैं!

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