Thursday, 2 August 2007

केसर-केसर रूप तुम्हारा

केसर-केसर रूप तुम्हारा, चंदन-चंदन सांसें
इन नैनों में बसी हुई हैं कुछ सपनीली आशें...

मुझ में तुम हो, तुम में मैं हूं, तन-मन रमे हुए हैं,
प्रेम सुधा बरसाती रहतीं अपनी दिन और रातें...


मिलन हमारा जब भी होता अधर मौन रह जाते,
नाजुक अधरों की चुप्पी भी कहतीं ढेरों बातें...

दर्श तुम्हारा पाकर मन में कई गुलाब खिल जाते,
फिर बहकी-बहकी बातें कहतीं मेरी दोनों आँखें...

जब से दूर गई हो प्रिय, सुध-बुध उजड़ गई है,
याद तुम्हारी सांझ सवेरे, अंखियों में बरसातें...

दर्पण मेरा रुप तुम्हारा यह कैसा जादू है,
जब भी सोचूं, तुमको सोचूं, हरदम तेरी यादें... --

अनिल आर्य

4 comments:

  1. अजी जनाब! आपने तो कमाल कर दिया. बधाई.

    ReplyDelete
  2. बढ़िया रहा इसके भाव जानना, वैसे यहाँ इस्तेमाल किये गये आशें शब्द पर थोड़ा प्रकाश डालें. मुझे लगा था कि आप आशायें कहने वाले हैं. इसका सही उपयोग जानना ज्ञानवर्धक होगा, बताईयेगा.

    --सुंदर भावपूर्ण रचना के लिये बधाई.

    ReplyDelete
  3. सुन्दर कविता लिखी है .

    ReplyDelete

सुस्वागतम!!