Wednesday, 18 July 2007

चुलबुली यादें

हम और बिरना खेलें एक संग मैया, पढ़ें इक संग, बिरना कलेवा मैया ख़ुशी -ख़ुशी दीनों, हमरा कलेवा मैया दीयो रिसियाए . मुझे याद है कन्या भ्रूण की सुरक्षा हेतु और बालक-बालिकाओं को सम।नता का दर्जा देने के लिए उन दिनों दूरदर्शन पर इक बड़ा ही प्यारा विज्ञापन आता था. जिसके जरिये पूरा संदेश भी था और वो इस क़दर मन में बसा जो हूबहू मुझे आज तक याद है. तब शायद चैनलों की बाढ़ नहीं आयी थी. तभी तो अश्लीता की गुंजाइशें भी नहीं होती थीं. खैर अब तमाम चैनलों के चलते दूरदर्शन का एंटीना कहीं कुचल गया. क्योंकि इसको लगा डाला तो लाइफ झींगालाला. इतने चैनलों को देखने के लिए बस बटन दबाते रहो, कुछ दिखे तो वहीं रोक दो वरना आगे बढ जाओ. खैर इसमें बढने की कोई कोशिश नहीं करनी होती क्योंकि इसमें एक के साथ एक फ्री जो मिल जाता है. हम वापस पुराने विज्ञापनों की बात करें तो एक और याद आ रहा है हॉकिंस की सीटी बजी खुशबू ही खुशबू उड़ी......... उस वकत सौम्यता का जामा पहने ऐसे न जाने कितने विज्ञापन होंगे. आपको शायद याद हो एक छोटी सी डाँक्युमेंटरी फिल्म आती थी बच्चों के लिए प्रायोजित कार्यक्रम था " सूरज एक चन्दा एक, एक-एक करके तारे भये अनेक, एक तितली, अनेक तितलियाँ, देखो देखो एक गिलहरी पीछे- पीछे अनेक गिलहरियाँ" इतने सुन्दर अक्षरो से बना यह गीत बच्चों को बेहद खूबसूरत तरीके से एक और अनेक में भेद करना सिखा गया था. ऐसा नही है कि अब मेहनत नहीं की जाती, पर उस मेहनत का उद्देश्य सबकी समझ से बाहर होता है. दरअसल अब ऐसी डाँक्युमेंटरी फ़िल्में बनती ही नहीं. डिजनी के मिकी मूस और बिल्लियों से ही फुरसत नही मिलती. पहले और अब में फ़र्क इतना है कि पहले इन्सान के बच्चों को शिक्षा देने के लिए इन्सान का ही प्रयोग होता था, उसी की तस्वीरों के ज़रिये सन्देश देने का प्रयास होता था लेकिन अब इन्सान के बच्चों को समझाने के लिए डिजनी के चूहे-बिलौटों का इस्तेमाल होता है. तब भी आज के बच्चों को जल्दी समझ में नहीं आता. बहुत पहले बच्चों की एक फिल्म दूरदर्शन पर कई बार आती थी जिसमे गरीबी के कारण छोटे भाई-बहन को जब भूख लगती है तो वो गाना गाते थे " सोनी बहना खाना दो पेट में चूहे कूद रहें है, ची-ची बोल रहें है, सोनी बहना खाना दो ...... फिर दूरदर्शन पर सईँ परांजपे का धारावाहिक अड़ोस -पड़ोस आया. फिर अमोल पालेकर का धारावाहिक आया " कच्ची धूप" जिसने भी अपने समय मे इसे देखा होगा कि बिना किसी अश्लीलता के यह तीन बहनों की कहानी जिसका टाइटल सांग था - " कच्ची धूप अच्छी धूप, मीठी और चुलबुली धूप, जिन्दगी के आंगन मे उम्र की दहलीज़ पर आ खडी होती है इक बार. इस तरह की हमारी पसंद को विराम लगा '' जंगल की कहानी मोंगली पर'' जिसमें चढ्ढी पहन कर फूल खिला है फूल खिला है, काफी प्रचलित हुआ. शायद मैं आपको कई साल पीछे ले जाने में थोडा सफल हो सकूं. लेकिन मैंने सभी कार्यक्रमों का ज़िक्र नही किया वोः आपके लिए छोड़ दिया। ताकि आप भी दरिया में डुबकी लगाए और हम पर भी गंगाजल छिडके.
इला श्रीवास्तव

5 comments:

  1. पढ़ते पढ़ते कृषि दर्षन के जमाने में घूम आये जब मधुमख्खी पालन आदि शाम को देखते थे ब्लैक एंड व्हाईट में.

    सूरज एक चंदा एक नीचे लिंक पर सुनिये-आपकी याद बिल्कुल ताजा हो आयेगी:
    http://vadsamvad.blogspot.com/2007/05/blog-post_31.html

    :)

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  2. थोड़ा गंगाजल हमारी तरफ से भी.

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  3. वाह इला जी,


    तबीयत खुश कर दी आप ने.हमें भी दूरदर्शन का जमाना याद आ गया.जब टीवी पर केवल रविवार को फिल्म दिखाई जाती थी जिसे देखने के लिए हम अपना होम वर्क पहले ही पूरा कर लेते थे.माँ रात का खाना शाम को ही बना कर रख देती थी .सबसे अच्छी बात यह थी कि चैनल बदलने को ले कर कोई झगरा नही होता था.

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  4. सही मुद्दा उठाया है.इला जी को ढ़ेर सारा धन्यबाद क्योंकि हम हमेशा उस ओर इशारा कर रहें हैं जिस कमीशनखोरी के वजह से डी कंपनी के कल्चर को फैलाया जा रह और हमारे टेस्ट सेन्स को खराब किया जा रह है उससे हमारी संस्कृति को अस्तित्त्व का संकट ही नहीं देश के नैतिक उत्थान को बहुत जोरदार धक्का लगा है.

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  5. बरसों पीछे छूट गए बचपन की गलियों मैं वापस ले जाने के लिए आभार इला जी। '' कच्ची धूप अच्छी धूप, मीठी और चुलबुली धूप, जिन्दगी के आंगन मे उम्र की दहलीज़ पर आ खडी हुई है इक बार।'' भला और क्या कहूँ! मन करता है अभी उड़ चलूं जीवन के उस दौर में. गाँव में रहते थे . इक्का दुक्का घर में टीवी होता था. पिता जी से जिद करते ' मुझे अभ्भी,अभ्भी जाना है ताऊ जी के घर, पिक्चर देखने..... वो मना करते हम जिद करते, मचलते, माँ पिता जी का झगड़ा होता और सदा की तरह जीत हमारी ही होती. पर अब ऐसा कहॉ होता है! बहुत पानी बह गया गंगा में तब से अब तक.. तब चित्रहार भी देखते थे तो. डरते थे माँ पिता जी न देख-सुन लें और आज ..

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