Sunday, 22 July 2007

कोर्स में सेक्स

शर्मा जी और सलाहू भाई को एक ही बेंच पर बैठे होने के बावजूद पिले पडे देख कर अपने कदम भी ठहर गए. सोच लिया कि वाक् तो रोज ही करते हैं, आज का दिन सिर्फ मोर्निंग पर ही संतोष कर लेते हैं. बहुत हुआ तो बाद में थोडा हाथ-पैर आगे-पीछे, ऊपर-नीचे कर लेंगे. मुल्ला जी से मुखातिब हुआ और पूछ ही पड़ा, 'क्या बात है भाई? बरसात तो अभी रात में ही हुई है, फिर क्यों दोनों लाल-पीले हुए जा रहे हो सुबह-सुबह?'
मालूम पड़ा शर्मा जी को एक टीनएजर जोडे की हरकतें नागवार गुजरीं हैं. 'हालांकि उनने इसके साथ कुछ भी नहीं किया. जो किया आपस में किया. पर ये सज्जन उन्हें डांट भी आए और उससे भी मन नहीं भरा तो अब यहाँ बैठ कर सरकार पर बिसूर रहे हैं.' यह सलाहू थे.
जोडे को डांट आए सो तो चलिए बात थोड़ी-बहुत समझ में आती है, पर अब सरकार पर बिसूर रहे हैं; शर्मा जी का यह स्टैंड मेरे भी समझ में नहीं आ रहा था. मान लीजिए अगर मुंडे-मुंडी ने कुछ किया भी हो उल्टा-सीधा तो इसमें सरकार कहॉ से आ गयी भाई. लेकिन नहीं साहब लोकतंत्र की यही तो मुसीबत है. बीवी ने दाल में नमक ज्यादा डाल दिया आफत सरकार की. बेटे ने दो-चार सौ रुपये फालतू मांग लिए आफत सरकार की. दूध वाले ने दाम अचानक पांच रुपये फी किलो बढ़ा दिए या रामबीर की भैंस आपके गमले में लगे फूल चर गयी, जीं आफत सरकार की. बेचारी सरकार की किसी भी तरह से खैर नहीं है. लेकिन शर्मा जी इस बात पर अड़े थे कि उनकी बात जिनुइन है, बशर्ते उसे समझा तो जाए. मैंने कहा, 'ठीक है भाई. माना मुल्ला समझने के लिए तैयार नहीं हैं, तो आप मुझे ही समझाइए.' 'अब देखो, जब आजकल के लड़के-लडकी ऐसे ही सिनेमा देख-देख कर इतने चंट हो गए हैं तो उन्हें और सेक्स एजुकेशन देने की क्या जरूरत है? पर सरकार उन्हें और बिगाड़ रही है सेक्स एजुकेशन देकर.' शर्मा जी बिल्कुल दार्शनिक मुद्रा में थे, 'क्या जरूरत है भाई स्कूलों में यह सब पढाने की?'
शर्मा जी की बात मुझे ठीक लगी. लिहाजा मैं सलाहू से ही मुखातिब हुआ, 'क्यों भाई सलाहू! माना कि अभी नहीं शुरू हुआ है, पर जब सरकार ने प्रस्ताव रख दिया है तो अब उसे तो शुरू करके ही मानेगी. आखिर सरकार तो सरकार है!'
'अरे मैं तो कहता हूँ कि अगर कल शुरू होनी हो तो आज शुरू हो जाए।' सलाहू बिल्कुल ताल ठोंकने वाले अंदाज में थे और उनकी यह उलटबांसी मेरे समझ में कहीँ से भी अंटने को तैयार नहीं थी। पूछ ही बैठा, 'क्यों भाई! इसके शुरू हो जाने से तुम्हे क्या फायदा है?' 'फ़ायदा है। केवल मुझे नहीं सारे माँ-बापों को फ़ायदा है।' सलाहू की यह मान्यता मुझे हैरत में डाल रही थी और वह कोई वजह बताए बग़ैर जारी थे. बिल्कुल वैसे ही जैसे लोक या विधान सभाओं में होनहार नेता सिर्फ अपनी बात कहने पर तुले होते हैं, दुसरे की कुछ भी सुने बग़ैर, 'मेरा तो मानना यह है कि सरकार को इसका इम्तहान भी लेना चाहिए।'
एकबारगी तो मुझे लगा कि कहीँ सलाहू का दिमाग तो नहीं फिर गया. मैं हक्का-बक्का सा एक टक ताकने लगा उनको. जैसे वोट दे चुके होने के बाद पब्लिक सरकार को ताकती है. 'ऐसे क्या ताक रहे हो भाई! कल मास्टर को सुना था क्या कह रहा था?'
मास्टर ने अभी हाल ही में एक इक्ज़ाम दिया है, संस्कृत में एमए का. बता रहे थे कि मेघदूत और वासवदत्ता में स्त्रियों के सौंदर्य और कामक्रीडा का जैसा वर्णन है, वैसा कर पाना तो आजकल के फिल्म प्रोड्यूसरों और फिल्मी गीतकारों के भी बस की बात नहीं है. अगर उसे सिर्फ पढना-पढना हो तो इतना मजा आए कि पूछो नहीं. 'तो फिर पढो, तुम्हे रोका किसने है?' सलाहू ने ही पूछा था, 'पढो जीं भर के'.
'अरे तुम्हारी परीक्षा व्यवस्था ने भाई और क्लासकोर्स ने। दूसरा कौन रोकेगा?' मास्टर आगे पूछे बग़ैर ही बोले जा रहा था, 'इन दो चीजों ने मिलकर हर चीज को इतना उबाऊ बना रखा है कि कालिदास से लेकर बिहारी तक सभी असह्य लगने लगते हैं. अच्छी-भली कविता कोर्स में आते ही पीड़ाहारी बाम का विज्ञापन लगने लगती है, जो सिरदर्द ठीक करने के नाम पर और बढ़ाने लगता है.'
मुझे याद आए वो दिन जब मैं खुद पढाई किया करता था. पढने-लिखने में तब मन बिल्कुल नहीं लगता था. इतिहास और भूगोल की किताबें तो कटाने दौड़ती थीं. सूर-कबीर-निराला तब बोझ लगते थे, क्योंकि इनकी जीवनी रटनी पडती थी. मेरा मन तो खैर कविता के कीटाड़ुओं से बचपन में ही संक्रमित हो गया था, लिहाजा मैंने कभी कवियों को गालियाँ नहीं दीं. लेकिन मुझे आज भी बखूबी याद है मेरे कई श्रद्धालु साथी जीं भर गलियां दिया करते थे कवियों-लेखकों को. वजह फकत इतनी थी कि उन्होने लिखा हमें पढना पड़ा. बात यहीं तक होती तो भी ठीक था. मुसीबत यह कि अब इनकी जीवनी भी रटनी पड़ती है. अरे वे कब पैदा हुए और कब मर गए, या उनके बाप या माँ के नाम क्या थे, इससे हमें क्या भाई. लेकिन नहीं साहब रटना पड़ता था. लिहाजा गली भी देनी ही पडती थी. अब सोचिए अगर उन्होने न लिखा होता तो क्या घट जाता! कम से कम हमें ये मुसीबत तो न झेलनी पडती. तब मैं सोचता था कि अगर कहीँ मेरा लिखना चल गया और हम क्लास में पढाए जाने लगे और बच्चों को हमारी जीवनी रटनी पडी तो ऎसी ही गालियाँ ............

ये अलग बात है कि बाद में हमने खुद रूचि ले-लेकर कई लेखकों-कवियों की जीवनियाँ ढूँढ -ढूँढ कर खुद रूचि लेकर पढी. यहाँ तक सलाहू ने भी. यही नहीं बाबर से लेकर औरंगजेब, समुद्रगुप्त से लेकर अशोक और अरुणाचल से लेकर अफ्रीका तक सब कुछ जाना और जानने में मजा भी आया. लेकिन तब नहीं आता था. क्यों? क्योंकि साहब हमारे यहाँ क्लास वाली किताबें बनाते समय इस बात का पूरा ख़याल रखा जाता है कि कहीँ बच्चों की इनमें रूचि न जग जाए. अगर फिर भी बच्चों ने पढने की बेवकूफी कर दी तो मास्टर ऐसे रख दिए जाएँगे जो पढाने के नाम पर अपनी फालतू बकवास से उनकी सारी रूचि निकाल दें. बकौल मास्टर सरकार ने ऎसी व्यवस्था इसलिए बना रखी है ताकी बच्चों का मन एक ही क्लास में न लगा रहे और हर साल नई क्लास में जाते रहें. जरा सोचिए, अगर क्लास वाली किताबें अच्छी यानी पढने लायक हो गईं तो ऐसा हो सकेगा क्या?
पर नहीं साहब कुछ बेवकूफ होते हैं जिन्हे लगता है कि पढ़-लिख कर वो नवाब बन जाएंगे. पढने-लिखने के नतीजे साल दर साल देखते रहने के बावजूद वो पढ़ते रहते हैं. वही लोग बाद में मास्टर या पत्रकार टाइप के कुछ हो जाते हैं और पूरी उम्र झेलते व झेलाते रहते हैं. तो उनका मन भी पढाई नमें न लगाने पाए, इसीलिए हमारे देश में परीक्षाओं की व्यवस्था की गयी है और उनका जबर्दस्त फोबिया बनाया गया है. ताकि अगर गलती से भी किसी का लगे तो उसे इक्जाम के नाम पर उबाया जा सके. उसका मन पढाई के बजाय परीक्षा की तैयारी में ही लगा रहे.
'अब बताओ, क्या अब भी तुम्हे लगता है कि कोर्स में शामिल किए जाने के बाद भी लड़के-लड़कियों की कोई रूचि सेक्स में बचती तुम्हें दिखती है?' सलाहू अब सलाह देने के मूड में आ गए थे, 'अरे मेरी मनो तो भई इसे लगा ही दिया जाना चाहिए कोर्स में. इसके लगते ही कई समस्याएँ हल हो जाएंगी. छेड़छाड़ से लेकर आबादी की तेज बढत तक.'
अब मैं सोच नहीं पा रहा हूँ कि मुझे किधर खङा होना चाहिए था. आप ही बताइए अगर कहीँ मेरी जगह आप ही होते तो क्या फैसला लेते? किधर खडे होते?
इष्ट देव सांकृत्यायन

11 comments:

  1. इस बेहतरीन विचारक लेख के बाद आप जहाँ भी खडे हो जाये, कोई अंतर नहीं पड़ता-जिम्मेदार तो सरकार ही कहलायेगी कि इष्ट देव इस तरफ क्यूं खड़े हैं. :)

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  2. खबरदार ज्ञानी प्रोफेसरों से बगैर राय-मशविरे के कुछ कोर्स -ओर्स डिजाइन किया तो।

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  3. प्रभु
    एक तो प्रोफेसर आप ही हैं. लिहाजा कोर्स डिजाइन करने के क्रम में सबसे पहली सलाह आप से ही. तो बताइए इस बारे में आप की सलाह क्या है?

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  4. बहुत ख़ूब. जोरदार आईना दिखाया है आपने शास्त्री जी. ऐसे लोगों के साथ तो यही होना चाहिए. उनके दिलों की फीके करने की जरूरत ही नहीं है. इसे इतना उबाऊ और बेकार क्यों बना दिया गया है, समझाना मुश्किल है.

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  5. अच्छा लिखा है.लिखते रहिए .

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  6. बहुत ख़ूब ईडी जी कोर्स अगर आप तैयार करेंगे तो पढ़ने वाले को मन लगाना ही पड़ेगा. ना जाने इस मुद्दे को इतना चूं चूं का मुरब्बा क्यों बनाया जाता रहा है .
    इला

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  7. sir
    sachmuch bahut achhcha likha hai. mja aa gya. sochne ko bhi majbur karta hai.

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  8. क्या ख़ूब लिखा है इष्ट देव जी. लगे रहो॥

    अनिल आर्य

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  9. aaap jahan khade honge piche mai bhi lag lunga.
    satyendra
    gorakhpur

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  10. अच्छा विचार है और अच्छी प्रस्तुति। जो लोग बेवजह के मुद्दों पर बहस कर रहे हैं, उन्हें इन सार्थक मुद्दों से सबक लेनी चाहिए।

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