Sunday, 1 July 2007

वही होगा जो .....

एक बार मैं घूमते-घूमते एक अनजाने कस्बे में पहुंच गया. छोटी सी पहाड़ी पर बसे इस कस्बे की आबो-हवा मुझे बहुत अच्छी लगी और पास ही कस्बे के बाहर एक ऊंची जगह पर एक खाली घर भी दिख गया. फिर क्या था, मैं वहीं ठहर गया. चूंकि यह जगह शहर से बाहर थी और वहां कोई खेती भी नहीं होती थी, इसलिए वहां तक पहुंचने का पूरा रास्ता कंटीली झाडि़यों से भर गया था. कुछ दिनों तक तो मेरे वहाँ होने के बारे में किसी को पता ही नहीं चला. मैं चुपचाप अल्लाह की इबादत में लगा रहा. पर आखिरकार लोगों को पता चल ही गया और फिर लोग मेरे पास पहुंचने भी लगे. पहुंचा हुआ फकीर मानने के नाते लोग तरह-तरह से मेरी खुशामद भी करते, पर मैं कुछ बोलता ही नहीं था. एक दिन हुआ यह कि कस्बे के लोगों द्वारा पाले गए सारे मुर्गे मर गए. तब गांव के तमाम लोग भागे हुए मेरे पास पहुंचे और मुझे यह हाल बताया. मैंने उन्हें कहा, 'कोई बात नहीं। समझो कि खुदा की यही मर्जी थी.' खैर लोग लौट गए. थोड़े दिनों बाद कस्बे में मौजूद सारी आग भी बुझ गई. उनके पास खाना पकाने तक के लिए भी आग नहीं बची. कस्बे के लोग फिर मेरे पास आए और मैंने फिर वही जवाब दिया. कुछ दिनों बाद वहां के सारे कुत्ते भी मर गए और तब भी मेरा जवाब वही रहा. इस पर लोगों को जरा गुस्सा भी आ गया. उन्होंने कहा, 'अब जब कुत्ते नहीं रहे जंगली जानवरों और चोरों से बचाने के लिए हमारे घरों और फसलों की रखवाली कौन करेगा?' मैंने कहा, 'जी, मैं तो एक ही बात जानता हूं. खुदा जो चाहेगा, वही होगा.' कुछ दिनों बाद कस्बे में लुटेरों का गिरोह आया. वे पूरे कस्बे में घूमे. लोग अपने-अपने घरों में दुबके रहे. कोई कुछ नहीं बोला. यहां तक कि कुत्ते भी नहीं बोले. लुटेरों ने निष्कर्ष निकाला, 'कहीं न तो आग जलती दिखती है, न कहीं मुर्गे बोलते हैं और न कुत्ते ही भौंकते हैं. ऐसा लगता है कि लोग यह कस्बा छोड़कर कहीं और चले गए हैं। छोड़ो, जब लोग ही नहीं हैं तो घरों में क्या रखा होगा? वापस चलते हैं.' लुटेरे बिना कुछ लूटपाट किए ही लौट गए और कस्बे के लोग मेरी बात का मर्म समझ गए थे.

2 comments:

  1. हम भी आपकी बात का मर्म समझ गये. अच्छा लिखा है.

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