Saturday, 16 June 2007

मौसम का सुरूर मेरा कुसूर

मैंने अब तक यह सुना था कि आज मौसम बड़ा बेईमान है. हकीकत का आज पता चल गया. लंबे इंतज़ार के बाद जब आज बारिश हुई तो लगा सिर मुड़ते ही ओले बरसने लगे. हुआ यूं कि जल्दी उठकर दफ्तर पहुंचने की तैयारी की और रिमझिम फुहारों का सिलसिला बंद होने के आसार नजर नहीं तो अपने तीन मंजिले ऊपर के मकान से नीचे उतरे. ज्यों ही गाडी स्टार्ट की, उसका स्टार्टिंग बटन चलने को राजी ही नहीं हो रह था. करते-करते मैं आधे से अधिक भीग गई, जितना कि ऑफिस पहुचने पर भी न भीगती. साथ ही सोसाइटी के कम से कम 8 लोगों ने आजमाइश भी की लेकिन अपनी धन्नो टस से मस न हुई. बाद मे पता चला कि पड़ोस मे रखी दूसरी उसी प्रजाति की गाडी बगल मे मुह बाए खडी मौसम का मजा ले रही थी. ऐसे में धन्नो मेरे साथ जाने को तैयार न थी. मौसम का सुरूर देखिए. लेकिन भला बताइए इसमे मेरा कुसूर क्या था? आख़िर वो मुझसे बेईमानी कर ही गया. जय बाबा भोलेनाथ. जय राम जी की.
इला श्रीवास्तव

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