Tuesday, 19 June 2007

दोहे

शेख ज़हीरा देखती कठिन न्याय का खेल ।
सच पर जोखिम जान की झूठ कहे तो जेल ॥

खलनायक सब खड़े हैं राजनीति में आज।
जननायक किसको चुनें दुविधा भरा समाज।।

क्या हिंदू क्या मुसलमाँ ली दंगो ने जान।
गिद्ध कहे है स्वाद में दोनो माँस समान॥

-विनय ओझा स्नेहिल

4 comments:

  1. वाह विनय भाई, बहुत करारे दोहे हैं. बधाई.

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  2. बहुत अच्छे दोहे। आखिरी वाला खासकर!

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  3. छ: पंक्तियों में इतना सन्देश! गजब! ईश्वर करे आपकी कलम से काव्य की अनंत धारा बहती रहे.

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