Wednesday, 2 May 2007

बचपन

न डरना शेर की दहाड़ से और बकरी
के मिमियाने से डर जाना. गिर पड़ना
आंगन में ठुमकते हुए, हौसला रखना
फिर भी एवरेस्ट के शिखरों पर फतह की.

न समझ पाना छोटी-छोटी बातें और
बेझिझक सुझाना बेहद मुश्किल मसलों
के हल. सूखे हुए पौधों वाले गमलों
में डालना पानी, नोच लेना नए बौर.

रूठ जाना बेबात और फिर न मानना
किसी के मनाने से. खुश हो जाना

ऐसे ही किसी भी बात से. डूब जाना
किसी भी सोच में, वैसे बिल्कुल न समझना

दादी किसकी चिन्ता करती हैं बेकार,
दादा क्या सोचते रहते हैं लगातार?

इष्ट देव सांकृत्यायन






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