Thursday, 17 May 2007

कुनबे की महिमा का सच

यह तो आप जानते ही हैं कि परमपूज्या राजमाता और माननीय श्रीमंत राजकुमार के मुँह बहुत कम ही खुल पाते हैं. बमुश्किल कभी-कभी ही. सिर्फ तब जब बहुत जरूरी हो जाता है. तब वह इस गरीब देश की दरिद्र जनता पर यह महती कृपा करते हैं. इसीलिए वे जब भी बोलते हैं पूरे देश की हिंदी और अंग्रेजी प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया उनके बयान को लोकने के लिए ऐसे टूटती है जैसे सिद्ध संतों द्वारा फेंके गए प्रसाद को लोकने के लिए उनके भक्त टूटते हैं. ऐसा लगता है जैसे इस दुनिया में अब इसके अलावा कोई और परमसत्य बचा ही ना हो. हाल ही में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान राजकुमार का मुँह एक बार खुला था और तब जहाँ एक तरफ तमाम कांग्रेसी कृतकृत्य हो गए थे वहीं देश-दुनिया के इतिहास की थोड़ी सी भी समझ रखने वाला हर शख्स एक दुखद आश्चर्य से भर उठा था. सबने एक सिरे से यही सोचा कि राजकुमार ने यह क्या कह दिया. अपने को जानकर मानाने वाले कुछ लेखकों-पत्रकारों-राजनेताओं ने तो थोड़ी हाय-तौबा मचाने की रस्म अदायगी भी की. पर अब वह बयान केवल राजकुमार तक सीमित नहीं रह गया है. परमपूज्या राजमाता ने भी राजकुमार के सुर से सुर मिला दिया है. राजकुमार ने तो अपने बयान से यह जता दिया था कि नेहरू-गाँधी परिवार नही तो देश नहीं और अब राजमाता ने इसे और ज्यादा विश्वसनीय बना दिया है यह जता कर कि उनका कुनबा नही तो कॉंग्रेस नहीं. आपने कल पढा और सुना ही होगा वह बयान जिसमे उन्होने बताया है कि उत्तर प्रदेश में संगठन की कमजोरी के नाते हारी है कॉंग्रेस. जाहिर है हमेशा की तरह इस बात पर भी कांग्रेसियों को कोइ शर्म तो आयी नहीं होगी अपने अन्नदाताओं के बयान पर.
यह बात और साबित हो गयी तब जब उत्तर प्रदेश कॉंग्रेस के अध्यक्ष सलमान खुर्शीद का यह बयान आया कि संगठन की गलती से ही हुई है राज्य में कॉंग्रेस की हार. खुर्शीद साहब के इस बयान ने उस दौर को हमारे सामने ला खड़ा किया जब पूरे दिन श्रम करने के बाद भी बेचारे मजदूरों को जमींदारों और उनके गुर्गों की मार मिलती थी. इसके बाद भी जमींदार के सामने पड़ने पर उन्हें कहना पड़ता था कि जीं हाँ हुजूर हम इसी लायक थे, इसी लायक हैं, और इसी लायक बने रहेंगे. जनाधार विहीन और ट्रिनोपाल छाप लोगों के हाथों में जब तक राजनीतिक पार्टियों का नेतृत्व रहेगा, तब तक पार्टियों के प्रदेश अध्यक्षों की हैसियत इससे आगे नहीं बढ पाएगी.
गौर करने की बात है कि कॉंग्रेस में इससे ज्यादा कभी किसी प्रदेश अध्यक्ष, राष्ट्रीय महासचिव या किसी भी अन्य पदाधिकारी की हैसियत रही भी है क्या? लोकतंत्र का मखौल किसे कहते हैं यह अगर किसी को जानना हो तो निश्चित रुप से उसे कॉंग्रेस का इतिहास जरूर जानना चाहिए. जमाना चाहे महात्मा गाँधी का रहा हो चाहे इंदिरा गाँधी का या फिर अब सोनिया गाँधी का, इस दल में चलती हमेशा किसी एक व्यक्ति की ही रही है. यह अलग बात है कि तरीके सबके अलग-अलग रहे हैं. कोई अनशन करके जबरदस्ती पूरे देश पर अपनी इच्छा थोप देता था तो कोई इमरजेंसी लगा कर और कोई एक ऐसे लाचार आदमी को प्रधानमंत्री बनाकर जो ग्रामप्रधानी का चुनाव भी नहीं जीत सकता है.
यह सब आख़िर किसलिए? सिर्फ इसीलिए न कि कोई काबिल राजनैतिक व्यक्ति सिंहासन तक न पहुँचाने पाए और वह राजकुमार के बडे होने तक उसके लिए सुरक्षित बचा रहे. यह कोई आज की नई बात नहीं है. बौरम प्रोत्साहन सिद्वांत ही कॉंग्रेस का मूलभूत सिद्वांत है. यह बात तो दुनिया जानती है न कि आजादी के तुरंत बाद देश की बागडोर कॉंग्रेस के हाथ में ही आयी थी. अनपढ़ोँ को शिक्षामंत्री, अपाहिजों को रक्षामंत्री, बीमारों को स्वास्थ्य मंत्री बनने और तकनीकी पदों पर इतिहास, भूगोल के रटते मार कर आई ए एस बने भैंसों को थोपने का क्रम तो वहीँ से शुरू हुआ न! आखिर क्यों? सिर्फ इसलिए कि इस तथाकथित लोकतंत्र को नेहरू परिवार के राजतन्त्र में बदला जा सके. कम से कम अपने होश में जहाँ से मैं कॉंग्रेस का शासन देख रहा हूँ, वहाँ से कॉंग्रेस नेतृत्व वाली सरकारों में हर पद पर खडाऊं ही बैठे दिख रहे हैं. अगर गलती से भी कहीँ किसी पद पर कोई सही व्यक्ति आ गया तो उसकी चरित्र हत्या का इंतजाम तुरंत शुरू हो जाता है.
विधान सभा चुनाव के दौरान पहली बार जब राजकुमार का मुँह खुला था तो जो वाक्य उनके मुखारविंद से बाहर निकला उसका उद्देश्य दरअसल यही था. लाल बहादुर शास्त्री के बाद पहली बार ऐसा हुआ था कि एक व्यक्ति अपने दम पर देश का प्रधानमंत्री बन गया था, कॉंग्रेस के भीतर और नेहरू परिवार के बाहर होने के बावजूद. देश नरसिंह राव को जिस कंगाल हाल में मिला था वह सभी जानते हैं. राव ने उस हॉल से देश को उबारा ही नहीं, इसे हैसियत वाले देशों की पांत में ले जाकर खड़ा कर दिया. तब जब कि नेहरू परिवार के पिट्ठू लगातार उसकी टाँगें खींचने में जुटे रहे. दक्षिण भारतीय होने के नाते वह अलग सबकी आंखों की किरकिरी बना रहा.

बेशक उस व्यक्ति की आलोचना होनी चाहिए. उन घपलों-घोटालों और सांसदों की खरीद-फरोख्त के लिए जो उसके शासन काल में हुए. लेकिन यह कहने के पहले कि "यदि गाँधी परिवार का कोई ...." अपनी गिरेबान में एक बार झांकना जरूरी हो जाता है. आख़िर रामजन्मभूमि का ताला किसके समय में खुला था और भिंडरावाले को संत किसने बनाया? और छोड़ दीजिए अभी आपने अपने घराने से बाहर के जिस शख्स को प्रधानमंत्री बना रखा है उसकी प्रतिभा की खोज भी उसी व्यक्ति ने की थी. आख़िर राजकुमार क्या बताना चाहते हैं यही न कि उनके परिवार से बाहर का कोई व्यक्ति देश की बागडोर सँभालने लायक नहीं है और गलती से कोई वहाँ बैठ ही तो भी वह है तो नालायक ही.
यह कहते हुए राजकुमार यह भी भूल जाते हैं कि यह जनादेश का अपमान है या शायद वह जनता को उसकी औकात ही बताना चाहते हों. आख़िर राजकुमार हैं, वह कुछ भी कर सकते हैं. उनका उद्देश्य देश और जनता के लिए कुछ करना नहीं, अपने लिए सिर्फ कुर्सी बचाना है. पिछली पीढी तक के लोगों का अंदाज विनम्रता वाला था, पर नई पीढी का अंदाज जरा अग्रेसिव है. वैसे ही जैसे नए दौर के विज्ञापनों का हो गया है. अगर आपके घर में ये वाली ती वी है तभी आप आदमी हैं और नही तो गधे हैं. ठीक इसी तर्ज पर बताया जा रहा है कि अगर गाँधी परिवार का व्यक्ति प्रधानमंत्री है, तब तो देश देश है और नहीं तो ............. अब यह आप तय करिये कि आप क्या समझना चाहते हैं- वह जो वे आपको समझाना चाहते हैं या वह जो आपके लिए उन्हें समझाना जरूरी हो गया है।
इष्ट देव सांकृत्यायन

1 comment:

  1. हमारे लिखने में हमारा गुस्सा नहीं दिखना चाहिये. हम ऐसे तर्क दें कि पढ़नेवाला गुस्से से भर जाए.

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