Sunday, 6 May 2007

इन आंखो में

पूरब से
आती है
या
आती है
पश्चिम से -
एक किरण
सूरज की
दिखती है
इन आंखों में.

मैं संकल्पित
जाह्नवी से

कन्धों पर है
कांवर.
आना चाहो

तो
आ जाना
तुम स्वयं
विवर्त से बाहर.

तुमको ढूढूं
मंजरिओं में
तो
पाऊँ शाखों में.
इन आंखों में.

सपने जैसा
शील तुम्हारा
और खयालों सा
रुप.
पानी जीने वाली
मछली ही
पी पाती है
धूप.

तुम तो
बस तुम ही हो
किंचित उपमेय नहीं-
कैसे गिन लूं
तुमको
मैं
लाखों में.
इन आंखों में।

इष्ट देव सांकृत्यायन

2 comments:

  1. अच्छी कविता है। बाकी कविताएँ भी पढ़ीं। शिल्प और संवेदना का अच्छा तालमेल है। आप बधाई के पात्र हैं।
    सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

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  2. हिन्दी ब्लॉगिंग मे आपका स्वागत है। आप अपना ब्लॉग नारद पर रजिस्टर करवाएं। नारद पर आपको हिन्दी चिट्ठों की पूरी जानकारी मिलेगी। किसी भी प्रकार की समस्या आने पर हम आपसे सिर्फ़ एक इमेल की दूरी पर है।

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