Wednesday, 2 May 2007

जगाने मत आना

सोया हूँ
मुझे
जगाने मत आना.
बादल हूँ
मुझ पर
छाने मत आना.

उमड़-घुमड़ कर
और-और सघन
होता जाता हूँ.
किस-किस से
मिलकर
क्या-क्या
खोता-पाता हूँ!

फट जाऊं तो
बह जाएँगे
गिरि-शिखर
न जाने कितने,
इसीलिए उफन-उफन कर भी
मैं कभी नहीं
रोता-गाता हूँ.

अगणित पीड़ाएँ
छिपी हुई हैं
कोनों में,
गिरी यवनिका
आज
उठाने मत आना.

केंद्र वृत्त का
कालाहांडी
और
परिधि पर
चौपाटी है.
बंद-बंद रहने वाला
यह
मेरा मन
बुधना की
पाती है.
दबा-ढका है
जाने क्या-क्या
पर
कुछ भी
छिपा नहीं है,
मेरा खुलना मुश्किल है,
पर
खुलता हूँ
तो मुश्किल हो जाती है.

अपने मन की
अँधेरी बंद गुफा में -
खोया हूँ,
मुझको पाने मत आना.

इष्ट देव सांकृत्यायन

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