Friday, 28 December 2007

तस्लीमा, तुम स्वीडेन चली जाओ प्लीज़

तस्लीमा के नाम केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार की चिट्ठी

तस्लीमा,

तुम महान हो। बढ़िया लिखती हो। तुम्हारा लिखा हुआ हमारे देश में भी खूब बिकता है। लेकिन तस्लीमा तुम स्वीडेन चली जाओ। तस्लीमा तुमने हमारी धर्मनिरपेक्षता के स्वांग को उघाड़ दिया है। हम कितने महान थे। हम कितने महान हैं। हम लोकतंत्र हैं, हमारे यहां संविधान से राज चलता है, जिसमें विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात नागरिकों के मूल अधिकारों में दर्ज है।

लेकिन ये अधिकार तो हम अपने नागरिकों को भी नहीं देते हैं तस्लीमा। हम विनायक सेन को कैद कर लेते हैं। वरवर राव हमारे निशाने पर है। विरोध करने वालों को हम माफ नहीं करते। हमारी जेलों में लेखक रहें ये अंग्रेजों के समय से चली आ रही परंपरा है।

और तुम तो विदेशी हो तस्लीमा। नंदीग्राम में हमने एक शख्स को तो इसलिए गिरफ्तार कर लिया है कि उसकी झोली में महाश्वेता की रचनाएं मिली हैं। फिर भी ये लोकतंत्र है तस्लीमा। हमारी भी कुछ इज्जत है। हमारी इज्जत तुम्हारे यहां होने से सरेआम उछल रही है। तस्लीमा, जिद न करो। यूरोपीय लोकतंत्र के सुरक्षित वातावरण में चली जाओ। अब जाओ भी। दफा हो जाओ भारत से।

वरना तस्लीमा हम तुम्हारा बुरा हाल करेंगे। हम लोकतंत्र हैं फिर भी तुम्हे नजरबंद कर देंगे। सुरक्षा के नाम पर तुम्हें बाकी दुनिया से काट देंगे। किसी से भी मिलने नहीं देंगे तुम्हे। फोन पर बात भी तुम उसी से करोगी, जिसके लिए हम इजाजत देंगे। अकेलेपन से तुम्हें डर लगता है ना तस्लीमा। हम तुम्हे अकेलापन देंगे। ऐसा अकेलापन कि तुम पागल हो जाओगी। तुम पागल बनना तो नहीं चाहती हो तस्लीमा। भारतीय लोकतंत्र का दिल भी बड़ा कोमल है। और तुम तो समझदार हो। तुम समझती क्यों नहीं तस्लीमा। प्लीज, अब मान भी जाओ।

देखती नहीं तुम कि तुम्हारे भारत में होने से हम दोनों सरकारों को कितनी दिक्कत हो रही है। मैं पश्चिम बंगाल सरकार हूं। मैं लेफ्ट हूं। मैं तो कहता हूं तुम जहां चाहो रहो। लेकिन पश्चिम बंगाल को तो माफ करो। यहां आओगी, तो हम तुम्हारी सुरक्षा नहीं करेंगे। हमने तीस साल के शासन में मुसलमानों के साथ बड़ा छल किया है। उनकी आबादी राज्य में 25 फीसद से ज्यादा है लेकिन सरकारी नौकरियों में वो सिर्फ 2.1 फीसदी हैं। उन्हें न हमने शिक्षा दी न बैंक लोन। तस्लीमा तुम सच्चर कमेटी की रिपोर्ट देख लो। वैसे अब तो हम उन्हें सुरक्षा भी नहीं दे रहे हैं। बर्गादार मुसलमानों की जमीन छीन रहे हैं हम। इसलिए नंदीग्राम होता है और वहां सबसे ज्यादा मुसलमान मारे जाते हैं।

तस्लीमा, पश्चिम बंगाल के मुसलमान नौकरियां मांगने लगे हैं। वो तो हम उन्हें दे नहीं सकते, लेकिन उनके कट्टरपंथी हिस्से को हम ये जरूर कह सकते हैं कि देखो हमने तस्लीमा को भगा दिया। तुम्हारा भागना हमारे लिए उपलब्धि है। ये हमारी ट्रॉफी है तस्लीमा। तुम बंगाल लौटकर उस ट्रॉफी को हमसे छीन लेना चाहती हो? खबरदार जो ऐसा किया। हम ऐसा नहीं होने देंगे।

हम बाहर नहीं बोलेंगे, पर केंद्र की सरकार को धमकाएंगे, समर्थन वापस लेने की धमकी भी देंगे। ऐसे में तुमको लगता है कि तुम बंगाल लौट पाओगी। भूल जाओ तस्लीमा। तुम स्वीडेन चली जाओ। हुसैन साहब भी तो विदेश भाग गए। तुम भी ऐसा ही करो। खुश रहो। हमारी शुभकामनाएं तुम्हारे साथ हैं। तुम कितनी अच्छी हो। थैंक्स।
-दिलीप मंडल

Sunday, 23 December 2007

हमारी संस्कृति और जाति व्यवस्था को मत छेड़ो प्लीज़...

...गुलामी भी हम बर्दाश्त कर लेंगे।

क्या देश के बीते लगभग एक हजार साल के इतिहास की हम ऐसी कोई सरलीकृत व्याख्या कर सकते हैं? ऐसे नतीजे निकालने के लिए पर्याप्त तथ्य नहीं हैं। लेकिन हाल के वर्षों में कई दलित चिंतक ऐसे नतीजे निकाल रहे हैं और दलित ही नहीं मुख्यधारा के विमर्श में भी उनकी बात सुनी जा रही है। इसलिए कृपया आंख मूंदकर ये न कहें कि ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है।

भारत में इन हजार वर्षों में एक के बाद एक हमलावर आते गए। लेकिन ये पूरा कालखंड विदेशी हमलावरों का प्रतिरोध करने के लिए नहीं जाना जाता है। प्रतिरोध बिल्कुल नहीं हुआ ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन समग्रता में देखें तो ये आत्मसमर्पण के एक हजार साल थे। क्या हमारी पिछली पीढ़ियों को आजादी प्रिय नहीं थी? या फिर अगर कोई उन्हें अपने ग्रामसमाज में यथास्थिति में जीने देता था, उनकी पूजा पद्धति, उनकी समाज संरचना, वर्णव्यवस्था आदि को नहीं छेड़ता था, तो वो इस बात से समझौता करने को तैयार हो जाते थे कि कोई भी राजा हो जाए, हमें क्या?

ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर इसका जवाब ढूंढने की कोई कोशिश अगर हुई है, तो वो मेरी जानकारी में नहीं है। देश की लगभग एक हजार साल की गुलामी की समीक्षा की बात शायद हमें शर्मिंदा करती है। हम इस बात का जवाब नहीं देना चाहते कि हजारों की फौज से लाखों की फौजें कैसे हार गई। हम इस बात का उत्तर नहीं देना चाहते कि कहीं इस हार की वजह ये तो नहीं कि पूरा समाज कई स्तरों में बंटा था और विदेशी हमलावरों के खिलाफ मिलकर लड़ने की कल्पना कर पाना भी उन स्थितियों में मुश्किल था? और फिर लड़ने का काम तो वर्ण व्यवस्था के हिसाब से सिर्फ एक वर्ण का काम है!

इतिहास में झांकने का मकसद अपनी पीठ पर कोड़े मारकर खुद को लहूलुहान कर लेना कतई नहीं हो सकता, लेकिन हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि गलतियों से न सीखने वाले दोबारा और अक्सर ज्यादा बड़ी गलतियां करने को अभिशप्त होते हैं।

भारत पर राज करने शासकों में से शुरूआती मुगल शासकों ने अपेक्षाकृत निर्बाध तरीके से (हुमायूं के शासनकाल के कुछ वर्षों को छोड़कर) देश पर राज किया। मुगल शासकों ने बाबर के समय से ही तय कर लिया था कि इस देश के लोग अपना जीवन जिस तरह चला रहे हैं, उसमें न्यूनतम हस्तक्षेप किया जाए। जजिया टैक्स लगाना उस काल के हिंदू जीवन में एकमात्र ऐसा मुस्लिम और शासकीय हस्तक्षेप था, जिससे आम लोगों को कुछ फर्क पड़ता था। ये पूरा काल अपेक्षाकृत शांति से बीता है। औरंगजेब ने जब हिंदू यथास्थिति को छेड़ा तो मुगल शासन के कमजोर होने का सिलसिला शुरू हो गया।

उसके बाद आए अंग्रेज शासकों ने भारतीय जाति व्यवस्था का सघन अध्ययन किया। उस समय के गजेटियर इन अध्ययनों से भरे पड़े हैं। जाति व्यवस्था की जितनी विस्तृत लिस्ट आपको अंग्रेजों के लेखन में मिलेगी, उसकी बराबरी समकालीन हिंदू और हिंदुस्तानी लेखन में भी शायद ही कहीं है। एक लिस्ट देखिए जो संयुक्त प्रांत की जातियों का ब्यौरा देती है। लेकिन अंग्रेजों ने भी आम तौर पर भारतीय परंपराओं खासकर वर्ण व्यवस्था को कम ही छेड़ा।

मैकाले उन चंद अंग्रेज अफसरों में थे, जिन्होंने जाति व्यवस्था और उससे जुड़े भेदभाव पर हमला बोला। समान अपराध के लिए सभी जातियों के लोग समान दंड के भागी बनें, इसके लिए नियम बनाना एक युगांतकारी बात थी। पहले लॉ कमीशन की अध्यक्षता करते हुए मैकाल जो इंडियन पीनल कोड बनाया, उसमें पहली बार ये बात तय हुई कि कानून की नजर में सभी बराबर हैं और अलग अलग जातियों को एक ही अपराध के लिए अलग अलग दंड नहीं दिया जाएगा। शिक्षा को सभी जाति समूहों के लिए खोलकर और शिक्षा को संस्कृत और फारसी जैसी आभिजात्य भाषाओं के चंगुल में मुक्त करने की पहल कर मैकाले ने भारतीय जाति व्यवस्था पर दूसरा हमला किया।

गुरुकुलों से शिक्षा को बाहर लाने की जो प्रक्रिया मैकाले के समय में तेज हुई, उससे शिक्षा के डेमोक्रेटाइजेशन का सिलसिला शुरू हुआ। अगर आज देश में 50 लाख से ज्यादा (ये संख्या बार बार कोट की जाती है, लेकिन इसके स्रोत को लेकर मैं आश्वस्त नहीं हो, वैसे संख्य़ा को लेकर मुझे संदेह भी नहीं है) दलित मिडिल क्लास परिवार हैं, तो इसकी वजह यही है कि दलितों को भी शिक्षा का अवसर मिला और आंबेडकर की मुहिम और पूना पैक्ट की वजह से देश में आरक्षण की व्यवस्था हुई।

ये शायद सच है कि मैकाले इन्हीं वजहों से आजादी के बाद देश की सत्ता पर काबिज हुई मुख्यधारा की नजरों में एक अपराधी थे। भारतीय संस्कृति पर हमला करने के अपराधी। देश को गुलाम बनाने वालों से भी बड़े अपराधी। हम विदेशी हमलावरों को बर्दाश्त कर लेते हैं, लेकिन हमारी जीवन पद्धति खासकर वर्णव्यवस्था से छेड़छाड़ करने वाला हमारे नफरत की आग में जलेगा।

वीपी सिंह की मिसाल लीजिए। उन्होंने जीवन में बहुत कुछ किया। उत्तर प्रदेश में डकैत उन्मूलन के नाम पर पिछड़ों पर जुल्म ढाए, राजीव गांधी की क्लीन इमेज को तार तार कर दिया, बोफोर्स में रिश्वतखोरी का पर्दाफाश किया, लेकिन मुख्यधारा उन्हें इस बात के लिए माफ नहीं करेगी कि उन्होंने मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू करने की कोशिश की। हालांकि वीपी सिंह ने ये कदम राजनीतिक मजबूरी की वजह से उठाया था और वो पिछड़ों के हितैषी कभी नहीं रहे फिर भी वीपी सिंह सवर्ण मानस में एक विलेन हैं और पूरी गंगा के पानी से वीपी सिंह को धो दें तो भी उनका ये 'पाप' नहीं धुल सकता। ये चर्चा फिर कभी।

जाहिर है मैकाले को लेकर दो एक्सट्रीम चिंतन हैं। लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या इसके लिए मैकाले की पूजा होनी चाहिए या उनकी तस्वीर को गोली मार देनी चाहिए। इस अतिवाद को छोड़कर देखें तो मैकाले के समय का द्वंद्व नए और पुराने के बीच, प्राच्य और पाश्चात्य के बीच का था। मैकाले उस द्वंद्व में नए के साथ थे, पाश्चत्य के साथ थे। अंग्रेजी शिक्षा के लिए उनके दिए गए तर्क उनके समग्र चिंतन से अलग नहीं है। इसलिए ये मानने का कोई आधार नहीं है कि मैकाले ने साजिश करके भारत में अंग्रेजी शिक्षा की नींव डाली। उनका मिनिट ऑन एजुकेशन (1835) पढ़ जाए। भारत के प्रति मैकाले में न प्रेम है न घृणा। एक शासक का मैनेजेरियल दिमाग है, जो अपनी मान्यताओं के हिसाब से शासन करने के अपने तरीके को जस्टिफाई कर रहा है।

मैकाले की इस बात के लिए प्रशंसा करना विवाद का विषय है कि उनकी वजह से देश में अंग्रेजी शिक्षा आई और भारत आज आईटी सेक्टर की महाशक्ति इसी वजह से बना हुआ है और इसी ज्ञान की वजह से देश में बीपीओ इंडस्ट्री फल फूल रही है। चीन में मैकाले जैसा कई नहीं गया। चीन के लोगों ने अंग्रेजी को अपनाने में काफी देरी की, फिर भी चीन की अर्थव्यवस्था भारत से कई गुना बड़ी है। लेकिन चीन का आर्थिक और सामाजिक परवेश हमसे अलग है और ये तुलना असमान स्थितियों के बीच की जा रही है और भाषा का आर्थिक विकास में योगदान निर्णायक भी नहीं माना जा सकता। - दिलीप मंडल

Friday, 21 December 2007

इधर त्रिलोचन सॉनेट के ही पथ पर दौडा

इष्ट देव सांकृत्यायन

पिछ्ले दिनो मैने त्रिलोचन जी से सम्बन्धित एक संस्मरण लिखा था. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए भाई अनूप शुक्ल यानी फुरसतिया महराज ने और भाई दिलीप मंडल ने आदेश दिया था कि इस विधा के बारे मे मै विस्तार से बताऊँ और अपने कुछ सानेट भी पढवाऊ. मेरे सानेट के मामले मे तो अभी आपको पहले से इयत्ता पर पोस्टेड सानेटो से ही काम चलाना पडेगा, सानेट का संक्षिप्त इतिहास मै आज ही पोस्ट कर रहा हूँ. हाँ, कविता को मै चूँकि छन्दो और रूपो के आधार पर बांटने के पक्ष मे नही हूँ, क्योंकि मै मानता हूँ कि काव्यरूपो के इस झगडे से कविता का कथ्य पीछे छूट जाता है; इसलिए मेरे सॉनेट कविता वाले खांचे मे ही दर्ज है.

वैसे यह लेख आज ही दैनिक जागरण के साहित्य परिशिष्ट पुनर्नवा मे प्रकाशित हुआ है और वही लेख दैनिक जागरण के ही मार्फत याहू इंडिया ने भी लिया है. भाई मान्धाता जी ने भी यह लेख अपने ब्लाग पर याहू के हवाले से लिया है. निश्चित रूप से भाई अनूप जी इसे पढ भी चुके होंगे, पर अन्य साथी भी इस विधा के इतिहास-भूगोल से सुपरिचित हो सके इस इरादे से मै यह लेख यहाँ दे रहा हूँ.

पहली ही मुलाकात में त्रिलोचन शास्त्री से जैसी आत्मीयता हुई, उसे मैं कभी भूल नहीं सकता. कवि त्रिलोचन को तो मैं बहुत पहले से जानता था और उनकी रचनाधर्मिता का मैं कायल भी था, लेकिन व्यक्ति त्रिलोचन से मेरी मुलाकात 1991 में हुई. उनकी सहजता और विद्वत्ता ने मुझे जिस तरह प्रभावित किया, उसने उनके कवि के प्रति मेरे मन में सम्मान और बढ़ा दिया. ऐसे रचनाकार अब कहां दिखते है, जो लेखन और व्यवहार दोनों में एक जैसे ही हों! पर त्रिलोचन में यह बात थी और व्यक्तित्व की यह सहजता ही उनके रचनाकार को और बड़ा बनाती है. अंग्रेजी का मुहावरा 'लार्जर दैन लाइफ' बिलकुल सकारात्मक अर्थ में उन पर लागू होता है.
अंग्रेजी का और नकारात्मक अर्थो में इस्तेमाल किए जाने के बावजूद इस मुहावरे का सकारात्मक प्रयोग करते हुए संकोच मुझे दो कारणों से नहीं हो रहा है. पहला तो यह हिंदी के प्रति पूरी तरह समर्पित होते हुए भी त्रिलोचन को अंग्रेजी से कोई गुरेज नहीं था. अंग्रेजी का छंद सॉनेट हिंदी में त्रिलोचन का पर्याय बन गया, इससे बड़ा प्रमाण इसके लिए और क्या चाहिए? दूसरा यह कि शब्दों के साथ खेलना मैंने त्रिलोचन से ही सीखा. वह कैसे किसी शब्द को उसके रूढ़ अर्थ के तंग दायरे से निकाल कर एकदम नए अर्थ में सामने प्रस्तुत कर दें, इसका अंदाजा कोई लगा नहीं सकता था. भाषा और भाव पर उनका जैसा अधिकार था उसकी वजह उनकी सहजता और अपनी सोच के प्रति निष्ठा ही थी.
अपने छोटों के प्रति सहज स्नेह का जो निर्झर उनके व्यक्तित्व से निरंतर झरता था, वह किसी को भी भिगो देने के लिए काफी था. लेकिन मेरी और उनकी आत्मीयता का एक और कारण था. वह था सॉनेट. वैसे हिंदी में सॉनेट छंद का प्रयोग करने वाले त्रिलोचन कोई अकेले कवि नहीं है. उनके पहले जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महाप्राण निराला भी इस छंद का प्रयोग कर चुके थे. उनके बाद जयप्रकाश बागी ने इसका प्रयोग किया. हो सकता है कि इसका प्रयोग कुछ और कवियों ने भी किया हो, पर इटैलियन मूल के इस छंद को आज हिंदी में सिर्फ त्रिलोचन के नाते ही जाना जाता है. ऐसे ही जैसे इटली में बारहवीं शताब्दी में शुरू हुए इस छंद को चौदहवीं सदी के कवि पेट्रार्क के नाते जाना जाता है.
ऐसा शायद इसलिए है कि पेट्रार्क की तरह त्रिलोचन भी ताउम्र सफर में रहे। वैसे ही जैसे यह छंद इटैलियन से अंग्रेजी, अंग्रेजी से हिंदी और फिर रूसी, जर्मन, डच, कैनेडियन, ब्राजीलियन, फ्रेंच, पोलिश, पुर्तगी़ज, स्पैनिश, स्वीडिश .. और जाने कितनी ही भाषाओं के रथ की सवारी करता दुनिया भर के सफर में है. चौदह पंक्तियों के इस छंद से त्रिलोचन का बहुत गहरा लगाव था और यह अकारण नहीं था. कारण उन्होंने मुझे पहली ही मुलाकात में बताया था, 'देखिए, यह छंद जल्दी सधता नहीं है, लेकिन जब सध जाता है तो बहता है और बहा ले जाता है. सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें आप जो कहना चाहते है, वही कहते है और पढ़ने या सुनने वाला ठीक-ठीक वही समझता भी है.' मतलब यह कि दो अर्थो के चमत्कार पैदा करने के कायल अलंकारप्रेमी कवियों के लिए यह छंद मुफीद नहीं है. ठीक-ठीक वही अर्थ कोई कैसे ग्रहण करता है? इस सवाल पर शास्त्री जी का जवाब था, 'हिंदी में बहुत लोगों को भ्रम है कि शब्दों के पंक्चुएशन से अर्थ केवल अंग्रेजी में बदलता है. हिंदी में क्रिया-संज्ञा को इधर-उधर कर देने से कोई फर्क नहीं पड़ता है. वास्तव में ऐसा है नहीं. हिंदी में तो केवल बलाघात से, बोलने के टोन से ही वाक्यों के अर्थ बदल जाते है. फिर ऐसा कैसे हो सकता है कि यहां शब्दों के पंक्चुएशन से अर्थ न बदले?'
त्रिलोचन की कोशिश यह थी कि वह जो कहे वही समझा जाए. यही वजह है जो-
इधर त्रिलोचन सॉनेट के ही पथ पर दौड़ा
सॉनेट सॉनेट सॉनेट सॉनेट क्या कर डाला
यह उसने भी अजब तमाशा. मन की माला
गले डाल ली. इस सॉनेट का रस्ता चौड़ा
अधिक नहीं है, कसे कसाए भाव अनूठे
ऐसे आयें जैसे किला आगरा में जो
नग है, दिखलाता है पूरे ताजमहल को.
गेय रहे एकान्वित हो. ..

और इसे आप नॉर्सिसिज्म नहीं कह सकते है। वह इस विधा में अपने अवदान को लेकर किसी खुशफहमी में नहीं है। साफ कहते है-
....उसने तो झूठे
ठाट-बाट बांधे है. चीज किराए की है.

फिर चीज है किसकी, यह जानने कहीं और नहीं जाना है.
अगली ही पंक्ति में वह अपने पूर्ववर्तियों को पूरे सम्मान के साथ याद करते है-
स्पेंसर, सिडनी, शेक्सपियर, मिल्टन की वाणी
वर्डस्वर्थ, कीट्स की अनवरत प्रिय कल्याणी
स्वरधारा है. उसने नई चीज क्या दी है!

ऐसा भी नहीं है कि वह आत्मश्लाघा से मुक्त है तो आत्मबोध से भी मुक्त हों। अपने रचनात्मक अवदान के प्रति भी वह पूरी तरह सजग है और यह बात वह पूरी विनम्रता से कहते भी हैं-
सॉनेट से मजाक भी उसने खूब किया है,
जहां तहां कुछ रंग व्यंग का छिड़क दिया है.

कविता की भाषा के साथ भी जो प्रयोग उन्होंने किया, वह बहुत सचेत ढंग से किया है. गद्य के व्याकरण में उन्होंने कविता लिखी, जिसमें लय उत्पन्न करना छंदमुक्त नई कविता लिखने वालों के लिए भी बहुत मुश्किल है. लेकिन त्रिलोचन छंद और व्याकरण के अनुशासन में भी लय का जो प्रवाह देते है, वह दुर्लभ है. शायद यह वही 'अर्थ की लय' है जिसके लिए अज्ञेय जी आह्वान किया करते थे.
यह अलग बात है कि आज हम उन्हे एक छंद सॉनेट के लिए याद कर रहे है, पर कविता उनके लिए छंद-अलंकार का चमत्कार पैदा करने वाली मशीन नहीं है. कविता उनके लिए लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का माध्यम है. ठीक-ठीक वही बात जो वह सोचते है. वह अपने समय और समाज के प्रति पूरे सचेत है-
देख रहा हूं व्यक्ति, समाज, राष्ट्र की घातें
एक दूसरे पर कठोरता, थोथी बातें
संधि शांति की..

वह यह भी जानते है जो संघर्ष वह कर रहे है वह उनकी पीढ़ी में पूरा होने वाला नहीं है.इसमें कई पीढि़यां खपेंगी, फिर उनके सपनों का समाज बन पाएगा.कहते है-
धर्म विनिर्मित अंधकार से लड़ते लड़ते
आगामी मनुष्य; तुम तक मेरे स्वर बढ़ते.

हमारी गालियों में मैकाले है, क्लाइव नहीं

लेकिन सवाल ये है कि आज क्लाइव और मैकाले की बात ही क्यों करें? सही सवाल है। समय का पहिया इतना आगे बढ़ गया है। ऐसे में इतिहास के खजाने से या कूड़ेदान से कुछ निकालकर लाने का औचित्य क्या है? चलिए इसका जवाब भी मिलकर ढूंढेंगे, अभी जानते हैं इतिहास के इन दो पात्रों के बारे में। आप ये सब वैसे भी पढ़ ही चुके होंगे। स्कूल में नहीं तो कॉलेज में।

कौन था क्लाइव


क्लाइव न होता तो क्या भारत में कभी अंग्रेजी राज होता? इतिहास का चक्र पीछे लौटकर तो नहीं जाता इसलिए इस सवाल का कोई जवाब नहीं हो सकता। लेकिन इतिहास हमें ये जरूर बताता है कि क्लाइव के लगभग एक हजार यूरोपीय और दो हजार हिंदुस्तानी सिपाहयों ने पलासी की निर्णायक लड़ाई (22 जून, 1757) में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हरा कर भारत में अंग्रेजी राज की नींव रखी थी। वो लड़ाई भी क्या थी? सेनानायक मीरजाफर ने इस बात का बंदोबस्त कर दिया था कि नवाब की ज्यादातर फौज लड़ाई के मैदान से दूर ही रहे। एक दिन भी नहीं लगे थे उस युद्ध में। उस युद्ध के बाद अंग्रेजों ने भारतीय संपदा की लूट का जो सिलसिला शुरू किया, उसकी बराबरी दक्षिण अमेरिका में स्पेन के युद्ध सरदारों की मचाई लूट से ही की जा सकती है।

और कौन था मैकाले

मैकाले को भारतीय इतिहास का हर छात्र एक ऐसे शख्स के रूप में जानता है जिसने देश को तो नहीं लेकिन भारतीय मानस को जरूर गुलाम बनाया। हमारी सामूहिक स्मृति में इसका असर इस रूप में है कि हम जिसे विदेशी मिजाज का, देश की परंपरा से प्रेम न करने वाला, विदेशी संस्कृति से ओतप्रोत मानते हैं उसे मैकाले पुत्र, मैकाले की औलाद, मैकाले का मानस पुत्र, मैकाले की संतान आदि कहकर गाली देते हैं।

लेकिन भारत में अंग्रेजी राज की स्थापना के सबसे महत्वपूर्ण प्रतीक क्लाइव को लेकर हमारे यहां घृणा का ऐसा भाव आश्चर्यजनक रूप से नहीं है। आखिर ऐसा क्यों है। मैकाले जब भारत आया तो भारत में अंग्रेजी राज जड़ें जमा चुका था। मैकाले को इस बात के लिए भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता है कि उसने क्लाइव की तरह तलवार और बंदूक के बल पर एक देश को गुलाम बनाया। या कि उसने छल से बंगाल के नवाब को हरा दिया। मैकाले अपने हाथ में तलवार नहीं कलम लेकर भारत आया था।

लेकिन मैकाले फिर भी बड़ा विलेन है।

मैकाले हमारी सामूहिक स्मृति में घृणा का पात्र है तो ये अकारण नहीं है। मैकाले के कुछ चर्चित उद्धरणों को देखें। उसका दंभ तो देखिए

"मुझे एक भी प्राच्यविद (ओरिएंटलिस्ट) ऐसा नहीं मिला जिसे इस बात से इनकार हो कि किसी अच्छी यूरोपीय लाइब्रेरी की किताबों का एक रैक पूरे भारत और अरब के समग्र साहित्य के बराबर न हो।"

और उनके इस कथन को कौन भूल सकता है। प्रोफेसर बिपिन चंद्रा की एनसीईआरटी की इतिहास की किताब में देखिए।

" फिलहाल हमें भारत में एक ऐसा वर्ग बनाने की कोशिश करनी चाहिए जो हमारे और हम जिन लाखों लोगों पर राज कर रहे हैं, उनके बीच इंटरप्रेटर यानी दुभाषिए का काम करे। लोगों का एक ऐसा वर्ग जो खून और रंग के लिहाज से भारतीय हो, लेकिन जो अभिरूचि में, विचार में, मान्यताओं में और विद्या-बुद्धि में अंग्रेज हो।"

इतिहासकार सुमित सरकार मैकाले को कोट करते हैं-

"अंग्रेजी में शिक्षित एक पढ़ा लिखा वर्ग, रंग में भूरा लेकिन सोचने समझने और अभिरुचियों में अंग्रेज।"

भारतीय इतिहास की किताबों में मैकाले इसी रूप में आते हैं। पांचजन्य के एक लेख में मैकाले इस शक्ल में आते हैं-

लार्ड मैकाले का मानना था कि जब तक संस्कृति और भाषा के स्तर पर गुलाम नहीं बनाया जाएगा, भारतवर्ष को हमेशा के लिए या पूरी तरह, गुलाम बनाना संभव नहीं होगा। लार्ड मैकाले की सोच थी कि हिंदुस्तानियों को अँग्रेज़ी भाषा के माध्यम से ही सही और व्यापक अर्थों में गुलाम बनाया जा सकता है। अंग्रेज़ी जानने वालों को नौकरी में प्रोत्साहन देने की लार्ड मैकाले की पहल के परिणामस्वरूप काँग्रेसियों के बीच में अंग्रेज़ी परस्त काँग्रेसी नेता पं. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में एकजुट हो गए कि अंग्रेज़ी को शासन की भाषा से हटाना नहीं है अन्यथा वर्चस्व जाता रहेगा और देश को अंग्रेज़ी की ही शैली में शासित करने की योजनाएँ भी सफल नहीं हो पाएँगी।...भाषा के सवाल को लेकर लार्ड मैकाले भी स्वप्नदर्शी थे, लेकिन उद्देश्य था, अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम से गुलाम बनाना।

तो ऐसे मैकाले से भारत नफरत न करे तो क्या करे? लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है, दोस्त।

Thursday, 20 December 2007

क्लाइव या मैकाले - किसे पहले जूते मारेंगे आप?

डिसक्लेमर: इस चर्चा में अगर कोई विचार मेरा है, तो उसका अलग से जिक्र किया जाएगा। - दिलीप मंडल

इन दो तस्वीरों को देखिएइनमें ऊपर वाले हैं लार्ड क्वाइव और नीचे हैं लॉर्ड मैकाले। लॉर्ड वो ब्रिटेन में होंगे हम उन्हें आगे क्लाइव और मैकाले कहेंगेएक सवाल पूछिए अपने आप सेकभी आपको अगरह कहा जाए कि इनमें से किसी एक तस्वीर को जूते मारो, या पत्थर मारो या गोली मारो या नफरत भरी नजरों से देखोतो आपकी पहली च्वाइस क्या होगी

अनुरोध इतना है कि इस सवाल को देखकर किसी नए संदर्भ की तलाश में नेट पर या किताबों के बीच चले जाइएगाअपनी स्मृति पर भरोसा करें, जो स्कूलों से लेकर कॉलेज और अखबारों से लेकर पत्रिकाओं में पढ़ा है उसे याद करेंऔर जवाब देंये सवाल आपको एक ऐसी यात्रा की ओर ले जाएगा, जिसकी चर्चा कम हुई हैजो इन विषयों के शोधार्थी, जानने वाले हैं, उनके लिए मुमकिन है कि ये चर्चा निरर्थक होलेकिन इस विषय पर मैं अभी जगा हूं, इसलिए मेरा सबेरा तो अभी ही हुआ हैइस पर चर्चा आगे जारी रहेगी

Tuesday, 18 December 2007

...कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम!


इष्ट देव सांकृत्यायन

तारीख 9 दिसम्बर 2007
दिन रविवार होने और अरसे बाद रविवार को रविवारी फुर्सत मिलने के कारण में पूरी तफरीह के मूड में था. करीब शाम को आए विनय और देर तक लुक्कड़ई होती रही. बाद में हम उनके ही घर चले गए और वहीं टीवी आन किया. रात साढ़े नौ बजे. मैंने टीवी खोला तो था डीडी भारती का कार्यक्रम 'सृजन' देखने के लिए, पर पहले सामने कोई न्यूज चैनल आ गया. इसके पहले की चैनल सरकाता, नीचे चल रहे एक प्रोमो पर ध्यान गया- "हिन्दी के वरिष्ठ कवि त्रिलोचन का निधन"। सहसा विश्वास नहीं हुआ. इसके बावजूद कि त्रिलोचन इधर काफी समय से बीमार पड़े थे मन ने कहा कि यह शायद किसी और त्रिलोचन की बात है. हालांकि वह किसी और त्रिलोचन की बात नहीं थी. यह तय हो गया ख़बरों के हर चैनल पर यही खबरपट्टी चलते देख कर.
यह अलग बात है कि शास्त्री जी के बारे में इससे ज्यादा खबर किसी चैनल पर नहीं थी, पर उस दिन में लगातार इसी सर्च के फेर में फिर 'सृजन' नहीं देख सका। इस प्रलय के बाद फिर सृजन भला क्या देखते! हिन्दी में आचार्य कोटि के वह अन्तिम कवि थे। एक ऐसे कवि जिसमें आचय्त्व कूट-कूट कर भरा था, पर उसका बोध उन्हें छू तक नहीं सका था. बडे रचनाकारों से क्षमा चाहता हूँ, पर अपने समय में में उन्हें हिन्दी का सबसे बडा रचनाकार मानता हूँ. सिर्फ इसलिए नहीं कि उनकी रचनाएं बहुत उम्दा हैं, बल्कि इसलिए कि अपने निजी स्वभाव में भी वह बहुत बडे 'मनुष्य' थे. गालिब ने जो कहा है, 'हर आदमी को मयस्सर नहीं इन्सां होना', संयोग से यह त्रिलोचन को मयस्सर था. त्रिलोचन वह वटवृक्ष नहीं थे जिसके नीचे दूब भी नहीं बढ़ पाती. वह ऐसे पीपल थे जिसके नीचे दूब और भडभाड़ से लेकर हाथी तक को छाया मिलती है और सबका सहज विकास भी होता है. त्रिलोचन की सहजता उतनी ही सच्ची थी जितना कि उनका होना. वह साहित्य के दंतहीन शावकों से भी बडे प्यार और सम्मान से मिलते थे और उनके इस मिलने में गिरोह्बंदी की शिकारवृत्ति नहीं होती थी.
पहली बार उनसे मेरी मुलाकात सन 1991 में हुई थी। तब में पहली ही बार दिल्ली आया था। उसी बीच श्रीकान्त वर्मा स्मृति पुरस्कार समारोह का आयोजन था. पुरस्कार उस साल उदय प्रकाश को दिया जाना था 'तिरिछ' कहानी संग्रह के लिए. उसी समारोह में शिरकत के लिए त्रिलोचन जी को ले आना था. डा. अरविंद त्रिपाठी पुरस्कार समिति के सचिव थे. उनके साथ ही में भी गया था. डा. अरविंद ने ही त्रिलोचन जी से मेरा परिचय कराया. यह जान कर कि में भी सानेट लिखता हूँ उन्होने कहा कि तब तो आप पहले अपने सानेट सुनाइए. खैर गीत-सानेट सुनते-सुनाते चाय-पानी पीकर हम लोग उनके घर से चले. करीब डेढ़ घंटे के उस सफर में वह दूसरे बडे रचनाकारों की तरह गंभीरता की चादर ओढे अलगथलग होकर चुप नहीं बैठ गए -. पूरे रास्ते बातचीत होती रही. वह सबकी सुनते और अपनी कहते रहे. सबसे अच्छी बात यह रही कि पूरे रास्ते साहित्य जगत की राजनीति की कोई बात नहीं हुई. बातें शब्दों पर हीन, हिन्दी और विश्व साहित्य पर हुईं, कविता की प्रवृत्ति और प्रयोगों पर हुईं ... और जाने किन-किन मुद्दों पर हुईं.
इसी बातचीत में मुहे पहली बार मालूम हुआ कि 'विकृति' शब्द का अर्थ 'खराबी' या 'गंदगी' जैसा कुछ नहीं होता। यह अर्थ उसमें शब्द के लाक्षणिक प्रयोग के नाते जुड़ गया है और रूढ़ हो जाने के कारण बहुधा मान्य हो गया है. इस शब्द का मूल अर्थ तो 'विशिष्ट कृति' है. लाक्षणिक प्रयोगों के ही चलते ऐसे ही जाने और कितने शब्दों के अर्थ रूढ़ होकर नष्ट हो गए हैं. ऐसे ही और बीसियों शब्दों के अर्थ उन्होने हमें बताए. इसी बातचीत में उपसर्ग-प्रत्यय से तोड़ कर शब्दों के मूल रूप और अर्थ ढूँढने की कला मैंने सीख ली, जो अब तक मेरे काम आ रही है.
अब तक में शास्त्री जी को केवल एक कवि के रूप में जानता था। लेकिन इसी बातचीत में मैंने जाना की वही त्रिलोचन जो कहते हैं -
चाय की प्यालियाँ कभी मत दो
हर्ष की तालियाँ कभी मत दो
चाह की राह से आए अगर
दर्द को गालियाँ कभी मत दो

बडे भाषाविद भी हैं. उन्होने कई कोशों का सम्पादन भी किया है. शब्दों की छिर्फाद करने की उनकी कला मुझे ही नहीं बडे-बडों को भी वाकई हैरत में डाल देती थी.
बहरहाल हम आयोजन स्थल पहुंचे और उस गहमागहमी में वह अविस्मरनीय सफर इतिहास का हिस्सा बन गया। शास्त्री जी मंचस्थ हो गए और में श्रोताओं की भीड़ में गुम. लेकिन आयोजन के बाद उन्होने मुझे खुद बुलाया और फिर टैक्सी आने तक करीब दस मिनट हमारी बातें हुईं. उन्होने फिर मिलने के लिए भी कहा और चलते-चलते यह भी कहा, 'आपकी कविताओं में जो ताप है वह आज के रचनाकारों में दुर्लभ है. इसे बनाए रखिए. एक बात और... रस, छंद, अलंकार कविता के लिए जरूरी हैं, लेकिन अगर इन्हें जिद बनाइएगा तो ये विकास में बाधक बनेंगे.'
यह मेरे लिए एक और सूत्र था। भाषा और भाव के प्रति इस खुलेपन का साफ असर त्रिलोचन की कविताओं पर ही नहीं, उनके व्यक्तित्व पर भी भरपूर था. एक तरफ तो वह कहते हैं - तुलसी बाबा भाषा मैंने तुमसे सीखी और दूसरी तरफ यह भी कहते हैं
चार दिन के लिए ही आया था
कंठ खुलते ही गान गाया था
लोग नाम कीट्स का लेते हैं
कैसे बन कर सुगंध छाया था

मात्र 26 वर्ष की उम्र में काल कवलित हो गए अंग्रेजी के विद्रोही कवि जान कीट्स की रचनाधर्मिता के वह कायल थे। यह बात मैंने उनसे बाद की मुलाकातों में जानी। दिल्ली के उस एक माह के प्रवास के दौरान शास्त्री जी से मेरी कई मुलाकातें हुईं। उन मुलाकातों में मैंने केवल उनके व्यक्तित्व के बड़प्पन को ही महसूस नहीं किया; हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, संस्कृत कई भाषाओं के हजारों शब्दों के नए-नए अर्थ भी जाने और यह भी जाना कि सुबरन को यह कवी किस बेताबी और शिद्दत के साथ ढूँढता फिरता रहा है.
बाद में में वापस गोरखपुर आ गया. फिर उनसे सम्पर्क बनाए नहीं रख सका. लम्बे अरसे बाद एक और मौका आया. वह विश्वविद्यालय के एक आयोजन में गोरखपुर आए हुए थे. मालूम हुआ तो में इंटरव्यू करने पहुंचा. मुझे उम्मीद नहीं थी कि अब उनको मेरा नाम याद होगा, पर मिलने के बाद यह मेरा भ्रम साबित हुआ. विश्वविद्यालय गेस्ट हाउस पहुंच कर मैंने सन्देश भेजा और उनसे मिलने की अनुमति चाही तो उन्होने तुरंत बुलाया. मिलते ही बोले, 'अरे तुम्हारे शरीर पर अब तक मांस नहीं चढ़ा!' उनके साथ ही बैठे केदार नाथ सिंह, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी और उदय भान मिश्र हंस पड़े और में अवाक था. साहित्य संसार पर इंटरव्यू तो हुआ, लेकिन इस बीच मैंने एक बात यह भी गौर की कि उनका मन कुछ बुझा-बुझा सा है.
.....चलना तो देखो इसका -
उठा हुआ सिर, चौडी छाती, लम्बी बाँहें,
सधे कदम, तेजी, वे टेढी-मेढ़ी राहें
मानो डर से सिकुड़ रही हैं ....

न ये वही त्रिलोचन नहीं थे. कारण पूछने पर शास्त्री जी तो नहीं बोले, पर केदार जी ने संकेत दिया, 'असल में गाँव में इनके हिस्से की जो थोड़ी-बहुत जमीन थी, उसकी बंदर्बांत हो चुकी है.' में समझ सकता था कि अपने हक़ से निराला की तरह 'बाहर कर दिया गया' यह रचनाधर्मी सांसारिक विफलता से नहीं, बल्कि इसके मूल में व्याप्त छल और व्यवस्था के भ्रष्टाचार से ज्यादा आहत है. शायद ऎसी ही वजहों से उन्होने कहा होगा -
अमर जब हम नहीं हैं तो हमारा प्यार क्या होगा?
लेकिन इसकी अगली ही पंक्ति
सुमन का सुगंच से बढ़कर भला उपहार क्या होगा
यह स्पष्ट कर देती है कि नश्वरता के इस बोध के बावजूद प्यार के प्रति उनके भीतर एक अलग ही तरह की आश्वस्ति है. आखिर हिन्दी के शीर्षस्थ रचनाकारों में प्रतिष्ठित होने के बाद भी अपनी मातृभाषा अवधी में 'अमोला' जैसा प्रबंधकाव्य उन्होने ऐसे ही थोडे दिया होगा. शायद यही वजह है जो नश्वरता का उनका बोध बाद में और गहरा होता गया-
आदमी जी रहा है मरने को
सबसे ऊपर यही सच्चाई है

नश्वरता के इस बोध के बावजूद उन्हें यह बोध भी है कि अभी अपनी पारी वह पूरी खेल नहीं पाए हैं. अभी ऐसे बहुत सारे काम बचे हैं जो उन्हें ही करने हैं. तभी तो वह कहते हैं -
कच्चे ही हो अभी त्रिलोचन तुम
धुन कहाँ वह संभल के आई है

और इसीलिए मुझे अब भी यह विश्वास नहीं हो रहा है कि शास्त्री जी नहीं रहे. आखिर सिर्फ उनसे ही हो सकने वाले बहुत सारे काम जो अभी बाक़ी पड़े हैं, उन्हें कौन पूरा करेगा?

Saturday, 15 December 2007

याद तुम्हारी आई है

नजरें जाती दूर तलक हैं
पर दिखती तनहाई है
क्या तुम रोते हो रातों में

सीली सी पुरवाई है
रातों में आते थे अक्सर
ख्वाब सुहाने तू हंस दे
बेरौनक मुस्कान हुई है
रोती सी शहनाई है
हम तेरी यादों के सहारे
जीते थे खुश होते थे
अब उजडा लगता है चमन क्यों
फीकी सी रौनाई है
गम के सफर में साथ दिया है

साया मेरा कदम-कदम
जानें क्या अब बात हुई है
धुंधली सी परछाई है
हमें खबर थी के तुम खुश हो
अपनी किस्मत लेकर संग
मुद्दत बाद अचानक कैसे
याद तुम्हारी आई है

रतन

Friday, 14 December 2007

हिंदी के दस हजार ब्लॉग, कई लाख पाठक

नए साल में ब्लॉगकारिता का एजेंडा

स्वागत कीजिए 2008 का। हिंदी ब्लॉग नाम के अभी अभी जन्मे शिशु के लिए कैसा होगा आने वाला साल। हम अपनी आकांक्षाएं यहां रख रहें हैं। आकांक्षाएं और उम्मीदें आपकी भी होंगी। तो लिख डालिए उन्हें। अगले साल इन्हीं दिनों में हिट और मिस का लेखाजोखा कर लेंगे। - दिलीप मंडल

हिंदी ब्लॉग्स की संख्या कम से कम 10,000 हो

अभी ये लक्ष्य मुश्किल दिख सकता है। लेकिन टेक्नॉलॉजी जब आसान होती है तो उसे अपनाने वाले दिन दोगुना रात चौगुना बढ़ते हैं। मोबाइल फोन को देखिए। एफएम को देखिए। हिंदी ब्लॉगिंग फोंट की तकनीकी दिक्कतों से आजाद हो चुकी है। लेकिन इसकी खबर अभी दुनिया को नहीं हुई है। उसके बाद ब्लॉगिंग के क्षेत्र में एक बाढ़ आने वाली है।

हिंदी ब्लॉग के पाठकों की संख्या लाखों में हो

जब तक ब्लॉग के लेखक ही ब्लॉग के पाठक बने रहेंगे, तब तक ये माध्यम विकसित नहीं हो पाएगा। इसलिए जरूरत इस बात की है कि ब्लॉग उपयोगी हों, सनसनीखेज हों, रोचक हों, थॉट प्रोवोकिंग हों। इसका सिलसिला शुरू हो गया है। लेकिन इंग्लिश और दूसरी कई भाषाओं के स्तर तक पहुंचने के लए हमें काफी लंबा सफर तय करना है। समय कम है, इसलिए तेज चलना होगा।

विषय और मुद्दा आधारित ब्लॉगकारिता पैर जमाए

ब्लॉग तक पहुंचने के लिए एग्रीगेटर का रास्ता शुरुआती कदम के तौर पर जरूरी है। लेकिन विकास के दूसरे चरण में हर ब्लॉग को अपनी-अपनी स्वतंत्र सत्ता बनानी होगी। यानी ऐसे पाठक बनाने होंगे, जो खास तरह के माल के लिए खास ब्लॉग तक पहुंचे। शास्त्री जे सी फिलिप इस बारे में लगातार काम की बातें बता रहे हैं। उन्हें गौर से पढ़ने की जरूरत है।

ब्लॉगर्स के बीच खूब असहमति हो और खूब झगड़ा हो

सहमति आम तौर पर एक अश्लील शब्द है। इसका ब्लॉग में जितना निषेध हो सके उतना बेहतर। चापलूसी हिंदी साहित्य के खून में समाई हुई है। ब्लॉग को इससे बचना ही होगा। वरना 500 प्रिंट ऑर्डर जैसे दुश्चक्र में हम फंस जाएंगे। तुम मेरे ब्लॉग पर टिप्पणी करते हो, बदले में मैं तुम्हारे ब्लॉग पर टिप्पणी करता हूं - इस टाइप का भांडपना और चारणपंथी बंद होनी चाहिए। साल में कुछ सौ टिप्पणियों से किसी ब्लॉग का कोई भला नहीं होना है, ये बात कुछ मूढ़मगज लोगों को समझ में नहीं आती। आप मतलब का लिखिए या मतलब का माल परोसिए। बाकी ईश्वर, यानी पाठकों पर छोड़ दीजिए। ब्लॉग टिप्पणियों में साधुवाद युग का अंत हो।

ब्लॉग के लोकतंत्र में माफिया राज की आशंका का अंत हो

लोकतांत्रिक होना ब्लॉग का स्वभाव है और उसकी ताकत भी। कुछ ब्लॉगर्स के गिरोह इसे अपनी मर्जी से चलाने की कोशिश करेंगे तो ये अपनी ऊर्जा खो देगा। वैसे तो ये मुमकिन भी नहीं है। कल को एक स्कूल का बच्चा भी अपने ब्लॉग पर सबसे अच्छा माल बेचकर पुराने बरगदों को उखाड़ सकता है। ब्लॉग में गैंग न बनें और गैंगवार न हो, ये स्वस्थ ब्लॉगकारिता के लिए जरूरी है।

ब्लॉगर्स मीट का सिलसिला बंद हो

ये निहायत लिसलिसी सी बात है। शहरी जीवन में अकेलेपन और अपने निरर्थक होने के एहसास को तोड़ने के दूसरे तरीके निकाले जाएं। ब्लॉग एक वर्चुअल मीडियम है। इसमें रियल के घालमेल से कैसे घपले हो रहे हैं, वो हम देख रहे हैं। समान रुचि वाले ब्लॉगर्स नेट से बाहर रियल दुनिया में एक दूसरे के संपर्क में रहें तो किसी को एतराज क्यों होना चाहिए। लेकिन ब्लॉगर्स होना अपने आप में सहमति या समानता का कोई बिंदु नहीं है। ब्लॉगर हैं, इसलिए मिलन करेंगे, ये चलने वाला भी नहीं है। आम तौर पर माइक्रोमाइनॉरिटी असुरक्षा बोध से ऐसे मिलन करती है। ब्लॉगर्स को इसकी जरूरत क्यों होनी चाहिए?

नेट सर्फिंग सस्ती हो और 10,000 रु में मिले लैपटॉप और एलसीडी मॉनिटर की कीमत हो 3000 रु

ये आने वाले साल में हो सकता है। साथ ही मोबाइल के जरिए सर्फिंग का रेट भी गिर सकता है। ऐसा होना देश में इंटरनेट के विकास के लिए जरूरी है। डेस्कटॉप और लैपटॉप के रेट कम होने चाहिए। रुपए की मजबूती का नुकसान हम रोजगार में कमी के रूप में उठा रहे हैं लेकिन रुपए की मजबूती से इंपोर्टेड माल जितना सस्ता होना चाहिए, उतना हुआ नहीं है। अगले साल तक हालात बदलने चाहिए।

नया साल मंगलमय हो, देश को जल्लादों का उल्लासमंच बनाने में जुटे सभी लोगों का नाश हो। हैपी ब्लॉगिंग।

Thursday, 13 December 2007

अपनी राम कहानी है


रतन
सपनों के बारे में कहना
कुछ कहना बेमानी है
दुनिया के लोगों जैसी ही
अपनी राम कहानी है
सोना चांदी महल इमारत
सब कुछ पल के साथी हैं
सच यह है कुछ और नहीं है
जीवन दाना पानी है
गम और खुशियाँ रात दिवस ये
शाम सुबह और सूरज चाँद
ये वैसे ही आते जाते
जैसे आनी जानी है
अगर मगर लेकिन और किन्तु
ये सब हमको उलझाते
इन पर वश तब तक चलता है
जब तक साथ जवानी है
अपनी राह नहीं है सीधी
चिंता गैरों को लेकर
उनके बारे में कुछ कहना
आदत वही पुरानी है

बचपन से ही दारू... क्या बात है भाई




ये तो पी के टुन्न हो गया। सिगरेट पीने की भी औकात नहीं। बीयर पीता था।





अभी से चुम्मा चाटी शुरु, कहां से सीखा गुरु।




जवानी के जलवे, चलो दाढ़ी बना लेते हैं।




अरे वाह क्या जलवा है कुमार शानू का। बिल्ली से लेकर शेर। सभी म्यूजिक से झूम रहे हैं।

Tuesday, 11 December 2007

यह मनुष्य था, इतने पर भी नहीं मरा था

सत्येन्द्र प्रताप
कवि त्रिलोचन. पिछले पंद्रह साल से कोई जानता भी न था कि कहां हैं. अचानक खबर मिली कि नहीं रहे. सोमवार, १० दिसंबर २००७. निगमबोध घाट पर मिले. मेरे जैसे आम आदमी से.
देश की आजादी के दौर को देखा था उन्होंने. लोगों को जीते हुए। एकमात्र कवि. जिसको देखा, कलम चलाने की इच्छा हुई तो उसी के मन, उसी की आत्मा में घुस गए। मानो त्रिलोचन आपबीती सुना रहे हैं. पिछले साल उनकी एक रचना भी प्रकाशित हुई. लेकिन गुमनामी के अंधेरे में ही रहे त्रिलोचन। अपने आखिरी दशक में.
उनकी तीन कविताएं...

भीख मांगते उसी त्रिलोचन को देखा कल
जिसको समझे था है तो है यह फौलादी.
ठेस-सी लगी मुझे, क्योंकि यह मन था आदी
नहीं, झेल जाता श्रद्धा की चोट अचंचल,
नहीं संभाल सका अपने को। जाकर पूछा,
'भिक्षा से क्या मिलता है.' 'जीवन.' क्या इसको
अच्छा आप समझते हैं. दुनिया में जिसको
अच्छा नहीं समझते हैं करते हैं, छूछा
पेट काम तो नहीं करेगा. 'मुझे आपसे
ऐसी आशा न थी.' आप ही कहें, क्या करूं,
खाली पेट भरूं, कुछ काम करूं कि चुप मरूं,
क्या अच्छा है. जीवन जीवन है प्रताप से,
स्वाभिमान ज्योतिष्क लोचनों में उतरा था,
यह मनुष्य था, इतने पर भी नहीं मरा था.

त्रिलोचन ने किसी से कहा नहीं। सब कुछ कहते ही गए. आम लोगों को भी बताते गए और भीख मांगकर जीने वालों को नसीहत देने वालों के सामने यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया.

दूसरी कविता
वही त्रिलोचन है, वह-जिस के तन पर गंदे
कपड़े हैं। कपड़े भी कैसे- फटे लटे हैं
यह भी फैशन है, फैशन से कटे कटे हैं.
कौन कह सकेगा इसका जीवन चंदे
पर अवलंबित है. चलना तो देखो इसका-
उठा हुआ सिर, चौड़ी छाती, लम्बी बाहें,
सधे कदमस तेजी, वे टेढ़ी मेढ़ी राहें
मानो डर से सिकुड़ रही हैं, किस का किस का
ध्यान इस समय खींच रहा है. कौन बताए,
क्या हलचल है इस के रुंघे रुंधाए जी में
कभी नहीं देखा है इसको चलते धीमे.
धुन का पक्का है, जो चेते वही चिताए.
जीवन इसका जो कुछ है पथ पर बिखरा है,
तप तप कर ही भट्ठी में सोना निखरा है.
कवि त्रिलोचन कहीं निराश नहीं है. हर दशक के उन लोगों को ही उन्होंने अपनी लेखनी से सम्मान दिया जो विकास और प्रगति की पहली सीढ़ी भी नहीं चढ़ पाया. संघर्ष करता रहा.
तीसरी कविता
बिस्तरा है न चारपाई है,
जिन्दगी खूब हमने पाई है.
कल अंधेरे में जिसने सर काटा,
नाम मत लो हमारा भाई है.
ठोकरें दर-ब-दर की थीं, हम थे,
कम नहीं हमने मुंह की खाई है.
कब तलक तीर वे नहीं छूते,
अब इसी बात पर लड़ाई है.
आदमी जी रहा है मरने को
सबसे ऊपर यही सचाई है.
कच्चे ही हो अभी अभी त्रिलोचन तुम
धुन कहां वह संभल के आई है.

Wednesday, 5 December 2007

कहाँ जाएंगे


रतन

रहे जो अपनों में बेगाने कहां जाएंगे
जहाँ हों बातों से अनजाने कहां जाएंगे
प्यार का नाम ज़माने से मिटा दोगे अगर
तुम ही बतलाओ कि दीवाने कहां जाएंगे
होंगे साकी भी नहीं मय नहीं पयमाने नहीं
न हों मयखाने तो मस्ताने कहां जाएंगे
लिखे जो ख्वाब कि ताबीर सुहाने दिन में
न हों महफिल तो वे अफ़साने कहां जाएंगे
यों तो है जिंदगी जीने का सबब मर जाना
न हों शम्मा तो ये परवाने कहां जाएंगे
है समझ वाले सभी पर हैं नासमझ ये रतन
बात हो ऐसी तो समझाने कहां जायेंगे

Saturday, 1 December 2007

और ज्यादा हंसो

थोडी देर पहले मैंने अनिल रघुराज के ब्लोग पर एक पोस्ट पढा है. उस पर प्रतिक्रिया देना चाह रहा था, पर यह प्रतिक्रिया ही लम्बी कविता बन गई. मैंने सोचा चलो पोस्ट बना देते हैं. पढ़ कर बताइएगा, कुछ गड़बड़ तो नहीं किया?

हंसो-हंसो
ताकि उन्हें यह शक न हो
कि तुम पढ़ रहे हो
उसमें भी कविता पढ़ रहे हो
और वह
उसे सचमुच समझ भी रहे हो
ताकि उन्हें यह शक न हो
तुम सचमुच पढ़ने के लिए
पढ़ रहे हो
ताकि उन्हें यह लगे कि
तुम सिर्फ पर्सेंटेज बनाने के लिए
पढ़ रहे हो
कि तुम सिर्फ नौकरी पाने के लिए
पढ़ रहे हो
कि तुम्हारे लिए पढ़ने का मतलब
जीवन और जगत के प्रति
कोई सही दृष्टि विकसित करना नहीं है
ताकि उन्हें यह लगे कि
तुम किसी प्रोफेसर के बेटे होया उसके होने वाले दामाद हो
पढ़ लिख कर
इसी यूनिवर्सिटी में
या किसी और संस्थान में
एक पुर्जे की तरह फिट हो जाओगे
हंसो-हंसो
ताकि उन्हें यह लगे कि
फिर तुम्हारा जम कर
इस्तेमाल किया जा सकेगा
जैसे चाहा जाएगा
वैसे तुम्हे बजाया जाएगा
कि तुम्हे बन्दर से भी
बदतर बना लिया जाएगा
चंद कागज़ के टुकडों के लिए
तुम्हे जैसे चाहे वैसे
नचाया जाएगा
झूठ को सुच्चा सच
और सच को
सरासर झूठ
तुमसे कहलवाया जाएगा
हंसो कि
नचाने वालों से कहीं ज्यादा
तत्परता के साथ तुम नाचोगे
हंसो कि
तुम्हारे पास अपनी मजबूरियों के लिए
कई हजार बहाने होंगे
हंसो कि
आज तुम जो कुछ पढ़ रहे हो
इसका वैसे भी कोई मतलब नहीं है
हंसो कि
पढ़-लिख जाने के बाद
तुम इसे और ज्यादा निरर्थक बना दोगे
हंसो कि
तुम्हे तुलसी-कबीर-गालिब-निराला
पढाए गए
ताकि तुम
हर्षद-नटवर-सुखराम
के रास्ते पर चल सको
हंसो कि हंसने के लिए
इससे बेहतर और क्या चाहिए
हंसो कि
हमारे देश में
पढ़ना अपने-आपमें
एक चुटकुला है
हंसो कि
बहुत लोग फिर भी इसे
बहुत गंभीरता से लेते हैं
हंसो कि
हंसने के लिए
इससे ज्यादा और क्या चाहिए।

Wednesday, 28 November 2007

मुझको मालूम है अदालत की हकीकत ....


इष्ट देव सांकृत्यायन

अभी-अभी एक ब्लोग पर नजर गई. कोई गज़ब के मेहनती महापुरुष हैं. हाथ धोकर अदालत के पीछे पड़े हैं. ऐसे जैसे भारत की सारी राजनीतिक पार्टियाँ पड़ गई हैं धर्मनिरपेक्षता के पीछे. कोई हिन्दुओं का तुष्टीकरण कर रहा है और इसे ही असली धर्मनिरपेक्षता बता रहा है. कोई मुसलमानों का तुष्टीकरण कर रहा है और इसे ही असली धर्मनिरपेक्षता बता रहा है. कोई सिखों का तुष्टीकरण कर रहा है और इसे ही असली धर्मनिरपेक्षता बता रहा है. गजब. ऐसा लगता है की जब तक भी लोग दोनों की पूरी तरह ऎसी-तैसी ही नहीं कर डालेंगे, चैन नहीं लेंगे.
तो साहब ये साहब भी ऐसे ही अदालत के पीछे पड़ गए हैं. पहले मैंने इनकी एक खबर पढी
कोर्ट के आदेश के बावजूद जमीन वापस लेने में लगे 35 साल. मैंने कहा अच्छा जी चलो, 35 साल बाद सही. बेचारे को मिल तो गई जमीन. यहाँ तो ऐसे लोगों के भी नाम-पते मालूम हैं जो मुक़दमे लड़ते-लड़ते और अदालत में जीत-जीत कर मर भी गए, पर हकीकत में जमीन न मिली तो नहीं ही मिली. उनकी इस खबर पर मुझे याद आती है अपने गाँव के दुर्गा काका की एक सीख. वह कहा करते थे कि जर-जोरू-जमीन सारे फसाद इनके ही चलते होते हैं और ये उनकी ही होती हैं जिनमें दम होता है. पुराने जमाने के दर्जा तीन तक पढे-लिखे थे. उनको राधेश्याम बाबा की रामायण बांचनी आती थी. उनका हवाला देकर कहते थे कि इन तीनो की चाल-चलन भैंस जैसी होती है, वो उसी की होती है जिसकी लाठी होती है.
कृपया इसे अन्यथा न लें. मेरी न सही, पर दुर्गा काका की भावनाओं की कद्र जरूर करें. असल में उनका सारा वक्त भैसों के बीच ही गुजरा और भैंसों के प्रति वह ऐसे समर्पित थे जैसे आज के कांग्रेसी नेहरू परिवार के प्रति भी नहीं होंगे. एक बार काकी ने अपने किसी सिरफिरे लहुरे देवर को बताया था कि जब वह नई-नई आईं तब काका ने उनके लहराते रेशमी बालों की तारीफ़ करते हुए कहा था - अरे ई त भुअरी भईंसिया के पोंछियो से सुन्नर बा. आपको इस बात पर हँसी तो आ सकती है, लेकिन आप भैंस के प्रति काका का समर्पण भाव देखिए. शायद इसीलिए उन्हें किसी भी काम के लिए लाठी से आगे किसी चीज की कोई जरूरत न पडी. अदालत-वदालत को वह तब तो कुछ न समझते थे, अब होते तो समझते कि नहीं, यह कहना असंभव ही है.
खैर, मुझे हैरत है कि जो बात दुर्गा काका इतनी आसानी से समझते थे हमारे ये ब्लॉगर मित्र इतने पढे-लिखे होकर भी यह बात समझ नहीं पाए. पत्रकार तो खैर होता ही नासमझ है. उसकी तो मजबूरी है मुर्दे से बाईट लाना और यह पूछना कि भाई मर कर आपको कैसा लग रहा है. पर ब्लॉगर की भी ऎसी कोई मजबूरी होती है, यह बात मेरी समझ में नहीं आती. आज कल कौन नहीं जानता कि कब्जे अदालती हुक्म से नहीं ताकत और पव्वे से मिलते हैं. ताकत और पव्वा कैसे आता है, यह सार्वजनिक रूप से बताया नहीं जा सकता. हो किसी में दम तो करवा न ले जजों से उनकी सम्पत्ति का खुलासा? पर नहीं साहब वह फिर भी माने. एक और खबर दे दी है
सिक्के उछाल फैसला करने वाले जज. यह खबर अमेरिका की है. वहाँ के लिए हो नई बात तो हो, हमारे यहाँ तो जी सरकार ही सिक्के उछाल कर बनती है. और तो और कानून भी सिक्का-उछाल सिद्धांत ही पर काम करता है. पर क्या करिएगा, कुछ लोग जान ही नहीं पाते जन्नत की हकीकत. तो वे जिन्दगी भर नेकी करते और अपनी व अपने बाल-बच्चों की जिन्दगी दरिया में डालते रहते हैं. चचा गालिब ने ये हकीकत समझ ली थी. इसीलिए वे इन सब चक्करों में नहीं पड़े और वजीफाख्वार बन शाह को दुआएं देते रहे. में सोच रहा हूँ कि अगर वे आज होते तो क्या लिखते? यही न -
मुझको मालूम है अदालत की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है.

Monday, 26 November 2007

ठोकरें राहों में मेरे कम नहीं।
फिर भी देखो आँख मेरी नम नहीं।

जख्म वो क्या जख्म जिसका हो इलाज-
जख्म वो जिसका कोई मरहम नहीं।

भाप बन उड़ जाऊंगा तू ये न सोच-
मैं तो शोला हूँ कोई शबनम नहीं।

गम से क्यों कर है परीशाँ इस क़दर -
कौन सा दिल है कि जिसमें ग़म नहीं।

चंद लम्हों में सँवर जाए जो दुनिया -
ये तेरी जुल्फों का पेंचो-ख़म नहीं।

दाद के काबिल है स्नेहिल की गज़ल-
कौन सा मिसरा है जिसमें दम नहीं।

-विनय ओझा ' स्नेहिल'

Saturday, 24 November 2007

अभी तक आपको केले से डर नहीं लगा होगा। कभी पैर के नीचे पड़ा होगा, आप गिरे होंगे तो थोड़ा डर जरूर लगा होगा। लेकिन अब जरा इधर गौर फरमाइये, हो सकता है आपको केले का खौफ भी सताने लगे।





Friday, 23 November 2007

कोर्ट पर हमला क्यों?


सत्येन्द्र प्रताप
वाराणसी में हुए संकटमोचन और रेलवे स्टेशनों पर विस्फोट के बाद जोरदार आंदोलन चला. भारत में दहशतगर्दी के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ था जब गांव-गिराव से आई महिलाओं के एक दल ने आतंकवादियों के खिलाफ फतवा जारी किए जाने की मांग उठा दी थी. बाद में तो विरोध का अनूठा दौर चल पड़ा था। संकटमोचन मंदिर में मुस्लिमों ने हनुमानचालीसा का पाठ किया और जबर्दस्त एकता दिखाई. मुस्लिम उलेमाओं ने एक कदम आगे बढ़कर दहशतगर्दों के खिलाफ़ फतवा जारी कर दिया.

इसी क्रम में न्यायालयों में पेश किए जाने वाले संदिग्धों के विरोध का भी दौर चला और वकीलों ने इसकी शुरुआत की। लखनऊ, वाराणसी और फैजाबाद में वकीलों ने अलग-अलग मौकों पर आतंकवादियों की पिटाई की थी।शुरुआत वाराणसी से हुई. अधिवक्ताओं ने पिछले साल सात मार्च को आरोपियों के साथ हाथापाई की और उसकी टोपी छीनकर जला डाली। आरोपी को न्यायालय में पेश करने में पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ी. फैजाबाद में वकीलों ने अयोध्या में अस्थायी राम मंदिर पर हमले के आरोपियों का मुकदमा लड़ने से इनकार कर दिया। कुछ दिन पहले लखनऊ कचहरी में जैश ए मोहम्मद से संबद्ध आतंकियों की पिटाई की थी.
राजधानी लखनऊ के अलावा काशी तथा फैजाबाद के कचहरी परिसर बम विस्फोटों से थर्रा उठे हैं। यह सीधा हमला है आतंकियों का विरोध करने वालों पर। कश्मीर के बाद यह परम्परा देश के अन्य भागों में भी फैलती जा रही है. नीति-निर्धारकों और चरमपंथियों का समर्थन करने वालों को एक बार फिर सोचा होगा कि वे देश में क्या हालात बनाना चाह रहे हैं.

Wednesday, 21 November 2007

....या कि पूरा देश गिरा?


इष्ट देव सांकृत्यायन
येद्दयुरप्पा ..... ओह! बड़ी कोशिश के बाद मैं ठीक-ठीक उच्चारण कर पाया हूँ इस नाम का. तीन दिन से दुहरा रहा हूँ इस नाम को, तब जाकर अभी-अभी सही-सही बोल सका हूँ. सही-सही बोल के मुझे बड़ी खुशी हो रही है. लगभग उतनी ही जितनी किसी बच्चे को होती है पहली बार अपने पैरों पर खडे हो जाने पर. जैसे बच्चा कई बार खडे होते-होते रह जाता है यानी लुढ़क जाता है वैसे में भी कई बार यह नाम बोलते-बोलते रह गया. खडे होने की भाषा में कहें तो लुढ़क गया.
-हालांकि अब मेरी यह कोशिश लुढ़क चुकी है. क्या कहा - क्यों? अरे भाई उनकी सरकार लुढ़क गई है इसलिए. और क्यों?
-फिर इतनी मेहनत ही क्यों की?
-अरे भाई वो तो मेरा फ़र्ज़ था. मुझे तो मेहनत करनी ही थी हर हाल में. पत्रकार हूँ, कहीं कोई पूछ पड़ता कि कर्नाटक का मुख्यमन्त्री कौन है तो मैं क्या जवाब देता? कोई नेता तो हूँ नहीं की आने-जाने वाली सात पुश्तों का इल्म से कोई मतलब न रहा हो तो भी वजीर-ए-तालीम बन जाऊं! अपनी जिन्दगी भले ही टैक्सों की चोरी और हेराफेरी में गुजारी हो, पर सरकार में मौका मिलते ही वजीर-ए-खारिजा बन जाऊं. ये सब सियासत में होता है, सहाफत और शराफत में नहीं हुआ करता.
-पर तुम्हारे इतना कोशिश करने का अब क्या फायदा हुआ? आखिर वो जो थे, जिनका तुम नाम रात रहे थे, वो मुख्य मंत्री तो बने नहीं?
हांजी वही तो! इसी बात का तो मुझे अफ़सोस है.
- अरे तो बन न जाने देते, तब रटते. तुमको ऎसी भी क्या जल्दी पडी थी.
- अरे भाई तुम वकीलों के साथ यही बड़ी गड़बड़ है. तुम्हारा हर काम घटना हो जाने बाद शुरू हो जाता है और फैसला पीडित व आरोपित पक्ष के मर जाने के बाद. लेकिन हमें तो पहले से पता रखना पड़ता है कि कब कहाँ क्या होने वाला है और कौन मरने वाला है. यहाँ तक कि पुलिस भी हमसे ऎसी ही उम्मीद रखती है. ऐसा न करें तो नौकरी चलनी मुश्किल हो जाए.
- तो क्या? तो अब भुगतो.
- क्या भुगतूं?
- यही मेहनत जाया करने का रोना रोओ. और क्या?
- अब यार, इतना तो अगर सोचते तो वे तो सरकार ही न बनाते.
- कौन?
- अरे वही जिन्होंने बनाया था, और कौन?
- अरे नाम तो बताओ!
- अब यार नाम-वाम लेने को मत कहो. बस ये समझ लो की जिनकी लुढ़क गई.
- अब यार इतनी मेहनत की है तो उसे कुछ तो सार्थक कर लो. चलो बोलो एक बार प्रेम से - येद्दयुरप्पा.
- हाँ चल यार, ठीक है. बोल दिया - येद्दयुरप्पा.
(और मैं एक बार फिर बच्चे की तरह खुश हो लिया)
- लेकिन यार एक बात बता!
- पूछ!
- क्या तुमको सचमुच लगता है कि उनकी सरकार गिर गई?
- तू भी यार वकील है या वकील की दुम?
- क्यों?
- अब यार जो बात हिन्दी फिल्मों की हीरोइनों के कपडों की तरह पारदर्शी है, उसमें भी तुम हुज्जत करते हो. सरे अखबार छाप चुके, रेडियो और टीवी वाले बोल चुके. अब भी तुमको शुबहा है कि सरकार गिरी या नहीं?
- नहीं, वो बात नहीं है.
- फिर?
- में असल में ये सोच रहा हूँ कि उनकी सरकार बनी ही कब थी जो गिर गई.
- क्यों तुम्हारे सामने बनी थी! पाच-छः दिन तक चली भी.
- अब यार जिसकी स्ट्रेंग्थ ही न हो उस सरकार का बनना क्या?
- अब यूं तो यार जो एमपी ही न हो उसका पीएम होना क्या?
- हाँ, ये बात भी ठीक है.
- लेकिन यार एक बात बता!
- बोल!
- मैं ये नहीं समझ पा रहा हूँ की गिरा कौन?
- क्या मतलब?
- मतलब ये कि येद्दयुरप्पा गिरे, या उनकी सरकार गिरी, या उनकी पार्टी गिरी, या उनका गठबंधन गिरा, या उनका भरोसा गिरा, या फिर उन पर से राज्य का भरोसा गिरा, या उनका चरित्र गिरा, या इनकी पार्टी के सदर गिरे ....... यार मैं बहुत कनफुजिया गया हूँ.
- क्यों पार्टी के सदर के गिरने का सुबह तुमको क्यों होने लगा भाई?
- अरे वो आज उन्होने कहा है न कि देवेगौडा सबसे बडे विश्वासघाती हैं!
- हाँ तो ?
- मैं सोच रहा हूँ उन्होने पार्टी के भीतर तो विश्वासघात नहीं किया, जबकि इनकी पार्टी में तो ऐसे लोग भरे पड़े हैं!
- हूँ! लेकिन यार एक बात है. तेरी मेहनत रंग लाएगी. देखना, जब येद्दयुरप्पा सचमुच मुख्यमन्त्री बनेंगे तब तुमको फिरसे उनका नाम नहीं रटना पड़ेगा.
- पर यार वो अब दुबारा बनेंगे कहाँ?
- नहीं-नहीं, पक्का है बन जाएंगे.
- वो कैसे?
- याद कर 1996 जब इनकी 13 दिन की सरकार बनी थी। तब एक बार गिरे. फिर 13 महीने सरकार बनी. फिर गिरी और फिर पूरे पांच साल तक चली.
- सो तो ठीक है. लेकिन तब ये वाले अध्यक्ष भी इनकी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं थे.
- लेकिन उससे क्या हुआ?
- हुआ न! याद करो जब वे यूं पी में भाजपा अध्यक्ष हुए तो वहाँ से भाजपा की छुट्टी हो गई. अब राष्ट्रीय अध्यक्ष हुए हैं तो उनके लाल ने ही उनके दिए पार्टी टिकट पर हरे होने से मना कर दिया. अरे क्या मतलब है भाई? यही न कि ये या तो कांग्रेस के तर्ज पर चल रहे हैं. अभी टिकट प्रपोज कराएंगे, फिर इनकार करेंगे, फिर एक दिन धीरे से ले लेंगे. यानी पार्टी को धीरे-धीरे कर के अपने कार्यकर्ताओं और जनता की डिमांड पर एंड संस कम्पनी बना देंगे. या फिर यह कि बेटे को पता है की बाप क्या गुल खिलाएंगे. शायद इसीलिए वो किसी दुसरे पार्टी में अपना सियासी भविष्य खोजने की कोशिश में जुट गया है. वैसे जैसे कांग्रेस का भतीजा चला आया ...........
- ए भाई! तुम तो बड़ी खतरनाक बात कर रहे हो. बेगम ने मुझे सब्जी लेने भेजा था. देर हो गई तो मार भी पड़ेगी.

(वैधानिक सवाल : यह मेरी और मेरे और मेरे वकील मित्र सलाहू की आपसी और गोपनीय बातचीत है. कहीं इसे आपने सुन तो नहीं लिया?)

Tuesday, 20 November 2007

हाय! पीले पड़े कामरेड



इष्ट देव सांकृत्यायन
कामरेड आज बाजार में मिले तो हमने आदतन उनको लाल सलाम ठोंका. लेकिन बदले में पहले वो जैसी गर्मजोशी के साथ सलाम का जवाब सलाम से दिया करते थे आज वैसा उन्होने बिलकुल नहीं किया. वैसे तो उनके बात-व्यवहार में बदलाव में कई रोज से महसूस कर रहा हूँ, लेकिन इतनी बड़ी तब्दीली होगी कि वे बस खीसे निपोर के जल्दी से आगे बढ़ लेंगे ये उम्मीद हमको नहीं थी. कहाँ तो एकदम खून से भी ज्यादा लाल रंग के हुआ करते थे कामरेड और कहाँ करीब पीले पड़ गए.
हालांकि एकदम पीले भी नहीं पड़े हैं. अभी वो जिस रंग में दिख रहे हैं, वो लाल और पीले के बीच का कोई रंग है. करीब-करीब नारंगी जैसा कुछ. हमने देखा है, अक्सर जब कामरेड लोग का लाल रंग छूटता है तो कुछ ऐसा ही रंग हो जाता है उन लोगों का. बचपन में हमारे आर्ट वाले मास्टर साहब बताए भी थे कि नारंगी कोई असली रंग नहीं होता है. वो जब लाल और पीला रंग को एक में मिला दिया जाता है तब कुछ ऐसा ही रंग बन जाता है. भगवा रंग कैसे बनता होगा ये तो में नहीं जानता, लेकिन मुझे लगता है कि शायद इसी में जब पीला रंग थोडा बढ़ जाता होगा तब वो भगवा बन जाता होगा.
मैंने बडे-बूढों से सुना भी है कि कामरेड लोग जब लाल रंग छोड़ते हैं तो लोग भगवे बूकने लगते हैं. हो न हो, इस बात में कुछ दम जरूर है. ये तो हमने खुद देखा है कि जो कामरेड लोग की हाँ में हाँ मिलाने से चूका, यानी आम को आम और इमली को कहने की ग़लती किया या उनके किसी टुच्चे से भी तर्क को काटने के लिए कोई दमदार तर्क लाया, उसे वो लोग तुरंत संघी घोषित करते हैं. मतलब तो यही हुआ न कि अपने बाद वह अगर किसी विचारधारा को मान्यता देते हैं तो वह संघ ही है. भले संघ का विचारधारा जैसी किसी चीज से कोई लेना-देना न हो. पर कामरेड लोग लाल और भगवे के अलावा बाकी किसी रंग को कोई मान्यता नहीं देते.
इसकी मुझे एक और वजह लगती है. एक तो यह कि कामरेड लोग अपने को सर्वहारा बताते हैं, जिसके पास हरने के लिए कुछ नहीं है और जीतने के लिए पूरी दुनिया. हम देखते हैं भगवाधारी बाबा लोग भी कुछ ऐसही बोलते हैं- ऐ मेरा क्या ले लेगा, क्या है मेरे पास. कामरेड लोग बम-बंदूक की बात करते हैं और बाबा लोग चिमटा-फरसा की. तेवर और तरीका दूनो का एक ही होता है. रही बात भाषा की तो अब कामरेड लोग भी तनी-तनी संस्कृत बोलने लगे हैं और बाबा लोग भी तनी-तनी अन्गरेंजी.
इसके बावजूद एक बात जो मेरी समझ में नहीं आ रही है वह है इस रंग परिवर्तन की रासायनिक प्रक्रिया. ये अलग बात है कि इधर दो-तीन साल से वो लोग अखबार-मैगजीन में थोडा छपने लगे थे, टीवी पर भी दिखने लगे थे. पर उनसे इनका कोई रेगुलर सम्पर्क नहीं था. अव्वल तो ये तवज्जो भी किसी और से सम्पर्क के नाते मिलने लगी थी. जिनके नाते इनको यह तवज्जो मिलने लगी थी उनका रंग है झक सफ़ेद. वैसे ये सच्चाई है कि उस सफ़ेद रंग से उनका समझौता शुरू से ही है, पर वह अन्दरखाते है. हालांकि ये जब-तब जाहिर भी होता रहा है. मसलन कमेटियों, परिषदों, अकादमियों या कमीशनों में मनोनयन और चुनावों, सरकारी खर्चे पर विदेश यात्राओं या फिर इमरजेंसी जैसे मौकों पर. फिर भी इतना खुल्लम-खुला खेल फरुक्खाबादी इन दोनों के बीच कभी नहीं चला.
हो न हो, ई मामला कुछ यूरोप-यूरोप है. इनकी इम्पोर्टेड विचारधारा और उनकी इम्पोर्टेड नेता. क्या गजब इत्तेफाक है! साझा सरकारों के अन्दर ऐसा तालमेल भी संजोग से ही मिलता है. अब देखिए सफेद्की पाल्टी के बापू की धोती सरे-बाजार उतार ली गई और जनता चेंचिया के रह गई, पर कामरेड लोग ऊंह तक नही किए. इसके पहले की जनता का भरोसा उनसे उठता एक और कमाल हुआ. पता नहीं क्या परमाणु-वर्माणु को लेकर भारत-अमेरिका के बीच समझौता होने लगा. बस अब अड़ गए कामरेड और खूब ठनी दो बांकों में. ये कहे समझौता हुआ तो हम सरकार गिरा देंगे. वे कहे हम समझौता करेंगे और सरकार गिरा लेंगे. ये तो बाद में पता चला कि असल में ये असली नहीं नूरा कुश्ती थी. देखिए न! आज तक न तो कोई गिरा और न कोई गिराया.
अब सबसे जोरदार मामला तो ऊ लग रहा है जो
नंदीग्राम में हो रहा है। अस्सी के दशक में कौनो सिनेमा ऐसा आया होता तो लोग टूट ही पड़ते हाल पर. बिना कौनो प्रचार के हर शो हाउसफुल जाता जी! मार-धाड़-बम-बंदूक-सस्पेंस-थ्रिल अरे का नहीं है जी उसमें. अगर कौनो दूसरे पार्टी की गौरमेंट बंगाल में रही होती तो अब तक उसको सिपुर्दे-खाक तो कर ही दिया गया होता और वहाँ राष्ट्रपति महोदया का शासन भी लग गया होता. पर देखिए न! कामरेड लोगों का पुण्य प्रताप! है कोई माई का लाल जो उनकी लाल सरकार को हाथ लगा के देखे? लेकिन लगता है की अपने कामरेड सफ़ेद रंग के इतने सघन संग के बावजूद अभी इतनी सफेदी नहीं सोख पाए हैं की उनके खून का रंग सफ़ेद हो गया हो. पर क्या करें ये बात सबसे कह भी तो नहीं सकते हैं न! शायद इसीलिए .....

Monday, 19 November 2007

बोलो कुर्सी माता की - जय



इष्ट देव सांकृत्यायन
अधनींदा था. न तो आँख पूरी तरह बंद हुई थी और न खुली ही रह गई थी. बस कुछ यूं समझिए कि जागरण और नींद के बीच वाली अवस्था थी. जिसे कई बार घर से भागे बाबा लोग समाधि वाली अवस्था समझ लेते हैं और उसी समय अगर कुछ सपना-वपना देख लेते हैं तो उसे सीधे ऊपर से आया फरमान मान लेते हैं. बहरहाल में चूंकि अभी घर से भगा नहीं हूँ और न बाबा ही हुआ हूँ, लिहाजा में न तो अपनी उस अवस्था को समाधि समझ सकता हूँ और उस घटना को ऊपर से आया फरमान ही मान सकता हूँ. वैसे भी दस-पंद्रह साल पत्रकारिता कर लेने के बाद शरीफ आदमी भी इतना तो घाघ हो ही जाता है कि वह हाथ में लिए जीओ पर शक करने लगता है. पता नहीं कब सरकार इसे वापस ले ले या इस बात से ही इंकार कर दे कि उसने कभी ऐसा कोई हुक्म जारी किया था!
बहरहाल मैंने देखा कि एक भव्य और दिव्य व्यक्तित्व मेरे सामने खडा था. यूरोप की किसी फैक्ट्री से निकल कर सीधे भारत के किसी शो रूम में पहुँची किसी करोड़टाकिया कार की तरह. झक सफ़ेद चमचमाते कपडों में. ऐसे सफ़ेद कपडे जैसे 'तेरी कमीज मेरी कमीज से ज्यादा सफ़ेद क्यों?' टाईप के विज्ञापनों में भी नहीं दिखाई देते. कुरते से ज्यादा सफ़ेद पायजामा, पायजामे से ज्यादा सफ़ेद कुरता और इन दोनों से ज्यादा सफ़ेद टोपी. गजब सफेदी थी, इस देश के दरिद्रों के चरित्र की तरह. में तो अभिभूत हो गया यह सफेदी देख कर ही.
अब इसके पहले की भूत हो जाऊं मैंने पूछ लेना ही मुनासिब समझा, "आपकी तारीफ़?" "जी मुझे नेता कहते हैं. मैं इस देश का कर्णधार हूँ." इतनी मधुर आवाज आई की लगा आकाशवाणी हो रही हो. आकाशवाणी की याद आते ही लगा जैसे समाचार सुन रहा होऊं और फिर मैं लगा प्राईवेट रेडियो-टीवी चैनलों को कोसने. ये चाहे कितनी सुन्दर लड़कियों को बतौर जोकी और एंकर रख लें, पर इतनी मधुर आवाज उनसे कभी नहीं सुनी जा सकती.
"क्यों? क्या हुआ? कहाँ खो गए वत्स?" शायद सपने में भी मुद्दे से भटकते मेरे ध्यान को नेताजी ने ताड़ लिया था. नेताजी की दुबारा से आई और भी ज्यादा मधुर आवाज ने मुझे नए सिरे से सचेत किया और मैं हदबदाया हुआ घर के भीतर भागा. इस ग्लानिबोध के साथ कि अपने द्वार पर खडे इतने बडे शख्स की मैं ढंग से अगवानी तक नहीं कर पा रहा हूँ. बहरहाल जैसे-तैसे ढूंढ कर अपनी इकलौती टुटही कुर्सी लेकर हाजिर हुआ.
मैं उसे पोछने ही जा रहा था कि नेताजी ने बडे आग्रह के साथ मेरे हाथ पकड़ लिए, "अरे-अरे ये क्या कर रहे हैं आप? में इसी पर बैठ लूंगा." नेताजी की वाणी ने एक बार फिर मेरे कानों में मिश्री की मिठास घोल दी.
"अरे नहीं. कई दिनों से रखी-रखी बहुत गंदी हो गई है और टुटही तो है ही. कहीं आप को किरचें-विराचें गड़ गईं तो ...."
"ही-ही-ही ........ आप पत्रकार लोग भी गजब होते हैं!" कल्कलाते झरने सी नेताजी की वह हँसी हिन्दी सिनेमा की किस हिरोईन जैसी थी, मैं याद नहीं कर पा रहा हूँ. "भला हमें कुर्सी की किरच भी कभी गड़ सकती है?"
नेताजी की इस बात का मर्म मैं सचमुच नहीं समझ पाया. मैं उन्हें वैसे ही भकुआया हुआ ताकता रह गया जैसे पिछडे हुए गाँव तकते हैं नई आयी सरकारी योजनाओं को. नेताजी ने लगता है मेरी नजर को ताड़ लिया. तभी तो उन्होने मुझे समझाने वाले अंदाज में बडे प्यार से कहा, "अरे भाई इतना तो आप जानते ही हैं की कुर्सी ही हमारा ईमान है. फिर भला कुर्सी की किरच हमें कैसे चुभ सकती है?
"थोडा अर्था कर कहें महराज!" आखिरकार मैंने हिम्मत करके बिनती कर ही दी.
"नहीं समझे" उन्होने अलजेबरा के मास्टरों की तरह समझाने वाले लहजे में कहा, "अब देखिए, वैसे तो कहने को हम धर्मनिरपेक्ष हैं. यानी हमारा कोई धर्म नहीं है. लेकिन असल में यही हमारा धर्म है. और कुर्सी उस धर्म का मर्म है. बस यह समझ लो ऑक्सीजन के बगैर तो हम दो-चार दिन जी सकते हैं, लेकिन कुर्सी के बगैर हमारी आत्मा एक पल के लिए भी हमारे शरीर में ठहर नहीं सकती. कुर्सी के लिए हम उल्लू को हंस और हंस को उल्लू तो क्या, गधे को बाप और बाप को गधा कह सकते हैं. कुर्सी के लिए हम दंगे करवा सकते है और दंगे के लिए जिम्मेदार लोगों को फांसी के तख्ते पर चढ़ जाने के बाद भी वहाँ से उतार सकते हैं."
"लेकिन ऐसा आप क्यों करते हैं?" आखिरकार हर पत्रकार की तरह मैंने भी अपने मूर्ख होने का परिचय दे ही दिया.
"अरे भाई इतना भी नहीं समझते! अगर हम उन्हें नहीं बचाएंगे आगे हमें दंगे करवाने के लिए लोग कहाँ से मिलेंगे? भला कौन बुरा आदमी हमारी भलमनसी पर भरोसा करेगा? और कैसे हम जमाए रख पाएंगे कुर्सी पर अपना कब्जा?"
"लेकिन हमने तो आपकी महान कुल परम्परा के बारे में कुछ और ही सुना था?"
"क्या सुना था वत्स?"
"यही कि आप लोग अत्यंत देशभक्त हैं और देश के लिए आपके कई पुरखों ने तो अपनी जान तक न्यौछावर कर दी है!"
"बिलकुल ठीक सुना है. इसमें गलत क्या है. लेकिन बताओ क्या इस देश की आत्मा एक कुर्सी में ही नहीं बसी हुई है? क्या पूरा भारत ही एक कुर्सी नहीं है और क्या एक कुर्सी ही पूरा भारत नहीं है? और टैब अगर एक कुर्सी में pइछाली कई पीढियों से हमारी इतनी गहरी आस्था है तो इसमें बुरा क्या है? अगर हम कुर्सी के लिए अपनी जान दे सकते हैं तो दूसरों की ले लेने में भी हमारे लिए क्या हर्ज है?"
में एकदम चकरघिन्नी हो गया था। नेताजी के ये मधुर वचन और गीता का कर्मयोग मेरे दिमाग में ऐसे खुदुर-बुदुर हो रहे थे जैसे अलमुनियम की पतीली में तेज आंच पर रखे चावल और उड़द होते हैं. इसके पहले कि मैं मामले को कुछ समझ पाता भीड़ से नारों की ऊंची आवाज मेरे कान में आने लगी - बोलो कुर्सी माता की जय, बोलो कुर्सी माता की जय, बोलो कुर्सी माता की जय.......

Thursday, 15 November 2007

अब वह नहीं डरेगा


इष्ट देव सांकृत्यायन
मैडम आज सख्त नाराज हैं. उनकी मानें तो नाराजगी की वजह बिल्कुल जायज है. उन्होने घोषणा कर दी है कि अब घोर कलयुग आ गया है. मेरी मति मारी गई थी जो मैने कह दिया कि यह बात तो मैं तबसे सुनता आ रहा हूँ जब मैं ठीक से सुनना भी सीख नहीं पाया था. कहा जाता था बेईमान तो मैं समझता था बेम्बान. गाया जाता था - "दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए" तो मैं समझता था "दिल चीत क्या है आप मेरी जान लीजिए" और वो जान भी लाइफ वाली नहीं केएनओडब्लू नो वाली. हालांकि तब उसे मैं पढ़ता था कनऊ. अब जब मैं चारों युगों के बारे में जान गया हूँ, जान गया हूँ कि सतयुग में हरिश्चंद्र के सत्यवादी होने का नतीजा क्या हुआ, त्रेतामें श्रवण कुमार और शम्बूक का क्या हुआ, द्वापर में बर्बरीक और अश्वत्थामा के साथ क्या हुआ तो मुझे कलयुग में आजाद, भगत सिंह या सुभाष के हाल पर कोई अफ़सोस नहीं होता.
ये अलग बात है कि मैंने कलयुग को न तो किसी तरफ से आते देखा और न जाते देख रहा हूँ. पर नहीं साहब मैडम का साफ मानना है कि कलयुग आया है और वो जिस तरह इसका दावा कर रहीं हैं उससे तो ऐसा लगता है गोया वो अभी थोड़ी देर पहले कहीं से घूमता-घामता चला आया है. करीब-करीब वैसे ही जैसे किसी वारदात की जगह पर रिपोर्टर पहुंच जाते हैं. अब करीब एक दशक से भी ज्यादा पुराने पति की भला ये बिसात कहाँ है कि इससे ज्यादा जोर दे ! पर बेवजह इस नाचीज को कलयुग लाने के लिए दोषी ठहरा दिया गया है, इस तमगे के साथ कि तुमसे सब्जी तक तो लाई नहीं जाती. पर साहब यह आरोप तो सिद्ध हो गया कि कलयुग को मैं ही लाया और वह भी पांच साल के बालक को उलटी सीधी बातें सिखा कर. दरअसल हुआ यह है कि बालक ने डरने से मना कर दिया है. उसने साफ कह दिया है कि अब वह किसी चीज से नहीं डरेगा. बन्दर से, भालू से, कुत्ते से, बिल्ली से, गन से, कैनन से और यहाँ तक कि आपसे यानी अपनी मम्मी से भी नहीं. मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि जो बात कहने की हिम्मत मैं तेरह साल में नहीं जुटा सका वह उसने पांच साल में कह दी. इसके पहले कि मैं इस बात को लेकर अपने खिलाफ हुए एकतरफा फैसले पर कुछ सोच पाता सलाहू आ धमका है. पेशे से वकील होने के नाते यह तो उसका कर्मसिद्ध अधिकार है ही कि जहाँ भी फटा देखे वहाँ टांग अड़ा दे. यह अलग बात है नाम सलाहुद्दीन होने के बावजूद सलाह कभी मुफ्त में न दे. सो सलाहू ने आते ही भांप लिया कि आज मामला कुछ टेंस है. लिहाजा उसने सवाल भी दाग ही दिया, 'क्या बात है भाई! तुम तो ऐसे मुंह लटकाए बैठे हो गोया मुंह न हुआ गठबंधन सरकार हो गई. कोई खास वजह?'
वजह मुझे बताने की नौबत नहीं आई. मैडम ही शुरू हो गईं, 'ये क्या बताएंगे वजह? बच्चे को ऐसा बिगाड़ दिया है कि अब वह किसी भी चीज से डरने से मना करने लगा है.'
'क्या मतलब?' असल में ऎसी वजह के नाते मुंह लटकाने की बात सलाहू की समझ में नहीं आई, 'अरे बच्चा डरने से मना कर दे तो इसके लिए तो उसकी हिम्मत को दाद दी जानी चाहिए. इसमें भला इसका क्या कसूर हो सकता है भाभी. यह तो खुद आपसे इतना डरता है?' सलाहू ने बचाव पक्ष के सधे हुए वकील की तरह दलील दी. मुझे भी लगा कि चलो साले से दोस्ती किसी दिन तो काम आई. पर मैडम ने बगैर किसी मरव्वत के विद्वान जज की तरह यह दलील खारिज कर दी. 'कसूर है इनका' मैडम ने कहा, 'ऐसे कि पहले जब बच्चा कुछ खाना नहीं खाता था तो में उसे बन्दर आने का डर दिखा कर खाना खिला देती थी. वह बन्दर से डरता था. एक दिन ये उसे जू ले गए. बन्दर दिखाया, लंगूर दिखाया और वन-मानुष दिखाया. आखिरकार ये भी बता दिया कि बन्दर आदमी के पूर्वज हैं. बन्दर से डरने की कोई जरूरत नहीं है. अब अगर कभी छत पर बन्दर आ जाता है तो मैं तो डर के मारे भाग जाती हूँ और मुन्ना उसे फल दे आता है. अब में उसे कैसे डराऊँ?'
सलाहू को मेरे बचाव में अपनी दलील देने का मौका नहीं मिल रहा था. मैडम बूके जा रहीं थीं, 'खैर मैंने उसे कुत्ते से डराना शुरू किया तो वह भी इन्होने ख़त्म कर दिया. फिर मैंने उसे बिल्ली से डराना शुरू किया तो इन्होने उसे घंटी बांधने वाली कहानी सुना दी और समझा दिया कि बिल्ली से सिर्फ चूहे डरा करते हैं. बच्चों को डरने की जरूरत नहीं है. बच्चों की तो वह मौसी होती है. तो अब उसने बिल्ली से भी डरना छोड़ दिया. मैंने सोचा कि ये तो हर चीज से निडर होता जा रहा है तो मैंने इसे ऎसी चीज से डराने की सोच ली जो दिखे ही नहीं. तो मैंने उसे डराने के लिए एक काले कोट वाले बाबा को ईजाद किया. दो-चार दिन डरा, पर आज जब मैं उसे पढ़ने के लिए डरा रही थी तो उसने एकदम से मना कर दिया. बोल दिया कि अब मैं काले कोट वाले बाबा से नहीं डरूंगा. अब मैं किसी भी चीज से नहीं डरूंगा. तब से मैं भालू, गैंडा, शेर जाने क्या-क्या बता चुकी, पर यह नहीं डर रहा है.'
'पर भाभी इसने तो इसे सिर्फ जानवरों से डरने से मना किया था. अब बाबे से अगर बच्चा नहीं डरता और उसने किसी से भी डरने से इनकार कर दिया, यानी चन्द्रशेखर आजाद या भगत सिंह के रास्ते पर चल पडा है तो इसमें मेरे यार की क्या गलती हो सकती है?'
'उसका यह डर गया कैसे है, मालूम है?' मैडम ने त्योरियां चढाए हुए ही सलाहू से पूछा.
सलाहू ने भी सधे हुए वकील की तरह जवाब दिया, 'बता ही दीजिए.'
'हुआ यह की आज सुबह इसने पूछा की पापा ये काले कोट वाला बाबा क्या होता है? तो अब इनको पहले से कुछ पता तो था नहीं. सो इन्होने बताया कि वो तुम्हारे सलाहू अंकल हैं न, वो काला कोट पहनते हैं न! तो उन्हें काले कोट वाला बाबा कहा जाता है. उसने पूछा तो क्या उनसे डरना चाहिए. तो इन्होने बताया कि बिलकुल नहीं. बच्चे कहीं अपने अंकल से डरते हैं! फिर उसने पूछा कि अगर कहीं वो पकड़ लें तो क्या करेंगे? तो इन्होने बता दिया कि तुमको चोकलेट खिलाएंगे और क्या करेंगे. तब से उसने मान लिया है कि मैं हर चीज से उसे झूठ-मूठ में ही डराती हूँ और अब वह किसी भी चीज से नहीं डरेगा.'
'वाह क्या बात है भाभी, आपको तो खुश होना चाहिए. इस बच्चे का विकास तो इस देश की जनता की तरह हो रहा है.' सलाहू ने बहुत भौकाली अंदाज में यह बात कही और मैडम पैर पटकती हुई बेगम सलाहू के साथ किचन की ओर चल पडीं. मुझे भी अपनी जान बख्शी हुई सी लगी. मैं सलाहू की ओर नमूदार हुआ, 'क्यों बे! तू मुन्ने के विकास को जनता के विकास से क्यों जोड़ रहा है?'
'देख भाई!' सलाहू बोला, 'पहले उन्नीसवीं सदी में जब बच्चे डरते थे तो माताएं उन्हें हिम्मत बंधातीं थीं. कोई और सहारा न होने पर खुदा को याद करने या हनुमान जी का नाम लेने के लिए कहती थीं. तब देश में अंग्रेजों की हुकूमत थी. देश में डर ही डर था. सरकार का डर, ठगों का डर, पुलिस का डर, साहूकार का डर, जमींदार का डर ..... सिर्फ डर ही डर था. तो माताएँ डर से मुक्त करने के लिए देवी-देवताओं या वीरों-वीरांगनाओं की याद दिलातीं थीं. फिर देश आजाद हो गया. लोकतंत्र आ गया. डर भाग गया तो हमारे हुक्मरानों को लगा कि ऐसे कैसे काम चलेगा. तो उन्होने नए-नए डर बनाने शुरू किए. ऐसे कि जिनसे आम आदमी तो डरे पर उनकी सेहत पर कोई फर्क न पड़े. सो उन्होने डराने की नई-नई तरकीबें ईजाद कीं और उसके लिए मशीनरी बनाई. जनता बहुत दिनों तक उससे डरती रही. उसी दौरान माताओं ने भी डर की अहमियत को समझते हुए बच्चों को डराना शुरू किया .... बेटा सो जा नहीं तौ गब्बर आ जाएगा. फिर बच्चा डरने लगा.
लेकिन डरने का यह दौर बहुत दिन चला नहीं, न तो बच्चों पर और न जनता पर. जनता ने देखा कि उनके लिए जो सिपाही हैं नेताओं के लिए बिजूके हैं. बडे लोग जब अपराध करते हैं तो उनको यही बचाते हैं और जनता को डराते हैं. फिर हम क्यों डरें? लिहाजा उसने डरने से एक दिन इनकार कर दिया. वैसे ही जैसे किसी दिन आजाद, मंगल, भगत ने कर दिया था. अब बच्चे को अगर मां डराती है तो वह कहता है की- अच्छा तो मुझे जल्दी से पिज्जा दिलाओ. नहीं तौ में पापा को बता दूंगा की रोज रात को यहाँ गब्बर आता है. इसी तरह नेताजी जब जनता को डराते हैं कि पुलिस बुला दूंगा तौ वह जूता उठा लेती है. नेता वोट मांगने जाते हैं तौ वह डिग्री मांगने लगती है. जनरल साहब इमरजेंसी लगाते हैं तौ वह बगावत पर उतर आती है. अरे भाई अब अगर बच्चा बोल पडा कि में तो नहीं डरूँगा तो इसमें हैरत की बात क्या है? आखिर एक न एक दिन तो यह होना ही था, वैसे जैसे देश की जनता ........

Tuesday, 13 November 2007

कंडोम से बन रहे हैं रबर बैंड्स



शुक्र है कि यह खबर भारत से नहीं है। कंडोम से रबरबैंड और हेयरबैंड बन रहे हैं। इसके प्रयोग से एड्स सहित तमाम रोगों का खतरा है। चिकित्सकों ने इस पर चिंता जाहिर की है। चीन के ग्वांगदांग प्रांत में इस्तेमाल किए गए कंडोम से बने रबरबैंड और हेयरबैंड की बिक्री बढ़ रही है। स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ने के कारण लोगों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई है। चाइना डेली ने प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में कहा है कि दोंग गुआंग शहर में रिसाइकिल्ड कंडोम न केवल बेंचे जा रहे हैं, बल्कि ब्यूटीपार्लरों तक में पहुंचाए जा रहै हैं। दैनिक ने लिखा है कि इन सस्ते और रंग-बिरंगे हेयरबैंडों तथा रबरबैंडों की शहर में अच्छी खासी बिक्री हो रही है। इससे स्थानीय लोगों और पर्यटकों के स्वास्थ्य का भी खतरा पैदा हो गया है। स्थानीय डॉक्टरों के हवाले से कहा गया है कि इससे यौन संक्रमित बीमारियों और एड्स के प्रसार का खतरा बढ़ गया है। इस हेयरबैंड में बहुत से विषाणु होते हैं। बालों की चोटी बनाते समय या उन्हें बांधते समय इन रबड़बैंड्स को मुंह में पकड़ने से संबंधित व्यक्ति या महिला एड्स या किसी अन्य यौन संचारी रोग की चपेट में आ सकते हैं।

कता

उम्मीद की किरण लिए अंधियारे में भी चल।
बिस्तर पे लेट कर ना यूँ करवटें बदल।

सूरज से रौशनी की भीख चाँद सा न मांग,
जुगनू की तरह जगमगा दिए की तरह जल ॥

-विनय ओझा स्नेहिल

मौत की घाटी नहीं है मेरा देश

-दिलीप मंडल

नंदीग्राम एक प्रतीक है। ठीक उसी तरह जैसा प्रतीक गुजरात में 2002 के दंगे हैं। जिस कालखंड में हम जी रहे हैं, उस दौरान जब कुछ ऐसा हो तो क्या हम कुछ कर सकते हैं? एक मिसाल इराक पर हुए अमेरिकी हमले के समय की है। जब इराक पर हमला होना तय हो चुका था तो एक खास दिन हजारों की संख्या में युद्धविरोधी अमेरिकी अपनी अपनी जगह पर एक तय समय पर खड़े हो गए। उन्होंने आसमान की ओर हाथ उठाया और कहा- रोको। अमेरिकी हमला तो इसके बावजूद हुआ। लेकिन विरोध का जो स्वर उस समय उठा, उसका ऐतिहासिक महत्व है।

नंदीग्राम के संदर्भ में मेरा कहना है- आइए मिलकर कहें, उनका नाश हो!ऐसा कहने भर से उनका नाश नहीं होगा। फिर भी कहिए कि वो इतिहास के कूड़ेदान में दफन हो जाएं। ये अपील जनवादी लेखक संघ और प्रगतिशील लेखक संघ वालों से भी है। नंदीग्राम में और सिंगुर में और पश्चिम बंगाल के हजारों गावों, कस्बों में सीपीएम अपने शासन को बचाए रखने के लिए जिस तरह के धतकरम कर रही है, उसे रोकने के लिए आपका ये महत्वपूर्ण योगदान होगा। आपको और हम सबको ये कहना चाहिए कि "मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश।"

सीपीएम ने जुल्मो-सितम ढाने का जो मॉडल पेश किया है, उसकी मिसाल कम ही है। विकासहीनता की जो राजनीति वाम मोर्चा ने पश्चिम बंगाल में की है, उसके बावजूद तीस साल से उसका शासन बना हुआ है। लोग नाराज हैं, पर उसका नतीजा वोट में नजर नहीं आता।

दरअसल सीपीएम ने राजकाज को एक माफिया तंत्र की तरह फाइनट्यून कर लिया है। शासन और विकास के लिए आने वाले पैसों से लेकर नौकरयों की लूट में पार्टी तंत्र की हिस्सेदारों के जरिए, प्रभावशाली जातियों और समुदाय के लोगों को सत्ता में स्टेकहोल्डर बना लिया गया है। लेकन पश्चिम बंगाल का वो किला दरक रहा है। खासकर मुसलमानों में मोहभंग गहरा है। क्या आप ये देख रहे हैं कि नंदीग्राम में मरने वालों के जो नाम सामने आ रहे हैं, उनमें लगभग सभी मुसलमान और दलित उपनाम वाले हैं। 25 फीसदी मुसलमानों की सरकारी नौकरियों में 2 फीसदी हिस्सेदारी की जो बात सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में सामने आई है, उसकी कोई सफाई सीपीएम के पास नहीं है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति करवट ले रही है। लेकिन बाकी राज्यों की तरह यहां का परिवर्तन शांति से निबटने वाला नहीं है। ये बेहद तकलीफदेह प्रक्रिया साबित होने वाली है। नंदीग्राम में आप इसकी मिसाल देख चुके हैं।

नीचे पढ़िए पश्चिम बंगाल सरकार की असलियत बयान करता एक आलेख-

वामपंथी राज में रिजवान के परिवार को न्याय मिलेगा क्या

रिजवान-उर-रहमान की मौत/हत्या के बाद के घटनाक्रम से पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री और सीपीएम पोलिट ब्यूरो के सदस्य ज्योति बसु चिंतित हैं। ज्योति बसु सरकार में शामिल नहीं हैं , इसलिए अपनी चिंता इतने साफ शब्दों में जाहिर कर पाते हैं। उनका बयान छपा है कि रिजवान केस में जिन पुलिस अफसरों के नाम आए हैं उनके तबादले का आदेश देर से आया है। इससे सीपीएम पर बुरा असर पड़ सकता है।रिजवान जैसी दर्जनों हत्याओं को पचा जाने में अब तक सक्षम रही पश्चिम बंगाल के वामपंथी शासन के सबसे वरिष्ठ सदस्य की ये चिंता खुद में गहरे राजनीतिक अर्थ समेटे हुए है।

रिजवान कोलकाता में रहने वाला 30 साल का कंप्यूटर ग्राफिक्स इंजीनियर था, जिसकी लाश 21 सितंबर को रेलवे ट्रैक के किनारे मिली। इस घटना से एक महीने पहले रिजवान ने कोलकाता के एक बड़े उद्योगपति अशोक तोदी की बेची प्रियंका तोदी से शादी की थी। शादी के बाद से ही रिजवान पर इस बात के लिए दबाव डाला जा रहा था कि वो प्रियंका को उसके पिता के घर पहुंचा आए। लेकिन इसके लिए जब प्रियंका और रिजवान राजी नहीं हुए तो पुलिस के डीसीपी रेंक के दो अफसरों ज्ञानवंत सिंह और अजय कुमार ने पुलिस हेडक्वार्टर बुलाकर रिजवान को धमकाया। आखिर रिजवान को इस बात पर राजी होना पड़ा कि प्रियंका एक हफ्ते के लिए अपने पिता के घर जाएगी। जब प्रियंका को रिजवान के पास नहीं लौटने दिया गया तो रिजवान मानवाधिकार संगठन की मदद लेने की कोशिश कर रहा था। उसी दौरान एक दिन उसकी लाश मिली।

रिजवान की हत्या के मामले में पश्चिम बंगाल सरकार और सीपीएम ने शुरुआत में काफी ढिलाई बरती। पुलिस के जिन अफसरों पर रजवान को धमकाने के आरोप थे, उन्हें बचाने की कोशिश की गई। पूरा प्रशासन ये साबित करने में लगा रहा कि रिजवान ने आत्महत्या की है। राज्य सरकार ने मामले की सीआईडी जांच बिठा दी और एक न्यायिक जांच आयोग का भी गठन कर दिया गया। इन आयोगों और जांच को रिजवान के परिवार वालों ने लीपापोती की कोशिश कह कर नकार दिया। आखिरकार कोलकाता हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार को सीबीआई जांच के लिए तैयार होना पड़ा। कोलकाता के पुलिस कमिश्नर और दो डीसीपी को उनके मौजूदा पदों से हटा दिया गया और आखिरकार मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य खुद रिजवान के परिवारवालों से मिलने पहुंचे, क्योंकि रिजवान की मां उनसे मिलने के लिए नहीं आई। राज्य सरकार ने परिवार वालों की मांग के आगे झुकते हुए न्यायिक जांच भी वापस ले ली है।

सवाल ये उठता है कि इस विवाद से राज्य सरकार इस तरह हिल क्यों गई है। दरअसल ये घटना ऐसे समय में हुई है जब पश्चिम बंगाल के मुसलमानों में वाममोर्चा के खिलाफ व्यापक स्तर पर मोहभंग शुरू हो गया है। पश्चिम बंगाल देश के उन राज्यों में है, जहां मुसलमानों की आबादी चुनाव नतीजों को प्रभावित करती है। 25 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले इस राज्य में मुसलमानों की हालत देश में सबसे बुरी है। ये बात काफी समय से कही जाती थी, लेकिन प्रधानमंत्री द्वारा गठित सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में इस बात का प्रमाण जगजाहिर कर दिया है। राज्य सरकार से मिले आंकड़ों के आधार पर सच्चर कमेटी ने बताया है कि पश्चिम बंगाल में राज्य सरकार की नौकरयों में सिर्फ 2 फीसदी मुसलमान हैं। जबक केरल में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत लगभग बराबर है पर वहां राज्य सरकार की नौकरियों में साढ़े दस फीसदी मुसलमान हैं। पश्चिम बंगाल में मुसलमानों का पिछड़ापन सिर्फ नौकरियों और न्यायिक सेवा में नहीं बल्कि शिक्षा, बैंकों में जमा रकम, बैंकों से मिलने वाले कर्ज जैसे तमाम क्षेत्रों में है।

साथ ही पश्चिम बंगाल देश के उन राज्यों में है, जहां सबसे कम रिजर्वेशन दिया जाता है। पश्चिम बंगाल में दलित, आदिवासी और ओबीसी को मिलाकर 35 प्रतिशत आरक्षण है। वहां ओबीसी के लिए सिर्फ सात फीसदी आरक्षण है। मौजूदा कानूनों के मुताबिक, मुसलमानों को आरक्षण इसी ओबीसी कोटे के तहत मिलता है।
सच्चर कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद से ही पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बौद्धिक जगत में हलचल मची हुई है। इस हलचल से सीपीएम नावाकिफ नहीं है। कांग्रेस का तो यहां तक दावा है कि 30 साल पहले जब कांग्रेस का शासन था तो सरकारी नौकरियों में इससे दोगुना मुसलमान हुआ करते थे। सेकुलरवाद के नाम पर अब तक मुसलमानों का वोट लेती रही सीपीएम के लिए ये विचित्र स्थिति है। उसके लिए ये समझाना भारी पड़ रहा है कि राज्य सरकार की नौकरियों में मुसलमान गायब क्यों हैं।

अक्टूबर महीने में ही राज्य के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने प्रदेश के सचिवालय में मुस्लिम संगठनों की एक बैठक बुलाई। बैठक में मिल्ली काउंसिल, जमीयत उलेमा-ए-बांग्ला, जमीयत उलेमा-ए-हिंद, पश्चिम बंगाल सरकार के दो मुस्लिम मंत्री और एक मुस्लिम सांसद शामिल हुए। बैठक की जो रिपोर्टिंग सीपीएम की पत्रिका पीपुल्स डेमोक्रेसी के 21 अक्टूबर के अंक में छपी है उसके मुताबिक मुख्यमंत्री ने कहा कि सच्चर कमेटी ने राज्य में भूमि सुधार की चर्चा नहीं की। उनका ये कहना आश्चर्यजनक है क्योंकि सच्चर कमेटी भूमि सुधारों का अध्ययन नहीं कर रही थी। उसे तो देश में अल्पसंख्यकों की नौकरियों और शिक्षा और बैंकिग में हिस्सेदारी का अध्ययन करना था। बुद्धदेव भट्टाचार्य ने आगे कहा- "ये तो मानना होगा कि सरकारी और प्राइवेट नौकरियों में उतने मुसलमान नहीं हैं, जितने होने चाहिए। इसका ध्यान रखा जा रहा है और आने वाले वर्षों में हालात बेहतर होंगे। " अपने भाषण के अंत में बुद्धदेव भट्टाचार्य ने मुसलमानों को शांति और सुऱक्षा का भरोसा दिलाया। दरअसल वाममोर्चा सरकार पिछले तीस साल में मुसलमानों को विकास की कीमत पर सुरक्षा का भरोसा ही दे रही है।

रिजवान के मामले में सुरक्षा का भरोसा भी टूटा है। इस वजह से मुसलमान नाराज न हो जाएं, इसलिए सीपीएम चिंतित है। सीपीएम की मजबूरी बन गई है कि इस केस में वो न्याय के पक्ष में दिखने की कोशिश करे। रिजवान पश्चिम बंगाल में एक प्रतीक बन गया है और प्रतीकों की राजनीति में सीपीएम की महारत है। अगर पूरा मुस्लिम समुदाय ये मांग करता कि राज्य की नौकरियों में हमारा हिस्सा कहां गया तो ये सीपीएम के लिए ज्यादा मुश्किल स्थिति होती। लेकिन रिजवान की मौत से जुड़ी मांगों को पूरा करना सरकार के लिए मुश्किल नहीं है। आने वाले कुछ दिनों में आपको पश्चिम बंगाल में प्रतीकवाद का ही खेल नजर आएगा।

Monday, 12 November 2007

निशानी नहीं थी

हरि शंकर राढ़ी
किसने कहा कि वो रानी नहीं थी.
दुष्यंत की बस निशानी नहीं थी.

तन में टूटन थी न मन में चुभन थी
सच में सुबह वो सुहानी नहीं थी.

लहरों सी उसमें लचक ही लचक थी
पानी भी था और पानी नहीं थी.

जल्दी से कलियों ने आँचल हटाया
हालांकि उनपर जवानी नहीं थी.

कैसे सुनाता वफ़ा की इबारत
दिल पर लिखी थी जुबानी नहीं थी.

फूलों के रस डुबाकर लिखी जो
राढ़ी वो सच्ची कहानी नहीं थी.

Thursday, 8 November 2007

अब खुला समलैंगिकों का पांच सितारा होटल


सत्येन्द्र प्रताप
दुनिया भी अजीब है। अमीर लोगों के शौक। पहले तो समलैंगिकों के लिए विवाह करने के लिए छूट मांगी गई और अब उनके लिए पांच सितारा होटल भी खुल गया।
कोई गरीब आदमी रोटी मांगता है, मुफ्त शिक्षा की माँग करता है, उद्योगपतियों द्वारा कब्जियाई गई जमीन के लिए मुआवजा मांगता है तो देश चाहे जो हो, उसे गोली ही खानी पड़ती है। लेकिन इन विकृत मानसिकता वालों के लिए आंदोलन चले, उनकी मांगों को माना भी गया और होटल खुला, वो भी पांच सितारा। अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस-आयर्स मे समलैंगिकों के होटल खोला गया है! पांच सितारा होटल। ४८ कमरे हैं। पारदर्शी तल वाला स्विमिंग पुल है, साथ ही बार, रेस्टोरेंट भी. यह होटल शहर के सबसे पुराने इलाके san telmo मे खोला गया है।

Saturday, 3 November 2007

तीस-पैंतीस बार


एक सज्जन रास्ते पर चले जा रहे थे. बीच में कोई जरूरत पड़ने पर उन्हें एक दुकान पर रुकना पडा. वहाँ एक और सज्जन पहले से खडे थे. उनकी दाढी काफी बढी हुई थी. देखते ही राहगीर सज्जन ने मजाक उडाने के अंदाज में पूछा, 'क्यों भाई! आप दिन में कितनी बार दाढी बना लेते हैं?'
'ज्यादा नहीं! यही कोई तीस-पैंतीस बार.' दढियल सजान का जवाब था.
'अरे वाह! आप टू अनूठे हैं.'
'जी नहीं, में अनूठा-वनूठा नहीं. सिर्फ नाई हूँ.' उन्होने स्पष्ट किया.

Wednesday, 31 October 2007

अगर औरत की शक्ल में कार हो




सत्येन्द्र प्रताप
संयुक्त राज्य अमेरिका के नेवादा में सेमा नाम से कार की प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है। यह दुनिया की सबसे बड़ी प्रदर्शनी मानी जाती है। हालांकि मनुष्य के हर रूप को बाजार ने भली भांति पहचाना है, लेकिन अगर कार के रुप में किसी महिला को देखा जाए तो तस्बीर कुछ इसी स्टेच्यू की तरह उभरेगी। शायद इसी सोच के साथ प्रदर्शनी के आयोजकों ने कार के पार्टस से महिला की स्टेच्यू बना डाली। आप भी औरत के विभिन्न अंगों की तुलना कार-पार्टस् से करके लुफ्त उठा सकते हैं???

Saturday, 27 October 2007

देख लो भइया, ये हाल है तुम्हारी दुनिया का




चीन के बीजिंग शहर में प्रदूषण का धुंध इस कदर छा गया है कि सड़क पर खड़े होकर बहुमंिजली इमारत का ऊपरी हिस्सा देखना मुश्किल हो गया है। चीन में अगले साल ओलंपिक खेल होने जा रहा है और उससे जुड़े अधिकारियों ने उद्योगों से होने वाले वायु प्रदूषण पर चेतावनी भी दी है।

Friday, 26 October 2007

सबूत लपेटकर फांसी पर लटकाया





सीरियाः अलेपो के उत्तरी शहर में १८ से २३ साल के पांच युवकों को सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटकाया गया।ये टुवक हत्या के मामले में दोशी पाए गए थे। फांसी पर लटकाए गए युवकों के शरीर पर उनके अपराधों के बारे में विस्तृत रूप से लिखकर लपेट दिया गया था।

Tuesday, 23 October 2007

बीड़ी जलइले िजगर से पिया....






शिक्षा के निजीकरण के िवरोध में सड़कों पर उतरे छात्र-छात्राओं का अनोखा विरोध

आजा, आ....... लड़ेगा क्या


स्लोवािकय का छह सप्ताह का बिल्ली का बच्चा , खेलते हुए

Monday, 22 October 2007

पत्रकार का प्रेमपत्र

सत्येन्द्र प्रताप
सामान्यतया प्रेमपत्रों में लड़के -लड़िकयां साथ में जीने और मरने की कसमें खाते हैं, वादे करते हैं और वीभत्स तो तब होता है जब पत्र इतना लंबा होता है िक प्रेमी या प्रेिमका उसकी गंभीरता नहीं समझते और लंबे पत्र पर अिधक समय न देने के कारण जोड़े में से एक भगवान को प्यारा हो जाता है.
अगर पत्रकार की प्रेिमका हो तो वह कैसे समझाए। सच पूछें तो वह अपने व्यावसाियक कौशल का प्रयोग करके कम शब्दों में सारी बातें कह देगा और अगर शब्द ज्यादा भी लिखने पड़े तो खास-खास बातें तो वह पढ़वाने में सफल तो हो ही जाएगा.

पहले की पत्रकािरता करने वाले लोग अपने प्रेमपत्र में पहले पैराग्राफ में इंट्रो जरुर िलखेंगे. साथ ही पत्र को सजाने के िलए कैची हेिडंग, उसके बाद क्रासर, अगर क्रासर भी लुभाने में सफल नहीं हुआ तो िकसी पार्क में गलबिहयां डाले प्रेमिका के साथ का फोटो हो तो वह ज्यादा प्रभावी सािबत होगा और प्रेमिका के इमोशन को झकझोर कर रख देगा.
नया अखबारनवीस होगा तो उसमें कुछ मूलभूत परिवर्तन कर देगा. पहला, वह कुछ अंगऱेजी के शब्द डालेगा िजससे प्रेमिका को अपनी बात समझा सके. समस्या अभी खत्म नहीं हुई क्योंिक वक्त की भी कमी है और पढ़ने के िलए ज्यादा समय भी नहीं है. फोटो तो बड़ा सा डालना होगा िजससे पत्र हाथ में आते ही भावनाएं जाग जाएं. अगर फोटो का अभाव है तो इंट्रो कसा हुआ हो, साथ ही टेक्स्ट कम होना बेहद जरुरी है.

अलग अलग अखबारों के पत्रकार अलग अलग तरीके से प्रेमपत्र िलखेंगे. िहन्दुस्तान में होगा तो बाबा कामदेव का प्रभाव, भास्कर में हुआ तो फांट से अलग िदखने की कोिशश, जागरण का हुआ तो ठूंसकर टेक्स्ट भरेगा, नवभारत टाइम्स का हुआ तो अंगऱेजी झाड़कर अपनी बेचारगी दशाॆएगा, अगर आज समाज का हुआ तो हेिडंग के नीचे जंप हेड जरूर मारेगा, चाहे डबल कालम का लव लेटर हो या चार कालम का.

आम आदमी भी प्रेम पत्र िलखने के इन नुस्खों को अपना सकते हैं, िजससे प्रेमी प्रेमिका की आपसी समझ बढ़ेगी और प्यार में लव लेटर के खतरे से पूरी तरह से बचा जा सकेगा.

तो कामदेव की आराधना के साथ शुरु करिये प्रेमपत्र लिखना. सफलता के िलए शुभकामनाएं.

Friday, 19 October 2007

चलना है

रतन
उम्र भर रात-दिन औ सुबहो-शाम चलना है
ये जिन्दगी है सफर याँ मुदाम चलना है

ये हैं तकदीर की बातें नसीब का लिखा
किसी को तेज किसी को खिराम चलना है

लाख रोके से रुकेगा नहीं इंसान यहाँ
जब भी आया है खुदा का पयाम चलना है
नहीं है एक कोई दुनिया से जाने वाला
आज मैं कल वो इस तरह तमाम चलना है
गलत किया है नहीं गर खता हुई हो कभी
माफ़ करना मुझे सब राम-राम चलना है
ज्यों यहाँ हम रहे खुशहाल वहाँ भी यों रहें
लबों पे लेके खुशनुमा कलाम चलना है

रतन हैं साथ सफर होगी हंसी अहले-जहाँ
कुबूल कीजिए मेरा सलाम चलना है

Wednesday, 17 October 2007

पहला आर्यसत्य

इष्ट देव सांकृत्यायन
राजकुमार सिद्धार्थ पहली बार अपने मंत्री पिता के सरकारी बंगले से बाहर निकले थे. साथ में था केवल उनका कार ड्राइवर. चूंकि बंगले से बाहर निकले नहीं, लिहाजा दिल्ली शहर के तौर-तरीक़े उन्हें पता नहीं चल सके थे. कार के बंगले से बाहर निकलते ही, कुछ दूर चलते ही रस्ते में मिला एक साईकिल सवार. हवा से बातें करती उनके कार के ड्राईवर ने जोर का हार्न लगाया पर इसके पहले कि वह साईड-वाईड ले पाता बन्दे ने गंदे पानी का छर्रा मारा ....ओये और 'बीडी जलाई ले जिगर से पिया ........' का वाल्यूम थोडा और बढ़ा दिया. इसके पहले कि राजकुमार कुछ कहते-सुनते ड्राईवर ने उन्हें बता दिया, 'इस शहर में सड़क पर चलने का यही रिवाज है बेबी.'

'मतलब?' जिज्ञासु राजकुमार ने पूछा.
'मतलब यह कि अगर आपके पास कार है तो आप चाहे जितने पैदल, साइकिल और बाइक सवारों को चाहें रौंद सकते हैं.' ड्राइवर ने राजकुमार को बताया. कार थोड़ी और आगे बढ़ी. ड्राइवर थोडा डरा. उसने जल्दी से गाडी किनारे कर ली. मामला राजकुमार की समझ में नहीं आया.
'क्या हुआ?' उन्होने ड्राइवर से पूछा.
'अरे कुछ नहीं राजकुमार, बस एक ब्लू लें आ रही है.'
'क्या ब्लू लाइन? ये कौन सी चीज है भाई?' वह अचकचाए.
'ये चीज नहीं है बेबी. धरती पर यमराज के साक्षात प्रतिनिधि हैं. साक्षात मौत.'
'मैं कुछ समझा नहीं?'
'बात दरअसल ये है कि धरती पर जब भी लोगों को यह घमंड हो जाता है कि अब मनुष्य ने बीमारियों का इलाज ढूँढ कर मृत्यु को जीत लिया है तो यमराज कोई नई बीमारी भेज देते हैं. दिल्ली में उसी का नाम ब्लू लाइन है. पहले इसे रेड लाइन कहते थे. इसके भीतर अगर कभी जाने का सौभाग्य आपको मिले तो आपको पता चलेगा कि वहाँ एक पूरा रेड लाईट एरिया होता है.'
'ये रेड लाईट एरिया क्या होता है?'
'ये वो एरिया होता है जहाँ सिर्फ वही लोग जा सकते हैं जिन्हे अपने मान-सम्मान और जीवन-मृत्यु की कोई परवाह न हो.'
'अच्छा! पर हम इसके भीतर तो जा नहीं रहे थे. तुम इसे देख कर डर क्यों गए?'
'वो क्या है राजकुमार कि अगर ब्लू लाइन बसों को इस बात का पूरा हक है कि ये जब चाहें कार वालों को भी रौंद सकती हैं. चूंकि यहाँ सडकों पर ट्रेनें और प्लेनें अभी चलती नहीं हैं, इसलिए इनका आप कुछ नहीं बिगाड़ सकते.'
थोडा और आगे बढ़े तो एक चौराहा दिखा. चौराहे पर लाल-पीली-हरी बत्तियां दिखीं. चारों तरफ चिल्ल-पों की फालतू आवाजों के साथ बेतरतीब आते-जाते गाड़ियों से गाड़ियों के बीच एक तरह की धक्का-मुक्की करते लोग दिखे. राजकुमार को पीछे चले संदर्भ याद आ गए. उन्होने फिर पूछा, 'क्या यही रेड लाईट एरिया है?'
'नहीं ये एरिया नहीं, सिर्फ रेड लाईट है. एरिया थोडा अलग मामला है. वहाँ जाने से आप बच भी सकते हैं. पर यहाँ तो आपको आना ही पड़ेगा. सबको आना पड़ता है.'
'ओह! और यह जो लाल-पीली बत्तियां लगीं हैं, ये किसलिए हैं?'
'किताबों में लिखा तो यह गया है कि ये ट्रैफिक कण्ट्रोल के लिए हैं. पर असल में ऐसा कुछ है नहीं. वास्तव में ये सिर्फ सजाने के लिए लगाई गईं हैं.'
कार को थोडा और आगे बढते ही एक खाकी वर्दीधारी ने रोका. राजकुमार ने देखा कि गितिर-पितिर अन्ग्रेज़ी बोलती एक अल्पवसना युवती उससे पहले ही भिडी हुई थी. पर राजकुमार के ड्राईवर ने कार का शीशा उतारा. डंडाधारी को कुछ कहा और आगे बढ़ गया. राजकुमार को फिर जिज्ञासा हुई. उन्होने पूछा,'क्या मामला था? वह युवती क्यों भिडी हुई है?'
'उसके पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं है.'
'ये क्या होता है?'
'ये एक प्रकार का कार्ड होता है, जिसके बग़ैर गाडी नहीं चलाई जा सकती है.'
'ओह! तो तुम्हारे पास था वो कार्ड?'
'नहीं. मेरे पास तो गाडी का आरसी भी नहीं है.'
'फिर तुमसे उसने कुछ कहा क्यों नहीं?'
'मैने उसे बता दिया कि ये मंत्री जी की गाडी है.'
'ओह! तो क्या मंत्री जी की गाडियां चलाने के लिए लाइसेंस की जरूरत नहीं होती?'
'हाँ. उनके लिए कोई नियम नहीं होता. ब्लू लाइन बसें इसीलिए तो सबको रौंदते हुए चलती हैं.'
'अच्छा! तो क्या ये ब्लू लाइन बसें मंत्री जी की हैं?'
'जी हाँ! आपके पिताजी की भी कई हैं. पर कागजों में इनका मालिक घुरहुआ है और मंत्री जी इन्हें चलवाते भी खुद नहीं हैं. सारी बसें ठेके पर चलती हैं.'
'ऐसा क्यों?'
'अब आपको क्या बताएं बेबी?' ड्राइवर अचानक से दार्शनिक हो गया, 'व्यवस्था ऐसे ही चलती है.'
हालांकि राजकुमार समझ नहीं पाए कि व्यवस्था क्या चीज है. पर उन्हें अब ड्राइवर से पूछना भी मुफीद नहीं लगा. आखिर वह क्या सोचता? यही न! कि राजकुमार इतना भी नहीं समझ सकते. लिहाजा वे अपने मौन में खो गए और सोचने लगे कि शायद यह कार है. या शायद ब्लू लाइन बस है. या शायद रेड लाईट है. या शायद वह एरिया है. या शायद ...............
और वह ध्यान मग्न हो गए. शायद उन्हें पहला आर्यसत्य मिल गया था.