Thursday, 21 November 2019

रेडिएशन, कटोरा और केकड़े


एक तरफ तो मोबाइल के टावरों से होने वाली रेडिएशन की बड़ी बात की जाती है. हजारों नुकसान गिनाए जाते हैं. और दूसरी तरफ हर शख्स के हाथ में दो-तीन फोन और उनमें पाँच-आठ सिम हैं.

यही नहीं, सबको बहुत अच्छी कनेक्टिविटी भी चाहिए. चाहे बात करने के लिए हो या फिर सर्फिंग के लिए. बात करते वक्त आवाज़ साफ़ सुनाई देनी चाहिए, जरा सी घिचपिच नहीं होनी चाहिए, एक बार भी संपर्क नहीं टूटना चाहिए और नेट के मामले में गूगल पर कैचवर्ड डालते ही टेक्स्ट से लेकर फोटो और विडियो तक पूरा मसाला हाजिर हो जाना चाहिए.

हम तो ट्रंककॉल वाली पीढ़ी से हैं. मेरी पीढ़ी के हर शख्स को ठीक से पता होगा कि हम सीधे मोबाइल पर नहीं आए. यहाँ तक कि एक से दूसरे शहर या कस्बे में बात भी लैंडलाइन फोन पर सीधे नहीं हो पाती थी. आपको अपने घर के फोन से केवल अपने शहर भर में बात करने की सुविधा थी. शहर से कहीं बाहर बात करनी हो तो पहले एक्सचेंज मिलाना पड़ता था. एक्सचेंज वाले बड़ी कृपा करके आपकी ट्रंक कॉल बुक करते थे. पता नहीं, तब एसटीडी-आइएसडी जैसी कोई व्यवस्था भी थी या नहीं.

फिर एसटीडी आया. पीसीओ भी आए. पीसीओ का धंधा आया, बड़े जोर से पनपा और उसके पनपते ही मोबाइल आया. मोबाइल आया और आते ही फैल गया, महामारी की तरह. इसे मजाक मत समझिए. मोबाइल वाकई महामारी है. लेकिन अभी हमने सुविधा और अपने दैहिक-मानसिक स्वास्थ्य में से सुविधा के नाम पर महामारी को चुन लिया है. सीधा मतलब है कि अभी हम यह स्वीकार नहीं कर पाए हैं कि यह महामारी है. अगर हमने थोड़ा-थोड़ा समझ लिया है तो भी हम यह मानकर चल रहे हैं कि अरे इतना भी नुकसानदेह नहीं है जितना लोग हल्ला मचाए हुए हैं. और हुआ भी तो क्या, देखा जाएगा. ख़ैर, प्रदूषण वगैरह बहुत चीजों की तरह इसे भी हम स्वीकार करेंगे, लेकिन तब जब हाथ में कुछ नहीं रह जाएगा.

तो मोबाइल ने एक तरफ तो पीसीओ को खाया, दूसरी तरफ बच्चों और जवानों को, लोगों के रिश्तों को. माता-पिता अब बच्चों को खुद मोबाइल थमा देते हैं. अपना पीछा छुड़ाने के लिए. बच्चे पहले कार्टून, फिर गेम और फिर खतरनाक गेम में बिजी हो जाते हैं. अगर वे खतरनाक गेम से बचकर सर्वाइव कर गए और युवा हुए तो फिर सोशल मीडिया, सीरियल, सिरीज, मूवी और पोर्न तक आते हैं.

उसके बाद रेडिएशन को कौन पूछता है! मंत्री जी अगर कहते हैं कि मोबाइल टावर से रेडिएशन नहीं होता तो ठीक कहते हैं. वैज्ञानिकों और उनकी प्रयोगशालाओं को जो कहना हो, कहा करें. हम तो मंत्री जी को ही ठीक मानेंगे. क्या मंत्री जी अगर कह दें कि रेडिएशन होता है और यह आपके लिए खतरनाक है, तो क्या आप अपनी जेब में मोबाइल रखना बंद कर देंगे? नहीं न? फिर फालतू का बखेड़ा क्यों?

आप तो अगर जेब में कूवत हुई तो फाइवजी के आते ही श्रीमान फोरजी को सिपुर्दे कूड़ेदान करेंगे. जेब तो छोड़िए बेडरूम से लेकर वॉशरूम तक मोबाइलजी का साथ नहीं छोड़ेंगे. फिर मतलब क्या है रेडिएशन का?

हाँ, रेडिएशन का सवाल आप उठाएंगे जरूर, केवल तब जब आपके पड़ोसी के घर की छत पर टावर लगेगा. क्यों? क्योंकि इससे उसे चार पैसे की आमदनी हो सकती है. यानी आपकी समस्या रेडिएशन नहीं, पड़ोसी की आमदनी है और हम हिंदुस्तानी तो हैं ही कटोरे में डाले गए चार केकड़े.
हम हिंदुस्तानियों के लिए तो स्वास्थ्य की परवाह भी एक पाखंड है. यह पाखंड और पाखंड के तहत हल्ला छोड़िए. रेडिएशन का असली इलाज फालतू का हल्ला नहीं, सिर्फ और सिर्फ़ पूंजीवाद का टेंटुआ है. लेकिन आप उसका टेंटुआ क्या दबाएंगे! आपकी जेब दो-तीन हैंडसेट रखकर वह आपका टेंटुआ बहुत कसकर पकड़े हुए है. हालांकि वह हाथ जिसमें आपकी गर्दन जकड़ी हुई है, उसे अभी आप प्रेयसी के कोमल हाथ समझ रहे हैं.



Saturday, 16 November 2019

प्लीज़ ऐसा न करो साथी


जिस मन में अपने लिए सम्मान नहीं होता, उसमें अपनी किसी चीज के लिए सम्मान नहीं होता. चाहे वह देश हो, समाज हो, संस्कृति हो, विचार हो या फिर अपने माता-पिता, जीवनसाथी या बच्चे!


ऐसे लोग जीवन भर लड़ते हैं, उनके इशारों पर जो वास्तव में इनसे और इनके समाज से अपनी दुश्मनी साध रहे होते हैं.


चूँकि वे खुद बार-बार हार गए और हार-हार कर यह मान गए कि सीधी लड़ाई वे कभी नहीं जीत सकते, तो उन कुंठित अपसंस्कृतियों ने यह छद्मयुद्ध छेड़ा.


इस छद्मयुद्ध में वे हमारे समाज के उस कचरे का इस्तेमाल कर रहे हैं जो हमारे ही टुकड़ों पर हमारी ही दया से पल रहा है और हमें ही गाली दे रहा है. हमें, हमारी संस्कृति को, हमारे गौरवशाली दर्शन, हमारे समाज को कोस रहा है.


वह हमें गालियों पर गालियां दिए जा रहा है क्योंकि हम बर्दाश्त कर रहे हैं. क्योंकि हम सह रहे हैं. सहने की जितनी भी सीमाएं हो सकती थीं, सारी पार की जा चुकी हैं. इसके बावजूद हम सह रहे हैं. सहे जा रहे हैं.

उस पर तुर्रा यह कि इन परजीवियों की नजर में हमारे समाज में असहिष्णुता बढ़ रही है. असहिष्णुता बढ़ रही है, ये झूठा हल्ला उस गंदी नाली के कीड़े मचाए हुए हैं जिन्होंने अपानाग्न्योत्सर्जन की सारी हदें छिन्न-भिन्न कर डाली हैं.

इन्हें लगता है कि लोग इनके बार-बार झूठ बोलने से और इनके गलाफाड़ हल्ले से वाकई प्रभावित हो जाएंगे और अंततः इनके सफेद झूठ को ही सच मान लेंगे.

ये नहीं जानते कि चार्वाक, कपिल, विश्वामित्र, महावीर, बुद्ध और नानक जैसे आँख वालों की धरती पर गोएबल्स जैसे अंधों के सिद्धांत काम नहीं आते. स्वामी विवेकानंद इस मिट्टी के एक ऐसे सपूत हैं जिनके प्रति देश का हर वर्ग अपने को अपने आप ही कृतज्ञ महसूस करता है.

भगवा कोई उन्हें किसी ने जबर्दस्ती नहीं उढ़ाया, संन्यासी होने के नाते यही उनका स्वाभाविक परिधान था. यही एक रंग है जिसमें किसी और रंग के प्रति कोई घृणा नहीं है. अलबत्ता तुम जिनके फेंके हुए जूठन के लिए हमारी भीख पर पलकर हम पर ही वमन कर रहे हो, वे ईसा से पहले और बाद के भी करीब 1300 वर्षों के अपने इतिहास पर इस कदर शर्मिंदा हैं कि बेचारे हमेशा कुछ इस मोड में रहते हैं- बताते भी नहीं बनता, छुपाते भी नहीं बनता.

हमारी सहिष्णुता की इससे बड़ी परीक्षा और क्या होगी कि हमने तुम्हारी इतनी बड़ी बेहूदगी को भी तुम्हारा पागलपन मानकर छोड़ दिया! तुम्हें थूरकर वाकई लाल नहीं कर दिया! वरना सहिष्णुता के तुम्हारे जो मानक हैं, वे कायर तो एक मामूली बात पर आदमी को धोखे से हलाल करने पहुँच जाते हैं.

जरा सोचो, अगर हम वाकई असहिष्णु हो गए और केवल इतने पर तुल जाएं कि हमारे दिए हुए कर में कितना पैसा भारत सरकार तुम पागल संपोलों को पालने पर खर्च कर रही है, उसका हिसाब दे, तो क्या हो? सोचो कि तुम्हारी चरस का इंतजाम फिर कहाँ से होगा?

जिनके लिए तुम यह सब कर रहे हो न, वे तुम्हारे लिए अपनी जूठन से टुकड़े फेंकेंगे वे ज्यादा से ज्यादा हुक्के भर के लिए ही होंगे. पेट में ठूंसने के लिए रोटी और हुक्के में भरने के लिए चरस तुम्हें हमारे ही खून-पसीने के टैक्स से मिलना है.

और यह भी जान लो कि जिसे तुम हमारी कमजोरी समझते हो वह कोई कमजोरी नहीं, हमारा संस्कार है. हम तुमसे डरते नहीं साथी, हमें तुम पर तरस आता है. निर्दोष तो छोड़ो, हम बहुत बड़े दोषी के भी गंदे खून से अपने हाथ सानना नहीं चाहते. लेकिन जब सारी हदें पार हो ही जाती हैं तो फिर संभवामि युगे युगे तो तुम जानते ही हो.

प्लीज ऐसा न करो साथी कि हमें सहिष्णुता का हमारा संस्कार वाकई छोड़ना ही पड़ जाए.    



Thursday, 14 November 2019

जहर से जहरीली अपसंस्कृति


भोजपुरी गायकी की अपनी एक समृद्ध परंपरा रही है. लोक में भी और शास्त्र में भी. नाम गिनाने बैठें तो चुनना कठिन हो जाएगा कि किनका नाम लूँ और किन्हें छोड़ूं.


लेकिन यह परंपरा तभी तक सुरक्षित थी जब तक भोजपुरी बजार की चीज नहीं हुई थी और बजार की चीज बनने से यह पटना छाप कैसेट कंपनियां आने तक बची रही. जैसे ही पटना वाली कुछ कैसेट कंपनियां आईं और उन्होंने लोक गायकी के नाम पर पॉप से भी फूहड़ और निहायत अश्लील सोनपुर मेले वालों और वालियों को पकड़ना और उनको रेकॉर्ड करके बजार में भाठना शुरू किया, वहीं से सारी गरिमा जाती रही.


इन्होंने बाजार के सारे टोटके अपनाते हुए अपनी रीच बढ़ाई और बसों से लेकर ट्रकों और दिल्ली से लेकर पंजाब, मुंबई और अहमदाबाद तक इनकी धमक सुनाई देने लगी.


ऐसा नहीं है कि भोजपुरी पट्टी से बाहर के बड़े शहरों में पहले कभी भोजपुरी गायकी की मिठास नहीं सुनाई देती थी. पहले भी सुनी जाती थी. लेकिन वह मिठास विशुद्ध लोक की थी. इसमें चैता, फगुआ, कजरी जैसे मौसमी और छठ, नहान, सतुआन, रामनवमी जैसे पर्वों या भक्ति के गीत शामिल होते थे. अवसर के अनुसार बियाह, जनेऊ और सोहर भी. गाने वाले छोटे-बड़े मजदूर, बाबू या साहब होते थे, जो अपने-अपने घरों से अपने जवार की माटी की महक सहेजे इन शहरों में अपना जांगर पेरने आए होते थे.

बेशक इनमें लोक की परंपरा और सहज प्रवृत्ति के अनुसार हल्का-फुल्का हँसी-मजाक भी होता था, शृंगार और शौर्य भी होता था. लेकिन फूहड़ता और अश्लीलता नहीं थी.

लेकिन कंपनियों ने भोजपुरी के नाम पर जो परोसा उसने भोजपुरी की इस सहजता को वैसे ही लील लिया जैसे राहु और केतु ग्रहण के दिन सूर्य और चंद्र को लील लेते हैं. जैसे औद्योगिक विकृति ने हमारी किसानी की संस्कृति को लील लिया. जैसे इस औद्योगिक विकृति के चलते सुरसा के मुँह की तरह बढ़ रहे शहरों ने छोटे-छोटे गाँवों और उनमें विहसते जीवन को लील लिया.


इन्होंने हमें थमाया है भोजपुरी के नाम पर फूहड़, अश्लील और बेहूदे दोअर्थी गाने. इन बेतुके और जहर से भी ज्यादा जहरीले गानों ने हमारे लोकगीतों और हमारी लोकसंस्कृति को वैसे ही नष्ट कर डाला जैसे चाय ने दही-लस्सी और मट्ठे की संस्कृति को.

किसी सरकार के पास इसका कोई मानक नहीं है और न कोई सरकार इसे रोक सकती है. अगर साहित्य की कहीं कोई भूमिका और समाज के प्रति इसकी कोई जिम्मेदारी आप मानते हैं तो यह जिम्मेदारी मूलतः भोजपुरी क्षेत्र के साहित्यकारों की है कि वे कम से कम अपने क्षेत्र में लोगों को जागरूक करें. उन्हें बताएं कि ये गाने कैसे जहर से भी ज्यादा जहरीले और खतरे से भी ज्यादा खतरनाक हैं.




Tuesday, 22 October 2019

कुम्हारों पर नहीं, ख़ुद पर करें एहसान

दीवाली पर झालरों को कहें बाय.
मिट्टी के दीये ख़रीद कर आप कुम्हारों पर नहीं, ख़ुद पर एहसान करेंगे.
सोचिए,
जब आप झालरों का उपयोग करते हैं तो क्या करते हैं?
बिजली की खपत बढ़ाते हैं.
दीवाली पर कई जगह ओवरलोडिंग के ही चलते शॉर्ट सर्किट हो जाती है. इससे केवल तकनीकी खामी के नाते बिजली के पारेषण की व्यवस्था ही खराब नहीं होती, बहुत सारी बिजली बर्बाद भी होती है. लाइन और ट्रांस्फार्मर में आए फॉल्ट से होने वाली लीकेज के कारण. वह किसी काम नहीं आती.
प्लास्टिक का कचरा बढ़ाते हैं.
जो झालरें आप लाते हैं, वे दो तीन साल से अधिक नहीं चलतीं. उसके बाद उनमें लगे प्लास्टिक के रंग-बिरंगे कवर्स समेत उन्हें फेंक देते हैं. बाकी प्लास्टिक का गुण-धर्म आप जानते ही हैं. लाखों वर्षों में भी वह नष्ट नहीं होता. मिट्टी को प्रदूषित करता है और मिट्टी का प्रदूषण अंदर ही अंदर फैलता चला जाता है.
भूमि का प्रदूषण बढाते हैं.
केवल प्लास्टिक ही नहीं, उनमें लगे बल्ब लेड के बने होते हैंं.लेड कितना ख़तरनाक ज़हर है, यह बताने की ज़रूरत नहीं. लेड के चलते हुआ प्रदूषण प्लास्टिक से भी ज़्यादा तेज़ी से फैलता है. जहाँ जहाँ यह पहुँचेगा, उस भूमि का जल और वहाँ उपजा अन्न या सब्ज़ियां कुछ भी खाने के लायक नहीं रह जाएगा.
भावी पीढ़ियों की बर्बादी.
इसका असर अभी तो सिर्फ़ दिखना शुरू हुआ है. ज़्यादा नहीं केवल पचास साल बाद की स्थिति सोचिए. हम तो शायद हों ही नहीं, लेकिन बड़े होकर हमारे बच्चे और उनके बच्चे सिर्फ़ ज़हर खा रहे होंगे.
हिरोशिमा-नागासाकी
झालरों के जरिये इस प्लास्टिक और लेड कचरे से हम अपने इर्द-गिर्द बिना किसी युद्ध के ख़ुद ही एक हिरोशिमा-नागासाकी बना रहे हैं. भोपाल गैस त्रासदी उत्पन्न कर रहे हैं. तीन पीढ़ी बाद हमारे आसपास केवल दिव्यांग पैदा हों, इसके पूरे इंतज़ाम बना रहे हैं.
उन पर नहीं, ख़ुद पर एहसान
अगर आप चाहते हैं कि आपकी भावी पीढ़ियां स्वस्थ और सुखी हों तो झालरों को अभी ना कह दें. सोचें ही नहीं इनके बारे में अब. मिट्टी के दीये और बर्तन बनाने वाले लोक-कलाकारों पर नहीं, ख़ुद पर एहसान करिए. अपनी परंपरा को निभाइए और इन लोक कलाकारों के प्रति एहसानमंद होइए.

Thursday, 17 October 2019

Udaipur visit





                     उदयपुर दर्शन :

                                                - हरिशंकर राढ़ी 

फतेहसागर झील                                          छाया : हरिशंकर राढ़ी 
 रात्रि विश्राम के बाद अगले दिन हमें उदयपुर के दर्शनीय स्थलों की सैर करनी थी। वैसे तो ऐसे पर्यटक बिंदुओं पर टैक्सीवाले तथा टुअर ऑपरेटर न जाने कितने स्थान पैदा कर लेते हैं, लेकिन हमें कुछ खास स्थल ही घूमने थे। उनमें फतेह सागर झील, सहेलियों की बाड़ी और सिटी पैलेस ही मुख्य थे। थोड़ा सा समय कुछ खरीदारी के लिए भी चाहिए था। लिहाज़ा हमने दस बजे होटल से चेक आउट कर लिया और गाड़ी में सवार हो लिए। हमारा पहला पड़ाव फतेह सागर झील थी। रास्ते में हमने आधा घंटा एक उद्यान में बिताया जो कि अच्छा तो था किंतु अद्वितीय किसी कीमत पर नहीं।

फतेह सागर झीलः 
फतेहसागर झील  के सामने                                      
 यह झील निश्चित  रूप से उदयपुर के प्रमुख आकर्षणों में एक है। यह कृत्रिम झील बहुत बड़ी है, हालाँकि अगस्त महीने में भी इसमें पानी की मात्रा संतोषजनक नहीं थी। झील की लंबाई लगभग ढाई किलोमीटर तथा चौड़ाई डेढ़ किलोमीटर है। झील के बीच में नेहरू पार्क नामक एक छोटा द्वीप भी है जो बहुत आकर्षक है। दो अन्य लघुद्वीप इतने उल्लेखनीय नहीं हैं। झील की सुंदरता में इस पार्क से चार चाँद लग जाता है। इस पार्क में कई फिल्मी गीतों की शूटिंग की गई थी। यह जानकर दर्शकों का मन और ललचाता है।

झील के एक किनारे की पहाड़ी की चोटी पर महाराणा प्रताप स्मारक बना है जिस पर राणा अपने स्वामिभक्त घोड़े चेतक पर सवार हैं। जो यात्री हल्दीघाटी नहीं जा पाते, उनके लिए यह स्मारक उपयोगी है। इसमें प्रवेश हेतु शुल्क लगता है। चूँकि हम हल्दीघाटी की पवित्रभूमि हो आए थे, इसलिए हमें इस स्मारक पर भारी शुल्क और समय देना उचित नहीं लगा। हाँ, यहाँ मौसम, दृष्य और वातावरण इतना सुहावना लग रहा था कि लगभग एक घंटे तक घूमते-टहलते रहे। पर्यटकों की एक बड़ी संख्या प्रायः मौजूद रहती है। झील के किनारे अनेक छोटे रेस्तराँ हैं जो पारंपरिक से लेकर आधुनिक खाद्य सामग्री परोसते रहते हैं। उदयपुर निवासियों को इस झील से जो भी लाभ हों, यात्रियों को तो बस नैनसुख और सुकून चाहिए जो यहाँ प्रचुर मात्रा में मिलता है।



उदयपुर का सिटी पैलेस                  छाया : हरिशंकर राढ़ी

पिछोला झील और सिटी पैलेस : 

पिछोला लेक एवं उसी से सटा सिटी पैलेस उदयपुर की विशिष्ट पहचान हैं। पहचान तो क्या, इन्हें एक तरह से उदयपुर का पर्याय मान लिया गया है। सिटी पैलेस, पिछोला लेक और उसके अंदर स्थित जगमंदिर पैलेस सौंदर्य, वैभव, विलासिता और सत्ता की अद्भुत संरचना है। पिछोला झील के बीच में चमकता उच्च सुविधा से युक्त जगमंदिर पैलेस, एक ओर से अरावली की पहाड़ियाँ तो दूसरी ओर से शा नदार सिटी पैलेस ! एक बार दर्शक इन प्राकृतिक और कृत्रिम संरचनाओं के मनमोहक जाल में                                                                                                 उलझकर रह जाता है। 


पिछोला झील का निर्माण
पिछोला झील का एक दृश्य                छाया : हरिशंकर राढ़ी
पिछोला झीलमें जगमंदिर  पैलेस           छाया : हरिशंकर राढ़ी
संभवतः 1362 ई0 में बंजारा ने महाराणा लाखा के समय बनवाया था। बंजारा एक जनजातीय वनवासी था जो अनाज का व्यापार करता था। इसके एक किनारे पर बना सिटी पैलेस स्थित है। यह कह पाना मुश्किल है कि पिछोला झील से सिटी पैलेस का सौंदर्य बढ़ता है या सिटी पैलेस से पिछोला झील का। यह संयोग कुछ वैसा ही है जैसे तालाब से कमल की शोभा होती है और कमल से तालाब की। कहा जाता है कि पिछोला झील के सौंदर्य से ही प्रभावित होकर राणा उदय सिंह द्वितीय ने अपनी राजधानी चित्तौड़ से यहाँ स्थानांतरित की तथा इसी झील के किनारे सिटी पैलेस की नींव दी थी। जब हम पहुँचे तो दोपहर होने को आ गई थी। मौसम में बादली धूप थी तथा मानसून की उमस। फिर भी झील के किनारे दर्शकों का तांता लगा हुआ था जिसमें हर वय के लोग थे। अधिकांश युवक-युवतियाँ फोटोग्राफी एवं सेल्फी में व्यस्त थे तो उम्रदराज लोग झील के सौंदर्यपान में। झील में बहुत से लोग नौकायन भी कर रहे थे। हमारी रुचि नौकायन में थी नहीं। पता नहीं कितने दिनों बाद संयोग बना है यहाँ आने का, फिर क्यों न इस झील और समूचे दृश्य को नैनों में उतार लिया जाए ?
उदयपुर का सिटी पैलेस         छाया : हरिशंकर राढ़ी
यहाँ से खिसकते हुए समय को देखकर हम सिटी पैलेस की ओर खिसक लिए। सिटी पैलेस वास्तव में बहुत भव्य है। इसका निर्माण लगभग चार सौ साल पहले सन् 1559 ई0 में राणा उदय सिंह ने शुरू करवाया तथा मेवाड़ के कई राजाओं ने इसे वर्तमान आकार और रूप प्रदान किया। लगभग आठ सौ फीट की लंबाई में निर्मित इस महल में मुख्यतः तीन प्रवेशद्वार हैं जिसे यहाँ की बोली में पोल कहते हैं। मुख्य प्रवेशद्वार बड़ी पोल के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त त्रिपोलिया पोल और हाथी पोल भी प्रयोग में हैं। महल के अंदर मोर चौक, सूरज गोखडा, दिलखुश महल, शीश महल, मोती महल, कृश्ण विलास, शंभु निवास, अमर विलास और बड़ी महल प्रमुख खंड हैं। फतेह प्रकाश  महल तथा शिव  निवास महल को विरासत होटल में परिवर्तित कर दिया गया है। उच्च सुविधाओं से युक्त इन होटलों से महल को अच्छी आय हो जाती है। महल में कई गलियारों में राजस्थानी कलाकृतियों तथा वस्त्रों की दूकानें हैं। वर्तमान में महल मेवाड़ राजघराने की संपत्ति है।

पैलेस में स्थित जनाना महल को सन् 1974 से संग्रहालय के रूप में प्रयोग किया जा रहा है, जिसका प्रवेशशुल्क तीन सौ रुपये है। दर्शकों की बड़ी संख्या को देखते हुए इस संग्रहालय, दूकानों के किराये एवं सामान्य प्रवेशशुल्क से कितनी आय हो रही होगी, इसका अंदाज लगाना बहुत सहज नहीं है। वापसी में हमारे ड्राइवर ने बताया कि महल की एक दिन की आमदनी साठ लाख रुपये है। हमने इस पर विश्वास  तो नहीं किया, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि सिटी पैलेस देश के सबसे धनी महलों में एक है।
पिछोला लेक के सामने हम पांच    छाया : हरिशंकर राढ़ी        



  
सहेलियों की बाड़ी तथा अन्य दर्शनीय बिंदु :
सिटी पैलेस आने से पहले हमने सहेलियों की बाड़ी तथा वैक्स म्यूजियम भी देख लिया था। वैक्स म्यूजियम न तो कोई ऐतिहासिक धरोहर है और न कोई बहुत मनोरंजक स्थल। इधर जबसे लंदन में स्थित मैडम तुसाद म्यूजियम चर्चा में आया, तबसे अपने देश में भी इनकी संख्या में बढ़ोतरी होने लगी है। इसी क्रम में उदयपुर का वैक्स म्यूजियम भी आता है। हम वहाँ पहुँच तो गए किंतु कोई भी इसे देखने को उत्सुक नहीं था। क्या देखना है मोम के पुतले ? ऊपर से प्रवेश टिकट साढ़े तीन सौ रुपये प्रति व्यक्ति। हम लोग पूछताछ करके वापस जाने लगे तो वहाँ के कर्मचारियों ने घेरा डाला और मोलभाव पर उतर आए। अंततः वे हम छह जनों को एक हजार रुपये में प्रवेश देने को मनाने लगे। खैर, हमने भी उनकी बात रखी। अंदर गए। वहाँ एपीज कलाम, महात्मा गांधी, मदर टेरेसा, राणा प्रताप, बराक ओबामा, नरेंद्र मोदी सहित कुल 15 मूर्तियाँ थीं। अब गए थे तो फोटो-सोटो तो खिंचने ही थे। इसके बाद शुरू हुआ उनका हॉरर षो। भूत, चुड़ैल और अधकटी काया के पुतले ध्वनि एवं उछल-कूद से डराने का प्रयास कर रहे थे जिसमें हमें कोई रुचि नहीं थी। हाँ, उसके बाद मिरर हॉल की भूल-भुलैया में कुछ आनंद जरूर आया।

सहेलियों की बाड़ी एक सुंदर बगीचा है जिसे महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय ने सन् 1710 से 1736 के बीच बनवाया था। यह राजपरिवार की महिलाओं के आमोद-प्रमोद का केंद्र था। अभी इसमें एक सुंदर फव्वारा चलता रहता है। बायीं ओर एक बड़ा उद्यान है जिसमें घूमना अच्छा लगता है। सहेलियों की बाड़ी मैं अपनी पिछली उदयपुर यात्रा में देख चुका था। सत्रह साल बाद उस यात्रा को दुहराना अच्छा लग रहा था। कुछ यादें भी थीं और कुछ भूलें भी।

इनके अतिरिक्त उदयपुर में घूमने के लिए अन्य बहुत से स्थल हैं, हालाँकि वे इतने महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। कुछ स्थल तो केवल गिनती के लिए होते हैं जिन्हें न देखकर भी पछतावा नहीं होता। हाँ, एक जिज्ञासा जरूर बनी रह जाती है। ऐसे स्थलों में उदयपुर में सुखाड़िया सर्कल, जगदीश मंदिर, शिल्पग्राम, करनी माता मंदिर, हाथीपोल बाजार, विंटेज कार म्यूजियम, शीशमहल आदि प्रमुख हैं। यदि पचास किलोमीटर की परिधि तक घूमने का समय हो तो जयसमंद लेक, चित्तौड़गढ़ किला और साँवलिया जी का मंदिर देखा जा सकता है।

सिटी पैलेस से निकलते-निकलते हमें लगभग तीन बज गए थे। पाँच बजे की हमारी गाड़ी थी। सो, हमने एक रेस्तराँ में खाना खाया और पास में स्थित जोधपुर स्वीट्स से घर के लिए मावे की कचौरियाँ पैक करायीं तथा रास्ते के लिए प्याज और दाल की कचौरियाँ। जोधपुर तथा उदयपुर जाकर आदमी वहाँ की कचौरियाँ न खा पाए तो उसे भाग्यहीन ही कहना चाहिए। हाँ, बीच में हम सबने राजस्थान क्राफ्ट एंपोरियम से अपनी पत्नी के लिए बड़े शौक से साड़ियाँ खरीदीं। निःसंदेह हम सबको साड़ियाँ बहुत पसंद आयी थीं। हम सभी ने एक ही डिजाइन की अलग-अलग रंग की साड़ियाँ ली थीं और यह सोचकर खुश हो रहे थे कि पत्नियाँ खुश होंगी। दिल्ली आने पर पता चला कि किसी की भी पत्नी को साड़ी पसंद नहीं आयी। आखिर मूर्ख ही साबित हुए।
उदयपुर की यात्रा यादों में कैद होकर रह गई। राणा प्रताप की हल्दीघाटी, चेतक का शौर्य, रक्त तलाई का इतिहास, राणा उदय सिंह का सिटी पैलेस और पिछोला लेक बहुत कुछ कह गए, बहुत कुछ दे गए।
(21 सितंबर, 2019)
घर वापसी :                      उदयपुर रेलवे स्टेशन पर 


Friday, 27 September 2019

Haldighati and Nathdwara

यात्रा संस्मरण

शौर्य एवं स्वाभिमान की भूमि हल्दीघाटी

                                                        -हरिशंकर राढ़ी

राणा प्रताप स्मारक  पर लेखक      
हल्दीघाटी की भूमि पर पहुँचकर जैसे एक बहुत लंबी अभिलाषा पूरी हुई थी। स्मारक के चबूतरे पर चेतक पर सवार की विषाल मूर्ति देखना तथा उस काल को महसूस करना रोमांचक ही नहीं, स्वाभिमान, देशभक्ति और उच्च जीवनमूल्यों से जैसे साक्षात्कार करना था। हल्दीघाटी -- अरावली पर्वतमाला में उदयपुर के पास पहाड़ियों के बीच एक छोटा सा रणक्षेत्र विदेशी आक्रांता मुगलवंशज अकबर की विशाल  सेना और स्वाभिमान के प्रतीक राणा प्रताप के बीच हुए भयंकर यु़द्ध का साक्षी है। यह वह युद्ध था जिसमें दस हजार राजपूत सैनिकों की आत्माहुति की भावना तथा स्थानीय वनवासी भीलों के सहयोग से राणा ने मुगलसेना के दाँत खट्टे कर दिए थे। यदि उस युद्ध में चेतक घायल नहीं होता तो निश्चित ही परिणाम कुछ और होता !

यह सच है कि बालमन पर पड़ी छाप को छुड़ा पाना बहुत मुश्किल होता है। हमारे समय में प्राथमिक कक्षाओं में राणा प्रताप के घोड़े चेतक पर एक कविता पढ़ाई जाती थी ‘रणबीच चौकड़ी भर-भरकर चेतक बन गया निराला था’ जिसे वीररस के प्रसिद्ध कवि श्यामनारायण पांडेय ने लिखा। इस कविता को बहुत ही ओज के साथ पढ़ाया जाता था। लगभग सभी बच्चों की जु़बान पर यह चढ़ी हुई थी। हम राणा प्रताप और उनके घोड़े चेतक की वीरता और साहस की कल्पना अपने-अपने हिसाब से करते। तभी से हल्दीघाटी और चेतक मन में बैठे हुए थे। चार-पाँच साल पहले जब चित्तौड़गढ़ की यात्रा पर गया तो हल्दीघाटी जाने की उत्कंठा और बढ़ गई। अंततः इस वर्ष अपनी भ्रमणसूची में उदयपुर-हल्दीघाटी पर टिक का निशान लग ही गया।

जून में ही सहयात्रियों की तलाश पूरी करके अगस्त माह के लिए योजना बना लिया। इस बार की यात्रा में पचमढ़ी यात्रा के मेरे सभी पाँच साथी सहर्ष शामिल हो गए। उपेंद्र कुमार मिश्र, बद्रीप्रसाद यादव, युवराज सिंह, ज्ञानचंद और ज्ञानसागर मिश्र जी के साथ कुछ छह जनों का आरक्षण चेतक एक्सप्रेस में कर लिया। कभी - कभी लगता है कि हमारी सरकारें भी अच्छे नाम रख सकती हैं। उदयपुर जाने वाली गाड़ी का नाम चेतक पर हो, इससे अच्छा और कुछ नहीं हो सकता। यह नाम अनेक तर्कां से सही लगता है। चेतक एक्सप्रेस गाड़ी बहुत पुरानी है। जब दिल्ली से उदयपुर - अहमदाबाद रेलपथ छोटी लाइन का था, तब भी मैं एक बार चेतक से उदयपुर निजी काम से गया था। सन् 2002 की बात होगी। यादें धुंधली हो गई थीं। पर इतना जरूर ध्यान में था कि उदयपुर एक अच्छा शहर है, यहाँ की संस्कृति और सभ्यता प्रशंसनीय है। लोग बहुत ही सहयोगी तथा आतिथ्य करने वाले हैं।

उस बार उदयपुर में केवल सहेलियों की बाड़ी देखने का अवसर मिला था। अब मैं उस यात्रा को भूल ही नहीं चुका हूँ, याद भी नहीं रखना चाहता। तबसे बहुत बदलाव आया है। हम दस अगस्त की सुबह आठ बजे उदयपुर जंक्शन पहुंच गए। योजनानुसार हमें पहले होटल लेकर नहाना-धोना था। उसके बाद नाथद्वारा, हल्दीघाटी और एकलिंग जी के लिए निकलना था। कुल दूरी लगभग सवा सौ किलोमीटर होगी। अगले दिन पाँच बजे चेतक से वापसी थी। सुरक्षित यही होता है कि पहले दूर के स्थानों को घूम लिया जाए। जिस दिन वापसी हो, उस दिन आस-पास की जगहें देखी जाएँ। इससे गाड़ी छूटने का खतरा नहीं रहता। मुझे पहली यात्रा से ज्ञात था कि बस स्टैंड के पास हमारी पसंद और बजट के होटल मिल जाएँगे। बस स्टैंड रेलवे स्टेशन से लगभग एक किलोमीटर होगा।

योजनानुसार होटल से गाड़ी करके निकले तो रिमझिम फुहारें पड़ रही थीं। मौसम बहुत सुहावना था। हमारी यात्रा में एक स्थल और जुड़ गया था, और वह था घसियार। यह वह जगह है जहाँ श्रीनाथ जी के विग्रह को आक्रांताओं के भय से नाथद्वारा से कुछ दिनों के लिए लाया गया था। गाड़ी को एक जगह रुकवाकर जोधपुरी कचौरियों का नाश्ता किया गया। उदयपुर से घसियार की दूरी लगभग 21 किलोमीटर है और यह राजमार्ग संख्या 72 पर स्थित है।

राणा प्रताप स्मारक                 छाया : हरिशंकर राढ़ी 
घसियार :
यह स्थान राजमार्ग पर शांत से वातावरण में स्थित है। दूर-दूर तक दिखती हुई छोटी पहाड़ियाँ, मानसून की हरियाली और रिमझिम फुहारें मन को प्रफुल्लित कर रही थीं। निश्चित रूप से पहले यह अज्ञात सा स्थान रहा होगा। आज भी न कोई भीड़-भाड़ और न कोई शोरगुल। खुले से वातावरण में श्वेत रंग में चमकता यह मंदिर बहुत शांत लग रहा था। घसियार मंदिर वह जगह है जहाँ कुछ दिनों के लिए भगवान श्रीनाथ का विग्रह छिपाकर रखा गया था। किसी समय पिंडारियों ने नाथद्वारा पर आक्रमण कर दिया और बहुत लूट-खसूट की। इसी समय जसवंत राव होल्कर तथा दौलतराव सिंधिया के बीच भयानक युद्ध हुआ जिसमें होल्कर पराजित हुआ। यह 1801 ई0 के आसपास का काल था। वहाँ से होल्कर नाथद्वारा आया और पीछे से सिंधिया की सेना भी। नाथद्वारा का वैभव देखकर उसने तीन लाख स्वर्णमुद्राओं की माँग रखी। उसकी नजर श्रीनाथ जी के मंदिर पर थी। खतरे को भाँपते हुए मेवाड़ के राजा ने श्रीनाथ जी के विग्रह को घसियार के बीहड़ों में निर्माणाधीन मंदिर में स्थापित करवा दिया। यह मूर्ति घसियार में कुछ काल तक रही। कहा जाता है कि श्रीनाथ जी की यह मूर्ति वृंदावन से लायी गयी थी। नाथद्वारा में शांति स्थापित हो जाने के बाद विग्रह को वापस लाया गया। अब घसियार में श्रीनाथ जी की काले रंग की एक बड़ी मूर्ति है। मंदिर गर्भगृह में फोटोग्राफी निषिद्ध है, इसलिए हम अंदर का कोई चित्र नहीं ले पाए। हाँ, परिसर में फोटोग्राफी की जा सकती है। गर्भगृह तथा विग्रह के अतिरिक्त हमने यथोचित फोटो खींचे।


राणा प्रताप संग्रहालय        छाया : हरिशंकर राढ़ी 
हल्दीघाटी तथा राणा प्रताप संग्रहालय : घसियार की रिमझिम फुहार में हम हल्दीघाटी के पावन स्थल पर पहुँच गए। सर्वप्रथम हमारे ड्राइवर महोदय हमें राणा प्रताप संग्रहालय ले गए। वैसे तो बाहर से हमने इस संग्रहालय को असली युद्धस्थल समझा। दरअसल, टिकट लेकर प्रांगण में प्रवेश करते हमें चेतक की एक विशालकाय प्रतिमा दिखी, जिससे अंदाजा हुआ कि यही मुख्य हल्दीघाटी होगी। इसी प्रांगण में हल्दीघाटी के युद्ध की प्रमुख झाँकियाँ बनाई गई हैं। राणा प्रताप के घोड़े चेतक ने राजा मानसिंह के हाथी के मस्तक पर अपने पाँव रखे थे। वही विंदु हल्दीघाटी के युद्ध का निर्णायक मोड़ था। वह दृश्य भी मूर्तिकला के माध्यम से जीवंत उतारा गया है।


राणा प्रताप संग्रहालय में चेतक        छाया : हरिशंकर राढ़ी 


  वस्तुतः  असली हल्दीघाटी यहाँ से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर है। न जाने इस देश में कौन सी मानसिकता की हवा चली कि राणा प्रताप, वीर शिवाजी और झाँसी की रानी जैसे वीर आत्मबलिदानियों को सरकारी स्तर पर बहुत उपेक्षित किया गया। जितना यशोगान अकबर ‘महान’ का हुआ, उसका आधा भी राणा प्रताप का नहीं हुआ। सुभद्रा कुमारी चौहान जैसी कवयित्री न होतीं तो शायद रानी झाँसी की वीरगाथा इतिहास में दबकर ही रह गई होती। राणा प्रताप के नाम पर यहाँ सरकारों द्वारा एक स्मारक भी नहीं बनवाया गया था। इस बात से दुखी होकर एक सामान्य से शिक्षक मोहनलाल श्रीमाली ने राणा प्रताप म्यूजियम का निर्माणकार्य अपने दम पर शुरू किया। श्रीमाली जी ने अपने गुरु और स्वतंत्रता सेनानी एवं संविधान सभा के सदस्य बलवंत सिंह मेहता की प्रेरणा से इस कठिन कार्य का बीड़ा उठाया। इस म्यूजियम के लिए उन्होंने अपना पूरा वेतन तो लगाया ही, अपना घर तक बेच देने में जरा सा संकोच नहीं किया। बाद में कुछ सहायता सरकार से भी प्राप्त हुई और अंततः इस म्यूजियम का सपना साकार हो पाया। आज भी म्यूजियम की कमाई को इसके विस्तार में लगाया जा रहा है। म्यूजियम में एक छोटा ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रम होता है जो केवल राणा प्रताप की वीरता और संघर्श की झलकियाँ ही नहीं दिखाता, अपितु मुगलकालीन भारत का इतिहास भी बताता है। इसके अतिरिक्त आंतरिक भाग में राणा प्रताप के वनवास, भीलों के सहयोग, भामाषाह की दानवीरता तथा राणा प्रताप के घोड़े चेतक का घायल अवस्था में अपने स्वामी को रणभूमि से लेकर भागना एवं प्रताप के भाई शक्ति सिंह का मिलना झाँकियों के माध्यम से दिखाया गया है।

राणा प्रताप संग्रहालय के सामने लेखक 
हल्दीघाटी का युद्ध : मुगल शासक अकबर अपने विस्तारवादी नीतियों एवं अहंकार के चलते भारत के तमाम स्वतंत्र रजवाड़ों को अपने साम्राज्य में मिलाना चाहता था। उसकी सेना बड़ी थी तथा उसमें तोपची भी थे। जिन राजाओं ने अकबर की दासता स्वीकार कर ली, उन्हें बड़ी दीवानी लेकर छोड़ दिया गया। इस नीति में देश के अनेक राजा शामिल हो गए तथा अकबर के अधीन राज करने लगे। किंतु मेवाड़ के राजा राणा प्रताप को यह बात स्वीकार नहीं हुई। वे एक सच्चे राजपूत थे और राणा उदयसिंह के वंषज थे। मेवाड़ छोटा राज्य जरूर था, किंतु उसका साहस और सम्मान छोटा नहीं था। जहाँ अनके राजपूत राजा अकबर की दासता स्वीकार कर चुके थे, राणा प्रताप अपने स्वाभिमान का झंडा उठाए चल रहे थे। अकबर के सामने उनकी शक्ति बहुत कम थी। आमेर के राजा तथा राणा के रिश्ते  के भाई मानसिंह अकबर के दरबारी बन चुके थे और पूरी तरह उसके अधीन थे। यही नहीं, वे अकबर के लिए राणा के मुखबिर भी थे। लेकिन राणा अपने स्वाभिमान पर अडिग रहे। अकबर से युद्ध में चित्तौड़ का अजेय दुर्ग निकल चुका था और राणा प्रताप अरावली की उपत्यकाओं में भटक रहे थे।

राणा का जन्म सन् 1540 ई में हुआ था और 1572 ई0 में उनका राज्याभिषेक  हुआ था।। लगभग छत्तीस वर्ष  की उम्र में सन् 1576 में 18 जून को अकबर की विशाल  सेना के विरुद्ध राणा ने छोटी सी सेना लेकर पारंपरिक हथियारों से भयंकर युद्ध लड़ा। इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व राजा मानसिंह कर रहे थे जबकि राणा की सेना के सेनापति हाकिम खान सूर थे जो अपने अफगानी विष्वस्तों व राजपूतों की बहादुर सेना लेकर लड़ रहे थे। इस युद्ध की खासियत यह भी थी कि जहाँ अकबर का सेनापति हिंदू था वहीं राणा का मुस्लिम। ऐसा संयोग इतिहास में विरले ही मिलता है। सैनिकों की संख्या के विषय  में इतिहासकार एकमत नहीं हैं, किंतु अधिकतर यही मानते हैं कि अकबर की सेना में दस हजार सेनिक थे जिनमें चार हजार राजपूत थे, जबकि राणा की सेना में तीन हजार सैनिक और चार सौ भील थे जो धनुष  बाण से पारंपरिक युद्ध कर रहे थे। इस युद्ध में मुगल आंशिक   रूप से विजयी रहे किंतु राणा को पकड़ने में सफल नहीं हुए। यह युद्ध अरावली पर्वतमाला में जिस जगह हुआ, वहाँ की मिट्टी हल्दी की तरह पीली थी, इसलिए इसे हल्दीघाटी कहा जाता है।

हल्दीघाटी के उपरोक्त युद्ध में राजा मानसिंह अकबर के सेनापति थे। यह सहज ही कल्पनीय है कि कोई भी अपने भाई को शत्रुसेना की कमान सँभाले देखेगा तो उसका खून प्रतिशोध  की आग में खौलेगा ही। राणा अपने घोड़े चेतक पर सवार होकर युद्ध कर रहे थे कि उन्हें सामने मानसिंह हाथी पर सवार दिख गए। वहीं राणा ने चेतक को एड़ लगाई और वह मानसिंह की हाथी के मस्तक पर दोनों पैर लगाकर खड़ा हो गया। राणा प्रताप ने मानसिंह पर बरछे का सधा हुआ वार किया किंतु मानसिंह हाथी के हौद में छिपकर जान बचाने में कामयाब रहा। इस बीच मानसिंह के हाथी ने अपनी सूँड़ में बँधी तलवार से चेतक के पिछले पैर पर वार कर दिया और घोड़ा घायल होकर गिर पड़ा। उल्लेखनीय यह है कि चेतक के मस्तक पर हाथी का मुखौटा लगाया गया था जिससे हाथियों को धोखे में रखा जा सके। चेतक सहित राणा को गिरा हुआ देखकर मुगल सेना उन पर टूट पड़ी किंतु उसी समय राणा के सैनिक झालामान सिंह ने राणा प्रताप की पगड़ी और वेश  धारण कर खतरा खुद पर ले लिया। चेतक घायलावस्था में फिर उठा तथा अद्भुत शौर्य एवं स्वामिभक्ति का परिचय देता हुआ राणा को लेकर युद्धभूमि से राणा को बचा ले गया।

इस युद्ध में अन्य बातों के साथ राणा और मानसिंह की किस्मत ने भी बहुत बड़ी भूमिका निभायी। यदि मानसिंह पर राणा का वार सफल होता तो इतिहास अलग होता। यदि चेतक घायल नहीं होता तो मानसिंह पर राणा का दूसरा वार होता जिसमें मानसिंह बच नहीं पाता। किंतु इन दोनो ‘यदि’ के न होने पर भी अकबर को उतनी हानि नहीं होती जितनी राजपूताने की होती। यह बात मानसिंह जैसे अवसरवादियों की समझ में नहीं आती जो अपने अस्थायी सुख और मान के लिए अपने ही देश के विरुद्ध विदेशियों का साथ देने में नहीं चूकते। यह परंपरा तबसे लेकर अंगरेजी काल तक जारी रही। इतिहास की चूकों पर हमें कष्ट होना स्वाभाविक था। वैसे भी हमारे दल में इतिहास के दो प्रवक्ता थे, ऐतिहासिक चर्चाएँ होनी ही थीं। अंततः ले-देकर पश्चात्ताप के अतिरिक्त हमारे पास बचा ही क्या था?

महाराणा प्रताप संग्रहालय को ठीक से देखकर निकले तो बाहर ढाबेनुमा चाय-जलपान की दूकानें थीं। इन खुली दूकानों पर मुझे चाय पीना और माहौल का आनंद लेना बहुत अच्छा लगता है। ऊपर से हल्की फुहारें पड़ रही थीं जिनमें खराब चाय भी अच्छी लगने लगती है। वहाँ बैठकर चायपान का दौर चला, हँसी-मजाक के साथ कुछ देर बैठे रहे। कुछ यात्री सजे-धजे ऊँटों पर सवारी कर रहे थे जिसमें सवारी कम फोटो खिंचाई ज्यादा थी।

महाराणा प्रताप स्मारक : यहाँ से निकलकर हमारा अगला पड़ाव महाराणा प्रताप स्मारक था जो संग्रहालय से आधा किलोमीटर के लगभग होगा। एक पहाड़ी के समतल शिखर पर चेतक पर सवार राणा प्रताप की एक विशाल मूर्ति है। आस-पास साज-सज्जा भी अच्छी है। ऊँचे चबूतरे पर चेतक सहित राणा प्रताप की मूर्ति बहुत शानदार और गौरवशाली लगती है। चूँकि यह स्मारक ऊँचाई पर है तथा चारो ओर खुली प्रकृति है, इसलिए यहाँ ठहरना बहुत अच्छा लगता है।

प्रताप स्मारक से नीचे उतरते ही चेतक स्मारक है। यह वही जगह है जहाँ हल्दीघाटी से राणा प्रताप को लेकर भागा हुआ चेतक वीरगति को प्राप्त हुआ था। इस बीच उसने एक नाले की छलाँग भी लगाई थी। यह भी कहा जाता है कि जब चेतक के घायल होने पर हल्दीघाटी से राणा प्रताप भागे तो शक्ति सिंह ने देख लिया और उनके पीछे लग गया। शक्ति सिंह राणा प्रताप के भाई लगते थे और वे भी मुगलों की तरफ थे। जहाँ चेतक गिरा, वहाँ शक्ति सिंह पहुँच गये। किंतु वहाँ शक्ति सिंह का भ्रातृप्रेम जाग गया और वार करने के बजाय उन्होंने अपना घोड़ा राणा प्रताप को दे दिया और वहाँ से भाग निकलने में मदद की। चलिए, कुछ तो अच्छा हुआ।

चेतक स्मारक का महत्त्व भी कम नहीं है, हालाँकि यह जगह कोई बहुत बड़ी और प्रचारित नहीं है। पशुओं की स्वामिभक्ति की बहुत सी कहानियाँ लोक में व्याप्त हैं, लेकिन चेतक सही अर्थों में स्वामिभक्त ही नहीं, देशभक्त था। उसने राणा की आन-बान की रक्षा के लिए अपनी जान दे दी। संभवतः चेतक ही एक पशु है जिस पर कवियों ने गीत और कविताएं लिखीं। जहाँ वीररस के प्रसिद्ध कवि श्याम नारायण पांडेय ने ‘रण बीच चौकड़ी भर-भरकर चेतक बन गया निराला था’ जैसी कविता लिखी, वहीं ‘जय चित्तौड़’ फिल्म के लिए भरत व्यास ने ‘ओ पवन वेग से उड़ने वाले घोड़े’ जैसा लोकप्रिय गीत लिखा जिसे लता मंगेशकर ने गाया।

ऐसे देशभक्त घोड़े को विनम्र श्रद्धांजलि देकर हम आगे बढ़े - हल्दीघाटी की असली युद्धभूमि की ओर। महाराणा प्रताप स्मारक से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर हल्दीघाटी का ऐतिहासिक युद्ध हुआ था। यहाँ की मिट्टी वाकई हल्दी जैसी पीली है। कहा जाता है कि जून 1576 के उस युद्ध में इतनी लाशें गिरीं की वहाँ खून का तालाब बन गया जिसे रक्त तलाई कहा जाता है। जब हम यहाँ पहुँचे तो बारिश ने ज्यादा जोर पकड़ लिया था, इसलिए वहाँ रुककर उस पवित्रभूमि को नमन करना मुष्किल था। हमने चलती गाड़ी से ही हाथ जोड़े और आगे बढ़ गए, बस यह सोचते हुए कि ऐसे सपूत बहुत कम पैदा होते हैं।

हल्दीघाटी से बाहर निकलते ही बादशाह बाग है जिसमें मुगल सेना ने डेरा डाला था। राणा प्रताप की सेना का पहला मुकाबला यहीं हुआ था। आज यह बाग पार्क के रूप में संरक्षित है। सामने सुंदर पहाड़ियाँ हैं। मानसून में यहाँ आना अच्छा लगा।
नाथद्वारा : राजस्थान के धार्मिक स्थलों में नाथद्वारा और एकलिंग जी बहुत ही मान्य और प्रसिद्ध हैं। जो भी पर्यटक उदयपुर के आसपास के स्थलों का भ्रमण करने जाते हैं, उन्हें टूर संचालक या टैक्सी वाले नाथद्वारा तथा एकलिंग जी जरूर ले जाते हैं। नाथद्वारा वैसे भी राजस्थान के ऐतिहासिक स्थलों में माना जाता है। यह एक धार्मिक और साहित्यिक नगरी है। हमारे चालक महोदय भी बादशाह बाग के बाद हमें नाथद्वारा ले गए। आजकल नाथद्वारा में भगवान शिव की एक बहुत ऊँची मूर्ति निर्माणाधीन है। यह चलन इन दिनों कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। दिल्ली के महिपालपुर की शिवमूर्ति तो ऊँची थी ही, बाद में करोलबाग में हनुमान जी की 108 फीट ऊँची मूर्ति बनी तथा दिल्ली के ही आद्या कात्यायनी मंदिर छतरपुर परिसर में संभवतः इससे भी बड़ी मूर्ति स्थापित हुई।

हमारी इनोवा कैब वहीं पार्क हो गई क्योंकि बाहरी बड़ी गाड़ियाँ नाथद्वारा नगर में प्रवेश नहीं पातीं। वहाँ से हमने श्रीनाथ जी के मंदिर तक जाने के लिए फटफट ऑटो किया और आ गए।


नाथद्वारा मंदिर के सामने लेखक , ज्ञानचंद जी  और युवराज सिंह      
श्रीनाथ जी के दर्शन और भीड़ : अधिकांश प्राचीन एवं महत्त्वपूर्ण मंदिरों की भांति श्रीनाथ जी के मंदिर में भी दर्शन का समय निर्धारित है। शृंगार-पूजन-आरती के लिए मंदिर बार-बार बंद होता है जिससे भीड़ बढ़ती जाती है। एक तो मंदिर का रास्ता तंग गलियों से होकर निकलता है और ऊपर से उसमें प्रसाद वालों तथा दूसरे दूकानदारों का कब्जा। किसी भी पुराने धार्मिक स्थल जैसा दृश्य। क्योंकि मंदिर बहुत पुराना है और इसके आस्थावान भक्तों की संख्या बहुत बड़ी है, इसलिए दर्शन सहजता से हो पाना आसान नहीं। मंदिर में प्रवेश के बाद पुरुषों-महिलाओं की लाइन अलग-अलग हो जाती है। दर्शनार्थियों को एक-एक करके छोड़ने के बजाय समूह में छोड़ा जाता है जिससे रेलम-पेल मच जाती है। प्रथम दर्शन ठाकुर जी के होते हैं, इसके बाद उनके पालने की ओर बढ़ते हैं जहाँ धक्का-मुक्की कुछ ज्यादा ही मिलती है। हालाँकि जब हम गए थे तो कोई विशेष पर्व या समय नहीं था।

जो भी हो, श्रीनाथ जी का मंदिर बहुत प्राचीन है, इसमें संदेह नहीं। कहा जाता है कि श्रीनाथ जी का विग्रह ब्रज से लाया गया था तथा इसे 20 फरवरी 1672 ई0 को यहाँ स्थापित किया गया था। पहले इस गाँव का नाम सिहाड़ था जिसे श्रीनाथ जी के पधारने पर नाथद्वारा कर दिया गया। जब पिंडारियों ने नाथद्वारा में घुसकर तोड़-फोड़ की तो श्रीनाथ जी के विग्रह को गोपनीय ढंग से घसियार पहुँचा दिया गया था। बाद में शांति स्थापित होने पर उन्हें फिर से इस मंदिर में स्थापित किया गया।

ऐसा माना जाता है कि श्रीनाथ जी का मंदिर वृंदावन के नंद महराज मंदिर की शैली में बनाया गया है। इसके शिखर पर सुदर्शन चक्र अंकित सात ध्वज फहराते रहते हैं जो पुष्टिमार्ग या वल्लभी संप्रदाय के सात भवनों का प्रतीक है। मंदिर को इसी संप्रदाय की भाषा में ‘श्रीनाथजी की हवेली’ कहा जाता है। श्रीनाथजी को ठाकुर जी भी कहा जाता है।


एकलिंग जी मंदिर  का द्वार        छाया : हरिशंकर राढ़ी 
एकलिंग जी मंदिर : श्रीनाथजी के दर्शन के बाद हमने शिवमूर्ति से अपनी गाड़ी पकड़ी और अब आज की यात्रा के अंतिम दर्शनीय बिंदु एकलिंग जी मंदिर की ओर बढ़ चले। दूरी ज्यादा नहीं है और बातों-बातों में कब हम पहुंच गए, पता ही नहीं चला। यह तीर्थ उदयपुर-देलवाड़ा मार्ग पर उदयपुर से लगभग 22 किमी की दूरी पर है। पहले से जुटाई गई जानकारी के अनुसार एकलिंग जी 108 मंदिरों का समूह था और हमारा अनुमान था कि मंदिर दूर-दूर फैले हांगे जिसमें समय लगेगा। लेकिन वहाँ पहुँचने पर ऐसा कुछ नहीं मिला। यह सत्य है कि एकलिंग जी में कुल 108 मंदिर हैं किंतु वे एक ही परिसर में नहीं हैं। बहुत से मंदिर आस-पास के क्षेत्र में हैं। एकलिंग जी का मंदिर अत्यंत पुराना और बहुत मान्यताप्राप्त है तथा बहुत दूर-दूर से भक्त दर्शन करने आते हैं। परिसर में अनेक मंदिर हैं जो निस्संदेह बहुत ही प्राचीन हैं तथा लगभग एक दूसरे की अनुकृति हैं। कहा जाता है कि एकलिंग जी मंदिर का निर्माण 734 ई0 में बप्पा रावल ने करवाया था। इसके अधिष्ठाता देव महादेव शिव हैं। तबसे मेवाड़ पर एकलिंग जी का एकाधिकार रहा है। यह मंदिर अनेक बार मुस्लिम शासकों द्वारा ध्वस्त कराया गया और परवर्ती राजाओं द्वारा अवशेषों से पुनः निर्मित कराया गया। यही हाल श्रीनाथ जी के मंदिर का भी हुआ था जिसपर अंतिम और सर्वाधिक हानिकारक प्रहार औरंगजेब ने करवाया था। एक संस्कृति या धर्म को अपनी संस्कृति और धर्म से पराजित ही नहीं विध्वंश करने की मानसिकता किस ईश्वर ने दी, यह मेरी समझ में तो नहीं आया।

पिरामिड के आकार में बने इस मंदिर का महत्त्व इसके भौतिक सौंदर्य से अधिक श्रद्धा एवं प्रभाव का है। मंडप केसम्मुख चाँदी से बनी नंदी की मूर्ति है जबकि दो अन्य मूर्तियाँ काले संगमरमर से बनी हैं। एक साथ बहुत सारे मंदिरों को देखना अच्छा लगता है। एकलिंग जी में स्थित सभी मंदिरों को देखने का समय हमारे पास नहीं था।सायंकाल हो गया था और हम सभी थक भी गए थे, अतः मंदिर परिसर में स्थित सभी मंदिरों को देखकर उदयपुर वापस लौट आए। निस्संदेह यह स्थान बहुत शांत है। एक छोटी सा बाजार है, जहाँ सामान्य आवष्कताओं की पूर्ति हो जाती है। उदयपुर के निकट होने से यात्री यहाँ ठहरने के बजाय वापस चले जाने को ही वरीयता देते हैं।

Wednesday, 21 August 2019

कश्मीर की कोकिला हब्बा खातून



 लल्लेश्वरी और शेख नूरुद्दीन के बाद कश्मीरी साहित्य में नाम आता है हब्बा खातून का। लल्लेश्वरी का जन्म १४वीं शताब्दी के दूसरे दशक में हुआ, नूरुद्दीन का सातवें दशक में और हब्बा खातून का जन्म हुआ १६वीं शताब्दी के छठे दशक में, एक मामूली किसान के घर।

हब्बा खातून का मूल नाम है जून। ज़ून शब्द का अर्थ कश्मीरी भाषा में है चांद। यह नाम उन्हें मिला उनके अप्रतिम सौंदर्य के कारण। कश्मीरी लडकियां वैसे भी बेहद खूबसूरत होती हैं। हब्बा को सौंदर्य के अलावा दो और गुण मिले थे; एक तो मोहक सुरीला कंठ और दूसरा कवि हृदय। गांव के मौलवी से उन्होंने पढ़ना-लिखना भी सीख लिया था।

श्रीनगर के निकटवर्ती सोंबुरा जिले के किसी गांव में जन्मी थीं वे। प्रकृति ने सौंदर्य तो इस पूरे क्षेत्र को दोनों हाथ खोलकर लुटाया है। यह पूरा इलाका है ही इतना सुंदर कि गणितज्ञ और तर्कशास्त्री भी यहां आकर कवि हो जाएं। भला जून इससे कैसे बच सकती थीं!

वह अपने खेतों-बागों में आते-जाते काम करते गाती रहती। सौंदर्य में रची-बसी कविताएं और उस पर सुरीला कंठ कौन न रीझ जाए इस पर। यहीं खेतों में रमते-खटते जून ने एक नई विधा को परवान चढ़ाया। यह विधा है लोल। कश्मीरी में लोल कहते हैं गीत को। 

लेकिन जून का यह गायन निर्बाध न चल पाया। ज़माना किसे उसकी अपनी दुनिया में रमे रहने देता है। अपेक्षाकृत कम उम्र में ही जून की शादी हो गई और जैसा कि आम तौर पर हो ही जाता था, बल्कि अब भी होता है, ये शादी हुई बेमेल। ससुराल में जून पर टूटने लगा दुखों का पहाड़।

जून गाती रहतीं और उनका गाना उनकी सास-ननद से बर्दाश्त न होता। वे जून से गुलाम की तरह काम लेना चाहती थीं और वह भी इस शर्त पर कि उनके अनमोल गुण वे बस अपने तक रखें। दुनिया को उससे रूबरू कराकर उनकी हेठी न कराएं। वही सास-बहू एपिसोड जो कमोबेश भारत के हर घर की कहानी है। यह पीड़ा उनके कुछ गीतों में भी छलकी है।

जून न मानतीं तो पति पीटता। आखिरकार हद हो गई। रिश्ता निभा नहीं, टूट गया। जून वापस अपने पिता के घर आ गईं। वहां आकर फिर वही राग। उन्हीं खेतों बागों पगडंडियों में वही गीत, वही सुर छिड़ गए। रिश्ते के साथ मन के भी टूटने से टूटी-बिखरी जून का कंठ दर्द के साथ और भी निखर गया। गीतों में केवल प्रकृति का सौंदर्य और अपना दर्द ही नहीं रहा, एक दार्शनिकता को भी जगह मिल गई।

ऐसे तो जून हब्बा कैसे बन गईं, इसका कोई स्पष्ट उल्लेख कहीं नहीं है।  लोकश्रुति यह है कि इस अलगाव के बाद किसी मौलवी ने उन्हें सुझाया कि तू अपने बिछड़े पति का नाम अपना ले। तेरी किस्मत बदल जाएगी। यह किंवदंती ही है। इसमें सच कितना है, कैसे कहा जा सकता है!

पर एक बात सच है। रिश्ते का टूटना जून का अनंत तक टूटना नहीं बना रहा। थोड़े दिनों बाद जून की किस्मत वाकई बदल गई। बदल ही नहीं गई, बल्कि कहें, पलट गई। 

हुआ यह कि किसी दिन जून अपने खेतों में काम करती वैसे ही गा रही थीं, जैसे अकसर गाती रहती थीं। संयोग, उसी वक़्त कश्मीर के उस समय के बादशाह यूसुफ शाह चाक, जो शिकार पर निकले थे, उनके कानों में जून की सुरीली आवाज पड़ी। 

यूसुफ शाह खुद को रोक न पाए। उन्होंने आवाज़ की दिशा पकड़ी तो एक चिनार के पेड़ के नीचे उन्हें गाती हुई जून मिलीं। यूसुफ ने उन्हें अपने साथ ले लिया।

एक मत यह भी है कि अपने पहले पति से जून का तलाक हुआ नहीं, बल्कि यूसुफ शाह ने कराया। ऐसा इसलिए क्योंकि यूसुफ उनकी सुंदरता और उनके कंठ पर मुग्ध हो गए थे। ऐसा कहने वालों का तर्क यह है कि इसीलिए तो जून ने अपने पति का नाम अपना लिया, अपना मूल नाम छोड़ कर। यह उनका अपने पहले पति की याद बनाए रखने का तरीका था। जून से हब्बा बन गईं। कश्मीरी में हब्बा का अर्थ है अनाज।


जनश्रुतियां यूसुफ के यहां जून यानी हब्बा के असर पर तो एकमत हैं, लेकिन हैसियत पर नहीं। एक धारा यह कहती है कि यूसुफ ने उन्हें अपनी बेगम बना लिया, मगर दूसरी धारा का मत यह है कि उन्होंने अपने हरम की तमाम औरतों में एक हब्बा को भी शामिल कर लिया।

अब जो भी हो, पर एक बात सब मानते हैं। यह कि शाह पर हब्बा का पूरा असर था। यहां तक कि राजकाज के फैसलों में भी हब्बा का पूरा दखल था। यह दखल इस हद तक था कि दूसरे शाहों या रजवाड़ों से उन्हें कैसे रिश्ते रखने हैं, यह भी हब्बा के बिना वे तय नहीं कर सकते थे।

इसी बीच दिल्ली सल्तनत का पैगाम आया, यूसुफ शाह चाक को। सम्राट अकबर का पैगाम यह था कि यूसुफ या तो उनकी अधीनता स्वीकार कर लें या फिर जंग के लिए तैयार हो जाएं। 

जैसा कि अकसर होता ही था, इस विषय पर भी यूसुफ शाह और हब्बा खातून की बात हुई। कवि मन राज्य और जनता की भलाई को चाहे जितनी बारीकी से समझता हो पर सियासत के पेचोखम और सल्तनत की जोर आजमाइश के खेल को तो वह क्या ही समझता। हब्बा को यह बात अपने स्वाभिमान के खिलाफ लगी और उन्होंने अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया।

आखिरकार जंग हुई और अपनी पूरी ताकत झोंक कर यूसुफ शाह अपनी स्वतंत्रता बचाने में सफल भी रहे। लेकिन अकबर बादशाह इतने से मान जाने वाला कहां था! थोड़े ही दिनों बाद उसने दुबारा जंग छेड़ दी। अकबर का ताकतवर साम्राज्य तो आसानी से झेल सकता था, पर यूसुफ जैसे छोटे शाह के लिए इसे झेलना बहुत मुश्किल पड़ा।

जीत तो गए यूसुफ पर बुरी तरह टूट भी गए। अब एक और जंग झेलने की हैसियत उनकी नहीं रह गई थी। उधर बहुत वक़्त न देते हुए अकबर ने उन्हें फिर पैगाम भेजा। इस बार पैगाम बातचीत का था।

लोकश्रुति यह है कि हब्बा ने इस सुलह वार्ता के लिए भी यूसुफ शाह को मना किया। हब्बा ने इस संधि से रोकने की हर संभव कोशिश की लेकिन यूसुफ माने नहीं। वे सुलह के लिए गए। जैसा कि हब्बा ने पहले ही अंदेशा जताया था, वही हुआ। अकबर ने यूसुफ शाह के दिल्ली पहुंचते ही उन्हें बंदी बना लिया।

बंदी बनाकर यूसुफ शाह को पहले बंगाल भेजा गया, फिर वहां से उन्हें बिहार लाया गया। वहीं जेल में ही उनकी मौत हो गई।

हब्बा को लेकर जनश्रुतियां यहां दो तरह की हैं। एक तो यह कि यूसुफ शाह के इस फैसले को हब्बा बर्दाश्त न कर सकीं। जैसे ही उन्होंने दिल्ली के लिए कूच किया, हब्बा महल से निकल गईं। दूसरी यह कि हब्बा ने उनका संदेश आने का इंतजार किया। पर जब आखिर में उन्हें पता यह चला कि हम तो मुगलों के मातहत हो गए, उन्होंने महल छोड़ दिया।

अब छोड़ा जब भी हो, पर ये तो तय है कि घर उन्होंने छोड़ दिया। घर छोड़कर वो जंगलों में चली गई। एक मत यह है कि वे गुरेज घाटी के जंगलों में आ गई। कुछ यह भी कहते हैं कि कहीं और चली गई लेकिन ये तय है कि एक दो साल तक वह किसी को दिखी नहीं और जब दिखीं तो तापस वेश में। उसी गुरेज की घाटी में ही। 

बाकी जीवन अपना उन्होंने वहीं गुजारा। उनका निधन 17वीं शताब्दी के पहले दशक में ही हुआ। श्रीनगर से जम्मू हाइवे पर ही एक जगह है अठवाजन, वहीं। उनकी कब्र वहीं है।

लेकिन कश्मीर में लोकविश्वास यह है कि हब्बा आज भी गुरेज की घाटी में मौजूद हैं। उनकी आत्मा वहां भटकती रहती है। उनके नाम पर वहां एक पहाड़ी का नामकरण भी कर दिया गया है। कहा जाता है कि इसी पहाड़ी के इर्द गिर्द वह भटकती रहती हैं और अपने प्रिय यूसुफ शाह चाक को तलाश करती रहती हैं।

हब्बा के गीतों में एक विरहिन की बेचैनी, प्रिय से मिलन की आस और उसकी आतुरता, शुरू से अंत तक दिखाई देती है। 

कश्मीर की इस कोकिला की रचनाओं का बहुत सुंदर अनुवाद मैंने जम्मू के रचनाकार अग्निशेखर का किया हुआ कहीं पढ़ा है। नेट पर कहीं मिल गया तो कमेंट में लिंक दूंगा।


भरमा ले तुम्हें कौन सौतन मेरी
क्यों बिछड़ गए तुम मुझसे

दूर करो मलाल जो भी हो
मैंने दिल में बसाया है तुझे
क्यों बिछड़ गए तुम मुझसे

आधी रात तक खोल रखे दरवाजे मैंने
किस बात पर तुम रूठे मुझसे
क्यों बिछड़ गए तुम मुझसे

झुलस गया है तन मन विरह की आग में
ये खून के आंसू ये लाल बदामी आंखें
क्यों बिछड़ गए तुम मुझसे।

©इष्ट देव सांकृत्यायन