Thursday, 2 May 2013

Aachar ka Yuddh

आचार का युद्ध   (दूसरी किश्त )
                  -हरिशंकर  राढ़ी 

 भ्रष्टाचार  से लड़ने का एक हथियार ढूँढ़ निकाला गया है। यह इस युद्ध की अब तक की सबसे बड़ी सफलता है। सभी जानते हैं कि आधुनिक युद्ध शारीरिक या मानसिक बल से नहीं लड़े जाते। नए युद्ध पूरी तरह हथियारों पर निर्भर हैं। इसीलिए दुनिया के सारे देश  हथियारों की साधना में लगे हैं। पड़ोसी तो हथियारों के दम पर कई युद्ध लड़कर और हारकर भी हथियारों की बटोर में लगे हैं। कलेजा भले ही बकरी का हो पर तलवार तो राणा प्रताप की ही चाहिए। बाजरे की रोटी का ठिकाना भले न हो, पर कर्ज लेकर परमाणु अस्त्र तक बनाएंगे। ऐसी स्थिति में भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में हथियार का निश्चित  हो जाना कोई कम बात नहीं है। मजे की बात यह है कि दोनों ही दलों ने एक ही प्रकार के हथियार का चयन किया है। वह महत्त्वपूर्ण हथियार है कानून। सबसे बड़ी बात है कि कानून के हाथ बड़े लम्बे होते हैं, ऐसा यहाँ अज्ञातकाल से माना जाता है। पहले भगवान के हाथ लम्बे होते थे, बाद में कानून के होने लगे। हाथ लम्बे होने का फायदा यह होता है कि आप नजदीक गए बिना यानी दूर से ही दुश्मन  पर वार कर सकते हैं; खतरा कम होता है।

 बहरहाल, विरोधी दलों की जबरदश्त  खींचतान में यह निश्चित  हो गया है कि हथियार के रूप में कानून का ही इस्तेमाल किया जाएगा। दोनों सेनाएं युद्ध भ्रष्टाचार के विरुद्ध करेंगी, लेकिन वार करेंगी एक दूसरे पर। दोनों सेनाओं में कोई बराबरी नहीं है। एक सेना में संख्याबल ज्यादा है तो दूसरी में छलबल। छलबल वाली सेना रथ पर सवार है जबकि संख्याबल वाली सेना पैदल है। रथ पर सवार सैनिक कम भले हों, पर वे भ्रष्टाचार दल के महारथी हैं। उनकी प्रतिभा एवं हस्तकौशल  का कोई जवाब नहीं। हाथ तो हाथ, उनकी जिह्वा से भी तीर छूटते हैं। वे एक साथ कई तीर चला सकते हैं और निशाचरी युद्ध में निष्णात  हैं। अभी कुछ दिनों पहले उन्होंने इस बात को सिद्ध भी कर दिया था जब आधी रात को भ्रष्टाचार विरोधी एक योगी को एक ही बाण से राजधानी से काफी दूर पर्वतराज हिमालय की उपत्यकाओं में फेंक दिया था। हमारे यहाँ योगियों के लिए हिमालय को संरक्षित क्षेत्र घोषित  किया गया है। उचित व्यवस्था है। जब राजागण योग के मामले में दखल नहीं देते तो योगीजन राज्य के मामले में दखल क्यों दें?
 
भ्रष्टाचार के महारथी भ्रष्टाचार विरोधी सैनिको के गणवेश  में युद्धक्षेत्र में शंख  फूँक चुके हैं। जनता-जनार्दन एक तलवार लेकर आई है। वह चाहती है कि उसकी तलवार से लड़ाई लड़ी जाए। यह तलवार न तो पूजित है और न विशेष  मंत्रों से अभिसिंचित। इसमें गुण इतना ही है कि यह फौलाद की बनी है और इसे चलाना आसान है। उनका कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिए वे जो तलवार ले आए हैं, वह जनता की तलवार से बढि़या है। इसे मान लेना चाहिए। जब उनका खाना-पीना, कपड़ा-लत्ता, रहन-सहन, धन-दौलत और वेतन-भत्ता जनता से बढि़या है तो तलवार तो बढि़या होगी ही। इसी तलवार से वे न जाने कितने युद्ध लड़ चुके हैं और कोई बाल तक बाँका नहीं कर सका है। ये तलवार चमत्कारी है जो सदैव दूसरों की ही गर्दन काटती है और अपने मालिक की बचा देती है। उन्होंने  एक नई तलवार बनाने की सोची है जो दुश्मन  पर कम और हमलावर पर ज्यादा वार करेगी। इधर जनता ज्यादा हमलावर बनने लगी है, कानूनी हथियार चाहिए उसे। इसलिए उन्होंने एक विशिष्ट  तांत्रिक अनुष्ठान  करवाकर यह तलवार बनवाई है। यह तलवार युद्ध में किसी के द्वारा भी चलाई जाए पर रक्षा करेगी अपने निर्माता की। ले जाओ इस तलवार को; पता चलेगा कि मियाँ की जूती, मियाँ का सिर किसे कहते हैं।
 
 इधर एक समझौता हो गया है कि जनता अपनी तलवार जमा करा दे। उसकी जांच की जाएगी। एकाध व्यक्तिगत तलवारें भी जमा हैं। हथियार विशेषज्ञ सबकी जांच करेंगे। यदि जनता की तलवार में कोई एकाध हिस्सा अच्छा पाया गया तो उसका प्रयोग महारथियों की तलवार में कर लिया जाएगा और भ्रष्टाचार को मार गिराया जाएगा। इतिहासकारों का मानना है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध युद्ध युगों-युगों से लड़ा जा रहा है। यह बड़ा मायावी है और इससे कोई जीत नहीं सका है। यह परकाया प्रवेश  में माहिर है और प्रभावशाली  एवं उच्च पदासीन लोगों की काया में प्रवेश  कर जाता है। जिसकी काया में प्रवेश करता है वह धन्य हो जाता है और चाहता है वह काया में ही में ही बना रहे। उसके शरीरस्थ  रहने से जीवन धन्य हो जाता है। अब आत्मा की भाँति शरीर में बैठे भ्रष्टाचार का पता लगा पाना या उसका समूल नाश  कर पाना संभव है क्या?


 इसीलिए महत्त्वपूर्ण और पहुँचे हुए लोगों का यह मत समर्थन योग्य है कि यह लड़ाई बन्द कर देनी चाहिए। कोशिश भी की जा रही है कि अर्जुन को किसी तरह बन्धु-बान्धवों के बीच लाकर खड़ा कर दिया जाए और वह अपने कुल के विनाश  का भावी दृश्य  देखकर पुनः मोहग्रस्त हो जाए। युद्ध को टालने का यही एक उपाय है। आखिर समय और संसाधन यों ही व्यर्थ करने का क्या लाभ?


Monday, 15 April 2013

स्वर एकादश: अग्निशेखर और केशव तिवारी की आवाज़


डॉ. गणेश पाण्‍डेय

बोधि प्रकाशन ने ग्यारह कवियों का एक अच्छा संकलन ‘स्वर-एकादश’ निकाला है। इस संकलन की वजह से कई कवियों ने खासतौर से ध्यान खींचा है। संकलन में संकलित कवियों के स्वर की विविधता ने ही नहीं, बल्कि तीव्रता ने भी चौंकाया है। इनमें कई ऐसे कवि हैं जो काफी समय से लिख रहे हैं। अलग-अलग अवसरों पर उनकी कविताओं ने पहले भी ध्यान खींचा है। पर यहाँ ठहर कर और एक साथ कई कवियों की रोशनी के बीच देखने पर इनका महत्व बढ़ जाता है। भूमिका में ठीक ही कहा गया है कि इनके स्वर अलग-अलग हैं। हर कवि के स्वर की निजता कविकर्म की बुनियाद है। जो कवि अपने कविता-संसार में अपनी निजता की रक्षा नहीं कर पाते हैं, वे अपनी कविता को नकली कविता की जमात में पहुँचा देते हैं। अच्छे कवि विचारधारा के आग्रह के बावजूद कविताई में अपनी छाप रखते हैं। विचारधारा ही नहीं, संवेदना के स्तर पर भी हर मजबूत कवि अपनी निजता को बचाये रखता है। तभी उसकी कविता नकल होने से बचती है। इस संग्रह की कविताओं में अपने परिवेश के प्रति जो लगाव है, दरअसल वह कवि जीवन का कविता के प्रति स्वाभाविक व्यवहार है। प्रकृति, समाज, रिश्ते, प्रेम इत्यादि से इस संकलन के कवियों की कविता का परिसर बनता है। एक खास बात, अपनी धरती से जुड़ाव की है। इस संकलन के कुछ कवियों में तो लोक संवेदना और काव्य संवेदना के बीच एक झीना-सा आवरण रहता है। कई बार लगता है कि यही कविता की असली दुनिया है। पर दरअसल यह सिर्फ लोक की ताकत नहीं है, लोक को कवि जीवन में जीने की ताकत है। शहरी जीवन पर लिखी तमाम कविताएँ कवि के जीवनानुभव की विपन्नता की वजह से इसीलिए सिर्फ एक काव्य प्रवृत्ति बन कर रह जाती हैं। अपना प्रभाव खो देती हैं। जिन कविताओं में जीवनानुभव की तीव्रता को काव्यानुभव मे बदलने की ईमानदार कोशिश होती है, वे चाहे लोक संवेदना की कविताएँ हों या कस्बाई या शहरी जमीन की, अपनी शक्ति और सौंदर्य का अनुभव कराती हैं। इन कवियों में कई कवि पचास पार के हैं, इसलिए कम से कम मैं उन्हें युवा कवि नहीं कह सकता। उनकी कविताएँ भी कविताई की दृष्टि से युवा कविता से भिन्न हैं। अपनी कविता की बनावट और बुनावट, दोनों स्तरो पर ये प्रभावित करते हैं। मुखातिब होते ही अपनी कविता की बाहों में भर लेते हैं। अपने प्रेम और अपने दर्द, अपने एकांत और अपने संघर्ष का साथी बना लेते हैं।
        अग्निशेखर की कविताओं को पहले भी देखने का अवसर मिला है। पर इस बार खास यह कि कोई ग्यारह कवियों की पंक्ति में क्रम ही ऐसा और अच्छा था कि सबसे पहले उन्हें ही देखा। कश्मीर राजनीति में भले ही एक सौदा रहा हो जिसे राजनीति करने वालों ने अपने-अपने नफे-नुकसान के नजरिये से देखा हो, पर साहित्य में कश्मीर को कभी इस नजरिये नहीं देखा गया है। कश्मीर उसी तरह वहाँ के लोगों के लिए जीवन का आधार है जैसे हमारे लिए पूर्वांचल या अवध या दूसरे अंचल। अपनी धरती से लगाव का क्या मतलब है, यह बताने की चीज नहीं है। अपनी धरती से बिछुड़ने का दर्द भी कितना दुख देता है, कहने की बात नहीं। पर जब यह जीवनानुभव  कविता का हिस्सा बनता है तो कविता कैसे हमारे अंतस्तल में रच-बस जाती है, कैसे हमारे विचार-स्फुलिंग जाग जाते हैं, कैसे हम एक गहरी बेचैनी से भर उठते हैं, कैसे हम उस दर्द के पहाड़ पर अपना सिर पटक देना चाहते हैं, कैसे हम देर तक स्तब्ध रहते हैं, यह सब एक अच्छी कविता ‘पुल पर गाय’ से पता चलता है-
सब तरफ बर्फ है खामोश
जले हुए हमारे घरों से ऊँचे हैं
निपते पेड़
एक राह-भटकी गाय
पुल से देख रही है
खून की नदी
रंभाकर करती है
आकाश में सुराख
छींकती है जब भी मेरी माँ
यहाँ विस्थापन में
उसे याद कर रही होती है गाय
इतने बरसों बाद भी
नहीं थमी है खून की नदी
उस पार खड़ी है गाय
इस पार है मेरी माँ
और आकाश में
गहराता जा रहा है
सुराख।
    दो-दो माँएँ हैं इस कविता में। एक गाय, एक माँ। गाय धरती माँ है। कश्मीर है। जिसके दर्द की आवाज से आकाश में सुराख हो रहा है और बढ़ता ही जा रहा है सुराख। अर्थात दर्द की आवाज और तेज होती जा रही है। कविता इससे आगे कहती यह है, इस विडम्बना से साक्षात्कार कराती है कि आसमान से अमन की जगह हिंसा की बारिश जारी है। गाय माँ की भटकती हुई आत्मा भी बन जाती है। गाय एक हिंदू परिवार की आवाज भी बन जाती है। कई अर्थछवियाँ हैं, इस कविता में। यह कवि की खूबी है कि वह अनेक अर्थछवियों को अस्पष्ट होने से बचाता है। अग्निशेखर की और भी कविताएँ इस संकलन में हैं, दिल्ली में पुश्किन,  पीजा, बर्गर और नाजिम हिकमत, बिरसे में गाँव, याद करजा है बच्चा, तेरी डायरियाँ, माली।  इन कविताओं में संवेदना की बारीक बुनावट के भीतर विचार का एक कोड़ा भी है, जो हमारे समय के यथार्थ से मुठभेड़ करता है। जैसे अग्निशेखर कश्मीर की जगह जम्मू में हैं, उसी तरह केशव तिवारी प्रतापगढ़ की जगह बाँदा में हैं। पर यह दर्द उतना बड़ा नहीं है। इसलिए कि केशव बाँउा में रह कर भी एक प्रतापगढ़ बना लेते हैं। कहना चाहिए कि बाँदा में रच-बस जाते हैं। वहाँ के लोक का हिस्सा हो जाते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि अपने जनपद में नहीं हैं। जहाँ हैं वही उनका जनपद हो जाता है। केशव की कविता में जन के पद की और जनपद की, दोनों की गूँज है। यही बात केशव में मुझे काफी अच्छी लगती है। कई जनवादियों को इधर हिंदी कविता और आलोचना में विलक्षणतावादी होते इतना देखा है कि लगता है कि वे हैं तो शुद्ध विलक्षणतावादी पर अपनी प्रगतिशीलता की दुकान बचाए रखने के लिए संगठनों में शामिल हो गये हैं। वे जनविरोधी भाषा में जनवादी कविताएँ और आलोचना लिखते हैं। कविता और आलोचना के इस अकाल में इधर के कवियों में केशव अच्छे लगते हैं। इसलिए कि जो लिखते हैं, वह जीते हैं। जीवनानुभव के धनी कवि केशव की कुछ कविताओं पर एक छोटे-से नोट पहले भी कह चुका हूँ कि कुछ नये कवि शोर बहुत करते हैं और काम कम। कुछ कवि चुपचाप अपना काम करते हैं। शयद ऐसे ही कवि हैं केशव तिवारी। केशव की कविताओं से मिलकर बहुत अच्छा लगा। हमारे समय और जीवन और खासतौर से लोकजीवन की भूमि पर रची साफ-सुथरी कविताएँ भला किसे अच्छी नहीं लगेंगी। केशव की कविताएँ इसलिए भी अच्छी लगती हैं कि इनमें जीवन की सहजता और लय की तरह कविता का जीवन भी बहुत सहज और आत्मीय है। केशव के लोक की एक बड़ी विशेषता है कि केशव का लोक अपने परिसर का विस्तार करता है। अपने अंचल से बाहर जहाँ-जहाँ लोक है, लोक के जन हैं सब केशव की कविता में रच-बस जाते हैं। जीवन जहाँ भी है, सुख-दुख की डोर के बीच तना है। ‘कल रात’ का छत्तीसगढ़िया मजदूर भी केशव की कविता की आत्मा का सहचर बन जाता है-
‘सोचता हूँ जैसे मैं अवध
और बुदेलखण्ड को चाहता हूँ
मेवाती मेवात को
भेजपुरिया भोजपुर को चाहता होगा
क्ल रात बतिया रहा था
दोस्त के ईंट-भट्ठे पर
सपरिवार काम करने आये एक छत्तीसगढ़िया मजदूर से
वह शराब में डूबा बता रहा था अपने लोगों की बदमाशी
कैसे अपने ही लोगों ने लिखाया झूठा मुकदमा
सयानी होती बिटिया पर कसे छींटे
कई-कई बार बोला वह
एक रोटी खाकर भी न छोड़ता देश
रोटी ही नहीं ये वजहें भी थीं सब छोड़ने की
बोला सालों से नहीं गया दुर्ग और न जाना चाहता है
चलते-चलते मैंने कहा-
कल में जा रहा हूँ दुर्ग
तुम भी तो पाटन के लिए उतरते होगे वहीं
जाने क्या छुपा था उसकी
नाराज आँखों के बीच
कि अचानक छलकने लगा बाहर
शराब के नशे में शिथिल
उदास आखों को इस तरह रोते मैंने
देखा पहली बार।’
    इस कविता में एक लोकमन को ही नहीं, कवि की आत्मा के साथ अपनी आत्मा को भी रोते हुए देख रहा हूँ। मजदूर तो कविता के भीतर रो रहा है। हम बाहर। यह कविता की ताकत है। कश्मीर कहाँ नहीं हैं। जुल्म ढ़ाने वाले कहाँ नहीं हैं। कभी रोटी की वजह से तो कभी बेदखल करने की वजह से, विस्थापन कर क्रम चलता रहता है। जीवन का यह क्रम हर जगह है। लेकिन सच्चाई यह कि हम जहाँ जाते हैं और जिन्दगी के बीस-तीस साल गुजारते हैं, वह जगह हमारी भी हो जाती है। हम उस जगह के हो जाते हैं। स्वर एकादश में केशव की कुछ और अच्छी कविताएँ हैं-दिल्ली में एक दिल्ली यह भी, रातों में कभी-कभी रोती थी मरचिरैया, बिसेसर। सभी कविताएँ अच्छी हैं। सब के बारे में कहने का न तो अवकाश नहीं हैं। इतना ही कि इस संकलन को तैयार करते समय यदि ध्यान दिया गया होता कि कवि कुछ कम रहें और कविताएँ कुछ और रहें तो ज्यादा अच्छा होता। पाँच-पाँच या सात-सात कवियों के दो स्वतंत्र संकलन बन सकते थे। इस संकलन के सभी कवि अच्छे हैं लेकिन सभी कवियों की एक साथ संगति ढ़ूँढ पाने में मुझे थोड़ी-सी दिक्कत जरूर हुई। जितनी सरलता से भूमिका में संगति देख ली गयी, मेरे लिए उतनी सरलता से देख पाना संभव नहीं था। अग्निशेखर और केशव तिवारी जैसे कवियों को इस संकलन की उपलब्धि के रूप मे देखता हूँ। इस संकलन में दूसरे अच्छे कवियों पर भी जल्दी ही कुछ कहता हूँ। सच तो यह कि अग्निशेखर,सुरेश सेन निशांत, राज्यवर्द्धन, केशव तिवारी, शहंशाह आलम,ऋषिकेश राय, राजकिशोर राजन, महेश चंद्र पुनेठा, भरत प्रसाद, संतोष कुमार चतुर्वेदी, कमल जीत चौधरी जैसे ग्यारह कवियों को बिना नाम लिए डेढ़ पेज में समेटने की कला भी तो मेरे पास नहीं है। समय निकाल कर एक-दो किस्त में बाकी कवियों पर अपनी बात कहँूगा।

Sunday, 14 April 2013

प्रदीप सक्‍सेना को डॉ.रामविलास शर्मा आलोचना सम्‍मान


जोकहरा स्थित श्री रामानन्‍द सरस्‍वती पुस्‍तकालय में गोष्‍ठी : इतिहास और आलोचना विषय पर आयोजित एक भव्‍य समारोह में हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक प्रो.नामवर सिंह ने प्रो.प्रदीप सक्‍सेना को शॉल, प्रशस्ति पत्र, नगद राशि प्रदान कर वर्ष 2012 का डॉ.रामविलास शर्मा आलोचना सम्‍मान से सम्‍मानित किया। श्री रामानन्‍द सरस्‍वती पुस्‍तकालय,जोकहरा, केदार शोध पीठ (न्‍यास), बॉंदा, डॉ.रामविलास शर्मा आलोचना सम्‍मान आयोजन समिति की ओर से प्रदान किए जाने वाले सम्‍मान समारोह के दौरान महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय, वरिष्‍ठ साहित्‍यकार प्रो.निर्मला जैन,प्रो.चौथीराम यादव, भारत भारद्वाज, दिनेश कुशवाह, प्रदीप सक्‍सेना, रमेश कुमार मंचस्‍थ थे।
       अध्‍यक्षीय वक्‍तव्‍य में प्रो. नामवर सिंह ने कहा कि हिंदी आलोचना में जिस तरह के साध्‍य की जरूरत है वह हिंदी में विरल होती जा रही है। रामविलास शर्मा ने जो श्रम और साधना की हिंदी आलोचना के लिए, उस परंपरा में एक मात्र हिंदी आलोचक प्रदीप सक्‍सेना दिखाई देते हैं। प्रदीप सक्‍सेना ने अपने इतिहास लेखन और आलोचना का कार्य रामविलास शर्मा की परंपरा का निर्वहन करते हुए किया है, वह इस सम्‍मान के हकदार हैं।    
       स्‍वागत वक्‍तव्‍य में विभूति नारायण राय ने कहा कि प्रदीप सक्‍सेना आलोचना के महत्‍वपूर्ण हस्‍ताक्षर हैं। अठारह सौ सत्‍तावन और भारतीय नवजागरण में इन्‍होंने मार्क्‍सवादी इतिहास-विज्ञान की तत्‍वमीमांसा को भारतीय परिवेश में ज्ञानमीमांसा में परिवर्तित कर उसका सार्थक उपयोग किया है। उन्‍होंने कहा कि इस वर्ष डॉ.रामविलास शर्मा जी का जन्‍म शताब्‍दी वर्ष है। विश्‍वविद्यालय में उनके नाम पर बने सड़क व साहित्‍य विद्यापीठ में लगाई गई प्रतिमा का अनावरण उनके सुपुत्र द्वारा किया गया। इस वर्ष प्रदीप सक्‍सेना जैसे मार्क्‍सवादी आलोचक को यह सम्‍मान दिया गया, इसके लिए उन्‍हें बधाई।
       सुप्रसिद्ध साहि‍त्‍यकार प्रो. निर्मला जैन ने कहा कि रामविलास जी ने हिंदी इतिहास लेखन की परंपरा का नए सिरे से मूल्‍यांकन किया है। उनके इतिहास लेखन में जो अंतर्विरोध हैं,उस पर बातचीत होनी चाहिए, किंतु इस बातचीत में हमें यह सावधानी बरतनी होगी कि हिंदी साहित्‍य में जो उन्‍होंने नई आलोचना दृष्टि दी है इस ओर भी हमें ध्‍यान देने की जरूरत है। वरिष्‍ठ साहित्‍यकार चौथीराम यादव ने कहा कि रामविलास शर्मा ने भाषा वैज्ञानिकों के परंपरागत भाषा संबंधी चिंतन से अलग हटकर क्षेत्रीय भाषा के महत्‍व को स्‍थापित किया। रामविलास जी के लेखन में हाशिए का समाज व चिंतन अनुपस्थित रहा है, इस पर पुर्नमूल्‍यांकन किए जाने की जरूरत है।  
       अलीगढ़ विश्‍वविद्यालय से आए वक्‍ता रमेश कुमार ने कहा कि समकालीन हिंदी आलोचना में प्रदीप सक्‍सेना, अपनी निर्भ्रांत इतिहास चेतना और आलोचकीय विवेक से समय,समाज और संस्‍कृति के जन-विरोधी चिंतन का प्रतिपक्ष रचते हैं। प्रतिपक्ष की इस सर्जना में जो सौंदर्यशास्‍त्र निर्मित होता है, वह अपनी प्रकृति में बहुआयामी है।
       इस दौरान प्रदीप सक्‍सेना ने कहा कि स्‍वतंत्रता के समय राष्‍ट्रीय आंदोलन का जो स्‍वरूप था उसकी एक झलक यहां दिखाई पड़ती है। यह पुस्‍तकालय सांस्‍कृतिक नवजागरण का एक महत्‍वपूर्ण केंद्र बनता जा रहा है। आज पूरी दुनिया एक ध्रुवीय हो गई है। अमेरिका को दुनिया में जहां भी लाभ दिखता है, वहां वह सभी तरह की नीतियों में हस्तक्षेप कर अपनी बात मनवाता है। पहले हम साम्राज्‍यवादी ताकतों के सामने लड़ने को तत्‍पर रहते थे पर आज नव साम्राज्‍यवाद में कुछ छिपी ताकतें हमारे दिलों पर राज करती हैं। हरेक गांव में एक ऐसा ही सांस्‍कृ‍तिक केंद्र हो ताकि नव औपनिवेशिक ताकतों से मुकाबला किया जा सके।
       साहित्‍यकार भारत भारद्वाज ने कहा कि राम विलास जी का मूल्‍यांकन होना बाकी है,पुर्नमूल्‍यांकन होना चाहिए। आलोचना साहित्‍य का विवेक है, आलोचक को विवेक का सम्‍मान करना चाहिए। रामविलास सम्‍मान प्रदीप जी को मिला है, आशा है कि आपनी आलोचकीय दृष्टि में साहित्‍य के विवेक को बनाए रखेंगे।
       महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा के इलाहाबाद क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी व आयोजक प्रो.संतोष भदौरिया ने प्रदीप सक्‍सेना के व्‍यक्तित्‍व एवं कृतित्‍व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इनके लेखन में विचार की प्रधानता है जो इनकी आलोचनात्‍मक सर्जना में अंतर्धारा की तरह प्रवहमान है।
       डॉ.रामविलास शर्मा आलोचना सम्‍मान के संयोजक नरेन्‍द्र पुण्‍डरीक ने कहा कि यह सम्‍मान हिंदी के ऐसे ओलाचक को उत्‍साहित करने के लिए दिया जाता है, जिसकी आलोचना सामर्थ्‍य एक तरफ विभिन्‍न प्रकाशनों से पहचान में आयी है और दूसरी तरफ उसके पास अभी इतना समय बचा है जिससे वह पूरी तरह से विकसित कर सके।
       प्रगतिशील लेखक संघ, उ.प्र. के महासचिव संजय श्रीवास्‍तव ने संचालन किया और श्रीप्रकाश मिश्र ने आभार व्‍यक्‍त किया। इस अवसर पर हिना देसाई, सुधीर शर्मा, कांति लाल शर्मा, राकेश श्रीमाल, प्रो. बद्री प्रसाद, राम शकल पटेल, हरि मंदर पांडेय, डॉ. बी.के.पांडेय, अमित विश्‍वास, विनय भूषण, मनोज सिंह, डॉ.गुफरान अहमद खान, उदभ्रांत, हीरा लाल, ए.के.सिंह सहित बड़ी संख्‍या में पुस्‍तकालय के विद्यार्थी व हिंदी के सुधी जन उपस्थित रहे।
फोटो कैप्‍शन 678 –  प्रदीप सक्‍सेना को वर्ष 2012 का डॉ.रामविलास आलोचना सम्‍मान से सम्‍मानित करते हुए प्रो. नामवर सिंह व अन्‍य महानुभाव।
फोटो कैप्‍शन 692– वक्‍तव्‍य देते हुए प्रो. नामवर सिंह, मंच पर उपस्थित हैं अन्‍य महानुभाव।

Monday, 8 April 2013

हिंदी विवि से जुड़े ऋतुराज, विनोद और दूधनाथ


कवि ऋतुराजकवि -उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल तथा साठोत्तरी कथा पीढ़ी के प्रमुख स्तंभ दूधनाथ सिंह महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के तीन नये अतिथि लेखक होंगे। प्रसिद्ध कथाकार व कथालोचक विजय मोहन सिंह तथा कथाकार संजीव का कार्याकाल समाप्त होने पर कुलपति विभूतिनायायण राय ने ये नियुक्तियां की हैं।



कविता के वाद-प्रतिवाद और तथाकथित गुटबंदी परक आंदोलनों से दूर ऋतुराज सातवें दशक के एक विरल कवि हैं। कविता की प्रखर राजनैतिकता के दौर में उन्होंने अपनी काव्यभाषा के लिये एक नितांत निजी मुहावरा रचा और अँगीठी में सुलगती आग की तरह उनकी कविताएँ आज भी नये कवियों के लिए अपरिहार्य बनी हुई हैं।
अपने उपन्यास दीवार में खिड़की रहती थी के लिये साहित्य अकादमी से पुरस्कृत कवि -उपन्यासकार विनोद कुमार शुक्ल सही मायने में हिंदी के जीनियस रचनाकार हैं। नौकर की कमीज,दीवार में खिड़की रहती थी और खिलेगा तो देखेंगे नाम से उनके तीन उपन्यासों की त्रयी ने एक तरह से भारतीय निम्न मध्यवर्ग का एक आधुनिक महाकाव्यात्मक शास्त्र रचा है । शब्द और उनके अर्थो की विच्छिन्नता के इस दौर में उनकी कवितायें शब्दों में उनके अर्थों की वापसी का जीवन्त दस्तावेज हैं।
साठोत्तरी कथा पीढ़ी सर्वाधिक तेजस्वी लेखकों में से एक कथाकार दूधनाथ सिंह हिंदी के उन गिने चुने लेखको में  हैं जिनकी प्रतिभा एक विधा के दायरे में नही बंध सकी। अपनी प्रमुख पहचान कहानियों के अलावा निराला एवं महादेवी पर उनका आलोचनात्मक कार्य,लौट आ ओ धार! जैसा संस्मरण और यमगाथा जैसा नाटक हिंदी साहित्य की उपलब्धियां हैं ।
हिंदी के इन विलक्षण रचनाकारों की एक साथ विश्वविद्यालय में उपस्थिति से परिसर का रचनात्मक वातावरण एक दस्तावेजी महत्व की तरह का होगा ,ऐसा भरोसा कुलपति ने जताया है।

Thursday, 4 April 2013

ग़ज़ल



इष्‍ट देव सांकृत्‍यायन

क्‍यों कर इतना उलझा मैं ताना-बाना ढूंढ रहा हूं
पल भर शीश छिपाने को आशियाना ढूंढ रहा हूं
वर्षों पहले एक खिलौना लिया था मैंने मेले में
नए खिलौनों से ऊबा मैं, वही पुराना ढूंढ रहा हूं
किसी के मन का कहां यहां कुछ होता है कब
जो है उससे जुडने का नया बहाना ढूंढ रहा हूं
जिससे कई दिनों से मिलना हो न सका ऐसे ही
कई दिनों से उसका ही पता-ठिकाना ढूंढ रहा हूं
कहकर और सपर कर अकसर लड़ने आता था
बचपन का वह दोस्‍त दिवाना ढूंढ रहा हूं
मीलों पैदल चल स्‍कूल पहुंचते सबक जिए जाते
एसी बिल्डिंग के धोखे में वही ज़माना ढूंढ रहा हूं
बोझ बने हैं हाथ करोडों, झेले झेल न जाएं
बनता हो कुछ काम जहां, कारखाना ढूंढ रहा हूं


Wednesday, 27 March 2013

जोगी जी वाह जोगी जी!


इष्ट देव सांकृत्यायन



चढ़ते फागुन में
हम मूढ़ों को 
ज्ञान बताने आए 

खेल धर्म का 
खेल चुके तो खुलकर 
जात बचाने आए

कबीरा सारारारा........
जोगीरा रारारारा .........
जोगी जी वाह जोगी जी!

किसकी कीच, कमल किसका है,
किसका रंग किसकी पिचकारी 
सभी शरीफ़ों की
है आपस में
गहरी रिश्तेदारी.

जांच-फांच की नौटंकी पर धमक जताने आए
कबीरा सारारारा जोगीरा रारारारा
जोगी जी वाह जोगी जी!

दूर बहुत दिखता है उसको
जो घर में सुन भी ना पाए
इधर जो मौक़ा लहे ज़रा सा
लेकर धोकरा दौड़ा आए

पंचतत्त की होली में सब दही भुजाने आए
कबीरा सारारारा जोगीरा रारारारा
जोगी जी वाह जोगी जी!

सबने पी है छक कर यारां
बादल बरसे भंग
गेरुआ बाना भीगा देखो
नसों से निकला रंग

फागुन में जभी तो वो मल्हार गाने आए
कबीरा सारारारा जोगीरा रारारारा
जोगी जी वाह जोगी जी!


Monday, 18 March 2013

बात का मर्म




इष्ट देव सांकृत्यायन

लोकतंत्र न हुआ, मुसीबत हो गई। किसी महामानव ने कुछ कहा नहीं कि बवाल शुरू। गोया बड़े लोगों को बेवजह छोटा बनाने और उन्हें भी अपनी ही औकात में लाने का सबको पूरा ह$क मिल गया हो। पांच साल में एक बार बड़े लोग मंच से हाथ क्या जोड़ लेते हैं, लोगों का मन इतना बढ़ जाता है कि वे उन्हें हमेशा हाथ जोड़े ही देखते रहना चाहते हैं। भूल ही जाते हैं कि सरकार और सरकारी अफसरों के शासक के बजाय सेवक होने की बात किताब में केवल लिखे जाने के लिए लिख दी गई है। असलियत से उसका संबंध उतना ही है, जितना राजनीति का नीति और डिग्री का योग्यता से।
मुझे ठीक-ठीक याद है गर्मी नहीं, जाड़े के दिन थे वे। वह भी ऐसा जाड़ा कि लोगबाग परेशान। दिन में धूप भले निकल आए, पर रात एकदम सर्द। ऊपर से हर तीसरे दिन बारिश और उसमें ओलापात भी। इधर बजट आया, उसने सर्दी से भी ज्य़ादा लोगों के हाथ-पांव टैक्सों के ज़रिये सुन्न कर दिए। भिन्न-भिन्न प्रकार के नेतृत्वविलीन और नेतृत्वविहीन आंदोलनकारियों की पिछले तीन-चार वर्षों में जो दशा हुई, उसने जोशे-जवानी को ठंडई में पहले ही बदल दिया था। माहौल में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिसके चलते किसी तरह की गर्मी आने के बारे में सोचा जाता, लेकिन लोगों की उस अक्ल का क्या करेंगे जो महाजनों की कोई बात सुनते ही एकदम से वहीं अटक जाती है। बात के मर्म तक पहुंचने लायक अक्ल तो उन्हें विधाता ने थमाई नहीं और समझे ब$गैर अक्ल के फारेनहाइट को ही सेल्सियस कर देना सबकी आदत अलग हो गई है।
किसी सूबे का आला हाकिम कुछ कहे और लोग उस पर $गौर न $फरमाएं, ऐसा हो ही नहीं सकता। बिजली के दाम बढ़े। लोगों ने थोड़ी नाराज़गी जताई। उन्होंने कह दिया कि भाई बिल कम करना है तो कूलर छोड़ो, पंखा चलाओ। $कायदे से यह एक नेक सलाह भर थी, जनता की भलाई के लिए। कोई मैंडेटरी आदेश नहीं था, जिसे मानना ही हो। लेकिन, जनता भी कई बार पार्टी के व$फादार सिपाहियों जैसा व्यवहार करने लगती है। यह अलग बात है कि उनके जैसे अनुशासन का परिचय वह कई बार तो पुलिस के डंडे की चपेट में आकर भी नहीं दे पाती। जबकि पार्टी के सिपाही आलाकमान के मुंह से निकली फूंक को भी ईश्वरीय मंत्र मानते हैं। प्रश्न उठाना तो दूर, उस पर अमल से पहले वे 'हाऊ टु डूÓ पढऩे की ज़रूरत भी नहीं समझते। जबकि जनता? बात समझे-न समझे, उसे आलोचना तो करनी ही है।
बात समझे ब$गैर पिल पडऩा लोगों की आदत सी हो गई है। कहां की बात कहां पहुंचा दी। आला हाकिम ने बात तो की पंखे-कूलर की और लोगों ने इसे आटे-दाल से जोड़ दिया। मसलन ये कि यानी आटा महंगा हो गया तो कम खाओ। हो सकता है, इसका यह आशय भी हो सकता है। लेकिन, जैसे लोग निकालते हैं, वैसे तो बिलकुल नहीं। पहले के ज़माने में ये परंपरा थी कि जब कोई महामानव कुछ कहे तो पहले उसके मर्म को समझा जाए। मर्म को समझे ब$गैर कोई बात न की जाए।
बड़े लोगों की बातों के पीछे बड़े मर्म होते हैं। पहली तो बात यह समझी जानी चाहिए कि उन्होंने कूलर की ही बात क्यों की? पंखा चलाने से मना नहीं किया और एयरकंडिशनर से भी नहीं। सबसे पहले तो यह समझना चाहिए उन लोगों को जो 30 रुपये से ऊपर कमाने वालों को अमीर मानने पर सवाल उठा रहे थे। उन्हें समझना चाहिए कि सरकार ने $गरीबों का कितना ख़्ायाल रखा है। ध्यान रखना चाहिए कि 30 रुपये तक रोज़ कमाने वाले पंखा तो चला ही सकते हैं और इन्कम टैक्स देने वाले तो एसी आराम से चला सकते हैं। जब इन्कम टैक्स पेइयों को मेट्रो सिटीज़ में दो हज़ार रुपये महीने किराये पर आराम से घर मिल सकता है तो उन्हें एसी चलाने में क्या प्रॉब्लम है? कुल मिलाकर यही तो दो वर्ग हैं देश में, एक $गरीबी रेखा के नीचे और एक अमीरी वृत्त के ऊपर। बीच में तो कोई तबका बचा नहीं। 
इतनी सुविधा के बावजूद अगर कोई कूलर चलाता है तो मेरे हिसाब से तो वह अपराध कर रहा है। अपराध इसलिए कर रहा है, क्योंकि इतनी अधिक मात्रा में क्लोरोफ्लोरो कार्बन गैस अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों के मुंह से भी नहीं निकलता, जितना कूलर से। उनके मुंह से निकला क्लोरोफ्लोरो कार्बन तो केवल भारतीय उपमहाद्वीप के समाज को ही तोड़ता है, लेकिन ये वाला कोई एक-दो समाज नहीं, पूरी दुनिया से भी ऊपर वो जो ओज़ोन वाली परत है, उसी को फाड़ डालता है। इसके अलावा यह हल्ला भी बहुत मचाता है। इसके हल्ले से सत्ता के कान पर जूं भले न रेंगे, लेकिन पर्यावरण के कान एकदम फट जाते हैं। ऐसा वे पर्यावरणविद बताते हैं जो जागरूकता के नाम पर अपने हर आयोजन के ज़रिये $करीब दस हज़ार डेसिबल का योगदान करते हैं। निश्चित रूप से आला हाकिम उनसे बहुत प्रभावित हैं। नहीं चाहते कि हमारा पर्यावरण प्रदूषण का शिकार हो। 
आला हाकिम को पता है कि पर्यावरण कोई समाज जैसा मसला नहीं है। समाज की तो एक सीमा है, लेकिन पर्यावरण की कोई सीमा नहीं है। उससे पूरी दुनिया ही नहीं, पूरा सौरमंडल प्रभावित होता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए इधर आटे-दाल के दाम भी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहे हैं। आप क्या समझते हैं, ज्य़ादा खाना बहुत अच्छी बात है? अगर ऐसी सोच आपकी है तो जनाब आप भ्रम में न रहें। ज़रा स्लिमिंग सेंटरों और जिमों पर भी नज़र डालें। जितना आप खाने पर ख़्ार्च नहीं करते, उससे कई गुना ज्य़ादा कुछ लोगों को खाया हुआ पचाने पर ख़्ार्च करना पड़ रहा है। सरकार जानती है कि अगर अधिक खाएंगे तो कल ऐसे ही आपको भी ख़्ार्च करना पड़ेगा। वह आपका योगक्षेम वहन करती है। अगर वह आपकी परवाह नहीं करेगी तो कौन करेगा? वह आपको अपनी सेहत ख़्ाराब करते और इस दारुण ख़्ार्च में पड़ते नहीं देखना चाहती। इसलिए सरकार की आलोचना की नकारात्मक मनोवृत्ति छोड़ें। पॉजि़टिव एटीट्यूड अपनाएं और सरकार की मंशा को समझते हुए कूलर को मारिए गोली। आज ही से शुरू कर दें पंखा और एसी चलाना।