Sunday, 24 June 2018

जाग मछेंदर गोरख आया-3


कल लिखने बैठा तो मन थोड़ा भन्नाया हुआ था. सोच ही नहीं पा रहा था कि शुरू कहाँ से करूँ. वजह कुछ ख़ास नहीं, बस एक दुविधा थी.

दुविधा यह कि आगे की कड़ी बढ़ाएँ कहाँ से. मन यह बन रहा था कि पहले जन्म से जुड़े सारे मिथकों की सारी चर्चा कर ली जाए. क्योंकि पिछली पोस्ट में जिस मिथक ज़िक्र किया वह कई मिथकों में से एक ही है. वह जो लगभग उत्तर भारत में प्रचलित है. लगभग माने बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब और हिमाचल तक. राजस्थान के कुछ भागों में यही मिथक है और कुछ में दूसरा. इसी से मिलता-जुलता.

इसी से मिलती-जुलती कई लोकगाथाएँ कई दूसरे क्षेत्रों में भी हैं. लेकिन पूर्वोत्तर भारत में भिन्न. गुजरात में कुछ और भिन्न. नेपाल और तिब्बत में और भिन्न. एक और बात है. मिथक या कहें लोकगाथाएँ या लोकवार्ताएँ मुझे आकर्षित बहुत करती हैं. जानते हुए भी कि इनमें तथ्य कम, भाव ज़्याद है और तथ्य अगर है भी तो वह बहुत गूढ़ अर्थ या कह लें लक्षणा में मौजूद है, जिसे निकालना बहुत जटिल काम है; मैं अपने को उनको उन्हें जानने और उनकी चर्चा करने से रोक नहीं पाता.

लेकिन जरूरी मुझे यह लग रहा था कि पहले काल की चर्चा कर ली जाए. हालांकि इस कार्य में भी विद्वानों ने लोक में प्रचलित रूपकों का सहारा बहुत लिया है. चाहे राहुल जी हों, या बड़थ्वाल, या फिर ब्रिग्स या ग्रियर्सन; जिसने भी गोरख का काल निर्धारित करने की कोशिश की, वह लोक में प्रचलित आख्यानों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सका.

लेकिन मुश्किल यह है कि ये बहुत हैं और ऐसे भी लोक में प्रचलित गाथाओं-आख्यानों को छानकर तथ्य निकालना बालू के ढूह से छननिया के पाव भर चीनी निकालने जैसा काम है. हालाँकि है ये बड़ा मज़ेदार काम, लेकिन फिर यह रास्ते से भटका देता.

इस असमंजस में फिर गोरख ही आगे आए.

छाँड़ै आसा रहै निरास, कहैं ब्रह्मा हौं ताका दास
तजै अल्यंगन काटै माया
, ताका बिषनु पषालै पाया
मरौ वे जोगी मरौ मरौ मरण है मीठा
तिस मरणी मरि दीठौ जिस मरणी मरि गोरष दीठा 

फिर छोडीं आसा
, तजी अलगनी और काटी माया... और हाँ, आजकल तो चादर तानने की भी ज़रूरत नहीं, सो बिस्तर पर पड़े और मर गए. सुबह जिए तो दिमाग़ साफ़ था. पहला उद्देश्य क्या है मेरा? गोरख का मानवीकरण ही न! तो फिर जन्म और स्थान को लेकर गाथाएं और आख्यान बाद में. अभी पहले काल पर चर्चा हो ले.

गोरख के काल पर सबसे पहला मौलिक प्रकाशित शोधकार्य ग्रियर्सन का है. इसकी जानकारी मुझे हुई ब्रिग्स को पढ़ते हुए. अपनी कृति Gorakhnāth and The Kānphaṭā Yogīs में जॉर्ज वेस्टन ब्रिग्स कहते हैं कि कच्छ के धिनोधर में स्थित प्रसिद्ध मठ धरमनाथ से जुड़ा है. प्रसिद्ध संत धरमनाथ गोरखनाथी थे और वह कच्छ 1382 में आए थे. बस इसी एक संदर्भ के आधार पर ग्रियर्सन गोरखनाथ का होना अस्थायी रूप से 14वीं शताब्दी में मानते हैं. इसके आगे वह तर्क देते हैं कि जोगियों की परंपरा के अनुसार देखें तो धरमनाथ और उनके प्रसिद्ध गुरु गोरखनाथ के बीच कम से कम एक और शिष्य होना ही चाहिए. ये दोनों यानी गोरख और धरमनाथ समकालीन तो हो ही नहीं सकते. 

इसमें उन्होंने ग्रियर्सन का जो संदर्भ दिया है, वह स्पष्ट नहीं है. कहीं और मैंने पढ़ा कि ग्रियर्सन का यह जो निष्कर्ष है वह ब्रिग्स के ही खोजे हुए एक अभिलेख के आधार पर है, जो उन्होंने गुजरात से तलाशा था. हालांकि ब्रिग्स ने कहीं ऐसा कोई ज़िक्र नहीं किया है. फिर ऐसे ही किसी किताब में मैंने पढ़ा कि गोरख का काल निर्धारण ग्रियर्सन ने लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के पाँचवें खंड में किया है. इसका कोई वाजिब कारण तो मेरी समझ में नहीं आया, फिर भी सोचा कि देख ही लिया जाए. उसके पाँचवें खंड का दूसरा भाग सरसरे तौर पर पूरा देख गया. भोजपुरी वाले हिस्से को ख़ासतौर पर पढ़ा. उसमें वह भोजपुरी की लिपि और व्याकरण दोनों विधिवत देते हैं. यह अलग बात है कि आजकल भोजपुरी के बड़े-बड़े स्वघोषित विद्वान सरकारी बैठकों में भोजपुरी की लिपि न होने की बात आसानी से मान कर आराम से मुँह लटकाए चले आते हैं. ख़ैर, इस पर फिर कभी. इसमें बहुत नई जानकारियां मिलीं, पर गोरख कहीं नहीं मिले.

इस दिशा में नवीनतम मौलिक खोज राहुल जी की है. इसकी चर्चा पहले इसलिए कर लेनी चाहिए क्योंकि कालक्रम में राहुल जी ही गोरख को सबसे पहले रखते हैं. बाक़ी सभी उनसे बाद का मानते हैं. राहुल जी ने गोरख को विक्रम संवत के अनुसार 10वीं शताब्दी का माना है. हिंदी साहित्य का इतिहास में आचार्य रामचंद्र शुक्ल लिखते हैं:
“गोरखनाथ के समय का ठीक पता नहीं. राहुल सांकृत्यायन जी ने वज्रयानी सिद्धों की परंपरा के बीच उनका जो स्थान रखा है, उसके अनुसार उनका समय विक्रम की दसवीं शताब्दी आता है. उनका आधार वज्रयानी सिद्धों की एक पुस्तक रत्नाकर जोपम कथाहै, जिसके अनुसार मीननाथ के पुत्र मत्स्येंद्रनाथ कामरूप के चरवाहे थे और चर्पटीपा के शिष्य होकर सिद्ध हुए थे. पर सिद्धों की अपनी सूची में सांकृत्यायन जी ने मत्स्येन्द्र को जलंधर का शिष्य लिखा है, जो परंपरा से प्रसिद्ध चला आता है. गोरखनाथ के गुरु मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ) थे, यह तो प्रसिद्ध ही है. सांकृत्यायन जी ने मीननाथ या मीनपा को पालवंशी राजा देवपाल के समय में अर्थात संवत 900 के आसपास माना है. यह समय उन्होंने किस आधार पर स्थिर किया, पता नहीं. यदि सिद्धों की उक्त पुस्तक में मीनपा के राजा देवपाल के समय में होने का उल्लेख होता तो वे उसकी ओर विशेष रूप से आकर्षित करते. चौरासी सिद्धों के नामों में हेरफेर होना बहुत संभव है. हो सकता है कि गोरक्षपा और चौरंगीपा के नाम पीछे से जुड़ गए हों और मीनपा का मत्स्येंद्र से नाम साम्य के अतिरिक्त कोई संबंध न हो. ब्रह्मानंद ने दोनों को बिलकुल अलग माना भी है (सरस्वती भवन स्टडीज). संदेह यह देखकर और भी होता है कि सिद्धों की नामावली में और सब सिद्धों की जाति और देश का उल्लेख है, पर गोरक्ष और चौरंगी का कोई विवरण नहीं. अतः गोरखनाथ का समय निश्चित रूप से विक्रम की दसवीं शताब्दी मानते नहीं बनता.”

जाहिर है, शुक्ल जी को मछेंदर नाथ के मीनपा होने पर संदेह है. और यह संदेह अकारण नहीं है. लेकिन सिद्धों की जो-जो सूची मैंने देखी है, सबमें ये दोनों नाम शामिल हैं. गोरख भी और मीनपा भी. सिद्धों की जो गाथाएँ हैं, इन दोनों के बारे में और इधर नाथों की जो गाथाएँ हैं, इन दोनों में भी बहुत मामूली अंतर हैं. यह अंतर केवल रूपकों का ही है. अपने-अपने परिवेश और अपनी-अपनी पारिस्थितिकी के अनुकूल लोगों ने अपने-अपने रूपक गढ़ लिए. लेकिन रूपकों में अंतर्निहित आख्यानों का मूल तत्त्व एक ही रहा. यह साम्य ऐसे ही नहीं हो सकता. 

यह तथ्य भी हमें ध्यान रखना चाहिए कि राहुल जी शुक्ल जी की तरह इत्मीनान में नहीं थे. वह बहुत बेचैन आत्मा थे. बेचैन इस अर्थ में कि उनके सामने बहुत सारा काम पड़ा था और समय कम था. इसलिए हर काम जल्दी से जल्दी निपटा लेने और साथ-साथ दुनिया भर की घुमक्कड़ी करते हुए अधिक से अधिक खोज और जान लेने की हड़बड़ी उनके पूरे जीवन में दिखाई देती है. चरैवेति चरैवेतिपरंपरा के इस महायोगी के जीवन के क्रम पर मैं जब भी सोचता हूँ, एक शेर मन ही मन अनायास गुनगुनाने लगता हूँ -
आदत ही बना ली है तुमने तो मुनीर अपनी
जिस शहर में भी रहना
, उकताए हुए रहना

इस नज़रिये से सोचें तो हो सकता है राहुल जी से अपनी स्थापना का आधार देना या विवरण देना छूट गया हो. पर ख़ैर, अब तो वह हो चुका है. और हो ही चुका है. इसमें सुधार की गुंजाइश नहीं है. तो आगे शुक्ल जी की बात पर ग़ौर किया जाना चाहिए. वह कहते हैं :
“महाराष्ट्र के संत ज्ञानदेव ने, जो अलाउद्दीन के समय (संवत् 1358) में थे, अपने को गोरखनाथ की शिष्य परंपरा में कहा है. उन्होंने यह परंपरा इस क्रम से बताई है
आदिनाथ
, मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ, गैनीनाथ, निवृत्तिनाथ और ज्ञानेश्वर. 

इस महाराष्ट्र परंपरा के अनुसार गोरखनाथ का समय महाराज पृथ्वीराज के पीछे आता है. नाथ परंपरा में मत्स्येंद्रनाथ के गुरु जलंधरनाथ माने जाते हैं. भोट के ग्रंथों में सिद्ध जलंधर आदिनाथ कहे गए हैं. सब बातों का विचार करने से हमें ऐसा प्रतीत होता है कि जलंधर ने ही सिद्धों से अपनी परंपरा अलग की और पंजाब की ओर चले गए. वहाँ काँगड़े की पहाड़ियों तथा और स्थानों में रमते रहे. पंजाब का जलंधर शहर उन्हीं का स्मारक जान पड़ता है. नाथ संप्रदाय के किसी ग्रंथ में जलंधर को बालनाथ भी कहा गया है. नमक के पहाड़ों के बीच
बालनाथ का टीलाबहुत दिनों तक प्रसिद्ध रहा. मत्स्येंद्र जलंधर के शिष्य थे, नाथपंथियों की यह धारणा ठीक जान पड़ती है. मीनपा के गुरु चर्पटीनाथ हो सकते हैं, पर मत्स्येंद्र के गुरु जलंधर ही थे. सांकृत्यायन जी ने गोरख का जो समय स्थिर किया है, वह मीनपा को राजा देवल का समसामयिक और मत्स्येंद्र का पिता मानकर. मत्स्येंद्र का मीनपा से कोई संबंध न रहने पर उक्त समय मानने का कोई आधार नहीं रह जाता और पृथ्वीराज के आसपास ही विशेषतः कुछ पीछे गोरखनाथ के होने का अनुमान दृढ़ होता है.”

ध्यान रहे, शुक्ल जी के पीछेका आशय पहलेसे है, ‘बादनहीं. इस तरह आचार्य शुक्ल गोरख को पृथ्वीराज का थोड़ा पूर्ववर्ती या समकालीन मानते हैं.

अब यह जानना जरूरी है कि पृथ्वीराज कब हुए. पृथ्वीराज के शासन का समय 1178 से 1192 सीई है. चूँकि शुक्ल जी गोरख को पृथ्वीराज का केवल समकालीन नहीं, उनके पूर्ववर्ती होने की संभावना भी स्वीकार करते हैं, अतः उनका पूरा जीवनकाल देख लेना ठीक रहेगा. पृथ्वीराज विजय के अनुसार उनका जन्म ज्येष्ठ मास की द्वादशी तिथि को हुआ. लेकिन किस संवत् या सन् में, इसका कोई उल्लेख उसमें नहीं है. लेकिन उस समय की ज्योतिषीय गणना और ग्रहदशाओं का विवरण उसमें उपलब्ध है. इन ग्रहदशाओं की गणना के आधार पर दशरथ शर्मा ने पृथ्वीराज के जन्म का जो समय निकाला, वह 1223 विक्रमीय संवत् अर्थात 1166 ईसवी है. इसका पूरा विवरण उनकी कृति Early Chauhān Dynasties में है.

इस तरह आचार्य शुक्ल की इस स्थापना पृथ्वीराज का समकालीन या थोड़ा पूर्ववर्तीका आशय सन् 1100 से पहले का नहीं हो सकता. स्पष्ट है कि शुक्ल जी गोरख का होना 12वीं शताब्दी ई. में मानते हैं. जबकि राहुल जी गोरख को 10वीं शताब्दी ई. का मानते हैं. और उधर ग्रियर्सन शुक्ल जी से भी आगे बढ़ जाते हैं. वह गोरख को चौदहवीं शताब्दी में ले जाकर खड़ा करते हैं. लेकिन अभी दो बहुत महत्त्वपूर्ण लोग बच रहे हैं. एक तो ब्रिग्स की बात पूरी नहीं हो पाई है. विशेषतः गोरखनाथ पर ही पहली शोधपरक कृति मेरी जानकारी में उन्हीं की उपलब्ध है, जिसकी संक्षिप्त चर्चा ऊपर कर चुका हूँ और दूसरे डॉ. पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल. तो यह अगली कड़ी में.  



[पुनश्च, कोई जानकारी अंतिम नहीं होती और न ही अतीत के संबंध में कोई स्थापना. इसलिए विनम्र अनुरोध है कि कमेंट में आप अपना मत, सहमति-असहमति जो भी हो, अवश्य रखें. और हाँ, कोई नई जानकारी, पुस्तक, आख्यान, लोककथा, लोकगाथा या जो भी कुछ हो; साझा करने में कभी संकोच न करें. गोरख हम सबकी साझी विरासत हैं.]

#गोरखआया-3 क्रमशः 

Wednesday, 20 June 2018

जाग मछेंदर गोरख आया-2

गोरख के साहित्य पर चर्चा हो, इसके पहले जरूरी है कि उनका मानवीकरण कर लिया जाए. वैसे यह मैं कोई नया काम करने नहीं जा रहा हूँ. बहुत पहले ही कई विद्वान कर चुके हैं. लेकिन चूँकि यह काम विद्वानों ने किया तो यह मोटी-मोटी किताबों में दफन होकर रह गया. बाक़ी का क्रियाकर्म कोर्स में कर दिया गया. लोक तो उन्हें देवता बना ही चुका है.

वैसे इस पर मुझे एतराज नहीं. हो भी तो क्या कर लूंगा. यह प्रवृत्ति केवल हमारे ही लोक की नहीं है. यह दुनिया भर के लोक की प्रवृत्ति है. ख़ासकर उन विभूतियों के साथ जिनके साथ अध्यात्म और चमत्कार जुड़ा है. गोरख के तो जन्म के साथ ही चमत्कार जुड़ा है.

चमत्कार या कहें मुश्किलों से निजात के साथ लोगों के सहज ही जुड़ जाने का जो कारण मेरी समझ में आता है, वह वही है जिसे ग़ालिब ने कुछ यूँ कहा है:
इब्न-ए-मरियम हुआ करे कोई
मेरे दुख की दवा करे कोई

जिसने भी उसके दुख की कुछ दवा कर दी, उसी को उसने भगवान मान लिया. भोजपुरी में तो कहावत ही है, जे पार लगावे तेही भगवान. जो उसे संसार सागर पार करा दे, यानी जो उसके कष्टों को मिटाने की दिशा में कुछ क़दम आगे बढ़ा दे, वही उसके लिए भगवान बन जाता रहा है. और उस दौर के आम आदमी की चाहतें भी कोई बहुत बड़ी-बड़ी नहीं थीं. वही जो कबीर की थी:
सांईं इतना दीजिए जामे कुटुम समाय
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाय

इतना पा लेने के उपाय बता देने वाले साधु भी कुछ कम अद्भुत नहीं रहे हैं. एक बार ध्यान का नशा चढ़ जाने के बाद तो साधारण आदमी भी भय-चिंता से मुक्त हो जाता है. फिर ये तो उससे आगे की अवस्था तक पहुँचे हुए लोग थे. इनका लोगों की समस्याओं का समाधान और यहाँ तक कि अपने बारे में बताने का ढंग भी शायद वही था, जो ग़ालिब ने कहा:
बक रहा हूँ जुनूँ में क्या-क्या कुछ
कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई

भला बुद्ध की जातक कथाओं और बाइबिल की फीबल्स से बेहतर उदाहरण इसका और क्या हो सकता है! हमारे पुराण भी तो ऐसी ही कथाओं से भरे पड़े हैं. क्या पता कुछ ऐसी ही बातों के आधार पर भारतीय लोक ने भी अपनी-अपनी धारणाएँ बना ली हों. बेहतर होगा कि पहले लोक की ही बात कर लें.

अब लोक में प्रचलित तो यह है कि गोरख का जन्म गोबर से हुआ था. नाम से ऐसा लगता भी है. कहानी यह है कि मछंदर नाथ कहीं जा रहे थे. रास्ते में एक गाँव पड़ा. उस गाँव में एक स्त्री थी. जो संतान न होने से बहुत दुखी थी. मछंदर नाथ ने उसे देखा तो पूछा कि माता तुम क्यों दुखी हो. उसने कहा कि बाबा बस एक माता ही नहीं हूँ. बाक़ी तो सब सुख है. और बाबा ने उसे भभूत दे दी.

अब बाबा ने उसे भभूत दे तो दी पर जैसा कि अकसर ऐसे मामलों में होता है, महिला ने भभूत खाई नहीं. उसने भभूत गोबर के एक ढेर पर फेंक दी. बारह वर्ष बाद मछंदर नाथ फिर उसी गाँव में आए. महिला से मिले और पूछा तो महिला ने कहा कि उसने तो भभूत फेंक दी थी. मछंदर नाथ बहुत नाराज़ हुए. वह गए उसी जगह. गोबर के ढेर पर जल छिड़का और पुकारा तो वहाँ से बारह वर्ष का एक बालक निकला. उस बालक को फिर मछंदर नाथ ने वहाँ छोड़ा नहीं. अपने साथ लेकर चले गए. वही बालक था जिसे अब गुरु गोरखनाथ के नाम से जाना जाता है.

गोरख के जन्म की कथा बस यही एक ही प्रचलित है. थोड़े-बहुत हेर-फेर के साथ बात लगभग यही दुहराई जाती है. हाँ, जगह को लेकर जरूर कई धारणाएँ हैं. कोई उन्हें राजस्थान में कहीं उद्भूत बताता है तो कोई नेपाल में, कोई पंजाब और कोई हिमाचल में. मुझे लगता है कि जिसके जो निकट था, उसने वही धारणा बनाने की कोशिश की. आख़िर गोरख जैसा पूत किसे नहीं चाहिए!

ख़ैर! अब काल की बात करें तो लोक में प्रचलित धारणा और भी अद्भुत है. महाभारत से जुड़ी पोखरे की कथा तो मैं आपको बता ही चुका हूँ. एक लोककथा यह भी है कि जब भगवान राम का राज्याभिषेक हुआ था तब भी गुरु गोरखनाथ को निमंत्रण देने महाराज दशरथ स्वयं आए थे. लेकिन गुरु गोरखनाथ उस समय तपोलीन थे. फिर भी गुरु गोरखनाथ ने अपना आशीर्वाद उन्हें गोरखपुर से ही भेजा था.

अब अगर इस आधार पर गुरु गोरखनाथ का जीवनकाल आप निकालने बैठें, त्रेता से लेकर द्वापर और फिर कलियुग तक, तो ख़ुद ही सोच लें. बहरहाल लोक गुरु गोरखनाथ को अमर मानता है. और हाँ, मैं भी लोक का ही हिस्सा हूँ. गोरख ही क्यों, सरहपा, कबीर, सूर, तुलसी; और पीछे जाएँ तो व्यास, वाल्मीकि, कालिदास... सभी अमर ही हैं और इस लोक के होने तक तो अमर ही रहेंगे. चाहे इस या उस रूप में.

यक़ीन मानें, गोरख के अस्तित्व के संदर्भ में विद्वानों के विचार भी इससे कुछ बहुत भिन्न नहीं हैं. बस यह है कि विद्वान इसे त्रेता से लेकर कलियुग तक नहीं फैलाते. फिर भी 9वीं से लेकर 14वीं शताब्दी तक कहीं भी किसी भी बिंदु पर तलाशते रहना, कुछ-कुछ वैसा ही तो है.
आज इतना ही. गोरख के जन्मस्थान और काल पर विभिन्न विद्वानों के शोध निष्कर्ष अगली कड़ियों में.

#गोरखआया 



Monday, 18 June 2018

जाग मछेंदर गोरख आया-1

ऐसा तो नहीं कि मैं गोरख को जानता न था. क्योंकि गोरखपुर में जन्मा. वहीं पला-बढ़ा. ढंग का जो कुछ सीखा, वहीं सीखा. अपनी मिट्टी छोड़ने के बाद तो इंसान जो कुछ सीखता है या दुनिया उसे जो कुछ सिखाती है, वह बिना सीखे निबह जाए तो बेहतर.
तो गोरख को मैं जानता तो था बचपन से. लेकिन यह जानना बाबा गोरखनाथ के रूप में था. संत भी नहीं, कुछ-कुछ भगवान जैसा. शिवावतार कहे जाते हैं हमारे यहाँ बाबा गोरखनाथ. किंवदंतियां बहुत, स्पष्ट जानकारी कुछ नहीं.
यह शायद भारतीय लोकमानस की खामी है. वह जिसे बड़ा मानता है, उसे बड़ा बना देता है कि भगवान से नीचे कुछ उसे स्वीकार ही नहीं होता. फिर गोरख तो गोरख ठहरे. यह केवल गोरख ही नहीं, कबीर के भी साथ हुआ. रैदास, दादू, मलूक, नानक, सूर, तुलसी, मीरा.... सबके साथ हुआ. 'जाग मछेंदर गोरख आया....' अपने गुरु तक को माया के पाश से मुक्त करने की औकात रखने वाले गोरख के साथ यह न होता, ये कैसे संभव था. तो गोरख के साथ भी हुआ.

उन किंवदंतियों की मानें तो गोरख महाभारत काल में भी हुए. क्योंकि हमारे यहाँ गोरखनाथ के मंदिर में एक पोखरा यानी तालाब है. पोखरे के किनारे एक लेटे हुए व्यक्ति की मूर्ति है. माना जाता है कि ये भीम की मूर्ति है. भीम यहाँ बाबा गोरखनाथ को निमंत्रण देने आए थे. राजसूय यज्ञ के लिए. उनके लेटने से यह पोखरा बन गया. ऐसी ही कई और बातें हैं. इन बातों में कितना सत्य है, मैंने कभी जानने की कोशिश नहीं की.
थोड़ा बड़ा हुआ, यानी किशोर वय में आया, तो नास्तिक हो गया, यह सब मानना और सोचना एकदम बंद. राहुल, यशपाल, बर्ट्रांड रसेल, मार्क्स, एंजेल्स और थोड़ा दयानंद सरस्वती भी... आदि को पढ़ते-पढ़ते और अपने-आप से ही तर्क करते-करते इस निष्कर्ष पर पहुँच गया कि ईश्वर-आत्मा सब झूठ है. इस विषय में सोचना ही छोड़ दिया. अपरिपक्व मानस और उसमें घुस गई नास्तिकता का असर यहाँ तक हुआ कि मैंने भक्ति काल के कवियों तक को पढ़ना छोड़ दिया. जब-तब कबीर को पढ़ लेता था और वह भी केवल उनके विद्रोही तेवर के नाते. वही उतना मुझे भाता था. वह भी जहाँ ईश्वर-आत्मा की बात करते, वह मुझे फालतू लगने लगती थी.
ख़ैर, बीए में मैंने हिंदी-अंग्रेजी साहित्य के साथ एक विषय दर्शन-शास्त्र भी लिया. सेंट एंड्रयूज कॉलेज में. वहाँ मुझे दर्शन के गुरु मिले डॉ, ग़ुलाम मुहम्मद यहया खाँ. बहुत तर्क होते थे उनसे. लेकिन धन्य है उनका स्नेह. उन्हें बड़े प्रेम से मुझे झेला ही नहीं, कई बार प्रश्न करने के लिए उकसाया भी. और बहुत बार प्रश्न का उत्तर न होने पर यह भी कहा कि इसका उत्तर तुम्हें समय देगा. वाकई समय ने दिया.
गोरख को मैंने जाना रजनीश से. ओशो रजनीश. हालांकि यह बहुत बाद की बात है. मैं उस वक्त तक नहीं जानता था कि गोरख कवि भी थे. संत भी थे. भगवान होने के नाते तो मैं उन्हें किंवदंती ही मानता था. मुझे लगता था कि जैसे भगवान के नाम पर कई मूर्तियां लगी हैं, वैसे ही यह भी एक मूर्ति हैं. और सबकी तरह इनके साथ भी कुछ झूठी-सच्ची कहानियाँ जोड़ दी गई हैं. हाँ, योग-ध्यान की ओर आकर्षण होने लगा था. चूँकि इसमें शामिल भी होने लगा तो इसका आनंद भी आने लगा था. लेकिन नास्तिकता पर कोई असर नहीं पड़ा था. हालांकि पड़ा, पर वह उसके बहुत बाद की बात है.
ओशो की गोरखवाणी शीर्षक प्रवचन श्रृंखला के संकलन का श्रीगणेश यहीं से होता है. यह तो कहने की बात नहीं कि अपने समय के विचारकों में रजनीश सबसे अधिक बहुपठ थे. अबके बाबाओं को उनके समक्ष रखकर देखना भी मेधामात्र का अपमान होगा.
वह कवि सुमित्रनंदन पंत से एक भेंट का ज़िक्र करते हैं. पंत ने रजनीश से पूछा कि भारत के धर्माकाश में वे कौन बारह लोग हैं जो उनकी दृष्टि में सबसे चमकते हुए सितारे हैं. रजनीश ने जो नाम गिनाए, वे ये हैं - कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, नागार्जुन, शंकर, गोरख, कबीर, नानक, मीरा, रामकृष्ण, कृष्णमूर्ति। रजनीश मानते हैं कि यह सूची बनाना आसान नहीं है. पर जोखिम मोल लेते हैं, क्योंकि यह उनकी आदत है, और बड़े सलीके से बनाते हैं. आगे उनके तर्क देखिए,
फिर पंत का तर्क-वितर्क भी हुआ. कि राम को क्यों छोड़ा. फिर उन्होंने सात नाम गिनाने को कहे. रजनीश ने सात गिनाए ‌- कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, शंकर, गोरख, कबीर। पंत ने फिर पूछा : आपने अब जो पांच छोड़े, किस आधार पर छोड़े हैं? रजनीश ने कहा : नागार्जुन बुद्ध में समाहित हैं. जो बुद्ध में बीज—रूप था, उसी को नागार्जुन ने प्रगट किया है. नागार्जुन छोड़े जा सकते हैं. और जब बचाने की बात हो तो वृक्ष छोड़े जा सकते हैं, बीज नहीं छोड़े जा सकते. क्योंकि बीजों से फिर वृक्ष हो जाएंगे, नए वृक्ष हो जाएंगे. जहां बुद्ध पैदा होंगे वहां सैकड़ों नागार्जुन पैदा हो जाएंगे, लेकिन कोई नागार्जुन बुद्ध को पैदा नहीं कर सकता. ऐसे ही कृष्णमूर्ति भी बुद्ध में समा जाते हैं. कृष्णमूर्ति बुद्ध का नवीनतम संस्करण हैं—नूतनतम; आज की भाषा में. पर भाषा का ही भेद है. बुद्ध का जो परम सूत्र था—अप्प दीपो भव—कृष्‍णमूत्रि बस उसकी ही व्याख्या हैं.
रामकृष्ण, कृष्ण में सरलता से लीन हो जाते हैं. मीरा, नानक, कबीर में लीन हो जाते हैं; जैसे कबीर की ही शाखाएं हैं. जैसे कबीर में जो इकट्ठा था, वह आधा नानक में प्रगट हुआ है और आधा मीरा में. नानक में कबीर का पुरुष—रूप प्रगट हुआ है. इसलिए सिख धर्म अगर क्षत्रिय का धर्म हो गया, योद्धा का, तो आश्चर्य नहीं है. मीरा में कबीर का स्त्रैण रूप प्रगट हुआ है—इसलिए सारा माधुर्य, सारी सुगंध, सारा सुवास, सारा संगीत, मीरा के पैरों में घुंघरू बनकर बजा है. मीरा के इकतारे पर कबीर की नारी गाई है; नानक में कबीर का पुरुष बोला है. दोनों कबीर में समाहित हो जाते हैं.
फिर पंत ने कहा : और अगर पांच की सूची बनानी पड़े? तो रजनीश ने ये नाम गिनाए : कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, महावीर, गोरख। क्योंकि कबीर को गोरख में लीन किया जा सकता है. गोरख मूल हैं। गोरख को नहीं छोड़ा जा सकता. और शंकर तो कृष्ण में सरलता से लीन हो जाते हैं। वह कृष्ण के ही एक अंग का दार्शनिक विवेचन हैं.
फिर पंत जी ने पूछा कि अगर चार ही रखने हों?
तो रजनीश ये नाम गिनाए — कृष्ण, पतंजलि, बुद्ध, गोरख. क्योंकि महावीर बुद्ध से बहुत भिन्न नहीं हैं, थोड़े ही भिन्न हैं. पंत यहीं माने नहीं. आगे उन्होंने तीन नाम गिनाने को कहे और रजनीश ने हाथ खड़े कर दिए. उन्होंने कहा कि अब इनमें से कुछ छोड़ना तो हाथ काटने जैसा होगा. इनमें से एक के बिना भी भारत का आध्यात्मिक नक्षत्र मंडल बनता ही नहीं.
ध्यान रहे, भारत के आध्यात्मिक नक्षत्र मंडल में जो चार भुजाएँ अकाट्य हैं, अभिन्न हैं, उनमें एक गोरख हैं. और रजनीश कुछ भी ऐसे ही नहीं कहते. मैंने जाना रजनीश से कि गोरख ने क्या-क्या कहा. हालांकि गोरख के मामले में रजनीश मेरे लिए केवल प्रस्थानबिंदु भर हैं. लेकिन बहुत महत्त्वपूर्ण. शायद मैं उतनी गहराई से और किसी से न जान पाता गोरख को, जितनी गहराई से रजनीश से जाना. गोरख की रचनाएँ पढ़कर ही आप जान सकते हैं कि गोरख वह नहीं हैं, जो आज आप उन्हें यह जानते हैं.
मैंने रजनीश से जाना कि गोरख कोई काल्पनिक पात्र नहीं और भगवान भी नहीं, सचमुच के एक व्यक्ति हैं. एक योगी, एक संत और एक कवि. एक चेतना संपन्न समाज सुधारक, एक क्रांतिचेता. एक ऐसा व्यक्ति जो चेतना के शिखर पर है. "गगन सिखर महँ बालक बोलै ताका नाँव धरहुँगे कैसा". यह गोरख ही हैं, कोई और नहीं. जो अपने समय में प्रचलित सनातन और बौद्ध दोनों में व्याप्त तमाम कुरीतियों, पाखंडों, कर्मकांडों का मज़ाक उड़ाता है. उस गोरख के जीवन पर, वह भी जीवन के केवल एक हज़ार साल के भीतर ऐसी भ्रांतियां पैदा हो जाएंगी, ना, यह केवल जनमानस की ख़ूबी-ख़ामी का नतीजा नहीं है. इसके पीछे और बहुत सी वजहें हैं. उनका विश्लेषण किया जाएगा और हर ढंग के सवाल का तसल्लीबख्श जवाब भी दिया जाएगा. पर आज इतना ही. बाक़ी किसी और दिन.

#गोरखआया-1 क्र्मशः