Saturday, 26 December 2009

एक सार्थक पहल के लिए

कथाकार - ०००0 सुनीति 0०००

' अगली गोष्ठी में काव्या जी अपनी कहानी का वाचन करेंगी । ' सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया और गोष्ठी समाप्त हो गयी .

' काव्या जी, ' डॉ . ललित ने विदा लेते हुए कहा, ' अगली गोष्ठी में आपकी सार्थक कहानी सुनने का अवसर मिलेगा .' काव्या ने जैसे असमंजस की स्थिति में उनके निमंत्रण को मौन स्वीकृति दे दी . एक निरर्थक जीवन पर सार्थक कहानी कैसे लिखी जा सकती है ? जबकि कहानी की विषयवस्तु स्वयं के जीवन पर आधारित हो . काव्या को लगा मानो परीक्षा की घडी आ गयी .

महीने में एक बार होने वाली इस गोष्ठी में कोई नामचीन कथाकार नहीं आते थे . बस ऐसे लोग जो केवल स्वान्तः सुखाय के लिए सृजन में विश्वास रखते थे . हाँ यह बात अलग है कि काव्या जी और डॉ. ललित जैसे जाने माने कथाकार इससे जुड़ गए हैं . ऐसे कथाकार सार्थक सृजन में विश्वास रखते हैं . वरना आज इतर लेखन की भरमार है . कुछ हद तक इसे सच माना जा सकता है कि साहित्य में समाज को बदलने की क्षमता नहीं है . समाज और देश को बदलने वाली शक्तियां दूसरी होती हैं . एक सजग ओत परिश्रमी लेखक ताउम्र लिखकर भी किसी आदमी के जीवन को सुधार नहीं सकता ! इससे विरोधाभास क्या होगा कि काव्या जी जैसी लेखिका लेखन की दुनिया में खुद को बलशाली साबित कर चुली हैं . किन्तु वह बाहरी दुनिया में विवश, शक्तिहीन और प्रभावहीन महसूस करतीं हैं .

इतने लम्बे रचनाकाल में काव्या जी ऐसा करने से कहाँ बच सकीं हैं . उसने जब भी जीवन से जुड़े सार्थक पहलू को चरितार्थ करने के लिए कलम उठाई है, मंजिल तक पहुँचने का साहस नहीं जूता सकीं . हर बार, घर की जरूरतों को मुंह फाड़े सामने पाया . वह जरूरतों और उनकी पूर्ति के बीच महज़ एक साधन बनकर रह गयी हैं . आज काव्या लेखा में अपने अस्तित्व का परचम लहराने के बावजूद भी स्वयं अपना अस्तित्व तलाश रहीं हैं !

गोष्ठी समाप्त हो गयी . घर को सूनेपन ने आ घेरा . वह इस सूनेपन में जीवन से जुड़े सार्थक पहलू को तलाशने लगी . वह झूठे बर्तनों को समेटने की रस्म अदायगी में लग गयी . कमरे में बिछा कालीन और गालिचा बेतरतीब हो गए थे . मिसेज लक्ष्मी के चार साल के बच्चे ने दो जगह कालीन गीला कर दिया था . वह शहर के मशहूर नाक-कान-गला विशेषज्ञ की पत्नी हैं . लेखन उनका शौक है . डॉ. पति के सहयोग से उन्हें सृजनात्मक बने रहने की प्रेरणा मिलती रहती है . आर.के. श्रीवास्तव और देवदास जी अच्छे लेखक नहीं हैं लेकिन अच्छे पाठक होने का गुण उन्हें इस गोष्ठी में खींच लाता है . वे रसिक श्रोता तो हैं ही , कहानी की समीक्षा भी अच्छी करते हैं . एक आम और रसिक पाठक का प्रतिनिधित्व वे करते हैं . इससे कहानी में निखार लाने में सुविधा होती होती है . खिड़की के पास , सिगरेट के एशट्रे को उठाते समय वह बरबस मुस्कुरा उठी . शर्मा जी अपनी सिगरेट पीने तलब को रोक नहीं पाते और दो घंटे की गोष्ठी के दौरान दी-एक बार बाकायदा अनुमति लेकर खिड़की के बाहर झांकते हुए सिगरेट फूंक लेते हैं . इसके बाद , जैसे रिचार्ज होकर अपने स्वाभाविक चुटीले अंदाज़ में आ जाते हैं - ' ललित जी, आपने अपनी कहानी के इस स्त्री पात्र का नाम गलत रख दिया है !'

' क्या मतलब ?', डॉ ललित जैसे ख्यातिलब्ध कथाकार शर्मा जी की टिप्पड़ी से चौंके . काव्य जी भी शर्मा जी की ओर देखने लगीं . शर्मा जी की आँखों में शरारत खेल रही थी , ' इस स्त्री पात्र का नाम काव्या होना चाहिए था .'

एक सामूहिक ठहाके से गोष्ठी और भी अनौपचारिक हो गयी थी . डॉ. ललित हलकी मुस्कराहट के साथ अपनी कहानी का पाठ कर रहे थे . अथाह गहराई में विपुल जलराशि को समेटे समुद्र की सी मर्यादा डॉ. ललित को आम आदमी से ख़ास बना देती है . जिसमे न जाने कितनी नदियाँ अपनी उच्छ्रंखलता भूलकर विसर्जित हो जाती हैं .

ललित सदैव से ऐसे थे । एकदम शांत, मर्यादित, संवेदनशील और दूसरों की मदद के लिए तत्पर । घर के सूनेपन में रात गहराने लगी . काव्या के पुराने यादों के पन्ने फाड़ फड़ाने लगे . और समय की गर्द छांटने लगी . उसके ज़ेहन में जीवन का एक-एक सफा स्पष्ट होने लगा .
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ललित ने एक दिन काव्या से ऐसा प्रश्न कर डाला जिसकी आशा उसे ललित से नहीं थी , ' काव्या जी, अब वो समय आ गया है कि मुझे अपने दिल कि बात कह देनी चाहिए ।' काव्या अवाक ललित के चेहरे को पढ़ने लगी । ललित कहते जा रहे थे , ' अब हमें अटूट बंधन में बांध जाना चाहिए । वरना मैं अपने आप को माफ़ नहीं कर पाऊंगा . अब आपके धैर्य और मेरी मर्यादा की परीक्षा की घडी आ गयी है .' [ इसी कथा से ]
कथाकार :: // सुनीति //
[[दो दर्जन कथाएं प्रतिठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित और आकाशवाणी से प्रसारित ]]
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' क्या मैं आपकी कुछ मदद कर सकता हूँ ?', ललित ने कालेज के पार्क में तनहा बैठी कामिनी से कहा . ललित उसकी क्लास में सहपाठी था . कोई और होता तो शायद कामिनी उसे अपनी तन्हाई में दखलंदाजी को आड़े हाथों लेती लेकिन ललित के साथ उसने ऐसा नहीं किया . हांलाकि वह कालेज की उच्छ्रुन्ख्रल एवं बिंदास लड़कियों में शुमार मानी जाती थी किन्तु ललित के व्यक्तित्व के आगे उसकी उच्छ्रंलता को नतमस्तक हो जाना पड़ता था . पिछले कुछ दिनों में उसके जीवन में जो कुछ घटा उससे उसके जीवन की दिशा ही बदल गयी थी .एक कार दुर्घटना में उसके पिता इस दुनिया से कूच कर गए थे . कामिनी को याद नहीं पड़ता कि उसकी माँ कैसी थी . हाँ, पिताजी ने कभी माँ कि कमी का अहसास नहीं होने दिया था . माँ तो जैसे उस मनहूस को देखना भी नहीं चाहती थी . इसलिए उसे जन्म देकर चल बसी और अब यह भूचाल ! परिस्थितियों ने उसे अचानक बेसहारा कर दिया था . ऐसे में उसी शहर में रहने वाले छोटे मामा उसके सहारा बने .

' मैं आपके दर्द को समझता हूँ कामिनी . ऐसे समय यदि मैं आपकी कुछ मदद कर सका तो अपने आप को खुशनसीब समझूंगा .' ललित कि गंभीरता ने उसे संबल प्रदान किया और वह अपने दर्द ललित से बांटने लगी . एक धीर गंभीर और सुलझे हुए व्यक्तित्व के धनी ललित के मर्यादित व्यवहार से, कामिनी की ललित के प्रति श्रद्धा अंदरूनी प्यार में बदलने लगी . वह कठिन परिस्थितियों में हर समस्या का निदान ललित से लेती थी . छोटी मामी के ताने और चरमराती गृहस्थी को संभालते छोटे मामा के आंसू, सब कुछ ललित से छुपा नहीं था .

एक दिन उसके जीवन में फिर भूचाल आया और छोटी मामी की जिद के आगे वह हार गयी . उसे एक बेरोजगार शराबी व्यक्ति के गले मढ़ दिया गया . इस बार भी ललित सहारा बनाकर खड़े थे लेकिन उसका भाग्य और समाज की मर्यादा ने उसे परिस्थितियों का गुलाम बना दिया . वह सब कुछ छोड़कर अपनी ससुराल जबलपुर में आ बसी . समय के चक्र में उसके लिए अभी भी भंवरें बाकी थीं . शादी के छः माह बाद लीवर फेल्योर से उसके पति का देहांत हो गया . अब उसके जीवन में केवल एक सपना शेष था जो उसके पेट में साँसें ले रहा था . घर में विधवा सास के सहारे वह अपने सपने को साकार करने में जुटी रही .

कागज़ पर कलम से कहानियां साकार होने लगीं तो उसका नाम प्रसिद्धियों की बुलंदियों को छूने लगा . काव्या के नाम से वह एक स्थापित कथाकार बन गयी . काव्या की बेटी सपना , बी.इ . एम्. बी. ए. करके मुंबई स्थित प्रतिष्ठित मल्टीनेशनल कंपनी में हायर सेलरीड इंजिनियर बन गयी थी .

जीवन के इस पड़ाव में तूफानों को झेलते काव्या फिर असहाय महसूस कर रही थी . जवान बेटी के हाथ पीले करने की उहापोह में ललित फिर सामने था . एक विचार गोष्ठी में अचानक काव्या की मुलाक़ात ललित से हो गयी थी . ललित अब डॉ. ललित के नाम से ख्यातिलब्ध कथाकार जाने जाते थे . वे अब एक गृहस्थ थे . इधर कामिनी से काव्या तक का सफ़र जानकर डॉ. ललित आश्चर्यचकित थे .

वह आज भी काव्या को अन्दर तक पढ़ सकते थे . तभी तो ललित ने एक दिन काव्या से ऐसा प्रश्न कर डाला जिसकी आशा उसे ललित से नहीं थी , ' काव्या जी, अब वो समय आ गया है कि मुझे अपने दिल कि बात कह देनी चाहिए .'

काव्या अवाक ललित के चेहरे को पढ़ने लगी . ललित कहते जा रहे थे , ' अब हमें अटूट बंधन में बांध जाना चाहिए . वरना मैं अपने आप को माफ़ नहीं कर पाऊंगा . अब आपके धैर्य और मेरी मर्यादा की परीक्षा की घडी आ गयी है .'

तभी दरवाजे की कॉल-बेल बज उठी . काव्या की यादों का तारतम्य टूट गया . ' इतनी रात कौन हो सकता है ? ' उसने बोझिल आँखें दीवार घडी की ओर घुमा दीं . फिर तकिये के नीचे डिब्बे में रखी ऐनक को बूढी आँखों पर चढ़ाया - ' अब तो सुबह हो चली है , पांच बज गए ? ' वह मन ही मन बुदबुदाने लगी . वह बिस्तर से उठकर दरवाजे की ओर बढ़ी तो ऐसा लगा कि वह पूरी रात तनहाइयों में विचरती रही . शरीर का सामर्थ्य जबाब दे रहा है .

उसने दरवाजा खोला, ' अरे ! सार्थक - सपना !! तुम दोनों !!!'

सार्थक ने प्रवेश करते ही काव्या के पैर छुए . वह निहाल हो गयी और स्नेह भरे हाथ सार्थक के बालों पर फिर दिए . फिर अपनी बेटी सपना की आँखों में ख़ुशी के आंसू देखकर पुलकित हो उठी .

'हाँ, माँ हमें कल रात ललित पापा ने फोन किया था कि आप बहुत परेशान हैं और हमें याद कर रहीं हैं, ' सपना बोले जा रही थी इसी बीच सार्थक ने बात पूरी करते हुए कहा, ' हमें क्यों, अपनी बेटी सपना को याद कर रहीं थीं . तभी तो मैं सपना को लेकर रात ही फ्लाईट के निकल पडा .'

' अच्छा किया बेटा, ये ललित जी भी ?' काव्या के बूढ़े हो चले गालों पर मासूमियत खिल गयी . कुछ देर बाद सार्थक ने अपने पिता डॉ. ललित को फोन पर अपने जबलपुर पहुचने की सूचना दे दी थी . अलसाया सूरज सुबह के शीतल आकाश में बढ़ रहा था . इधर काव्या, कलम और कहानी एक सार्थक पहल के लिए आत्मसात हो गए थे .

उधर किचिन से सपना और सार्थक की ठिठोली सुनाई दे रही थी .

Monday, 21 December 2009

निठारीकरण हो गया

कर दिया जो वही आचरण हो गया ।

लिख दिया जो वही व्याकरण हो गया ।

गोश्त इन्सान का यूं महकने लगा

जिंदगी का निठारीकरण हो गया ।

क्योंकि घर में ही थीं उसपे नज़रें बुरी

द्रौपदी के वसन का हरण हो गया ।

उस सिया को बहुत प्यार था राम से

पितु प्रतिज्ञा ही टूटी , वरण हो गया ।

'राढ़ी ' वैसे तो कर्ता रहा वाक्य का

वाच्य बदला ही था, मैं करण हो गया ।

कल भगीरथ से गंगा बिलखने लगी

तेरे पुत्रों से मेरा क्षरण हो गया । ।

Friday, 11 December 2009

व्यंग्य को आलोचना की बैसाखी की जरूरत नहीं

हिन्दी व्यंग्य एवं आलोचना पर लखनऊ में यह राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई तो थी 30 नवंबर को ही थी और इसकी सूचना भी भाई अनूप श्रीवास्तव ने समयानुसार भेज दी थी, लेकिन मैं ही अति व्यस्तता के कारण इसे देख नहीं सका और इसीलिए पोस्ट नहीं कर सका. अब थोड़ी फ़ुर्सत मिलने पर देख कर पोस्ट कर रहा हूं.
-इष्ट देव सांकृत्यायन

हिन्दी व्यंग्य साहित्यिक आलोचना की परिधि से बाहर है ? इस विषय पर आज उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान और माध्यम साहित्यिक संस्थान की ओर से अट्टहास समारोह के अन्तर्गत आयोजित दो दिवसीय विचार गोष्ठी में यह निष्कर्ष निकला कि व्यंग्यकारों को आलोचना की चिन्ता न करते हुए विसंगतियों के विरूद्ध हस्तक्षेप की चिन्ता करनी चाहिए, क्योंकि वैसे भी अब व्यंग्य को आलोचना की बैसाखी की जरूरत नहीं.
राष्ट्रीय संगोष्ठी की शुरूआत प्रख्यात व्यंग्यकार के.पी. सक्सेना की चर्चा से शुरू हुई. श्री सक्सेना का कहना था कि हिन्दी आलोचना को अब व्यंग्य विधा को गंभीरतापूर्वक लेना चाहिए.  उन्होंने यह भी कहा कि अब व्यंग्य को आलोचना की बैसाखी की जरूरत नहीं है. व्यंग्य लेखन अपने उस मुकाम पर पहुंच गया है कि  उसने राजनीति, समाज एवं शिक्षा जैसे सभी पहलुओं को अपने दायरे में ले लिया है. अब वह किसी आलोचना का मोहताज नहीं है. 
यह गोष्ठी राय उमानाथ बली प्रेक्षागार के जयशंकर प्रसाद सभागार में आयोजित की गयी थी. इसमें गिरीश पंकज, अरविन्द तिवारी, बुद्धिनाथ मिश्र, सुश्री विद्याबिन्दु सिंह, डा0 महेन्द्र ठाकुर, वाहिद अली वाहिद, अरविन्द झा, सौरभ भारद्वाज, आदित्य चतुर्वेदी, पंकज प्रसून, श्रीमती इन्द्रजीत कौर नरेश सक्सेना, महेश चन्द्र द्विवेदी, एवं अन्य प्रमुख लेखकों ने अपने विचार प्रकट किए. गोष्ठी का समापन माध्यम के महामंत्री श्री अनूप श्रीवास्तव के धन्यवाद प्रकाश से हुआ. इससे पूर्व संस्था के उपाध्यक्ष श्री आलोक शुक्ल ने आशा प्रकट की कि प्रस्तुत संगोष्ठी के माध्यम से व्यंग्य लेखन को उसका आपेक्षित सम्मान मिल सकेगा.
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष और सुविख्यात व्यंग्यकार श्री गोपाल चतुर्वेदी ने कहा कि व्यंग्यकार लेखन करते रहें एक न एक दिन आलोचना उनकी ओर आकर्षित होगी. उन्होंने नए व्यंग्यकारों से आग्रह किया कि वे समाज की बेहतरी के लिए लिखते रहें और आलोचना की परवाह न करें.
अट्टहास शिखर सम्मान से कल नवाजे गये डा0 शेरजंग गर्ग का कहना था कि आज जितने भी व्यंग्यकार स्थापित हैं वे अपनी गंभीर लेखनी के कारण ही प्रतिष्ठित हैं. आलोचकों की कृपा पर नहीं हैं. कवि आलोचक नरेश सक्सेना ने नागार्जुन की व्यंग्य का जिक्र करते हुए व्यंग्य की शक्ति प्रतिपादित की.
हिन्दी संस्थान के निदेशक डा0 सुधाकर अदीब का कहना था अगर व्यंग्य लेखन में गुणवत्ता का ध्यान रखा जाय तो हमें आलोचना से घबराना नहीं चाहिए. श्री महेश चन्द्र द्विवेदी का कहना था कि हास्य और व्यंग्य अलग-अलग हैं इनको परिभाषित करने की आवश्यकता है. श्री सुभाष चन्दर जिन्होंने व्यंग्य का इतिहास लिखा है का कहना था कि व्यंग्य लेखन को दोयम दर्जे का साहित्य समझा जाता रहा है लेकिन हिन्दी के संस्थापक सम्पादक स्व0 बाल मुकुन्द गुप्त ने लिखा है कि मैंने व्यंग्य के माध्यम से लोहे के दस्ताने पहनकर अंग्रेज नाम के अजगर के मुंह में हाथ डालने का प्रयास किया था. आवश्यकता इस बात की है कि हम व्यंग्य के सौन्दर्य शास्त्र को समझें और आलोचना की समग्र पक्षों के अनुरूप व्यंग्य लेखन का विकास हो. हरिशंकर परसाई पुरस्कार से विभूषित सुश्री अलका पाठक ने कहा- व्यंग्य की आलोचना अनुचित है. हम असंभव लेखन को भी संभव करके अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं. श्री अरविन्द तिवारी का कहना था कि व्यंग्य के माध्यम से हम आम जनता का ध्यान तमाम विषयों पर दिला पाते हैं. श्री बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा- व्यंग्य कोई नई विधा नहीं है विदूषकों की परम्परा रही है. व्यंग्य को निंदारस मानना गलत होगा. वास्तव में यथार्थ की विदू्रपता पर आक्रोश व्यंग्य के माध्यम से व्यक्त किया जाता है. श्री गोपाल मिश्र का कहना था कि अच्छा व्यंग्य छोटा साहित्य होता है. अतः इसे परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं है.
डा0 महेन्द्र कुमार ठाकुर का कहना था कि हम व्यंग्यकार हैं और हमें अपने साहित्यिक शिल्प को मजबूत करने की आवश्यकता है. श्री वाहिद अली वाहिद का कहना था कि व्यंग्य हमारी परम्परा में रहा है और नई पीढ़ी को इसे आगे बढ़ाना चाहिए. श्री रामेन्द्र त्रिपाठी का कहना था कि व्यंग्यकार मूलतः आलोचक ही है इसकी लोकप्रियता ही इसकी सफलता का मापदण्ड बनता है. श्री आदित्य चतुर्वेदी के विचार मे समाज के सुधार में व्यंग्य की प्रमुख भूमिका है. श्री भोलानाथ अधीर के विचार में लेखक का दायित्व है कि वह समाज की कमियों को उजागर करे और उन पर प्रहार करे इसके लिये व्यंग्य एक सशक्त माध्यम है.

Monday, 7 December 2009

भांति-भांति के जन्तुओं के बीच मुंबई बैठक

आलोक नंदन
मुंबई के संजय गांधी राष्ट्रीय नेशनल पार्क में भांति-भांति के जन्तुओं के बीच रविवार को भांति-भांति के ब्लौगर जुटे। लेकिन एन.डी.एडम अपनी ड्राइंग की खास कला से वाकई में कमाल के थे। पेंसिल और अपनी पैड से वह लगातार खेलते रहे, किसी बच्चे की तरह। और देखते ही देखते वहां पर मौजूद कई ब्लौगरों की रेखा आकृति उनके पैड पर चमकने लगी। भांति भांति के ब्लौगरों के बीच अपने अपने बारे में कहने का एक दौर चला था, और इसी दौर के दौरान किसी मासूम बच्चे की तरह वह अपने बारे में बता रहे थे।
“मुझे चित्र बनाना अच्छा लगता था। एक बार अपने शहर में पृथ्वी कपूर से मिला था। वो थियेटर करते थे। मैं थियेटर के बाहर खड़ा था। एक आदमी ने उनसे मेरा परिचय यह कह कर दिया कि मैं एक चित्रकार हूं। वह काफी खुश हुये और मुझे थियेटर देखने को बोले। शाम को जब मैं अगली पंक्ति में बैठा हुआ था तो लोगों को आश्चर्य हो रहा था,” मुंबईया भाषा में वो इसे तेजी से बोलते रहे। जब वह अपना परिचय दे रहे थे तो बच्चों की तरह उनके मूंह से थूक भी निकल रहा था, जिसे घोंटते जाते थे।
“मैं पांचवी तक पढ़ा हूं, फिर चित्र बनाता रहा। मुझे चित्र बनाना अच्छा लगता था। चालिस फिल्म फेस्टिवलों में घुम चुका हूं, और लोगों की तस्वीरें बनाता रहा हूं...पांच हजार से भी अधिक तस्वीर मैं बना चुका हूं….....’’ वह बोलते रहे। रेखाचि्त्र में हिटलर का भी हाथ खूब चलता था, उसके बुरे दिनों में वह इसी से अपना खर्चा चलाने की कोशिश करता था। कभी-कभी बिना आधार के भी तुलना किया जा सकता है।
चार्ली चैपलिन की आत्मकथा और चाल्र्स डारविन की आत्मकथा को 2006 में अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करने वाले सूरज प्रकाश की तस्वीर उन्होंने बहुत ही सहजता से बना दी थी। बाद में अविनाश वाचस्पति को भी उन्होंने पूरी तरह से उकेर दिया था। उनका मुंबई दौरा बहुत सारे ब्लागरों को एक साथ बिठा लिया, और आगे भी बैठने की मंशा के साथ यह बैठक चलता रहा।
विवेक रस्तोगी हाल के अंदर पंखा बंद करने में परेशान भी हुये थे कुछ देर। ब्लागरों की बातों को हाल के अंदर के पंखे की आवाजों से परेशानी हो रही थी। एन.डी.एडम ने उनको भी उकेरा था। बाद में ब्लौगरों को सही ठिकाने पर लाने के लिए बैठक के दौरान विवेक रस्तोगी इधर-उधर भागते रहे, कुशल मैनेजमेंट की भूमिका में वह शुरु से अंत तक रहे (कुशल मैंनजेमेंट तभी कुशल बनता है जब वह एक साथ कई बड़ी गलतियां करता है।) ब्लागरों के साथ लगातार कम्युनिकेशन बनाये रखा उन्होंने। चाय और नास्ते में भी कमाल हो गया था। इस कमाल में इजाफा किया था अविनाश वानचस्पति ने भूने हुये काजू परोस कर। बिस्किट का दौर तो लगातार चल ही रहा था।
हाल के अंदर जैन आचार्यों की तस्वीरें टंगी हुई थी, कतार में। बैठक के दौरान दो बार ब्लागरों को इन तस्वीरों से इधर उधर होना पड़ा। वातावरण आश्रम वाला था, पहाड़ों में जीव जंतु घूम रहे थे। संजय गांधी नेशनल पार्क से जैन मंदिर की दूरी करीब करीब ढेड़ किलोमीटर थी। इस सड़क से गुजरने के दौरान पहाड़ों में निकल आई जड़ों के बीच लड़कों की विभिन्न टोलियों का आपस में क्रिकेट खेलना एक लुभावना दृश्य बना रहा था।
वाद और संवाद के दौर लगातार चलते रहे, लोग एक दूसरे को कहते और सुनते रहे। राज सिंह छक्कों की तलाश में घूम रहे थे, एक गीत पर थिरकाने के लिए। लुंगी, लोटा और सलाम नाम से एक फिल्म भी बना रहे हैं...उसी फिल्म में इस गाने की इस्तेमाल भी करने जा रहे हैं....गाने की बोल को उन्होंने कुछ इस अंदाज में सुनाया....मार मार ..आगे से मार- पीछे से मार....ऊपर से मार- नीचे से मार....लोगों को इक्कठा करने में वह भी अपने तरीके से जुटे हुये थे। उन्होंने कहा कि नेट की हिंदी को हिंदी माना ही नहीं जाता है, चाहे आप कुछ भी रच ले। वैसे राज सिंह के प्रस्ताव पर कई ब्लागर छक्का बनकर इस गाने पर डांस करने के लिए भी तैयार थे...मेकअप गेटअप भी बदलने के लिए तैयार थे। राज सिंह 26 साल बाद सूरज प्रकाश से मिल रहे थे, दोनों को सुखद आश्चर्य हो रहा था। कुछ ब्लौगर बीच में भी आये, और अंत तक आते रहे। कुछ नये रंगरुट भी
बैठक की धमक अच्छी रही, कुछ नये और कुछ पुराने ब्लागर भी आये। नये ब्लागरों को अच्छा लग रहा था यह बताते हुये कि वह कैसे ब्लागिंग में आये और पुराने ब्लागर यह बताते हुये गर्व महसूस कर रहे थे कि कई लोगों को ब्लागिंग में उन्होंने डाला है। बेशक बैठक उम्दा रही। अब आगे क्या हो सकता है, इसको मथने की जरूरत है। ब्लागिंग दिमागी अय्याशी है जैसे शब्द भी उछले और यह भी महसूस किया गया कि इसने अच्छे-अच्छे मठाधीशों की नींद हिला दी है। ब्लागिंग से जुड़े लोग हर चीज को खंगाल रहे हैं, और हर तरीके से। सारी अय्य़ाशियां इसमें मौजूद है, लेकिन इससे आगे क्या है। यह भी कहा गया कि यह खाये पीये और अघाय लोगों की चीज है। पत्नी के फटकार वाले शब्दे ब्लोगेरिया भी सुनने को मिले इसमें। निसंदेह ब्लागिंग व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का एक शसक्त माध्यम बन कर उभरा है, लेकिन अब यह सामूहिकता की ओर भाग रहा है व्यवहारिक रूप से। मजे की बात है कि बैठकों का दौर विभिन्न शहरों में विभिन्न तरीके से चल रहा है। क्या यह ब्लाग जगत के यूनाइटेड एजेंडे की ओर बढ़ता हुआ कदम है...या फिर मानसिक अय्याशी का ही एक हिस्सा। आने वाले दिनों में ऐसे बैठकों में ऐसे सवालों पर चर्चा हो तो शायद सार्थकता की ओर बढ़ता हुआ एक कदम होगा, सोशल मोबलाइजेशन तो यह है ही। आत्म अभिव्यक्ति ही सामूहिक अभिव्यक्ति की ओर ले जाती है। और यही तो कामन विल होता है। समाज के हर तत्व का अंश उसमें होता है। ब्लाग समृद्ध हो रहा है, हर दिन और हर पल। चौंकाने वाली चीजें यहां आ रही हैं, और भरपूर मात्रा में आ रही है और चौतरफ आ रही है। लोग मुखर हैं, और हर नजरिये से मुखर हैं। चार्ली चैपलिन को इस बैठक में लिया जा सकता था, या फिर चाल्र्स डारविन को सूरज प्रकाश की अनुदित आत्मकथाओं के बहाने। बौद्धिक स्तर पर बैठक समृद्धि की ओर बढ़ती, और ब्लाग भी, और ब्लाग लेखन भी।

Friday, 4 December 2009

ललन और लोलिता को सांस्कृतिक ठेकेदारों से बचाते हैं जज पंत

मैं एक जज की गरिमा को पूरी मजबूती से स्थापित करना चाह रहा था...इसलिये जज पंत के रुटीन को लेकर चल रहा था ताकि दर्शकों के बीच जज पंत की पहचान एक गंभीर जज के रूप में हो। सीन 6 और 7 में कहानी को आगे बढ़ाते हुये एक जज के मैनेरिज्म को ही स्थापित किया गया है। उसका नौकर भंडारी और बाकी के गनमैन जज पंत की आभा को ही विस्तार दे रहे हैं। सीन 8 में ललन और लोलिता एक बार फिर आ रहे हैं। वेलेंनटाइन डे के दिन ललन लोलिता को लेकर जाते हुये एक पार्क के करीब एक सांस्कृति संगठन का निशाना बनता है और जज पंत उन्हें बचाते हैं।

Scene 6

Characters : Pant, Bhandari and four gunmen
Ext/morning/ portico
(Pant comes out from the door and advances to the portico. A white ambassador car is standing there. A police man with his gun and a driver are waiting for him. Having seen Pant the gunman open the back door of the car, the second police man sits at his driving seat.)

Pant
(standing at the car’s back door) kal tum bata rahe the ki tumahari shadi ho gai hai?
Bhandari

Ji sahab.
Pant
Ghar kitane din se nahi gaye?
Bhandari
Ek sal se.
Pant
Main kuch din ke liye bahar ja raha hun, ….Tum chaho to chuti le sakate ho…aaj se hi.
Bhandari
(Happily) Ji bahut acha sahib, lekin aap ja kanha rahe hai?
(Pant looks at Bhandari. Bhadari feels that he has asked something wrong. He drops the news papers in the back seat of the car. Pant enters into the car. The gunman closes the door and sits on the front seat besides the driver. The car starts moving. At the main gate two gunmen are standing. Both of them salute Pant. Pant calls one of them )
Pant
Kal se yaha kisi bhi gunman ki duty nahi hogi…main bahar ja raha hun.
Gunman
Sir hame order mil gaya hai . Sham 4 baje tak humlog post chor denge.
(Pant asks driver to go ahead.The car goes out of the main door.)

Cut to…

Scene 7
Characters—Pant and two police man.
Ext/day/ roadside
7A.
The car is running on a road. Pant is sitting inside the car and reading a news papers.
7B. At four square roads, a traffic police sees Pant’s car and salutes. He stops all the traffic and gives way to pant’s car.
Note- The dignity of a Judge car is established in the traffic world.
Cut to…



Scene 8
Characters—Pant, a gunman, a driver, Lalan, Lolita, five boys and ten passerby.
Ext/day/in front of a public park.
(Lalan is being beaten by five boys. He is protesting according to his own way, discussing with them. Lolita is standing besides him, she is fearful. Some passerby are watching them from some distance )
Lalan
Dekho hath mat lagana…Hamari jo marji aaye kare …tumlog kaun hote ho rokane wale?
The first boy
(slaps him) Sarvajanik jaghon per ashlilata failana mana hai….samaj per bura prabhav parata hai.
The second boy
(The second boy snatches a heart shape balloon from Lolita’s hand)
Abhi dudh ke dant tute nahi aur chali hai muhabbat karane….tere ghar walon ko pata hai ki tu isq ladane nikali hai ?
Lalan
Usase kaya bat kar rahe ho..mujhase bat karo.
The third boy
(slaps Lalan from behind) Ha, bol kaya bat hai….vo kaya kahate hai Velentine day manane aaya hai….angrej chale gaye lekin unake tote abhi bhi yaha ud rahe hai.

Lolita
(In a slow voice) Lalan chalon yaha se.
Lalan
Tum thaharo main inse bat karata hun.

The fourth boy
Galati isaki nahi isake ma-bap ki hai…
The second boy
(Blasting the balloon at the Lolita face)
Tere dil ki hawa nikal gai.

Inter cut…..
(:Pant’s car is coming. He sees some disturbance. When the car comes very near to the place he recognizes Lalan )
Pant

(to gunman) us ladake ko yaha le aao.
(The car stops at the Lalan. All persons looks at the car. The gunman comes out )
Gunman
(Harshly) kaya ho raha hai yaha?
The first boy
(touching the Lalan chick)
Apane yahan ke kuch bachoon per bhulentaine baba ka bhut swar ho gaya hai…use hi deshi andaj me utar rahe hai.
Lolita

(To gunmen) Sir ye log Lalan ko pit rahe hai.
The second boy
Jab bache bigar jate hai to ma-bap unhe thora-bahut pitate hai.
Gunman
Cahlo sab hato yahan se.
(gunman forces everyone to leave the place. All the boys move smoothly )
Gunman
(coming near to Lalan) Tumhe saheb bula rahe hai.
(Lalan comes to car and Pant opens the window)
Lalan
Sri aap!
Pant
Kaya ho raha hai yahan?
Lalan
Main Lolita ko purpose karane ke liye yaha lekar aaya tha…aur ye log disturb karane lage.

Pant
(Looking to Lolita)
Purpose kiya?
Lalan
Abhi nahi Sir.
Pant
Then do it. ….car me baitho tum logon ko kahi chor dunga.
Lalan
Vo chale gaye hai….ab koi pareshani nahi hogi.
Pant

Are you sure?
Lalan
Yes, sir.
Pant

(Moving to driver)
let us move.

(The car starts running)
Inter-cut
(The car inters into a court campus and stops in special gallery where a board is hanging …specially for Judge )
(अगला किश्त अगले शुक्रवार को...)


Tuesday, 1 December 2009

कहां है चैनलों को मिले 268 नोटिसों का जवाब ??

आलोक नंदन
सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय ने कलर्स टीवी पर चलने वाला धारावाहिक “ना आना इस देश लाडो” और तथाकथित रियलिटी शो “बिग बास 3” के लिए कलर्स चैनल को कारण बताओं नोटिस जारी किया है। सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय का कहना है कि “ना आना इस देश लाडो” में एक मजिस्ट्रेट को नकारात्मरूप से दिखाया जा रहा है, जो सरासर गलत है। सूचना एंव प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी मजबूत तर्क प्रस्तुत कर रही हैं कि एक मजिस्ट्रेट को इस रूप में नहीं चित्रित किया जा सकता है। राज्य की छवि इससे खराब होती है, और राज्य को यह पूरा अधिकार है कि वह अपने सार्वजनिक पदों के मान और सम्मान की रक्षा करे। मंत्रालय का कहना है कि अब तक प्रोग्राम कोड को ठेंगा दिखाने वाले विभिन्न चैनलों को 268 नोटिस भेजे जा चुके हैं। यदि इनलोगों ने अपने आप को नियंत्रित नहीं किया तो अब नोटिस नहीं भेजा जाएगा, बल्कि सीधे कार्रवाई होगी। बिग बास 3 में संचालक की भूमिका में अमिताभ बच्चन भी हैं, और बिग पर अश्लीलता परोसने की बात सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय कर रहा है।
ना आना इस देश लाड़ो को कन्या भ्रूण हत्या के इमोशनल ड्रामे के साथ परोसा जा रहा है, लेकिन जिस तरह से एक मजिस्ट्रेट को करप्ट दिखाया जा रहा है, उससे मंत्रालय की त्योरियां चढ़ी हुईं है, हालांकि इससे आम जन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है कि मजिस्ट्रेट करप्ट है या नहीं। क्योंकि करप्शन के पीछे आम जनता की साइकोलोजी कुछ और है। करप्शन को वह देश भर में सहज भाव से लेती है, एवरी वाक आफ लाइफ में। एक मजिस्ट्रेट को करप्ट दिखाने और न दिखाने से आम जनता के सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता है। वह इसको लेकर हैबिचुअल है, हालांकि सूचना मंत्रालय का यह कदम नैतिकता से भरा हुआ है, उसे पूरा हक है कि वह राज्य अधिकारियों सम्मान की रक्षा करे। लेकिन इनकी धज्जियां तो फिल्मों में विभिन्न स्तर पर अर्से से उड़ाई जा रही हैं, छोटे पर्दे ने इधर शुरु की है। हालांकि एक प्रश्न स्वाभाविक है कि तमाम तरह की चीजों को कम्युनिकेट करने वाले चैनल्स नोटिस का जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं। 268 नोटिस में से अब तक कितने चैनलों ने जवाब दिया है, यदि नहीं तो क्यों नहीं, और यदि हां तो क्या ?? आम जन के लिए सूचना के अधिकार के तहत यह जानना रोचक होगा। इलेक्ट्रोनिक संचार माध्यमों को रेग्लुरेट करने की बात लगातार हो रही है, और अब अंबिका सोनी नोटिस से आगे बढ़ने की बात कर रही हैं, तो निसंदेह कुछ भी हो सकता है।
बिग बास 3 को बार बार अश्लील कहा जा रहा है, और ऐसा लोगों ने भी कई बार महसूस किया है, और चिंतित भी हुये हैं। हालांकि उस तरह के दृश्य को रियलिटी शो के नाम पर जिस तरह से परोसा जा रहा है, उसे देखने की गुप्त मंशा रखने वाले दर्शकों की भी कमी नहीं है, लेकिन भारतीय शिष्टाचार के स्तर पर लोगों ने इसे लेकर ऊबकाई जरूर महसूस किया है। बेशक नब्बे फीसदी लोग मानते हैं कि यह बदबू से भरा हुआ रियलिटी शो है, और दूर दूर तक फैले हुये भारतीय संस्कृति को मवाद की तरह प्रदूषित करने का काम कर रहा है। हालांकि अब लोग इसके भी अभ्स्त हो चले हैं।
वैसे इस तरह के रियलिटी शो के पहले संवादों के माध्यम से महेश भट्ट और एकता कपूर लोगों के दिमाग में बहुत ज्यादा थूक चुके हैं। स्वाभिमान और बाद में सास बहू के ड्रामे के नाम पर अवैध संबंधों की इतनी किश्तें दिखाई कि छोटे छोटे शहरों तक में अच्छी-अच्छी औरतें भी फैन्टसी में इसका सूख लेने लगी थी। खैर जो होना था वह हो चुका है, उस पर सिर फोड़ने से कुछ नहीं हो सकता। सोचने वाली बात यह है कि अमिताभ बच्चन बिग बास 3 में क्या कर रहे हैं। क्या वह सिर्फ कमाऊ मशीन बन चुके हैं?? यदि वह ऐसा सोंचते हैं तो उन्हें भी निसंकोच इसी पांत में बिठाकर क्षमा किया जा सकता है। लेकिन कहीं न कहीं उनसे इतनी उम्मीद तो लोगों को बंधती ही है कि लोगों के दिमाग को करप्ट करने वाली चीजों से वह दूर रहे। वैसे प्रोफेसनिल्जम का तकाजा यही है कि वह बस माल बटोरते रहे, दुनिया जाये भाड़ में।
बहरहाल अंबिका सोनी मीडिया को सेल्फ रेग्युलेट करने पर जोर दे रही हैं, जिसे मीडिया वाले या तो समझ नहीं पा रहे हैं, या फिर अपने आप को समझने और समझाने की सीमा से परे समझते हैं। सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय कलर्स को केबल टेलीविजन रेगुलेशन एक्ट -1955 को सख्ती से पालन करने को कह रहा है।

Sunday, 29 November 2009

टीवी क्राइम शो और उसके इफेक्ट को रिफ्लेक्ट करता फिल्म राब्स का सीन 5

मित्रों आलोक जी ने यह एपिसोड समय से लिखकर सहेज दिया था, मैं ही अपनी निजी व्यस्तता के कारण इसे पोस्ट नहीं कर सका.  बहरहाल, आशा है सुधी पाठक देर के लिए मुझे क्षमा करेंगे.
फिल्म की पटकथा में जितनी महत्वपूर्ण चीज़ कहानी होती है, उतना ही महत्वपूर्ण होता है  उसके अलग-अलग चरित्रों का विकास. यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है फिल्म में कब, कहां और किस तरह उनकी एंट्री कराई जाए. यह सब कई बातों को ध्यान में रख कर करना होता और वह भी एक ख़ास रणनीति के तहत. इस किस्त में आलोक नन्दन ने इन्हीं बारीकियों का ज़िक्र किया है. 
                                                                                                   - इष्ट देव सांकृत्यायन


आलोक नंदन
सीन 4 में जज पंत के दैनिक जीवन को दिखाया गया है...उसके दिन की शरुआत गार्डेन से होती है, फूल-पत्तियों से उसे प्यार है। इस सीन में ललन को इंट्रोड्यूस किया गया है...साथ ही एक और नाम आया है...मैक्सफियर...जब मैं इस स्टोरी को डेवल्प कर रहा था तो मुझे लगा कि इसमें एक ऐसे कैरेक्टर का समावेश करूं जो सही मायने में इंग्लैंड से जुड़ा हो....दिमाग शेक्सपीयर पर आकर टिक गया...शेक्सपीयर को लंबे समय से पढ़ता आ रहा था. नाटक लिखने के पहले वह एक्टिंग भी किया करते थे, तो सोचा कि क्यों न शेक्सपीयर को ही एक कैरेक्टर के रूप में इसमें शामिल करूं...अपने एक बड़बोले गीतकार मित्र मंथन के साथ इस पर चर्चा की तो वह बहकने लगा...और एक  ख़ास अदा के साथ इस पर एक्टिंग भी करनी शुरु कर दी...और साथ में इस चरित्र की विशेषताएं भी बतलाने लगा कि यह काफी डरपोक किस्म का इन्सान है, लेकिन इसे जानवरों और आदमियों से बहुत प्यार है. इस चरित्र का नाम मैक्सफियर उसके मुंह से ही निकला और मुझे जंच गया. सीन 4 में मैक्सफीयर के नाम का सिर्फ जिक्र है...इससे मुलाकात आगे होगी. यह जरूरी नहीं है कि किसी चरित्र को आप सीधे-सीधे दर्शकों के सामने ले आएं. किसी पात्र के माध्यम से भी आप उसे दर्शकों के सामने ला सकते हैं. इस सीन में मैंने इसी तकनीक का इस्तेमाल किया है.
मीडिया की कार्यप्रणाली और इससे जुड़े लोगों को लंबे समय से मैं करीब से देखता आया था. सीन 5 में समग्र रूप से मीडिया के रूप को रखा है. टीवी पर प्रसारित किए जाने वाले तमाम क्राइम शो और उसके इफेक्ट को लेकर मैं बेचैनी महसूस करता था. एक बार मेरी एक मित्र की मां ने मुझसे कहा था कि उनके पति एक क्राइम शो को लगातार देखते आ रहे हैं, और अब उन्हें विश्वास हो चला है कि उनका बेटा और उनकी पत्नी उनके पैसे के लिए उनकी हत्या करने की योजना बना रहे हैं. यह सुनकर वाकई मैं अवाक रह गया था. उस वक्त मैं एक टीवी चैनल में काम रहा था. टीवी चैनल के प्रबंध संपादक से मैंने कहा कि एक महिला ऐसी ऐसी बात कह रही है, क्यों न उसे स्टूडियो में बुलाकर इस पर एक कार्यक्रम तैयार किया जाए. उन्होंने मेरी बात को तव्वजो नहीं दिया. लेकिन यह बात मेरे मन में धंस सी गई थी. परिस्थिति बनने पर सीन 5 में यह निकलती चली गई . तो इस बार प्रस्तुत है फिल्म राब्स के सीन 4 और 5.......



Scene 4
Characters—Pant, Lalan, Bhandari and two gunmen.
Ext/early morning/ Pant’s garden
(Pant is busy with a rose plant, cutting its unwanted branches. He is still in his night dress. Two gunmen are standing at the main gate. Lalan, sixteen years old, delivering milk to Bhandari, turns back to the main gate. He is in a happy mood. During his return he sees a beautiful glooming rose and he tries to break it. Pant sees him touching the rose and cries not to touch it but he does his job before his words comes to his ear.Pant becomes angry. He comes to Lalan )
Pant
(In an angry mood but in a control vioce)
Tumhari himmat kaise hui is gulab ko torare ki?
(Lalan keep silence, looking here and ther)
Main hawa se nahi tumase baten kar raha hun.
Lalan
Ji mujhe yeh gulab acha laga…aur…
Pant
Aur tumane ise tor liya…kayo?
Lalan
(With some hesitation) Ji
Pant
(After controlling his anger completely)
Tumhare pita ji ka kaya nam hai?
Lalan
Raja Ram.
Pant
W oh tumhe ache lagate hai?

Lalan
Ji ha.

Pant
Phir to tumhe unhe bhi tor dena chahiye…is gulab ki tarah (denoting to rose)
Lalan
Mujhe maph kar dijiye…Aaj ke bad main aisi galati nahi karunga.
Pant
(In polite voice) Sundarata niharane ke liye hai na ki tor-phor ke liye….beshak yeh gulab tum le ja sakate ho.
Lalan
(with a smile) Sir aapaka yeh sabak main jindagi bhar yad rakhunga.
Pant

Good, dudh dene to tumhare pita ji aate the…aaj w oh nahi hai?
Lalan
Woh Shahar se bahar hai.
Pant
Thik hai tum jao….vaise is gulab ka tum karoge kay?
Lalan
Sir, main aap se jhuth nahi bol sakata.
Pant
Usaki jarurat bhi nahi hai…main sach sunana chahata hun.
Lalan
Aaj Velentain day hai ..yeh gulab mai apani girl friend do dena chahata hun.
Pant
Kaya nam hai usaka?
Lalan
Lolita.
Pant
Aur tumhar?
Lalan
Lalan.
Pant
Tum usase payar karate ho?
Lalan
Ji..bahut payar karata hun.
Pant
Aur woh bhi tumhe payar karati hai?
Lalan
Shyad,,aisa mujhe lagata hai….aaj main use propose kajunga..Maxfear sahab ne kaha hai ki aaj ke din propose karne se koi ladaki bura nahi manati hai..
Pant
Maxfear!
Lalan
Ha, unhone ne Shakespear per research kiya hai….unhone ne hi kaha hai ki pahle main ladaki ko ek lall gulab dun aur phir propose karu..

Pant
Aisa tumhe kayo lagata hai ki woh ladaki tumhe bhi payr karti hai?
Lalan
(enthusiastically) subah-subah apane kutte ko lekar jab woh tahalti hai to main bhi uskake sath hota hun…apane kutte ko puchkarate huye woh meri oor bare payar se dekhati hai…Maxfear saheb ne mujhe usaki aankhon ki bhasa smjhane ke kuch formula bataye hai…kabhi-kabhi to woh mujhse apane mathmatics ke kuch prasan bhi hal karwane aati hai…aur bilkun mere bagal me baithti hai….halani ki mere maths kamjor hai aur main un prasno ko hal nahi kar pata hun.

Pant
Koshish karate raho…maths needs more and more practice..ab tum ja sakate ho.
Lalan
Thank u sir.
(Lalan advances to the main gate.Pant thinks something standing there)
Pant

One minute please
(Lalan turns with a question mark in his eyes. Pant pull down a rose and hands it over to Lalan)
Pant
Yeh tumhare liye meri oor se.

Cut to

Scene 5
Characters- :Pant, Bhandari, Priyadarshani and Bundela.
Int/morning/ drawing room.

(A TV in on. A special show ‘Breakfast News’ is being produced by Fast News Channel. Pant in his judiciary dress taking his breakfast. All the news papers are on the table.All the eating materials are also present on the table. The first shot open with the ancor Priydarshani)

Priydarshani
(The TV shot) Break fast show me aap sabhi darshakon ka swagat hai. Vishes kahabaron ke sath-sath aaj hum aapaki mulakat karayenge TV ki duniya ke pramukh crime show Crime Act ke vishes reporter aur ancor Bundela se. Is crime show se sambandhit sawalon ke liye aap hamari studio me direct phone kar sakate hai. Apane subah ke nasate ke sath aap hamare sath bane rahiye vishesh show Break Fast me….Hum abhi hajir hote hai ek chote se break ke bad.

Add 1
(Priydarshani disappear form the screen and add starts. A man stands before a door. In his hand there is a briefcase. He is looking very tired. He rings the call bell. A beautiful woman opens the door. She is in a sexy night dress. She stands at the door and advances his right hand with a sexy smile and some resistance as if she does not allow man to enter into the room without taking her gift. The man takes out a packet of condom from his pocket and g ives it to her. Both of them look each-other lustfully )
Cut to….

In the second scene of this add. The Woman dresses are laying over the man’s drees on the flour. The laughing sound of woman can be listened ….VO---Up or down everyone wants climax. A packet of climax condom is seen over the man and woman dress. A sexy voice of a woman can be heard…I want only climax.
Cut to……
Note—the add of this climax condom must be prepared according to rules of add world.
(Pant cut omlet with a knife and looks to the TV. Bhandari is standing besides him taking a glass of juce. He is also watching the TV. Both of them have its unique reaction)
Add 2
A healthy man with his long mostache appears on the screen.
VO: Dad, khaj aur khujali ka shartiya ilaj . Swapandosh, shighra patan aur mardana kamjori ke chamtkari ilaj ke liye shighra mile…ilaj pahle aur paisa bad me.

(Disgusting reaction of Pant’s face, Bhandari, too, feel the same thing )
Add 3
A beautiful girl in her excutive drees sitting on a chair in her luxurious office.She is working over her computer.She looks to the camera and says confidently.

The girl
Her mahine mahilaon ki jindagi me kuch aise pal aate hai jb usaki jindagi thahar jati hai…lekin mujhe to hamesha aage barate rahana hai…mere sapanon ko sakar karane me madad karata hai Safe and Smooth….Aap bhi aage bar sakati hai Safe aur Smooth ke sath…A packaging of Safe and Smooth is seen on the screen. The young girl gives a pleasant and confident smile.

Cut to….


(Pleasant reaction of Bhandari, Pant, too, feel easy. Again Priyadarshani appears on the screen)
Priydarshani
Namskar, Vishesh karykram Break fast Show me ek bar phir aapka swagat hai.TV ki duniya ke Hit show Crime Act ka aaj pure do sal hone ko aaye. Is lokpriye show ke reporter aur ancor Bundela hamare sath hai…Is show ki kamyabi ke bare me inse bat karenge, lekin pahale dekhate hai is show ki kuch pramukh jhalakiya.
(In his special scaring get-up Bundela appears on the screen.He walks here and there with a frightening manner)

Bundela


Apane ashik ke isk me giraftar ak aurat ne n sirf apane pati ko jahar dekar mar dala balaki apane do bachon ko bhi maut ke hawale kar diya…Sath sal ke ek bure ne apani bhanji ke sath balatkar kiya aur bhed khul jane ke bhay se usaki hatya kar di…Sharab ke nashe me dhut bete ne apane bap ko kulhari se kat dala …isake sath hi aap aaj crime show me dekhenge ----sautali ma ka kahar.
(Raction of Pant and Bhandari. Pant looks angry but takes some special interest in it)
(Priyadarshani and Bundela appears on the screen, sitting together )

Priydarshani
Bundela is crime show ki lokpriyata ka raj kaya hai?
Bundela
Hamari koshis hoti hai ki hum logon ko crime scene ke real feeling de…unhe is bat ka ehsas ho ki crime unake samane ho raha hai.
Priydarshani
Punjab ke jalandhar jile se ek mahila aapse kuch kahana chahti hai…ha kaya nam bataya aapne?

Kuldeep kaul,s voice
Kuldeep kaul.
Pridarshani
Ha, aap puchiye ..

Kuldeep’s voice
(an angry voice) aapka programme dekhane ke bad mere pati ki mansik halat kaphi bigar gai hai…apane bachon ko chor dijiye…unhe mujh per viswas nahi raha…vo phauj se retire huye hai…unhe har waqt yehi lagata hai main unaki hatya karane wali hun…insane ki ghinoni harkat wale is bibhatswa programme se aap kaya messeage dena chahate hai?
Bundela
Hamara udesh logon ko bhaybhit karana nahi balki unhe jagruk karana hai.
Kuldeep’voice
(more angry) yeh kaisi jagrukata hai jisaka asar bujurg aur bachon per par raha hai?..Aap hamare ghar me ghuskar hamare pariwar ko mansik rup se bimar kar rahe hai….
Bundela
Dekhiye hum crime free society chahate hai…log crime ke prati shatark rahe
Kuldeep’s voice
Kaya is tarah ke crime show ko dekhane ke bad ….log sadhu ho jayenge?
(All of sudden TV goes off. Bhandari serves the juce )
Bhandari
Sahab lagata bijali chali gai.
(Pant without any word drinks juce and stands up and advances to the door. He is in his judiciary dress. Bhandari takes up all the news papers and follows him)

Cut to….
नोट---सीन 5 में कुछ छोटे छोटे एड भी दिये गये हैं, जो एड मैकिंग तकनीक को समझने में सहायक हो सकते हैं। साथ में एंकरिंग की भी जानकारी दी गई है....टीवी पर एंकरिंग करने के इच्छुक लोग भी इससे लाभ उठा सकते हैं।