शब्द अपने संकेत और ध्वनि खो देते हैं,
रश्मियों का उभरना भी बंद हो जाता है...
विरोधाभाषी शंकायें एक दूसरे की हत्या
करते हुये समाप्त होते जाती हैं...
आंखों के सामने बहुत कुछ दौड़ता है
लेकिन दिखाई नहीं देता......
बाहर का शोर अंदर नहीं आता
..................सब कुछ सपाट।
पता ही नहीं चलता...शून्य में मैं हूं
या मुझमें शून्य है....
मीलों आगे निकलने के बाद अहसास
होता है मंजिल के पीछे छूटने का....
और फिर मंजिल भी अपने अर्थ खो देता है...
मंजिल सफर का शर्त नहीं हो सकता...
इस रहस्य को मैं गहराई से समझता हूं,
अनजाने रास्तों पर भटकने
की बात ही कुछ और है...
कोलंबस के सफर की तरह...उनमुक्त और बेफिक्र...,
शून्य के परे तुम उभरती हो,
एक दबी सी मुस्कान के साथ...
खाली कैनवास पर रंग खुद चटकने लगते हैं...
तुम एक रहस्मयी धुन में गुनगुनाती हो...
और खींच ले जाती हो मुझे ओस में लिपटे एक तैरते द्वीप पर...
रात सफर में हो तो सुबह आ ही जाती है....
प्रयोग से गुजरने की जिद तुम्हे भी है, मुझे भी...
Tuesday, 14 July 2009
Monday, 13 July 2009
क्यों न रोएँ ?
शीर्षक पढ़ते ही आपने मुझे निराशावादी मान लिया होगा। किसी तरह कलेजा मजबूत करके मैं कह सकता हूँ कि मैं निराशावादी नहीं ,आशावादी हूँ। पर मेरे या आपके ऐसा कह देने से इस प्रश्न का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। सच तो यह है कि आशावाद के झूठे सहारे हम अपने जीवन का एक बडा हिस्सा निकाल लेते हैं। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। पर आंसू भी कम बलवान नहीं होते और कई बार हम अपने आंसुओं को दबाने के असफल प्रयास में भी रो पड़ते हैं। चलिए, माना हमें रोना नहीं चाहिए, लेकिन क्या इतना कह देने से रोने की स्थितियां उलट जाएंगी ?क्या हर भोले-भाले और निर्दोष चेहरे पर असली हँसी आ जाएगी ?
कहाँ से शुरू करें ?अभी कल की बात है, बाजार गया था। किराने की एक बड़ी सी दूकान पर एक मजदूर ने दाल का भाव पूछा। चैरासी रुपये किलो! बेचारे का चेहरा उतर गया। “पाव कितने की हुई ?”इक्कीस रुपये। डरता हुआ सा वह धीरे से वापस चला गया। मैं सोचने को विवश हो गया कि आज वह परिवार क्या खाएगा? कई दिनों बाद सौ रुपये की दिहाड़ी लगाने वाला मजदूरकिस कलेजे से अपनी ”आय” का एक चैथाई एक वक्त की दाल पर खर्च कर देगा ? अब दाल रोटी से नीचे क्या है! शायद नमक रोटी ! धीरे-धीरे नमक पर भी गाज गिरने लगी है । खुला नमक प्रतिबन्धित हो गया है। हानिकारक होता है ! घेंघा की बीमारी हो जाती है। हमें आपके स्वास्थ्य की चिन्ता है। आपको आयोडीन नमक खाना ही होगा, वरना आपके बच्चे मन्दबुद्धि पैदा होंगे। आयोडीन नमक पैकेट बन्द मिलता है । यह बात अलग है कि इस नमक पर बेचारे को दिहाड़ी का दस प्रतिशत खर्च करना पड़ता है। अब बेचारा नमक भी कहां से लाए? प्रेम चोपड़ा का एक डायलाग याद आता है- नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या ?
विडम्बना तो यह है कि हमें उसके इस जीवन से भी जलन है। लाखों का टैक्स चोरी करने वाला “सभ्य ” नागरिक भी परेशान है, उसे मजदूर का “सुख चैन” देखा नहीं जाता- हमसे तो अच्छा मजदूर ही है,कल की चिन्ता नहीं। दाल रोटी खाकर चैन से सोता तो है! चलो भाई , नहीं खाएगा दाल रोटी।
सरकार बहुत सक्रिय है। उसने नरेगा( रोजगार गारंटी अधिनियम) बना दिया है। अब सारा हिन्दुस्तान सुखी होगा, सबको रोजगार जो मिल गया! फिर भी लोगों को लग रहा है कि महंगाई बढ़ रही है जबकि इसका कोई प्रमाण अभी तक उपलब्ध नहीं है।सारे सूचकांक नीचे गिरे पड़े हैं। रेपो रेट भी घट गया है। मुद्रास्फीति गिरकर कहां गई, पता ही नहीं लग रहा! अभी जून के आखिरी सप्ताह में महंगाई दर शून्य से भी नीचे चली गई थी और आप कह रहे हैं कि महंगाई बढ़ रही है ?पब्लिक झूठ बोलती है। उसे सब कुछ फ्री चाहिए। हमारा थर्मामीटर नहीं बता रहा कि आपको बुखार है तो कैसे मान लें ? आपका शरीर तप रहा हो तो आप जानें। आप रो नहीं रहे, आप नखरे कर रहे हैं। आप निराशावादी लगते हैं।
बड़े लोग हमेशा से कल्याण में लगे हैं। जैसा कि मैंने पहले कहा, आयोडीन से आप की सेहत सुधारी ,आपके लिए इन्होंने और भी कल्याणकारी काम किया। आपको याद न हो,ये बात अलग है । आपको भूलता भी तो बहुत जल्दी है! जहां आयोडीन खिलाकर आपको घेंघा से मुक्ति दिलाई और आपका बुद्धिवर्धन किया, वहीं कॅन्डोम की बिक्री बढ़ाकर आपको एड्स से बचाकर नया जीवन दिया। एड्स अच्छा आया। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का कॅन्डोम अपने देश में आया ।बच्चा बच्चा एड्स के बारे में जान गया है।खुल के जियो, खुल के बात करो , खुल के यूज करो।रब जाने कब जरूरत पड़ जाए। उपलब्धता की गारंटी बढ़ा दी गई है। हर सार्वजनिक शौचालय पर जोश स्पॉट है। हमेशा जोश में रहो!
ददुआ को मारने में भले ही बावन घंटे लग जाएं, रणवीर सिंह (देहरादून इंकाउंटर मामले का शिकार ) को मार गिराने में बावन मिनट भी नहीं लगते!इसमें हमारा प्रषासन बड़ा तेज है।अब गाजियाबाद के उस परिवार के आँसू देखकर भी हमें नहीं रोना चाहिए।ऐसी छोटी मोटी घटनाएं तो होती ही रहती हैं। ये मैं नहीं कह रहा हूं ,एक बड़े नेता ने कहा था।
इसी से एक बात और याद आई। हमारे राज्य हमारी निजी सम्पत्ति हैं।बिना हमारे वीजा के आप यहां कैसे आ गए ? वह भी घूमने फिरने नहीं, नौकरी करने ?
जैसे तैसे जी भी रहे थे,पर ये टीवी न्यूज चैनल वाले जीने नहीं देते । डराते रहते हैं। पता नहीं कहां कहां से खबर जुटाते रहते हैं। जिसे घी समझ के खा लेते थे और बलवान होने का भ्रम पालकर खुश हो लेते थे, उसे इन्होंने यूरिया और सर्फ का अवलेह सिद्ध कर दिया, दूध को पेण्ट का उत्पाद साबित कर दिया। हमने भी अच्छा धंधा अपना लिया है। मैं आपको नकली घी दूध बेच दूं , आप मुझे नकली दवाई बेच देना। हिसाब बराबर! पर वो बेचारा गरीब क्या बेचेगा ? हाँ, याद आया, उसके पास गुरदा है। वो अपना गुरदा बेच देगा। दो चार दिन के लिए ये वाली दाल और पैकेट वाला नमक तो मिल ही जाएगा !रोएगा तो कौन सी नई बात ? और वह है किस लिए ?
अभी तो और भी समस्याएं हैं।हमें यौन शिक्षा लागू करनी है। बिजली पानी मिले न मिले , गे कल्चर वालों को सुविधाएं उपलब्ध करवानी है। अमेरिका की बराबरी करनी है हमें। एम जे की मौत पर मरने वालों को ढांढस बधाना है। वे भी तो बेचारे रो रो के लार बार हुए जा रहे हैं। आपको तो बस महंगाई और व्यवस्था की पड़ी है!
मैंने बहुत सोचा कि न रोऊँ इन हालात पर। पर मन यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि हालात रोने के नहीं हैं ।सोचता हूँ काश! हम इन मुद्दों पर एक बूंद आंसू बहा सकते!
कहाँ से शुरू करें ?अभी कल की बात है, बाजार गया था। किराने की एक बड़ी सी दूकान पर एक मजदूर ने दाल का भाव पूछा। चैरासी रुपये किलो! बेचारे का चेहरा उतर गया। “पाव कितने की हुई ?”इक्कीस रुपये। डरता हुआ सा वह धीरे से वापस चला गया। मैं सोचने को विवश हो गया कि आज वह परिवार क्या खाएगा? कई दिनों बाद सौ रुपये की दिहाड़ी लगाने वाला मजदूरकिस कलेजे से अपनी ”आय” का एक चैथाई एक वक्त की दाल पर खर्च कर देगा ? अब दाल रोटी से नीचे क्या है! शायद नमक रोटी ! धीरे-धीरे नमक पर भी गाज गिरने लगी है । खुला नमक प्रतिबन्धित हो गया है। हानिकारक होता है ! घेंघा की बीमारी हो जाती है। हमें आपके स्वास्थ्य की चिन्ता है। आपको आयोडीन नमक खाना ही होगा, वरना आपके बच्चे मन्दबुद्धि पैदा होंगे। आयोडीन नमक पैकेट बन्द मिलता है । यह बात अलग है कि इस नमक पर बेचारे को दिहाड़ी का दस प्रतिशत खर्च करना पड़ता है। अब बेचारा नमक भी कहां से लाए? प्रेम चोपड़ा का एक डायलाग याद आता है- नंगा नहाएगा क्या और निचोड़ेगा क्या ?
विडम्बना तो यह है कि हमें उसके इस जीवन से भी जलन है। लाखों का टैक्स चोरी करने वाला “सभ्य ” नागरिक भी परेशान है, उसे मजदूर का “सुख चैन” देखा नहीं जाता- हमसे तो अच्छा मजदूर ही है,कल की चिन्ता नहीं। दाल रोटी खाकर चैन से सोता तो है! चलो भाई , नहीं खाएगा दाल रोटी।
सरकार बहुत सक्रिय है। उसने नरेगा( रोजगार गारंटी अधिनियम) बना दिया है। अब सारा हिन्दुस्तान सुखी होगा, सबको रोजगार जो मिल गया! फिर भी लोगों को लग रहा है कि महंगाई बढ़ रही है जबकि इसका कोई प्रमाण अभी तक उपलब्ध नहीं है।सारे सूचकांक नीचे गिरे पड़े हैं। रेपो रेट भी घट गया है। मुद्रास्फीति गिरकर कहां गई, पता ही नहीं लग रहा! अभी जून के आखिरी सप्ताह में महंगाई दर शून्य से भी नीचे चली गई थी और आप कह रहे हैं कि महंगाई बढ़ रही है ?पब्लिक झूठ बोलती है। उसे सब कुछ फ्री चाहिए। हमारा थर्मामीटर नहीं बता रहा कि आपको बुखार है तो कैसे मान लें ? आपका शरीर तप रहा हो तो आप जानें। आप रो नहीं रहे, आप नखरे कर रहे हैं। आप निराशावादी लगते हैं।
बड़े लोग हमेशा से कल्याण में लगे हैं। जैसा कि मैंने पहले कहा, आयोडीन से आप की सेहत सुधारी ,आपके लिए इन्होंने और भी कल्याणकारी काम किया। आपको याद न हो,ये बात अलग है । आपको भूलता भी तो बहुत जल्दी है! जहां आयोडीन खिलाकर आपको घेंघा से मुक्ति दिलाई और आपका बुद्धिवर्धन किया, वहीं कॅन्डोम की बिक्री बढ़ाकर आपको एड्स से बचाकर नया जीवन दिया। एड्स अच्छा आया। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का कॅन्डोम अपने देश में आया ।बच्चा बच्चा एड्स के बारे में जान गया है।खुल के जियो, खुल के बात करो , खुल के यूज करो।रब जाने कब जरूरत पड़ जाए। उपलब्धता की गारंटी बढ़ा दी गई है। हर सार्वजनिक शौचालय पर जोश स्पॉट है। हमेशा जोश में रहो!
ददुआ को मारने में भले ही बावन घंटे लग जाएं, रणवीर सिंह (देहरादून इंकाउंटर मामले का शिकार ) को मार गिराने में बावन मिनट भी नहीं लगते!इसमें हमारा प्रषासन बड़ा तेज है।अब गाजियाबाद के उस परिवार के आँसू देखकर भी हमें नहीं रोना चाहिए।ऐसी छोटी मोटी घटनाएं तो होती ही रहती हैं। ये मैं नहीं कह रहा हूं ,एक बड़े नेता ने कहा था।
इसी से एक बात और याद आई। हमारे राज्य हमारी निजी सम्पत्ति हैं।बिना हमारे वीजा के आप यहां कैसे आ गए ? वह भी घूमने फिरने नहीं, नौकरी करने ?
जैसे तैसे जी भी रहे थे,पर ये टीवी न्यूज चैनल वाले जीने नहीं देते । डराते रहते हैं। पता नहीं कहां कहां से खबर जुटाते रहते हैं। जिसे घी समझ के खा लेते थे और बलवान होने का भ्रम पालकर खुश हो लेते थे, उसे इन्होंने यूरिया और सर्फ का अवलेह सिद्ध कर दिया, दूध को पेण्ट का उत्पाद साबित कर दिया। हमने भी अच्छा धंधा अपना लिया है। मैं आपको नकली घी दूध बेच दूं , आप मुझे नकली दवाई बेच देना। हिसाब बराबर! पर वो बेचारा गरीब क्या बेचेगा ? हाँ, याद आया, उसके पास गुरदा है। वो अपना गुरदा बेच देगा। दो चार दिन के लिए ये वाली दाल और पैकेट वाला नमक तो मिल ही जाएगा !रोएगा तो कौन सी नई बात ? और वह है किस लिए ?
अभी तो और भी समस्याएं हैं।हमें यौन शिक्षा लागू करनी है। बिजली पानी मिले न मिले , गे कल्चर वालों को सुविधाएं उपलब्ध करवानी है। अमेरिका की बराबरी करनी है हमें। एम जे की मौत पर मरने वालों को ढांढस बधाना है। वे भी तो बेचारे रो रो के लार बार हुए जा रहे हैं। आपको तो बस महंगाई और व्यवस्था की पड़ी है!
मैंने बहुत सोचा कि न रोऊँ इन हालात पर। पर मन यह मानने को तैयार ही नहीं होता कि हालात रोने के नहीं हैं ।सोचता हूँ काश! हम इन मुद्दों पर एक बूंद आंसू बहा सकते!
Wednesday, 8 July 2009
एक श्रद्धांजलि उन्हें भी
कल उनका अन्तिम संस्कार हो गया। माफी चाहूंगा ,वहां इसे संस्कार नहीं बोलते। संस्कार वहां होते ही नहीं। यूँ समझिए कि क्रिया-कर्म हो गए। दफना दिए गए।लगभग दो सप्ताह तक यूँ ही पड़े रहे। मृत शरीर को देखकर कोई पुत्र, कोई पत्नी तो कोई वास्तविक उत्तराधिकारी होने का दावा कर रहा था।गनीमत थी कि क्रिया कर्म हो गया। ऐसा विवाद अपने देश में होता और कोर्टकेस हो जाता तो मिट्टी भी नहीं मिलती बेचारी काया को!
खैर, क्रिया कर्म बड़ा शानदार हुआ।उनका जीवन भी तो बड़ा शानदार था।कई लोग उन्हें जिन्दा देखकर मरे, कई मरने के बाद मर गए।मुझे समझ नहीं आया।मानसिक मृत्यु के बाद ऐसे 12 लोगों को शारीरिक आत्महत्या की क्या आवश्यकता थी?परन्तु वे उनके फैन थे और फैन को कुछ भी करने का अधिकार होता है ।बहरहाल , उनके क्रियाकर्म पर विशाल जलसा हुआ- रंगारंग कार्यक्रम पेश किए गए।गाने गाए गए, डांस हुआ। शमशान भी गूंज उठा।उस मस्ती में कहां की वसीयत और कहां की आत्महत्या! सारे विवाद संगीत में डूब गए।
जिस ताबूत में वे दफनाए गए,सुना कि बेशकीमती था। कीमती चीजों से उन्हें गहरा लगाव था।उसी के लिए जिए वे!जो भी किया ,बहुत बड़ा किया। सुना कि उनका घर बहुत बड़ा था-नेवरलैण्ड।ऐसी लैण्ड आगे कभी नहीं- नेवर! झील से लेकर चिड़ियाघर तक अन्दर ही। क्या पता कब किस जानवर की जरूरत पड़ जाए!मन कब बच्चा-बच्चा खेलने लग जाए या किस जानवर से प्रेमप्रसंग का शौक चढ़ बैठे!क्या चमत्कारी काया थी ? नाचीज के समझ में कुछ आया ही नहीं।चेहरा-मोहरा देखकर लिंगभेद होता ही नहीं था। पता नहीं लोग होमोसेक्सुअल होने का आरोप कैसे लगा देते थे? लोगों का क्या, अनाप सनाप बकते ही रहते हैं।
अब समस्या तो इस नाचीज के दिमाग की है। कुछ समझ ही नहीं आता ।अब अपने समझ में यही नहीं आया कि क्या उस महंगे ताबूत में पंचभूत काया का जैविक क्षरण सामान्य विधि से अलग होगा? होगा तो समय कम लगेगा या ज्यादा?
उनके वस्त्रालंकार की तो बात करना ही बेमानी है।पता नहीं क्या-क्या पहने, क्या-क्या खाए! आवष्यकतानुसार चेहरा-मोहरा भी बदला।प्लास्टिक सर्जरी भी कराई, कभी मम्मी बने तो कभी पापा! ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है। पैसे को उन्होंने पैसा समझा ही नहीं। इतने फकीर थे कि करोड़ों डालर के कर्ज में डूब गए। यह सब देखकर विदर्भ के किसानों की सोच पर मुझे बड़ी चिढ़ आई। छोटे से कर्जे पर नासमझ आत्महत्या कर लेते हैं। उन्हें भी पोजिटिव होने का गुण उनसे सीखना चाहिए। पर वे ऊँची बातें सोचते ही नहीं!
वे बड़े फनकार थे।संगीत को उन्होंने बड़ी इज्जत दिलाई। शास्त्रीय संगीत से पॉप संगीत में शिफ्ट करने में उनकी उच्चतम भूमिका है। वस्तुतः युवा पीढ़ी को संगीत से जोड़ने का पूरा श्रेय उन्हें ही दिया जाना चाहिए। आप से ही प्रभावित होकर अपने आर्यावर्त में अंगरेजी गाने का वर्चस्व बढ़ा और हमारा समाज ऊँचा हुआ। वैसे नाचीज ने भी अंगरेजी में एम .ए। किया था और अपने जमाने में अँखफोड़ पढ़ाकू था। इतना अँखफोड़ कि यूनिवर्सिटी में भी गर्लफ्रेण्ड बनाने का टाइम नहीं मिला परन्तु अंगरेजी गाने आज तक पूरी तरह समझ में नहीं आए।
उनके नृत्यकौशल की तो बात ही निराली थी।जब वे स्टार्ट हो जाएं तो जेनेरेटर भी मात खा जाए,करेंट लग जाए या फिर मिर्गी का रोगी भी शरमा जाए। क्या पद संचालन था!भाव भंगिमा की तो जनाब बात ही मत करिए। शरीर का हर जोड़ अलग -अलग दिखने लग जाए और पता लग जाए कि किस अंग का वाइब्रेशन अधिकतम कितना हो सकता है। उनके कंपन के अंकन के लिए कोई यन्त्र बना ही नहीं। सारे सीज्मोग्राफ और ई.सी.जी. फेल!
अब वे नहीं रहे। पता नहीं क्या होगा उस फन का, उस विरासत का? पर , एक भरोसा है उनके पीछे चलने वाली पीढ़ी पर। जिसके इतने फैन,इतने फोलोवर है कि आत्महत्या तक कर लें, उनके कुछ योग्य चेले तो होंगे ही! संभालेंगे उनकी विरासत। हमें क्या ? हमारी तरफ से भी एक विनम्र श्रद्धांजलि!
खैर, क्रिया कर्म बड़ा शानदार हुआ।उनका जीवन भी तो बड़ा शानदार था।कई लोग उन्हें जिन्दा देखकर मरे, कई मरने के बाद मर गए।मुझे समझ नहीं आया।मानसिक मृत्यु के बाद ऐसे 12 लोगों को शारीरिक आत्महत्या की क्या आवश्यकता थी?परन्तु वे उनके फैन थे और फैन को कुछ भी करने का अधिकार होता है ।बहरहाल , उनके क्रियाकर्म पर विशाल जलसा हुआ- रंगारंग कार्यक्रम पेश किए गए।गाने गाए गए, डांस हुआ। शमशान भी गूंज उठा।उस मस्ती में कहां की वसीयत और कहां की आत्महत्या! सारे विवाद संगीत में डूब गए।
जिस ताबूत में वे दफनाए गए,सुना कि बेशकीमती था। कीमती चीजों से उन्हें गहरा लगाव था।उसी के लिए जिए वे!जो भी किया ,बहुत बड़ा किया। सुना कि उनका घर बहुत बड़ा था-नेवरलैण्ड।ऐसी लैण्ड आगे कभी नहीं- नेवर! झील से लेकर चिड़ियाघर तक अन्दर ही। क्या पता कब किस जानवर की जरूरत पड़ जाए!मन कब बच्चा-बच्चा खेलने लग जाए या किस जानवर से प्रेमप्रसंग का शौक चढ़ बैठे!क्या चमत्कारी काया थी ? नाचीज के समझ में कुछ आया ही नहीं।चेहरा-मोहरा देखकर लिंगभेद होता ही नहीं था। पता नहीं लोग होमोसेक्सुअल होने का आरोप कैसे लगा देते थे? लोगों का क्या, अनाप सनाप बकते ही रहते हैं।
अब समस्या तो इस नाचीज के दिमाग की है। कुछ समझ ही नहीं आता ।अब अपने समझ में यही नहीं आया कि क्या उस महंगे ताबूत में पंचभूत काया का जैविक क्षरण सामान्य विधि से अलग होगा? होगा तो समय कम लगेगा या ज्यादा?
उनके वस्त्रालंकार की तो बात करना ही बेमानी है।पता नहीं क्या-क्या पहने, क्या-क्या खाए! आवष्यकतानुसार चेहरा-मोहरा भी बदला।प्लास्टिक सर्जरी भी कराई, कभी मम्मी बने तो कभी पापा! ऐसा उदाहरण मिलना मुश्किल है। पैसे को उन्होंने पैसा समझा ही नहीं। इतने फकीर थे कि करोड़ों डालर के कर्ज में डूब गए। यह सब देखकर विदर्भ के किसानों की सोच पर मुझे बड़ी चिढ़ आई। छोटे से कर्जे पर नासमझ आत्महत्या कर लेते हैं। उन्हें भी पोजिटिव होने का गुण उनसे सीखना चाहिए। पर वे ऊँची बातें सोचते ही नहीं!
वे बड़े फनकार थे।संगीत को उन्होंने बड़ी इज्जत दिलाई। शास्त्रीय संगीत से पॉप संगीत में शिफ्ट करने में उनकी उच्चतम भूमिका है। वस्तुतः युवा पीढ़ी को संगीत से जोड़ने का पूरा श्रेय उन्हें ही दिया जाना चाहिए। आप से ही प्रभावित होकर अपने आर्यावर्त में अंगरेजी गाने का वर्चस्व बढ़ा और हमारा समाज ऊँचा हुआ। वैसे नाचीज ने भी अंगरेजी में एम .ए। किया था और अपने जमाने में अँखफोड़ पढ़ाकू था। इतना अँखफोड़ कि यूनिवर्सिटी में भी गर्लफ्रेण्ड बनाने का टाइम नहीं मिला परन्तु अंगरेजी गाने आज तक पूरी तरह समझ में नहीं आए।
उनके नृत्यकौशल की तो बात ही निराली थी।जब वे स्टार्ट हो जाएं तो जेनेरेटर भी मात खा जाए,करेंट लग जाए या फिर मिर्गी का रोगी भी शरमा जाए। क्या पद संचालन था!भाव भंगिमा की तो जनाब बात ही मत करिए। शरीर का हर जोड़ अलग -अलग दिखने लग जाए और पता लग जाए कि किस अंग का वाइब्रेशन अधिकतम कितना हो सकता है। उनके कंपन के अंकन के लिए कोई यन्त्र बना ही नहीं। सारे सीज्मोग्राफ और ई.सी.जी. फेल!
अब वे नहीं रहे। पता नहीं क्या होगा उस फन का, उस विरासत का? पर , एक भरोसा है उनके पीछे चलने वाली पीढ़ी पर। जिसके इतने फैन,इतने फोलोवर है कि आत्महत्या तक कर लें, उनके कुछ योग्य चेले तो होंगे ही! संभालेंगे उनकी विरासत। हमें क्या ? हमारी तरफ से भी एक विनम्र श्रद्धांजलि!
Tuesday, 7 July 2009
Listened your silent eyes
Breaking the transparent falsehood,
Your golden silence lead me to a flight of fancy;
You emerged as a new thought,
Laying all night on your speechless bed.
A ray of dark light opened the lock of pound,
I too gaze in your eyes without sound.
I entered into the temple kissing the door,
Had imagined it a lot before.
Your face was as blank as unwritten verse
I could not get it was boon or curse.
When I was deep in the cave under mountains,
Drink some water, feeling the fountain.
I searched it deep all around
You too were bound to get its sound.
My honest toil went in vain,
I did it again and again.
flooded in confusion, shame, remorse and despair
I listened your silent eyes...Oh! I was not there!!!!
Your golden silence lead me to a flight of fancy;
You emerged as a new thought,
Laying all night on your speechless bed.
A ray of dark light opened the lock of pound,
I too gaze in your eyes without sound.
I entered into the temple kissing the door,
Had imagined it a lot before.
Your face was as blank as unwritten verse
I could not get it was boon or curse.
When I was deep in the cave under mountains,
Drink some water, feeling the fountain.
I searched it deep all around
You too were bound to get its sound.
My honest toil went in vain,
I did it again and again.
flooded in confusion, shame, remorse and despair
I listened your silent eyes...Oh! I was not there!!!!
Monday, 6 July 2009
अनकही खामोशियां
अपने अक्ष पर घुमती हुई पृथ्वी कभी स्थिर हो सकती है....? फिर मैं कैसे........??
मैं तो घूमता रहा और थकता रहा.....
अनकही खामोशियों में तुम थी...
नींद मर्ज है...यह कहकर तुने मुझे सुला दिया......
कई छोटे छोटे अनु-सपने आते-जाते रहे...
मैं नींद में बेशुध रहा...गहरी नींद...अति गहरी...
न जाने कब सपनों ने भी आना छोड़ दिया.....
नर्म मुलायम नींद में डूबते हुये अंतिम नींद तक सोया....सारी थकान जाती रही...
सुबह बारिश के झोंके पृथ्वी पर बरस रही थी...
बादल के गुच्छे मूड में थे...बस बरसे जा रहे थे...
आंख खुलने से पहले तुमने कुछ कहा...फिर ओझल हो गई....
रात की दुपहरिया में खजुराहो पीछे छूट गया था...
अनकही खामोशियों से गुजरते हुये...मैं इनमें अर्थ तलाशता रहा...
अर्ध चेतना में तो तुम भी थी...और मैं भी...
बेहतर होता बिना मंजिल के भटकना....या फिर पूर्ण चेतना में होना.....
अनकही खामोशियों में क्या था.....? कोई ठहरी हुई सी चीज....या फिर ठहराव के नीचे कोई बहती हुई सी चीज....??
पृथ्वी के साथ तुम भी मेरी आंखों में घुम रही हो.......अनकही खामोशियों की तरह।
मैं तो घूमता रहा और थकता रहा.....
अनकही खामोशियों में तुम थी...
नींद मर्ज है...यह कहकर तुने मुझे सुला दिया......
कई छोटे छोटे अनु-सपने आते-जाते रहे...
मैं नींद में बेशुध रहा...गहरी नींद...अति गहरी...
न जाने कब सपनों ने भी आना छोड़ दिया.....
नर्म मुलायम नींद में डूबते हुये अंतिम नींद तक सोया....सारी थकान जाती रही...
सुबह बारिश के झोंके पृथ्वी पर बरस रही थी...
बादल के गुच्छे मूड में थे...बस बरसे जा रहे थे...
आंख खुलने से पहले तुमने कुछ कहा...फिर ओझल हो गई....
रात की दुपहरिया में खजुराहो पीछे छूट गया था...
अनकही खामोशियों से गुजरते हुये...मैं इनमें अर्थ तलाशता रहा...
अर्ध चेतना में तो तुम भी थी...और मैं भी...
बेहतर होता बिना मंजिल के भटकना....या फिर पूर्ण चेतना में होना.....
अनकही खामोशियों में क्या था.....? कोई ठहरी हुई सी चीज....या फिर ठहराव के नीचे कोई बहती हुई सी चीज....??
पृथ्वी के साथ तुम भी मेरी आंखों में घुम रही हो.......अनकही खामोशियों की तरह।
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Saturday, 4 July 2009
अनवरत तलाश
मीलों आगे चलते हुये अनवरत तलाश
...अंधरे पथ को टटोलने की कोशिश...मंजिल का पता नहीं...सुबह कोसों दूर।
बादलों से घिरा आससान, रिमझिम बूंदे,
फिजा में फैली हुई धरती की सोंधी महक,
घने वृक्ष के तले लुप्त होती चेतना,
रहस्यों के कोहरे को चीर कर बढ़ते मेरे कदम।
घुमावदार पर्वत की नमी, उससे टकराकर लौटती खुद की सांस,
अतल गहराई और उसमें उतरने की अदम्य इच्छा...चेतन पर अचेतन का कब्जा।
बौने होते अब तक के सींचे गये विचार,
उभरें पर्वतों के उस ओर देखने की कोशिश
...व्यर्थ...!व्यर्थ...!!व्यर्थ...!!!अंधेरे में पसरी मौन आवाज,
सुरमई गहराईयों में डूबना....बस डूबते ही जाना....
नमी के साथ कल-कल की आवाज,
रहस्मय अंधकार के उस पार उफनती नदी का अहसास।
शिराओं को नर्म स्पर्श करते हुये आगे बढ़ना
एक छोटी सी आवेग भरी धारा....
दूसरी..तीसरी...चौथी....फिर अनवरत निर्मल प्रवाह।
थकान से चूर मस्तिष्क और तपता हुआ शरीर
रोक देती है मुझे एक निश्चित बिंदू पर,
निर्झर के उदगम की ओर नहीं बढ़ पाना
असर्मथता ही तो है...
कहीं इस अनवरत तलाश में मैं खुद न खो जाऊं !!!!!!!
...अंधरे पथ को टटोलने की कोशिश...मंजिल का पता नहीं...सुबह कोसों दूर।
बादलों से घिरा आससान, रिमझिम बूंदे,
फिजा में फैली हुई धरती की सोंधी महक,
घने वृक्ष के तले लुप्त होती चेतना,
रहस्यों के कोहरे को चीर कर बढ़ते मेरे कदम।
घुमावदार पर्वत की नमी, उससे टकराकर लौटती खुद की सांस,
अतल गहराई और उसमें उतरने की अदम्य इच्छा...चेतन पर अचेतन का कब्जा।
बौने होते अब तक के सींचे गये विचार,
उभरें पर्वतों के उस ओर देखने की कोशिश
...व्यर्थ...!व्यर्थ...!!व्यर्थ...!!!अंधेरे में पसरी मौन आवाज,
सुरमई गहराईयों में डूबना....बस डूबते ही जाना....
नमी के साथ कल-कल की आवाज,
रहस्मय अंधकार के उस पार उफनती नदी का अहसास।
शिराओं को नर्म स्पर्श करते हुये आगे बढ़ना
एक छोटी सी आवेग भरी धारा....
दूसरी..तीसरी...चौथी....फिर अनवरत निर्मल प्रवाह।
थकान से चूर मस्तिष्क और तपता हुआ शरीर
रोक देती है मुझे एक निश्चित बिंदू पर,
निर्झर के उदगम की ओर नहीं बढ़ पाना
असर्मथता ही तो है...
कहीं इस अनवरत तलाश में मैं खुद न खो जाऊं !!!!!!!
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Wednesday, 1 July 2009
nijikaran
--------- गतांक से जारी ---- समापन किश्त
एक अन्य महत्त्वपूर्ण विभाग जिसका निजीकरण किया गया , वह था पुलिस विभाग। सरकार ने देखा कि तनख्वाह बढ़ाने के बाद भी अपराधों में कमी नहीं आई है तो निजीकरण का मन बन ही गया। पुलिस की कमाई बढ़ाने के लिए न जाने कितने नियम बनाए गए, कितन प्रशिक्षण दिया गया, परन्तु परिणाम ढाक के वही तीन पात! अन्ततः निजीकरण हो ही गया। एक झटका तो लगा पुलिस को, लेकिन संभल गई। सरकार तनख्वाह ही तो नहीं देगी! पहले ही कौन सा खर्च चल जाता था? हाँ,यही न कि आयकर रिटर्न भरना आसान हो जाता था। असली साधन तो कानून था, वह तो अभी भी हाथ में दे ही रखा है। निजीकरण के बाद विभाग में व्यापक परिवर्तन हुए। चहुँओर शान्ति छा गई ।अब उपभोक्ता वाद के मज़े आने लगे! police ने अनेक प्रकार के शुल्क निर्धारित कर दिए, यथा-सुरक्षा शुल्क, पिटाई शुल्क , षिष्टाचार शुल्क आदि। सुरक्षा शुल्क वह शुल्क था जो सम्मानित नागरिक चोर-डाकुओं से सुरक्षित रहने के लिए जमा कराते। यह अनिवार्य शुल्क था। सम्मान शुल्क जमा कराने वाला नागरिक पुलिस की गाली अकारण प्राप्त करने से बच सकता था। विशेष सम्मान शुल्क दाता नागरिक पुलिस वालो से सम्मान भी पाता और पुलिस उत्सवों में भी बुलाया जाता। अनादर शुल्क ,पिटाई शुल्क ,गाली शुल्क , जमा कराके कोई नागरिक अपने इच्छित व्यक्ति का अनादर या पिटाई इत्यादि करा सकता था। इसके अलग- अलग ग्रेड थे।ये शुल्क सुरक्षा एवं सम्मान शुल्क से अधिक थे। यदि कोई सम्मान या षिष्टाचार शुल्क दाता का अपमान कराना चाहता तो उसे ऊँची धन rashi जमा करानी पड़ती। ऐसी स्थिति में वांछित व्यक्ति को सूचित किया जाता। सूचना में पुलिस इस बात का उल्लेख करती कि उक्त व्यक्ति पर कितनी धनराषि लगाई गई है। सम्मानित व्यक्ति उससे अधिक शुल्क जमा कराकर इस प्रकार के दंड से बच सकता था। प्रयोग सफल रहा।न कहीं चोर ,न कहीं डाकू।न दंगे न फसाद!एक - एक कर हर विभाग का निजीकरण कर दिया गया।आमदनी कम हो गई तो विष्वबैंक से कर्ज लेकर सांसदों- विधायकों का खर्च चलाया गया। pradesh सरकारों का निजीकरण किया गया।आज वह ऐतिहासिक दिन भी आ गया कि केन्द्रीय सरकार का भी निजीकरण विज्ञापित हो गया है। निविदाएँ भरी जाएंगी, बोली लगेगी, निजीकरण होगा पर घसीटा दास ,कुछ अन्य लोगों सहित मेरी भी ishwar से यही प्रार्थना है कि बोली किसी नेता के नाम न छूटे!
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