Wednesday, 24 May 2017

Maheshpur Azamgarh ka

महेशपुर (आजमगढ़ )
  - हरिशंकर राढ़ी 
समाज में आए व्यापक परिवर्तनों से कोई अछूता रह गया हो, यह संभव नहीं है। भौतिक प्रगति के साथ वैचारिक बदलाव हर जगह दिख रहा है और उसके साथ-साथ जीवन पद्धति में भी बड़ा बदलाव आया है। रूढ़ियां तो टूटी ही हैं, कुछ अच्छी परंपराएं भी बिखरी हैं। आदमी सुविधाभोगी हुआ है और उसके अनुसार उसने सिद्धांत और व्यवसाय भी बदला है। अन्य क्षेत्रों की भांति राढ़ियों के दोनों गांवों में व्यवसाय और सोच में काफी परिवर्तन आया है। नयी पीढ़ी बेहतर सुविधाओं और रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रही है, खेती पर निर्भरता कम हुई है। किंतु सबसे अधिक असर जातिगत तानेबाने पर हुआ है और उसमें भी सकारात्मक ताने-बाने पर। बिरादरी की परंपराओं का जो जुनून और कानून 30-40 साल पहले तक था, वह बिखर रहा है।
महेश और विष्णु में बड़ा भाई कौन था, इसे निश्चित रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता। महेश ने महराजगंज से उत्तर देवारा क्षेत्र चुना और बस गए। उनके बसाए गांव का नाम महेशपुर हुआ। वह जमाना निश्चित ही सुविधाओं के घोर अभाव का रहा होगा। न कोई रास्ता, न यातायात और न कोई नगरीय जुड़ाव। न जाने महेश बाबा की क्या मानसिकता रही होगी कि छोटी सरयू और बड़ी सरयू (घाघरा) के बीच के कछार क्षेत्र में उन्होंने बसने की ठानी होगी, जबकि दो-तीन सौ साल पहले देश में न कृषियोग्य भूमि की कमी थी और न इतनी आबादी का घनत्व। ऊपर से दूर आए हुए ज्ञानी ब्राह्मण। शायद उन्हें प्रकृति का सान्निध्य प्रिय रहा हो, बड़े साहसी रहे हों या एकांतवासी।
 महेशपुर  में शस्य साम्राज्य :                  छाया हरिशंकर राढ़ी 
जो भी हो, मेरे बचपन का महेशपुर आज से बहुत भिन्न था। महराजगंज बाजार के पुराने चैक से बनियों और कुम्हारों के मोहल्ले से होते हुए छोटी सरयू नदी को पार करिए और वहां से एक पतली सी गहरी कच्ची सड़क (जिसे हम खोर कहते थे, खोर की कोई सही उत्पत्ति मुझे तो नहीं मिली, हो सकता है कि खोह का अपभ्रंश हो क्योंकि यह रास्ता किसी खोह जैसा ही गहरा था।) सर्पीले आकार में चली जाती थी। कुल जमा चैड़ाई एक बैलगाड़ी निकलने भर को। खोर के दोनों ओर सरपत और मेउड़ी की बाड़। मेउड़ी अब नहीं दिखती और न मैं इस वनस्पति शास्त्र का इतना बड़ा ज्ञाता हूँ कि उसका सर्वव्यापी या वानस्पतिक नाम बता सकूँ। इतना याद है कि इस मेउड़ी का उपयोग टोकरियां (जिन्हें आजमगढ़ मंे खांची कहा जाता है) बनाने में किया जाता था क्योंकि इसके लरछे बड़े मजबूत और चिम्मड़ होते थे। इसके अतिरिक्त छप्पर का बंधन बांधने में भी ये काम आती थीं, जलावन भी होता था किंतु मेउड़ी का सर्वाधिक सदुपयोग अध्यापकों द्वारा छात्रों की पिटाई और चमड़ा उतारने में किया जाता था। यह सर्वसुलभ शस्त्र था और इससे देश की शिक्षा व्यवस्था आगे बढ़ती थी। मैं इस मामले में सौभाग्यशाली था कि मुझे इसके प्रहार का स्वाद नहीं मिला था। कारण दो थे-- एक तो मेरी माता जी उसी विद्यालय में पढ़ाती थीं और दूसरे यह कि मैं अपने काम में किसी प्रकार की कमी नहीं रखता था। हाँ, बाकी बहुत से सहपाठियों को मेउड़ी का प्रहार सहते जरूर देखा था। पूरे मन से पढ़ाने और पीटने के मामले में तब प्राइमरी पाठशाला के अनेक शिक्षक बहुत विख्यात होते थे।

 महेशपुर  में लेखक का पैतृक आवास                  छाया :        हरिशंकर राढ़ी
महराजगंज और महेशपुर के बीच पुराने बाजार से लगभग दो किमी की दूरी थी। इस बीच में न कोई घर और न कोई ठांव। राहगीर अकेला हो और हिम्मती न हो तो उसका मालिक भगवान ही। हाँ, लगभग बीच में मुंडीलपुर गांव जरूर पड़ता था, कितु रास्ते से काफी दूर। बीच में पकवा इनार (पक्का कुआं)। पकवा इनार मुड़ीलपुर के ठाकुर जगन्नाथ सिंह का बगीचा और उसमें बना ऊंची जगत का पक्का कुआं जो शायद आम के बाग के लगने के समय सिंचाई के लिए बनवाया गया होगा। वहां से आगे निकले तो बौलिया नामक एक पोखरी और पेड़ों की घनी झुरमुट। कोढ़ में खाज यह कि बौलिया पर भूतों और चुड़ैलों का बसेरा होने का अंधविश्वास। बच्चे तो क्या, बड़ों की हिम्मत नहीं पड़ती थी शाम ढलते ही वहां से गुजरने की। कुछ लोग थे जो रात में देर से आते, उन्हें बड़ा हिम्मती मर्द माना जाता था। मौसम गर्मियों का हो तो, गनीमत। सबसे भयंकर दृश्य होता था बारिश के मौसम का। छोटी सरयू उफान पर और वहां से गांव तक की खोर पानी से भरी हुई। घुटनों तक पानी, तैरते हुए सांप बिच्छू और उनमें से होकर निकलना। मुझे ठीक से याद है कि बरसात के चार महीनों में हम बच्चों का बाजार जाना बिलकुल बंद। घर का कोई बड़ा सप्ताह में एक दिन बाजार जाता तो नमक, मिट्टी का तेल और माचिस जैसी आवश्यक वस्तुएं ले आता। दो-चार पड़ोसी भी कुछ न कुछ लाने को दे दिया करते। जहां तक मुझे याद है, सन् 1975 के बाद कच्ची सड़क पटनी शुरू हुई थी और सन 1984 में छोटी सरयू पर लकड़ी का पुल बनकर तैयार हुआ था।
महेशपुर आज एक विकसित गांव है और बैंक के अलावा सारी सुविधाएं मौजूद हैं। भारतीय स्टेट बंैक भी लगभग खुल गया था किंतु गांव के प्रभावी लोगों के झगड़े में निरस्त हो गया। महेशपुर में कुल सात पुरवे हैं जिसमें दक्षिण का पूरा और उत्तर के पूरा में राढ़ी ब्राह्मणों के कुल मिलाकर 40 घर होंगे। इसके अतिरिक्त गांव में जातिगत आबादी में यादव बहुसंख्यक हैं। अनुसूचित जाति, कोइरी और गड़ेरिया जाति की भी जनसंख्या अच्छी है। महेशपुर गांव के लोग सामान्यतः शांतिप्रिय हैं और जाति आधारित विवाद कभी भी नहीं हुआ है। जो भी विवाद हैं, वे संपत्ति से संबंधित हैं और न्यायालय के अलावा हिंसा के स्तर पर प्रायः नहीं आते। जातिगत मतभेद या जातिवाद चुनावों के अतिरिक्त कभी मुखर नहीं होता। एक -दूसरे के सुख-दुख में शरीक होने के पुरानी भारतीय संस्कृति अभी भी इस गांव में चल रही है।
जनगणना विभाग के आंकड़ों के हिसाब से (2011की जनगणना, जो वेबसाइट पर उपलब्ध है) इस गांव में कुल 212 परिवार हैं और कुल आबादी 1526 है जिसमें 762 पुरुष और 764 महिलाएं हैं। महेशपुर की साक्षरता दर 66.4 है जो औसत से जरा सा कम है किंतु लिंगानुपात सकारात्मक है। समुद्रतल से ऊँचाई 91 मीटर है।
वैसे वेबसाइट सर्च के दौरान मुझे महेशपुर के विषय में जो जानकारियां मिलीं, वे बड़ी हास्यास्पद और अविश्वसनीय थीं। न जाने किन लोगों ने किस आधार पर कहां से सूचना एकत्रित की तथा पूरी तरह से दिग्भ्रमित करने का प्रयास किया है। उदाहरण के तौर पर एक वेबसाइट ने बताया कि महेशपुर महराजगंज तहसील में पड़ता है जबकि महराजगंज तहसील है ही नहीं। पता नहीं किस जिले के महराजगंज को महेशपुर की तहसील बना दिया। मैंने इस वेबसाइट को काफी पहले मेल भी लिखा किंतु उनके कान पर जूँ नहीं रेंगी। इसी प्रकार एक दूसरी वेबसाइट ने महेशपुर का निकटतम अस्पताल बलरामपुर लिखा है जो गोंडा जिले में है और निकटतम हवाई अड्डा अकबरपुर बताया है जबकि अकबरपुर मे हवाई अड्डा है ही नहीं। इन भ्रामक सूचनाओं के आधार पर कोई महेशपुर के विषय में क्या जानकारी इकट्ठा करेगा, सोचने वाली बात है।
मेरा बचपन और पूरी किशोरावस्था इसी महेशपुर में गुजरी है। युवावस्था का प्रथम चरण भी कमोवेश यहीं बीता है और इस गांव की मिट्टी मेरे तन-मन में बसी है। इस गांव में एक प्राइमरी स्कूल था, कालांतर में एक इंटर कालेज बना। पहली से लेकर आठवीं तक की शिक्षा गांव के प्राथमिक पाठशाला और आदर्श इंटर काॅलेज में हुई। तब यह दसवीं तक ही था। विज्ञान पढ़ने के लिए मैं नौवीं कक्षा में इंटर काॅलेज महराजगंज चला गया किंतु महेशपुर की यादें साथ लगी रहीं। अपने शुरुआती दिनों में आदर्श इंटर काॅलेज वाकई आदर्श रहा। यह बात अलग है कि बाद में विभिन्न कारणों और स्वार्थों के चलते यह अपने नाम का पूरा विरोधी हो गया। गांव में शाखा डाकघर, सहकारी खाद-बीजगोदाम, पशु चिकित्सालय, सरकारी नलकूल और न जाने कितनी सरकारी योजनाएं तबसे हैं जब ये विरली होती थीं। इनमें अधिकांश विकास कार्य एवं संस्थाओं की स्थापना स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व0 पं0 लक्ष्मीकंात मिश्र के अथक प्रयासों एवं प्रभाव से हुई थीं। आदर्श इंटर काॅलेज की स्थापना भी इन्हीं की देन है जिसमें विवाद के चलते अलग होना पड़ा। इसके बाद पं0 लक्ष्मीकांत मिश्र जी ने दक्षिण पूरा में इंटर काॅलेज की जमीन पर सन 1986 के आसपास बालिका विद्यालय की नींव डाली। उनके समय तक बालिका विद्यालय में विकास कार्य होता रहा, अनेक कमरे बने किंतु 90 के दशक में उनका निधन हो जाने के बाद विद्यालय उसी स्थिति में रह गया। उनके सामाजिक अवदान को देखते हुए महराजगंज के नए चैक पर  उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। वह समय बदलाव का था। निजीकरण शुरू हो गया था, शिक्षा संस्थान समाज सेवा न होकर आय के स्रोत बन गए, सरकारी विद्यालयों का स्तर गिरने लगा, सरकार ने अनुदान देना बंद कर वित्तविहीन मान्यता देनी शुरू कर दी। व्यावसायिक बुद्धि न रखने वाले समाजसेवी पिछड़ते गए और शिक्षा पूर्णरूपेण शिक्षा माफिया के हाथों में चली गई।
 महेशपुर  में अपने पैतृक आवास पर लेखक                  छाया :      हरिशंकर राढ़ी
गांव का व्यासायिक और सामाजिक ताना-बाना बदलता गया। कुछ राढ़ी जो जमींदार थे, जमींदारी उन्मूलन के बाद जमीन पर आ गए। खेतों की सीमा निर्धारित कर दी गई और कालांतर में चकबंदी भी हो गई। महेशपुर के राढ़ियों में सबसे बड़ी जमींदारी रामानंद-रामशरण राढ़ी की थी जो देवारा कदीम से लेकर मथुरा ठेकेदार के पूरा तक फैली थी। समय की मार और कुप्रबंधन ने इनके बिखरने में बहुत योगदान दिया। यह मलाल इस पूरे खानदान को अभी भी सालता है और यह लेखक भी उनकी चैथी पीढ़ी का हिस्सा है। बिखराव के बाद चैथी पीढ़ी ने स्वयं को संभाला और अपनी मेधा और शिक्षा के बल पर अब इनमें से अधिकांश विकसित या विकास की ओर अग्रसर हैं। वैसे भी इस गांव के अनेक राढ़ियों ने मेधा और शिक्षा के बल पर तमाम सरकारी नौकरियां प्राप्त कीं और उच्च पदों पर रहे। इनमें से उत्तर के पूरा  कई लोग उल्लेखनीय हैं। पुरानी पीढ़ी में उत्तर के पूरा में रमाशंकर मिश्र की भी ख्याति थी। आज महेशपुर गांव में अनेक लोग पीएच. डी और उच्च पदस्थ हैं।
महेशपुर का पश्चिमी पूरा यहां की कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा है। इसे पहले इसे ‘सनपुर’ के नाम से जाना जाता था। कागजों में इसे महेशपुर भले ही लिखा जाता हो, स्थानीय लोग इसे सनपुर के नाम से ही जानते हैं। सनपुर की अधिकांश आबादी यादवों की है और मुख्य महेशपुर से इसकी दूरी एक किमी से अधिक ही होगी।
महेशपुर और सनपुर को जोड़ने वाला रास्ता अब पक्की के सड़क के रूप में है और इसके मध्य में श्री मोतीलाल यादव (पूर्व ब्लंाॅक प्रमुख) द्वारा स्थापित स्व0 ईशदत्त स्मारक डिग्री काॅलेज है। हालांकि यह देवारा कदीम के नाम से पंजीकृत है किंतु वास्तव में महेशपुर में स्थापित होने से महेशपुर की शोभा और गरिमा को यह चार चांद लगाता है। गांव की लड़कियों को अब उच्च शिक्षा आंगन में ही मिलने लगी है। चूंकि श्री मोतीलाल यादव के पुत्र श्री राकेश यादव गुड्डू इस क्षेत्र से एमएलसी हैं, अतः विकासकार्य को गति मिलना स्वाभााविक है।
सनपुर से अविछिन्न खेमानंदपुर महेशपुर का छोटा भाई सा लगता है और इन दोनों गावांे को मिलाकर ग्रामपंचायत का निर्माण हुआ है। पड़ोसी गांव सादातपुर और खोजापुर आकार और आबादी में बहुत छोटे हैं इसलिए ये भी महेशपुर के अभिन्न अंग से लगते हैं। आपसी भाई-चारा और न्योता-भोज में ये महेशपुर से अलग नहीं होते। दरअसल, दूर के क्षेत्रों में इन दोनों गांवों के लोग स्वयं को महेशपुर का ही निवासी बताते हैं....महेशपुर ख्यातिप्राप्त तो है ही।

 महेशपुर  में शस्य साम्राज्य                           छाया  :     हरिशंकर राढ़ी
अब वे असुविधाओं वाले दिन गए। गांव से सटती हुई सड़क घाघरा के बांध सहदेव गंज तक जाती है जिस पर बढ़ते यातायात को देखकर देश की प्रगति का विश्वास होता है। लगभग हर घर में दुपहिया वाहन,  अनेक ट्रैक्टर, गाड़ियां और आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित हो चुका है महेशपुर। अब न वो बाढ़, न खोर और न सांप-बिच्छू। दिन-रात फर्राटे भरती गाड़ियों को देखकर और महराजगंज आजमगढ़ को पैरों के तले देखकर बड़ा संतोष मिलता है, नहीं मिलते तो यहां की पगडंडियों पर बिताए बचपन केे दिन... मेरे बचपन का महेशपुर....

Saturday, 25 March 2017

Rarh and Rarhi

राढ़ और  राढ़ी

--हरिशंकर राढ़ी 


(यह आलेख किसी जातिवाद या धर्म-संप्रदाय की भावना से नहीं लिखा गया है। इसका मूल उद्देश्य एक समुदाय के ऐतिहासिक स्रोत और महत्त्व को रेखांकित करना तथा वास्तविकता से अवगत कराना है।)

महराजगंज के इतिहास और वर्तमान की बात हो तो राढ़ियों की चर्चा के बिना अधूरी ही रहेगी। जैसा कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है, महराजगंज बाजार प्रमुखतया विशुनपुर (राढ़ी का पूरा) की ही जमीन पर बसा हुआ है और इसकी स्थापना से लेकर विकास में राढ़ियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। आज बाजार का विकास और विस्तार बहुत हद तक हो चुका है तथा आज के दौर में समाज के हर वर्ग और क्षेत्र का सहयोग और समर्पण है।
बहुत दिनों तक यह अज्ञात ही रहा कि महराजगंज के राढ़ी किस मूल क्षेत्र के निवासी हैं क्योंकि सामान्यतः हमारे देश में इतिहास और आत्मकथा लेखन की परंपरा नहीं रही है। मुगलकाल और अंगरेजी राज्य में साक्षरता दर और स्वस्थ परंपराओं का लोप होता गया। स्थिति ऐसी आई लोग या तो रोजी-रोटी में फंस गए या फिर पोंगापंथी परंपराओं में। अंगरेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति ने बहुत नुकसान पहुंचाया।
‘राढ़ी’ शब्द से सामान्यतः झगड़ालू प्रवृत्ति का बोध होता है और यही धारणा विशुनपुर और महेशपुर के राढ़ियों के विषय में पाई जाती रही है। कुछ हद तक इनमें क्षत्रियत्व और स्वाभिमान (अक्खड़पन की सीमा तक) पाया जाता है इसलिए इस अर्थ की सामान्यतः पुष्टि भी हो जाती है। किंतु वास्तविक इतिहास कुछ और ही है और वह बंगाल की उच्च बौद्धिक क्षमता और परंपराओं वाले गौरवशाली इतिहास का हिस्सा है।
वस्तुतः राढ़ी की उत्पत्ति किसी अनुमानित अर्थ या प्रवृत्ति से नहीं हुई है। यह शब्द बंगाल के राढ़ क्षेत्र से संबंधित है। ़राढ़ क्षेत्र विश्व के प्राचीनतम क्षेत्रों में एक है। उपलब्ध कुछ स्रोतों को सही मानें तो राढ़ क्षेत्र का अस्तित्व तब था जब हिमालय का अस्तित्व नहीं था। यह एक मान्यताप्राप्त संकल्पना है कि जहां आज हिमालय है, वहां पहले टेथिस सागर था और उसके दोनों ओर दो भू़क्षेत्र थे जिनके परस्पर टकराने से हिमालय का जन्म हुआ। तो भी, राढ़ क्षेत्र राढ़ नामक नदी द्वारा लाई गई मिट्टी से बना था और आदिम काल से यह आबाद था। राढ़ क्षेत्र को दो भागों में बांटा गया - पूर्वी राढ़ और पश्चिमी राढ़।
पूर्वी राढ़ के अंतर्गत ये क्षेत्र आते हैं: 1- पश्चिमी मुर्शिदाबाद, 2- बीरभूम जिले का उत्तरी भाग, 3-पूर्वी बर्धमान, 4- हुगली, 5- हावड़ा क्षेत्र, 6- पूर्वी मेदिनीपुर तथा 7- बांकुड़ा जनपद का इन्दास थाना क्षेत्र।
पश्चिमी राढ़ में ये क्षेत्र सम्मिलित हैं: 1- संथाल परगना, 2- बीरभूम के अन्य क्षेत्र, 3- बर्धमान का पश्चिमी भाग, 4- बांकुडा (इन्दास थाना क्षेत्र को छोड़कर), 5-पुरुलिया, 6- धनबाद, 7-हजारीबाग के कुछ इलाके, 8- रांची के कुछ इलाके, 9-सिंहभूम तथा 10- मेदिनीपुर का कुछ इलाका ।
आनंदमार्ग प्रकाशन तिलजला, कोलकाता द्वारा प्रकाशित और श्री प्रभात रंजन सरकार द्वारा लिखित पुस्तक ‘सभ्यता का आदि बिंदु -राढ़’ के तथ्यों को प्रामाणिक मानें तो राढ़ क्षेत्र में सभ्यता विकसित ही नहीं हुई थी, अपितु सभ्यता का यहां जन्म हुआ था। एक समय था जब राढ़ क्षेत्र का ध्वज विदेशों तक लहराता था। यहां केे लोगों ने जय का दंभ पालने के बजाय मानवसेवा को अपना धर्म माना।
प्रभात रंजन के अनुसार मंगलकाव्य और वैष्णव काव्य साथ - साथ चल रहे थे। इस क्रम में जयदेव को वे प्रमुखता देते हैं जिन्होंने गीत गाविंद की रचना की और वैसा लालित्य शायद ही किसी अन्य गीत में हो। राढ़ क्षेत्र के प्रमुख लोगों में रवीन्द्रनाथ टैगोर, राजशेख बसु, रासबिहारी बसु, सुभाषचंद्र बोस, रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद ( नरेंद्रनाथ दत्त) की गणना की जा सकती है। रामकृष्ण परमहंस जहां राढ़ी ब्राह्मण थे, वहीं विवेकानंद राढ़ी कायस्थ। राढ़ क्षेत्र में इतनी प्रसिद्ध और महान विभूतियाँ हुईं कि उनको सूचीबद्ध कर पाना बहुत दुष्कर कार्य है। वैसे तो ्राढ़ क्षे़त्र की सभी जातियां अपने को राढ़ी लिखती हैं किंतु राढ़ी ब्राह्मण और राढ़ी कायस्थ स्वयं को ‘राढ़ी’ के नाम से ही कहलाना पसंद करते हैं।
इसमें संदेह नहीं कि यह क्षेत्र विकसित था। चहुंओर से समतल और जलोढ़ मिट्टी, विदेशी आक्रमण से दूर, हरीतिमा से भरपूर था यह क्षेत्र। हर प्रकार से संपन्न होने के कारण सभ्यता और संस्कृति का विकास तो होना ही था। कालांतर में राढ़ क्षेत्र शैव मतावलंब के गहरे प्रभाव में पड़ा। जगह - जगह शिव के मंदिर इसके प्रमाण हैं। किंतु वैष्णव प्रभाव भी कम नहीं हुआ।
राढ़ क्षेत्र में राढ़ी ब्राह्मणों की उपस्थिति और इतिहास का विवेचन करना बहुत सहज नहीं है। ये इस क्षेत्र के ज्यातिपुंज रहे हैं। राढ़ियों को कुलीन ब्राह्मणों के वर्ग में रखा जाता है। यह तो बहुत स्पष्ट नहीं है कि इनकी उत्पत्ति यहीं की है या ये विस्थापित होकर आए हैं, किंतु इनकी परंपराओं, ज्ञान और उपलब्धियों को देखकर तार्किक रूप से यह कहा जा सकता है कि ये यहां के आदि निवासी थे। ब्राह्मण वंशावली का ज्ञान रखने वाले और विवेचन करने वाले भिन्न -भिन्न मत रखते हैं।
राढ़ क्षेत्र का इतिहास लिखना यहां मेरा उद्देश्य नहीं है, हालांकि मेरे पास कुछ शोधपरक जानकारी जरूर है। यह तो प्रसंगवश है। मेरा लेखनक्रम यहां महराजगंज (आजमगढ़) के राढ़ी ब्राह्मणों और उनके स्थानीय महत्त्व को रेखांकित करना है।
जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया, इस बात का कोई बड़ा प्रमाण नहीं है कि राढ़ी ब्राह्मण यहां के मूल निवासी थे या कहीं से विस्थापित होकर आए थे। विकीपीडिया एवं कुछ अन्य वेबसाइटों का अध्ययन करने से मालूम होता है कि राढ़ी ब्राह्मण मूलतः कन्नौज के कुलीन ब्राह्मण थे और किसी अज्ञात समय और अज्ञात कारणों से बंगाल के इस क्षेत्र में पहुंचे। कन्नौज क्षेत्र के ब्राह्मणों को कान्यकुब्ज ब्राह्मण भी कहा जाता है।
बंगाली कुलीन ब्राह्मण कुल पांच प्रसिद्ध गोत्रों में आते हैं जिनमें- शांडिल्य, भारद्वाज, कश्यप, वत्स और सावण्र्य या स्ववर्ण हैं। इन्हें यहां दो प्रमुख वर्गों में रखा गया है -राढ़ी और वरेन्द्र। बंगाल मंे इनके होने के प्राचीनतम प्रमाण कुमारगुप्त के ताम्रपत्रों से 433 ईस्वी में मिले हैं। एक ताम्रपत्र में राढ़ी ब्राह्मण द्वारा किसी जैन विहार को भूमिदान करने का उल्लेख है। वैसे पौराणिक एवं प्रागैतिहासिक ग्रंथों में भी इनके वहां होने का प्रमाण मिलता है। कुछ पारंपरिक ग्रंथों एवं कथाओं में भी, जिन्हें कुलग्रंथ या कुलपंजिका कहा जाता है, इनकी उत्पत्ति का उल्लेख मिलता है। बंगाल के राजाओं के दरबारी ग्रंथों में भी राढी ब्राह्मणों का जिक्र है। इनके प्रमुख लेखक हरि मिश्र, एदू मिश्र, वाचस्पति मिश्र, राजेन्द्रलाल मित्र हैं और ये लगभग 13वीं से 15वीं सदी के अभिलेख हैं।
कहा जाता है कि आदिसुर नामक किसी राजा को यज्ञ कराने हेतु योग्य वैदिक ब्राह्मणों की आवश्यकता थी और उसके राज्य में वैदिक विशेषज्ञ ब्राह्मण नहीं थे। (एदू और हरि मिश्र के आख्यान के आधार पर) उसने कोलांचल और कान्यकुब्ज के पांच ब्राह्मणों को यज्ञकार्य हेतु आमंत्रित किया। यह वृत्तांत आठवीं सदी का होगा। इतिहास के जानकारों के अनुसार आदिसुर बंगाल के बजाय उत्तरी बिहार का था। यह तर्क भी पूरी तरह स्वीकार्य नहीं है क्योंकि आदिसुर का राज्य मिथिला क्षेत्र के सन्निकट है और मिथिला में योग्य वैदिक ब्राह्मणों की कमी रही होगी।
कहा जाता है कि बंगाल के सेन राजाओं ने ब्राह्मणों को भूमि और धन खूब दिया। वे समाज मंे वैदिक प्रथाएं और मूल्य स्थापित करना चाहते थे। वे समाज में पूर्ण अनुशासन चाहते थे और यह अनुशासन उन्होंने ब्राह्मणों पर भी लागू किया। कुलीन ब्राह्मण उसे ही माना जाता था जिसके मातृ और पितृ दोनों पक्ष 14 पीढ़ियों तक कुलीन रहे हों। हालांकि ब्राह्मणों ने इसका विरोध भी किया, किंतु कुलीनता की यह प्रथा परंपरा में बदल ही गई।
बंगाल मंे जो भी राढ़ी ब्राह्मण हैं, उनके साथ प्रतिष्ठा जुड़ी हुई है। उनमें प्रमुख जातिनाम व गोत्र निम्नवत हैं:
1. मुखर्जी या मुखोपाध्याय (भारद्वाज गोत्र)
2. बनर्जी या बंदोपाध्याय (शांडिल्य गोत्र)
3. चटर्जी या चट्टोपाध्याय (कश्यप गोत्र)
4. गांगुली या गंगोपाध्याय (सावर्ण गोत्र)
इसके अतिरिक्त लाहिड़ी, सान्याल, मोइत्रा और बागची वरेंद्र समूह के राढ़ी ब्राह्मण हैं।
जो राढ़ी ब्राह्मण राढ़ क्षेत्र छोड़कर दूसरे राज्यों में चले गए, उनमें अधिकांशतः अपना जातिनाम ‘मिश्र’ लगाते हंै। इनमें भी प्रायः वे लोग हैं जिनका गोत्र कश्यप है। उत्तरी भारत के मिश्र जातिनाम के ब्राह्मणों में कश्यप गोत्र शामिल नहीं है। इस प्रकार की चर्चा मुझसे एक बार काशी विद्यापीठ से सेवानिवृत्त प्रो0 वंशीधर त्रिपाठी जी से हो गई। वे ‘कश्यप’ गोत्र सुनते ही बोल पड़े कि इस जातिनाम ‘मिश्र’ में कश्यप गोत्रीय ब्राह्मण हो ही नहीं सकता। वह या तो किसी की गद्दी यानी ‘नेवासा’ (ससुराल या ननिहाल में वंशहीनता की स्थिति में उसी वंश की संपत्ति और घर पर स्थायी रूप से निवास करने वाला) पर होगा या किसी अन्य कारण से अपना जातिनाम बदल लिया है। जब उन्हें पता लगा कि कुछ मिश्र लोग मूलतः राढी हैं तो उन्होंने कहा कि यही कारण है कि उन्हें कश्यप और मिश्र में तुल्यता का संदेह हुआ। राढ़ी तो मूलतः बंगाली ब्राह्मण हैं और मिश्र जातिनाम बंगाल में नहीं होता। प्रो0 वंशीधर त्रिपाठी एक सुदीर्घ अध्येता रहे हैं। आज उनकी वय 85 से ऊपर की है। वे एक अत्यंत अच्छे और गंभीर लेखक रहे हैं। आप मनोविज्ञान, समाज विज्ञान और दर्शनशास्त्र में एम ए तथा डबल पीएच. डी हैं। उन्होंने भारतीय साधु समाज पर शोध किया था और उसके लिए विधिवत दीक्षा लेकर साधु समाज में एक लंबा समय बिताया था। उनकी पुस्तक ‘साधूज आॅफ इंडिया’ एक प्रसिद्ध और मान्यताप्राप्त ग्रंथ है जो अमेरिका के पुस्तकालयों में तथा विश्वविद्यालयों में चर्चित है।
महराजगंज के राढ़ी निश्चित रूप से इसी राढ़ क्षेत्र से विस्थापित हैं। उनकी अधिकांश परंपराएं बंगाल के ब्राह्मणों से मिलती हैं। अंतर एक ही है कि यहां के राढ़ी मूलतः और अधिकांशतः शाकाहारी हैं। वे वैष्णव एवं शैव दोनों ही पंथों में विश्वास रखते हैं और आदिशक्ति दुर्गा उनकी कुल अधिष्ठात्री देवी हैं। वे ही उनकी अंतिम शरण हैं। महराजगंज के राढ़ी राढ़ क्षेत्र से विस्थापित होकर कब और क्यों आए, इसका कोई स्पष्ट उत्तर नहीं है। हो सकता है कि अतिरिक्त स्वतंत्रता, रिक्तता और अस्तित्व की तलाश में राढ़ को छोड़ दिया हो। किसी प्राकृतिक आपदा का संकेेत तो मिलता नहीं। यह भी कहा जाता है कि नवाव शुजाउद्दौला के समय युद्ध और धर्मपरिवर्तन से भयभीत होकर पलायन करना पड़ा हो।
महाराजगंज के राढ़ियांे की मान्यता के अनुसार उनके पूर्वज पहले सुगौटी में आकर बसे। यह गांव भैरव स्थान से लगभग एक किमी की दूरी पर छोटी सरयू के उत्तरी तट पर है। तब शायद बाढ़ का प्रकोप ज्यादा हुआ करता था। कालांतर में विष्णु और महेश दो सगे भाइयों ने एक और विस्थापन लिया। विष्णु ने महराजगंज के पास बांगर क्षेत्र को चुना और बस गए तथा महेश भैरोजी से लगभग तीन किलोमीटर उत्तर पूर्व कछार क्षेत्र में बस गए। यहीं से विष्णु के नाम पर विष्णुपुर (विशुनपुर) तथा महेश के नाम पर महेशपुर आबाद हुआ। आज दोनों ही गांवों में इन्हीं के वंशजों की एक बड़ी आबादी है। अब समय परिवर्तित हो गया है, पहले इन्हें लोग मिश्र के बजाय राढ़ी कहकर ही बुलाते थे।
जैसा कि मैंने पहले कहा, राढ़ी ब्राह्मणों में ब्राह्मणत्व के साथ क्षत्रियत्व अधिक है। ये लोग बड़े अभिमानी, सुपठित, तार्किक और ज्ञानी थे। पंडिताई, यजमानी और व्यावसायिक पूजा-पाठ जैसे ब्राह्मणोचित कार्य में कभी संलग्न नहीं हुए। अधिकांशत: राढ़ी अच्छे किसान भी थे और इनके पास कृषियोग्य भूमि की अधिकता थी। जमींदार भी थे ये।
क्रमशः...........





Saturday, 18 February 2017

चर्चा में ‘समाज का आज’

नरेश दाधीच
जयपुर  पीस फाउण्डेशन के तत्वावधान में आज मानसरोवर स्थित उनके संगोष्ठी कक्ष में डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की नव प्रकाशित पुस्तक समाज का आज पर चर्चा गोष्ठी आयोजित की गई. प्रारम्भ में फाउण्डेशन के अध्यक्ष प्रो. नरेश दाधीच ने पुष्प गुच्छ देकर लेखक का स्वागत किया  और फिर कृतिकार डॉ अग्रवाल ने अपनी पुस्तक के बारे में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि मूलत: एक अपराह्न दैनिक के स्तम्भ के रूप में लिखे गए ये आलेख समकालीन देशी-विदेशी समाज की एक छवि प्रस्तुत करते हैं. डॉ अग्रवाल ने कहा कि ये लेख विधाओं की सीमाओं के परे जाते हैं और बहुत सहज अंदाज़ में हमारे समय के महत्वपूर्ण सवालों से रू-ब-रू कराने  का प्रयास करते हैं. कृति चर्चा की शुरुआत की जाने-माने पत्रकार श्री राजेंद्र बोड़ा ने. उनका कहना था कि यह किताब बेहद रोचक है और हल्के फुल्के अंदाज़ में बहुत सारी बातें कह जाती हैं. क्योंकि ये लेख एक अखबार  के लिए लिखे गए हैं इसलिए इनमें अखबार की ही तर्ज़ पर इंफोटेनमेण्ट है‌ यानि सूचनाएं भी हैं और मनोरंजन भी. 

बोड़ा ने किताब की भाषा की रवानी की विशेष रूप से सराहना की और यह भी कहा कि इन लेखों में लेखक का सरल, सौम्य व्यक्तित्व झलकता है. लेकिन उनका यह भी मत था कि इस किताब में जो सच उजागर हुआ है वह समाज के एक वर्ग विशेष का ही सच है, पूरे समाज का नहीं है. यहां मज़लूम  और ग़रीब वर्ग सिरे से गायब है. लेकिन उनका यह भी कहना था कि लेखक सर्वत्र मानवीय पक्ष के साथ खड़ा नज़र आता है. श्री बोड़ा का यह भी विचार था कि इस किताब  के बहुत सारे- करीब चालीस-  लेख प्रश्न चिह्न पर ख़त्म होते हैं, और लगता है कि लेखक खुद कोई स्टैण्ड नहीं ले रहा है. लेकिन उनका एक मत यह भी था कि लेखक अपनी बात कहता है और निर्णय पाठक पर छोड़ देता है. श्री बोड़ा का कहना था कि इन लेखों में कोई भी पीड़ा सघन रूप से अभिव्यक्त नहीं हो पाई है, उसकी सूचना मात्र है. फिर भी, किताब की पठनीयता की उन्होंने उन्मुक्त सराहना की. 

श्री बोड़ा की बात को आगे बढ़ाया वरिष्ठ कवि श्री नंद भारद्वाज ने. उन्होंने कहा कि आकार इन लेखों की बहुत बड़ी सीमा है. विषय जैसे ही खुलने लगता है, लेख समाप्त हो जाता है. लेकिन लेखक के स्टैण्ड की बात पर उनका कहना था कि मूल्यों के स्तर पर लेखक लोकतांत्रिक स्टैण्ड लेता है. वह अपनी बात कहता है और फैसला पाठक पर छोड़ देता है. वह भले ही कोई निर्णय न दे, विचार को ज़रूर प्रेरित करता है. श्री  भारद्वाज ने इस किताब की दो ख़ास बातों को रेखांकित किया. एक तो यह कि लेखक संस्कृति की अच्छाइयों को उभारता है, और दूसरी यह कि वह बदलावों, विशेष रूप से तकनीक में आ रहे बदलावों के प्रति सहानुभूति पूर्ण नज़रिया रखता है.

वरिष्ठ रचनाकार और साहित्यिक त्रैमासिकी अक्सरके सम्पादक डॉ हेतु भारद्वाज का  कहना था कि यह किताब अखबार और लेखक के रिश्तों पर विचार करने की ज़रूरत महसूस कराती है. उनका सवाल था कि क्या अख़बार लेखक काइस्तेमाल करता है, और अगर  लेखक कोई स्टैण्ड लेता है तो अखबार का रुख क्या होगा. उन्होंने लेखक से चाहा कि वो कभी ऐसा भी कुछ लिखकर देखे जो अखबार को स्वीकार्य न हो. चर्चा में सहभागिता करते हुए कथाकार और विमर्शकार हरिराम मीणा ने कहा कि हर कॉलम की अपनी शब्द सीमा होती है और लेखक को उस सीमा के भीतर रहना होता है. उन्होंने कहा  कि इस किताब के लेख बहुत रोचक और समसामयिक हैं. उनका यह भी मत था कि लेखक कोई उपदेशक नहीं होता कि वह अपने पाठक को रास्ता बता दे. अंतिम सत्य उसके पास भी नहीं होता है. पहले उठे एक मुद्दे के संदर्भ में उन्होंने कहा कि लेखक जिस समाज को जानता है, उसी के बारे में तो लिखता है. किसी भी लेखक से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह समाज के उन हिस्सों के बारे में भी  लिखेगा  जिन्हें वो जानता ही नहीं है. साहित्य समर्थाकी सम्पादक कथाकार नीलिमा टिक्कू का कहना था कि इस किताब के लेख ज्वल्लंत समस्याओं को उठाते और पाठक को उद्वेलित करते हैं.न्यूज़ टुडैके पूर्व सम्पादकीय प्रभारी, जिनके कार्यकाल में ये आलेख प्रकाशित हुए थे, श्री अभिषेक सिंघल का कहना था कि अखबारी लेखन और साहित्य में स्वभावत:  एक फासला होता है, और फिर अगर वह अखबार सांध्यकालीन हो तो यह फासला और बढ़ जाता है क्योंकि इसका पाठक वर्ग भिन्न होता है. उन्होंने इस कॉलम के लिए अपनी मूल योजना से परिचित कराते हुए बताया कि हम चाहते थे कि  समाज के यथार्थ से आंख न मूंदी जाए, लेकिन उसे सहज शैली और सरल भाषा में प्रस्तुत किया जाए. 

सिंघल ने इस बात पर प्रसन्नता ज़ाहिर की कि उनके अखबार  में छपे ये लेख अब पुस्तकाकार उपलब्ध हैं और इन्हें पढ़ा और सराहा जा रहा है. चर्चा का समापन करते हुए राजनीति विज्ञानी डॉ नरेश दाधीच ने कहा कि इस किताब के लेखों की भाषा नए प्रकार की है और वह उत्तर आधुनिक है. यह भाषा विषयों द्वारा निर्मित सीमाओं का अतिक्रमण करती है और कभी-कभी यह आभास देती है जैसे यह हरिशंकर परसाई  की भाषा का उत्तर आधुनिक संस्करण है. एक तरह से तो इस किताब की भाषा आने वाले समय की हिंदी कैसी हो, इसका मानक रूप प्रस्तुत करती है. भाषा की सरसता और लचीलेपन के अलावा उन्होंने विषयों  के वैविध्य की भी सराहना  करते हुए और विशेष रूप से किताब के अंतिम लेख का विस्तृत हवाला देते हुए यह शिकायत की कि लेखक पूरी घटना बता कर भी उसका अंत नहीं बताता है.

इसी बात के जवाब से अपनी टिप्पणी की शुरुआत करते हुए लेखक डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कहा कि यह शिल्प उन्होंने आज की कहानी से लिया है जो प्राय: ओपन एण्डेड होती है और जहां कथाकार पाठक से अपेक्षा करता है कि वह अंत की कल्पना खुद कर लेगा. उन्होंने विभिन्न वक्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी. उनका कहना था कि अखबार ने कभी उनकी अभिव्यक्ति पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया. इस्तेमाल वाली बात पर अपने चिर परिचित हल्के फुल्के अंदाज़ में उन्होंने कहा कि इस्तेमाल तो सभी एक दूसरे का करते हैं. अगर अखबार लेखक का इस्तेमाल करता है तो लेखक भी अपनी बात कहने के मंच के तौर पर अखबार का इस्तेमाल करता है.

इस संगोष्ठी में जयपुर  के  अनेक  प्रमुख साहित्यकार-पत्रकार जैसे फारूक आफरीदी, हरीश करमचंदानी, गोविंद माथुर, अनिल चौरसिया, एस भाग्यम शर्मा, रेखा गुप्ता, स्मिता विमल, रंजना त्रिखा, प्रो. सुल्ताना, कल्याण प्रसाद वर्मा, अशोक  चतुर्वेदी, सम्पत सरल, बनज कुमार बनज, माया मृग, चंद्रभानु भारद्वाज, हनु रोज, और अनेक सुधी साहित्य रसिक उपस्थित थे.


Tuesday, 14 February 2017

गंगा-जमुनी तहज़ीब के दुश्मन कौन?

इष्ट देव सांकृत्यायन 
कहने के लिए पद्मावती को लेकर उठा विवाद थम गया. लेकिन यह बस थमा ही है, ख़त्म नहीं हुआ. क्योंकि जो विवाद एक बार उठ जाता है, वह कभी ख़त्म नहीं होता. उसके मूलभूत तत्त्व, जो विवाद के कारण होते हैं, बिलकुल निचले तल पर जाकर कहीं बैठ जाते हैं. वे समय-समय पर नए-नए रूपों में उभरते और समाज को दूषित करते रहते हैं. विवाद के हर दौर में पक्ष-विपक्ष की ओर से तर्कों के रूप में कई ऐसी बातें आ जाती हैं जो समाज के किसी तबके के थोथे अहंकार को बढ़ाती हैं और किसी के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाती हैं. यह आशंका उस समाज में बहुत अधिक होती है जहाँ बुद्धिजीवियों के रूप में मौजूदा या पूर्ववर्ती सत्ता के वकील होते हैं. जिनका काम नीर-क्षीर विवेक के ज़रिये किसी सत्य तक पहुँचना नहीं, केवल अपने-अपने पोषकों की सत्ता या प्रभाव को जैसे-तैसे बचाए रखने के लिए थोथे तर्क गढ़ना होता है.

लोकतंत्र में सत्ता या प्रभाव का मूल स्रोत वोट होता है. वोट पाने के लिए समाज के कल्याण के लिए जो काम किए जाने की ज़रूरत है, उसका भारतीय राजनीति में शुरू से ही सर्वथा अभाव है. इसीलिए ऐसी कोई नीति नहीं बनाई जाती जिससे सबमें अपने भोजन-कपड़े-मकान के इंतज़ाम की आत्मनिर्भरता के साथ-साथ लैप्टॉप-टैब्लेट ख़रीदने की औकात आ सके. यहाँ यह सब वोट के बदले बाँटे जाने की घोषणाएँ की जाती हैं और न जाने हमारा तंत्र किस नज़रिये से देखता है कि यहाँ यह सब वोट के बदले दिए जाने वाले प्रलोभन के तौर पर नहीं देखे जाते. तंत्र की तो ख़ैर छोड़िए, इसी से यह भी पता चलता है कि हमारे ये तथाकथित बुद्धिजीवी कितनी ईमानदारी और तत्परता से अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं जो जनता में उसके अपने व्यापक स्वार्थ की सही समझ और आत्मसम्मान भी पैदा नहीं कर सके. ये केवल बंद कमरों में बैठकर देश के वास्तविक इतिहास को नकारने या एयरकंडीशंड सभागारों में देश की सीमाओं को लेकर नए-नए विवाद खड़े करने में लगे रहते हैं. इनकी ज़बान हिलते ही पता चल जाता है कि अपना देश इनके लिए केवल साधन और सुविधाप्रदाता है, जनता केवल उपयोग की वस्तु है. वस्तुतः जुड़ाव तो इनका कहीं और से है. ऐसे बुद्धिजीवी किसी भी समाज के लिए उन तत्त्वों से ज़्यादा ख़तरनाक हैं, जिन्हें अराजक कहा जाता है.

यह पूरा विवाद ऐसी ही बौद्धिक अराजकता का नतीजा है. कला और कल्पनाशीलता के नाम पर केवल अपरिमित नहीं, आपराधिक छूट इनकी ही ज़रूरत है. हिंदी सिनेमा ने अपने इतिहास में कितनी रचनात्मकता दिखाई है और किन ईमानदार लोगों की कृपा पर पला है, यह बताने की ज़रूरत नहीं है. गुण का विरोध मात्रा से करने का बीभत्स याराना पूँजीवादी तरीक़ा ही बंबइया सिनेमा उर्फ़ बॉलीवुड की पहचान है. जैसा कि अब बन गए बॉलीवुड नाम से ही ज़ाहिर है, कथ्य के स्तर पर यह केवल हॉलीवुड का उच्छिष्ठ है. लागत के स्रोत की बात करें तो यह उन्हीं ईमानदारों से आती रही है जिनके ख़िलाफ़ अस्सी-नब्बे के दशक में सबसे ज़्यादा फिल्में बनीं. वो सारी मलिन बस्तियाँ उजाड़ने में हिंदी बॉलीवुड के आश्रयदाता ही सबसे आगे रहे हैं, जिनका प्रतिनिधित्व इनकी फिल्मों का एंग्री यंग मैन ब्रांड हीरो करता रहा है. आप जानते ही हैं कि किस तरह इनका एंग्री यंग मैन परदे पर पूँजीपतियों और राजनेताओं के विरोध का स्वांग करते-करते ख़ुद पूँजीपति से लेकर मंत्री तक बन जाता है. फिल्मी कलाकारों पर अवैध असलहे रखने से लेकर पारिवारिक संबंधों  में धोखाधड़ी तक के मुकदमों की तो छोड़िए, आपने यह भी देखा है कि कैसे एक मुंबइया हीरो फुटपाथ पर सोए अमीरों के सीने पर गाड़ी चढ़ाकर दनदनाते हुए निकल जाता है. आप भूले नहीं होंगे कि कैसे दुबई या लाहौर में बैठे महान संत पर्दे के शेर को चिकना कहते हैं और उनके सामने वह दीन-हीन सा रिरियाता नज़र आता है. ऐसे ही रचनाधर्मियों के पक्ष में खड़े जनधर्मियों को जब मैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और रचनात्मक छूट की झंडाबरदारी करते देखता हूँ तो घिन सी आने लगती है.

रचनात्मक छूट के नाम पर अपने को पूँजीवाद के धुर विरोधी बताने और हर बात पर अमेरिका के ख़िलाफ़ झंडा उठा लेने वाले बुद्धिजीवी भी हॉलीवुड के उद्धरण देते नहीं थकते. दुनिया जानती है कि केवल मुनाफ़ा कमाने की होड़ में लगा भारत का पूँजीपति वर्ग अपने पूरे प्रोडक्शन पर भी उतना ख़र्च नहीं करता जितना हॉलीवुड केवल रिसर्च में लगा देता है. न्यूनतम लागत में अधिकतम मुनाफ़े की इसी होड़ से इनकी ज़िम्मेदारी का पता चलता है. कल्पनाशीलता और रचनात्मक छूट के नाम पर ये किसी भी देश के इतिहास के साथ वही करेंगे जो हीरोइन बनने के सपने सँजोए मुंबई पहुँची किसी भोली-भाली क़सबाई लड़की के साथ करते हैं. कास्टिंग काउच शब्द किसी व्याख्या का मोहताज नहीं है. उसी तर्ज पर ये पहले तो एक असभ्य, कायर और धूर्त लुटेरे के सपने में एक स्वाभिमानी स्त्री को उसके साथ रोमैंस करते दिखाएंगे. उस स्त्री को जिसने उसके हाथ लगने की तुलना में अपने प्राणों की आहुति देना बेहतर समझा. जब समाज इस पर कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं करेगा या उसकी प्रतिक्रिया दबा दी जाएगी तब आगे चलकर ये उसी स्त्री को उसी लुटेरे के साथ जोड़कर कोई प्रेम कहानी ही बना देंगे.

यही नहीं, बाद में कोई ऐसा स्वनामधन्य इतिहासकार, जिसका इतिहासकार होना किसी गिरोहबाज़ी के परिणास्वरूप हुई एक ऐतिहासिक दुर्घटना होगा और जो लोक में सदियों से रची-बसी गाथाओं को कपोलकल्पना मानता होगा, इनकी फिल्मी कहानी के आधार पर एक रक्तपिपासु समलैंगिक लुटेरे को न केवल एक आदर्श प्रेमी बल्कि महान प्रजापालक लोककल्याणकारी सम्राट बना कर पेश कर देगा. ये अलग बात है कि पद्मावती क्या, मौक़ा मिले तो जायसी तक को ये काल्पनिक घोषित कर देंगे. गोएबल्स के निर्लज्ज चेले याराना पूँजीवाद के सहयोगी प्रचार तंत्र का भरपूर उपयोग करते हुए अपने गढ़े झूठ को सत्य की जगह स्थापित करने के लिए अंग्रेज़ी में किताब लिखेंगे. जुगाड़ तंत्र के बल पर भारतीय इतिहास के ज्ञान से सर्वथा वंचित और भारत को हर हाल में नीचा दिखाने को तत्पर अपने किसी विदेशी आका से पुरस्कार ले लेंगे. यहाँ की सरकारों की इच्छाशक्ति के प्रतीकस्वरूप भरे पड़े बेरोज़गारों या किसी गिरोहबाज़ की कृपा से रोज़गारशुदा बने अपने कृपाकटाक्ष के चिर आकांक्षियों से उसका भरपूर सकारात्मक और विरोधात्मक प्रचार करवा लेंगे. इस प्रचार से आक्रांत भारतीय जन का कोई वर्ग अहंकार, तो कोई कुंठा से थोड़ा और ग्रस्त हो जाएगा. इसकी मदद से वैमनस्य फैलाकर ये समाज को बाँटने में थोड़ा और आगे बढ़ जाएंगे.

पद्मावती के अस्तित्व से जो इनकार कर चुके हैं, वे एक-न-एक दिन मलिक मुहम्मद जायसी, शेख़ फ़रीद, हज़रत निज़ामुद्दीन, बुल्ले शाह और दूसरे सूफ़ियों व संतों के अस्तित्व से भी इनकार करेंगे ही. क्योंकि ये जो करना चाहते हैं, सूफी और संत उस मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हैं. वह सूफ़ी और संत ही हैं जिन्होंने भारत में गंगा-जमुनी तहज़ीब के प्रवाह को बनाए रखने में अपना जीवन होम कर दिया. इसके लिए सूफ़ी और संत किसी शाह के वज़ीफ़ाख़्वार नहीं बने. वज़ीफ़ाख़्वार बनकर किसी संस्कृति, इतिहास या जन के साथ न्याय किया भी नहीं जा सकता. क्योंकि वजीफ़ाख़्वार किसी का भी हो, उसे लढ़िये की तरह एक तरफ़ उल्ल होना ही पड़ता है.

ज़रा सोचिए, जायसी चाहते तो क्या वे पद्मावत की कहानी को आध्यात्मिक टर्न देते हुए ही वह नहीं कर सकते थे जो भंसाली ने किया? उन्होंने ऐसा नहीं किया. उसी सत्य को अपना सत्य माना जो उनके समय के जनगणमन में अंतःसलिला धारा की तरह प्रवहमान था. यही वजह है कि उनके समय और बाद के कई धुरंधर बह गए, लेकिन जायसी, बुल्लेशाह, रसखान और उनके जैसे दूसरे रचनाकार लोक की स्मृति में रचे-बसे रहे. काँटों की राह पर ज़िंदगी गुज़ार देने वाले ये रचनाकार आज के पाँचसितारा छाप जनधर्मी बुद्धिजीवियों की राह के सबसे बड़े काँटे हैं.

जायसी जैसे रचनाकारों के भारत की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बने रहते इनकी सफलता केवल कुछ लोगों को हिंदू-मुसलमान बना देने तक ही सीमित रहेगी. मैंने देखा कि सोशल मीडिया पर किस तरह कुछ लोग अपने को हिंदू या मुसलमान बनाते हुए पद्मावती के बहाने जोधा-अकबर, फ़िरोजा-वीरमदेव, जहाँआरा-शत्रुसाल से लेकर धरमन बीबी और बाबू कुँवर सिंह के प्रेम तक के मसले उठाकर एक-दूसरे को ललकारते रहे. धुर पुरुषवादी मानसिकता से आक्रांत लोगों में से किसी के लिए विकृत यौन मानसिकता का वहशी दरिंदा आदर्श हो गया तो किसी के लिए दो ऐतिहासिक पात्रों का पवित्र प्रेम एक-दूसरे को नीचा दिखाने का माध्यम बन गया. अगर इसे संस्कृति मान लिया जाए तो फिर विकृति क्या होगी?

पंथनिरपेक्षता का पाखंड रचने वालों ने यह स्थापित करने की पुरज़ोर साजिश रची कि भारत का मुसलमान पूर्वज के रूप में अपनी प्रेरणा उन्हीं लुटेरे और रक्तपिपासु आक्रांताओं से ग्रहण करता है, जिनके मनुष्य होने पर मनुष्यता शर्मिंदा है. इन आक्रांताओं से बहुत पहले अध्यात्म के संदेश लेकर आए सूफियों को उसने विस्मृति के हवाले कर दिया है. लेकिन आमजन का ऐसा मान लेना उतनी ही बड़ी ग़लती होगी जितना कि यह सोचना कि भारत का हिंदू अपनी प्रेरणा कंस, जरासंध, दुशासन या जयचंद जैसे कुपात्रों से लेता है.  मेरे मुसलमान दोस्तों में तो एक भी ऐसा नहीं जो खिलजी, गोरी या ग़ज़नी को अपना  प्रेरणास्रोत मानता हो. वे तो जायसी, फरीद और बुल्ले शाह को ही याद करने वाले हैं. मीर, ग़ालिब और  फ़िराक़ के उद्धरण देने वाले हैं. फिर हर राजनीतिक खेमे और उनके झंडाबरदार विद्वानों की ओर से यह स्थापित करने की साजिश क्यों रची जा रही है?

इसे इसी स्वांग के मार्फ़त समझने की ज़रूरत है. झापड़ पड़ने और फेसबुक-ट्विटर पर मिली गालियों के बाद आख़िरकार भंसाली इस पर राज़ी हो गए कि वह फिल्म में कोई रोमैंस सीन नहीं डालेंगे. पता नहीं उनका मानना कितना सच है और कितना निबाहा जाएगा. यह भी कि करणी सेना की मंशा के पीछे कितना आत्मगौरव और कितना न्यस्त स्वार्थ है. लेकिन एक बात तो तय है कि वह फिल्म बना रहे हैं और एक-दो चाटों के बदले मुफ़्त में उन्हें जो प्रचार मिला, वह करोड़ों रुपये विज्ञापन पर ख़र्च कर भी नहीं मिल पाता.

करणी सेना और ऐसे ही अन्य आत्मगौरववादी भले इसे अपनी जीत मानें, लेकिन विजय यह वास्तव में याराना पूँजीवाद की ही है. वह याराना पूँजीवाद ही है जिसके लिए वज़ीफ़ाख़्वार विद्वज्जन रचनात्मक छूट और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नारा ही नहीं, पद्मावती के एक काल्पनिक पात्र होने की कपोलकल्पित स्थापना तक लेकर आ गए थे. एक बार के लिए यह तो माना जा सकता है कि करणी सेना के लोग बिना सोचे-समझे इस जाल के हिस्से बन गए हों. लेकिन, कलात्मक कल्पनाशीलता के ध्वजवाहक वे विद्वज्जन जो दिन-रात पूँजीवाद की बखिया ही उधेड़ते रहते हैं, इस क्षुद्र ज्ञान से वंचित होंगे, यह मेरी कल्पना से बाहर है. उनसे अनजाने में कोई ग़लती नहीं हुई है. वे अच्छी तरह जानते हैं कि फिल्म बनाने वाले कितने ग़रीब होते हैं, इसके लिए पूँजी कहाँ से आती है और उसकी भरपाई की शर्तें क्या होती हैं. अब यह आपको सोचना होगा कि वे सब जान-बूझकर ऐसा क्यों करते हैं? यह भी कि भारत की गंगा-जमुनी तहजीब को नष्ट करने की साजिश रचने वाले कौन हैं और इसके पीछे उनके उद्देश्य क्या हैं?

Sunday, 5 February 2017

इति सिद्धम


इष्ट देव सांकृत्यायन

विषयों में एक विषय है गणित. इस विषय के भीतर भी एक विषय है रेखागणित. ऐसे तो इस विषय के भीतर कई और विषय हैं. अंकगणित, बीजगणित, त्रिकोणमिति, लॉगरिथ्म, संख्यिकी, कलन आदि-आदि, मने विषयों की भरमार है यह अकेला विषय. इस गणित में कई तो ऐसे गणित हैं जो अपने को गणित कहते ही नहीं. धीरे से कब वे विज्ञान बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता. हालाँकि ऊपरी तौर पर विषय ये एक ही बने रहते हैं; वही गणित. हद्द ये कि तरीक़ा भी सब वही जोड़-घटाना-गुणा-भाग वाला. अरे भाई, जब आख़िरकार सब तरफ़ से घूम-फिर कर हर हाल में तुम्हें वही करना था, यानि जोड़-घटाना-गुणा-भाग ही तो फिर बेमतलब यह विद्वता बघारने की क्या ज़रूरत थी! वही रहने दिया होता. हमारे ऋषि-मुनियों ने बार-बार विषय वासना से बचने का उपदेश क्यों दिया, इसका अनुभव मुझे गणित नाम के विषय से सघन परिचय के बाद ही हुआ.

जहाँ तक मुझे याद आता है, रेखागणित जी से मेरा पाला पड़ा पाँचवीं कक्षा में. हालाँकि जब पहली-पहली बार इनसे परिचय हुआ तो बिंदु जी से लेकर रेखा जी तक ऐसी सीधी-सादी लगीं कि अगर हमारे ज़माने में टीवी जी और उनके ज़रिये सूचनाक्रांति जी का प्रादुर्भाव हो गया होता तो कोई भरोसा नहीं कि उस उम्र में ही मैं उन पर मर-मिटा होता. चूँकि बिना पटरी के भी सीधी रेखा जी को खींचना मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं थी, इसलिए अपने सहपाठियों की तुलना में शुरू-शुरू में मैं थोड़ा आगे ही चल रहा था. सामान्य परिचय के बाद जब रेखाजी ने थोड़ा इठलाना-बल खाना शुरू किया, तो भी मुझे अच्छा ही लगा. हालांकि बीच-बीच में कुछ त्रिकोण, चतुर्भुज, पंचकोण, षटकोण आदि लोगों से पाला पड़ा और वे लोग अगर अच्छे नहीं तो कुछ ख़ास बुरे भी नहीं लगे, क्योंकि थे तो ये सब रेखा जी लोगों के ही खेल. और रेखा जी को सीधे-टेढ़े हर तरह से खींचना मुझे आता था. लेकिन जैसे-जैसे मेरा परिचय इनसे सघन होता गया, वैसे ही वैसे इनके सीधेपन से मेरा विश्वास उठता गया. पता चला कि ये तो लंब के रूप में बिलकुल सीधी खड़ी होते हुए भी इठलाती हैं, आधार के रूप में लेटी हुई भी बल खाती हैं और कर्ण के रूप में ऊपर जाते हुए भी अपने पर भरोसा करने वाले को नीचे गिरा देती हैं.

रेखा जी और उनसे संबंधित गणित के बारे में यह सब मैं तब जान पाया जब सातवीं कक्षा में पहुँचा. सातवीं कक्षा में आधा समय बीत जाने यानि छमाही परीक्षा के बाद मालूम हुआ कि अब मामला केवल बिंदु जी और रेखा जी को बनाने-बिगाड़ने तक ही सीमित नहीं रहा, अब तो सिद्ध करना पड़ेगा. और सिद्ध करने के लिए जिस तरह की बेसिर-पैर की बातें सामने होती थीं, उनसे उलझना नाथों-सिद्धों की इहलोक-परलोक की उलझनों से भी बड़ी उलझन थी. समझ ही न आता था कि इस उलझन को सुलझाएँ कैसे. इस विषय का असली चरित्र उजागर होते ही विषयासक्ति संबंधी ऋषियों के आप्तवचन मेरे निजी अनुभव का हिस्सा बनने लगे.

सिद्ध करिए कि अगर दो रेखाएँ एक-दूसरे को काटें तो उन पर ऊर्ध्वाधर बनने वाले कोण बराबर होंगे. अमाँ यार, काटेंगी रेखा जी लोग एक-दूसरे को और बनेंगे कोण. अब वो बराबर हों या छोटे-बड़े, ये सिरदर्द है रेखा जी लोगों का या फिर कोण लोगों का. उनके पचड़े में एक सीधे-सादे बच्चे को क्यों फँसा रहे हो? 


निर्मेय, प्रमेय और रचना जी का खेल जब शुरू हुआ तब समझ में आया कि अधिकतर छात्रों में ग्यारहवीं तक पहुँचते-पहुँचते गणित के नाम से ही दिमाग़ी बुख़ार के लक्षण क्यों दिखने लगते हैं. अजब-ग़जब सवाल होते थे और हर सवाल की शुरुआत ही ‘सिद्ध करिए’ से होती थी. सिद्ध करिए कि अगर एक किरण एक रेखा पर खड़ी हो तो उस पर बनने वाले दो कोणों का जोड़ 180 अंश होगा. अरे भाई, खड़ी होंगी किरण जी और वह भी रेखा जी पर, तो उनसे बनने वाले जो भी कोण होंगे उनका जोड़ या टूट जो भी हो, वो उनका सिरदर्द है न, मुझ बच्चे की जान क्यों ले रहे हो? अब दूसरा सवाल देखिए. सिद्ध करिए कि अगर दो रेखाएँ एक-दूसरे को काटें तो उन पर ऊर्ध्वाधर बनने वाले कोण बराबर होंगे. अमाँ यार, काटेंगी रेखा जी लोग एक-दूसरे को और बनेंगे कोण. अब वो बराबर हों या छोटे-बड़े, ये सिरदर्द है रेखा जी लोगों का या फिर कोण लोगों का. उनके पचड़े में एक सीधे-सादे बच्चे को क्यों फँसा रहे हो? या फिर सिद्ध करिए कि एक रेखा के समानांतर चाहे जितनी रेखाएँ खींची जाएँ सभी समानांतर होंगी. श्रीमान जी, ये मामला रेखा जी लोगों को आपसी मामला है, नितांत निजी टाइप. वो आपस में निपट लेंगी. हम बालक इसमें क्या कर सकते हैं? अब मान लीजिए कि अगर वो समानांतर न भी हों तो हम उनका बिगाड़ क्या लेंगे?

अव्वल तो बात यह कि सब सिद्ध करने का फ़ायदा ही क्या? क्या हमारे सिद्ध न करने से वो रेखा जी लोग एक-दूसरे को काटने-पीटने लगेंगी जो आपके सवाल में समानांतर हैं? या फिर वो रेखा जी लोग समानांतर हो जाएंगी जो अभी तक एक-दूसरे को काट रही थीं? रहेंगी तो वो वही जो हैं, फिर हमारे सिद्ध कर देने या न कर पाने से क्या फ़र्क़ पड़ता है? लेकिन नहीं साहब, न सिद्ध कर पाने वाले बच्चे के नंबर तो गुरुजी लोग ऐसे काटते थे कि रेखा जी लोग भी एक-दूसरे को क्या काटती रही होंगी. हमारे ज़माने के गुरुजी लोग भी क्या ग़ज़ब के अत्याचारी थे. एक-एक नंबर ऐसे जोड़-घटा कर दिया करते थे, गोया अपने पीएफ से निकालकर दे रहे हों. ख़ैर, अपने कुछ साथियों की तुलना में मुझे इस विषय की वासना से मुक्ति तो जल्दी ही मिल गई, लेकिन इनके मूलभूत कर्म यानी ‘सिद्ध करने’ से मेरी वितृष्णा बढ़ती ही चली गई.
हिरन जी तो उस दिन शेर जी की मैरिज एनिवर्सरी की पार्टी में थे. उधर आए ही नहीं, इन्हें गोली कैसे लग गई. असल में उस दिन कुत्ता जी लोगों को खाना कम पड़ गया तो उन्होंने हिरन जी की पार्टी मना ली. ये देखिए योर आनर, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लिखा है कि हिरन जी के बचे हुए लेग पीस में मीट मसाला लगा हुआ था. 

जैसे-जैसे जीवन का अनुभव बढ़ा मैं समझ पाया कि ‘सिद्ध करने’ का काम कितना निस्सार, निरर्थक और निरुपयोगी है. लगभग उतना ही जितनी कि वकालत या राजनीति. मुझे पूरा विश्वास हो गया कि इस विषय को ग़लत जगह लगा दिया गया है. हमारे समय में रेखागणित जी के ऊँचे सवालों से उन्हीं बच्चों का पाला पड़ता था जिनका इरादा गणितज्ञ, वैज्ञानिक या इंजीनियर आदि बनने का होता था. वकील लोग आर्ट साइड पढ़ के बन जाया करते थे और राजनीति के लिए तो आप जानते ही हैं. ख़ैर, क्या पता इंजीनियरों को भी बालू-सीमेंट-ईंट-छड़ वग़ैरह के बीच कहीं कुछ सिद्ध करना ही पड़ता हो. लेकिन अव्वल तो वकील के लिए यह उपयोगी है. इसलिए क्योंकि उन्हें कुछ भी सिद्ध करने की निस्सारता बहुत अच्छी तरह पता है. वे जानते हैं कि जिसे क़त्ल करते सबने देखा है, सिद्ध करके ही मानना है कि उसके पास तो छर्रा ही नहीं था, बंदूक कहाँ से ले आया. हिरन को अगर गोली लगी है तो साबित करना है कि जी हिरन जी तो उस दिन शेर जी की मैरिज एनिवर्सरी की पार्टी में थे. उधर आए ही नहीं, इन्हें गोली कैसे लग गई. असल में उस दिन कुत्ता जी लोगों को खाना कम पड़ गया तो उन्होंने हिरन जी की पार्टी मना ली. ये देखिए योर आनर, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लिखा है कि हिरन जी के बचे हुए लेग पीस में मीट मसाला लगा हुआ था.

विद्वान वकील जी लोग यह सब सिद्ध करके सिर्फ़ अपनी ही इज़्ज़त नहीं बढ़ाते, बड़े-बड़े लोगों को बाइज़्ज़त बरी भी करा ले जाते हैं. ऐसा वे इसीलिए करते हैं कि अगर वह यह बात सिद्ध नहीं करेंगे तो दूसरे वकील साहब सिद्ध कर देंगे. अगर दूसरे वकील साहब भी सिद्ध न कर सके तो मुक़दमा ही इतना खिंच जाएगा कि कुछ सिद्ध होने से पहले ही ‘इज़्ज़तदार मुल्जिम जी’ चुनाव लड़ लेंगे और फिर जनता जनार्दन जी उनकी निर्दोषता पर अपने वोट की मुहर लगा कर सिद्ध कर देंगी कि इज़्ज़त से ज़्यादा इज़्ज़तदार तो अपने नेताजी ही हैं, जिन्हें आपने फ़िलवक़्त मुल्जिम जी बना रखा है. कृपा करके इन्हें बाइज़्ज़त बरी कर दें. और अगर इतने पर भी कोई माननीय और विद्वान न्यायाधीश जी न पसीजे तो तय मानिए कि तारीख़-पर-तारीख़-दर-तारीख़ मुक़दमा इतना लंबा खिंच जाएगा कि इज़्ज़तदार मुल्जिम जी भी बेग़ैरत भुक्तभोगी की ही तरह इस असार संसार को ‘सिद्ध करने’ की प्रक्रिया जैसा ही निस्सार समझते हुए, इस दुनिया से ही बाइज़्ज़त बरी हो जाएंगे. अब बताइए, इस सिद्ध करने का कोई मतलब है क्या? नहीं न! इति सिद्धम.

Saturday, 28 January 2017

भारतीय इतिहास पर एसिड अटैक

इष्ट देव सांकृत्यायन
अगर भंसाली ने अपनी फिल्म में ऐसा कुछ दिखाने की कोशिश की है, जैसा बताया जा रहा है तो इसे क्या माना जाए? यह भारतीय इतिहास के स्थापित तथ्यों के साथ खिलवाड़ नहीं, बलात्कार जैसा है. इतिहास के सीने में खंजर भोंकने जैसा है. क्या दुनिया का कोई और देश अपने इतिहास के स्थापित तथ्यों के साथ कला के नाम पर ऐसा कुछ करने की इजाजत देता है? भारतीय इतिहास और जन ऐसी इजाजत क्यों देगा? उससे यह मूर्खतापूर्ण अपेक्षा क्यों की जानी चाहिए? क्या यह वैसा ही जघन्य अपराध नहीं है जैसे बलात्कार या छेड़छाड़ के किसी मामले में अपराधी को उसके अत्याचारों की शिकार लड़की का प्रेमी बताया जाए? क्या यह् पद्मावती की चरित्र हत्या जैसा मामला नहीं है? यह कौन करता है? वे टुच्चे वकील जिनका पेशा ऐसे घटिया लोगों की पक्षधरता करके ही चलता है. जिनके बारे में माना जाता है कि नैतिकता, मानवता और जीवन के उदात्त मूल्यों से उनका कोई लेना-देना नहीं है. क्या कला का धंधा करने वाले उन वकीलों से भी ज़्यादा गए-गुज़रे हो गए हैं? क्या इनका कोई दीन-ईमान नहीं रह गया है? क्या यह न केवल भारतीय इतिहास, बल्कि भारतीय जन से भी विश्वासघात जैसा नहीं है? क्या कला इसीलिए होती है?


भारतीय इतिहास पर एसिड अटैक का यह दौर बहुत लंबे समय से चला आ रहा है. यह बार-बार समय और जगह बदल-बदल कर भिन्न-भिन्न रूपों में होता आ रहा है. सही कहें तो इस प्रवृत्ति को पिछले 70 वर्षों में सत्ता प्रतिष्ठान ने जान-बूझकर बढ़ावा दिया है. एक समुदाय के मिथकों-प्रतीकों के साथ जब भी कुछ बेहूदी हरकत की गई तो उसके विरोध को ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन’ बताकर लगभग बर्बरता से दबा दिया गया. यहाँ तक कि एक टुच्चा पेंटर बार-बार अदालत के सम्मन की अनदेखी करता रहा और जब उसके ख़िलाफ़ वारंट कट गया तो इसे इमरजेंसी से भी भयावह बताया गया. क्या यह वही मानसिकता नहीं है जो ‘अफ़जल हम शर्मिंदा हैं/तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं’ का नारा लगाते हुए देश के माननीय उच्चतम न्यायालय को क़ातिल बताने में भी संकोच नहीं करती? उस पर तुर्रा ये कि यही संविधान में सबसे बड़े आस्था रखने वाले भी हैं. बाक़ी लोग संविधान की ऐसी-तैसी कर रहे हैं. यह बताने वाले वही लोग थे जिन्हें तसलीमा नसरीन, सलमान रुश्दी, एम.ए.खान, तारिक़ फ़तह, हसन निसार के नाम पर साँप सूँघ जाता है. वहीं दूसरी ओर शर्ले एब्दो की घटना पर चुप्पी साध ली गई. क्यों?


उस ख़ास वर्ग की यह चुप्पी बहुत दिनों तक सधी नहीं रही. थोड़े दिनों बाद जब हल्ला थम गया तो मुखर हुई और मुखर इस रूप में हुई कि ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कोई तो सीमा होनी चाहिए’. फेसबुक-ट्विटर पर इस तरह की अभिव्यक्तियों की भरमार हो गई. यह सीमाएँ बताने वाले भी वही थे, जो एक टुच्चे पेंटर के मामले में अभिव्यक्ति की अनंत स्वतंत्रता के बड़े भारी पैरोकार बने फिर रहे थे. क्या इस मानसिकता को आप ‘दोगली’ के अलावा कोई और संज्ञा दे सकते हैं?


उस ख़ास समुदाय के ही संबंध में इन्हें सीमाएँ क्यों याद आती हैं? केवल इसलिए न कि वह इनकी उस चक्रव्यूह रूपी चुनौती के षड्यंत्र को स्वीकार नहीं करता जिसे ये संवाद या बहस या विमर्श कहते हैं! वह बात करने की एक ही भाषा जानता है और वह है बंदूक. जो इनसे बात करने की कोशिश करते हैं उन्हें ये पहले तो दकियानूस करार देते हैं और फिर बहस का मैदान छोड़कर भाग जाते हैं. अपनी एक ख़ास खोल में छिपे हुए वहीं से भौं-भौं करते रहते हैं. ग़लती से कोई इनका सुरक्षा घेरा तोड़कर भीतर घुस गया और वहाँ इनसे बहस करने बैठ गया तो पहले तो उसके तथ्यगत सही तर्कों को सुनने से ही इनकार कर देते हैं और फिर उस पर कुतर्कों की बौछार कर देते हैं. इस पर भी कुछ रह गया तो देश भर के अख़बारों-टीवी चैनलों में रंगे सियारों की तरह हुआँ-हुआँ शुरू कर देते हैं. इसके बाद चारा क्या बचता है?


साहित्य में यह बात बार-बार कही जाती रही है कि ऐतिहासिक उपन्यास इतिहास नहीं होता. लेकिन साथ ही यह भी कहा जाता रहा है कि ऐतिहासिक उपन्यास की अपनी सीमाएँ होती हैं. साफ़ अर्थ है कि साहित्य में कल्पना के पुट के नाम पर इतिहास के तथ्यों के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता. इसकी अनुमति स्वयं साहित्य भी नहीं देता. ऐसा केवल हिंदी या भारतीय साहित्य में नहीं है, दुनिया भर का साहित्य इस धारणा को मान्यता देता है. वह इस धारणा को मान्यता इसलिए देता है क्योंकि अगर ऐसा न किया गया तो साहित्य और इतिहास के बीच बड़ी अराजक स्थिति उत्पन्न हो जाएगी. जो न तो साहित्य के लिए ठीक होगी, न इतिहास के लिए और न ही समाज के लिए. इसके बावजूद भारतीय साहित्य में ऐसी छूट ली गई है और वह छूट लेने वाले कोई दूसरे नहीं, वही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर साहित्य को अपनी कुंठाओं का उगालदान बनाने वाले हैं. आज वही गिरोह है जो सिनेमा में करोड़ों की लागत लगाकर अरबों का मुनाफ़ा कमाने वाले ग़रीब संजय लीला भंसाली के पीछे एक बार फिर खड़ा हो गया है. क्या अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य की इस पैरोकारी और इस कलावाद पर आपको हँसी नहीं आती?


मुझे सिनेमा को इतिहास संबंधी अपनी कुंठाओं का उगालदान बनाने वालों पर जूते पड़ने का कोई अफ़सोस नहीं है. हाँ, अफ़सोस इस बात का है कि ये जूते मारने वाले अभी तक या तो केवल क्षणिक आवेश के शिकार साबित हुए हैं या फिर भाड़े के कुत्ते. जो अंततः इन ग़रीब खरबपतियों के लिए मुनाफ़ा बढ़ाने वाले औजार ही साबित होते हैं. अगर करणी सेना इसे इतिहास और स्त्री की अस्मिता के साथ खिलवाड़ का मामला बनाकर अदालत तक न ले गई और अदालत से यह फिल्म बनने पर रोक न लगवा सकी तो उसे भी भाड़े का कुत्ता ही माना जाएगा.