Thursday, 24 May 2018

यात्रा वृत्तांत

               पंचमढ़ी के प्रपात
                                  ---हरिशंकर राढ़ी  

मध्यप्रदेश के विस्तृत मैदानी और पठारी क्षेत्रफल में यदि प्रकृति की सुंदरता निहारनी हो तो पंचमढ़ी के अलावा अन्य कोई विकल्प हो ही नहीं सकता। सतपुड़ा की रानी के नाम से प्रसिद्ध इस पहाड़ी स्थल का अंदाज ही निराला है। न तो किसी मुख्य रेलमार्ग या राजमार्ग पर होने के बावजूद समय-समय पर यहां पहुंचने वाले सैलानियों की बड़ी संख्या से इसकी रमणीयता और लोकप्रियता का अंदाजा लग जाता है। हाँ, एक बार इस पर्वतीय संुदरी के पास पहुंच जाने पर तन-मन की सारी थकान उतर जाती है। सुंदरता में चार चांद तब और लग जाते हैं यदि भ्रमण पावस काल में हो। वस्तुतः पंचमढ़ी घूमने का सर्वोत्तम समय वर्षाऋतु ही है।
अगस्त महीने की उमस और दोपहरी की धूप झेलते हुए जब हमारी बस मैदानी इलाका पार कर सतपुड़ा की पहाड़ियों की सर्पीली सड़क पर चढ़ने लगी तो मौसम सुहावना हो आया। रिमझिम बूँदों के बीच हवा की शीतलता और प्राकृतिक सुंदरता ने हमारी आंखों को बांध लिया। यह मार्ग हिमालयी सड़कों की भांति खतरनाक नहीं लगता, इसलिए यात्री का पूरा ध्यान आनंद पर ही होता है। यहीं से पंचमढ़ी यात्रा की सफलता का आभास होने लग जाता है। जितना भी समय पंचमढ़ी की वादियों में बीतता है, वह नितांत अपना और विशिष्ट होता है।

दिल्ली से भोपाल तक की हम छह जनों की यात्रा रात में पूरी हो गई और सुबह हम भोपाल से पिपरिया के लिए दूसरी गाड़ी में सवार हो गए। दरअसल पंचमढ़ी का निकटतक रेलवे स्टेशन पिपरिया है जो मुंबई जबलपुर रेलमार्ग पर पड़ता है। दिल्ली से पिपरिया के लिए जबलपुर जाने वाली एक ही गाड़ी है जो बहुत अधिक समय ले लेती है। सो यह निश्चित हुआ कि भोपाल से गाड़ी बदलकर इटारसी होते हुए पिपरिया पहुँचा जाए। पिपरिया हम दोपहर में पहुंच गए। टैक्सी वालों के भाव बहुत ऊँचे थे, इसलिए हमने बस अड्डे से बस पकढ़ी और हंसते बोलते पंचमढ़ी की ओर चल पड़े।

पंचमढ़ी को स्थानीय भाषा में पचमढ़ी कहते हैं। पंचमढ़ी की सीमा में प्रवेश करते ही उड़ती-उड़ती आवाजें पड़ने लगीं कि होटल बुक हो चुके हैं किंतु हमें सहज विश्वास नहीं हुआ। लेकिन यह सच हमें एक-दो होटलों की देहरी लांघते ही मालूम हो गया। जिन कमरों का किराया आठ सौ या अधिकतम एक हजार होना चाहिए था, वे लगभग चार हजार में थे। ऐसी कीमत देखकर माथे पर पसीना चुहचुहा आया, हालांकि रिमझिम बारिश हो रही थी और ठंडी हवा भी चल रही थी। दरअसल, अधिकतर लोगों की भांति हमने भी पचमढ़ी भ्रमण का कार्यक्रम छुट्टियों को ध्यान में रखते हुए बनाया था। स्वतंत्रता दिवस के अड़ोस-पड़ोस में दूसरा शनिवार और रविवार पड़ रहा था और कुल मिलाकर तीन छुट्टियां मिल रही थीं। इस कारण पूरा पंचमढ़ी पर्यटकों से भर रहा था और होटल वालों को यह पता था। होटल और टैक्सी यूनियन वाले इस अवसर का लाभ उठाने में किसी प्रकार की रियायत बरतने या मौका चूकने को तैयार नहीं थे। हर जगह एक भी दर, यहाँ तक कि साधारण तो क्या,गली कूचों के टुटपंुजिए होटलों का भी सितारा बुलंद था।  ”क्या करें जी, हमारे कमाने के यही तो दो-चार दिन हैं ! फिर पंचमढ़ी कौन आता है? मक्खियां मारते रहो। खर्चा भी नहीं निकलता।“ अर्थात् पूरे साल का बिजनेस एक -दो हफ्ते में ही करना है। खैर, काफी देर तक छान-बीन और भाव-ताव करके हमें उसी होटल में आना पड़ा जिसमें हमने सबसे पहले पूछताछ की थी। दो रात का किराया मोलभाव के बाद साढ़े छह हजार मंे तय हुआ और हमें लगा कि हम सस्ते छूटे।

कमरे में सामान पटककर तरोताजा होकर बूंदाबांदी के बीच चाय पीने और बाजार देखने के लिहाज से हम बाहर निकले। सूरज अब तक डूब गया था और हल्के अंधेरे में जलते बल्बों मंे पंचमढ़ी बाजार बहुत संुदर लग रहा था। पंचमढ़ी में तमाम जिप्सी फोर बाई फोर आवाजाही कर रही थीं।  पता चला कि पंचमढ़ी दर्शन के लिए एकमात्र यही साधन हैं। यहां की ऊँची-नीची, ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों के लिए केवल यही उपयुक्त हैं। छह-सात सवारियां बैठ जाती हैं और पूरे एक दिन, एक रूट का खर्चा ढाई हजार रुपये है। इसके अतिरिक्त वन विभाग का एंट्री पास एक हजार रुपये का अलग। अर्थात् एक दिन का भ्रमण साढे़ तीन हजार में। हम तो छह मित्र थे, इसलिए वजन ज्यादा नहीं पड़ने वाला किंतु जो दंपती या एक परिवार के तीन चार सदस्य थे, उनके माथे पर महंगाई की मार साफ दिख रही थी। वन विभाग का प्रवेश शुल्क तो हमेशा ही एक हजार रहता है, किंतु टैक्सी वालों ने भी शुभ मुहूर्त देखते हुए किराया एक हजार बढ़ा दिया था, अन्यथा सामान्य सीजन में डेढ़ हजार ही होता हैै। यह तय हुआ कि होटल वाले से बात करके कल सुबह ही तय किया जाएगा।
बी  फॉल  का  एक दृश्य        छाया : हरिशंकर राढ़ी 

अगली सुबह पंचमढ़ी को इंद्रदेव ने पूरी तरह अपने कब्जे में ले लिया था। बारिश को जैसे आज ही यहां रहना था। वैसे, पंचमढ़ी इंद्र के आगोश में बहुत ही मनभावन लग रही थी, लगातार भीगती और नहाती हुई। लगभग दस बज गए तो निर्णय हुआ कि अब टैक्सी बुला ली जाए। बारिश तो पूरी तरह रुकेगी नहीं और तमाम सैलानी जिप्सियों में भरे चले जा रहे थे। हाँ, एक व्यवस्था अवश्य थी। पाॅलीथिन के कामचलाऊ ओवरकोट खरीदो और निकल लो। पूरी बाजू से आधी बाजू तक के टोपी सहित। सो, हमने भी जिप्सी में घुसते ही ड्राइवर साहब से निवेदन कर दिया कि किसी दूकान पर रोककर हमें भी पॅालीकोट खरिदवा दें। संयोग ऐसा था कि जिस जगह उसने टैक्सी रोकी, वहां की नजदीकी दूकान पर ओवरकोट अच्छा नहीं मिला। बारिश जारी थी, हममें से एक ही सज्जन दूकान पर गए थे और उन्हें जो ही मिला उठा लाए। चलिए काम तो हो गया। नुक्स कौन निकाले, हाँ वह बारिश को रोकने में ठीक से कामयाब नहीं हुआ।

पचमढ़ी के अधिकांश दर्शनीय स्थल संरक्षित वन क्षेत्र में पड़ते हैं और वन विभाग प्रवेश हेतु एक हजार रुपये शुल्क के रूप वसूलता है। यह शुल्क अदा कर हम अपने पहले गंतव्य ‘बी’ फाॅल की तरफ चल दिए। कुल ही दूर सफर करने के बाद जो पहाड़ी संकरे, अधकच्चे और चढ़ाई वाले रास्ते मिलने शुरू हुए कि रोमांच हो आया। अभी तो हम ढलान पर थे और ढलान देखी नहीं जा रही थी। कहीं-कहीं तो इतनी खड़ी ढलान की लगता हमारी जिप्सी सीधे नीचे ही जाएगी और स्वाभाविक है कि वापसी वालों के लिए उतनी ही खड़ी चढ़ाई। अब जाकर चारो पहियों में गियर होने का असर और पचमढ़ी में केवल जिप्सी का चलन होने का कारण समझ में आने लगा। इतनी ही क्यों, वहां के ड्राइवरों की हिम्मत और कुशलता की प्रशंसा न करना भी उनके साथ अन्याय ही होगा।

बी  फॉल  के सामने  हरिशंकर राढ़ी 

‘बी’ फॅाल: पचमढ़ी के संुदर और दर्शनीय स्थलों में ‘बी’ फाॅल अपनी ऊँचाई, तीव्र प्रवाह और ध्वनि के लिए प्रसिद्ध है। हमारी टैैक्सी इस फाॅल से कुछ दूर ही रुक गई क्योंकि इसके आगे वाहन योग्य रास्ता नहीं था। हम लोग लगभग तीन-चार सौ मीटर पैदल चलकर जब एक छोटे प्रपात पर पहुंचे तो लगा कि सारा श्रम बेकार गया। बारिश हो रही थी और पर्यटक आ-जा रहे थे। दिशा से हमें हरहराहट का तीव्र वेग सुनाई दे रहा था और कुछ यात्री उधर ही चले जा रहे थे। तो अभी कुछ बाकी है। और जब उस तरफ कदम बढ़े तो प्रकृति के अनूठे रूप के साक्षात्कार का आभास होने लगा। आगे पतली पगडंडियों और सीढ़ियों से लगातार नीचे उतरते हुए एक दिव्य, मनोहारी झरने का संगीत, नृत्य और दृश्य हमें सम्मोहित करने लगा। यह झरना ही ‘बी’ फाॅल के नाम से जाना जाता है। दरअसल जो छोटा झरना पहले मिला था वह ‘ए’ फाॅल और ये दूसरा विशाल वाला ‘बी’ फाॅल है। मौसम बारिश का था और पानी की प्रचुरता के कारण यह अपनी पूरी जवानी पर था। सतपुड़ा की पहाड़ियां हिमालय की भांति बर्फीली नहीं हैं और ये झरने साल के अन्य मौसमों में गरीब हो जाते हैं और इनका सौंदर्य चुक जाता है। हम सौभाग्यशाली थे कि मानसून काल में गए थे और वह भी उस दिन बारिश भी हो रही थी। वस्तुतः यह झरना पचमढ़ी की शान है।

रजत और अप्सरा प्रपात:  पचमढ़ी के प्रपात मार्ग कितने खतरनाक हैं, इसका पता हमें ‘बी’ फाॅल से वापस आते और रजत फाॅल जाते समय लगा। एकाध जगह तो इतनी तीव्र चढ़ाई, अंधे मोड़ और कच्चे रास्ते पड़े और ऊपर से सामने से आती दूसरी जिप्सी कि सांसें हलक में अटक जाएं। यदि रास्ते पक्के हों तो कुछ गनीमत भी। हाँ, इसमें संदेह नहीं कि आनंद भी कम नहीं आ रहा था। रजत और अप्सरा प्रपात पचमढ़ी के दूरस्थ दर्शनीय स्थानों में हैं और घने जंगल में स्थित हैं। गाड़ियां एक निश्चित स्थान तक ही जा पाती हैं और आगे लगभग दो किलोमीटर पैदल ही जाना होता है। कुछ दूर चलने के बाद पगडंडियां शुरू हो जाती हैं। हमारा दल कुल छह लोगों का था, सो गप्पें लड़ाते और टीका-टिप्पणी करते कब पहुंच गए, पता ही नहीं चला। इन दोनों झरनों की ओर जाने वाले सैलानियों की संख्या कम नहीं थी। युवक-युवतियां, बच्चे और उम्रदराज, हर तरह के लोग कुदरत के रूप को निहारने चले जा रहे थे।
सिल्वर फॉल की ओर             छाया : हरिशंकर राढ़ी 
रजत प्रपात की तरफ जाने वाले दर्शकों की संख्या कम ही होती है। कारण यह है कि यह प्रपात बहुत बड़ा नहीं है और अपेक्षाकृत दुर्गम है। घाटी के दूसरी ओर गिरता यह झरना दूर से चांदी की धारा जैसा लगता है, अतः इसका नाम रजत प्रपात (सिल्वर फाॅल) है। अप्सरा प्रपात कुछ बड़ा और चैड़ी धार वाला है जिसमें कुछ सैलानी नहाने का आनंद भी लेते हैं। इसके लिए भी धरातल से काफी नीचे जाना पड़ता है। जब हम वहां पहुंचे तब भी कुछ युवक और युवतियाँ झरने के नीचे नहाने का सुख लूट रहे थे और युवतियों का जलविहार देखकर एक बार वाकई लगा कि इसका नाम अप्सरा प्रपात ही होना चाहिए।

पांडव गुफा  का  एक दृश्य                   छाया : हरिशंकर राढ़ी 
पांडव गुुफाएँ: पचमढ़ी नगर से कुछ ही दूरी पर पांडव गुफाएं हैं। ये गुफाएं एक ऊँची सी पहाड़ी को काट कर  बनाई गई हैं। कहा जाता है कि पांडव अपने वनवास के दिनों में यहीं रहा करते थे और ये गुफाएं उन्होंने ही बनाई है। हालांकि एक सामान्य समझ केे व्यक्ति के दृश्टिकोण से यह बात सही नहीं लगती। कारण यह कि ये गुफाएं न तो इतनी पुरानी लगती हैं और न प्राकृतिक रूप से बनी हुई। हाँ, यह मानव निर्मित जरूर लगती हैं और आस पास का वातावरण देखकर भी नहीं लगता कि ये गुफाएं पांडवनिर्मित हैं। ये सामान्यतः किसी भी सामान्य व्यक्ति के रहने लायक हैं और कुछ हद तक कमरों के आकार की हैं। ऊपर तक पतली सीढ़ियां जाती हैं। पांडव गुफाएं संख्या में पांच हैं जिनके आधार पर ही इस स्थान का नाम पंचमढ़ी या पचमढ़ी रखा गया। हो सकता है कि पांडव घूमते-घामते कुछ दिन के लिए यहां प्रवास पर आए हों। यहां पर गुफा संख्या तीन पर एक लेख उत्कीर्ण है जिससे पता चलता है ये गुफा किसी भगवक नामक भिक्षु ने बनाई थी जो संभवतः गुप्तकाल में यहां आया था। हाँ, यहां थोड़ा बहुत समय आराम से बिताया जा सकता है। गुफा की ऊँचाई से पचमढ़ी का दृश्य सुंदर लगता है।

जटाशंकर गुफा के सामने   हरिशंकर राढ़ी 
जटाशंकर गुफा: यह पचमढ़ी की सर्वोत्तम गुफा और बी फाॅल समान नयनाभिराम स्थल है। पचमढ़ी बस स्टैंड और शासकीय महाविद्यालय से लगभग दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह धार्मिक और प्राकृतिक सौंदर्य का स्थल पचमढ़ी यात्रा को सार्थक कर देता है। ज्ञातव्य है कि यह जिप्सी की दूसरी दृश्य सूची में आता है और पहले दिन की ढाई हजार की बुकिंग से बाहर है। यदि यहां जाना है तो इसके साथ के अन्य गंतव्य जोड़कर फिर एक दिन का टैक्सी किराया खर्च करना होगा। समस्या यह है कि यहां सामान्य आॅटो और नगर सेवा की टैक्सियां नहीं चलतीं कि आप अपनी इच्छानुसार जहां चाहंे जाएं और जहां चाहें न जाएं। यहां तो आपको पैकेज ही लेना पड़ेगा, हाँ आप कोई बिंदु चाहें तो छोड़ने के लिए स्वतंत्र हैं।

जटाशंकर गुफा का आंतरिक दृश्य             छाया:  हरिशंकर राढ़ी 
हमारे साथ ऐसी कोई समस्या नहीं थी। देश के अधिकांश पर्यटन और धार्मिक स्थलों को घूमने से इतना तो अनुभव हो ही चुका है कि आधे से अधिक दर्शनीय बिंदु केवल कहने और गिनने के लिए होते हैं। सो हमने स्थानीय लोगों से पहले ही पता कर लिया था और छहो जनें जटाशंकर के लिए पैदल ही अगली सुबह निकल पड़े। वैसे भी हमारे पास समय कम था और हमें भोपाल तथा भीमबेटका देखने केे लिए आज ही दोपहर से निकलना था। होटल का किराया यूं भी यहां पर्यटकों को ठहरने नहीं दे रहा था।

जटाशंकर गुफा के रास्ते में 
मौसम बहुत ही सुहावना था। आसमान में बादल छाए हुए थे और तापमान सुखकर था। हम सभी बातें करते, हंसते और सुंदर दृश्यों के साथ फोटोग्राफी करते जटाशंकर पहंुच ही गए। यहां एक बहुत ऊँचे पहाड़ के नीचे एक गुफा और शिव मंदिर है। कहा जाता है कि जब भगवान शिव ने भस्मासुर का हाथ रखते ही भस्म हो जाने की शक्ति प्रदान की तो वह राक्षस वर की परीक्षा हेतु शिव के पीछे ही पड़ गया। भगवान शिव अपनी जान बचाकर भागे और यहीं गुफा मंे छिप गए। उन्हांेने अपनी पहचान छिपाने के लिए जटा यहीं उतार दी और इस स्थल का नाम पड़ गया जटाशंकर। यहां पहाड़ी के नीचे एक गुफानुमा मंदिर है जिसमें ठीक से खड़ा हो पाना संभव नहीं होता। हर तरफ ऊँची खड़ी पहाड़ियां हैं। कहीं कहीं झरने गिरते दिख जाते हैं और पूरा वातावरण मनोरम हो जाता है। गुफा की ओर जाते समय ही संकट मोचन हनुमान मंदिर है। सड़क के किनारे चाय और शीतल पेय की दूकाने मिल जाती हैं। प्रसाद और धार्मिक पुस्तकें इत्यादि तो मिलना स्वाभाविक ही है।

रजत प्रपात 
यहां हमने काफी समय बिताकर प्रकृति का आनंद लिया और भोपाल के लिए दोपहर दो बजे वाली बस पकड़ने के इरादे से वापस हो लिए। पचमढ़ी में दो रात्रि का निवास एक सुखद एहसास दे गया। हालांकि हम यहां के दर्शनीय स्थलों से इतने प्रभावित नहीं हुए, किंतु यहां की शांति, प्रकृति और पर्यटकीय विविधता देखकर बहुत अच्छा लगा था।

आवश्यक जानकारियाँ: पचमढ़ी का निकटतम रेलवे स्टेशन पिपरिया है जो मुंबई जबलपुर रेलमार्ग पर पड़ता है। जबलपुर की ओर जाने वाली लगभग सभी गाड़ियां पिपरिया में ठहरती हैं। यहां से बस द्वारा या किराए की टैक्सी से पचमढ़ी आराम से पहंुचा जा सकता है। पचमढ़ी मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले मंे पड़ता है। पूरा पचमढ़ी कैंट क्षेत्र है और सेना की प्रचुरता है। एक प्रकार से यहां सेना का ही कब्जा है और प्रशासन भी उसी प्रकार है। भोपाल और जबल पुर से सीधी बसें मिल जाती हैं। पिपरिया से पचमढ़ी लगभग 60 किमी तथा भोपाल से लगभग 200 किमी है। पचमढ़ी में लगभग हर प्रकार के होटल उपलब्ध हैं और भोजनालय भी बस स्टैंड के पास बहुतायत में हैं। वैसे जलाराम गुजराती भोजनालय शुद्ध शाकाहारी भोजन और अपनी सफाई के लिए प्रसिद्ध है।

















Saturday, 13 January 2018

पीठ, बेंच, डेस्क और चेयर

इष्ट देव सांकृत्यायन 

-नारायण नारायण!
-कहिए देवर्षि, क्या हाल है मृत्युलोक का?
-हाल तो ठीक नहीं है प्रभु! माँ भारती तो आक्रांतप्राय हैं. वहाँ तो लोकतंत्र को लेकर चतुर्दिक शोर मचा हुआ है.
-शोर मचा हुआ है? कैसा शोर मचा है?
-भारत में लोकतंत्र के चारों खंबे चीख-चीख कर कह रहे हैं कि अब मेरा तारणहार ख़तरे में है.
-चारों खंबे? उनका तारणहार? कौन है इन खंबों का तारणहार?
-हे प्रभु, ये उसे ही अपना तारणहार मानते हैं, जिसने इन्हें नौकरी पर रखा. यानी लोकतंत्र.
-ओह! तो लोकतंत्र वहाँ ख़तरे में है?
-हाँजी प्रभू! लोकतंत्र वहाँ ख़तरे में है. भयंकर ख़तरे में.
-अच्छा, तो अब इसका क्या निदान हो सकता है देवर्षि? आप ही कुछ सुझाएँ!
-क्या सुझाएँ प्रभू! इस पर शोध के लिए क़ायदे से तो हमें पीठ गठित करनी चाहिए. लेकिन पीठ तो आजकल बार-बार बेंच की ओर भाग रही है.
-तो एक फुल बेंच ही गठित कर दीजिए.
-कैसे करें प्रभु! रोज़-रोज़ मीडिया ट्रायल-मीडिया ट्रायल रटने वाले बेंच तो कल डेस्क के पास पहुँच गई.
-तो डेस्क ही के पास चले जाइए.
-क्या करेंगे डेस्क के पास जाकर प्रभु! डेस्क के पायों को बेंच पहले ही उनकी औकात बता चुकी है. ख़ुद उसकी ही अवमानना करने वाले डेस्क के महाप्रभुओं को बेंच ने अवमाननाकार तो माना, पर उनके द्वारा की गई अवमानना को 'नॉट विलफुल' करार दे चुकी है.
-अच्छा तो ऐसा करिए कि चेयर के पास चले जाइए.
-नारायण नारायण नारायण... आप भी क्या कहते हैं प्रभु!
-क्यों? क्या हुआ?
-चेयर वाले तो सब पहले ही मिले हुए हैं जी! चेयर वाले तो आजकल चेयर वालों की भी नहीं सुनते प्रभु! हमारी वहाँ कौन सुनेगा प्रभु!
-क्यों? क्या चेयर वालों ने आपकी भी सुननी बंद कर दी है?
-नारायण नारायण नारायण... आप सुनने की बात करते हैं प्रभु! सुनने का तो वहाँ यज्ञ चल रहा है, चेयर से लेकर बेंच और डेस्क तक. मृत्युलोक की भारतभूमि पर आप जहाँ जाएँ वहीं चारों तरफ़ सुनने का अश्वमेध चल रहा है. हालत यह है कि सभी सुनने की गलाकाट प्रतिस्पर्धा में जुटे हुए हैं, अहमअहमिका वृत्ति से. सुनने में सब एक दूसरे से आगे निकल जाना चाहते हैं.
-कुछ समझ नहीं आया देवर्षि! सब सुनने की प्रतिस्पर्धा में भी लगे हुए हैं और कोई सुन भी नहीं रहा... अर्थात?
-अर्थात यह प्रभू कि जहाँ-जहाँ सुनने का महायज्ञ चल रहा है, वहाँ-वहाँ यज्ञक्षेत्र में हर प्रार्थी के स्वागत के लिए नगाड़े रखे हुए हैं. ये नगाड़े उसके आगे-पीछे, ऊपर-नीचे, दाएँ-बाएँ हर तरफ़ रखे हुए हैं. नगाड़ों से बनाए उस घेरे में जैसे ही प्रार्थी पहुँचता है, परम कर्तव्यपरायण नगाड़े स्वयमेव सक्रिय हो जाते हैं और तब तक पूरी तत्परता से सक्रिय ही रहते हैं जब तक कि प्रार्थी अपनी पूरी प्रार्थना न सुना ले. और जैसे ही प्रार्थी की प्रार्थना पूरी होती है, नगाड़े तो बंद हो जाते हैं लेकिन चेयर से लेकर बेंच और
डेस्क हर तरफ़ से आनंद का अट्टहास होने लगता है. इसके साथ ही प्रार्थी पर आकाश से ऐतिहासिक महत्त्व वाली पुरावस्तुरूपी पुष्पों की दारुण वर्षा होने लगती है और प्रतापी प्रार्थी उनके ढेर में ही दब जाता है.
-ssssssssssssह! फिर तो आप अतीत के गौरव में ही झाँकें देवर्षि. कदाचित वहाँ कोई हल मिले.
-झाँका प्रभु!
-कुछ दिखा क्या देवर्षि?
-दिखा प्रभू!
-क्या दिखा देवर्षि?
-एक कालखंड दिखा प्रभु!
-कब से कब तक का कालखंड है वह देवर्षि?
-25 जून 1975 से 2 मार्च 1977 का कालखंड है वह प्रभु!
-ना, पिछली शताब्दी के काल की गति को नई शताब्दी में लाना मुझसे न हो सकेगा देवर्षि. कुछ और करें.
-अब क्या करें प्रभु?
-अब ऐसा करें कि वर्तमान में ही देखें.
-कैसे देखें प्रभु?
-ऐसा है कि इतिहास के बाद भूगोल देखने की परंपरा है देवर्षि. अतएव आप भारतभूमि के आस-पड़ोस में देखें.
-हाँ, ठीक है प्रभु!
देवर्षि ने धीरे-धीरे आँखें बंद कीं. आधे घंटे बाद धीरे-धीरे आँखें खोलनी शुरू कीं. खुलते ही उन्होंने पुनः टेर लगाई,
-नारायण नारायण
-कहिए देवर्षि. क्या समाचार है.
-बहुत अच्छा समाचार है प्रभु!
-हूँ... तो बताइए. हम भी जानें.
-प्रभू भारतभूमि के बगल में ही पाकिस्तान है. वहाँ फुलटॉस लोकतंत्र है. दूसरी तरफ़ चीन है. वहाँ तो और भी फुलटॉस लोकतंत्र है. वहाँ तो 1989 में लोकतंत्र का एक बहुत बड़ा महोत्सव भे हुआ था, जिसे इतिहास के पन्नों में जून फोर्थ इंसिडेंट के नाम से स्वर्णाक्षरों में दर्ज है प्रभू!
-हूँ... बात तो ठीक है, लेकिन इतने निकट से .. आइ मीन इमिडिएट पड़ोसी से नकल नहीं करनी चाहिए. कॉपी मिलने के चांसेज़ बढ़ जाते हैं और एग़्ज़ामिनर विदहेल्ड कर सकता है. कोई और उदाहरण दें देवर्षि.
-प्रभू ऐसे तो भारतभूमि में सिर्फ़ यूरोप और अमेरिका ही ऐसी जगह है जहाँ की नकल को नकल नहीं माना जाता और अगर कभी पता भी चल जाए कि यह तो नकल है तो उसे स्वयमेव महाअकल सिद्ध मान लिया जाता है. लेकिन बीते दिनों रूस और चीन की नकल की वहाँ बड़ी उदात्त परंपरा स्थापित हुई थी. ख़ैर, अब ये बीते दिनों की बात हो गई. इधर नया ट्रेंड वहाँ थोड़े दूर के पड़ोसी नॉर्थ कोरिया के नकल की है. अब तो पोस्टर पर भी लेनिन-मार्क्स की जगह उनके महान राष्ट्रनायक महामहिम जननेता श्री किम जोंग उन दिखाई देने लगे हैं. आजकल उनके महान देश में जनता बहुत सुखी-संपन्न है और चतुर्दिक लोकतंत्र का रंग-बिरंगा उत्सव चल रहा है. सड़कों पर दौड़ने, छतों पर सुखाए जाने, खेतों में उगने, घास के मैदानों में चरे जाने और तोपों में बतौर बारूस भरे जाने से लेकर गाँवों-शहरों की नालियों एवं सीवर तक में लोकतंत्र ही बह रहा है.
-हूँ... आप ठीक कहते हैं. वैसे ये नॉर्थ कोरिया है कहाँ देवर्षि?
-नारायण नारायण... क्यों मज़ाक करते हैं प्रभू? अरे ये उसी साउथ कोरिया का एकदम से इमिडिएट नेबर है प्रभू जिससे आपकी रिश्तेदारी रही है.
-मेरी रिश्तेदारी?
-हांजी-हांजी प्रभू! भूल गए आप अपना रामावतार? आपके रामावतार के महान कुल की रिश्तेदारी प्रभू!
-ओह! आइ नो... आपने ठीक कहा. ठीक है तो ऐसा करिए कि मृत्युलोक की भारतभूमि के निवासियों से कहिए कि यथाशीघ्र वे लोकतंत्र का नॉर्थ कोरिया मॉडल ही अपना लें. वहाँ के लिए केवल यही श्रेयस्कर रहेगा.




Wednesday, 5 July 2017

Azamgarh : History, Culture and People

आजमगढ़ : इतिहास और संस्कृति 

                         - हरिशंकर राढ़ी 

आजमगढ़ रेलवे स्टेशन    फोटो : हरिशंकर राढ़ी 
रामायणकालीन महामुनि अत्रि और सतीत्व की प्रतीक उनकी पत्नी अनुसूया के तीनों पुत्रों महर्षि दुर्वासा, दत्तात्रेय और महर्षि चन्द्र की कर्मभूमि का गौरव प्राप्त करने वाला क्षेत्र आजमगढ़ आज अपनी सांस्कृतिक विरासत और आधुनिकता के बीच संघर्ष करता दिख रहा है। आदिकवि महर्षि वाल्मीकि के तप से पावन तमसा के प्रवाह से पवित्र आजमगढ़ न जाने कितने पौराणिक, मिथकीय, प्रागैतिहासिक और ऐतिहासिक तथ्यों और सौन्दर्य को छिपाए अपने अतीत का अवलोकन करता प्रतीत हो रहा है। आजमगढ़ को अपनी आज की स्थिति पर गहरा क्षोभ और दुख जरूर हो रहा होगा कि जिस गरिमा और सौष्ठव से उसकी पहचान थी, वह अतीत में कहीं खो गयी है और चंद धार्मिक उन्मादी और बर्बर उसकी पहचान बनते जा रहे हैं। आजमगढ़ ने तो कभी सोचा भी न होगा कि उसे महर्षि दुर्वासा, दत्तात्रेय, वाल्मीकि, महापंडित राहुल    सांकृत्यायन, अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, शिक्षाविद अल्लामा शिबली नोमानी, कैफी आजमी और श्यामनारायण पांडेय के बजाय बटला हाउस, आतंकवाद, जातिवादी राजनीति और अपराध से जाना जाएगा।

इतिहास- 

पौराणिक आख्यानों और रामायण काल की भौगोलिक स्थिति का आकलन करें तो यह कोशल राज्य का एक हिस्सा था। ऋषि विश्वामित्र राम-लक्ष्मण को सरयू (घाघरा) के किनाने-किनारे लेकर बलिया होते हुए जनकपुर सीता स्वयंवर में ले गए थे। जनश्रुति के अनुसार वे एक रात्रि सरयूतट पर दोहरीघाट में विश्राम किए थे, इसीलिए इसका नाम दोहरीघाट पड़ा। महराजगंज स्थित भैरव बाबा का स्थान एक विचित्र बिंदु पर पड़ता है और यह तत्कालीन संस्कृति के एक केंद्र  के रूप में था। विचित्रता यह है कि भैरव जी से पश्चिम में अयोध्या, उत्तर में गोरखनाथ की भूमि गोरखपुर और दक्षिण में बाबा विश्वनाथ की नगरी और भारत की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी बराबर दूरी पर हैं। यहां से ये तीनों स्थान लगभग चालीस कोस (120 किमी) की दूरी पर हैं। यह अपनी संस्कृति, शौर्य और आस्था के लिए प्रसिद्ध था और जनश्रुति के अनुसार यहां पर राजा दक्ष ने यज्ञ किया था।
आजमगढ़ की सरकारी वेबसाइट और कुछ अन्य स्रोतों की मानें तो रामकाल में आजमगढ़ में राजभर या भर समुदाय का वर्चस्व था और उसी की सत्ता थी। चूंकि इस क्षेत्र में बाहरी शक्तियों के आक्रमण का भय कम था, इसलिए यहां किलों तथा अन्य राजकीय महलों का कोई अवशेष नहीं मिलता। यदि आजमगढ़ में किलों की बात की जाए तो एक किला घोसी में है जो राजा घोष ने बनवाया था। किंतु, इस पर भी मतभेद है। कुछ लोगों का कहना है कि इसे असुरों ने बनवाया था।

महराजगंज, आजमगढ़ में  (भैरोजी मंदिर )  
फोटो : हरिशंकर राढ़ी
आजमगढ़ का प्राचीन इतिहास अन्य भारतीय स्थानों की भांति अप्रमाणित ही है क्योंकि भारत में कभी इतिहास लिखने की परंपरा ही नहीं रही। देश का इतिहास और इतिहास लेखन पहले अंगेरेजों ने सत्यानाश को समर्पित किया और बाद में प्रायोजित तौर पर लिखने वाले ‘महान वामपंथी इतिहासकारों’ ने। भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने भी कुछ पाने के लिए कोई खास जहमत नहीं उठाई और यदि कहीं उठाई और प्रमाण भी दिया तो सरकारों और ‘बुद्धिजीवियों’ ने मानने से साफ इन्कार कर दिया। विश्वास न हो तो अयोध्या प्रकारण देख सकते हैं। आजमगढ़ में ऐसे अनेक स्थल हैं जिनकी खुदाई की गई होती तो अनेक रहस्यों से पर्दा उठता। भैरोजी में जहां मिडिल स्कूल  यदि वहां के ऊँचे टीले की खुदाई होती तो कुछ रहस्योद्घाटन हो सकता था। किसी समय यहां कूपर साहब का बंगला था और उससे पहले यहां शुजाउद्दौला के समय हिंदुओं और मुसलमानों में संघर्ष हुआ था।
1192 के तराइन के युद्ध में पृथ्वीराज चैहान मुहम्मद गोरी के हाथों पराजित हुआ तथा उसे बंदी बनाकर गजनी ले जाया गया और वहीं उसे मार डाला गया। 1193 में जयचंद भी मारा गया और वाराणसी सहित आजमगढ़ (तब आजमगढ़ वाराणसी का ही एक भाग था और आजमगढ़ नामकरण नहीं हुआ था) गोरी के नुमाइंदों के हाथ में आ गया।

आजमगढ की स्थापना और नामकरण

यह एक निर्विवाद तथ्य माना जाता है कि आजमगढ़ की स्थापना आजमशाह ने की थी और उसी के नाम पर इस शहर का नाम आजमगढ़ रखा गया। जनश्रुतियों, विकीपीडिया और आजमगढ़ गजेटियर (Azamgarh Gazetteer, Vol XXXIII, of the District Gazetteer of the United Province of Agra and Oudh, Edited and Compiled by DRAKE –BROCKMAN – ICS. Published in 1911) के अनुसार आजमगढ़ की स्थापना ऐलवल और फुलवरिया गांवों के ध्वंशावशेषों पर की थी। किसी समय मेहनगर के गौतम राजपूत शासक विक्रमाजीत बहुत प्रभावशाली थे किंतु कालांतर में टैक्स इत्यादि की अदायगी न कर पाने के कारण उन्हें शुजाउद्दौला के दरबार में पेश होना पड़ा। उसके सामने दो स्थितियां थी - या तो अपने राज्य से हाथ धोएं या फिर इस्लाम स्वीकार करें। हालांकि इन शर्तों का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता, किंतु उस समय की मुगल प्रवृत्ति को देखते हुए इस पर सहज विश्वास हो उठता है। विक्रमाजीत ने अपनी सत्ता बचाने के लिए इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। उसने एक मुस्लिम युवती से शादी की जिससे दो पुत्र - आजमशाह और अजमत शाह पैदा हुए। आजमशाह ने आजमगढ़ की स्थापना की और अजमत शाह ने अजमतगढ़ बसाया जो जीयनपुर बाजार के पास सगड़ी तहसील में पड़ता है। आजमगढ़ की सरकारी वेबसाइट और आजमगढ़ गजेटियर के अनुसार आजमगढ़ की स्थापना सन् 1665 ई0 में हुई, हालांकि कुछ स्थानीय जानकारों का मानना है कि यह वाकया सन् 1770 के आस-पास का होगा क्योंकि शुजाउद्दौला का शासनकाल तभी माना जाता है। विकीपीडिया के मुताबिक विक्रमाजीत मुगलों के दिल्ली दरबार अपनी राज्य सीमा बढ़ाने की इच्छा लेकर गए थे। उन्हें वहां आजमगढ़ के इर्द-गिर्द 22 परगना दे दिए गए किंतु इसके बदले उन्हें इस्लाम कुबूल करना पड़ा।

आजमशाह की कन्नौज में 1675 ई0 में मृत्यु हो गई। अजमत शाह ने अजमतगढ़ में शासन करना शुरू तो किया किंतु वह कभी मजबूत शासक नहीं बन पाया। छबीले राम ने 1688 में अजमतगढ़ पर धावा बोल दिया और अजमत शाह जान बचाने के लिए गोरखपुर की ओर भागा। दोहरीघाट के निकट जब वह घाघरा पार कर रहा था तभी चिल्लूपार (बड़हलगंज) की ओर से उसे रोक लिया गया। अजमत शाह घाघरा मेें डूब गया या मार दिया गया। उसका पुत्र इकराम शासन व्यवस्था देखता था। उसके छोटे भाई  का नाम मोहब्बत था। अंततः इस परिवार से केवल मोहब्बत का पुत्र इरादत ही बचा जो सिमटी हुई जमींदारी संभालने लगा।

अंगरेजों के शासनकाल में 18 सितंबर, 1832 को आजमगढ़ आधिकारिक रूप से जिला बना और अलग से कलेक्टरेट बनाई गई। मि0 थामसन जनपद के पहले कलेक्टर बने जो आगे चलकर कंपनी के ले0 गवर्नर बने।


स्वाधीनता का प्रथम संग्राम और आजमगढ़

अंगरेजों ने आजमगढ़ के भौगोलिक, ऐतिहासिक महत्त्व और यहां के लोगों का जुझारूपन देखते हुए सदैव बड़ी गंभीरता से लिया। सन् 1857 के आंदोलन में आजमगढ़ में अंगरेजों की 17वीं बटालियन डेरा जमाए थी। आंदोलनकारियों से भयंकर युद्ध हुआ और एक बार अंगरेजों के पांव उखड़ने लग गए थे। फिर लखनऊ से 19वीं और 34वीं बटालियन की मदद मिली और वे आंदोलन को कुचलने में कामयाब रहे।

प्रथम स्वाधीनता संग्राम में लखनऊ एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा था। बेगम हजरत महल के संघर्ष के किस्से मशहूर हैं। एक बार लखनऊ जीत के बाद भी अंगेरजों के हाथ से निकल गया था और स्वाधीनता सेनानियों की विजय हो गई थी। किंतु उसके बाद अंगरेजों ने दूसरी टुकड़ियां और कप्तान भेजकर लखनऊ को जीत लिया। इस जीत का जश्न इंग्लैंण्ड में जोर-शोर मनाया गया और मरने वाले अंगरेज सिपाहियों को शहीद की संज्ञा दी गई। अंगरेज कवि अल्फ्रेड लार्ड टेन्नेशन की कविताओं के प्रशंसक भारत में भी बहुत से हैं। वह रानी विक्टोरिया का जमाना था और इंग्लैण्ड में उपनिवेश विस्तार की देशभक्ति चरम पर थी। विक्टोरिया काल में अंगरेजी साहित्य पूरी तरह राजभक्त हो चुका था और साहित्य में प्रेम, शृंगार और कोमल भावनाओं को निंदनीय दृष्टि से देखा गया। विक्टोरिया कालीन अंगरेजी साहित्य की प्रमुख विशेषता यह थी कि इंग्लैण्ड की शासक महिला होने के बावजूद महिलाओें को पथभ्रष्टिका के रूप में देखा गया और उन्हें विकास और विस्तार के मार्ग में बाधा माना गया। उनके यौन आकर्षण और प्रेम की निंदा की गई और शारीरिक संबंधों के लिए दंडित किया गया। राबर्ट ब्राउनिंग की कविता ‘माई लास्ट डचेस’ और ‘परफीरिया’ज लवर’ उनकी महिला विरोधी प्रतिनिधि कविताएं हैं। इस क्रम में लाॅर्ड टेन्नेशन का उल्लेख करना परमावश्यक है जिन्हें एक कवि के तौर पर बहुत सम्मान मिलता है। बहुत कम लोग जानते हैं कि टेन्नेशन ने ‘डिफेंस आॅफ लकनाॅऊ’ नाम की एक लंबी कविता लिखी है जिसमें 1857 के युद्ध में लखनऊ युद्ध गंवाने वाले अंगरेज सैनिकों को शहीद के तौर पर श्रद्धांजलि दी गई है और पुनः जीतने वालों की स्तुति की गई । इतना ही नहीं, भारतीय विद्रोहियों को अपशब्द भी कहा गया है। पढ़कर ऐसा लगता है कि लखनऊ टेन्नेशन की पुश्तैनी जायदाद रही हो और भारतीयों ने उस पर जबरन कब्जा कर लिया हो।

अठारहवीं सदी के प्रारंभ में आजमगढ़ जौनपुर और गाजीपुर की सरकारों के अधीन रहा। उस समय आजमगढ़ का राजा मोहब्बत शाह था। सन् 1857 की क्रांति में आजमगढ़ ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और वीर कुंवर सिंह के नेतृत्व में भयंकर संघर्ष हुआ। 3 अक्टूबर, 1929 को महात्मा गंाधी ने आजमगढ़ का दौरा किया और श्रीकृष्ण पाठशाला में एक सभा का आयोजन हुआ जिसमें लगभग 75000 लोगों ने हिस्सा लिया तथा 5000 रुपये गांधी जी को भेंट किया गया।

भारत छोड़ो आंदोलन में भी आजमगढ़ ने अपने हिस्से की क्रांति में कोई कसर नहीं छोड़ी। सरायमीर के निकट रेलवे लाइन उखाड़ दी गई, तरवां थाना फूंक दिया गया और महराजगंज थाने को भी लगभग कब्जे में ले लिया गया। अंततः आजादी का जश्न मनाने में भी आजमगढ़ पीछे नहीं रहा।

तमसा: 

आजमगढ़ को पवित्र तमसा तट पर स्थित सबसे बड़ा शहर होने का सौभाग्य प्राप्त है। तमसा आज भी बह रही है और आजमगढ़ का लगभग तीन ओर से परिवेष्टित किए हुए है, ठीक वैसे ही जैसे काशी को गंगा ने कर रखा है। लेकिन, भौतिकता और लालच के दौर में होने वाले विकास और असंवेदनशीलता से वह भी धीरे-धीरे अन्य नदियों की भांति काली और मैली हो रही है। तमसा छोटी भले हो, उसका सांस्कृतिक, पौराणिक और ऐतिहासिक महत्त्व कम नहीं है। इसी के पावन तट पर आदि कवि महर्षि वाल्मीकि का आश्रम था, जहां आदिकाव्य रामायण का सृजन हुआ। इसी आश्रम में सीता का वनवास कटा और लव-कुश का जन्म हुआ। यहीं महर्षि वाल्मीकि को प्रथम छंद ज्ञान हुआ और उनका विश्वविख्यात श्लोक ‘मा निषाद प्रतिष्ठाम...’ प्रकट हुआ। इसी के तट पर भगवान दत्तात्रेय का आश्रम भी है जहां तमसा अपनी छोटी बहन कुंवर नदी से संगम करती है तो दुर्वासा का आश्रम तमसा और मझुई के संगम पर है।

तमसा आज जैसी भी स्थिति में हो, रामायण काल में यह एक पवित्र और महत्त्वपूर्ण नदी थी। गोस्वामी तुलसीदास ने अयोध्या कांड में इसका कई बार उल्लेख किया है। राम वनगमन और भरत के मनाने जाने के क्रम में तुलसीदास जी ने इसके महत्त्व को रेखांकित किया है। राम को वन में छोड़कर वापस आए सुमंत्र महाराज दशरथ को राम के वनगमन का वृत्तांत सुनाते हुए कहते हैं -
प्रथम बासु तमसा भयउ, दूसर सुरसरि तीर।
न्हाइ रहे जलपान करि सिय समेत रघुबीर ।। रामचरित मानस, अयो0 150।।

जब भरत राम को मनाने चित्रकूट के लिए गए तो उनका प्रथम रात्रि विश्राम तमसा तट पर ही हुआ था। रामचरित मानस का प्रसंग देखिए-
तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू ।। अयोध्या0 187-8 ।।

भरत ने वापसी में चित्रकूट से अयोध्या की यात्रा कुल चार दिनों में की थी। उनकी दुखकातर मानसिकता को समझा जा सकता है। वापसी में पहला दिन तो बिना आहार के ही बीत गया था, ऐसी स्थिति में न गंगा ही अच्छी लगी होगी और न तमसा ही।
महर्षि वाल्मीकि के जीवन में तो तमसा बहुत गहराई तक समाई हुई थी। उन्होंने तमसा को और तमसा ने उन्हें गरिमा प्रदान की। ‘रामायण’ बालकांड के द्वितीय सर्ग में ही महर्षि वाल्मीकि तमसा को लेकर लिखते हैं-
स तु तीरं समासाद्य तमसाया मुनिस्तदा।
शिष्यमाह स्थितं पाश्र्वे दृष्ट्वा तीर्थकर्दमम् ।।4।।
अकर्दममिदं तीर्थं भरद्वाज निशामय।
रमणीयं प्रसन्नाम्बु सन्मनुष्यो यथा ।।5।।
न्यस्यतां कलशस्तात दीयतां वल्कलं मम।
इदमेवावगाहिष्ये तमसातीर्थमुत्तमम् ।।6।।

अर्थात् तमसा के तट पर पहुंचकर वहां के घाट को कीचड़ से रहित देखकर मुनि ने अपने पास खड़े हुए शिष्य से कहा - भरद्वाज देखो, यहां का घाट बहुत सुंदर है। इसमंे कीचड़ का नाम नहीं है। यहां का जल वैसा ही स्वच्छ है, जैसा सत्पुरुष का मन होता है। तात, यहीं कलश रख दो और मुझे मेरा वल्कल वस्त्र दो। मैं तमसा के इसी उत्तम तीर्थ में स्नान करूंगा।’
वनगमन के समय राम ने सीता और लक्ष्मण सहित तमसा तट पर रात्रि विश्राम किया था, जिसका उल्लेख रामचरित मानस में सुमंत्र के मुख से मिलता है। इसका वर्णन महर्षि वाल्मीकि ने भी किया है-
ततस्तु तमसातीरं रम्याश्रित्य राघवः ।
सीतामुद्वीक्ष्य सौमित्रिमिदं वचनमब्रवीत ।। रामायण, अयो0 सर्ग 46, श्लोक -1

उसी तमसा को हमारी विकसित सभ्यता और सुख-सुविधा मुंह चिढ़ा रही है। शायद ही उसे विश्वास होता हो कि कभी उसके तट पर भगवान श्रीराम को आश्रय मिला होगा और उन्होंने उसके सौन्दर्य और पवित्रता की भूरि-भूरि प्रशंसा की होगी। ऐसा भी एक दिन रहा होगा कि उसने न जाने कितने ऋषियों को अपने तट पर बसाया होगा और उनकी प्रशंसा पाई होगी। अब तो हमें भौतिक और अंधाधंुध विकास चाहिए।

तमसा, जिसे स्थानीय तौर पर प्रायः टौंस या टौंसिया के नाम से पुकारा जाता है, आजमगढ़ को पश्चिम, दक्षिण और पूरब से घेरे हुए है। पहले इस पर एक मात्र पुल था जो आजमगढ़ को जौनपुर-वाराणसी रोड से जोड़ता था। अंगरेजों का बनवाया हुआ। बाद में कलेक्टरी मैदान के पास एक और पुल बना जो अब अपर्याप्त सिद्ध होता है। आजकल अंगरेजों के बनाए पुल को तोड़कर नया पुल बनाया जा रहा है। सिधारी के पास का पुल पूरबी हिस्सों को जोड़ता है।
आजमगढ़ रेलवे स्टेशन    फोटो : हरिशंकर राढ़ी

रेल यातायात:  

रेल यातायात की दृष्टि से आजमगढ़ अब देश के प्रमुख हिस्सों से ठीक से जुड़ गया है। एक समय था कि यह जनपद रेलवे से लगभग वंचित था। सन 1997 में ब्राड गेज के चालू होने से पूर्व यहां के लोगों के लिए वाराणसी या शाहगंज ही आश्रय हुआ करता था। ऐसा नहीं था कि आजमगढ़ में रेल लाइन नहीं थी, थी किंतु मीटर गेज और प्रमुख मार्ग पर न होने से वह नहीं के बराबर ही थी। आज का आजमगढ़ रेलवे स्टेशन तब स्थानीय आजमगढ़ियों की बोली में पल्हनी स्टेशन के नाम से जाना जाता था और 75-80 की उम्र वाले आज भी उसे पल्हनी ही कहते हैं क्योंकि मुख्य शहर से लगभग तीन किमी की दूरी पर पल्हनी नामक गांव में यह बना था। आजमगढ़ गजेटियर के अनुसार आजमगढ़ 8 जून 1898 को तुर्तीपार मऊ रेलखंड से कनेक्ट हुआ था जो उस समय बंगाल और उत्तर पश्चिम रेल प्रखंड में पड़ता था। इसी तिथि पर मऊ- आजमगढ़ खंड को भी चालू किया गया जिस पर खुरहट, मोहम्दाबाद गोहना और जहानागंज रोड स्टेशन थे। 15 मार्च 1899 को इंदारा स्टेशन से बलिया लाइन को खोला गया और तुर्तीपार लाइन को बनारस तक विस्तारित किया गया। 14 फरवरी 1903 को मऊ-आजमगढ़ लाइन को शाहगंज से जोड़ दिया गया, अर्थात आजमगढ़ मुख्य रेलपथ से जुड़ गया और जौनपुर-वाराणसी पहुंचना आसान हो गया। 1904 में घोसी होते हुए दोहरीघाट के लिए रेलवे लाइन खोल दी गई और बाद में शाहगंज से गोशाईंगंज होते हुए फैजाबाद के लिए ट्रैक बिछाने का सर्वेक्षण किया गया।
आजमगढ़ रेलवे स्टेशन का एक दृश्य  
 फोटो : हरिशंकर राढ़ी
कालांतर में वाराणसी - शाहगंज - फैजाबाद लाइन ब्राडगेज बन गई और आजमगढ़ -शाहगंज लाइन मीटर गेज ही। परिणाम यह हुआ कि यह रेल सेक्शन लगभग अनुपयोगी और अन्य क्षेत्रों से कटा ही रह गया। सन 2000 के आसपास आजमगढ़- दिल्ली (1997 के आसपास ब्राडगेज बन जाने पर ) कैफियात एक्सप्रेस चलने के पूर्व मैं भी दिल्ली की ट्रेन पकड़ने या तो गोरखपुर या फैजाबाद जाया करता था।

रेलवे के सुविधा अच्छी न होने से आजमगढ़ का रोडवेज बसस्टेशन काफी विकसित हुआ और यह आज भी उत्तर प्रदेश के बड़े बस स्टेशनों में एक है। यहां से प्रदेश के लगभग हर जिले के लिए बसें हैं और गाजीपुर तथा बलिया डिपो की बसें भी इसकी संख्या और सुविधा में वृद्धि करती हैं।
आजमगढ़ रेलवे स्टेशन पर  लेखक  हरिशंकर राढ़ी







विकास के इस युग में भी आजमगढ़ एक अदद हवाई अड्डे के लिए तरस रहा है। लखनऊ से पूरब जाने पर अगला हवाई अड्डा गया और पटना ही है जो बिहार में लगभग 500 किमी की दूरी पर है। मजे की बात है कि आजमगढ़ फैजाबाद रोड पर कप्तानगंज के पास मंदुरी में हवाई अड्डा बनकर तैयार है और इसका ट्रायल भी हो चुका है। न जाने कौन सी समस्या है कि इसे चालू नहीं किया जा सका।  इसके चालू होते ही आजमगढ़ ही नहीं, बलिया, दक्षिणी गोरखपुर, अंबेडकरनगर देश की हरेक हिस्से से जुड़ जाएंगे। जब सन 2014 के चुनाव में यहां से सांसद के तौर पर श्री मुलायम सिंह यादव चुने गए थे और उन्हीं के पुत्र श्री अखिलेश यादव की प्रदेश में सरकार थी, तब लोगों की आशाएं आसमान चूमने लगी थीं। किंतु ढाक के वही तीन पात। मंदुरी हवाई अड्डा उस दिन की बाट देख रहा है जब उसके रनवे पर कोई ऐसा विमान उतरे जिसमें आजमगढ़ की मिट्टी का कोई नाॅन वीआईपी हो।

आजमगढ़ विकास की राह पर है। यहां के लोग सीधे-सरल जरूर हैं किंतु वे विरोध और परिवर्तन की राजनीति में गहरा विश्वास करते हैं। इधर जब से जाति और धर्म की राजनीति का बोलबाला हुआ है, आजमगढ़ उसमें बहुत आगे है। कभी वामपंथियों का गढ़ था, अब जातिवादियों का है। यहां से अनेक कद्दावर नेता निकले किंतु आजमगढ़वासियों को तकलीफ है कि उनमें से किसी ने जिले के विकास के लिए कुछ नहीं किया। पहले स्व0 चंद्रजीत यादव इंदिरा गंाधी की कैबिनेट में मंत्री रहे। उन्होंने कुछ निजी परिचय के लोगों की सुधि ली। जनता सरकार के समय स्व0 रामनरेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हुए। उन्होंने कुछ करने की सोची कि 19 माह में उनकी सरकार का पतन हो गया। बाद में बहुत दिनों तक वे राज्यपाल रहे किंतु आजमगढ़ की याद उन्हें नहीं आई। यह भी दुखद रहा कि आजमगढ़ की जनता ने प्रायः सत्ताविरोध में मतदान किया और उसका दंश झेलने को मिला। हाँ, घोसी के सांसद और इंदिरा गांधी के करीबी स्व0 कल्पनाथ राय ने अपने क्षेत्र में बहुत विकास किया और मऊ को अलग जिला बनवाने में उनका प्रयास स्मरणीय है।
आजमगढ़ की बोली भोजपुरी है। एक अलग सी भोजपुरी जो बनारस और आजमगढ़ के लिए ही बनी है। इसमें न तो बिहार, बलिया और गोरखपुर का दीर्घ विस्तार है और न उच्चारण में ‘ओ’ या बंगाली पुट। यह अवधी और भोजपुरी का एक सीधा मिश्रण है, सपाट है। न तो मिठास की अधिकता और न अवधी की रूक्षता। आजमगढ़ की भोजपुरी यानी बनारसी भाषा। भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में आजमगढ़ और बनारस ही ऐसे हैं जहां ‘है’ के लिए ‘हौ’ का प्रयोग होता है और ‘का हो गुरू, का हालि हौ?’ का एकात्म प्रयोग। अभी भी आजमगढ़ में दिखावा और प्रपंच का प्रकोप नहीं है। लोग राजनीति कैसी भी करें, जीवन बड़ी सादगी से जीते हैं।

Sunday, 4 June 2017

Vishunpur (Rarhi ka Pura ) Azamgarh

विशुनपुर (राढ़ी का पूरा), आजमगढ़  का 

                                          --हरिशंकर राढ़ी 

राढ़ियों का गांव विशुनपुर महराजगंज क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है और इसकी चर्चा पहले के लेखों में की जा चुकी है। दरअसल महराजगंज बाजार का अधिकांश हिस्सा विशुनपुर की जमीन में ही आता है और वहां इनका वर्चस्व सदैव से रहा है। महराजगंज का नया चौक पूर्णतया विशुनपुर की कृषिभूमि में बसा है और अब यह बाजार का सबसे मंहगा और रौनक वाला क्षेत्र है। महेशपुर की भांति विशुनपुर (राढ़ी के पूरा) की स्थापना का समय बताया नहीं जा सकता। आजमगढ़ गजेटियर में महराजगंज के साथ इसका जिक्र बिशनपुर के नाम से है। नाम में आंशिक परिवर्तन निश्चित रूप से अंगरेजों की टेढ़ी जबान के कारण होगा जिससे उन्होंने भारत के अधिकांश शहरों और गांवों की वर्तनी का सत्यानाश कर दिया।

विशुनपुर गांव बांगर क्षेत्र में होने के कारण अपेक्षाकृत समृद्ध था और बाजार के निकट होने से पहुंच में आसान भी। इस गांव के राढ़ी मुख्यतः तीन पूरवे में बसे हुए हैं। सबसे पश्चिम, अक्षयबट से सटा हुआ पोखरा वाला पूरा, फिर बीच का जो सबसे बड़ा है और कुछ घर महराजगंज-कप्तानगंज सड़क से पूरब की ओर। पूरा विशुनपुर महराजगंज टाउन एरिया में आता है अतः साफ-सफाई आदि का विकास हुआ है। गांव के वर्तमान से ज्यादा महत्त्वपूर्ण इसका इतिहास रहा है। एक जमाने में क्षेत्रीय स्तर पर इस गांव का कोई शानी नहीं था। ऐसे कई लोग हुए जो अपनी ताकत और बुद्धि से सम्मानित और विख्यात हुए। हाँ, यह कहा जा सकता था कि राज्य और राष्ट्र स्तर पर पहचान बनाने या बड़े सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने में किसी ने बहुत रुचि नहीं दिखाई। बहुत पहले का तो नहीं, किंतु पिछले 70-80 वर्षों का इतिहास कमोबेश बताया जा सकता है, हालांकि यह इतिहास अलिखित है। इसमें से कुछ तो मुझे पिताजी से ज्ञात हुआ था क्योंकि उनका विशुनपुर के राढ़ियों से बहुत अच्छे संबंध थे, आना जाना था और दूसरे वे किस्सागोई में बहुत माहिर थे। कुछ अंश मैंने महेशपुर के बुजुर्गों से सुना था और बहुत कुछ श्री जे0के0 मिश्र का बताया हुआ है। दरअसल, महराजगंज, विशुनपुर और महेशपुर के विषय में इतना लिखने के पीछे श्री मिश्र जी का आग्रह, उत्साहवर्धन, लगातार तकाजे और उनके द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी का बहुत बड़ा हाथ है। भैरोजी पर लिखने का विचार तो बहुत पुराना था किंतु पिछले साल भैरोजी पर लिखे और ब्लाॅग पर प्रकाशित लेख के बाद मैं इतनी कड़ियां शायद ही इतनी जल्दी लिख पाता। भैरोजी पर लिखे लेख पर पाठकों ने जो रुचि दिखाई, (ब्लाॅग की रीडरशिप काउंटिंग के आधार पर) उससे भी उत्साहवर्धन हुआ। लोग अपने क्षेत्र एवं अपनी श्रद्धा के प्रतीकों के विषय में जानना तो चाहते हैं, किंतु इस पर लेखन कम हो रहा है।
महराजगंज चौक पर लक्ष्मी कांत मिश्र की प्रतिमा 

वह समय था जब क्षेत्र में उच्च तो क्या, माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था नहीं थी। ले-देकर एक प्राइमरी विद्यालय और कूपर साहब के जाने के बाद भैरोजी में एक मिडिल स्कूल। हाँ, एक संस्कृत पाठशाला भी भैरोजी में थी जिससे आधुनिक और रोजगारपरक शिक्षा की आवश्यकता की पूर्ति नहंी हो सकती थी। मिडिल से ऊपर की शिक्षा में महराजगंज इंटर काॅलेज की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही।(मैं भी इस काॅलेज का छात्र रह चुका हूँ।) महराजगंज इंटर काॅलेज की स्थापना एक विद्यालय के रूप में सर्वप्रथम विशुनपुर के पोखरे के पास- महराजगंज बाजार के बजरंग चैक से देवतपुर जाने वाली सड़क पर- हुई थी। इसके संस्थापक सदस्यों में इस क्षेत्र के प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक कार्यकर्ता स्व0 श्री कृष्णमाधव लाल, अक्षयबट गांव के श्री बाबूराम सिंह और विशुनपुर पोखरा के स्व0 श्री कमलाकांत  मिश्र जी थे। एक शिक्षक के तौर पर मिडिल स्कूल भैरोजी के प्रधानाध्यापक श्री इदरीश मौलवी भी सहायता कर जाते थे। उल्लेखनीय है कि मौलवी इदरीश यहां एक शिक्षक के तौर पर बहुत सम्मानित व्यक्ति थे। कालांतर में यह विद्यालय अधिक जगह की तलाश में अपने वर्तमान स्थान पर स्थापित कर दिया जो गांव प्रतापपुर की जमीन में है। तब यहां जमीन की समुचित उपलब्धता थी। बाद में बगल में थाना स्थापित हो गया और सामने आम की विशाल बाग का उपयोग छात्रगण खेलकूद के लिए करने लगे। जब मैं महराजगंज इंटर काॅलेज का छात्र था (1980 के आसपास) तब इस बाग में प्राय स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम होते थे और नागपंचमी पर होने वाली कुश्ती भी यहीं आयोजित होने लगी। संभवतः यह 1935-36 की बात होगी।

महराजगंज इंटर काॅलेज के पहले प्रधानाचार्य स्व0 श्री सुदर्शन शुक्ल हुए। आज भी उनकी चर्चा एक योग्य, कर्मठ, सीधे-सरल किंतु सत्यनिष्ठ एवं न्यायनिष्ठ प्राचार्य के रूप में होती है। उनके समय तक इस इंटर काॅलेज की उच्च प्रतिष्ठा थी। हाँ, शुक्ल जी की कृपणता की चर्चा भी बहुत विस्तार से सुनी-सुनाई जाती है। वे काॅलेज में ही रहते थे। तत्कालीन अध्यापकों ने बताया कि वे चपरासी से एक पाव छोटे बताशे मंगाते थे और उसकी गिनती करते थे, क्योंकि वे प्रतिदिन सुबह एक बताशा खाकर पानी पीते थे। यदि किसी दिन बताशा साइज में बड़ा होेने कारण गिनती में एक भी कम होता तो उस चपरासी को दुबारा कन्हैया हलवाई की दुकान पर वापस भेजते और संख्या में पूरे बताशे मंगाते। बाद में स्व0 श्री बाबूराम सिंह प्रधानाचार्य हुए। कठोर तो वे भी बहुत थे, किंतु तब शिक्षा जगत में राजनीति घुस चुकी थी। शिक्षा और विद्यालय खोलना समाजसेवा न होकर निज सेवा होती जा रही थी। परिणाम यह हुआ कि प्रबंधन, प्राचार्य और वरिष्ठ अध्यापकों के झगड़े में शिक्षा पतन की ओर अग्रसर होती गई। आज तो शायद ही कोई इंटर काॅलेज होगा जो स्वस्थ हो, जहां नकल और राजनीति का बोलबाला न हो।

अगर पिछली सदी के मध्य दशक में विशुनपुर के प्रभावी और ताकतवर लोगों की बात की जाए तो कुछ नाम स्वतः ही उभरकर क्षेत्रीय लोगों के मस्तिष्क में आ जाते हैं। इनमें सर्वप्रमुख स्व0 श्री रामनारायण मिश्र, श्री विजय नारायण मिश्र और स्व0 श्री शिवपूजन मिश्र थे। इन लोगों की लंबी जमींदारी और रुतबा था तथा प्रभाव एवं स्वभाव में ये किसी ़क्षत्रिय से कम नहीं  थे। बाद में श्री रामनारायण राढ़ी के पुत्र स्व0 श्री त्रिवेणी मिश्र ने अपने पिता की विरासत को संभाला। वास्तविकता यह थी कि एक समय श्री त्रिवेणी मिश्र से आँख मिलाकर बात करने की हिम्मत रखने वाला या उनसे शत्रुता मोल लेने वाला क्षेत्र में कोई नहीं था। हाँ, राढ़ी बिरादरी के लोगों का वे बहुत सम्मान करते थे और भाईचारा रखते थे। श्री त्रिवेणी मिश्र और श्री शिवपूजन मिश्र जब हाथी पर बैठकर अपने क्षेत्र में घूमते तो इनका जलवा होता था। श्री त्रिवेणी मिश्र का निधन अस्सी के दशक में हुआ होगा और श्री शिवपूजन मिश्र दीर्घजीवी रहे। श्री शिवपूजन मिश्र तो अंततः आर्थिक पतन को प्राप्त हुए और क्षेत्र के लोग उनका उत्थान - पतन, संपन्नता - विपन्नता के उदाहरण में उनके नाम का प्रयोग करने लगे। एक समय स्व0 श्री कामेश्वर मिश्र ने भी अपना परचम लहराया। उनका लंबा कुर्ता उनकी पहचान गया और वे भाजपा के स्थानीय नेता के रूप में स्थापित हुए। मधुमेह और सड़क दुर्घटना ने उन्हें लील लिया। प्रभाव और रुतबे के क्रम में स्व0 श्री राजेश्वरी मिश्र भी खड़े दिखते हैं और उनके पुत्र स्व0 श्री शीतला मिश्र ने भी वह विरासत संभाली। समय के साथ परिवर्तन आया और अब जातीय प्रभाव और आर्थिक शक्ति के बजाय आपराधिक प्रवृत्ति के लोग हर जगह प्रभावशाली हो रहे हैं, भले ही उनकी अपनी कोई औकात न हो।

ब्राह्मणत्व, विद्वता, सामथ्र्य, शक्ति और सज्जनता का समन्वय एक साथ यदि राढ़ी के पूरा में देखना होता तो उस समय पोखरा वाले पुरवे की ओर रुख करना पड़ता था। मैं अपने लेख में आदरणीय श्री जाह्नवी कांत  मिश्र का कई बार उल्लेख कर चुका हूँ। आप इसी टोले के हैं। श्री मिश्र जी के पिता स्व0 श्री कमलाकांत मिश्र (1914-2003) उस समय एक अच्छे पढ़े-लिखे व्यक्ति थे जो अंगरेजी सरकार में रेलवे अधिकारी थे। तब रेलवे को ई आई आर (ईस्ट इंडिया रेलवे) के नाम से जाना जाता था। एक अधिकारी होने के कारण उन्होंने कई लोगों की नौकरियां लगवाई थीं। श्री जे0के0 मिश्र ने इंजीनियरिंग पास की और भारत सरकार की सेवा से सेवानिवृत्त होकर इस समय बैंगलुरु में जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
राढ़ी के पूरा  का पोखरा 

इसी पोखरा टोले के स्व0 श्री रामप्यारे मिश्र भी बहुत सम्मानित व्यक्ति रहे। मध्य शिक्षा प्राप्त श्री रामप्यारे मिश्र एक शिष्ट, योग्य, विनम्र किंतु निडर व्यक्ति थे। अदालती कार्यवाही, कानून और संगीत के वे अच्छे जानकार थे और हारमोनियम में निष्णात थे। उनके पास बैठने का सौभाग्य इस लेखक को भी बहुत मिला था क्योंकि पहले पिताजी से उनके संबंध बहुत अच्छे थे और बाद में मैं स्वयं बहुत निकट पहुंच  गया। उनकी संगीत की विरासत को उनके छोटे पुत्र श्री जगदीश मिश्र ने बखूबी संभाला। स्व0 श्री रामप्यारे मिश्र के बड़े पुत्र श्री त्रिलोकी नाथ मिश्र इंटर काॅलेज के प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हैं और अच्छे अध्येता और ज्ञाता हैं और आज भी उनके अंदर का विद्यार्थी जीवित है। भैरोजी के विषय में मुझे उनसे भी अच्छी जानकारी मिली थी।

विशुनपुर, महाराजगंज की बात की जाए तो आस-पास के कुछ महत्त्वपूर्ण गांवों को उपेक्षित नहीं किया जा सकता। महराजगंज का दूसरा निकटतम और सशक्त गांव अक्षयबट है जिससे स्थानीय अपभ्रंश में अखैबर कहा जाता है। प्रमुखतया यह क्षत्रियों का गांव है और गांव की प्रसिद्धि क्षत्रियोचित कारणों से ही है। किसी समय भैरोजी के मंदिर पर मुसलमानों का आक्रमण हुआ था और शायद वह फारूख शेख का समय था, तब अक्षयबट के क्षत्रियों ने हमले का जवाब बड़ी बहादुरी से दिया था। उस आक्रमण में फारूख शेख के सिपाहियों ने हिंदुओं का कत्लेआम शुरू किया था किंतु अक्षयबट के क्षत्रियों ने विशुनपुर के राढ़ियों के साथ मिलकर उनका सामना किया था, अगुवाई की थी और आक्रांताओं को मुंह की खानी पड़ी थी। अक्षयबट की बाग में अंगरेजों के खिलाफ सभाएं हुई थीं और विद्रोह का बिगुल बजा था।
श्री जे- के - मिश्र के माता-पिता (स्व० श्री कमला कांत मिश्र )

मिश्रपुर (चांदपुर) की चर्चा किए बिना इस क्षेत्र का इतिहास अधूरा ही रहेगा। किसी समय जब संस्कृत, वैदिक आचार और शुचिता का बोलबाला था तो मिश्रपुर इसका ध्वजारोही था। इसे छोटा काशी कहा जाता था, और यह प्रकरण 1950 के आस-पास तक का होगा। कई जिलों के पंडित, शास्त्रज्ञ और विद्वान यहां के पंडितों से शास्त्र समझने आते थे। शास्त्रार्थ में चुनौती देने का साहस शायद किसी में रहा हो। न जाने कितनी किंवदंतियां यहां के विषय में प्रचलित हैं। सुना तो यह भी जाता है कि लगभग 100 साल पहले संस्कृत यहां की बोलचाल की भाषा थी। यदि अपुष्ट प्रमाणों की बात की जाय तो कहा जाता है कि एक बार बनारस में यहां के पंडितों के ज्ञान की चर्चा चली तो कुछ बनारसी विद्वान मिश्रपुर के पंडितों की परीक्षा लेने पहुंच  आए। बरसात का मौसम था। मुख्यमार्ग से गांव के बीच में कोई बरसाती नाला था जिसमें पानी भरा था । एक बनारसी विद्वान ने पास में खड़ी एक महिला (जो संभवतः कहार जाति से थी) से पूछा - नाले में कितना पानी है? इसपर महिला ने कहा- भीतो मा भव, केवलं कटिमानं जलं वर्तते’’। संस्कृत में दिए गए उसके इस उत्तर को सुनकर बनारसी विद्वान वहीं से उल्टे पांव वापस लौट गए। इस गांव के दो शास्त्रज्ञ विभूतियों को देखने का अवसर इस लेखक को भी मिला है। स्व0 त्रिवेणी तिवारी तो एक मिथक थे ही, स्व0 श्री रामदरश मिश्र भी कम विद्वान नहीं थे। यह मेरा सौभाग्य है कि श्री रामदरश मिश्र जी का बहुत ही अधिक स्नेह मुझे प्राप्त हुआ था।

कुल मिलाकर यह क्षेत्र भारतीय संस्कृति का एक उन्नत उदाहरण रहा है। भौतिकता के इस युग में भी अभी यह बड़े दावे के साथ कहा जा सकता है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश भाईचारा, प्रेम, सौहार्द और अपनत्व में अपना शानी नहीं रखता। सीधी-सपाट जिंदगी, न दिखावा न अतिशयता। आजमगढ़ का यह क्षेत्र हर काल में अपना महत्त्व रखता रहा है। भैरोजी की यह पावन भूमि अतुलनीय है और रहेगी।

Wednesday, 24 May 2017

Maheshpur Azamgarh ka

महेशपुर (आजमगढ़ )
  - हरिशंकर राढ़ी 
समाज में आए व्यापक परिवर्तनों से कोई अछूता रह गया हो, यह संभव नहीं है। भौतिक प्रगति के साथ वैचारिक बदलाव हर जगह दिख रहा है और उसके साथ-साथ जीवन पद्धति में भी बड़ा बदलाव आया है। रूढ़ियां तो टूटी ही हैं, कुछ अच्छी परंपराएं भी बिखरी हैं। आदमी सुविधाभोगी हुआ है और उसके अनुसार उसने सिद्धांत और व्यवसाय भी बदला है। अन्य क्षेत्रों की भांति राढ़ियों के दोनों गांवों में व्यवसाय और सोच में काफी परिवर्तन आया है। नयी पीढ़ी बेहतर सुविधाओं और रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रही है, खेती पर निर्भरता कम हुई है। किंतु सबसे अधिक असर जातिगत तानेबाने पर हुआ है और उसमें भी सकारात्मक ताने-बाने पर। बिरादरी की परंपराओं का जो जुनून और कानून 30-40 साल पहले तक था, वह बिखर रहा है।

महेश और विष्णु में बड़ा भाई कौन था, इसे निश्चित रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता। महेश ने महराजगंज से उत्तर देवारा क्षेत्र चुना और बस गए। उनके बसाए गांव का नाम महेशपुर हुआ। वह जमाना निश्चित ही सुविधाओं के घोर अभाव का रहा होगा। न कोई रास्ता, न यातायात और न कोई नगरीय जुड़ाव। न जाने महेश बाबा की क्या मानसिकता रही होगी कि छोटी सरयू और बड़ी सरयू (घाघरा) के बीच के कछार क्षेत्र में उन्होंने बसने की ठानी होगी, जबकि दो-तीन सौ साल पहले देश में न कृषियोग्य भूमि की कमी थी और न इतनी आबादी का घनत्व। ऊपर से दूर आए हुए ज्ञानी ब्राह्मण। शायद उन्हें प्रकृति का सान्निध्य प्रिय रहा हो, बड़े साहसी रहे हों या एकांतवासी।
 महेशपुर  में शस्य साम्राज्य :                  छाया हरिशंकर राढ़ी 
जो भी हो, मेरे बचपन का महेशपुर आज से बहुत भिन्न था। महराजगंज बाजार के पुराने चैक से बनियों और कुम्हारों के मोहल्ले से होते हुए छोटी सरयू नदी को पार करिए और वहां से एक पतली सी गहरी कच्ची सड़क (जिसे हम खोर कहते थे, खोर की कोई सही उत्पत्ति मुझे तो नहीं मिली, हो सकता है कि खोह का अपभ्रंश हो क्योंकि यह रास्ता किसी खोह जैसा ही गहरा था।) सर्पीले आकार में चली जाती थी। कुल जमा चैड़ाई एक बैलगाड़ी निकलने भर को। खोर के दोनों ओर सरपत और मेउड़ी की बाड़। मेउड़ी अब नहीं दिखती और न मैं इस वनस्पति शास्त्र का इतना बड़ा ज्ञाता हूँ कि उसका सर्वव्यापी या वानस्पतिक नाम बता सकूँ। इतना याद है कि इस मेउड़ी का उपयोग टोकरियां (जिन्हें आजमगढ़ मंे खांची कहा जाता है) बनाने में किया जाता था क्योंकि इसके लरछे बड़े मजबूत और चिम्मड़ होते थे। इसके अतिरिक्त छप्पर का बंधन बांधने में भी ये काम आती थीं, जलावन भी होता था किंतु मेउड़ी का सर्वाधिक सदुपयोग अध्यापकों द्वारा छात्रों की पिटाई और चमड़ा उतारने में किया जाता था। यह सर्वसुलभ शस्त्र था और इससे देश की शिक्षा व्यवस्था आगे बढ़ती थी। मैं इस मामले में सौभाग्यशाली था कि मुझे इसके प्रहार का स्वाद नहीं मिला था। कारण दो थे-- एक तो मेरी माता जी उसी विद्यालय में पढ़ाती थीं और दूसरे यह कि मैं अपने काम में किसी प्रकार की कमी नहीं रखता था। हाँ, बाकी बहुत से सहपाठियों को मेउड़ी का प्रहार सहते जरूर देखा था। पूरे मन से पढ़ाने और पीटने के मामले में तब प्राइमरी पाठशाला के अनेक शिक्षक बहुत विख्यात होते थे।

 महेशपुर  में लेखक का पैतृक आवास                  छाया :        हरिशंकर राढ़ी
महराजगंज और महेशपुर के बीच पुराने बाजार से लगभग दो किमी की दूरी थी। इस बीच में न कोई घर और न कोई ठांव। राहगीर अकेला हो और हिम्मती न हो तो उसका मालिक भगवान ही। हाँ, लगभग बीच में मुंडीलपुर गांव जरूर पड़ता था, कितु रास्ते से काफी दूर। बीच में पकवा इनार (पक्का कुआं)। पकवा इनार मुड़ीलपुर के ठाकुर जगन्नाथ सिंह का बगीचा और उसमें बना ऊंची जगत का पक्का कुआं जो शायद आम के बाग के लगने के समय सिंचाई के लिए बनवाया गया होगा। वहां से आगे निकले तो बौलिया नामक एक पोखरी और पेड़ों की घनी झुरमुट। कोढ़ में खाज यह कि बौलिया पर भूतों और चुड़ैलों का बसेरा होने का अंधविश्वास। बच्चे तो क्या, बड़ों की हिम्मत नहीं पड़ती थी शाम ढलते ही वहां से गुजरने की। कुछ लोग थे जो रात में देर से आते, उन्हें बड़ा हिम्मती मर्द माना जाता था। मौसम गर्मियों का हो तो, गनीमत। सबसे भयंकर दृश्य होता था बारिश के मौसम का। छोटी सरयू उफान पर और वहां से गांव तक की खोर पानी से भरी हुई। घुटनों तक पानी, तैरते हुए सांप बिच्छू और उनमें से होकर निकलना। मुझे ठीक से याद है कि बरसात के चार महीनों में हम बच्चों का बाजार जाना बिलकुल बंद। घर का कोई बड़ा सप्ताह में एक दिन बाजार जाता तो नमक, मिट्टी का तेल और माचिस जैसी आवश्यक वस्तुएं ले आता। दो-चार पड़ोसी भी कुछ न कुछ लाने को दे दिया करते। जहां तक मुझे याद है, सन् 1975 के बाद कच्ची सड़क पटनी शुरू हुई थी और सन 1984 में छोटी सरयू पर लकड़ी का पुल बनकर तैयार हुआ था।

महेशपुर आज एक विकसित गांव है और बैंक के अलावा सारी सुविधाएं मौजूद हैं। भारतीय स्टेट बैंक भी लगभग खुल गया था किंतु गांव के प्रभावी लोगों के झगड़े में निरस्त हो गया। महेशपुर में कुल सात पुरवे हैं जिसमें दक्षिण का पूरा और उत्तर के पूरा में राढ़ी ब्राह्मणों के कुल मिलाकर 40 घर होंगे। इसके अतिरिक्त गांव में जातिगत आबादी में यादव बहुसंख्यक हैं। अनुसूचित जाति, कोइरी और गड़ेरिया जाति की भी जनसंख्या अच्छी है। महेशपुर गांव के लोग सामान्यतः शांतिप्रिय हैं और जाति आधारित विवाद कभी भी नहीं हुआ है। जो भी विवाद हैं, वे संपत्ति से संबंधित हैं और न्यायालय के अलावा हिंसा के स्तर पर प्रायः नहीं आते। जातिगत मतभेद या जातिवाद चुनावों के अतिरिक्त कभी मुखर नहीं होता। एक -दूसरे के सुख-दुख में शरीक होने के पुरानी भारतीय संस्कृति अभी भी इस गांव में चल रही है।

जनगणना विभाग के आंकड़ों के हिसाब से (2011की जनगणना, जो वेबसाइट पर उपलब्ध है) इस गांव में कुल 212 परिवार हैं और कुल आबादी 1526 है जिसमें 762 पुरुष और 764 महिलाएं हैं। महेशपुर की साक्षरता दर 66.4 है जो औसत से जरा सा कम है किंतु लिंगानुपात सकारात्मक है। समुद्रतल से ऊँचाई 91 मीटर है।
वैसे वेबसाइट सर्च के दौरान मुझे महेशपुर के विषय में जो जानकारियां मिलीं, वे बड़ी हास्यास्पद और अविश्वसनीय थीं। न जाने किन लोगों ने किस आधार पर कहां से सूचना एकत्रित की तथा पूरी तरह से दिग्भ्रमित करने का प्रयास किया है। उदाहरण के तौर पर एक वेबसाइट ने बताया कि महेशपुर महराजगंज तहसील में पड़ता है जबकि महराजगंज तहसील है ही नहीं। पता नहीं किस जिले के महराजगंज को महेशपुर की तहसील बना दिया। मैंने इस वेबसाइट को काफी पहले मेल भी लिखा किंतु उनके कान पर जूँ नहीं रेंगी। इसी प्रकार एक दूसरी वेबसाइट ने महेशपुर का निकटतम अस्पताल बलरामपुर लिखा है जो गोंडा जिले में है और निकटतम हवाई अड्डा अकबरपुर बताया है जबकि अकबरपुर मे हवाई अड्डा है ही नहीं। इन भ्रामक सूचनाओं के आधार पर कोई महेशपुर के विषय में क्या जानकारी इकट्ठा करेगा, सोचने वाली बात है।

मेरा बचपन और पूरी किशोरावस्था इसी महेशपुर में गुजरी है। युवावस्था का प्रथम चरण भी कमोवेश यहीं बीता है और इस गांव की मिट्टी मेरे तन-मन में बसी है। इस गांव में एक प्राइमरी स्कूल था, कालांतर में एक इंटर कालेज बना। पहली से लेकर आठवीं तक की शिक्षा गांव के प्राथमिक पाठशाला और आदर्श इंटर काॅलेज में हुई। तब यह दसवीं तक ही था। विज्ञान पढ़ने के लिए मैं नौवीं कक्षा में इंटर काॅलेज महराजगंज चला गया किंतु महेशपुर की यादें साथ लगी रहीं। अपने शुरुआती दिनों में आदर्श इंटर काॅलेज वाकई आदर्श रहा। यह बात अलग है कि बाद में विभिन्न कारणों और स्वार्थों के चलते यह अपने नाम का पूरा विरोधी हो गया। गांव में शाखा डाकघर, सहकारी खाद-बीजगोदाम, पशु चिकित्सालय, सरकारी नलकूल और न जाने कितनी सरकारी योजनाएं तबसे हैं जब ये विरली होती थीं। इनमें अधिकांश विकास कार्य एवं संस्थाओं की स्थापना स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व0 पं0 लक्ष्मीकंात मिश्र के अथक प्रयासों एवं प्रभाव से हुई थीं। आदर्श इंटर काॅलेज की स्थापना भी इन्हीं की देन है जिसमें विवाद के चलते अलग होना पड़ा। इसके बाद पं0 लक्ष्मीकांत मिश्र जी ने दक्षिण पूरा में इंटर काॅलेज की जमीन पर सन 1986 के आसपास बालिका विद्यालय की नींव डाली। उनके समय तक बालिका विद्यालय में विकास कार्य होता रहा, अनेक कमरे बने किंतु 90 के दशक में उनका निधन हो जाने के बाद विद्यालय उसी स्थिति में रह गया। उनके सामाजिक अवदान को देखते हुए महराजगंज के नए  पर चौक  उनकी प्रतिमा स्थापित की गई। वह समय बदलाव का था। निजीकरण शुरू हो गया था, शिक्षा संस्थान समाज सेवा न होकर आय के स्रोत बन गए, सरकारी विद्यालयों का स्तर गिरने लगा, सरकार ने अनुदान देना बंद कर वित्तविहीन मान्यता देनी शुरू कर दी। व्यावसायिक बुद्धि न रखने वाले समाजसेवी पिछड़ते गए और शिक्षा पूर्णरूपेण शिक्षा माफिया के हाथों में चली गई।
 महेशपुर  में अपने पैतृक आवास पर लेखक                  छाया :      हरिशंकर राढ़ी

गांव का व्यासायिक और सामाजिक ताना-बाना बदलता गया। कुछ राढ़ी जो जमींदार थे, जमींदारी उन्मूलन के बाद जमीन पर आ गए। खेतों की सीमा निर्धारित कर दी गई और कालांतर में चकबंदी भी हो गई। महेशपुर के राढ़ियों में सबसे बड़ी जमींदारी रामानंद-रामशरण राढ़ी की थी जो देवारा कदीम से लेकर मथुरा ठेकेदार के पूरा तक फैली थी। समय की मार और कुप्रबंधन ने इनके बिखरने में बहुत योगदान दिया। यह मलाल इस पूरे खानदान को अभी भी सालता है और यह लेखक भी उनकी चौथी पीढ़ी का हिस्सा है। बिखराव के बाद चौथी पीढ़ी ने स्वयं को संभाला और अपनी मेधा और शिक्षा के बल पर अब इनमें से अधिकांश विकसित या विकास की ओर अग्रसर हैं। वैसे भी इस गांव के अनेक राढ़ियों ने मेधा और शिक्षा के बल पर तमाम सरकारी नौकरियां प्राप्त कीं और उच्च पदों पर रहे। इनमें से उत्तर के पूरा  कई लोग उल्लेखनीय हैं। पुरानी पीढ़ी में उत्तर के पूरा में रमाशंकर मिश्र की भी ख्याति थी। आज महेशपुर गांव में अनेक लोग पीएच. डी और उच्च पदस्थ हैं।

महेशपुर का पश्चिमी पूरा यहां की कुल आबादी का एक बड़ा हिस्सा है। इसे पहले इसे ‘सनपुर’ के नाम से जाना जाता था। कागजों में इसे महेशपुर भले ही लिखा जाता हो, स्थानीय लोग इसे सनपुर के नाम से ही जानते हैं। सनपुर की अधिकांश आबादी यादवों की है और मुख्य महेशपुर से इसकी दूरी एक किमी से अधिक ही होगी।
महेशपुर और सनपुर को जोड़ने वाला रास्ता अब पक्की के सड़क के रूप में है और इसके मध्य में श्री मोतीलाल यादव (पूर्व ब्लंाॅक प्रमुख) द्वारा स्थापित स्व0 ईशदत्त स्मारक डिग्री काॅलेज है। हालांकि यह देवारा कदीम के नाम से पंजीकृत है किंतु वास्तव में महेशपुर में स्थापित होने से महेशपुर की शोभा और गरिमा को यह चार चांद लगाता है। गांव की लड़कियों को अब उच्च शिक्षा आंगन में ही मिलने लगी है। चूंकि श्री मोतीलाल यादव के पुत्र श्री राकेश यादव गुड्डू इस क्षेत्र से एमएलसी हैं, अतः विकासकार्य को गति मिलना स्वाभााविक है।

सनपुर से अविछिन्न खेमानंदपुर महेशपुर का छोटा भाई सा लगता है और इन दोनों गांवों  को  मिलाकर ग्रामपंचायत का निर्माण हुआ है। पड़ोसी गांव सादातपुर और खोजापुर आकार और आबादी में बहुत छोटे हैं इसलिए ये भी महेशपुर के अभिन्न अंग से लगते हैं। आपसी भाई-चारा और न्योता-भोज में ये महेशपुर से अलग नहीं होते। दरअसल, दूर के क्षेत्रों में इन दोनों गांवों के लोग स्वयं को महेशपुर का ही निवासी बताते हैं....महेशपुर ख्यातिप्राप्त तो है ही।

 महेशपुर  में शस्य साम्राज्य                           छाया  :     हरिशंकर राढ़ी
अब वे असुविधाओं वाले दिन गए। गांव से सटती हुई सड़क घाघरा के बांध सहदेव गंज तक जाती है जिस पर बढ़ते यातायात को देखकर देश की प्रगति का विश्वास होता है। लगभग हर घर में दुपहिया वाहन,  अनेक ट्रैक्टर, गाड़ियां और आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित हो चुका है महेशपुर। अब न वो बाढ़, न खोर और न सांप-बिच्छू। दिन-रात फर्राटे भरती गाड़ियों को देखकर और महराजगंज आजमगढ़ को पैरों के तले देखकर बड़ा संतोष मिलता है, नहीं मिलते तो यहां की पगडंडियों पर बिताए बचपन केे दिन... मेरे बचपन का महेशपुर....