Friday, 21 September 2018

Bhimashanker Jyotirlinga Darshan

यात्रा वृत्तांत

भक्ति और प्रकृति का अनूठा संगम: भीमाशंकर

                                                         -हरिशंकर राढ़ी

भीमाशंकर मंदिर का एक विहंगम दृश्य                             छाया : हरिशंकर राढ़ी 
भीमाशंकर की पहाड़ियाँ और वन क्षेत्र शुरू होते ही किसी संुदर प्राकृतिक और आध्यात्मिक तिलिस्म का आभास होने लग जाता है। सहयाद्रि पर्वतमाला में स्थित भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग कई मामलों में अन्य ज्योर्तिलिंगों से अलग है, और उसमें सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि यह आरक्षित वन क्षेत्र में स्थित है, जिसके कारण इसका अंधाधुंध शहरीकरण नहीं हो पाया है। यह आज भी पर्यटकीय ‘सुविधओं’ के प्रकोप से बचा विचित्र सा आनंद देता है। वैसे सर्पीली पर्वतीय सड़कों पर वाहन की चढ़ाई शुरू होते ही ऐसा अनुमान होता है कि हम किसी हिल स्टेशन की ओर जा रहे हैं और कुछ ऐसे ही आनंद की कल्पना करने लगते हैं। किंतु वहां जाकर यदि कुछ मिलता है तो केवल और केवल भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग तथा साथ में समृद्धि प्रकृति का साक्षात्कार। पुणे से लगभग सवा सौ किलोमीटर की कुल दूरी में पर्वतीय क्षेत्र का हिस्सा बहुत अधिक नहीं है, किंतु जितना भी है, अपने आप में बहुत ही रोमांचक और मनोहर है।


भीमाशंकर मंदिर का सम्मुख दृश्य           छाया : हरिशंकर राढ़ी 
                                                                                                                                                     जनवरी का महीना था। दिल्ली में भयंकर ठंड पड़ रही थी। उसपर हमारी गाड़ी सुबह की थी। दिल्ली से प्रातःकाल निकली हमारी ट्रेन पुणे अगले दिन करीब 11 बजे पहुँची तो वहां मौसम एकदम सुहावना था। सर्दी का नामो-निशान नहीं, बल्कि हाल यह था दिल्ली से पहने हुए गरम कपड़े बोझ लग रहे थे और ट्रेन में ही उन्हें निकाल देना पड़ा। मेरे एक दूर के रिश्तेदार मिश्र जी रेलवे स्टेशन पर हमें लेने पहुंचे हुए थे। मैं और मेरे एक मित्र, हम कुल दो जने थे। मिश्र जी मेरे मित्र के गांव के हैं और पुणे में ही रहते हैं। इसलिए नई जगह की दिक्कतों का हमें सामना नहीं करना पड़ा।

भीमाशंकर मंदिर का प्रातः दृश्य          छाया : हरिशंकर राढ़ी 
पुणे से भीमाशंकर तक की यात्रा हमें बस से करनी थी, वह भी प्राथमिकता के आधार पर सरकारी बस से। सरकारी बसें भौतिक रूप से भले ही थोड़ी खराब हों और औसत आय के लोग यात्रा करते हों, इनपर विश्वास किया जा सकता है और ये सुरक्षित भी होती हैं। यद्यपि यात्रा प्रारंभ करने से पूर्व ही मैंने बहुत सी जानकारियां जुटा लीं थीं, फिर भी कुछ अधूरा तो रह ही जाना था। पुणे में रिश्तेदार पहले तो अपने यहां चलने की बात पर अड़े, लेकिन इस प्रतिज्ञा पर कि अगले दिन हम लौटकर उन्हीं के यहां ठहरेंगे और पुणे घूमेंगे, वे मान गए। पुणे में दो बस अड्डे हैं - शिवाजी नगर और स्वार गेट। भीमाशंकर, महाबलेश्वर आदि के लिए बसंे स्वार गेट बस अड्डे से जाती हैं। स्वार गेट बस अड्डा रेलवे स्टेशन से लगभग दस-बारह किलोमीटर होगा। यही ज्ञान हमारी अगली महाबलेश्वर यात्रा में काम आया।

स्वार गेट बस अड्डे से भीमाशंकर के लिए महाराष्ट्र रोडवेज की एक बस मिल गई। लगभग एक बजे यह बस पुणे से भीमाशंकर के लिए चल पड़ी और हम शहर  से निकलते ही यात्रा का आनंद लेने लगे। राश्ट्रीय राजमार्ग संख्या 60 से होते हुए बस गंतव्य की ओर दौड़ने लगी। जनवरी का महीना था और सड़क के दोनों किनारों पर हरी-भरी फसलें लहलहा रही थीं। इस क्षेत्र में रबी के मौसम में भी मक्के की खेती होती है। खेतों में चरते हुए पशुओं के झंुड, सुखद हवा और रम्य वातावरण यात्रा को सुखद बना रहे थे। बस सरकारी थी और भरी हुई थी। जगह-जगह सवारियों को उतारते चढ़ाते हुए चल रही थी। दक्षिण भारत की अनेक यात्राओं में मैंने देखा कि लंबी दूरी की सरकारी बसें चलती तो तेज हैं किंतु रास्ते भर सवारियां उतारती-चढ़ाती हैं और अपने यहां की भाषा में कहें तो लोकल का आनंद देती हैं। पुणे से आगे निकलने के बाद भीमाशंकर जाने के दो रास्ते हो जाते हैं। एक रास्त घोड़ेगांव होकर जाता है तो दूसरा मंचर होकर। जहां तक मुझे याद है, मेरी बस मंचर होकर गई थी और वहां लंबा विश्राम भी लिया था।

भीमाशंकर पहुंचे तो शाम के लगभग पांच बज रहे होंगे। मुझे अंदाजा था कि यहां भी अन्य तीर्थस्थलों या पर्यटन स्थलों की तरह होटलों के एजेंट घेरेंगे, पकाएंगे और होटल के लिए जान मुश्किल में कर देेंगे। लेकिन यहां तो स्थिति कुछ उलटी ही थी। एक सूना-सूना सा स्थान, केवल कुछ बसें खड़ीं, उनमें से भी पर्यटक बसों की संख्या अधिक। न कोई भीड़-भाड़ और न कोई पूछने वाला। बस से उतरकर शरीर सीधा किया। मंदिर का रास्ता पूछा और आगे बढ़ गए। अनजान जगह पर पूछताछ करना ठीक होता है, लेकिन एक सीमा तक। ज्यादा पूछने में भी आपके अनाड़ीपने की बू आती है। यहां तो न कोई बाजार जैसा माहौल, न अट्टालिकाएं और न होटलों की लाइने। खैर, हम दोनों थोड़ी दूर आगे बढ़े तो एक बुझे से आदमी ने मरे से स्वर में पूछा -‘होटल लेना है?’ हमने जवाब नहीं दिया और आगे बढ़ गए। फिर भी उसने अपने तईं एक मरी सी गली की ओर इशारा कर दिया और जो हम सुन सके, उसने कहा कि यहां आपको अच्छे होटल नहीं मिलेंगे, आपको यहीं आना पड़ेगा। साथ में जो सज्जन थे, षांत रहना और धैर्य रखना उनके लिए बहुत ही मुश्किल है, किंतु मेरी वजह से ज्यादा सक्रियता नहीं दिखा पा रहे थे। हम उस बुझे आदमी को अनसुना करके आगे बढ़ गए।

और उसकी बात सच निकली कि वहां अच्छे होटल नहीं मिलेंगे। जो एक - दो मिले, उन्हें होटल नहीं कह सकते थे। किसी के घर की दूसरी मंजिल पर अस्थायी सा एक ढांचा - पटिया, चद्दर या किसी ऐसी ही सामग्री से बना हुआ एक या दो कमरा जिसमें गुजारा हो सके या जिसे किसी तरह छत का नाम दिया जा सके। एक ऐसे ही सुरंगनुमा ‘होटल’ में घुसे और किराया पूछा तो कुछ घृणा जैसी मनःस्थिति पैदा हुई। लुब्बे-लुवाब यह कि वहां से खिसकना पड़ा - इस निःशुल्क चेतावनी के साथ कि बाद में आएंगे तो यह भी नहीं मिलेगा और यह कि यहां होटल नहीं हैं। यह इलाका वनक्षेत्र संरक्षित है और यहां निर्माण की अनुमति नहीं हैं। वहां से निकले तो मेरा मन हुआ कि पहले वाले को ही देख लिया जाए। तब तक मित्र महोदय को एक धर्मशाला नजर आ गई और उनके कदम उधर ही बढ़ गए। धर्मशाले के बाहरी रूप रंग से ही मुझे अनुमान लग गया कि यहां तो गुजारा हो नहीं सकता। समय ही व्यर्थ करने हम जा रहे हैं क्योंकि मित्र महोदय को अनुमान से अधिक सीधी बात पर भरोसा था। अनमने मन से हमारा स्वागत हुआ। बताया गया कि कमरा तो मिल जाएगा, किराया सौ या डेढ़ सौ लगेगा।  इससे पहले कि कमरा देखा जाए, जनाब ने बताया कि शौच के लिए जंगल में जाना पड़ेगा। यहां शौचालय नहीं है। क्यों ? इसलिए कि यहां पानी की भीषण समस्या है और पानी पांच किलोमीटर दूर से रिक्शे - रेहड़ी पर केन में भरकर लाया जाता है। उम्र का एक बड़ा हिस्सा उत्तर भारत के एक सुविधाहीन गांव में बिना शौचालय के गुजारने के बावजूद इस अनजान अभयारण्य में साहस नहीं हुआ। अंधेरा घिर रहा था और समीप के जंगल से गीदड़ और न जाने किन -किन जानवरों की आवाजें आ रही थीं।

भीमाशंकर मंदिर के पृष्ठ में हरिशंकर राढ़ी              
अब मैंने और अधिक समय गंवाए बिना, जल्दी से पहले वाले मरे से आदमी की गली में भागना उचित समझा। खैर यह जल्दबाजी कुछ हद तक कामयाब रही क्योंकि पहुंचते-पहुंचते एक तीन विस्तरों वाला कमरा हमें मिल गया। दो विस्तरों का कमरा उठ चुका था। लिहाजा उस लाॅज में (संभवतः जिसका नाम चेतन लाॅज था) तीन विस्तरों वाला कमरा ले लेने में ही भलाई थी। किराया छह सौ रुपये। मित्र ने मोलभाव किया तो इतना ही हो पाया कि वह छह सौ में ही चार-पांच बाल्टी पानी दे देगा। पानी का वही रोना कि एक बाल्टी पानी वहां पर बीस या पच्चीस रुपये का। और यह भी कि मंदिर में दर्शन हेतु जाने से पूर्व भोर में ही वह नहाने के लिए दो बाल्टी पानी गरम भी कर देगा। हाँ, शौचालय था किंतु अटैच नहीं, काॅमन।

भीमाशंकर के दर्शन: तथाकथित लाॅज में अपना-अपना बैग फेंक व हाथ-मुंह  धोकर हम भीमाशंकर के दर्शन के लिए निकल पड़े। बड़ी मुश्किल से पांच सौ मीटर दूर रहा होगा वह लाॅज से। हाँ, मंदिर काफी नीचे है और लगभग दो सौ सीढ़ियां उतरनी पड़ती हैं। सीढ़ियां बहुत चैड़ी हैं और लगातार नहीं हैं, इसलिए अधिक कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता है।

मंदिर एक तरह से तलहटी में है। इसकी प्राचीनता इसकी दीवारों और बनावट से जाहिर हो जाती है। मंदिर आकार- प्रकार में बहुत विशाल तो नहीं है किंतु बनावट एवं महत्त्व के कारण एक गहन आध्यात्मिक वातावरण की अनुभूति अवश्य कराता है। गर्भगृह में शिवलिंग स्थापित है जो आकार में छोटा ही है। अन्य मंदिरों की भांति इसमें गर्भगृह के सम्मुख एक मंडपम है जिसमें ज्योतिर्लिंग की दिशा में नंदी की मूर्ति है। दीवारों से छत तक पत्थर के टुकड़ों से निर्मित है और दक्षिण भारतीय नागरा शैली को अपनाया गया है।

जब हम पहुँचे तो अंधेरा घिर रहा था। सायंकालीन आरती की तैयारियाँ हो रही थीं। मंदिर में कम ही भक्त उपस्थित थे। संभवतः अधिकांश यात्री दर्शनोपरांत शाम तक वापस लौट जाते हैं क्योंकि ठहरने की समस्या तो है ही। स्थानीय आबादी भी कम है और जिस दिन हम गए थे, उस दिन न कोई पर्व और न त्योहार। अतः जिस तरह की शांति किसी मंदिर में होनी चाहिए, वैसी ही थी। आरती के बाद मित्र ने पुजारी से बात की तो उसने अगले दिन एकदम प्रातः आने की सलाह दी। प्रातःकालीन शृंगार से पूर्व लिंग का रजत आवरण हटाकर सफाई की जाती है और उस समय के दर्शन को कुछ लोग बहुत अधिक महत्त्व देते हैं। जैसा कि मैंने पहले ही बताया, मित्र अत्यंत धार्मिक स्वभाव के हैं, इसलिए यह तय किया गया कि अगली सुबह चार बजे ही मंदिर परिसर में उपस्थित हो जाएंगे।

जिस प्रकार भीमाशंकर में ठहरने के विकल्प सीमित हैं, उसी प्रकार भोजन के लिए भी विकल्प सीमित हैं। ले-देकर एक ढाबा जैसा भोजनालय जिसमें दाल-रोटी और एक - दो सब्जी ही उपलब्ध थी। रेस्तरां का तो दूर-दूर तक नामो-निशान नहीं। खैर, मेरे लिए इतना बहुत है, समस्या उन लोगों के लिए है जिनके लिए भोजन बहुत बड़ी चीज है और जो बहुत महंगा और विविधतापूर्ण आहार लेकर ही स्वयं को धन्य और बड़ा मानते हैं। जो भी था, खा-पीकर हमने तीन बजे प्रातः का अलार्म लगाया और सो गए।

प्रातः दर्शन: भोर में समयानुसार उठकर हमने लाॅज मालिक को जगाया और गरम पानी की मांग की। ठंड तो ज्यादा नहीं थी, फिर भी सामान्य पानी से नहाना संभव नहीं था, सामान्य पानी भी उसी के पास था। जब तक अन्य कार्यों से हम निवृत्त हों, उसने एक-एक करके दो छोटी बाल्टी गरम पानी उपलब्ध करा दिया। मजे की बात यह हुई कि पानी कुछ अधिक ही गरम हो गया था और हमारे पास ठंडा पानी था नहीं कि उसे मिलाकर सामान्य कर लें। जैसे-तैसे बच-बचाकर नहाने की औपचारिकता पूरी की गई और हम एक बार पुनः अंधेरे में सीढ़ियाँ उतरते, कुत्तों की भौंक खाते मंदिर परिसर में उपस्थित।
भीमाशंकर मंदिर की सीढ़ियों का दृश्य          छाया : हरिशंकर राढ़ी 
प्रातःकालीन दर्शन अपेक्षा के अनुरूप रहा। मित्र ने पुजारी से अग्रिम परिचय कर लिया था, सो पूजा-दर्शन उन्होंने मन से कराया। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग में पुजारियों की लूट-पाट का कोई आंतक नहीं है। कम से कम हमें तो कोई भी ऐसा पंडित-पुजारी नहीं मिला जिसने पैसे की मांग की हो या भोजन इत्यादि के नाम पर उगाही करनी चाही हो। जो भी दिया, स्वेच्छा या बलपूर्वक ही दिया। बहुत अच्छा लगी यह स्थिति। प्रातःकाल मंदिर का प्रांगण बहुत ही सुंदर लग रहा था और दूर मंदिर से ऊँचाई पर फैली पहाड़ियां वातावरण को मनोरम बना रही थीं। चहुंओर प्राकृतिक हरीतिमा एक अलग ही रंग जमा रही थी। सुबह की गुनगुनी धूप प्रांगण में ही रोके रखना चाहती थी। धीरे-धीरे भक्तों की संख्या बढ़ने लगी थी। नौ-दस बजे तक पुणे और अन्य नगरों से यात्री पहुंचने लगते हैं और देखते-देखते भीमाशंकर की नीरवता चहल-पहल में बदल जाती है। दोपहर बाद हमें पुणे लौटना था। अभी कुछ अन्य जगहें भी घूमनी थीं, इसलिए हम भीमाशंकर लिंग को प्रणाम कर वापसी की सीढ़ियां चढ़ने लगे। हमारे मन और होठों पर भीमाशंकर स्त्रोत बार-बार आ रहा था। सीढ़ियों पर प्रसाद स्वरूप ताजा बनते हुए पेड़े, औटता हुआ दूध बहुत ही लुभाता है और पेड़े खरीदने से षायद ही कोई बच पाता हो। न जाने फिर कब आना होगा इस भूमि पर, यही सोचते और भीमाशंकर स्त्रोत को सुनते हम अपने तल पर एक बार फिर वापस।

यं डाकिनीशाकिनिकासमाजे निशेव्यमाणं पिशिताशनैश्च।
सदैव भीमादिपदप्रसिद्धं तं शंकरं भक्तहितं नमामि।।


भीमा नदी के उद्गम की ओर  वनपथ  
भीमा उद्गम की ओर: भीमाशंकर वस्तुतः भीमा नदी के उद्गम पर बसा हुआ है और इसी कारण इस ज्योतिर्लिंग का नाम भीमाशंकर है। भीमाशंकर एक बहुत बड़ा वनक्षेत्र तो है ही, भीमा नदी का उद्गम भी यहीं है। कथा के अनुसार भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति भीमा नदी के उद्गम पर ही है जो मंदिर से लगभग दो किलोमीटर से अधिक दूरी पर गहन वन में स्थित है। पगडंडियों से ही जाना होता है और वन में हिंसक जन्तु भी रहते हैं। एक बार रास्ता भटके तो लौटना बहुत ही कठिन। जहां हमने चाय पी, वहीं मालूम हुआ कि भीमा नदी के उद्गम तक पथ प्रदर्शक के रूप में किसी न किसी को ले जाना पड़ेगा। अब तो पूरा ध्यान नहीं है, लेकिन दूकानदार ने ही एक 12-14 साल का लड़का सौ - दो सौ रुपये में हमारे साथ गाइड के तौर पर लगा दिया। लड़का बहुत वाचाल और मनमौजी था। उसके साथ हम कुछ डरते तो कुछ आनंदित होते भीमा नदी के उद्गम पर पहुंच गए।
भीमा नदी के उद्गम पर शिवलिंग             
जनवरी महीने में  भीमा में पानी तो कहने मात्र को था। एक झरनेनुमा स्थान के पास एक अत्यंत छोटी सी मढ़िया बनी हुई थी और पास में एक शिवलिंग जैसी आकृति पर कुछ फूल चढ़े हुए थे। कहा जाता है कि भीमाशंकर की उत्पत्ति यहीं पर हुई थी।

भीमा नदी का  उद्गम           छाया : हरिशंकर राढ़ी  
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति: भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति के संबंध में एक कथा विख्यात है। कहा जाता है कि डाकिनी वन (आज का भीमाशंकर वनक्षेत्र) में राम-रावण युद्ध के पश्चातकाल में कर्कटी नामक राक्षसी अपने महाबलवान पुत्र भीमा के साथ रहती थी। कर्कटी लंकेश्वर रावण के भाई कुंभकर्ण की पत्नी थी, वही कुंभकर्ण जो अपनी षट्मासी निद्रा के लिए प्रसिद्ध है और जो राम के हाथों मारा गया था। कर्कटी ने अपने पुत्र भीमा को उसके पिता के विषय  में कुछ नहीं बताया था और यह रहस्य भीमा को परेशान किए रखता था। एक दिन भीमा के अति हठ के बाद कर्कटी ने राम -रावण युद्ध का वर्णन किया और बताया कि उसके पति और भीमा के पिता कुंभकर्ण श्री विश्णु के अवतार अयोध्या के राजा श्री राम के हाथों मारे गए थे। तब से वह इसी प्रकार दुखों का पहाड़ उठाए भटक रही है। यह सुनकर भीमा को बहुत क्रोध आया तथा उसने विष्णु से अपने पिता का बदला लेने का निश्चय किया।

भीमा को ज्ञात था कि विष्णु से बदला लेना इतना आसान नहीं है, इसलिए उसने ब्रह्मा की घोर तपस्या की और उनसे अतुलित शक्ति प्राप्त कर ली। इसके बाद उसने मनुष्यों, ऋषियों और देवताओं पर भयंकर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया। देवराज इंद्र के स्वर्ग पर आक्रमण करके, इंद्र को  पराजित करके स्वर्ग को अपने अधीन कर लिया। तीनों लोकों में उसका आतंक हो गया। सभी देवता मिलकर भगवान शिव के पास गए और उनसे प्रार्थना की कि वे उन्हें भीमा के आतंक से रक्षित करें। भगवान शिव ने देवताओं को उनकी रक्षा का आश्वासन दिया। एक बार उसने परम शिवभक्त कामरूपेश्वर को बंदी बना लिया और उनपर अतिशय अत्याचार करने लगा। एक दिन भीमा ने कामरूपेश्वर को आदेश दिया शिव के बजाय उसकी पूजा करे। कामरूपेश्वर के मना कर देने पर क्रोधित हो उसने तलवार निकाल ली और शिवलिंग पर वार करने ही जा रहा था कि भगवान शिव प्रकट हो गए। शिव - भीमा में भयंकर युद्ध हुआ तथा देवर्षि  नारद की प्रार्थना पर भगवान शिव ने भीमा का वध कर दिया। देवतागण प्रसन्न हुए और शिव से प्रार्थना की कि वे वहीं पर ज्योतिर्लिंग रूप में विराजें। भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना मान ली और वे भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के रूप में डाकिन वन में स्थापित हो गए।

यह भी कहा जाता है कि युद्ध में शिव के शरीर से गिरी पसीने की बूंदों से भीमा नदी की उत्पत्ति हुई। एक अन्य कथा के अनुसार भगवान शिव ने यहीं त्रिपुरासुर का वध किया था और उस युद्ध में गिरे स्वेदकणों से भीमा नदी का जन्म हुआ था।
भीमाशंकर वन में हनुमान मंदिर           छाया : हरिशंकर राढ़ी 
आस-पास के दर्शनीय स्थल: भीमाशंकर मंदिर के आस-पास देखने के लिए प्रकृति में बहुत कुछ है। भीमाशंकर अभयारण्य अपने आप में एक बड़ा आकर्षण है। इस अभयारण्य में विभिन्न प्रकार के पक्षी और वन्य जंतु बहुतायत में देखे जा सकते हैं । हमारे पास समय कम था, अतः अभयारण्य घूमने की इच्छा अधूरी ही रह गई। हाँ, प्रकृति के साहचर्य में मुझे अकूत संतोष मिलता है, इसलिए जो भी मिल जाए उसे छोड़ना नहीं चाहता। भीमा उद्गम से वापसी के बाद पता लगा कि कुछ दूर जंगल में हनुमान जी का एक प्रसिद्ध मंदिर है। दूरी लगभग दो किलोमीटर होगी, पैदल का ही रास्ता है। इतना समय हमारे पास था और हम निकल पड़े जंगल की ओर। वास्तव में सहयाद्रि पर्वत माला का यह हिस्सा बहुत ही सौंदर्यशाली और हरा-भरा है। रास्तें में बहुत से युवक-युवतियां हनुमान मंदिर की ओर जाते मिले। हनुमान मंदिर तो कोई विशिष्ट नहीं है, किंतु यहां की शांति और एकांत मनमोहक था। इधर-उधर कूद-फांद करते हुए बंदर हमारा मनोरंजन कर रहे थे। निरभ्र वातावरण एक विशेष आनंदानुभूति दे रहा था। कुछ देर रुककर हम अपने लाॅज वापस आ गए। हनुमान लेक तथा अन्य स्थलों के भ्रमण का लोभ संवरण कर हम दोपहर बाद पुणे जाने वाली बस में भीमाशंकर की शांति और सौंदर्य मन में बसाकर वापस चल दिए।

 हनुमान मंदिर   का एक दृश्य        छाया : हरिशंकर राढ़ी
जरूरी जानकारियाँ: भीमाशंकर पुणे से लगभग 125 किलोमीटर की दूरी पर है और नियमित रूप से सरकारी तथा निजी बसें चलती रहती हैं। सरकारी बसें पुणे के स्वारगेट बस अड्डे से चलती हैं। पुणे से भीमाशंकर या तो मंचर या फिर घोड़ेगांव होकर जाया जाता है। दोनों  रास्ते ठीक हैं। निजी गाड़ियां प्रायः घोड़ेगांव होकर जाती हैं। टैक्सियां भी हमेशा मिल जाती हैं। यदि आपका समूह 4-5 या इससे अधिक का हो तो टैक्सियां बेहतर रहेंगी। पुणे से भीमाशंकर दर्शन की निजी बसें भी चलती हैं जो पुणे से सुबह चलकर षाम को वापस छोड़ देती हैं। चूंकि भीमाशंकर में ठहरने की व्यवस्था अच्छी नहीं है, इसलिए इस सुविधा का लाभ उठाया जा सकता है। हाँ, भीमाशंकर से पहले अच्छी श्रेणी के  होटल और रिजाॅर्ट मिल जाते हैं। यदि दो दिन का समय हो तो अभयारण्य, हनुमान लेक और ज्योतिर्लिंग के दर्शन ठीक से हो सकते हैं । यहां पूरे वर्ष  जाया जा सकता है, किंतु यदि गर्मियों से बचा जाए तो बेहतर होगा।







Thursday, 23 August 2018

Kya Haal Sunaavan-- book review




समीक्षा     (नरेन्द्र मोहन की आत्मकथा - क्या हाल सुनावाँ)

आत्मकथा के बहाने समय से विमर्श

                                         - हरिशंकर राढ़ी 



हिंदी साहित्य में आत्मकथा लेखन का प्रारंभ निश्चित ही देर से हुआ किंतु समृद्धि तक पहुंचने में इसे बहुत समय नहीं लगा। आज साहित्य जगत के ही नहीं, कला के विभिन्न क्षेत्रों, खेलों और यहां तक की राजनीति जगत के व्यक्तित्वों ने आत्मकथा को अपने समय, समाज और जीवन की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया है। संस्कृत साहित्य और संस्कार से शुरू भारतीय साहित्य आत्मप्रशंसा के बजाय लोक कल्याण और लोक जीवन को अधिक महत्त्व देता रहा, संभवतः इसी कारण भारतीय भाषाओं में आत्मकथा का अभाव रहा। प्राचीन साहित्यकारों के आत्मपरिचय के अभाव का दंश आज भी पूरा साहित्य जगत झेल रहा है। विश्व साहित्य के प्रभाव और आत्मकथ्य की बेचैनी ने हिंदी में भी आत्मकथा लेखन को बढ़ावा दिया और आज का हर लेखक या कवि आत्मकथा के बहाने उन सभी भावों तथा अनुभवों को उद्गार देना चाहता है जिसे वह अपने साहित्य में नहीं दे पाया है।
कुछ आत्मकथाएं केवल आत्मपरिचय और निजी सुख-दुख के दायरे तक ही सिमटकर रह जाती हैं, भले ही उनमें अनुभवों और भावनाओं का प्रवाह सघन हो। वे केवल एक व्यक्ति का जीवन लेकर चलती हैं तथा अपने समय और समाज को परिभाषित नहीं कर पातीं। वे पढ़ी तो जाती हैं किंतु शीघ्र ही भुला दी जाती हैं क्योंकि वे पाठक को विस्तृत फलक से जोड़ नहीं पातीं। वहीं दूसरी ओर कुछ आत्मकथाएं ऐसी होती हैं जो लेखक के निजी संस्मरणों को सामाजिक और साहित्यिक मान्यता प्रदान करती हुई चलती हैं। वे एक जीवन न होकर अपने समय की इतिहास और संस्कृति होती हैं। वे अपने समय के समाज को व्याख्यायित करती हैं और एक संकुचित दृश्य न देकर पैनोरमा बनाती हैं। ऐसी आत्मकथाएं साहित्य और समाज दोनों के लिए थाती हो जाती हैं।
कमोबेश दूसरी बिरादरी की ही एक आत्मकथा नरेन्द्र मोहन की लेखनी से आई है - क्या हाल सुनावाँ। इस आत्मकथा के पृष्ठों से गुजरते हुए वक्त लगता है और लगता है कि लेखक अपने समय और समाज के विभिन्न वर्गों की साइको से वार्ता कर रहा है। लेखक के जीवन चारो ओर बहुत सी स्थितियां और घटनाएं घूमती हुई नज़र आती हैं तो कई बार लेखक स्वयं साहित्य और समाज के परिक्रमा पथ पर चक्कर लगाता हुआ दिखता है। कहा जाए तो यह आत्मकथा एक साहित्यकार की समयकथा में घुलती-मिलती चली जाती है और अंततः उसमें से अनुभवों, अनुभूतियों, सफलताओं- विफलताओं, जय-पराजय और संवेदनाओं का एक गाढ़ा सा आसव निकलता है। लेखक ने अपने जीवन की घटनाओं और संघर्षों के ताने-बाने से एक ऐसी चादर बुनी है जिसे पाठक बड़ी गंभीरता से ओढ़ना -बिछाना और सहेजना चाहेगा।
‘क्या हाल सुनावाँ’ नरेन्द्र मोहन की आत्मकथा की दूसरी कड़ी है और संभवतः पहली कड़ी ‘कमबख्त निंदर’ का शिखर है। ऐसा इसलिए कहा जा सकता है कि लेखक जिस तरह छोटी-छोटी घटनाओं, वृत्तांतों और साधारण यादों को विमर्श में बदल देता है, वह अन्यत्र सहज उपलब्ध नहीं हो सकता। सामाजिक सरोकार उसकी पीड़ा और विषाद की जड़ में हैं तो अपने निजी संघर्ष और अनुभूतियां सामाजिक और साहित्यिक विमर्श। बंटवारे और विस्थापन का दर्द, विश्वविद्यालयी उठापटक, रजतपट की चकाचैंध में पकड़ खोते रंगमंच, राजनीतिक लाभ-हानि के चलते अभिव्यक्ति की स्वंतंत्रता पर लगाए गए सरकारी पहरे, सृजन की प्रसव पीड़ा और दैहिक कमजोरियां किसी एक लेखक की अपनी समस्या या मानसिकता की उपज नहीं, यह तो देश और काल की पीड़ा है। यह वैयक्तिक हो ही नहीं सकती। यह बात अलग है कि इसको अंतरतम तक भोगने वाला एक संवेदनशील लेखक ही हो सकता है। होने को और लोग भी हो सकते हैं, पर वे कह नहीं सकते, बस लेखक के स्वर में स्वर मिला सकते हैैं।
सच कहा जाए तो यह आत्मकथा देश और काल के पृष्ठ दर पृष्ठ पर अनगिन प्रश्नवाचक चिह्न लगाती हुई आगे बढ़ती है। वे प्रश्न बंटवारे, विस्थापन, साहित्यिक जीवन और देश तथा समाज के विभिन्न चरित्रों पर हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, लेखक के नाटक ‘मि0 जिन्ना’ की अंतर्कथा और नरेन्द्र मोहन के संघर्ष को ही ले लें। एक सामान्य मान्यता के तहत देश के बंटवारे के लिए अकेले जिन्ना को जिम्मेदार मानकर कुछ राजनीतिक दल या बुद्धिजीवी अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं और स्वयं पाक-साफ बन जाते हैं। इस ओढ़े हुए तथ्य के विरुद्ध ‘मि0 जिन्ना’ नाटक के लेखक का शोध और बहुफलकीय विश्लेषण सरकार तथा कुछ अन्य लोगों को गवारा नहीं होता और नाटक का मंचन प्रतिबंधित कर दिया जाता है। यह समस्या अकेले इस लेखक की नहीं हो सकती। यह तो समय, समाज और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है और वह अपनी आत्मकथा में इसे विमर्श का रूप देने में काफी हद तक सफल रहता है।
कुल 15 उपशीर्षकों में बँटी यह आत्मकथा जीवन को सिलसिलेवार व्यक्त करने का उपक्रम नहीं है, इसमें जीवन के चुनिंदा प्रकरणों को व्याख्यायित करने का प्रयास है। लेखक ऊँचे प्लेटफार्म पर खड़े होकर देखने के बजाय अतीत को एक सामान्य धरातल से देखता है और उसे मुख्यतः विकल कर देने वाले प्रसंग दिखते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि इसमें सतत विलाप, किस्मत और समाज से शिकायतों का अंबार या नकारात्मकता का शब्दजाल है। हकीकत तो यह है कि लेखक किसी भी घटना को इस दृष्टिकोण से न देखता है और न परोसता है। वह तो अपने लेखकीय जीवन के आंतरिक और बाहरी संघर्षों को इस आत्मकथा का पाथेय बनाता है।
कथ्य के आधार पर इस पुस्तक को दो भागोें में रखा जा सकता है। इसका एक बड़ा हिस्सा एक कवि, नाटककार की रचनायात्रा, तज्जन्य कठिनाइयों, तमाम कवियों-लेखकों से साहित्य के दोस्ताना विमर्श एवं साहित्यिक यात्राओं के खाते में है तो दूसरा हिस्सा स्वास्थ्यगत और पारिवारिक स्थितियों और समस्याओं का है जो कम स्पेस पाता है। नरेंद्र मोहन की अपने बचपन के शहर लाहौर और रावी नदी को भूल नहीं पाते और उनकी मानसिक आवाजाही लगातार बनी रहती है। उन्हें जम्मू में तवी नदी देखकर रावी याद आती है और एक नदी उन्हें दूसरी नदी तक ले जाती है। बार-बार अतीत में वापस जाना और बचपन की धरती को तलाशना उनकी प्रकृति बन गई है, लेकिन वे अपने अतीत को बहुत संवेदनशील तरीके से जीते हैं। नास्टैल्जिया होते हुए भी इसे ‘नास्टैल्जिया’ कहकर उपेक्षित नहीं किया जा सकता है। मानसिक यात्रा के अलावा अवसर मिलते ही वे पाकिस्तान यात्रा का लोभ संवरण नहीं कर पाते और अपनी रावी को निगाहों में एक बार पुनः उतारने वे लाहौर पहुंच जाते हैं। उनका लाहौर की यात्रा करना एक व्यक्ति या लेखक की यात्रा नहीं है, अपितु यह उन सभी लोगों की यात्रा है जो विस्थापन का दर्द जानते हैं। बंटवारा एक ऐसी त्रासदी थी जिससे उबर पाना एक व्यक्ति तो क्या, अभी तक दोनों मुल्कों के लिए भी संभव नहीं हो पाया है।
लेखक ने विस्थापन के दर्द के साथ देश में अपने लिए जमीन तो तैयार कर ली, उस जमीन पर उसके पाँव मजबूती से टिक भी गए; लेकिन कोई न कोई उसे जन्मस्थान की ओर जरूर खींचता रहता है। इसी लिए जब ‘मि0 जिन्ना’ नाटक का प्रकाशन और मंचन पाकिस्तान में होता है तो उसे बहुत सुकून महसूस होता है। दूसरी ओर जब राजनीतिक पूर्वाग्रहों और गलत इतिहास की अधकचरा जानकारी के चलते अपने ही देश में नाटक ‘मि0 जिन्ना’ का मंचन ऐन वक्त पर प्रतिबंधित हो जाता है तो बहुतेरे प्रश्न और बहुतेरे दर्द उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं। लेखक की प्रवृत्ति रही है कि वह चुनौतीपूर्ण विषयों को ही अपनी कलम की धार के नीचे लेता रहा है। मोहम्मद अली जिन्ना निश्चित रूप से बंटवारे के प्रमुख सूत्रधार रहे हैं, किंतु यह कह देना कि इकलौते कारण वही थे, इतिहास और समाज से पलायन है। इसके अतिरिक्त उस मानसिकता का विश्लेषण जिसके कारण कोई बंटवारे की विषैली मानसिकता का जनक हो जाए, अपने आप में कम साहसिक कदम नहीं है। उदारता की लाख अच्छाइयों के बावजूद संभवतः अभी हम इतने परिपक्व और नवोन्मेषी नहीं हो पाए की निर्धारित कथनों के विरुद्ध दूर तक जाकर कुछ नया सोच पाएं। और शायद यही कारण है कि सिगमंड फ्रायड इस देश में मान्यता के लिए संघर्ष करते हैं।
रंगमंच की उपयोगिता, स्थिति और भविष्य को लेकर नरेन्द्र मोहन कहीं चिंतित तो कहीं सतर्क दिखते हैं। इसमें संदेह नहीं कि रजतपट के आगमन से रंगमंच की लोकप्रियता और दर्शनीयता कम हुई है। अब तो ऐसे भी लोग मिल जाएंगे जिन्हें यह भी पता नहीं कि रंगमंच क्या होता है। साहित्य में नाटककार कम रह गए हैं और अच्छे नाटक कम लिखे जा रहे हैं। जिस प्रकार छिछले हास्य कवियों ने काव्यमंच को उपहास्य और हल्का बना दिया है, उसी प्रकार प्रहसनकारों ने रंगमंच की छीछालेदर की है। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। गंभीर साहित्य और गंभीर संगीत कालजयी होते हैं और कालातीत भी। पूरी आत्मकथा पढ़ने के बाद यह आश्वस्ति मिलती है कि रंगमंच के लिए काम हो रहा है। अच्छे नाटककार, निर्देशक और चरित्र अभिनेता अपनी पूरी जिजीविषा से लगे हुए हैं और पूर्ण समर्पण से काम कर रहे हैं। लेखक अपने अनेक नाटकों के मंचन और पूर्वाभ्यास का सशक्त विवरण देता है।
‘मि0 जिन्ना’ ही नहीं, वे अपने अन्य कई नाटकों की रचना प्रक्रिया, उनपर किए गए शोध की अंतर्कथा सुनाते हुए चलते हंैं जिनमें ’अभंगगाथा’ और ‘सींगधारी’ उल्लेखनीय है। मंटो की जीवनी पर साहसिक शोध और लेखन की गाथा नरेन्द्र मोहन की चुनौतियां स्वीकारने की अभिव्यक्ति है। हाँ, एक बार जब नाटककार अपने लिखे नाटक को मंचित होते देखता है तो उसे अपार संतोष मिलता है और लगता है कि उसके लिखे शब्दों और संवादों में नए रंग उभर कर आ रहे हैं। यही दशा किसी कवि को अपने गीतों को लयबद्ध होते देखकर होती है। नरेन्द्र मोहन इस सुख को बार-बार दिखते हैं किंतु उतना ही दुख भी महसूस करते हैं जब ‘मि0 जिन्ना’ पर मंचन के ऐन पहले प्रतिबंध लग जाता है और दूसरी बार स्वास्थ्यगत कारणों से औरंगाबाद से ‘मलिक अंबर’ को छोड़कर।
लेखक अपने निजी पलों को भी बड़ी शिद्दत से महसूस करता है। दरअसल, इस आत्मकथा में दर्शन, रहस्यवाद (मिस्टीसिज्म), अध्यात्म, मनोविज्ञान और साहित्य का अजीब सा मिश्रण दिखता है। पत्नी की मृत्यु का वर्णन एकदम भावुकता से उठकर एक अनजाने से लोक की ओर चल देता है। इसमें संदेह नहीं कि नरेन्द्र मोहन अपनी कविताओं में एक अलग तरह का सूफीज्म और लौकिक प्रवाह लेकर चलते हैं। यही प्रवाह इस आत्मकथा में व्यापक रूप से दृष्टिगत होता है।
पूरी आत्मकथा एक जीवन दर्शन लेकर चलती है। यत्र तत्र वे इसमें अपने अनुभवों की पाक सारवाक्य छोड़ते चलते हैं और कहा जाए तो स्वयं के मैक्ज़िम्स तैयार करते हैं। प्राप्तियों और अनुभूतियों से उपजे वाक्यों को एक जगह समेट पाना असंभव है। बार-बार वे पाठक को ठहरने और सोचने पर मजबूर करते हैं। आत्मालोचन के लिए बार-बार जगह बनाते हैं और कुछ न कुछ कह जाते हंैं। यह भी एक सर्वमान्य तथ्य है कि आत्मकथा लेखक अपने कमजोर पक्षों को प्रायः छिपा जाता है या उपेक्षित कर देता है। निजी जीवन से जुड़ी यादों को जब वह लिपिबद्ध करता है तो अधिकांश आलोचक और पाठक उसके अपने प्रेम प्रसंगों को को तलाशता है। अज्ञेय और हरिवंश राय बच्चन अपनी जीवनियों में ऐसे प्रसंगों को छिपाते नहीं। वहीं अनेक आत्मकथाओं में निजी संबंधों और कमजोरियों को छिपाया गया है। वैसे, जब लेखक अपनी वैयक्तिकता को सामाजिक संपत्ति के रूप में परिवर्तित कर देता है तो उसके इन संबंधों की तलाश बेजा ही है। क्या हाल सुनावाँ में लेखक ने न तो ऐसे प्रसंगों को अतिरंजना या ऊँचाई प्रदान की है और न छिपाया ही है।
लेखक का अपना अलग नजरिया होता है। वह अपने मित्रों और समाज को सकारात्मक दृष्टि से देखता है। बढ़ती हिंसा और राजनीतिक कटुता पर उसे चिंता होती है और होनी भी चाहिए। ‘‘इधर मैं कविताएं लिखता रहा, उधर हत्याएं होती रहीं।’’पंजाब के आतंकवाद और चैरासी के दंगों के परिप्रेक्ष्य में लिखित यह वाक्य एक ही बार में बहुत सी विडम्बनाओं को उभार देता है। लेखक कहीं से मुगालते में नहीं है। आत्मकथा लिखते समय वह बहुत गंभीर है और कहता है -‘‘ देखा जाए तो आत्मकथा आत्म में बिंधे लोगों, प्रसंगों और घटनाओं का, अनुभवों, यात्राओं और स्मृतियों का एक सिलसिला है, मगर यह सिलसिला सीधा और सपाट नहीं है।.......आत्म में गहरे गोते लगाने वाला ही आत्म के विस्तार को छू सकता है।’’
नरेन्द्र मोहन अपने इस वक्तव्य पर व्यावहारिक रूप से खरे उतरते हैं। दरअसल, वे भोक्ता और दर्शक का भाव एक साथ लेकर चलते हैं। आत्मकथा के अनेक पृष्ठों पर उनकी अपनी और कुछ अन्य कवि मित्रों की कविताएं गंभीर उपस्थिति दर्ज कराती रहती हैं और लेखक को इस भाव से पकड़े रहती हैं कि तुम मूलतः कवि हो और कविता को मत छोड़ो।
क्या हाल सुनावाँ उन पाठकों या आलोचकों के लिए निराशाजनक है जो चटक साहित्य पढ़ने में विश्वास रखते हैं। स्वाद की तलाश वाले पाठकों के लिए यह लोहे के चने चबाने से कम कतई नहीं है। इसमें साहित्य, समाज, राजनीति, मनुष्य के ओछेपन और गैंगबाजी पर गंभीर किंतु सत्य टिप्पणियां हैं। आसान नहीं है इसके पृष्ठों को पलटते जाना। इसके चरित्र सोचने पर मजबूर करते हैं। भाषा की बात की जाए तो गंभीर थीम के लिए सर्वथा उपयोगी है किंतु कहीं- कहीं ज्यादा ही भारी हो जाती है। अंगरेजी शब्दों को इच्छानुसार ढाल लिया गया है, जो कहीं अच्छे लगते हैं तो कहीं खटकते भी हैं। वस्तुतः लेखक ने आत्मकथा के बहाने अपने देश और काल का गहन सर्वेक्षण किया है और स्व को किसी लेखक के रूप में उंडे़ल दिया है। पुस्तक का भौतिक रूप-रंग आकर्षक है धीरे-धीरे ही सही, यह स्वयं को पढ़वाकर ही दम लेती है बशर्ते आप जीवन में गंभीरता को महत्त्व देते हों।

Sunday, 5 August 2018

Khajuraho

यात्रा वृत्तांत

                        रति का अध्यात्म: खजुराहो

                                              -हरिशंकर राढ़ी

कंदरिया महादेव मंदिर       छाया : हरिशंकर राढ़ी  


यदि किसी को धरती पर कामक्रीडा का सौंदर्य
] वैचारिक खुलापन, शारीरिक सुंदरता के प्रतिमान तथा कलात्मक जीवंतता एक साथ देखनी हो तो उसे खजुराहो की धरती पर एक बार जरूर आना चाहिए। ऐसे मंदिर शायद ही कहीं और हों जहां गर्भगृह में ईश्वरीय सत्ता के दूत] हिंदू मान्यता के कल्याणकारी देव विराजमान हों और दीवारों पर सृश्टि की सुंदरतम रचना नारी के लावण्यमयी अंगों का पुरुष संसर्ग में अनावृत्त चित्रण हो। आज से लगभग एक हजार साल पहले प्रेम, सौंदर्य और संभोग की पूजा करने वाला समाज हमारे इस तथाकथित विकसित समाज से कितना आगे और वैज्ञानिक सोच वाला था] इसका अंदाज खजुराहो की धरती पर फैली विशाल मंदिर शृंखला को देखकर सहज ही हो जाता है। चरित्र, वासना और गोपनीयता के नाम पर मनुष्य अपनी नैसर्गिकता और तार्किक सोच से कितना दूर हो गया है, इसका अनुमान यहीं लगाया जा सकता है। ऐसा भी नहीं है कि आज भी खजुराहो जाने वाला हर भारतीय पर्यटक इन कामक्रीडारत मूर्तियों को देखकर बहुत सहज महसूस करता है या इसे एक विकसित सोच का नमूना मानता है। कुछ लोग अभी भी पूरा भ्रमण किए ही वापस आ जाते हैं। हाँ, विभिन्न रिश्तों से बंधे परिवार का एक साथ यहां जाना असहज कर सकता है, इसलिए बेहतर होगा है कि अपनी वय और स्वीकार्य संबधियों के साथ यहां जाया जाए।


दीवार पर मैथुनरत छवि          छाया : हरिशंकर राढ़ी 
अपने दो मित्रों के साथ मेरा यहाँ सन् 2015 में दो दिन के लिए आना हुआ था। आना तो कुल पांच मित्रों को था किंतु एक मित्र किसी कार्यवश आखिरी वक्त यात्रा निरस्त कर बैठे और एक मित्र ट्रैफिक जाम में फंसने की वजह से दस मिनट देर हो गए और ट्रेन चल पड़ी। उस दिन का जाम हमें  आज भी याद है और हम स्वयं पर्याप्त समय लेकर चलने के बावजूद बीस मिनट पहले स्टेशन पहुंच पाए थे। मित्र के छूट जाने के प्रकरण से कुछ हद तक निराश हम खजुराहो लिंक एक्सप्रेस में चलते गए। उत्तरप्रदेश संपर्क क्रांति एक्सप्रेस में कुछ डिब्बे खजुराहो के लिए जोड़ दिए जाते हैं जो महोबा जंक्शन पर काटकर अलग इंजन से खजुराहो भेज दिए जाते हैं। महोबा दिल्ली जबलपुर रेलमार्ग पर स्थित एक महत्त्वपूर्ण जंक्शन है। यह वही महोबा है जो आल्हा-ऊदल की वीरता और शारीरिक बल के लिए जाना जाता है और जिसके आधार पर आल्हखंड का लोकगीत आल्हा मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के अधिकांश भागों में गाया जाता है।

कंदरिया महादेव मंदिर का  प्रवेश       छाया : हरिशंकर राढ़ी 
खजुराहो रेलवे स्टेशन से खजुराहो मुख्य शहर और पश्चिमी समूह के मंदिर लगभग छह किलोमीटर की दूरी पर हैं। यहां से आॅटोरिक्शा करके हम खजुराहो शहर में पहुंच गए। अगस्त का महीना था और चारो ओर हरियाली बिखरी हुई थी। हल्की-फुल्की बूंदे पड़ रही थीं। रास्ते में खजुराहो विमानतल देखकर खुशी हुई कि दूर से आने वाले सैलानियों को इसका लाभ तो मिलेगा ही, विश्व विरासत खजुराहो को भी इससे पर्यटकों की बढ़ती संख्या मिलेगी। खजुराहो कोई बड़ा शहर नहीं है। यदि मंदिरों को निकाल दिया जाए तो यह एक मध्यम आकार का बाजार है। हाँ, विश्व विरासत होने के कारण यहां होटलों की भरमार है और हवाई अड्डे के आस-पास पांच सितारा होटल भी हैं। हमने आॅटो स्टैंड के पास ही मोल-भाव करक एक मध्य बजट का होटल लिया और तरोताजा होने की तैयारियों में लग गए।

पश्चिमी समूह के मंदिर: नहा-धो लेने और जलपान के बाद हमारा पहला लक्ष्य पश्चिमी समूह के मंदिरों को देखना था क्योंकि वे हमारे होटल से लगभग सटे हुए थे। इस समूह के मंदिर पैदल ही पैदल घूमे जा सकते हैं और यहां के प्रमुख आकर्षण हैं। परिसर में प्रवेश करते ही विस्तृत हरीतिमा के दर्शन होते हैं। एक ही परिसर में दूर-दूर तक फैले अनेक मंदिरों का विहंगम दृश्य मन को मुुग्ध कर लेता है। पश्चिमी समूह में लक्ष्मण मंदिर, कंदरिया महादेव, चित्रगुप्त और विश्वनाथ मंदिर आते हैं जिनमें लक्ष्मण मंदिर तथा कंदरिया महादेव का शिल्प और मैथुनरत युगल या समूह की मूर्तियाँ अद्वितीय हैं।

कंदरिया महादेव मंदिर का एक कलात्मक दृश्य       
लक्ष्मण मंदिर: भगवान विष्णु को समर्पित यह मंदिर जितना विशाल है, उतना ही उत्कृष्ट भी। इस मंदिर का निर्माण चंदेल राजा यशोवर्मन ने 930& 9500 के मध्य करवाया था। ऊँचे चबूतरे पर बने इस विशाल मंदिर का गर्भगृह और शिखर कारीगरी के बेहतर नमूने हैं। चबूतरे की दीवारों पर कामक्रीडारत पुरुषों और स्त्रियों की ऐसी मूर्तियां हैं कि किसी को भी विचलित कर सकती हैं। वात्स्यायन के कामशास्त्र पर आधारित संभोग के विभिन्न आसनों में कहीं प्रेमी युगल तो कहीं समूह में संभोगरत स्त्री-पुरुष शिल्प के अतिरिक्त कुछ पशुओं की मूर्तियां भी बनी हुई हैं। निःसंदेह खजुराहो के मंदिर ऐसे हैं जिनके गर्भगृह में स्थापित देवताओं के विग्रह कामक्रीडा और शारीरिक भूगोल के समक्ष गौड़ हो जाते हैं।

कंदरिया महादेव मंदिर: लक्ष्मण मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित यह मंदिर अपनी वास्तुकला और चित्रात्मकता के लिए जाना जाता है। यह मंदिर आकार में सबसे बड़ा और सुंदर माना जाता है। ऊँचे चबूतरे पर स्थित होने के कारण इसकी सुंदरता और भी बढ़ जाती है। इस मंदिर का निर्माण 1025&10500 के मध्य हुआ था। इसकी दीवारों पर नृत्यमुद्रा में निमग्न सुंदरियों] विभिन्न प्रकार के पशुओं और और काम मुद्राओं का चित्रण मंत्रमुग्ध कर लेता है। जिस प्रकार की सुंदरता और शारीरिक बनावट इन मूर्तियों में छेनी-हथौड़ी से उभारी गई है, वैसी तो कागज के पन्नों पर तूलिका और रंग से भी नहीं उभारी जा सकती। इस मंदिर के देवता भगवान शिव हैं। कंदरिया महादेव मंदिर का शिल्प देखकर जल्दी लौट आना बहुत ही कठिन कार्य होता है।

चित्रगुप्त मंदिर के सामने लेखक    
चित्रगुप्त मंदिर: पश्चिमी समूह के मंदिरों में चित्रगुप्त महत्त्वपूर्ण है। यह एक तरह से प्रांगण के कोने में है और सामने बड़े वृक्ष और हरी घास का मैदान बहुत सुंदर है। यह मंदिर पास में स्थित जगदंबी मंदिर की अनुकृति लगता है। ऊँचे चबूतरे पर स्थित यह मंदिर सूर्यदेव को समर्पित इकलौता मंदिर है। सात घोड़ों के रथ का दृश्य उभारता यह मंदिर हिंदू पौराणिक मान्यताओं को प्रतिबिंबित करता है। इस मंदिर का निर्माण कार्य संभवतः 1020&10250 में हुआ था। दीवारों पर कामुक जोड़ों की आकर्षक मूर्तियाँ मन को बांध लेती हैं। मंदिर का बाहरी हिस्सा और मूर्तियां समय और आक्रमण की मार से कहीं-कहीं क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं किंतु दीवारों पर सुरा- सुंदरी का मोहक रूप अवर्णनीय है। योनिदर्शना अप्सरा अपनी कामुक किंतु संकोची मुद्रा से पर्यटकों को बांध लेती है।

विश्वनाथ मंदिर: चित्रगुप्त मंदिर से कुछ ही दूरी पर स्थित विश्वनाथ मंदिर भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। यह मंदिर स्पश्टतः भगवान शिव को समर्पित है और खजुराहो के मंदिर समूहों में सबसे पुराना माना जाता है। इस मंदिर का निर्माण संभवतः 10020 में राजा धंग ने कराया था और इसे शिव मर्कटेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता था। पंचायतन शैली में निर्मित] परिक्रमा पथ सहित निर्मित सुंदर मंदिर में अब दो ही मंदिर शेष हैं।

जैन मंदिर की भित्ति पर देह सौंदर्य        छाया : हरिशंकर राढ़ी 
जैन मंदिर समूह: खजुराहो के पूर्वी मंदिर समूह में जैन मंदिर समूह बहुत ही आकर्षक और परिमार्जित शैली के हैं। इन मंदिरों की दीवारों पर कामरत युगलों की मूर्तियां बहुत ही सजीव और कामोद्दीपक लगती हैं। आदिनाथ, पार्श्वनाथ और शांतिनाथ मंदिर वास्तुकला और मानवीय रचनात्मकता के जीवंत उदाहरण हैं। पार्श्वनाथ मंदिर दसवीं शताब्दी के मध्य में बना हुआ माना जाता है। आदिनाथ मंदिर ग्यारहवीं सदी में बनाया गया और पश्चिमी समूह के मंदिरों की सुंदरता से मेल खाता है। हाँ, जैन मंदिरों की दीवारों पर बनी नग्न नर्तकियों की शारीरिक भाषा और भी अधिक मोहक है तथा उनकी तन्वंगी काया बेजोड़ है। इन मंदिरों की एक विशेषता यह भी मानी जा सकती है कि यहां मूर्तियां विध्वंसकों के कहर से बची हुई हैं। शिखर तक की गई महीन नक्काशी दर्शकों को बांधने और सोचने पर मजबूर कर देती है।

अन्य मंदिर: सच तो यह है कि खजुराहो में एक बार घूमना शुरू कर दिया जाए तो लगता है कि मंदिरों का अंत ही नहीं होगा। तीनों समूहों में इतने मंदिर हैं कि इनकी संख्या अनंत सी लगती है। वामन मंदिर,चतुर्भुज मंदिर, दूल्हादेव मंदिर और जावेरी मंदिर कहीं से भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं हैं। पुराने खजुराहो गांव में स्थित जावेरी मंदिर और वामन मंदिर प्राचीन स्थापत्य कला और मानवीय संवेदनशीलता की कहानी कहते हैं।

दूसरी ओर दूल्हादेव मंदिर कुल ग्यारह हजार एक शिवलिंगों के लिए जाना जाता है। इस मंदिर में मुख्य शिवलिंग पर ग्यारह हजार शिवलिंग बने हुए हैं और मुख्य शिवलिंग को मिलाकर ग्यारह हजार एक शिवलिंग बनते हैं। यह मंदिर आस्था का भी केंद्र है और स्थानीय भक्त यहां पूजा-अर्चना करने आते हैं। प्रदक्षिणा पथ काफी बड़ा है। ऊँचाई पर स्थित इस मंदिर के सामने एक बड़ा उद्यान भी है और मानसून काल में यहां हरियाली का साम्राज्य होता है। संभवतः बारहवीं सदी में बना यह मंदिर भी कामक्रीडारत युगलों और युवतियों के आकर्शक नग्न शरीर का चित्रण बहुत खूबसूरती से करता है। इस समूह के मंदिरों की बात होगी तो वामन मंदिर और वाराह मंदिर का भी जिक्र होगा। सच तो यह है कि खजुराहो के मंदिरों को देखकर जी नहीं भरता और आश्चर्य होता है कि कामकला, रतिक्रीडा और नारी देह के नाम पर आज इक्कीसवीं सदी में भी नाक-भौं सिकोड़ने वाले भारतीय समाज में आज से एक हजार वर्श पूर्व कितना खुलापन रहा होगा कि ऐसे मंदिरों का निर्माण किया गया। निःसंदेह वह काल कुंठाग्रस्त और पाखंडी नैतिकता का युग नहीं था। जो सच था, उसे पूरी सुंदरता के साथ स्वीकारा गया। हाँ] दुख होता है जब मुख्यतः पश्चिमी समूह की सुंदर मूर्तियों को खंडित रूप में देखना पड़ता है और अफसोस होता है उन जाहिल मुगल बादशाहों पर जिन्हें कला का ककहरा भी पता नहीं था और सार्वदेशिक - सार्वकालिक कामक्रीडा जैसे प्राकृतिक कर्म को हेय मानकर मूर्तियों को भंजित करवा दिया। किसी समय कुल बीस वर्ग किलोमीटर में फैले 85 से अधिक मंदिरों में अब केवल छह वर्ग किलोमीटर में लगभग 25 मंदिर ही शेष हैं।

पश्चिमी और दक्षिणी समूह के मंदिरों तक जाने के लिए आटो रिक्शा या कैब की आवश्यकता होती है। ये मंदिर बहुत अधिक दूरी पर तो नहीं हैं किंतु पैदल जा पाने में समय का अपव्यय होना ही है।

रने प्रपात: मंदिरों के अतिरिक्त भी खजुराहो के पास घूमने के लिए बहुत कुछ है। खजुराहो में हमें पूरे दो दिन रुकना था और पहले दिन हम वहां सुबह ही पहुंच गए थे। पहले से जुटाई गई जानकारी और नियोजन के अनुसार उस दिन दोपहर तक हमने पश्चिमी समूह के मंदिरों का भ्रमण, दर्शन और मनन किया। पूर्वी और दक्षिणी समूह के मंदिरों के लिए हमने अगला दिन सुरक्षित रखा और शाम को केन नदी पर स्थित रने प्रपात देखने का निश्चय किया।

     रने  प्रपात के दृश्य         छाया : हरिशंकर राढ़ी 
 रने  प्रपात के सम्मुख 
दरअसल हम इस मामले में भाग्यशाली थे कि हमने अपने भ्रमण का समय अगस्त माह में रखा था जो वर्षाकाल का चरम होता है। मध्यप्रदेश की अधिकांश नदियां सदानीरा नहीं हैं। वर्षाऋतु में ही इन पर यौवन आता है और इनके झरने हंसते हंैं। रने प्रपात खजुराहो से बीस किलोमीटर की दूरी पर छतरपुर जनपद में स्थित है। यह घड़ियाल अभयारण्य के निकट केन तथा खुदार नदियों के संगम पर स्थित है। केन तो एक बड़ी और चैड़ी नदी है किंतु मानसून के अतिरिक्त अन्य ऋतुओं में गरीब ही रहती है। यहां लगभग पांच किलोमीटर की लंबाई और तीस मीटर की चैड़ाई में गहरे गर्त का निर्माण करती केन नदी बहुत सुंदर दिखती है। नदी के उस पार दूर-दूर तक हरीतिमा फैली हुई दिखती है और लगता है कि वह हर दर्शक को अपने अज्ञात में बुला रही है। रने फाॅल जाने के लिए हमने एक आॅटोरिक्शा तय कर लिया था जो मध्यप्रदेश की संकरी और उबड़ -खाबड़ सड़क से गुजरता हुआ लगभग एक घंटे मंे पहुंच गया था। प्रवेशद्वार पर औपचारिकता एवं शुल्क भुगतान कर हम घड़ियाल अभयारण्य में प्रवेश कर गए। कुछ ही दूर जाने पर केन की धारा अनेक धाराओं में विभक्त होती हुई अति रोमांचक और सुंदर दृश्य प्रस्तुत करती हुई दिख गई। वास्तव में एक सम्मोहक वातावरण था। संध्या ज्यों -ज्यों निकट आ रही थी, प्रपात का सौंदर्य तथा रोमांच बढ़ता जा रहा था। दर्शकों की भीड़ लगी हुई थी। प्रपात की दहाड़, संगीत और नृत्य एक साथ न जाने कितनी भावनाएं हमारे मन में भर रहा था। दृश्य के लिए क्या कहा जाए - गिरा अनयन नयन बिनु बानी। ऊपर से नीचे गिरने के बाद धारा का प्रवाह भीम रूप धारण कर रहा था। यह सब देखते-देखते वापसी का समय आ गया। आखिर बीस किलोमीटर उसी 'राजपथसे जाना था जिससे हिचकोले खाते आए थे। अभयारण्य मानसून में बंद रहता है। बादल घिर आए थे और फिर बारिश भी इतनी जोर की हुई कि दिखना असंभव सा हो गया।

खजुराहो भ्रमण - कब और कैसे: बढती हुई पर्यटन प्रवृत्ति से खजुराहो जैसे छोटे से कस्बे तक पहुंचना बहुत आसान हो गया है। खजुराहो के मंदिर यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत घोषित किए जाने के बाद यहां पर्यटन और तद्जन्य सुविधाओं में विकास हुआ है। खजुराहो तो अभी भी एक छोटा सा बाजार है किंतु यहां पांच सितारा से लेकर मितव्ययी होटलों की संख्या में वृद्धि हुई है। यहां वायु, रेल और सड़क मार्ग से आसानी से पहुंचा  जा सकता है। खजुराहो का अपना हवाई अड्डा है जहां दिल्ली और वाराणसी से विमान सेवा उपलब्ध है। शीघ्र ही अन्य महानगरों से विमान सेवा का विस्तार हो सकता है। खजुराहो में रेलवे स्टेशन भी है जो मुख्य बाजार से लगभग चार - पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां के लिए महोबा जंक्शन से लिंक गाड़ियां चलती हैं और महोबा झांसी - जबलपुर मुख्य रेल मार्ग पर स्थित है। दिल्ली से यहां के लिए उत्तर प्रदेश संपर्क क्रांति के कुछ डिब्बे कटकर जाते हैं।

खजुराहो के लिए सर्वोत्तम समय अक्टूबर से मार्च है जो कि अधिकांश भारतीय पर्यटन स्थलों के लिए उचित माना जाता है। मानसून में भी जा सकते हैं किन्तु तब यहां उमस कुछ अधिक ही रहती है। हाँ, ग्रीष्म ऋतु में न जाएं तो बेहतर है क्योंकि तापमान कुछ असहनीय ही रहता है। ठहरने के लिए छोटे से लेकर अच्छे होटल उपलब्ध हैं और भोजन के लिए अनेक होटल, ढाबे और रेस्तरां हैं। हाँ, यदि एक रात और दो दिन का कार्यक्रम बनाया जाए तो बहुत ही अच्छा रहेगा। वैसे समयाभाव हो तो एक दिन में भी घूमा जा सकता है।




पश्चिमी समूह के मंदिरों में प्रवेश के लिए मुख्य द्वार पर टिकट लेना पड़ता है। सामान्य भारतीय पर्यटक के लिए यह शुल्क दस रुपये है जबकि विदेशियों के लिए अधिक है। फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के लिए भारतीयों से 25 रु बतौर शुल्क वसूला जाता है जो बहुत पीड़ादायक नहीं लगता। पश्चिमी समूह के अतिरिक्त मंदिर खुले ही रहते हैं और किसी प्रकार का शुल्क देय नहीं होता।

Monday, 30 July 2018

आख़िर कब तक और क्यों ढोएँ हम?


हमारी अपनी ही आबादी 134 करोड़ पार कर चुकी है. यह रुकने का नाम नहीं ले रही है. घटने की तो बात ही बेमानी है.

यह बढ़ती आबादी हमारे लिए एक बड़ी मुसीबत है. वे लोग जो आबादी को ह्यूमन रिसोर्स और इस नाते से लायबिलिटी के बजाय असेट मानने की दृष्टि अपनाने की बात करते हैं, जब इस ह्यूमन रिसोर्स के यूटिलाइज़ेशन की बात आती है तो केवल कुछ सिद्धांत बघारने के अलावा कुछ और कर नहीं पाते. दुनिया जानती है कि ये सिद्धांत कागद की लेखी के अलावा कुछ और हैं नहीं और कागद के लेखी से कुछ होने वाला नहीं है.


ये कागद की लेखी वैसे ही है जैसे किसी भी सरकार के आँकड़े. जिनका ज़मीनी हक़ीक़त से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं होता. आँखिन की देखी के पैमान पर इन्हें कसा जाए तो ये प्रायः झूठ और उलझनों के पुलिंदे साबित होते हैं.

इस बढ़ती आबादी से पैदा होने वाली उलझनों की हक़ीक़त ये है कि देश में बहुत बड़ी आबादी या तो बेरोज़गारी की शिकार है या फिर अपनी काबिलीयत से कमतर मज़दूरी पर कमतर रोज़गार के लिए मजबूर. इस आबादी में हम और आबादी जोड़ते जा रहे हैं. नए-नए शरणार्थियों का आयात कर रहे हैं. दुनिया भर के टुच्चे नियम-क़ानून और बेसिर-पैर का हवाला देते हुए.

ये हवाले देखें तो ऐसा लगता है गोया वसुधैव कुटुंबकम का ठेका हमारे बुद्धिजीवियों और कुछ राजनेताओं ने ही ले रखा है. हक़ीक़त ये है कि इनका वसुधैव कुटंबकम भी वह सूत्र नहीं है जो महोपनिषद में आया है, यह तो इसका वैसे ही इस्तेमाल कर रहे हैं जैसे पंचतंत्र के सियार ने बैल पर किया.

देश और देश की जनता से इनकी कितनी सहानुभूति है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगा सकते हैं कि देश में जाति-धर्म की सारी आग उनकी लगाई हुई है जो ख़ुद सेकुलरिज़्म का सबसे बड़ा ठेकेदार बताते नहीं अघाते. ये सिद्धांत भी इनके लिए अपना वोटबैंक बढ़ाने के अलावा कुछ नहीं है.

जिन लोगों की भावनाएँ भड़काकर ये बंग्लादेशियों और रोहिंग्याओं को यहाँ बसाने के लिए मरे जाते हैं, हक़ीक़त ये है कि ये अवैध प्रवासी उनकी ही रोज़ी-रोटी के लिए ख़तरा बनते हैं. उनके ही लिए रोज़गार का संकट पैदा करते हैं. क्योंकि दूसरे देश से अवैध रूप से आकर बसे आदमी के सामने सबसे पहला संकट अपने लिए रोटी के जुगाड़ का होता है. ऐसे में उसे अपने श्रम का जो भी मूल्य मिलता है, वह उसी पर काम करने के लिए राज़ी हो जाता है.

इसका भरपूर फ़ायदा उठाता है क्रोनी कैपिटलिज़्म और उसके इस फ़ायदे के लिए मानवाधिकारों के चैंपियनशिप की बहानेबाज़ी करते हैं हमारे उदारचेता लोग. इनकी सारी उदारता का कुल लाभ किसे मिलता है, इस पर हम ग़ौर ही नहीं कर पाते.

एक बार इस पर ज़रा ग़ौर से देखिए. ये जो बांग्लादेश और म्यांमार से आए हुए अवैध प्रवासी हैं, जो किसी भी हाल में जीने के लिए राजी हैं, ये यहाँ आकर करते क्या हैं? या तो असंगठित क्षेत्र के वे काम जिनमें हमारे देश की बहुत बड़ी ग़रीब आबादी लगी हुई है. या फिर चोरी-डकैती. दोनों ही स्थितियों में शिकार हमारा ग़रीब और मध्यवर्ग ही होता है. क्योंकि चोरी डकैती भी कोई उनके घर नहीं कर सकता जो सात पहरों में रहते हैं.

ये सेकुलरिज़्म और सामाजिक न्याय के बड़े-बड़े दावे करने वाले बुद्धिजीवी और नेता धर्म और जाति के आधार पर ही इन्हें यहाँ अपना पाहुन बनाने के लिए जनमत तैयार करते हैं. जबकि हक़ीक़त ये है कि ये अपने लिए सिर्फ़ वोटबैंक तैयार करते हैं और उसके मार्फ़त बड़े-बड़े पूँजीपतियों के लिए सस्ते, लगभग मुफ़्त के मज़दूर.

इनसे पूछा जाना चाहिए कि जिनके रोज़गार ये खाते हैं और जिनके पेट पर ये लात मारते हैं, वे कौन हैं. पहले से भारत में रह रहे हिंदू-मुसलमान और ईसाइयों के ग़रीब तबके. आप चाहे पिछड़े कह लें या दलित. जब स्वार्थों के टकराव की बात आती है तो ये हिंदू को मुसलमान से, दलित को सवर्ण से और पिछड़े को दलित से भिड़ाकर चैन की बंशी बजाते हैं.

अपने लिए वोटबैंक साधते हैं और क्रोनी कैपिटलिज़्म के लिए मुफ़्त के मज़दूर तैयार कर देते हैं. बड़े-बड़े मनीषियों के सारे सिद्धांत एक किनारे चले जाते हैं. आप जब इन पर सवाल उठाते हैं तो प्रतिक्रियावादी, सांप्रदायिक, संशोधनवादी और पिछड़ी सोच वाले करार दे दिए जाते हैं. चूँकि आपके ज़मीनी सवालों का इनके पास कोई हल नहीं है, लिहाज़ा इकलौता रास्ता यही है कि आपको भरमाया जाए. बेवजह नीचा दिखाया जाए. उनका अपराध आपके सिर थोपा जाए और अंततः कन्नी काटी जाए.

आख़िर कब तक? और क्यों ढोएँ हम?

Saturday, 28 July 2018

कश्मीर की आवाज़


जिस कश्मीर को आप केवल आतंकवादियों की सहायता में पत्थरबाजी के लिए जानते हैं, वहाँ ऐसे लोग भी हैं जो आतंकवादियों के छक्के छुड़ाने का हौसला रखते हैं. बल्कि ऐसे लोगों की तादाद ज़्यादा है. और ये वही लोग हैं जो ख़ुद भारतीय मानते हैं और जमू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग.


हुआ बस यह था कि इनकी आवाज़ दबा दी गई थी. यह दबाने का काम किसी और ने नहीं, शेख़ अब्दुल्ला के शासन ने किया था. ख़ुद नेहरूजी ने महसूस किया अब्दुल्ला का साथ देकर उन्होंने ग़लती कर दी. लेकिन जब उन्होंने महसूस किया तब तक पानी सिर से गुज़र चुका था.

अगस्त 1953 में जब उसकी पहली गिरफ़्तारी की गई तब तक वह अपने गुर्गे पूरे कश्मीर में फैला चुका था और उन्हें अपना शासन रहते बहुत मजबूत कर चुका था.

इसके पहले वह विलय के पक्ष में आंदोलन करने वाले तमाम हिंदुओं और मुसलमानों पर बेइंतहां जुल्म ढा चुका था. जेल में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की जान ले चुका था. कई और लोगों की जान जेल से बाहर ले चुका था. लिहाजा उसका और उसके गुर्गों का ख़ौफ़ लोगों पर क़ायम रहा.

पाकिस्तान से भेजे गए गुर्गों को भी वह जगह-जगह स्थापित कर चुका था. इनसे मिलकर उसके गुर्गे अपना काम कर रहे थे. आमजन को डरा-धमका रहे थे और उसे पाकिस्तानपरस्त बना रहे थे. उसी पाकिस्तान के पक्ष में जो अब्दुल्ला को स्वायत्तता के मुद्दे पर कुत्ते की तरह दुरदुरा चुका था और वह अपना सा मुँह लेकर लौट आया था.

लेकिन कश्मीर पर क़ब्ज़ा तो उसे चाहिए था और इसके लिए उसने अब्दुल्ला को हरसंभव सहायता जारी रखी. जो वास्तव में अब्दुल्ला को उसकी सहायता नहीं, बल्कि पाकिस्तान द्वारा अपने हित में अब्दुल्ला का इस्तेमाल था. अब्दुल्ला इसमें इस कदर मशगूल हुआ कि उसने सारे कश्मीरियों की आवाज़ सिर्फ़ दबा नहीं दी, बल्कि बदल दी. उन्हें अपनी बात बोलने के लिए मजबूर किया.

मजबूरी में उन्होंने सिर्फ़ बोला ही नहीं, वह सब किया भी जो अब्दुल्ला और उसके परवर्तियों ने चाहा. चूँकि भारत सरकार ने इस पर कभी कोई प्रभावी लगाम नहीं लगाया तो उसका और उसके जैसे दूसरे अलगाववादियों का मन बढ़ता ही गया. इसी क्रम में कश्मीरी पंडितों की सबसे बीभत्स मॉब लिंचिंग हुई. जिसे तब के अखबारों-चैनलों में से किसी ने मॉब लिंचिंग नहीं कहा.

तब शायद उनके पास यह शब्द था नहीं. असल में उन्हें किसी नए पवित्र शब्द की जरूरत तभी पड़ती है जब किसी वास्तविक अपराधी के ख़िलाफ़ निर्दोष आमजन कोई क़दम उठाता है. इसका अंदाजा आप आसानी से लगा सकते हैं इन दिनों देश के कुछ अंग्रेजी अखबारों की हेडलाइन-फोटो-कार्टून प्रोपगंडा नीति से.

आपको यह ख़बर बहुत कम अख़बारों में दिखी होगी और दिखी भी होगी तो किसी कोने में. ख़बर यह है कि बैंक लूटने आए आतंकवादियों को आमजन ने मार भगाया. हालांकि इस घटना में कुछ लोग घायल भी हो गए, लेकिन उन्होंने जिस साहस का परिचय दिया, यह वे पहले नहीं कर सकते थे.

आज कर पा रहे हैं, यह बड़ी बात है. यह एक बड़ा परिवर्तन है. तैयार रहें, हो सकता है कि आने वाले दिनों में लोग ऐसे ही आतंकवादियों को धरना-दबोचना और उनकी ही भाषा में उनके कृत्यों का जवाब देना शुरू करें. अफजल की मौत पर शर्मिंदा बुद्धिजीवी और अख़बार तब शायद इसे भी मॉब लिंचिंग का नाम देंगे.

शुरुआत हो गई है तो दूर तलक जाएगी. बहरहाल मेरी राय कि खूंखार आतंकियों का सामना करने वाले इन आम नागरिकों और गार्ड को पुरस्कृत किया जाना चाहिए.


आपकी भूख का फुटबॉल

जिन राजनेताओं को लेकर आप बहुत गंभीर होते हैं, अपने दोस्तों-परिजनों से लेकर अजनबियों तक से भिड़ जाते हैं; कभी ग़ौर किया है कि वे आपको लेकर कितने गंभीर हैं?

नहीं किया है तो अबसे करें.

जब आप भूख से मरते हैं तो वे आपके मरने को मुद्दा बनाते हैं. और मुद्दा वे उसी चीज़ को बनाते हैं, जिसे भुना सकें. भुना सकें, यानी जिससे ख़ुद फ़ायदा उठा सकें. फ़ायदा उठा सकें यानी व्यापार कर सकें.
तो वे आपके भूख से मरने का भी व्यापार करते हैं.

और इस व्यापार में वे आपकी भूख को फुटबॉल बना लेते हैं. यानी एक आपकी भूख को लात मार कर दूसरे के पाले में फेंकता है. और फिर दूसरा भी उसके साथ यही सलूक करता है. सब यही कहते हैं -- नहीं नहीं, मेरे नहीं, उसके चलते हुई है तेरी मौत. तेरी भूख की वजह मैं नहीं बे, वो है.

पूरी ईमानदारी से सभी यही करते हैं. वो भी जो आप पर रोज़ किरपा की बारिश करते रहते हैं. इतनी बारिश कि जितनी कोई बाबा भी न कर सके. और वो भी जो आपको दुनिया भर के पाठ पढ़ाते हैं.

कोशिश सबकी यही है कि आप कभी इस लायक होने ही न पाएँ कि उनकी किरपा से बाहर निकल जाएँ. उनके होने का तो सारा मज़ा ही बस तभी तक है जब तक कि आप उनकी किरपा के दायरे में बने रहें.

आपकी रोटी ही नहीं, आपका स्वाभिमान, आपकी सभ्यता, आपकी संस्कृति, आपका विचार... कुछ भी, उनके लिए फुटबॉल से ज़्यादा कुछ नहीं है.

इस पूरे उपक्रम में आपके और नेता के बीच बुद्धिजीवी आते हैं. बिलकुल वैसे ही जैसे कौड़े पर आलू भूनते वक़्त आपके और आलू के बीच लकड़ी आती है.

ये लकड़ी किसके इशारे पर और कैसे काम करती है, आप जानते हैं. कैंब्रिज एनलिटिका की लिस्ट आपने हाल ही में देखी है. इसके पहले कई और लिस्टें बिना प्रकाश में आए अपना काम कर चुकी हैं.

जब तक आप नेता और लकड़ी से समझते रहेंगे, आप फुटबॉल बने रहेंगे. इनमें से कोई भी आपको कभी भी वह नहीं समझाएगा जो आपको समझना चाहिए. क्योंकि इसे तो आपकी भूख बेचनी है. आपकी शर्म बेचनी है. आपका स्वाभिमान, आपकी सभ्यता, आपकी संस्कृति बेचनी है.

जब तक आप इनकी समझाइश पर समझते रहेंगे, फुटबॉल ही बने रहेंगे.

यह आपको तय करना होगा कि आप उनके फुटबॉल बने रहना चाहते हैं, या फिर आप बनना चाहते हैं.