Thursday, 30 June 2016

Azamgarh ke Bhairv Baba (Part-2)

आजमगढ़ के भैरो बाबा   ( भाग - 2)

                                            -हरिशंकर राढ़ी

पिछले सप्ताह भैरो बाबा के इस स्थान पर जाने का पुनः अवसर मिला। कुछ विशेष परिवर्तन तो होना नहीं था इस बीच। हाँ, पिछले लेख में कुछ छूट अवश्य गया था जिसे पूरा करने का खयाल मन में बैठा था। दशहरे का प्रसिद्ध मेला समाप्त हो रहा था। झूले और सर्कस वाले अपना डेरा-डम्पा हटा रहे थे। खजले की दुकानें अभी भी थीं, उनकी संख्या अब कम हो चली थी। दिन मंगलवार था नहीं और सुबह का समय था, इसलिएइक्का - दुक्का दर्शनार्थी आ रहे थे। मंदिर परिसर में प्रवेश करने पर एक सुखद आश्चर्य हुआ कि गर्भगृह में इस बार पंक्तिबद्धता के लिए बैरीकेड लग गए हैं जो अपार भीड़ में थोड़ा -बहुत तो काम करते ही होंगे। मंदिर का परिक्रमा पथ कीचड़ और फिसलन से लथपथ था। रात में बारिश हुई थी और सफाई करे तो कौन ?

भैरव  मंदिर का एक दृश्य            छाया : हरिशंकर राढ़ी 

रोजगार की तलाश और भौतिकवाद ने सुविधाओं की बढ़ोतरी की है। मुझे याद है कि मेरे बचपन में यहां केवल मंगलवार को ही पूजा-प्रसाद यानी कि फूल-माला और बताशे की दुकानें लगती थीं। बाकी किसी दिन आइए तो आपका सामना केवल लाल बंदरों से होता था। बंदरों की एक विशाल फौज इस पेड़ से उस पेड़ तक भाग-दौड़ किया करती थी। इनके उत्पात से दर्शनार्थी परेशान होते रहते थे। यह बात अलग है कि मनोरंजन के घोर अभाव के उस युग में ये मनोरंजन के निःशुल्क साधन होते थे। प्रसाद और  कड़ाही चढ़ाना मुश्किल होता था। लगभग पंद्रह साल पहले एक लंगूर आया और उसने लाल बंदरो की पूरी सेना को न जाने किस देश भगा दिया। आज भैरोजी के स्थान पर एक भी बंदर नहीं दिखता और स्थानीय लोग बंदरों की कमी महसूस करते हैं। सच यह है कि बंदरों के गायब होने की कमी खलती सी है।            

अब यहां फूल-बताशे की चार-पांच दूकानें हर दिन खुली मिल जाती हैं। मंगलवार को इनकी संख्या 25-30 से कम नहीं होती। बगल से महराजगंज- राजेसुल्तान पुर मार्ग निकलता है। घाघरा नदी पर बिड़हर घाट सेतु बन जाने से वाया जहांगीरगंज इस मार्ग का संपर्क गोरखपुर से हो गया है। अब कुछ प्राइवेट बसें भी इस मार्ग से चलने लगी हैं। पूरा देवारा क्षेत्र (छोटी सरयू से उत्तर घाघरा नदी तक का क्षेत्र यहां देवारा के नाम से जाना जाता है क्योंकि आजादी के बाद तक यह घाघरा का बाढ़ क्षेत्र था) अब सड़कों के जाल से जुड़ गया है। फलस्वरूप दर्शनार्थियों का आना-जाना लगा ही रहता है और कुछ लोगों की जीविका चलती रहती है।
हनुमान  मंदिर का एक दृश्य            छाया : हरिशंकर राढ़ी 


इसमें संदेह नहीं कि इस ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल के बहुत से रहस्य समय के गर्भ में दबे रह गए जिनके उद्घाटित होने की संभावनाएं न के बराबर बची हैं। मुझे याद है कि मंदिर के आस-पास कई ऊंचे-ऊंचे टीले थे जिनके गर्भ में कुछ न कुछ छिपा जरूर था। हो सकता है कि कोई छोटा महल या अन्य महत्त्वपूर्ण भवन रहा हो। सन् 1990 के आस-पास उन टीलों को समतल करके उस पर एक बड़ा राजकीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोल दिया गया। सरकारी अस्पतालांे का क्या हाल है, यह किसी से छिपा नहीं है। पहले उसी जगह पर दशहरे के मेले के सर्कस और कठपुतली के नाच होते थे। उन टीलों के नीचे क्या छिपा रह गया, अब यह रहस्य ही रह जाएगा।
छोटी सरयू के किनारे एक छोटा सा सतत प्रवहमान जलस्रोत था। उसमें से जल की धारा लगातार बहती रहती थी। मेरी किशोरावस्था में यह स्रोत पतली उंगली के बराबर मोटा था। भैरव बाबा पर मेरे पिछले लेख की चर्चा चली तो राढ़ी का पूरा (विशुनपुर) के श्री त्रिलोकीनाथ मिश्र ने बताया कि उनकी किशोरावस्था यह जलस्रोत काफी मोटी धारा के रूप में था। श्री मिश्र जी कौड़िया इंटर काॅलेज के प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हैं और उनकी उम्र 70 वर्ष से अधिक होगी। आप एक बहुत अध्ययनशील, आध्यात्मिक प्रवृत्ति विद्वान और सम्मानित व्यक्ति हैं। अतः उनकी बात  पर विश्वास न करने का कोई कारण तो नहीं दिखता। देख तो नहीं पाया, सुना है कि वह जलस्रोत अब पाट दिया गया है क्योंकि भौतिक विस्तार तो होना ही है।

क्षेत्र के तमाम उम्रदराज लोग बदलती परंपराओं और मूल्यों का दर्द लेकर जी रहे हैं। उन्होंने भैरो जी और उस क्षेत्र का गौरवशाली इतिहास देखा है, इतिहास को बदलते देखा है।  स्वाधाीनता संग्राम में भी इसके आस-पास लोग इकट्ठा होते थे और अंगरेज सरकार के खिलाफ जनसभाएं होती थीं। वह युग स्वानुशासन और नैतिकता का था। आधा पेट खाकर भी लोग मूल्यों की रक्षा करते थे। भैरो जी स्थित मिडिल स्कूल सत्तर से ऊपर की उम्र के सभी क्षेत्रीय शिक्षितों के लिए एक गर्व का संस्थान है। केवल आवश्यक योग्यता वाले अध्यापकों ने शि़क्षा का आदर्श कायम कर रखा था। भले ही वे अध्यापक आज के शि़क्षकों की भांति उच्च डिग्री प्राप्त नहीं थे, पर उनका नैतिक स्तर, समर्पण और निष्ठा अतुलनीय थी जिसके दम पर अभाव में जी रहे शिक्षक और शिक्षार्थी प्रतिमान बनाते थे। जो कुछ भी था, ईमान आधारित था और शिक्षण एक पेशा नहीं, अपितु एक पुनीत कर्तव्य था।
समय के साथ सरकारी विद्यालयों ने अपना महत्त्व और सम्मान खोया है। शिक्षकों की उदासीनता, समाज का पश्चिमीकरण, शिक्षा का व्यवसायीकरण और निजी विद्यालयों की चोंचलेाबाजी तथा सरकार की जड़ के बजाय पत्ते सींचने की प्रवृत्ति ने सरकारी विद्यालयों को सफेद हाथी बनाकर रख छोड़ा है। अब वहां का मुख्य कार्य मध्याह्न भोजन बांटना और निःशुल्क सुविधाएं पहुंचाना है। फलस्वरूप सरकारी विद्यालय अपने वर्तमान को अतीत के रूप  में जी रहे हैं। भैरोजी का यह मिडिल स्कूल भी दुर्दिन को प्राप्त हो चुका है। क्षेत्र में कुकुरमुत्तों की भांति अनेक निजी विद्यालय खुल गए हैं जिनमें अप्रशिक्षित अयोग्य अध्यापक बेरोजगारी की मार झेलते हुए दिहाड़ी मजदूरों से भी कम वेतन पर शिक्षा बंाटने का प्रयास कर रहे हैं और पुरानी पीढ़ी सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा पर आंसू बहा रही है।
आजमगढ़ या महराजगंज तो क्या, पूरा पूर्वी उत्तर प्रदेश सरकारी उदासीनता का शिकार रहा है। इस क्षेत्र से कई बड़े नेता और मंत्री सरकारों से जुड़े किंतु विकास के नाम पर उतना ही हुआ जितना किसी अनाथ क्षेत्र का होता है। आजमगढ़ और गोरखपुर की भौगोलिक सीमा का निर्धारण घाघरा नदी करती है जो लंबाई को छोड़ दे ंतो गंगा से किसी भी रूप में कम नहीं है। इसकी चैड़ाई, जल प्रवाह और जल विस्तार क्षेत्र प्रायः गंगा को  मात दे देता है। ऊपर से सरयू से इसका मिलना इसे पवित्रता प्रदान करता है। उल्लेखनीय है कि घाघरा नदी को सरयू के नाम से भी जाना जाता है और लोक आस्था में यह बहुत पुनीत नदी है। अयोध्या को पवित्र करती और राम जन्म भूमि से पवित्र होती यह नदी आज भी सर्वाधिक प्रदूषणमुक्त है और इसका जल किसी भी सदानीरा से शुद्ध है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में भगवान राम के मुख से इसकी प्रशंसा कराई है-
 जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि । उत्तर दिशि बह सरयू पावनि ।।
बिड़हर घाट  के  घाघरा पुल  पर लेखक                 छाया : शशि मिश्रा 
किंतु भैरोजी से उत्तर देवारा क्षेत्र के निवासियों को घाघरा पार करना सदैव एक चुनौती रहा है। मानसून सीजन में इस नदी का पाट चार-पांच किमी से भी अधिक हो जाता है और ऐसी स्थिति में इसे नाव से पार करना जान पर खेलने से कम नहीं होता। आश्चर्य जनक बात है कि शायद यही नदी होगी जिसपर दो सौ किमी के बीच में कोई पुल नहीं था। अभी कुछ साल पहले फैजाबाद में स्थित घाघरा पुल से पूरब चलने पर दोहरीघाट-बड़हलगंज में ही दूसरा पुल मिलता था। तब दोहरीघाट आजमगढ़ जनपद में था किंतु आज मऊ का हिस्सा है। दोहरीघाट पुल सन 1972 के आसपास तैयार हुआ था और गोरखपुर आजमगढ़ - इलाहाबाद मार्ग से सीधा  जुड़ पाया था। लगभग दो साल पहले जनपद अंबेडकरनगर में बिड़हरघाट पुल बन कर तैयार हुआ तो लोगों को लगा कि दूरी कम भी हो सकती है। हाँ, भैरोजी से लगभग 15 किमी की दूरी पर घाघरा नदी पर बन रहा कम्हरियाघाट पुल तैयार हो जाने पर स्थिति बदलने की उम्मीद की जा सकती है।

Saturday, 28 May 2016

Bhairo Baba :Azamgarh ke

स्थानीय आस्था के केंद्र : आजमगढ़ के भैरव बाबा

                                                                         -हरिशंकर राढ़ी

आस्था तो  बस आस्था ही होती है, न उसके पीछे कोई तर्क और  न सिद्धांत। भारत जैसे धर्म और आस्था प्रधान देश में आस्था के प्रतीक कदम-दर कदम बिखरे मिल जाते हैं। यह आवश्यक भी है। जब आदमी आदमी और प्रकृति के प्रकोपों से आहत होकर टूट रहा होता है, उसका विश्वास और साहस बिखर रहा होता है तो वह आस्था के इन्हीं केंद्रों से संजीवनी प्राप्त करता है और अपने बिगड़े समय को साध लेता है। भारत की विशाल जनसंख्या को यदि कहीं से संबल मिलता है तो आस्था के इन केंद्रों से ही मिलता है। तर्कशास्त्र कितना भी सही हो, इतने व्यापक स्तर पर वह किसी का सहारा नहीं बन सकता !
भैरव बाबा मंदिर का शिखर : छाया - हरिशंकर राढ़ी

 ऐसे ही आस्था का एक केंद्र उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद में महराजगंज बाजार स्थित भैरव बाबा का विशाल एवं अति प्राचीन मंदिर है। प्रशासनिक स्तर पर महराजगंज ब्लॉक भले ही विख्यात हो, भैरव जी की महत्ता और लोकप्रियता दूर-दूर तक फैली है। श्रद्धा और आस्था की दृष्टि से महराजगंज भैरव बाबा के अस्तित्व के कारण जाना जाता है, न कि महराजगंज के कारण भैरव जी को।

भैरव बाबा का यह मंदिर पचास किलोमीटर की परिधि से श्रद्धालुओं को सामान्य दर्शन के लिए खींचा करता है किंतु विशेष मेलों और मनौतियों की दृष्टि से यह आसपास के कई जिलों तक आकर्षण और श्रद्धा का केंद्र है। मनौतियां पूरी होने पर, मुंडन और जनेऊ संस्कार के लिए गोरखपुर, मऊ, बलिया, गाजीपुर, बनारस, जौनपुर और फैजाबाद तक के लोग आया करते हैं। ज्येष्ठ मास के गंगा दशहरा पर लगने वाले सप्ताह भर के मेले में लाखों श्रद्धालुओं का आगमन होता है।

भैरव बाबा का यह मंदिर निस्संदेह बहुत प्राचीन है। इसकी उत्पत्ति के विषय में किंवदंतियां और जनश्रुतियां पौराणिक काल तक ले जाती हैं। सामान्यतः माना यह जाता है कि दक्षिणमुखी ये काल भैरव भगवान शिव के उन गणों के प्रमुख हैं जिन्होंने राजा दक्ष का यज्ञ विध्वंश किया था। यह कथा लगभग हर हिंदू को मालूम है कि राजा दक्ष ने एक यज्ञ किया था जिसमें उन्होंने अपनी पुत्री पार्वती और दामाद शिव को नहीं आमंत्रित किया था। कारण यह था कि वे शिव के अवधूत स्वभाव से चिढ़े हुए थे। पार्वती अनामंत्रित ही पिता के यज्ञ में गई और पति का अपमान देखकर भस्म हो गईं। तब भगवान शिव ने भयंकर क्रोध किया और काल भैरव को आदेश दिया कि वे राजा दक्ष का यज्ञ विध्वंश कर दें। यज्ञ विध्वंश के बाद काल भैरव दक्षिणाभिमुखी होकर यहीं बैठ गए और तबसे यह स्थान भैरव बाबा के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
अतृप्त हवन कुंड  : छाया - हरिशंकर राढ़ी

भैरव जी के इस क्षेत्र में इस कथा का प्रतिवाद करने वाला कोई नहीं है। यह सर्वमान्य हो चुका है कि राजा दक्ष का यज्ञ यहीं हुआ था। मेरे पैत्रिक निवास से इस स्थान की दूरी तीन किलोमीटर से कम है और पहले मुझे भी इस कथा का स्थल यही होने में कोई संदेह नहीं था। िंकंतु यज्ञस्थल यही था, ऐसा मान लेना पूरी तरह उचित नहीं होगा। प्रमाणों के आधार पर यह निश्चित सा हो गया है कि राजा दक्ष का वह यज्ञ हरिद्वार में गंगातट पर कनखल में हुआ था और क्योंकि राजा दक्ष हिमालय या हिमाचल के राजा थे, इसलिए हरिद्वार के प्रमाण में तथ्य मजबूत दिखते हैं।
परंतु संदेह इसमें भी नहीं है कि इस भैरव स्थान पर भी एक यज्ञ हुआ था। उसके प्रमाण हैं। यह स्थल भी छोटी सरयू नदी के किनारे है जहां कभी सरयू नदी स्वयं बहा करती थी। लगभग चालीस वर्ष पहले यहां सैकड़ों कुएं थे जिनमें कई का व्यास चार-पांच फीट ही था। पिताजी के अनुसार उनके बचपन में यहां दो सौ से कम कुएं नहीं रहे होंगे। इसके पीछे कारण यह बताया गया था कि राजा दक्ष के यज्ञ में 360 पंडितों ने भाग लिया था और हर पंडित के लिए एक अलग कुआं था। दूसरा प्रमाण यह दिया जाता है कि मंदिर परिसर में एक हवन कुंड है जिसमें विधिपूर्वक कितनी भी आहुति दी जाए, यह कभी भरता नहीं। कारण कि इस हवन कुंड में पार्वती कूद कर भस्म हुई थीं। आज भी इस हवन कुंड में श्रद्धालू हवन कराते रहते हैं। इसकी पूर्णता की सच्चाई पर दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता।
पहले का भैरव मंदिर बहुत छोटा सा था - बिलकुल किसी अति प्राचीन सिद्धपीठ की भांति। आज यहां पर अत्यंत ऊंचा मंदिर है जिसका शिखर दस-बारह किलोमीटर की दूरी से भी दिख जाता है। 
कहा जाता है कि पार्वती का श्राप था कि यहां कोई यज्ञ सफल नहीं होगा। सन 1971-72 के दौरान एक युवा ब्रह्मचारी का आगमन हुआ और उन्होंने मंदिर परिसर से हटकर एक बड़ा यज्ञ करवाया। अपने क्षेत्र का यह अपूर्व एवं अप्रतिम आयोजन था। यज्ञ सफल ही नहीं हुआ, इतना जनसमूह आया और इतना चढ़ावा चढ़ा कि िंकंवदंती बन गई। ब्रह्मचारी जी ने उसी चढ़ावे का उपयोग करके नए उच्च मंदिर का निर्माण कराया. म्ंदिर का ढांचा बहुत पहले ही बनकर तैयार हो गया था और बीसों साल तक यथावत पड़ा रहा। भैरो जी का प्राचीन मंदिर इस विशाल मंदिर के अंदर ही था और स्थानीय लोगों को यह बात पीड़ा पहुंचाती रही। काफी दिनों बाद जब महराजगंज बाजार टाउन एरिया के अंतर्गत आया तो टाउन एरिया निवासी व्यापारियां ने मंदिर की प्लास्टर और साज-सज्जा हेतु कमर कसी। जहां तक मुझे याद है, अपने कार्यकाल में टाउन एरिया चेयरमैन श्री लक्ष्मी जायसवाल ने नेतृत्व का बीड़ा उठाया। स्थानीय सहयोग से मंदिर को साज-सज्जा और भव्यता प्रदान की गई। मंदिर के कलश को सुधारा गया और उसे स्वर्णिम रंगत प्रदान की गई। परिक्रमा पथ बनवाया गया और भैरो विग्रह को बड़े मंदिर में स्थापित किया गया। छोटे मंदिर में भीड़ के दिनों में दर्शन दुर्लभ हो जाता था। अब कुछ आसानी जरूर हुई है। हां, दर्शन की लाइन अभी भी नहीं लगती और पूर्णिमा के दिन धक्कामुक्की चलती रहती है। यह सुनसान सा स्थान आज आजमगढ़ के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में एक है।
ग्रामीण क्षेत्र में स्थित होने से इसे प्राकृतिक हरीतिमा का वरदान प्राप्त है। मंदिर से सटा एक विशाल तालाब जिसे यहां पोखरा कहा जाता है, इसके सौंदर्य में वृद्धि करता है। पोखरे में आनंद और श्रद्धा के लिए डुबकी लगाते हैं। स्थल से सटी छोटी सरयू नदी भी वातावरण को रसमय करती है।
मंदिर के पास का पोखरा      छाया - हरिशंकर राढ़ी
         
 आसपास मंदिरों की एक कतार सी है। हनुमान मंदिर (जिसका हाल में ही जीर्णोद्धार हुआ है), मेवालाल का बनवाया हुआ शिव मंदिर भी श्रद्धालुओं के लिए महत्त्वपूर्ण है।
ज्येष्ठ में गंगा दशहरा से पूर्णिमा तक एक सप्ताह का विशाल मेला लगता है। हमारे बचपन का यह बड़ा आकर्षण हुआ करता था। यहीं हमें कठपुतली की नाच, सर्कस, चिड़ियाघर और न जाने कितने अजूबों का दर्शन और परिचय हुआ करता था। हर स्थानीय परिवार में कुछ रिश्तेदार आया करते थे जिसके बहाने मेला घूमने और मिठाइयां खाने का अवसर मिलता था। दूर-दूर से कड़ाही चढ़ाने भक्त आया करते थे। कड़ाही चढ़ाना पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक विशेष श्रद्धा है जिसमें देवस्थान पर पूड़ी और हलवा बनाकर इष्टदेव को अर्पित किया जाता है। हर माह की पूर्णिमा को बड़ा और मंगलवार को छोटा मेला लगता है। यातायात के साधनों की प्रचुरता और

आर्थिक स्तर में उन्नयन के साथ श्रद्धालुओं की                                                                                           संख्या बढ़ती जा रही है।

राजेंद्र हलवाई अपनी दूकान पर                                                           
किशोरावस्था के अंतिम वर्षों में हर मंगलवार को यहां जाने का नियम सा हो गया था। जाना, दर्शन करना और उसके बाद राजेन्द्र हलवाई की दूकान पर बैठकर गप्पें मारना एक सुखद एहसास था। मिठाइयों की दूकानें अब भी सजती हैं किंतु वह रस शायद कहीं बिला गया है। व्यापारीकरण की मार यहां तक पहुंची है। इस साल फरवरी में गया तो जहां सैकड़ों कुएं थे, उनका निशान तक नहीं मिला। कुआें को बंद करके निर्माण कार्य और दूकानें सजा ली गई हैं। आखिर आर्थिक विकास और रोजगार के आगे श्रद्धा, परंपरा, संस्कृति और नैतिकता कहां तक ठहर सकती है।


भैरव स्थान पर  छोटी  सरयू के किनारे लेखक 
गंगा  दशहरा पर लगने वाले मेले   का एक दृश्य 

कैसे पहुंचें 

बाहरी लोगों के लिए यह बता देना ठीक रहेगा कि भैरव बाबा का यह स्थान आजमगढ़ जनपद मुख्यालय, रेलवे स्टेशन या रोडवेज बस स्टेशन से लगभग  पचीस किमी की दूरी पर है। आजमगढ़ फैजाबाद राजमार्ग पर आजमगढ़ से 16 किमी की दूरी पर कप्तानगंज बाजार है और वहां से सात किमी महराजगंज बाजार है। भैरव बाबा महराजगंज से बिलकुल सटा हुआ हे और बाजारीकरण के विकास में महराजगंज और भैरव बाबा के बीच की सीमा समाप्त हो चुकी है। फैजाबाद या अकबरपुर से आने वाले सड़क यात्रियों के लिए कप्तानगंज से ही मुड जाना होगा । गोरखपुर की ओर से आने पर आजमगढ़ से पहले जीयन पुर बाजार से महराजगंज मार्ग पर 25 किमी आना पड़ता है।  

महराजगंज और भैरव बाबा में आज भी कोई होटल/लॉज या ठहरने योग्य धर्मशाला नहीं है। अतः यदि कोई व्यक्तिगत परिचय या रिश्ता न हो तो यहां ठहरने का कार्यक्रम बनाकर नहीं आना चाहिए। 
हां, यह प्रशंसनीय है कि यहां कोई लूट-खसोट या धोखेबाजी नहीं है। हालांकि मंदिर की व्यवस्था पंडों के जिम्मे है लेकिन उनका भी कोई आतंक नहीं है।  दस-पांच रुपये में मान जाते हैं। आवश्यकता के सभी सामान और जलपान गृह उपलब्ध हैं।
आखिर ग्रामीण क्षेत्र की संस्कृति और श्रद्धा समेटे इस स्थान का भ्रमण कर लेने में बुरा ही क्या है ?



Monday, 15 February 2016

ghazel

ग़जल
फिसलती रही
 &हरिशंकर राढ़ी

टूटकर साँस चलती रही।
सोच करवट बदलती रही।
बाजुओं में सदा जीत थी
उँगलियों से फिसलती रही।
चाँदनी में अकेली दुल्हन
भोर तकती] पिघलती रही।
दो कदम बस चले साथ तुम
उम्र भर याद चलती रही।
काग की चोंच में मोतियां
हंसिनी हाथ मलती रही।
सेंकने की तलब थी उन्हें
झोंपड़ी मेरी जलती रही।
यूँ कटा जिन्दगी का सफर
रोज गिरती-संभलती रही।

Wednesday, 30 September 2015

Chitrakoot Part-3

              चित्रकूट में शेष दिन 

                                 -हरिशंकर राढ़ी 

स्फटिक शिला:

चित्रकूट शहर से कुछ ही दूरी पर मंदाकिनी के तट पर यह शिला है जो स्फटिक पत्थर की ही। नदी के उस पर सुंदर घना जंगल है और कुल मिलाकर नेत्रों को बड़ी शांति मिलती है। इस शिला पर भगवान राम सीता के साथ बैठा करते थे और समय को देखते रहते थे। यहीं इंद्रपुत्र जयंत कौवे के भेश में सीता के चरणों में चोंच मारकर भागा था और श्रीराम ने सींक का तीर चलाकर दंडित किया था। यह कथा बहुत प्रसिद्ध है। लेकिन, मुझे जो चीज सबसे रोचक लगी, वह यह कि राम कितने प्रकृति प्रेमी रहे होंगे और कितना चिंतन करते रहे होंगे। उनका सीता जी के साथ प्रेम का एक सुुंदर प्रसंग रामचरित मानस में मिलता है:
स्फटिक शिला             छाया : हरिशंकर राढ़ी 


एक बार चुनि कुसुम सुहाए।
निजकर भूषण राम बनाए।।
सीतहिं पहिराए प्रभु सादर।
बैठे फटिक शिला पर सुंदर।।
                            (अरण्य कांड, )
इस शिला पर राम के पैरों के चिह्न बने हुए दिखाई देते हैं। यहीं पर जयंत ने अपनी एक आंख देकर अपने प्राणों की रक्षा की थी। जयंत की वह आंख भी यहां पत्थर पर अंकित है।

जानकी कुंड: 

स्फटिक शिला से रामघाट की ओर बढ़ने पर जानकी कुण्ड  मिलता है। दरअसल यह मंदाकिनी का एक घाट है जहाँ चित्रकूट प्रवास के दौरान सीता जी स्नान किया करती थीं। यहाँ एक बहुत छोटा सा मंदिर बना हुआ है। सड़क से काफी निचाई पर यह घाट स्थित है और सीढि़याँ उतरकर घाट तक आना पड़ता है। सीढि़यों पर भिखारियों और कुत्तों का साम्राज्य है। जानकी कुंड पर कुछ फोटो-सोटो खींचकर हम वापस रामघाट अपने होटल आ गए।

हनुमान धारा: 

भोजन और अल्प विश्राम के बाद हमारा कार्यक्रम हनुमान धारा जाने का था। हनुमान धारा रामघाट से ढाई-तीन किमी की दूरी पर एक पहाड़ी चोटी पर स्थित है। रामघाट से हनुमान धारा तक का रास्ता भी अत्यंत ऊभड़-खाबड़ रास्तों में एक है। समझ में नहीं आया कि जो स्थल भगवान राम का अधिवास रहा हो, जहाँ इतने तीर्थयात्री आते हैं और जिनसे इस पूरे क्षेत्र की जीविका को इतना बड़ा आधार मिला हो, वहाँ की सरकार और प्रशासन  सड़कों तथा अन्य सुविधाओं के साथ इतनी उदासीनता क्यों बरत रहा है ? ऐसे रास्तों पर दस-बीस मील सफर हो करना हो तो शायद शरीर की हड्डियाँ अपना समायोजन फिर से करने लगें। खैर, छोटी सी कष्टप्रद  दूरी तय करके हम हनुमान धारा चोटी के पद पर पहुँच गए।
हनुमान धारा पर्वत              छाया : हरिशंकर राढ़ी 
हनुमान धारा काफी ऊँचाई पर स्थित है और वहां तक सीढि़यां जाती हैं। सीढि़यां बहुत अच्छी नहीं तो बहुत खराब भी नहीं हैं। हनुमान धारा तक की सीढि़यों तक वही धर्मालयी बुराइयाँ। दोनों तरफ भिखारियों का झुंड जो कृत्रिम रूप से दयनीय शक्ल बनाकर, बिगड़ी आवाज और घिसे-पिटे अभिनय करके ‘भक्तों’ का दिल पिघलाते हैं और अपना कटोरा भरते हैं। हो सकता है कि कुछ असमर्थ होते हों, कुछ किसी बड़ी भीख कंपनी के शिकार होते हों, परंतु वे मुझ जैसे तार्किक ‘भक्त’ को ज्यादा चिढ़ाते हैं जो स्वस्थ्य और जवान होते हुए भी लोगों की दयालुता का भयंकर दुरुपयोग करते हैं। दूसरा उनका आतंक जो किसी पत्थर के पास हनुमान जी की सिंदूर पुती मूर्ति रखकर या पत्थर पर ही सिंदूर पोतकर लोगों की धार्मिक भावना का दोहन करते हैं। अब तो श्रद्धा के ध्यान रखते हुए काली माँ, साईं बाबा या दुर्गा जी को यत्र-तत्र इन महात्माओं द्वारा रख दिया जाता है। हनुमान धारा तक जाने वाली लगभग पांच सौ सीढि़यों पर न जाने कितने ‘भगवान’ और कितने भिखारी बैठे मिल जाते हैं जो अपने ‘आर्द्र’ स्वर से आपकी यात्रा को खाते रहते हैं, बशर्ते  आप वाकई ‘बड़े भक्त’ न हों।
हनुमान धारा मंदिर              छाया : हरिशंकर राढ़ी 
हनुमान धारा एक छोटा सा मंदिर है। हालाँकि इसमें भी भ्रम की स्थिति है। यहाँ पर हनुमान धारा के दो मंदिर हैं और दोनों ही अपने को असली हनुमान धारा होने का दावा करते हैं। कहा जाता है कि राम-रावण युद्ध के बाद भी हनुमान जी लंकादहन की गर्मी से त्रस्त थे। रामायण और रामचरित मानस के अनुसार हनुमान जी ने लंकादहन के तुरंत बाद समुद्र में कूदकर अपनी पूँछ की आग बुझा ली थी। किंतु, यहाँ पर जनश्रुति के अनुसार ज्ञात हुआ कि हनुमान जी की लंकादहन से उत्पन्न जलन शांत नहीं हुई थी। उन्होंने भगवान राम को अपनी समस्या बताई और दाह को शांत  करने की प्रार्थना की तो उन्होंने धनुष  पर बाण चढ़ाकर संधान किया जिससे चित्रकूट के इस पर्वत पर एक जलधारा प्रकट हुई। इस धारा में हनुमान जी ने स्नान किया तो उनका दाह चला गया। तबसे यह धारा अविरल बह रही है। यह तो सत्य है कि एक पतली जलधारा पर्वत को भेदकर लगातार बहती रहती है, लेकिन इस कथा में कितनी सच्चाई है, इसे प्रमाणित नहीं किया जा सकता है। प्रश्न आस्था का है। हाँ, दोनों मंदिरों में धार्मिक लेन-देन खूब चलता है। यह आप पर निर्भर करता है कि आप कितने धर्मपारायण हैं और कितना पुण्य खरीदना चाहते हैं।
दोनों मंदिरों में दर्शन  करने के उपरांत अधिकांश यात्री वापस लौट आते हैं। कुछ सैलानी जैसे ही लोग और ऊपर जाना पसंद करते हैं। हनुमान धारा से ऊपर की तरफ सीढि़याँ जाती हैं जो पर्वत की चोटी तक पहुँचती हैं, ऊँचाई कुछ कम नहीं है। वहाँ सीता की रसोई है जिसे देखने और मौजूद समय का सदुपयोग करने की इच्छा हम रोक नहीं सके। यहाँ तक पहुँचना आनंददायक था किंतु आगे धर्म कराने और पुण्य बेचने वालों के अगणित स्टाल लगे हुए थे जो हमें कब्जे में करने को आतुर थे। कुछ-कुछ आतंक जैसा माहौल माना जा सकता है। छोटे-छोटे घेरे और कपड़े या टिन की छत बनाकर उसमें कई देवी-देवताओं की फोटो और मूर्तियाँ जमाई गई थीं और उन पर मालाएं तथा मुद्राएँ चढ़ी हुई थीं। इन पुण्यस्थलों पर कहीं ‘टोलटैक्स या एंट्री फीस’ भरते हुए, कहीं घूरते या उपेक्षित करते हुए हम सीता रसोई तक पहुँच ही गए।

सीता रसोई: 

सीता रसोई            छाया : हरिशंकर राढ़ी 
पर्वत की चोटी पर एक छोटा सा मंदिर बना था जिसे सीता रसोई नाम दिया गया था। पूछने पर पता चला था कि चित्रकूट निवास की अवधि में एक बार सीता जी ने अत्रि सहित तीन ऋषियों को अपने हाथों से बनाकर भोजन कराया था। यह वही स्थल है और सीता रसोई के नाम से प्रसिद्ध है। ऐसा संभव लगता है। हाँ, यदि यह कथा होती कि सीता जी प्रतिदिन यहाँ रसोई बनाया करतीं तो बात कुछ अतार्किक होती। मैं इस बात को महसूस करता रहा कि क्या आदर्श होते थे उस समय लोगों के मन में। विद्वानों की क्या प्रतिष्ठा होती थी और राजवंश में पले-बढ़े लोग कितने सभ्य, विनम्र, सांस्कारिक और उदार होते थे। कितनी मानवता भरी होती थी। सीता जी जैसी राजकुमारी जो जनकराज की पुत्री और दशरथ की पुत्रवधू और राम की पत्नी थीं, अपने हाथों से भोजन बनाकर अतिथि सत्कार करती थीं। एक और युग आया है जब यह सुनकर हैरानी होती है कि अमुक (उच्च शिक्षिता) महिला भोजन बनाना भी जानती है।
खैर, वहां से बाहर निकले तो धर्मचक्र वालों की वसूली फिर शुरू और अपने यहाँ जमाई दुकान पर मत्था टेकने का लगभग बलपूर्वक आग्रह। यहाँ तक आते-आते मेरा धैर्य जवाब दे गया और न चाहते हुए भी खरी-खोटी सुनाना पड़ ही गया। विवाद तो क्या होता, हाँ मूड जरूर खराब हुआ और पाखंड को कोसते हुए हम अवतरण की ओर चल पड़े। नीचे जलपान और धार्मिक स्थलों पर मिलने वाली दुकानों का क्रम था। कुछ सामान देखा गया और जलपान करने के उपरांत फिर वही रामघाट।

भरतकूप की ओर: 

भरत कूप            छाया : हरिशंकर राढ़ी 
अगले दिन सायंकाल हमारी ट्रेन थी। हमारे पास लगभग तीन बजे तक का समय था और हमने यह निश्चय किया कि यह समय भरतकूप के दर्शन करके निकाला जाए। भरत के प्रति मेरे मन बहुत श्रद्धा है, शायद उतनी राम के प्रति नहीं है। किशोरावस्था से ही रामचरित मानस पढ़कर यह श्रद्धा स्थिर भाव से मन में बैठ गई है। तुलसीदास भरत के विशय में लिखते हैं -
      भरत सरिस को राम सनेही। 
     जग जपे राम, राम जपे जेही।।
     जौ न होत जग जनम भरत को। 
      सकल धरमधुरि धरनि धरत को।।
      भरत महामहिमा जलराशी।
      मुनि मति ठाढ़ तीर अबला सी।।
      गा चह पार जतन हियँ हेरा। 
      पावति नाव न बोहित बेरा।। (अयोध्याकांड में विविध प्रसंगो से)

ऐसे भरत कूप का दर्शन तो अनिवार्य ही था। गाँव में बचपन के दिनों में चारो धाम के यात्रियों से सुन चुका था कि चित्रकूट में भरत कूप स्थित है। 
भरतकूप रामघाट से लगभग 18 किमी की दूरी पर स्थित है और यही एक तीर्थ चित्रकूट में है जो उत्तरप्रदेश में है। यहाँ के लिए हमने बड़ा वाला आॅटो रिक्शा तय किया और फिर एक बार अस्थिभंजक गर्तशंकुल बीहड़ रास्ते से होते हुए किसी प्रकार एक घंटे की यात्रा करके भरतकूप पहुँच  गए।
भरतकूप आज की तारीख में एक कुआँ है जो उपयोग में है। रामकथा के अनुसार राम के राजतिलक हेतु सभी तीर्थों को जल मंगाया गया था किंतु दुर्भाग्यवश राम को वनवास हो गया। यह जल उपयोग में नहीं आ पाया। जब भरत ने चित्रकूट जाकर राम को मनाने और वापस लाने का निर्णय किया तो वे आत्मविश्वास से भरे थे और निश्चय किया कि राम का राजतिलक वहीं कर दिया जाएगा। शायद इसी मानसिकता से वे पूरी सेना, गुरु वशिष्ठ सहित अनेक ऋषियों -मुनियों सहित राजर्शि जनक को भी साथ लेकर गए थे। राम समयपूर्व अयोध्या लौटने को तैयार नहीं हुए तो भरत के सामने यह समस्या हुई कि तीर्थों के पवित्र जल का क्या करें। इस पर चित्रकूट का विशद भौगोलिक ज्ञान रखने वाले अति मुनि ने भरत को सलाह दी कि इस पवित्र जल को अमुक कूप में रख दिया जाए क्योंकि वह बहुत ही पवित्र जल वाला कूप है। तीर्थों का जल उसमें रख देने से कूप का भी महत्त्व बढ़ जाएगा और जल का भी सम्मान होगा। इतना ही नहीं, उस दिन से उस कूप का नाम भरतकूप होगा और इसके जल में स्नान करने से समस्त पापों का विनाश होगा। गोस्वामी तुलसीदास को एक बार फिर उद्धृत करें तो: 
भरतकूप कहिहहिं सब लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा।।
प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहंहि बिमल करम मन बानी।। (अयो0/309/8)

भरत कूप पर लेखक पत्नी के साथ 
कूप एक विशाल पीपल के पेड़ के नीचे है और कूप पर टीन की चादरों से छाया की हुई है। दो - तीन चरखियाँ लगी हुई हैं और अनेक भक्त बाल्टियों से पानी भरकर स्नान करते रहते है।
चार भाइयों का मंदिर: कूप परिसर में ही भरत मंदिर और चार भाइयों का मंदिर है। राम मंदिर तो देश में हर गली-मोहल्ले में मिल जाते हैं किंतु भरत मंदिर और चार भाइयों का मंदिर दुर्लभ है। यह स्थल वस्तुतः भाइयों के प्रेम और त्याग का प्रतीक है। एक ओर जहाँ मर्यादा परुषोत्तम राम हैं तो दूसरी ओर उनसे कम त्यागी और धैर्यवान भरत नहीं हैं। लक्ष्मण का त्याग कम करके आँकना भ्रातृस्नेह का घोर अपमान होगा। यह एक ऐसा स्थल है जहाँ पर अयोध्या जैसे स्रामाज्य को लात मारने की होड़ लगी है। कथा तो हम सुन लेते हैं किंतु वास्तविक जीवन में राम-भरत और  के देश में कितना त्याग कर पाते हैं, यह सोचने की बात है। 
कुछ देर रुककर हमने वापसी का मन बनाया । यहाँ जाने के लिए निजी वाहन ही सर्वोत्तम है। सार्वजनिक वाहन पर भरोसा करना कष्टप्रद हो सकता है। एक वृद्ध दंपति साधन के अभाव में बहुत देर से परेशान हो रहे थे। हमारे आॅटो में पीछे की सीट खाली थी और उन्होंने निवेदन किया तो हम सहर्ष उन्हें बिठा लाए। वे पिछले दो घंटे से वाहन की प्रतीक्षा में परेशान थे।

रामशैया :

राम शैया              छाया : हरिशंकर राढ़ी 
 भरतकूप से वापसी में रामशैया नामक एक स्थल पड़ता है। यहाँ एक विशाल शिला है जो दो भागों विभक्त सी दिखती है, या यों कहें कि बीच में मेंड़ सी बनी हुई है। कहा जाता है कि इस  शिला पर राम और सीत शय न करते थे। बीच में मेंड़ थी जिससे वे अलग रहते थे और पूरे वनवास काल में उन्होंने ब्रह्मचर्य का पालन किया था। यह अलग बात है कि पूरी श्रद्धा के बाद भी यह तर्क गले नहीं उतरता कि वे रहते थे कामदगिरि के पास और शयन करने यहां आते थे। इसके सम्मुख एक छोटा सा परिसर है जहाँ कुछ छोटे मंदिर भी हैं और सामने एक विद्यालय है जहाँ उस समय जूनियर तक की परीक्षाएं चल रही थीं।
खैर, उस गड्ढेनुमा सड़क से होते हुए हम एक बार फिर रामघाट आ गए। दोपहर का भोजन किया। रामघाट को प्रणाम किया और ट्रेन पकड़ने चित्रकूटधाम कर्वी स्टेशन चल पड़े -हाँ, मन में यह पंक्ति वापसी के समय भी गूँज रही थी -चलु चित चेति चित्रकूटहिं अब। काश ! चित्रकूट को उसकी प्राचीन और उपयुक्त गरिमा पुनः मिल पाती। 

Wednesday, 2 September 2015

इन्द्राणी के बहाने


हालांकि मीडिया के सोचने-करने के लिए हमेशा बहुत कुछ रहता है, इस वक़्त भी है. न तो किसानों की आत्महत्या रुकी है, न कंपनियों की लूट, न ग़रीबों-मज़दूरों का शोषण, न फीस के नाम पर स्कूलों की लूट. सांस्कृतिक दृष्टि से देखें देश का सबसे बड़ा पर्व महाकुंभ नासिक में और राजनीतिक नज़रिये से चुनाव बिहार में चल ही रहे हैं. मीडिया चाहे तो इनके बहाने उन बुनियादी सवालों से जूझ सकती है जिनसे जूझना देश और जन के लिए ज़रूरी है. लेकिन हमारी मीडिया ऐसा कभी करती नहीं है. इन सवालों से वह हमेशा बचती रही है और आगे भी बचती रही है. इनसे बचने के लिए ही वह कभी कुछ झूठमूठ के मुद्दे गढ़ती है और कभी तलाश लेती है. जिन मुद्दों को वह तलाश लेती है, उनमें कुछ देश को जानना चाहिए या जिन प्रश्नों की ओर देश का ध्यान जाना चाहिए, उनसे वह हमेशा बचती है. ऐसा ही एक मुद्दा इन दिनों इंद्राणी मुखर्जी का है. ख़बरें उन्हें लेकर बहुत चल रही हैं, लेकिन उन तीखे प्रश्नों से हमारी मीडिया बच कर भाग जा रही है, जो उठाए ही जाने चाहिए. वही प्रश्न उठा रहे हैं भारत संस्कृति न्यास के अध्यक्ष संजय शांडिल्य

वास्तव में कहा आ गए है हम। क़ुछ समझ में नहीं आता। हम भारत के लोग है। हमारे पास चिंतन और चर्चा के हजारों विषय है। हमारी विरासत महान है। हम बहुत ही उत्तम संस्कृति के वाहक हैं। हमारे देश का सबसे बड़ा सांस्कृतिक पर्व फ़िलहाल नासिक में चल रहा है। हमारे दश के सबसे बड़े ज्ञानी राज्य बिहार में विधानसभा चुनाव होने जा रहे है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में पिछले 36 सालो में 60 हज़ार से ज्यादा बच्चे मौत के मुह में इसलिए समा गए क्योकि हमारी सरकारों ने ठीक से काम नहीं किया और इन्सेफेलाइटिस जैसी महामारी फैलती चली गयी। देश की दशा और दिशा किस हालत में है? देश की सीमा पर दुश्मन रोज ललकार रहा है. …… लेकिन देश की मीडिया के लिए पिछले आठ दिनों एक ऐसी कहानी चिंता और चर्चा का विषय बनी है जिसमें कुछ भी ऐसा नहीं है जो भारतीय हो, सब अभारतीय मूल्यहीनता और असामाजिकता का नमूना है। एक ऐसी महिला जिसके जीवन की संपूर्ण यात्रा में केवल संस्कारहीनता की घटनाएं हैं, उन्हें देश के सामने ऐसे परोसा जा रहा है जैसे इस कथानक को सुने बिना भारत की धड़कन रूक जाएगी। हमारे देश की मीडिया को शायद यही लगता है कि इन्द्राणी की कहानी दिखा कर वह देश को बहुत ही रोचक जानकारी दे रहा है। वह यह भूल गया है की इन्द्राणी केवल एक इन्द्राणी मुखर्जी नाम की महिला की कथा नहीं है। यह एक ऐसी प्रवृत्ति की कथा है जिसमे पूरी तौर पर भारतीयता का लोप हो चुका है।

कोई एक दिन में इन्द्राणी मुख़र्जी नहीं बन जाता। उसके लिए देश काल परिस्थितियां भी बहुत हद तक जिम्मेदार होती है। देश और समाज जैसा संस्कार देते है कोई पारी वैसे ही इन्दाणी या इन्द्राणी मुख़र्जी बनती है। सोचिए की एक छोटी सी लड़की अपने सौतेले पिता के साथ रहती है। वह शराबी है। रोज अपनी पत्नी से झगड़ा भी करता है। वह उस सौतेली बेटी पर भी गलत निगाह रखता है। बच्ची थोड़ी बड़ी होती है। बहकते माहौल में वह किसी अधेड़ आदमी की कुंठा का शिकार होती है. फिर वह अपनी कच्ची उम्र में ही घर से भागती है। उसे लगभग उसी की उम्र का एक लड़का मिलता है। दोनों बिना किसी बंधन के एक साथ एक कोठरी में रहना शुरू करते है। स्वाभाविक रूप से इस जोड़ी के माध्यम से दो बच्चे अस्तित्व में आ जाते हैं। दोनों बिना ब्याह के माँ बाप बन कर भी बच्चों को बाकायदा जन्मा देते है। वे चाहते तो वह सब कर सकते थे जैसा आज कल हो रहा..abortion करा सकते थे। लेकिन ऐसा न करके दोनों उन बच्चो के साथ जीने की कोशिश करते है। बिना किसी सामाजिक बंधन के ये दोनों केवल तीन साल एक साथ रहते है। लड़का अलग होकर असली शादी कर अपना घर बसा लेता है। 

लड़की अपने लावारिस बच्चों को अपने उन्हीं माँ बाप के घर छोड़ने के बाद अपना घर बसाने की कोशिश करती है। एक दूसरा आदमी उसको सम्बल देता है। उससे भी एक बेटी जन्म लेती है।लेकिन यह बंधन इतना कच्चा निकलता है कि सब बिखर जाता है. फिर वह महिला जीवन जीने की कोशिश में वह भी करती है जिसे समाज का सबसे गंदा पेशा कहा जाता है। एक दिन वह एक वेश्यालय से पकड़ ली जाती है। अब ऐसी महिला के लिए इस समाज में तो जगह नहीं है। वह जब उस पकड़ से निकलती है तब तक समाज उसे सब कुछ सिखा चुका होता है। वह सीधे देश की सबसे चकाचौध वाली माया नगरी में पहुंच कर अपना नया आशियाना तलाशती है। यह भी खोज का विषय होना चाहिए की इन्द्राणी को आखिर स्टार टीवी के दफ्तर में काम किसने दिलाया और उसके बदले इन्द्राणी को क्या कुर्बानी देनी पड़ी। क्योकि असम या कोलकाता से आने वाली एक सामान्य सी महिला रातोरात स्टार जैसी कंपनी में ह्यूमन रिसोर्स की सलाहकार कैसे बन गयी। यहाँ इस एक पड़ाव को हमारे मीडिया के शोधकर्ता पी जा रहे है। इतने बड़े मीडिया हाउस में अचानक किसी को इतना बड़ा पद नहीं मिल सकता। 

बहरहाल अब इन्द्राणी बोरा के जीवन का सुन्दरकाण्ड शुरू होने वाला है। भारतीय मीडिया के दिग्गज पुरुष के रूप में पीटर मुखर्जी की पहचान है। वह कोई सामान्य आदमी नहीं हैं। छोटे-मोटे पत्रकारों और संपादकों के लिए उन तक पहुंचना भी आसान नहीं था जब वे स्टार के सीईओ रहे होंगे। ऐसे में इन्द्राणी नाम की यह महिला कैसे उनके इतने करीब पहुंच गयी और एक दिन अचानक वह इन्द्राणी बोरा से इन्द्राणी मुख़र्जी बन गयी.... क्या यह कोई बच्चों का खेल है या कि मंच का drama... बहरहाल यह उनकी अपनी जिंदगी है। आज वह पीटर की पत्नी के रूप में ही जानी जा रही है। यह अलग बात है कि .उसके आज के संकट में पीटर उसके साथ नहीं दिख रहे। अब आइये इस यात्रा की थोड़ी विवेचना कर ली जाय। एक ऐसी लड़की जो १४ या १५ साल की है उसी उम्र में उसका सौतेला पिता उसका शोषण करता है। वह भाग कर अपनी उम्र के लड़के के साथ रहती है वह उसे भोग कर बच्चे पैदा कर किनारे लग जाता है। फिर वह दूसरे के साथ जीने की कोशिश करती है। वह भी एक बेटी पैदा कर छोड़ देता है। 

यहाँ एक प्रश्न पैदा होता है की यदि उस लड़की को एक जिम्मेदार माँ बाप मिले होते जो उसको पूरी सुरक्षा देते फिर ठीक से उसका विवाह करते उसका अपना घर बसता। तब यदि वह अपने मन से इधर उधर जाती तो उसका दोष बनता था। यह वही समाज है न जिसने एक लड़की को कदम-कदम पर शोषित होते देखा। किसी ने यह सवाल उस समय सिद्धार्थ दास से क्यों नहीं किया की बिना ब्याह के दो बच्चे पैदा करने के बाद किस भरोसे उसने इन्द्राणी को छोड़ा? खन्ना ने क्यों नहीं निधि को अपने पास रख कर पढाया? शादी यदि टूट भी गई तो इन्द्राणी के खर्च के लिए खन्ना ने क्या दिया? सच तो यह दिख रहा है कि जब इन्द्राणी पैसे वाली बन गयी तब उसने सबका ख्याल किया। अपने उन्ही माँ-बाप के लिए आलिशान कोठी बना कर दी। उन्ही बच्चो को काफी धन दिया। अपने पूर्व पति खन्ना की भी मदद की। यह तो हुआ एक पक्ष। अब इस कहानी का दूसरा पक्ष भी देखिये। इन्द्राणी ने जो कुछ किया वह सब गलत हो सकता है लेकिन सिद्धार्थ दस ने क्या किया। खन्ना ने क्या किया। उस पीटर मुखर्जी ने क्या किया जिन्होंने इन्द्राणी के डैम पर सैकड़ो करोड़ की कंपनी कड़ी कर ली। आखिर उनके पास यह अकूत संपत्ति कहा से आई। 

आज पीटर अपने को पाक साफ बता रहे है। मीडिया के उनके चाटुकार उनके बारे में सवाल तक नहीं उठा रहे। इन्द्राणी ने शीना की हत्या की या नहीं यह तो अब कोर्ट में तय होगा लेकिन विडम्बना तो यह है की इन्द्राणी फिर से एक मर्द के हाथ ठगी गयी। आज पीटर काम से काम इन्द्राणी के असली पति तो है ही और इस लिहाज से उनको इन्द्राणी की मदद करनी चाहिए थी। आज वह यदि कहते भी है की उनका इन घटनाओ से कोई लेना देना नहीं है तब भी कोई उनकी बात पर भरोसा नहीं करेगा। किरण बेदी जी ने भी माना है की पुलिस को चाहिए कि पीटर को भी interogate करे। यह एक बात साफ हो गयी है की इसमे आज की तारीख में कोई किसी की पत्नी नहीं है। कोई माँ नहीं है। कोई बाप नहीं है। कोई भाई नहीं है। कोई बेटा नहीं है। कोई बेटी नहीं है। अर्थात सभी अलग अलग जीने वाले जानवर है। भारत में ऐसे जानवरो को इंसान नहीं कहा जाता। इसीलिए हमारी संस्कृति संस्कारो को महत्व देती है। 

देखिये न कि केवल एक जगह एक संस्कार टूटा तो कैसी कहानी बन गयी। आप खुद सोचिये कि हम समाज को सिर्फ मनुष्य के रूप में जानवर देना चाहते है या रिश्तो के संस्कारो के साथ स्वस्थ समाज बनाना चाहते है। और तकलीफ तो इस बात की है कि देश का मीडिया आज आठ दिनों से इसी कहानी में पूरे दश को उलझाये हुए है।यह अखबारों के पैन इन खबरों से भरे पड़े है कि बेटे ने बाप को कुल्हाड़ी से काटा, बेटे ने माँ की गर्दन मरोड़ी , भाई ने भाई को मर डाला , बही ने भाभी की हत्या कर दी , बाप ने बेटी को गड़ासे से काटा , दहेज़ केलिए नव विवाहिता जलायी गयी आदि आदि। और तो और देश में अनगिनत इंद्राणिया घूम रही है.... अनगिनत खन्ना और पीटर मौजूद है...यदि वास्तव में चिंता करनी है तो इस बात की होनी चाहिए कि इन प्रवृत्तियों को कैसे रोक जाय। मित्रो यह कहानी यही खतम होने वाली नहीं है। २३०० साल पहले देवी हेलेना ने भी अपने पुत्र जस्टिन का कत्ल भरी सभा में किया था। विगत वर्षो में कई ऐसी हत्याए हुई है जिनमे माँ बाप शामिल रहे है। कई चर्चित हत्याए राजनीतिक महत्वाकांक्षा में भी हुई है। आज भी देश के कई घरानो में ऐसा ही युद्ध चल रहा है। क्या सभी को हमारा मीडिया ऐसे ही दिखा सकेगा/ हमारे पुरखे कह गए है की जब कही से कोई सड़ांध पैदा होने लगे या बदबू आने लगे तो उस जगह से दूर चले जाना चाहिए। संस्कारहीन जानवरो की कथा सुना कर देश के लोगो खासकर बच्चो के दिमाग में गन्दगी नहीं फैलानी चाहिए। इतना इनको मत उछलिये की ये ही समाज के रोलमॉडल बनने लगे। बस कीजिये।

Tuesday, 25 August 2015

Chitrakoot Part - 2

                                   चित्रकूट के रामघाट पर 

                                                                  -हरिशंकर राढ़ी 

रामघाट:

रामघाट पर हमारा पहला मुकाबला बोटिंग वालों से हुआ। घाट की ओर रुख करते ही बोटिंग वाले कुछ इस तरह हम पर टूटे जैसे मधुमक्खियों, ततैया या बर्र का झुण्ड  टूटता है। केवल उनकी खींचतान और शोर -शराबा । मुझे ऐसे मुकाबलों से सख्त नफरत है। एक-दो बार मना करने के बावजूद जब उनकी दुकानदारी बंद नहीं हुई तोे गुस्सा फूट पड़ा। यार चैन से जीने दोगे या नहीं ? कोई यात्री तुम्हें ग्राहक के अलावा भी कुछ नजर आता है कि नहीं ? कौन किस मूड और किस परिस्थिति में आया है, तुम्हें इससे फर्क पड़ता है या नहीं ? और न जाने क्या - क्या ! थोड़ी सी भीड़ जमा हुई और फिर कोई खास मनोरंजन न पाकर धीरे-धीरे छंट गई। अपने देश  का भीड़तंत्र तो है ही ऐसा।
रामघाट की एक नौका        छाया : हरिशंकर राढ़ी 
अकेला पाकर रामघाट की सीढि़यों पर बैठ गया। शांत  होने का प्रयास करने लगा और सोचने भी लगा। आखिर ऐसा हुआ क्यों जा रहा है। लोग तीर्थों पर इसलिए जाते रहे होंगे कि कुछ शांति  मिल सके; थोड़ा सा स्वयं को भी देखने का अवसर मिल सके। भौतिकवाद और मौज-मस्ती से अलग अपनी आत्मा के नजदीक जाने का अवसर मिल सके। लेकिन कहां से कहां पहुंच गई हमारी सभ्यता और मानसिकता ! तीर्थस्थल पिकनिक और मौजमस्ती के स्पाॅट बन गए। क्या वाकई धार्मिक आस्था बढ़ी है या धर्म भी मनोरंजन का माध्यम बन गया है। अभी केदारनाथ की त्रासदी भूली नहीं है और प्रकृति का इतना बड़ा और आसान सा पाठ हमारी समझ में नहीं आया है। धार्मिक स्थल सैर-सपाटे के पर्याय बनते जा रहे हैं। सैर सपाटे में कोई बुराई नहीं है, तीर्थयात्रा के पीछे भी यह सोच रही होगी; लेकिन क्या कहीं भी हम अपनी भौतिक समृद्धि और कामना को छोड़कर कुछ गंभीर चिंतन और यात्रा नहीं कर सकते ? मैं मानता हूँ कि आबादी के साथ रोजगार की समस्या बढ़ी है और पर्यटन स्थल, चाहे वे तीर्थ ही क्यों न हों, जीविका चलाने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं। लेकिन उसका भी एक तरीका होना चाहिए। एक व्यवस्था हो जिसमें इच्छुक व्यक्ति खुद ही इन सुविधाओं का लाभ लेने जाए और बिना किसी मोल-भाव को निश्चित  दर पर ईमानदारी से इन सुविधाओं को भोग सके। लेकिन अपने यहां ऐसा नहीं होता । मंदिर के बाहर फूल-माला-प्रसाद वाले भी कुछ ऐसा ही दृश्य  उपस्थित करते हैं और रास्ता तक रोक लेते हैं। मुझे कई बार ऐसे आग्रहों से चिढ़ हुई है और चिढ़ बस मैंने मन होते हुए भी फूल-माला नहीं लिया।
रामघाट वह जगह है जहां राम अपने वनवास के दिनों में मंदाकिनी में नहाया करते और बैठा करते। इसी लिए इस घाट का नाम रामघाट पड़ा। राम से जुड़ी कई नदियों के घाटों का नाम ‘रामघाट’ है। नासिक में भी गोदावरी के किनारे प्रसिद्ध रामघाट है, जहां बारहवें वर्ष  कुंभ का मेला लगता है और आज भी हिंदू पितरों को पिंडदान करते हैं।

पर तब मंदाकिनी और उसका तट बहुत सुन्दर  रहा होगा। आज मंदाकिनी गंदा नाला बन चुकी है। अंधेरा हो चुका था। रामघाट बहुत सुन्दर  लग रहा था। अधिकांश  लोग बोटिंग और दूसरे प्रकार की मस्ती कर रहे थे। मैं राम के वनवास की कल्पना और तत्कालीन परिस्थितियों का अवलोकन कर रहा था। बच्चे अपने में मस्त थे। पत्नी को लगा कि ये कुछ ऐसा ही सोच रहे होंगे (वे मेरे इस दुर्गुण से परिचित हैं)। मैंने उन्हें भी रामायण काल की चर्चा में शामिल किया और उस अतीत को उन्होंने भी महसूस किया। पर उनका मन भी मंदाकिनी में सजी-सजाई नौकाओं में लगा हुआ था। मैं बचपन से किशोरावस्था तक अपने गांव के पास की बरसाती नदी में नौकायन (उसे मजबूरी या नदी पार करने का एकमात्र साधन कह सकते हैं) का खूब आनंद लियाा था। स्कूली बच्चे कभी-कभी नाव को डुबाने की भी कोशिश  करते। एक बार हमारी नाव डूब भी गई थी, लेकिन वहां पर गहराई अधिक नहीं थी। मुझे याद है कि जब मैं दसवीं का छात्र था तो अपनी साइकिल समेत नदी में उलट गया था। कई बार  विशाल  सरयू (घाघरा नदी जो चैड़ाई और वेग में गंगा को भी मात करती है) को नाव से पार किया था। सो, मुझे नौकायन का कोई शौक  नहीं है। हाँ, बच्चे ललचा रहे थे। मित्र ज्ञान जी का परिवार इस आनंद को उठाना चाहता था। अकेला पाकर एक नाविक आया और सभ्यता से बात करने लगा और फिर हम नौकायन के लिए मंदाकिनी में उतर गए।
नौकायन के बाद हम रामघाट पर उस ओर चले जहाँ गोस्वामी तुलसी दास का एक छोटा सा मंदिर है। तुलसीदास ने रामघाट पर लंबा समय बिताया था। जिस जगह राम ने 12 वर्ष  काटे हों, वहां लंबे प्रवास के बिना रामायण पूरी भी कैसे हो सकती थी। छोटे से बुर्जनुमा मंदिर में तुलसीदास की प्रतिमा बड़ी जीवंत लगती है और दीवार पर वह प्रसिद्ध दोहा लिखा है जिससे चित्रकूट की पहचान को अतिरिक्त महत्त्व मिलता है:

चित्रकूट के घाट पर भइ संतन की भीर।
तुलसिदास चंदन घिसंे, तिलक देत रघुबीर।।

गुप्त गोदावरी के लिए:

गुप्त गोदावरी गुफा  :       छाया  हरीशंकर राढ़ी 
अगली सुबह हमारा गंतव्य गुप्त गोदावरी की गुफा थी। रामघाट से इसकी दूरी लगभग बीस किमी है और यह मध्य प्रदेश  में है। वहाँ जाने के लिए बड़े वाले तिपहिया और टैक्सियाँ मिलती हैं जिसकी जानकारी हमने एक दिन पहले ही ले ली थी। इसी रास्ते में सती अनसूया का मंदिर, स्फटिक शिला  और जानकी कुंड है। तिपहिया वाले अक्टूबर 2014 में छह सौ रुपये लेते थे। सुबह हम होटल से निकले तो तिपहिया वालों ने घेरा और हमने एक नई सी गाड़ी देखकर बात तय कर ली। उसने बिठाया और जिधर से (रामघाट गंदे नाले के पुल से जिसके उस पार मध्यप्रदेश  है) जाना था, उसके बजाय उल्टा मोड़ा तो हमें मामला खटका। उसका जवाब यह था कि उसका आॅटो यूपी के नंबर का था और पुल पर जो एमपी के आॅटो खड़े रहते हैं, वे नहीं जाने देंगे। अतः वह दूसरे रास्ते से जाएगा। इस बीच उसे दूसरा आॅटो आता दिख गया जो उसी मालिक का था, सो उसने हमें नए वाले में से उतार कर पुराने वाले में बिठा दिया और लंबा रास्ता लेकर न जाने किस सड़क पर आया। वहाँ उसने ड्राइवर को ताकीद की कि आगे जाकर फलाँ पंचर वाले से टायर ले ले नहीं तो रास्ता खराब है और पंचर हो जाने पर दिक्कत होगी। हमें लगा कि वह सवारियों के सुख-दुख का ध्यान रख रहा है। पंचर वाले ने पंचर लगाया नहीं था, सो उसमें लगभग आधा घंटा खराब हुआ। और जनाब हम शहर से बाहर निकले ही थे कि उस अति खराब, अधिकांषतः गड्ढे वाली संकरी सड़क को उसका टायर झेल नहीं पाया और लीजिए साहब फिस्स। जिसका डर वही हुआ। वहां भी आधा घंटा लगा और इन ड्राइवरों के महालालची स्वभाव से उत्पन्न बाधाओं को सहते हुए हम डरे मन से गुप्त गोदावरी की ओर।
गुप्त गोदावरी गुफा में लेखक 
भगवान न करें कि ऐसी सड़कों पर यात्रा करनी पड़े। महान जीवट के वे टैक्सी आॅटो चालक हैं जो इन सड़कों पर अपने शरीर का भुरता बनवाते हैं। खैर, लगभग बीस किमी की दूरी हम दो घंटे में तय करके गुप्त गोदावरी जा पहुँचे।

यह स्थल दर्शनीय  है। यहाँ कुल दो गुफाएं हैं जिनमें प्रवेश  रोमांचित करता है। गुफा में प्रवेश  हेतु दस रुपये षुल्क था जिसका भुगतान करके हम अंदर गए। गुफा नंबर एक को राम दरबार के नाम से भी जाना जाता है। इसमें श्रीराम प्रमुख ऋषियों  - मुनियों से मिलते और गंभीर चर्चा किया करते थे। इस गुफा में कई शा खाएं हैं और प्राकृतिक नक्काशी  मन को  बांध लेती है। इसी गुफा के एक हिस्से में वह स्थल है जहाँ सीता जी का वस्त्र चुराने वाले राक्षस को लक्ष्मण ने मारकर उल्टा लटका दिया था। वह वस्त्र सती अनुसूया ने सीता जी को भेंट में दिया था। कहा जाता है कि श्रीराम से मिलने दक्षिण की गंगा कही जाने वाली गोदावरी उनसे मिलने हेतु यहां प्रकट हुई थी। गुफा संख्या दो में घुटनों से ऊपर तक बहता हुआ जल भरा रहता था। यह जल गुफा अंदर पत्थरों में से स्वतः उत्स्रुत कूप की भांति निकलता रहता है। जनश्रुति के अनुसार गोदावरी की एक धारा नाशिक  से अंदर ही अंदर प्रवाहित होती हुई यहाँ पत्थरों को तोड़कर बाहर निकलती है और तब से लगातार प्रवाहित हो रही है। नाशिक  में गोदावरी का उद्गम स्थल देखने का मुझे अवसर मिला था। जब मैं दूसरी बार त्रयंबकेष्वर का दर्शन  करने गया था तो गोदावरी के उद्गम स्थल तक की लंबी चढ़ाई चढ़कर हम वहाँ गए थे और गोदावरी को कई जगहों से प्रकट होते हुए देखा था। इस स्थल पर गोदावरी को भगवान राम ने वचन दिया था कि वे उससे मिलन अवश्य आएंगे और सीता हरण से पूर्व वनवास के अंतिम दो वर्ष वे गोदावरी और कपिला नदी के संगम पर ही पर्णकुटी बनाकर रहे थे। नाशिक  शहर में भी रामघाट एक पवित्र स्थल है जहां कुंभ का मेला लगता है और लोग अपने पितरों का तर्पण करते हैं। इस जल से भरी गुफा में चलना काफी अच्छा लग रहा था। गुफा में जब-तब भीड़ अधिक हो जाती है क्योंकि बाहर से कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है कि दर्षनार्थियों को क्षमतानुसार रोककर भेजा जाए। एक बार लगा कि इसमें कभी कोई हादसा हो सकता है। लेकिन जब तक हादसा हो न जाए, हम एहतियात बरतते कहाँ हैं ?
चित्रकूट में आकर यह पहली जगह मिली थी जहाँ हमें एक सुंदर प्रकृति के दर्शन हुए थे। यहाँ का वातावरण मनोहारी था और पहली बार पर्यटन का आनंद मिलता हुआ महसूस हुआ था। दोपहर हो आई थी और हमें भूख लगने लगी थी। यहाँ के अधिकांश ढाबों में लकड़ी पर खाना बनता है और यह देखकर हमारी लालच कुछ और बढ़ गई। सो, निश्चित  हुआ कि भोजन कर लिया जाए। सती अनुसूया का आश्रम देखकर चित्रकूट पहुंचते-पहुंचते तीन बज जाएगा और भोजन का समय निकल जाएगा। लेकिन जितना देखने में लग रहा था, भोजन उतना अच्छा नहीं निकला और न ढाबे वाले की सेवा ही सराहनीय रही। कुल मिलाकर भोजन हो गया। हमारा आॅटो वाला बेचैन हो रहा था। हम आॅटो में सवार हुए और सती अनुसूया आश्रम के लिए चल पड़े। उस बिगड़ैल रास्ते पर भी आॅटो वाले रेलम-पेल मचाए हुए थे। एक जगह सामने गलत तरीके से आ रहे आॅटो से टक्कर होते-होते बची और हम सती अनसूया के आश्रम पहुंच गए। बीच का रास्ता घने जंगल से होकर जाता है और प्रकृति का सानिध्य मिल जाता है।

सती अनसूया का आश्रम:

सती अनुसूया का मंदिर :       छाया  हरिशंकर राढ़ी 
 यह आश्रम प्राकृतिक रूप से समृद्ध है। यह आज की स्थिति है। त्रेताकाल में यह स्थान और भी संुदर रहा होगा। हमारे ऋषि -मुनि अपनी ज्ञान साधना में किसी प्रकार की टोका-टाकी नहीं चाहते थे और प्रकृति के साहचर्य में रहकर ऊर्जा प्राप्त करते रहना चाहते थे, सो उन्होंने ऐसे स्थलों को चुना और उसे अपने तप से पावन और रमणीय बनाया। इस स्थल पर बने परमहंस आश्रम की पृश्ठभूमि में ऊँचा पर्वत और सम्मुख मंदाकिनी की मंद और निर्मल धारा के उस पार सघन वन वातावरण को आध्यात्मिक बना रहे थे। परमहंस आश्रम की भव्यता और उसके अंदर की झांकियाँ हमारी पहुँच को सार्थक कर रहे थे। इसमें अनसूया का त्रिदेवों को अबोध बालक बनाना और सीता को सतीत्व का उपदेश  देना प्रमुुख है जिसे लोग बड़ी श्रद्धा से देखते हैं। सती अनसूया अपने पति अत्रि मुनि के साथ यहाँ चिरकाल तक निवास करती रहीं और सीता को उपदेश , आशीष  और उपहार स्वरूप वस्त्राभूषण  दिया था।
सती अनुसूया का आश्रम  :       छाया  हरिशंकर राढ़ी 
रामचरित मानस के अनुसार चित्रकूट में मंदाकिनी का अवतरण सती अनसूया के तप से हुआ था। ऋषियों -मुनियों की सुविधा तथा वन्य पशुओं की प्यार बुझाने हेतु एक जलस्रोत की आवश्यकता थी और उस आवश्यकता को सती अनसूया ने अपनी कठिन साधना से पूरा किया। गोस्वामी तुलसीदास लिखते हैं -






नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रि प्रिया निज तपबल आनी।
सुरसरि धार नाम मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि।

वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड के उनसठवें सर्ग में मंदाकिनी का अप्रतिम वर्णन मिलता है। श्रीराम मंदाकिनी को सरयू के समान पवित्र और पापहारी मानते हैं तथा सीता से आग्रह करते हैं कि वे भी उनके (राम के) साथ मंदाकिनी में स्नान करें -
विधूतकल्मशैः सिद्धैस्तपोदमष्मान्वितैः ।
 नित्यविक्षोभितजलां विगाहस्व मया सह।। (2/59/13)
लेकिन आज यह मंदाकिनी शायद अपने जन्म को रो रही होगी। नदी तो दूर, आश्रम की पवित्रता का ध्यान किए बिना भी लोग मल-मूत्र से लेकर हर प्रकार की गंदगी इसके आँचल में डालते रहते हैं। पता नहीं क्या होगा ऐसी सोच वाले लोंगो का और देश  का। कहने के लिए धर्म हमारा प्राण है। हम सबसे बड़े धार्मिक देश  के निवासी हैं जहाँ ईश्वर  ने एक नहीं, दस अवतार लिए हैं। इसका उद्गम आश्रम से कुछ ही दूर घने जंगल में है और हमें समयाभाव और खतरा मोल न ले पाने की स्थिति के कारण इसका उद्गम देखे बिना ही चलना पड़ा। हाँ, आश्रम के ठीक ऊपर सती अनसूया का प्राचीन मंदिर और कुछ अन्य अवशेष  देखना हम नहीं भूले।
पूरी तरह आश्रम देख और महसूस कर लेने के बाद हम पुनः आॅटो में सवार हुए और चित्रकूट की ओर वापस।