Monday, 28 November 2016

खेत नहीं थे तो बुजुर्ग ने छत पर उगा दी फसल, वैज्ञानिक भी हैरान

मुझे श्री भागीरथी बिसई जी के बारे में अपने स्तर से कोई जानकारी नहीं है. फेसबुक पर सतनाम भाई ने एक लिंक साझा किया है, उसी से उपलब्ध जानकारी आप तक पहुँचा रहा हूँ.     -इष्ट देव


नई दिल्ली ( 27 नवंबर ):एक 73 वर्षीय किसान किसान भागीरथी बिसई ने अपने घर की छत पर ही धान की खेती की है। दरअसल बिसई के पास खेत नहीं हैं। उन्होंने लीज पर खेत लेने के बजाय खुद ये नया तरीका इजाद कर लिया। खेती में छत गिर न जाए, इसके लिए उन्होंने छत पर रेत और सीमेंट की ढलाई तो कराई, लेकिन लोहे की छड़ के साथ बांस की लकड़ी लगवाई।
उनका तर्क है कि बांस जल्दी नहीं सड़ता। बास के कारण सीलन की समस्या दूर हो गई। छत पर मिट्टी की छह इंच परत बिछाई गई है। वह परंपरागत किसान हैं। इस एक्सपेरिमेंट के लिए उन्होंने कोई ट्रेनिंग नहीं ली है।
बिसई ने 2004 में एफसीआई से रिटायर होने के बाद 100 वर्गफीट में धान बोया और प्रयोग सफल रहा। फिर उन्होंने घर को दो मंजिला किया। तीन हजार वर्गफीट की छत पर छह इंच मिट्‌टी की परत बिछाई। अब वे तीन हजार वर्गफुट की छत पर ही खेती कर रहे हैं। साल में दो क्विंटल धान दो अलग-अलग किस्मों के साथ लेते हैं। उनके इस जुनून को देखकर वैज्ञानिक भी हैरान हैं।
क्या-क्या उगाते हैं
- भागीरथ दुबराज धान व सब्जी की खेती करते हैं।
- गेंदा फूल के पौधे में टमाटर, बैगन के साथ दो किस्म की मिर्ची का उत्पादन करते हैं।
- अब कम लागत में धान की 14 इंच की बाली से अधिक उपज लेने में लगे हुए हैं। पौधे तैयार कर दूसरी जगह प्लांट करते हैं।

Tuesday, 15 November 2016

MAHRAJGANJ, AZAMGARH

महराजगंज बाज़ार, आजमगढ़ 

                                      -हरिशंकर राढ़ी 


महराजगंज बाज़ार  आजमगढ़ के प्रमुख कस्बों में यह बाजार शामिल है। इसकी प्राचीनता पर कोई प्रश्नचिह्न तो लगाया नहीं जा सकता, किंतु इसकी स्थापना का इतिहास बता पाना दुरूह अवश्य है। ‘आजमगढ़ गजेटियर’ में महराजगंज का जिक्र बहुत कम आता है। दोहरीघाट, मऊ निजामबाद, घोसी और दुर्बाशा आश्रम का उल्लेख कई बार मिला किंतु महराजगंज और भैरोजी का कोई अता-पता नहीं मिलता। इसका अर्थ यही हो सकता है कि महराजगंज अति पिछड़े क्षेत्र में था औरं इसे आजमगढ़ की कंेद्रीय भूमिका में कोई खास जगह नहीं थी। एक कारण और था कि महराजगंज से उत्तर लगभग 12 किमी तक कछार क्षेत्र था जो अति पिछड़ा था। इसलिए जनपद के आर्थिक एवं राजनीतिक परिदृश्य में इस इलाके का महत्त्व नहीं रहा होगा।
राजकीय बालिका विद्यालय महराजगंज(भैरोजी)               छाया :  राजनाथ मिश्र
यह भी हो सकता है कि वह युग भौतिकतावादी और बाजारवादी नहीं था। बाजार लोगों की मांग के अनुसार चलते थे, लोग बाजार की आपूर्ति के हिसाब से नहीं। बाजार की जरूरत उतनी ही थी जितनी भोजन में नमक। मुझे याद है कि लोग अगम्य और दूरस्थ गांवों में रहना पसंद करते थे, बाजार में नहीं। खुली हवा, भाई-पट्टीदार और अपनत्व का महत्त्व हुआ करता था। मूल आवश्यकता की चीजें ही बाजार से आती थीं। तब बाजारों में प्यार और त्योहार नहीं बिका करते थे। समय बदला है, प्यार का इजहार उपहार में मंहगी चीजें देकर किया जाने लगा है। त्योहार कैसे मनाए जाएँ, रक्षाबंधन पर भाई-बहन एक दूसरे को क्या उपहार दें जिससे प्रेम की गहनता प्रमाणित हो, यह बाजार तय करने लगा और ऐसी चीजें बाजार हमारे घरों में ठेलना लगा। तो लगता है कि तब बाजार का वह महत्त्व नहीं रहा होगा और महराजगंज जैसे बहुत से बाजार अखबारों पत्रिकाओं से गायब ही रहते थे।
पिछली किश्त में भैरोजी स्थित पुराने ऊँचे टीले का जिक्र करते हुए, जिसपर आजकल राजकीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का भवन है, मैंने श्री जे के मिश्र द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर बताया था कि यहाँ नील बनाने की भट्ठियाँ थीं और नील उत्पादन का कार्य कूपर साहब की देखरेख में चलता था। यह बात “आजमगढ़ गजेटियर” के आधार पर भी प्रमाणित होती है। हालांकि इस अंक में महराजगंज का जिक्र तो नहीं है, किंतु यह स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि अक्षयबट, नगवा और भीलमपुर में नील की खेती होती थी। ऐसा लगता है कि नील का प्रसंस्करण भैरोजी में ही होता रहा होगा। (Azamgarh Gazetteer, Vol XXXIII, of the District Gazetteer of the United Province of Agra and Oudh, Edited and Compiled by DRAKE –BROCKMAN – ICS. Published in 1911)
मिडिल स्कूल  जहां  नया  विद्यालय बना है ( महराजगंज भैरोजी)  छाया :  राजनाथ मिश्र 
दरअसल यह गाँव विशुनपुर का एक हिस्सा है। छोटी सरयू के दक्षिण की ओर का पूरा क्षेत्र गाँव विशुनपुर की सीमा में था। समय के साथ कुछ बनियों ने यहाँ पर परचून इत्यादि की दूकानें खोलीं। दूकानों का विस्तार हुआ और एक छोटा सा बाजार अपना रूप लेने लगा। आज भी बाजार का कुछ हिस्सा विशुनपुर के राढि़यों की संपत्ति है, जो कि पहले उनका खेत हुआ करता था। बाजार की अधिकांश दूकानें विशुनपुर और कुछ महेशपुर के राढ़ी निवासियों के खेतों में बनी हैं। कालांतर में बाजार का विस्तार होता गया और इसे महराजगंज के नाम से जाना जाने लगा।
 अपुष्ट इतिहास, जनश्रुतियों और श्री जेके मिश्र जी की बात को आधार मानें तो महराजगंज बाजार का नामकरण राढ़ी ब्राह्मणों के नाम पर हुआ। राढ़ी ब्राह्मण दो सौ साल से अधिक पहले बंगाल से विस्थापित होकर इस क्षेत्र में आए थे। ऐसा माना जा सकता है कि जब अंगरेजों और नवाब  शिराजुद्दौला के बीच जंग हुई, बंगाल में अंगरेजों का शासन स्थापित हुआ, उस समय आंतरिक हलचलों और धर्मपरिवर्तन के भय से राढ़ी ब्राह्मण बंगाल से पलायन कर गए। इसमें संदेह नहीं कि बंगाल का राढ़ क्षेत्र किसी समय मानव सभ्यता का एक उन्नत केंद्र था। बंगाल की यह उर्वर भूमि बौद्धिक क्षेत्र में अपना शानी नहीं रखती थी। यदि ..... को सत्य माना जाए तो राढ़ क्षेत्र भारतीय सभ्यता का केेंद्रविंदु था। जो भी हो, राढ़ी ब्राह्मण बंगाल से पलायन कर उपयुक्त निवासयोग्य स्थल की तलाश करते उत्तरप्रदेश (तब अवध क्षेत्र जो अति पावन माना जाता था) तक आए। राढि़यों के कुछ पूर्वज सुगौटी नामक गाँव में आकर बस गए। यह गाँव भैरव स्थान से लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर आज भी है। वर्तमान में यादव बाहुल्य यह गाँव बहुत ही समृद्ध है। तब यह गाँव सरयू और छोटी सरयू के दोआबे की बाढ़ से ग्रसित था। कुछ समय बाद विष्णु राढ़ी और महेश राढ़ी (दोनों सगे भाई) सुगौटी को छोड़कर दो अलग-अलग जगहों पर बस गए। विष्णु राढ़ी के नाम पर विशुन पुर (विष्णुपुर) और महेश राढ़ी के नाम पर महेशपुर गाँव आबाद हुआ। यहाँ यह भी उल्लेख करना जरूरी है कि इन लोगों ने कालांतर में पूर्वी उत्तर प्रदेश में पाए जाने वाले उत्तम ब्राह्मणों का जातिनाम ‘मिश्र’ अंगीकार कर लिया। ‘मिश्र’ ब्राह्मणों में राढ़ी बहुत विरले पाए जाते हैं और ये जहाँ भी हैं, इनका गोत्र कश्यप है। महेशपुर गाँव छोटी सरयू के उत्तर देवारा क्षेत्र में है और विशुनपुर बाँगर क्षेत्र में। इस अंतर को लेकर दोनों गाँवों की राढ़ी विरादरी में हँसी मजाक का दौर आज भी चलता रहता है।
अपने विस्थापन और स्थापन के समय राढ़ी ब्राह्मण अपनी बौद्धिक और तापस्विक क्षमता के लिए जाने जाते थे।( ब्राह्मणत्व के साथ-साथ इनमें क्षत्रियत्व  का सम्मिश्रण भी देखने को मिल जाता है ।) सम्मान सहित इन्हें ‘महराज’ भी कहा जाता था। चूँकि महराजगंज बाजार इन्हीं राढि़यों की जमीन और दान पर बसा था, इसलिए इसका नाम महराजगंज पड़ा।
नया चौक  महराजगंज   छाया :  राजनाथ मिश्र 
आज महराजगंज बाजार का पुराना चौक पहले प्रमुख बाजार था और शायद वहीं तक सिमटा हुआ था। कच्ची सड़क, चौक के उत्तर कुछ पंसारियों की दूकानें जो तबकी सामाजिक व्यवस्था के अनुसार बनियों द्वारा ही चलाई जाती थीं। चौक के उत्तर एक दो सुनार जिनके वंशज आज भी उसी धंधे से जुड़े हैं। उसके उत्तर कुम्हारों का मोहल्ला। चौक के पूरब हलवाइयों की दूकानें जिनमें प्रमुख हलवाई शंकर थे। उनकी तीसरी-चौथी पीढ़ी ने बदलते समय के साथ व्यवसाय को अद्यतन और विस्तारित किया। जातिगत व्यवसाय की समाप्ति के बाद अनेक दूकानें खुल गई हैं और गहमागहमी बढ़ी है। चौक के पश्चिम जनरल स्टोर्स थे जिसमें वहीद मियाँ की दूकान सबसे विश्वसनीय थी। एक दो केमिस्ट और हकीम। चौक के दक्षिण लगभग खाली क्षेत्र। काफी आगे जाने के बाद महराजगंज बाजार का थाना और फिर अधिकतर राढि़यों के खेत। बाद में वहीं से नई सड़क निकली जो आज भी नई सड़क के नाम से जानी जाती है और नया चौक गहमागहमी का नया केंद्र। सड़क और परिवहन के बढ़ते महत्त्व के कारण यद्यपि यहां रौनक बढ़ी है किंतु बड़ी खरीदारी के लिए पुराना बाजार और पुराना चौक ही प्राथमिकता के तौर पर चुना जाता है।
महराजगंज बाजार छोटी सरयू नदी के तट पर बसा है। छोटी सरयू सदानीरा नहीं है। मानसून को छोड़कर बाकी महीनों में इसमें पानी कम ही रहता है। कमर भर अधिकतम। किंतु छोटी सरयू कभी आज की घाघरा यानी सरयू थी, ऐसी मान्यता और प्रमाण है। नदियां रास्ता बदलती हैं, यह एक भौगोलिक तथ्य है। छोटी सरयू से घाघरा के वर्तमान प्रवाहपथ तक का क्षेत्र देवारा है, जितना ही उपजाऊ उतना ही कभी समस्याग्रस्त। छोटी सरयू में बरसात के दिनों में नाव चला करती थी और बारहवीं कक्षा की पढ़ाई तक मैं भी नाव से पार करके महराजगंज इंटर कॉलेज जाया करता था। सन् 1984 के आसपास लकड़ी का पुल तैयार हुआ था किंतु मुझे याद है कि जिस दिन नदी में आखिरी बार नाव चली थी, उस दिन मैं नाव से पार करते हुए अपनी साइकिल समेत नदी में गिर गया था और वहां गले तक पानी था। भीगकर घर वापस आया और अगले मानसून तक पुल चालू हो गया था।

Saturday, 8 October 2016

Bhairo baba - Azamgarh ke. Part-3

महराजगंज और भैरव बाबा : पार्ट -3

                          ---हरिशंकर राढ़ी 

यदि भैरव बाबा की कहानी शुरू होती है और उसके साथ इस स्थान के इतिहास की चर्चा होती है तो निकटवर्ती बाजार महराजगंज को उपेक्षित नहीं किया जा सकता। यह क्षेत्र आजमगढ़ जनपद में बहुत महत्त्वपूर्ण है और इसका इतिहास भारत के स्वाधीनता संग्राम से जुड़ता है। स्वाधीनता संग्राम में आजमगढ़ का बहुत बड़ा योगदान रहा है और महराजगंज क्षेत्र इसमें अग्रणी। मैंने अपने पिछले लेख में भैरव जी स्थित जूनियर हाई स्कूल और ऊँचे टीले की चर्चा की थी। यह ऊँचा टीला, जहाँ आजकल प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का भवन है, ब्रिटिश शासन में एक अंगरेज शासक का निवास सह कार्यालय था। उस समय यहाँ नील की खेती होती थी और इस टीले के आसपास नील की फसल से नील निकाला जाता था, अर्थात उसका प्रसंस्करण होता था। मि0 कूपर (Mr Cooper)  इसके प्रमुख परियोजना अधिकारी और स्वामी थे। अंगरेज कोई भी हो, उसका रुतबा किसी कैप्टन या कोतवाल से कम नहीं होता था। उसे भारतीय जनता को प्रताडित करने का हक था। कूपर साहब कोई अपवाद नहीं थे। उनका भी क्षेत्र में भयंकर आतंक था। सामान्यतः अशिक्षित जनता उन्हें ‘नीलहवा’के नाम से पुकारती थी। ‘साहब’ घोड़े पर सवार होकर चलते थे और हाथ में दूसरे अंगरेज सिपाहियों-प्रशासकों की भांति एक हंटर होता था। उसका प्रयोग वे किसी भी हिन्दुस्तानी की पीठ पर कर सकते थे। उनके आतंक का आलम यह था कि ‘शोले’ के गब्बर की तरह माताएँ अपने बच्चों को दूध पीने और सोने के लिए उनके नाम से डराती थीं। यह बात सन् उन्नीसवीं शताब्दी के आखिरी दशक (1890-1900 ई.) के आसपास की होगी। माना कि इन बातों का आधिकारिक उल्लेख कहीं नहीं मिलता किंतु जिनका जन्म 1930 के बाद हुआ, वे लोग ऐसी घटनाओं को अपने माता-पिता और दादा-दादी से सुन चुके हैं। अतः उनकी बातों पर संदेह करने का कोई कारण नहीं बनता। इस विषय पर मुझे सबसे अधिकृत जानकारी श्री जाह्नवी कांत मिश्र जी से मिली जो आजकल बेंगलुरू में रहते हैं। आप विशुनपुर (राढ़ी का पूरा), महराजगंज के निवासी हैं और उम्र के आठवें दशक में हैं। उस जमाने के उच्च शिक्षित मिश्र (भारत सरकार की इंजीनियरिंग सेवा से सेवानिवृत्त) जी भैरव जी के इतिहास के विषय में विस्तृत और  गहन जानकारी रखते हैं।
कृत्रिम नील के आविष्कार के बाद नील की खेती भारत से अपना बोरिया बिस्तर समेटने लगी। धीरे-धीरे राष्ट्रवाद की चेतना उभरने लगी और गांधी जी प्रभावित हो निरीह जनता भी आजादी के आंदोलन की भागीदार बनने लगी। सन् 1916 के आसपास बिहार के पश्चिमी चंपारन में नील किसानों का बुरा हाल था। महात्मा गांधी उसी दौरान नील आंदोलन में कूदे और सत्याग्रह के बल पर विजयी हुए। चंपारण से नील किसान राजकुमार शुक्ल कांग्रेस के लखनऊ सम्मेलन में आकर गांधी जी से वहां चलने और नील किसानों की समस्याओं का समाधान करने का आग्रह किया। अंततः गांधी जी गए और चंपारण का आंदोलन महात्मा गांधी और भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास लिए मील का पत्थर साबित हुआ। यहां भैरोजी में चंपारण जैसे हालात तो नहीं थे, किंतु नील व्यवसाय के पतन के साथ मि0 कूपर को इलाका छोड़कर भागना पड़ा और उसके भवन को स्कूल में तब्दील कर दिया गया। जहाँ नील को पकाने के लिए बड़ी-बड़ी भट्ठियाँ बनीं थीं, वही स्थान बाद में टीले के रूप में अस्तित्व में आया।
आजादी की लड़ाई में आरा के वीर कुंवर सिंह ने अंगरेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। आजमगढ में एक भयंकर संघर्ष हुआ था जिसका 1857 के संग्राम में बहुत महत्त्व रहा है। जनपद में जगह-जगह सभाएं और रैलियाँ हुआ करती थीं। सामयिक साहित्य और संगीत भी इस बात का साक्षी है। भैरव जी और महराजगंज के बीच में एक महत्त्वपूर्ण गांव है अक्षयबट। इस गांव की अधिकांश आबादी क्षत्रियों की है, हालांकि और जातियों के लोग भी इस गांव के निवासी हैं। इस गांव में आम का एक बहुत बड़ा बाग था जो मेरे बचपन में भी बड़ा था। यह बात अलग है कि भौतिकता  और बाजारवाद के इस युग में यह बाग भी अपनी आखिरी सांसे गिन रहा है। आम की संकर प्रजातियों के आगमन के बाद देशी या बीजू आमों ने अपना महत्त्व खो दिया। पेड़ बूढ़े हो गए और अनुपयोगी। ऊपर से जमीन और व्यावसायिक भवनों की मांग ने इनकी उपयोगिता और कम कर दी। किंतु कभी इस बाग का जलवा था। इसमें नागपंचमी के दिन क्षेत्र की प्रसिद्ध दंगल हुआ करती थी। अब न वे शौक रहे और न जरूरतें।
इस बाग में आजादी की बहुत सी सभाएं हुईं। बकौल पिता जी, कई बार इन सभाओं में वे भी एक बाल दर्शक के रूप में शामिल हुए। दरअसल इन सभाओं में केवल भाषण और नारेबाजी ही नहीं, देशभक्ति के गीत भी गाए जाते थे और उस समय के स्थानीय अच्छे गायक लोगों में चेतना जगाने का कार्य करते थे। नाम तो मुझे याद नहीं, किंतु पिता जी के अनुसार कोई प्रज्ञाचक्षु गायक थे जो महफिल लूट लिया करते थे। उनका गाया एक गीत (जिसे स्थानीय बोली में नकटा कहते हैं) पिताजी को याद था और वे उसे सस्वर गाकर सुनाया करते थे -
पहिरा गवनवाँ की सारी, विदेशी विदा है तुम्हारी।
अर्थात हे अंगरेजों ! अब तुम गवने की साड़ी पहनो। अब तुम्हारी विदाई का समय आ गया है। यहां केवल अंगरेजों को भगाने का ही संकल्प नहीं है, अपितु इस बात का दर्द भी है कि तुमने जितना इस देश को लूटा है, उसे ले जाओ और जीवन को आराम से बिताओ, लेकिन अब तुम्हारी विदाई का वक्त आ गया है। यह गीत 40 के दशक में गाया जा रहा था जब अंगरेजी सरकार की जड़ें भारत से हिल चुकी थीं। यह गीत पिताजी पूरा सुनाया करते थे किंतु न तब इसे लिखा गया और न अब याद रहा।
भैरव जी का अस्तित्व तब भी था किंतु मंदिर आज की भांति उत्तुंग और आलीशान नहीं था। भैरव मंदिर अत्यंत छोटा सा कच्चा मंदिर हुआ करता था। अधिकांश क्षेत्रीय जनता के लिए यही छोटा मंदिर एक विशाल संबल हुआ करता था। सामाजिक उत्सवों, निजी कार्यों और जनहित की सभाओं के लिए यही स्थान सर्वथा उपयुक्त माना जाता था। कालांतर में कच्चे मंदिर के स्थान पर ही लगभग उतना ही बड़ा मंदिर लाहौरी ईंटों से बनाया गया जिसका अस्तित्व अभी एक दशक पहले तक विशाल मंदिर के गर्भ में कायम रहा। जब बड़े मंदिर में भैरव जी के विग्रह की स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा हुई, तब लाहौरी ईंटों वाले मंदिर का विसर्जन किया गया। आज भी उस स्थान पर एक त्रिकोण घेराबंदी में एक लघु विग्रह मौजूद है।
समूचे ग्रामीण भारत की तरह स्वतंत्रतापूर्व यह क्षेत्र भी अति पिछड़ा, साधन विहीन और निर्धन था। फिर भी यह क्षेत्र अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा, भाईचारे और देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत था। गांधीवाद का युग था और अधिकांश घरों में चरखे चला करते थे। जो कुछ सीमित साधनों के दायरे में हो सकता था, वह देश के लिए किया जा रहा था। धीरे-धीरे सामाजिक और राजनैतिक गतिविधियों का केंद्र महराजगंज बाजार होता गया क्योंकि वहाँ बाजारू सुविधाएँ उपलब्ध थीं और वह आर्थिक गतिविधियों का केंद्र बनता गया।


Wednesday, 7 September 2016

खाट पड़ी है बिस्तर गोल

इष्ट देव सांकृत्यायन

खाट पड़ी है बिस्तर गोल
बोल जमूरा जय जय बोल
आते ही नज़दीक चुनाव
शुरू हो गए बचन बोल

सबका दुख वे समझ रहे हैं
जिनके बदल गए हैं रोल.
खिसक गई ज़मीन तो काहें
घिस रहे हैं झुट्ठै सोल.

कसरत कोई कितनी कर ले
मन है सबका डावाँडोल
अपने चरित्र का कोई न ठेका
खोल रहे सब सबकी पोल

चाहे जिसकी देखो पंजी
सबमें हुई है झोलमपोल
भाँग कुएँ में कौन मिलाए
बरस रहा है गगन से घोल

अपने ढंग से बजा रहे हैं
सभी एक दूसरे का ढोल
किसी के सिर पर ताज बिठा दे
जनता कितनी है बकलोल.

Thursday, 30 June 2016

Azamgarh ke Bhairv Baba (Part-2)

आजमगढ़ के भैरो बाबा   ( भाग - 2)

                                            -हरिशंकर राढ़ी

पिछले सप्ताह भैरो बाबा के इस स्थान पर जाने का पुनः अवसर मिला। कुछ विशेष परिवर्तन तो होना नहीं था इस बीच। हाँ, पिछले लेख में कुछ छूट अवश्य गया था जिसे पूरा करने का खयाल मन में बैठा था। दशहरे का प्रसिद्ध मेला समाप्त हो रहा था। झूले और सर्कस वाले अपना डेरा-डम्पा हटा रहे थे। खजले की दुकानें अभी भी थीं, उनकी संख्या अब कम हो चली थी। दिन मंगलवार था नहीं और सुबह का समय था, इसलिएइक्का - दुक्का दर्शनार्थी आ रहे थे। मंदिर परिसर में प्रवेश करने पर एक सुखद आश्चर्य हुआ कि गर्भगृह में इस बार पंक्तिबद्धता के लिए बैरीकेड लग गए हैं जो अपार भीड़ में थोड़ा -बहुत तो काम करते ही होंगे। मंदिर का परिक्रमा पथ कीचड़ और फिसलन से लथपथ था। रात में बारिश हुई थी और सफाई करे तो कौन ?

भैरव  मंदिर का एक दृश्य            छाया : हरिशंकर राढ़ी 

रोजगार की तलाश और भौतिकवाद ने सुविधाओं की बढ़ोतरी की है। मुझे याद है कि मेरे बचपन में यहां केवल मंगलवार को ही पूजा-प्रसाद यानी कि फूल-माला और बताशे की दुकानें लगती थीं। बाकी किसी दिन आइए तो आपका सामना केवल लाल बंदरों से होता था। बंदरों की एक विशाल फौज इस पेड़ से उस पेड़ तक भाग-दौड़ किया करती थी। इनके उत्पात से दर्शनार्थी परेशान होते रहते थे। यह बात अलग है कि मनोरंजन के घोर अभाव के उस युग में ये मनोरंजन के निःशुल्क साधन होते थे। प्रसाद और  कड़ाही चढ़ाना मुश्किल होता था। लगभग पंद्रह साल पहले एक लंगूर आया और उसने लाल बंदरो की पूरी सेना को न जाने किस देश भगा दिया। आज भैरोजी के स्थान पर एक भी बंदर नहीं दिखता और स्थानीय लोग बंदरों की कमी महसूस करते हैं। सच यह है कि बंदरों के गायब होने की कमी खलती सी है।            

अब यहां फूल-बताशे की चार-पांच दूकानें हर दिन खुली मिल जाती हैं। मंगलवार को इनकी संख्या 25-30 से कम नहीं होती। बगल से महराजगंज- राजेसुल्तान पुर मार्ग निकलता है। घाघरा नदी पर बिड़हर घाट सेतु बन जाने से वाया जहांगीरगंज इस मार्ग का संपर्क गोरखपुर से हो गया है। अब कुछ प्राइवेट बसें भी इस मार्ग से चलने लगी हैं। पूरा देवारा क्षेत्र (छोटी सरयू से उत्तर घाघरा नदी तक का क्षेत्र यहां देवारा के नाम से जाना जाता है क्योंकि आजादी के बाद तक यह घाघरा का बाढ़ क्षेत्र था) अब सड़कों के जाल से जुड़ गया है। फलस्वरूप दर्शनार्थियों का आना-जाना लगा ही रहता है और कुछ लोगों की जीविका चलती रहती है।
हनुमान  मंदिर का एक दृश्य            छाया : हरिशंकर राढ़ी 


इसमें संदेह नहीं कि इस ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल के बहुत से रहस्य समय के गर्भ में दबे रह गए जिनके उद्घाटित होने की संभावनाएं न के बराबर बची हैं। मुझे याद है कि मंदिर के आस-पास कई ऊंचे-ऊंचे टीले थे जिनके गर्भ में कुछ न कुछ छिपा जरूर था। हो सकता है कि कोई छोटा महल या अन्य महत्त्वपूर्ण भवन रहा हो। सन् 1990 के आस-पास उन टीलों को समतल करके उस पर एक बड़ा राजकीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खोल दिया गया। सरकारी अस्पतालांे का क्या हाल है, यह किसी से छिपा नहीं है। पहले उसी जगह पर दशहरे के मेले के सर्कस और कठपुतली के नाच होते थे। उन टीलों के नीचे क्या छिपा रह गया, अब यह रहस्य ही रह जाएगा।
छोटी सरयू के किनारे एक छोटा सा सतत प्रवहमान जलस्रोत था। उसमें से जल की धारा लगातार बहती रहती थी। मेरी किशोरावस्था में यह स्रोत पतली उंगली के बराबर मोटा था। भैरव बाबा पर मेरे पिछले लेख की चर्चा चली तो राढ़ी का पूरा (विशुनपुर) के श्री त्रिलोकीनाथ मिश्र ने बताया कि उनकी किशोरावस्था यह जलस्रोत काफी मोटी धारा के रूप में था। श्री मिश्र जी कौड़िया इंटर काॅलेज के प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त हैं और उनकी उम्र 70 वर्ष से अधिक होगी। आप एक बहुत अध्ययनशील, आध्यात्मिक प्रवृत्ति विद्वान और सम्मानित व्यक्ति हैं। अतः उनकी बात  पर विश्वास न करने का कोई कारण तो नहीं दिखता। देख तो नहीं पाया, सुना है कि वह जलस्रोत अब पाट दिया गया है क्योंकि भौतिक विस्तार तो होना ही है।

क्षेत्र के तमाम उम्रदराज लोग बदलती परंपराओं और मूल्यों का दर्द लेकर जी रहे हैं। उन्होंने भैरो जी और उस क्षेत्र का गौरवशाली इतिहास देखा है, इतिहास को बदलते देखा है।  स्वाधाीनता संग्राम में भी इसके आस-पास लोग इकट्ठा होते थे और अंगरेज सरकार के खिलाफ जनसभाएं होती थीं। वह युग स्वानुशासन और नैतिकता का था। आधा पेट खाकर भी लोग मूल्यों की रक्षा करते थे। भैरो जी स्थित मिडिल स्कूल सत्तर से ऊपर की उम्र के सभी क्षेत्रीय शिक्षितों के लिए एक गर्व का संस्थान है। केवल आवश्यक योग्यता वाले अध्यापकों ने शि़क्षा का आदर्श कायम कर रखा था। भले ही वे अध्यापक आज के शि़क्षकों की भांति उच्च डिग्री प्राप्त नहीं थे, पर उनका नैतिक स्तर, समर्पण और निष्ठा अतुलनीय थी जिसके दम पर अभाव में जी रहे शिक्षक और शिक्षार्थी प्रतिमान बनाते थे। जो कुछ भी था, ईमान आधारित था और शिक्षण एक पेशा नहीं, अपितु एक पुनीत कर्तव्य था।
समय के साथ सरकारी विद्यालयों ने अपना महत्त्व और सम्मान खोया है। शिक्षकों की उदासीनता, समाज का पश्चिमीकरण, शिक्षा का व्यवसायीकरण और निजी विद्यालयों की चोंचलेाबाजी तथा सरकार की जड़ के बजाय पत्ते सींचने की प्रवृत्ति ने सरकारी विद्यालयों को सफेद हाथी बनाकर रख छोड़ा है। अब वहां का मुख्य कार्य मध्याह्न भोजन बांटना और निःशुल्क सुविधाएं पहुंचाना है। फलस्वरूप सरकारी विद्यालय अपने वर्तमान को अतीत के रूप  में जी रहे हैं। भैरोजी का यह मिडिल स्कूल भी दुर्दिन को प्राप्त हो चुका है। क्षेत्र में कुकुरमुत्तों की भांति अनेक निजी विद्यालय खुल गए हैं जिनमें अप्रशिक्षित अयोग्य अध्यापक बेरोजगारी की मार झेलते हुए दिहाड़ी मजदूरों से भी कम वेतन पर शिक्षा बंाटने का प्रयास कर रहे हैं और पुरानी पीढ़ी सरकारी विद्यालयों की दुर्दशा पर आंसू बहा रही है।
आजमगढ़ या महराजगंज तो क्या, पूरा पूर्वी उत्तर प्रदेश सरकारी उदासीनता का शिकार रहा है। इस क्षेत्र से कई बड़े नेता और मंत्री सरकारों से जुड़े किंतु विकास के नाम पर उतना ही हुआ जितना किसी अनाथ क्षेत्र का होता है। आजमगढ़ और गोरखपुर की भौगोलिक सीमा का निर्धारण घाघरा नदी करती है जो लंबाई को छोड़ दे ंतो गंगा से किसी भी रूप में कम नहीं है। इसकी चैड़ाई, जल प्रवाह और जल विस्तार क्षेत्र प्रायः गंगा को  मात दे देता है। ऊपर से सरयू से इसका मिलना इसे पवित्रता प्रदान करता है। उल्लेखनीय है कि घाघरा नदी को सरयू के नाम से भी जाना जाता है और लोक आस्था में यह बहुत पुनीत नदी है। अयोध्या को पवित्र करती और राम जन्म भूमि से पवित्र होती यह नदी आज भी सर्वाधिक प्रदूषणमुक्त है और इसका जल किसी भी सदानीरा से शुद्ध है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में भगवान राम के मुख से इसकी प्रशंसा कराई है-
 जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि । उत्तर दिशि बह सरयू पावनि ।।
बिड़हर घाट  के  घाघरा पुल  पर लेखक                 छाया : शशि मिश्रा 
किंतु भैरोजी से उत्तर देवारा क्षेत्र के निवासियों को घाघरा पार करना सदैव एक चुनौती रहा है। मानसून सीजन में इस नदी का पाट चार-पांच किमी से भी अधिक हो जाता है और ऐसी स्थिति में इसे नाव से पार करना जान पर खेलने से कम नहीं होता। आश्चर्य जनक बात है कि शायद यही नदी होगी जिसपर दो सौ किमी के बीच में कोई पुल नहीं था। अभी कुछ साल पहले फैजाबाद में स्थित घाघरा पुल से पूरब चलने पर दोहरीघाट-बड़हलगंज में ही दूसरा पुल मिलता था। तब दोहरीघाट आजमगढ़ जनपद में था किंतु आज मऊ का हिस्सा है। दोहरीघाट पुल सन 1972 के आसपास तैयार हुआ था और गोरखपुर आजमगढ़ - इलाहाबाद मार्ग से सीधा  जुड़ पाया था। लगभग दो साल पहले जनपद अंबेडकरनगर में बिड़हरघाट पुल बन कर तैयार हुआ तो लोगों को लगा कि दूरी कम भी हो सकती है। हाँ, भैरोजी से लगभग 15 किमी की दूरी पर घाघरा नदी पर बन रहा कम्हरियाघाट पुल तैयार हो जाने पर स्थिति बदलने की उम्मीद की जा सकती है।

Saturday, 28 May 2016

Bhairo Baba :Azamgarh ke

स्थानीय आस्था के केंद्र : आजमगढ़ के भैरव बाबा

                                                                         -हरिशंकर राढ़ी

आस्था तो  बस आस्था ही होती है, न उसके पीछे कोई तर्क और  न सिद्धांत। भारत जैसे धर्म और आस्था प्रधान देश में आस्था के प्रतीक कदम-दर कदम बिखरे मिल जाते हैं। यह आवश्यक भी है। जब आदमी आदमी और प्रकृति के प्रकोपों से आहत होकर टूट रहा होता है, उसका विश्वास और साहस बिखर रहा होता है तो वह आस्था के इन्हीं केंद्रों से संजीवनी प्राप्त करता है और अपने बिगड़े समय को साध लेता है। भारत की विशाल जनसंख्या को यदि कहीं से संबल मिलता है तो आस्था के इन केंद्रों से ही मिलता है। तर्कशास्त्र कितना भी सही हो, इतने व्यापक स्तर पर वह किसी का सहारा नहीं बन सकता !
भैरव बाबा मंदिर का शिखर : छाया - हरिशंकर राढ़ी

 ऐसे ही आस्था का एक केंद्र उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जनपद में महराजगंज बाजार स्थित भैरव बाबा का विशाल एवं अति प्राचीन मंदिर है। प्रशासनिक स्तर पर महराजगंज ब्लॉक भले ही विख्यात हो, भैरव जी की महत्ता और लोकप्रियता दूर-दूर तक फैली है। श्रद्धा और आस्था की दृष्टि से महराजगंज भैरव बाबा के अस्तित्व के कारण जाना जाता है, न कि महराजगंज के कारण भैरव जी को।

भैरव बाबा का यह मंदिर पचास किलोमीटर की परिधि से श्रद्धालुओं को सामान्य दर्शन के लिए खींचा करता है किंतु विशेष मेलों और मनौतियों की दृष्टि से यह आसपास के कई जिलों तक आकर्षण और श्रद्धा का केंद्र है। मनौतियां पूरी होने पर, मुंडन और जनेऊ संस्कार के लिए गोरखपुर, मऊ, बलिया, गाजीपुर, बनारस, जौनपुर और फैजाबाद तक के लोग आया करते हैं। ज्येष्ठ मास के गंगा दशहरा पर लगने वाले सप्ताह भर के मेले में लाखों श्रद्धालुओं का आगमन होता है।

भैरव बाबा का यह मंदिर निस्संदेह बहुत प्राचीन है। इसकी उत्पत्ति के विषय में किंवदंतियां और जनश्रुतियां पौराणिक काल तक ले जाती हैं। सामान्यतः माना यह जाता है कि दक्षिणमुखी ये काल भैरव भगवान शिव के उन गणों के प्रमुख हैं जिन्होंने राजा दक्ष का यज्ञ विध्वंश किया था। यह कथा लगभग हर हिंदू को मालूम है कि राजा दक्ष ने एक यज्ञ किया था जिसमें उन्होंने अपनी पुत्री पार्वती और दामाद शिव को नहीं आमंत्रित किया था। कारण यह था कि वे शिव के अवधूत स्वभाव से चिढ़े हुए थे। पार्वती अनामंत्रित ही पिता के यज्ञ में गई और पति का अपमान देखकर भस्म हो गईं। तब भगवान शिव ने भयंकर क्रोध किया और काल भैरव को आदेश दिया कि वे राजा दक्ष का यज्ञ विध्वंश कर दें। यज्ञ विध्वंश के बाद काल भैरव दक्षिणाभिमुखी होकर यहीं बैठ गए और तबसे यह स्थान भैरव बाबा के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
अतृप्त हवन कुंड  : छाया - हरिशंकर राढ़ी

भैरव जी के इस क्षेत्र में इस कथा का प्रतिवाद करने वाला कोई नहीं है। यह सर्वमान्य हो चुका है कि राजा दक्ष का यज्ञ यहीं हुआ था। मेरे पैत्रिक निवास से इस स्थान की दूरी तीन किलोमीटर से कम है और पहले मुझे भी इस कथा का स्थल यही होने में कोई संदेह नहीं था। िंकंतु यज्ञस्थल यही था, ऐसा मान लेना पूरी तरह उचित नहीं होगा। प्रमाणों के आधार पर यह निश्चित सा हो गया है कि राजा दक्ष का वह यज्ञ हरिद्वार में गंगातट पर कनखल में हुआ था और क्योंकि राजा दक्ष हिमालय या हिमाचल के राजा थे, इसलिए हरिद्वार के प्रमाण में तथ्य मजबूत दिखते हैं।
परंतु संदेह इसमें भी नहीं है कि इस भैरव स्थान पर भी एक यज्ञ हुआ था। उसके प्रमाण हैं। यह स्थल भी छोटी सरयू नदी के किनारे है जहां कभी सरयू नदी स्वयं बहा करती थी। लगभग चालीस वर्ष पहले यहां सैकड़ों कुएं थे जिनमें कई का व्यास चार-पांच फीट ही था। पिताजी के अनुसार उनके बचपन में यहां दो सौ से कम कुएं नहीं रहे होंगे। इसके पीछे कारण यह बताया गया था कि राजा दक्ष के यज्ञ में 360 पंडितों ने भाग लिया था और हर पंडित के लिए एक अलग कुआं था। दूसरा प्रमाण यह दिया जाता है कि मंदिर परिसर में एक हवन कुंड है जिसमें विधिपूर्वक कितनी भी आहुति दी जाए, यह कभी भरता नहीं। कारण कि इस हवन कुंड में पार्वती कूद कर भस्म हुई थीं। आज भी इस हवन कुंड में श्रद्धालू हवन कराते रहते हैं। इसकी पूर्णता की सच्चाई पर दावे से कुछ नहीं कहा जा सकता।
पहले का भैरव मंदिर बहुत छोटा सा था - बिलकुल किसी अति प्राचीन सिद्धपीठ की भांति। आज यहां पर अत्यंत ऊंचा मंदिर है जिसका शिखर दस-बारह किलोमीटर की दूरी से भी दिख जाता है। 
कहा जाता है कि पार्वती का श्राप था कि यहां कोई यज्ञ सफल नहीं होगा। सन 1971-72 के दौरान एक युवा ब्रह्मचारी का आगमन हुआ और उन्होंने मंदिर परिसर से हटकर एक बड़ा यज्ञ करवाया। अपने क्षेत्र का यह अपूर्व एवं अप्रतिम आयोजन था। यज्ञ सफल ही नहीं हुआ, इतना जनसमूह आया और इतना चढ़ावा चढ़ा कि िंकंवदंती बन गई। ब्रह्मचारी जी ने उसी चढ़ावे का उपयोग करके नए उच्च मंदिर का निर्माण कराया. म्ंदिर का ढांचा बहुत पहले ही बनकर तैयार हो गया था और बीसों साल तक यथावत पड़ा रहा। भैरो जी का प्राचीन मंदिर इस विशाल मंदिर के अंदर ही था और स्थानीय लोगों को यह बात पीड़ा पहुंचाती रही। काफी दिनों बाद जब महराजगंज बाजार टाउन एरिया के अंतर्गत आया तो टाउन एरिया निवासी व्यापारियां ने मंदिर की प्लास्टर और साज-सज्जा हेतु कमर कसी। जहां तक मुझे याद है, अपने कार्यकाल में टाउन एरिया चेयरमैन श्री लक्ष्मी जायसवाल ने नेतृत्व का बीड़ा उठाया। स्थानीय सहयोग से मंदिर को साज-सज्जा और भव्यता प्रदान की गई। मंदिर के कलश को सुधारा गया और उसे स्वर्णिम रंगत प्रदान की गई। परिक्रमा पथ बनवाया गया और भैरो विग्रह को बड़े मंदिर में स्थापित किया गया। छोटे मंदिर में भीड़ के दिनों में दर्शन दुर्लभ हो जाता था। अब कुछ आसानी जरूर हुई है। हां, दर्शन की लाइन अभी भी नहीं लगती और पूर्णिमा के दिन धक्कामुक्की चलती रहती है। यह सुनसान सा स्थान आज आजमगढ़ के प्रमुख दर्शनीय स्थलों में एक है।
ग्रामीण क्षेत्र में स्थित होने से इसे प्राकृतिक हरीतिमा का वरदान प्राप्त है। मंदिर से सटा एक विशाल तालाब जिसे यहां पोखरा कहा जाता है, इसके सौंदर्य में वृद्धि करता है। पोखरे में आनंद और श्रद्धा के लिए डुबकी लगाते हैं। स्थल से सटी छोटी सरयू नदी भी वातावरण को रसमय करती है।
मंदिर के पास का पोखरा      छाया - हरिशंकर राढ़ी
         
 आसपास मंदिरों की एक कतार सी है। हनुमान मंदिर (जिसका हाल में ही जीर्णोद्धार हुआ है), मेवालाल का बनवाया हुआ शिव मंदिर भी श्रद्धालुओं के लिए महत्त्वपूर्ण है।
ज्येष्ठ में गंगा दशहरा से पूर्णिमा तक एक सप्ताह का विशाल मेला लगता है। हमारे बचपन का यह बड़ा आकर्षण हुआ करता था। यहीं हमें कठपुतली की नाच, सर्कस, चिड़ियाघर और न जाने कितने अजूबों का दर्शन और परिचय हुआ करता था। हर स्थानीय परिवार में कुछ रिश्तेदार आया करते थे जिसके बहाने मेला घूमने और मिठाइयां खाने का अवसर मिलता था। दूर-दूर से कड़ाही चढ़ाने भक्त आया करते थे। कड़ाही चढ़ाना पूर्वी उत्तर प्रदेश की एक विशेष श्रद्धा है जिसमें देवस्थान पर पूड़ी और हलवा बनाकर इष्टदेव को अर्पित किया जाता है। हर माह की पूर्णिमा को बड़ा और मंगलवार को छोटा मेला लगता है। यातायात के साधनों की प्रचुरता और

आर्थिक स्तर में उन्नयन के साथ श्रद्धालुओं की                                                                                           संख्या बढ़ती जा रही है।

राजेंद्र हलवाई अपनी दूकान पर                                                           
किशोरावस्था के अंतिम वर्षों में हर मंगलवार को यहां जाने का नियम सा हो गया था। जाना, दर्शन करना और उसके बाद राजेन्द्र हलवाई की दूकान पर बैठकर गप्पें मारना एक सुखद एहसास था। मिठाइयों की दूकानें अब भी सजती हैं किंतु वह रस शायद कहीं बिला गया है। व्यापारीकरण की मार यहां तक पहुंची है। इस साल फरवरी में गया तो जहां सैकड़ों कुएं थे, उनका निशान तक नहीं मिला। कुआें को बंद करके निर्माण कार्य और दूकानें सजा ली गई हैं। आखिर आर्थिक विकास और रोजगार के आगे श्रद्धा, परंपरा, संस्कृति और नैतिकता कहां तक ठहर सकती है।


भैरव स्थान पर  छोटी  सरयू के किनारे लेखक 
गंगा  दशहरा पर लगने वाले मेले   का एक दृश्य 

कैसे पहुंचें 

बाहरी लोगों के लिए यह बता देना ठीक रहेगा कि भैरव बाबा का यह स्थान आजमगढ़ जनपद मुख्यालय, रेलवे स्टेशन या रोडवेज बस स्टेशन से लगभग  पचीस किमी की दूरी पर है। आजमगढ़ फैजाबाद राजमार्ग पर आजमगढ़ से 16 किमी की दूरी पर कप्तानगंज बाजार है और वहां से सात किमी महराजगंज बाजार है। भैरव बाबा महराजगंज से बिलकुल सटा हुआ हे और बाजारीकरण के विकास में महराजगंज और भैरव बाबा के बीच की सीमा समाप्त हो चुकी है। फैजाबाद या अकबरपुर से आने वाले सड़क यात्रियों के लिए कप्तानगंज से ही मुड जाना होगा । गोरखपुर की ओर से आने पर आजमगढ़ से पहले जीयन पुर बाजार से महराजगंज मार्ग पर 25 किमी आना पड़ता है।  

महराजगंज और भैरव बाबा में आज भी कोई होटल/लॉज या ठहरने योग्य धर्मशाला नहीं है। अतः यदि कोई व्यक्तिगत परिचय या रिश्ता न हो तो यहां ठहरने का कार्यक्रम बनाकर नहीं आना चाहिए। 
हां, यह प्रशंसनीय है कि यहां कोई लूट-खसोट या धोखेबाजी नहीं है। हालांकि मंदिर की व्यवस्था पंडों के जिम्मे है लेकिन उनका भी कोई आतंक नहीं है।  दस-पांच रुपये में मान जाते हैं। आवश्यकता के सभी सामान और जलपान गृह उपलब्ध हैं।
आखिर ग्रामीण क्षेत्र की संस्कृति और श्रद्धा समेटे इस स्थान का भ्रमण कर लेने में बुरा ही क्या है ?



Monday, 15 February 2016

ghazel

ग़जल
फिसलती रही
 &हरिशंकर राढ़ी

टूटकर साँस चलती रही।
सोच करवट बदलती रही।
बाजुओं में सदा जीत थी
उँगलियों से फिसलती रही।
चाँदनी में अकेली दुल्हन
भोर तकती] पिघलती रही।
दो कदम बस चले साथ तुम
उम्र भर याद चलती रही।
काग की चोंच में मोतियां
हंसिनी हाथ मलती रही।
सेंकने की तलब थी उन्हें
झोंपड़ी मेरी जलती रही।
यूँ कटा जिन्दगी का सफर
रोज गिरती-संभलती रही।