Sunday, 30 June 2019

अंडरवर्ल्ड से तिब्बती योग तक



कल बात गंगा की चली थी और वह भी उल्टी बहने वाली गंगा. सिनेमा की दुनिया में गंगा उल्टी ही बहती है. 80-90 के दशक में जो फिल्में बन रही थीं, एंग्री यंग मैन वाले जो रोल बहुत पसंद किए जा रहे थे और उसी नाते कुछ अभिनेताओं में लोग देवी-देवता देखने लगे थे, उनकी हकीकत शताब्दी के अंत तक आते-आते खुलने लगी थी. मजाक तो समझदार लोग तब भी उड़ाते थे और बोलते थे कि एक टिटहरी जैसा आदमी डॉन के अड्डे में घुसकर हथियारों से लैस उसके पचास मुश्टंडों को निबटा देता है, यह सिर्फ़ हिंदी सिनेमा में ही हो सकता है. और कहीं नहीं.

तो उल्टी गंगा के क्रम में ही मुझे फिल्मी दुनिया की एक और गंगा याद आई. वही गंगा जो मैली हो गई थी. वह गई तो सीधी ही थी. जहाँ तक मुझे याद आता है वह निकली पहाड़ के किसी छोटे से गाँव से थी और अपने शेखचिल्ली टाइप प्रेमी के चक्कर में शादी-वादी करके एक बच्चे की माँ भी बन गई. पर उसका वह प्रेमी फिर गायब हो गया. लौट नहीं पाया समय से.

पहली बात तो यह कि ऐसा भारत में कहीं होता नहीं. कुछ बेहद मजबूर या आपराधिक मनोवृत्ति वाले माता-पिता की बात छोड़ दें तो इस टाइप वाले माँ-बाप भारत में कहीं पाए नहीं जाते जो अपनी बेटी का हाथ किसी अजनबी को ऐसे ही सौंप दें. इस लिहाज से देखें तो यह पहाड़ के लोगों की सरलता का बेहद अपमानजनक उपहास था. लेकिन ख़ैर, सिनेमा को क्रिएटिविटी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर पहाड़ तो क्या पूरे मजाक उड़ाने और सारे तथ्यों को सिर के बल खड़ा करके पूरी की पूरी भारतीय संस्कृति और इतिहास की पूरी ऐसी-तैसी करने की पूरी छूट है और वो होनी ही चाहिए. आखिर उनके साथ भारत विरोधियों की एक पूरी भजनमंडली जो खड़ी है.

वैसे इस बात को लेकर इक्के दुक्के मुकदमे भी दायर हुए थे. लेकिन वे मुकदमे भी संभवतः इसे प्रचार दिलाकर खत्म हो गए. या हमारी महान जुडिशियरी की कृपा से अपनी वास्तविक गति को प्राप्त हो गए.

जब कई दिनों तक वह बहुत जहीन दिखाया गया शेखचिल्ली प्रेमी वापस नहीं आया तो बेचारी नीली आँखों वाली पहाड़ी लड़की उसे ढूँढने शहर निकली. निकल कर वह वहींं पहुँच गई जहाँ पहुँच कर हिंदी सिनेमा की सारी कहानियों को मोक्ष की उपलब्धि हो जाती है.85 में आई इस फिल्म के बाद उस गंगा की कोई फिल्म चली नहीं. इसके बाद 89 में उसने फिल्में साइन करनी ही छोड़ दीं.

इस छोड़ देने पर फिल्मी पत्रिकाएं तमाम तमाम तरह के गॉसिप लेकर बहुत दिनों तक आती रहीं. उस गॉसिप को भारतीय जनता का एक वर्ग उन दिनों बहुत गंभीरता से लेता था और एक वर्ग उसे धेला भाव नहीं देता था. मेरे खयाल से वह 90 का दशक रहा होगा जब उसकी फिल्में आनी बिलकुल बंद हो गईं और कुछ अखबारों में ऐसी फोटुएं आने लगीं जिसमें 'भाई' भी मौजूद होता था. भाई की मौजूदगी वाली उन फोटुओं ने बड़ा तहलका मचाया. बड़ी चर्चा रही बहुत दिनों तक.

फिर यह भी खबर आई मंदाकिनी नाम की वह उलटी गंगा, जिसका असली नाम यास्मीन जोसेफ है और जो एक मुस्लिम माँ और ब्रिटिश पिता की संतान है, असल में 'भाई' के घर में आग लगने का कारण बन बैठी है. हाल ये है कि 'भाई' से उसके संबंधों की गहराई इस हद तक चली गई है कि 'भौजाई' को अपना घर टूटता दिखने लगा है और इसीलिए 'भौजाई' ने उस पर नज़र रखने के लिए अपने गुर्गे लगा दिए हैं.

खबर यह है दाउद से यास्मीन जोसेफ उर्फ मंदाकिनी की मुलाकात असल में एक पार्टी में हुई थी. पार्टी में 'भाई' ने रोल और ब्यूटी की जरा तारीफ क्या कर दी अभिनेत्री मचल उठी. फिर देर तक वो बाकी पार्टी छोड़छाड़ कर भाई से ही उलझी रही. बाद में फोना-फानी होने लगी. फिर तो उनके पास फिल्मों और मॉडलिंग ऑफर्स की झड़ी ही लग गई. मॉडलिंग के लिए वे अकसर भारत से बाहर यानी गल्फ में जाने लगीं. गल्फ में इनके ठहरने की जगह एक ही होती थी और वो था दाउद का विला. एक ऐसा वक्त भी आया कि भाई के साथ मैडम अकसर दुबई में ही घूमती-फिरती, मौज-मस्ती और खरीदारी करती देखी जाने लगीं.

उन्हीं दिनों बॉलीवुड के ही एक प्रोड्यूसर जावेद सिद्धीक के क़त्ल की ख़बरें आईं. थोड़े दिनों बाद यह बात भी आ गई कि इस क़त्ल के पीछे कोई और नहीं, 'भाई' ही हैं. भला 'भाई' से इसका क्या चक्कर हो सकता है? इतनी हिम्मत तो फिल्मी दुनिया मं किसी की है नहीं कि 'भाई' के ख़िलाफ़ एक लफ़्ज भी बोले और न इतनी कि 'भाई' का पैसा लेकर कोई लौटाने से इनकार कर दे. फिर क्यों मारे गए सिद्दीक. इन तमाम सवालों से गुज़रती ख़बरें आख़िर में इस निष्कर्ष पर पहुँचीं कि सिद्दीक ने असल में यास्मीन जोसेफ उर्फ मंदाकिनी को अपनी किसी फिल्म में साइन करने से मना कर दिया था.

इसके बाद शारजाह के किसी मैच में भी 'भाई' के साथ इनकी एक तसवीर आई. ऐसी कि उसने तहलका ही मचा दिया था. लेकिन मार्च 1993 में मुंबई (तब बंबई) में हुए कुछ विस्फोटों ने दाउद का नाम एकदम से मोस्ट वांटेड की सूची में शामिल करवा दिया. इसके बाद दाउद ने भारत छोड़ दिया और मंदाकिनी अंडरग्राउंड हो गईं.

साल भर उन्होने फिर फिल्मी दुनिया में वापसी की कोशिश की. शायद कुछ फिल्में भी मिलीं. लेकिन उन फिल्मों को दर्शक नहीं मिले. अब नहीं मिले तो नहीं मिले. दर्शक कोई ऐसी चीज तो है नहीं कि उसी घसीट कर हॉल में लाया जा सके.
आख़िरकार वे तिब्बती योग के भक्तिभाव में लीन हो गईं. और अंततः एक बौद्ध भिक्षु डॉ. कग्युर टी रिनपोछे ठाकुर के साथ घर बसा लिया. यास्मीन जोसेफ से सिर्फ मंदाकिनी हुई मंदाकिनी अब मंदाकिनी जोसेफ ठाकुर हैं.

रुपहली दुनिया की यह अकेली बदरंग तसवीर नहीं है. ऐसी कहानियों से भरी है ये दुनिया. जिससे आप सच दिखाने की अपेक्षा करते हैं और बड़ी उम्मीद लगाकर अपनी गाढ़ी कमाई का धन देते हैं, उसका अपना सच ये है कि किसी को एक रोल न देने के नाते एक प्रोड्यूसर को दुनिया छोड़नी पड़ सकती है. यह रोल उसने उसे नहीं दिया, जिसके दरवाजे पर सिर्फ पटक पटक कर उन दिनों कई प्रोड्यूसर रोल दे आ रहे थे. जरा सोचिए, अगर उसने नहीं दिया तो क्यों नहीं दिया होगा? जहाँ रोल को लेकर इतना दबाव है, वहाँ और चीजों को लेकर कितना दबाव होता होगा? इन और चीजों में सबसे पहली चीज तो कहानी ही होती है. क्या ऐसी स्थिति में आप किसी फिल्मी कहानी से तथ्यों के अनुरूप और सच के कहीं आसपास होने की उम्मीद भी कर सकते हैं?


Saturday, 29 June 2019

उल्टी गंगा बहाती फिल्में

गंगा गंगोत्री से निकलकर ऋषिकेश, हरिद्वार, गढ़मुक्तेश्वर, कानपुर, प्रयागराज, काशी, अजगैबीनाथ आदि होते हुए हावड़ा से आगे जाकर गंगा सागर में मिलती है क्या? नहीं न।
असल में इसका उलटा है।
असल में है क्या कि गंगा गंगासागर से निकलती है और भुवनेश्वर, हैदराबाद, चेन्नई, बंगलुरू, मुंबई, लाहौर, काबुल, मॉस्को आदि होते हुए आल्प्स की पहाड़ियों में कहीं मिल जाती है।
अगर आप इस सच को स्वीकार कर सकते हैं तो जरूर देखें। फिल्में आपके लिए ही बनती हैं। अगर आप इस सच से आहत नहीं होते हैं, अगर आपके मन में इस सच पर कोई सवाल नहीं उठता, अगर आपके मन में सच और स्थापित तथ्यों को क्रिएटिविटी के नाम पर इस तरह विकृत किए जाने पर कोई पीड़ा नहीं होती, अगर आप गटर को बिस्लरी और बिसलरी को गटर मान सकते हैं तो साथी फिल्में जरूर, जरूर, जरूर देखें। फिल्में आपके लिए ही बनती हैं।
आप ही हैं वो होनहार जिसके दम पर कई लाख करोड़ का धंधा चल रहा है। आप ही हैं वो महान आत्मा जिसके दम जिनके साथ बैठने में भी सभ्य व्यक्ति को शर्म आनी चाहिए उनके एक आटोग्राफ के लिए कुछ लोग कुत्ते से भी बदतर बनने को तैयार हैं। आप ही हैं वो विद्वाज्जन जिनके लिए भारत के सारे अखबार आमजन की बिजली, पानी, शिक्षा, चिकित्सा, सरकारी महकमों में हर जगह घूसखोरी, भ्रष्टाचार जैसी ख़बरें छोड़कर रुपहले परदे वाले वालियों के बेडरूम से लेकर उनके ताजातरीन बच्चे की सुसू पॉटी की खबरें आमजन तक पहुंचाकर कृतकृत्य हो रहे हैं। और हां, वह दानवीर भी आप ही हैं जिनके दम पर अंडर वर्ल्ड के तमाम मेहनतकश लोगों का बड़ी मेहनत से कमाया गया धन धवल हो रहा है।
बिलकुल शुरुआती दौर की बात छोड़ दें, जब औरतों के किरदार पुरुषों को निभाने पड़ते थे, जब भले घरों के लड़कों के लिए भी सिनेमा में काम करना अच्छी बात नहीं समझी जाती थी, जब फिल्में देखना बहुत गौरव की बात नहीं थी... हां तब फिल्मों को फाइनेंसर भी आसानी से नहीं मिलते थे। जैसे तैसे लोग फिल्में बनाते थे और जैसे तैसे ही देखते थे। फिर दौर आया मुनाफे का और इसके साथ ही इसमें घुसा अंडर वर्ल्ड।
अंडर वर्ल्ड का धन कहीं भी बड़ी आसानी से नहीं जाता। वह अपने साथ कई शर्तें ले जाता है। किसी संचार माध्यम में उसकी पहली शर्त समाज में अपनी जगह, अपने लिए स्वीकृति बनानी होती है। इसके लिए सिनेमा के निर्माता निर्देशक, खासकर हिंदी सिनेमा के, बड़ी आसानी से तैयार हो जाते रहे हैं।
याद है आपको, एक दौर था केवल डाकू जी वाली फिल्मों का। पहले डाकू जी को समाज में बड़ा सम्मान दिलाया गया। अरे उन्हें गरीबों का मसीहा बनाया गया भाई। पहले विक्टिम फिर मसीहा। फिर आया तस्कर जी लोगों का दौर। कुछ नौजवान लड़के तो तस्कर ही बनने की योग्यता अर्जित करने की बात सोचने लगे। फिर आया डॉन जी लोगों का दौर। आप आज भी कुछ लोगों को अपने को बड़ी शान से डॉन बोलते सुन सकते हैं। सोचिए, कितने सम्मान के पात्र हो गए डॉन साहब! यह सब उसी अंडर वर्ल्ड के धन का प्रसाद है। और आप उसे बढ़ाने में भागीदार हो रहे हैं।
अरे दौर तो चलाने की कोशिश की गई थी आतंकवादी जी को भी महान बनाने की एक। थोड़ा थोड़ा चला भी। एक दो महान शोमैन जी लोगों ने बड़ी हिम्मत करके अपने भीतर की पूरी बेशर्मी खर्च भी कर डाली। लेकिन वो उससे काम चल नहीं पाया। फिर बेशर्मी के आयात और तस्करी की भी कोशिश की गई। पर उससे भी काम नहीं चला। इसलिए उसे भविष्य के लिए छोड़ दिया गया। लेकिन भविष्य में वह दौर आएगा जरूर। बस आप अपना हौसला और फरजीपने की दुनिया को अपना पूरा समर्थन बनाए रखें।
अब देखिए न, अभी कुछ लोग एक फिल्म को हिट कराने पर तुल गए हैं। बता रहे हैं कि वह तथ्यों के बिलकुल विपरीत कहानी बना रहा है। अब वो उसका विरोध कर रहे हैं। विरोध इसलिए कर रहे हैं कि उनकी आस्था को ठेस लग रही है। अबे तुम्हारी आस्था और सचमुच के सच की परवाह किसे है मेरे दोस्त?
कहां जाओगे तुम अपनी आस्था और तथ्य लेकर। जहां जाओगे वहां से 2जी, 3जी, सी जी और एनएचजी वालों को सिर्फ जमानत दी जाती है। देश भर के अखबरकर्मियों के श्रम के विरुद्ध खुद ताकतवर लोगो द्वारा खुद बड़े दरबार की खुल्लखुल्ला और स्वयंसिद्ध अवमानना को अवमानना नहीं माना जाता। और हां, जिस महाझूठ की बात तुम कर रहे हो, इसी बेहूदगी को वहां अभिव्यक्ति और रचनातमकता की स्वतंत्रता और अधिकार माना जाता है।
तो तुम्हारे यह चिल्लाने से उन्हें कोई नुक्सान नहीं होता, उलटा फायदा होता है। लोग जानते हैं उनका नाम और वो भी चले जाते हैं हाल तक जिन्हें नहीं जाना होता। उनका धंधा बढ़ता है।
यह धंधा बढ़ने का सीधा मतलब है अंडर वर्ल्ड का पैसा बढ़ना। अंडर वर्ल्ड का पैसा बढ़ने का सीधा मतलब है ड्रग तस्करी और आतंकवाद बढ़ना। अब यह तो आप सोचना ही छोड़ चुके हैं कि फिल्में आपके बच्चों को संस्कार क्या दे रही हैं। इसे सोच का पिछड़ापन मान लिया गया है। यह तो सोचिए कि इनके अर्थशास्त्र और समाजशास्त्र के जरिए आप उन्हें भविष्य क्या दे रहे हैं। उनके जीने के लिए कैसा समाज छोड़कर जाने की तैयारी कर रहे हैं आप?

Friday, 28 June 2019

हिंदी सिनेमा और सब आपका

हर हफ्ते 10-20 ठो फिल्में रिलीज होती हैं. उनमें एकाध बड़े बजट की होती हैं. महीने-दो महीने में एक-दो बहुतै बड़े बजट वाली फिल्में भी आती हैं.
अब ये इतना बड़ा वाला बजट आता कहाँ से है और इससे जो वसूली होती है, उसका रिटर्न जाता कहाँ तक और कैसे है, ये जानने वाले बहुत अच्छी तरह जानते हैं और जो नहीं जानते वो तो यह भी नहीं जानते कि परदे का हीरो वास्तव में कितना साहसी और दिलदार होता है, यह भी कि हो सकता है कि परदे का विलेन वाकई कोई नेक इंसान हो पर हीरो से ये उम्मीद बेमानी है. करीब-करीब उतनी ही बेमानी जितनी हिंदी के किसी नामी साहित्यकार के साहित्य में सच की अपेक्षा.
तो बात बड़े बजट वाली फिल्मों की हो रही थी. ये जो बड़े बजट वाली फिल्में होती हैं, उनके सामने बहुत बड़ी समस्या उस बड़े बजट की वसूली होती है. दर्शक आमतौर पर सिनेमाहाल तक जाना नहीं चाहता. वैसे भारत में सिनेमाहाल तक जाने वाले आम तौर पर तीन ही तरह के लोग होते रहे हैं. या तो वे जो परम फालतू किस्म के लोग हैं. जिनमें थोड़े-बहुत मामूली अंतर के साथ वही कहानी बार-बार झेलने की हिम्मत है. या फिर वे जिनका पृथ्वी नामक ग्रह पर अवतार ही पंखा बनने के लिए हुआ है.
अगर उन्हें अमिताभ बच्चन, सलमान खान, मोदीजी, राहुलजी, गांधीवाद, साम्यवाद या कोई और जी या वाद नहीं मिलेंगे तो वे छिपकलीजी, केंचुआजी, साँपजी, बिच्छूजी आदि किसी के भी पंखे हो जाएंगे और उनके लिए कुछ न कुछ देखने-सुनने या करने जाएंगे. वास्तव में ये लोग परोपकारी हैं और इन्हीं के भरोसे संसार चल रहा है. अगर ये न हों ये जो पृथ्वी नाम का ग्रह सूर्य नाम के गैसीय पिंड के चारों ओर चक्कर लगा रहा है, ये चक्कर लगाना बंद कर दे और दुनिया एक जगह ठहर जाए. तीसरी कटेगरी के दर्शक वे लोग हैं जिन्हें किसी से कुछ चाहिए ही नहीं. सिनेमा से भी नहीं. मने परमसंत कटेगरी वाले. इन्हें सिर्फ़ तीन घंटे का मनोरंजन चाहिए होता है और मनोरंजन का मतलब इनके लिए बस मारधाड़, देहदर्शन, नाच-गाने तक सीमित है. इससे ज्यादा कुछ नहीं.
इन तीन वर्गों को भी अब हॉल तक जाने की जरूरत महसूस नहीं होती. क्योंकि नेट 400 रुपये में तीन महीने के लिए उपलब्ध है और लगभग हर हाथ में अच्छा-बुरा किसी न किसी तरह का स्मार्टफोन है. लेकिन फिल्में बनाने वालों का पैसा वसूल तो दर्शक को हॉल में ढटिया कर ही होना है. तो इसके लिए उसे मजबूर किया जाता है. डंडे से हाँक-हाँककर हॉल तक लाया और फिर दो-तीन घंटे के लिए ढटियाया जाता है.
यह डंडा अदृश्य किस्म का होता है. बिना मुद्दे के मुद्दे यानी किसी न किसी कृत्रिम मुद्दे पर बनने वाली फिल्मों पर कृत्रिम विवाद उठाया जाता है. यह कृत्रिम विवाद उठाने के लिए शुरू में कुछ लोगों को पैसा दिया जाता है. बाद में लोग इसमें लोग अपने-आप ही शामिल होते चले जाते हैं. चूँकि देश आजकल राजनीतिक रूप से दो कटेगरी में बँटा हुआ है और दोनों कटेगरियां अपनी पीढ़ियों की वास्तविक दोस्ती तक भुला कर नई-नई बनी छद्म राजनीतिक दुश्मनी निभा रही हैं, तो किसी विवाद में शामिल करने के लिए लोग ढूँढने भी नहीं पड़ते. अधिकतर तो पहले से ही मुफ्त का बेल्ट लगाकर बैठे होते हैं.
याद करिए वो फिल्म जिस पर पूरा राजस्थान धधक उठा था. बाद में रिलीज होने पर इस हाथी के दिल को चीरा तो पता चला कि इक कतर-ए-खूँ भी न निकला. उसके बाद उसी राजपूती आन-बान को बट्टा लगाने वाली बहुत बातें असली दुनिया में हुईं. उसी राजस्थान में ही. लेकिन कुछ हुआ क्या? फिर पता चला क्या किसी सेना का? फिर ये सेना एक टुच्ची फिल्म के लिए कहाँ से टपक पड़ी थी?
ये तो बस हाल का एक विवाद है. ऐसे कम से कम एक हज़ार विवाद भारत में हो चुके हैं. क्या इनसे कभी कोई हल निकला है. आजकल फिर ऐसे ही कुछ प्यालियों में तूफान उठाए जाने की कोशिश की जा रही है. धीरे-धीरे टेम्पो बन भी रहा है और फिर उफन कर बैठ भी जा रहा है. लेकिन होगा क्या? फिर वही ढाक के तीन पात. क्योंकि पहले भी मुद्दे और विवाद दोनों कृत्रिम थे और आज भी स्थिति वही है.
आप याद करिए, सीधे आपके असली मुद्दे को केंद्र में रखकर कोई सच्ची फिल्म बनी हो? मैं उनकी बात नहीं कर रहा जो तीन घंटे में पोएटिक जस्टिस थमा के आपको हॉल से बाहर कर देती हैं. तीन मिनट में साहूकार खेत को हड़पता है और पाँचवें मिनट में शेखचिल्ली टाइप हीरो उसके सारे गुंडों को मारकर गाँव वालों को जिता देता है. किसी राज्य के मुख्यमंत्री को एक दरोगा लतियाते हुए लॉकअप में बंद कर देता है. देखते-देखते फैक्ट्री में हड़ताल हो जाती है और उसके तुरंत बाद पूँजीपति मान जाता है. हम सब जानते हैं कि यह सब सिर्फ हिंदी सिनेमा में होता है, बाकी किसी सिनेमा में भी नहीं. और वास्तविक जीवन से तो इसका उतना भी संबंध नहीं है जितना बुद्धिजीवियों का सच्चाई से होता है.
याद करिए, इतने दिनों में एक भी फिल्म बनी हो भारत के सूखाग्रस्त क्षेत्रों की समस्या को जमीनी तौर पर संबोधित करती हो? एक भी फिल्म बनी हो जो भारत में शिक्षा-व्यवस्था की बुनियादी समस्याओं को संबोधित करती हो? रोजगार की ही बात उठा लीजिए. अच्छा आइए, इतिहास की ही बात उठा लेते हैं. बाजीराव जैसे योद्धा को हिंदी सिनेमा देवदास बना के धर देता है. विभाजन के नाम पर केवल झूठ का प्रदर्शन है. सौ प्रतिशत शुद्ध झूठ. लिखित और सर्वस्वीकृत ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत. वह भी तब जबकि फिल्में बनाने वाले कुछ बड़े घराने खुद विभाजन के शिकार रहे हैंं. जिस समय विभाजन हुआ, केवल पंजाब ही नहीं बँटा था, बंगाल का सेना चीरा गया था. बंगाल के विभाजन का दर्द कहीं दिखाई देता है क्या? या विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान (अब बंग्लादेश) से जो लोग भगाए गए, वे बड़े मजे-मजे में चले आए?
दलित बड़ा प्रिय विषय है हमारे बुद्धिजीवियों का और सिनेमा में बुद्धिजीवी होने के भ्रम के शिकार कम लोग नहीं हैं. मने सब जगह हो सकते हैं बुद्धिजीवी तो सिनेमा में क्यों नहीं? तो दलितों पर उन्होंने खूब बनाया. लेकिन बनाया क्या? उसके दुख की पैरोडी, मजाक. भारत-विभाजन के समय एक जोगेंद्र नाथ मंडल हुआ करते थे. डॉ. अंबेडकर के बाद दूसरे बड़े दलित नेता. दोनों में फर्क यह था कि अंबेडकर वाकई दलित हितैषी थे और सच्चे अर्थों में मनुष्यतावादी भी, मंडलजी के लिए दलित अपने राजनीतिक स्वार्थसाधन का एक उपयोगी सामान मात्र था. तो मंडल जी अपने समय के पाकिस्तान में मंत्री बना दिए गए थे. उन्होंने पाकिस्तान बनवाने के लिए भी दलितों का कुछ इस्तेमाल किया और डॉ. अंबेडकर के मना करने के बावजूद बड़ी मात्रा में दलितों को पाकिस्तान में थोड़े दिन रोका. बाद में जब उन पर इस्लामी कहर बरपना शुरू हुआ तो मंडल जी रह पाए और न दलित. मंडल जी तो खैर बड़े आदमी थे, भाग आए. लेकिन जो आम दलित वहाँ रह गए थे, वे? उनकी सुहि लेने की जहमत न साहित्य ने उठाई और न सिनेमा ने.
सिनेमा की मानें तो थाने में कहीं घूस नहीं चलता. दरोगा जी संसार के सबसे ईमानदार प्राणी हैं. कानून अंधा है, लेकिन जज साहब भगवान से भी सच्चे हैं. झुग्गियाँ उजाड़ी जाती हैं. उजाड़ने वाले पूँजीपति के गुंडे होते हैं. लेकिन झुग्गियां बसाने के लिए हर साल इंसानों की ये जो बाढ़ आती है, ये आती कहाँ से है? यह सब पोएटिक जस्टिस का सतही तौर निपटे जा सकते लायक विषय नहीं हैं. ये और ऐसे ही और कई विषय हमारे सामाजिक जीवन के जटिल यथार्थ हैं. इनमें मसाला नहीं है. कड़वाहट है और जटिलताएँ हैं. और जहाँ यह सब है, वहाँ कम से कम हिंदी सिनेमा तो नहीं जाता.
फिर भी आप हॉल तक जाना चाहते हैं तो जरूर जाएँ. आख़िर जेब आपकी है, समय आपका, मन आपका और ईश्वर की कृपा से झेलने की कूवत भी आपकी ही.

Tuesday, 18 June 2019

Yudhishthir ka kutta by Hari Shanker Rarhi


Cover Page of Yudhishthir ka Kutta


युधिष्ठिर का कुत्ता 

 व्यंग्य संग्रह 

(लेखक हरिशंकर राढ़ी )


हरिशंकर राढ़ी  का प्रथम व्यंग्य संग्रह " युधिष्ठिर का  कुत्ता " अयन प्रकाशन मेहरौली नई दिल्ली से प्रकाशित होकर आ गया है. यह कुल सोलह व्यंग्यों का संग्रह है जो लगभग बीस साल की अवधि में लिखे गए हैं।  संग्रह की पृष्ठ संख्या 132 है और मूल्य 260 /- है. यह संग्रह अब हिंदी बुक सेंटर पर उपलब्ध है जो की  साइट   पर ऑन लाइन मंगाया  जा सकता है. साथ ही स्नैपडील पर भी उपलब्ध है। इस संग्रह पर वरिष्ठ व्यंग्यकार सुरेश कांत कहते है :
कल शाम व्यंग्यकार हरिशंकर राढ़ी (Hari Shanker Rarhi) द्वारा भिजवाया गया उनका प्रथम व्यंग्य-संकलन 'युधिष्ठिर का कुत्ता' मिला। 132 पृष्ठों का 260 रुपये मूल्य वाला यह संकलन अयन प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली-110030 ने छापा है, जिसमें भूमिका के अतिरिक्त उनके पिछले 20 वर्षों में लिखे गए 16 व्यंग्य शामिल हैं।

छोटी-सी भूमिका में उन्होंने कई बड़ी बातें कही हैं। एक तो यह कि यथार्थ-दर्शन का 'पुण्य' हर आँख को नहीं मिलता और जब मिल जाता है तो 'व्यंग्य' का जन्म होता है। दूसरे, उनके इस संकलन के प्रकाशन का श्रेय उनके कई मित्रों की झिड़कियों को जाता है। तीसरे, हिंदी-साहित्य में व्यंग्य की दखलंदाजी और स्वीकार्यता बढ़ने के बावजूद उसके प्रभाव में कमी आई है। और उसका संभावित कारण उन्होंने यह बताया है कि आज की राजनीति और समाज का पतन बेशर्मी की हद तक हो चुका है; उसकी खाल इतनी मोटी हो चुकी है कि उसे चोट लगती ही नहीं। दूसरी ओर, आज का व्यंग्यकार कितना भी गाल बजा ले, वह कबीर नहीं हो सकता। चौथे, उन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित परसाई ने किया और वह इसलिए कि 1990 के आसपास उन्हें परसाई-रचनावली के छहों खंड पढ़ने का सौभाग्य मिल गया था। बाद में अंग्रेजी-साहित्य के होरास वालपोल, जुवेनाल आदि के रोमन से अंग्रेजी में अनुवाद भी उन्होंने पढ़े, जिससे मुझे यह अतिरिक्त जानकारी मिली कि रोमन भी कोई भाषा है, जबकि मैं उसे अब तक लैटिन और अंग्रेजी भाषाओं की लिपि ही समझता आया था। व्यंग्य और हास्य के संबंध में भी उन्होंने कुछ महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं, जैसे यह कि उसे न तो पूरी तरह नकारा जा सकता है और न ही स्वीकार किया जा सकता है। फिर उन्होंने संकलन में संकलित अपने व्यंग्यों के बारे में बताया है कि वे (दूसरों की तरह) किसी कॉलम के दबाव में नहीं लिखे गए हैं और न मौसमी पकवान ही हैं। और अंत में उन्होंने पुनः अपने कोंचने वाले मित्रों और हितैषियों के साथ-साथ प्रकाशक को भी धन्यवाद दिया है।                                              
शेष पुस्तक पूरी पढ़ने के बाद। तब तक आप भूमिका में लिखी उनकी विचारोत्तेजक स्थापनाओं    पर विचार करेंखासकर इस पर कि व्यंग्य की दखलंदाजी और स्वीकार्यता बढ़ने के बावजूद उसका प्रभाव कम क्यों हुआ है और क्या वाकई ऐसा है या लेखक की नजरों से कम प्रभावित करने वाली  रचनाएँ ही गुजरीं और उन्होंने उनके आधार पर ही यह धारणा बना ली




Yudhishthir Ka Kutta
A collection of Satires by 
Hari Shanker Rarhi
Published by - Ayan Prakashan Mehrauli, New Delhi -110030
email:  ayanprakashan@rediffmail.com
Pages: 132     Cost :  Rs 260/ 
ISBN :978-93-88471-14-5

Sunday, 2 June 2019

Ek Baarat Yatra : Andar Baahar (Samsmaran - A Marriage Procession)





संस्मरण
एक बारात यात्रा : अंदर और बाहर
                                                                                                -हरिशंकर राढ़ी

अभी बिहार से एक बारात करके होकर लौटा हूँ। बहुत दिनों से बिहार में किसी विवाह में सम्मिलित होने की इच्छा थी। वैसे भी बिहार घूमने और देखने का कभी नजदीकी अवसर नहीं मिला था। एक-दो बार ट्रेन से आना-जाना हुआ, लेकिन उसे बिहार भ्रमण तो नहीं माना जा सकता। सुना था कि बिहार कि संस्कृति बहुत धनी है। मिथिला की ओर विवाह एक बहुत भव्य आयोजन होता है और व्यंजनों की भरमार लग जाती है। पिछले कुछ दशकों में बिहार कई अर्थों में बदनाम हुआ। उसकी प्रतिष्ठा में जातिवाद, बेरोजगारी, लचर कानून व्यवस्था और कुछ हद तक निम्न जीवन स्तर ने बहुत बट्टा लगाया। बिहार की साख गिराने में पलायनवाद ने महती भूमिका निभाई। कारण कुछ भी रहा हो, बिहार बदनाम हुआ। फिर भी, बिहार की संस्कृति और व्यवस्था को देखने के लिए मेरा मन कसमसाता रहा। संयोग बन गया। एक मित्र के भतीजे की षादी भागलपुर में तय हुई तो उनका आग्रहपूर्ण आदेश आया कि बारात चलना है। उसमें भी अच्छाई यह कि दिल्ली से एक बड़ा दल चलेगा जिसमें अधिकांश लोग मेरे नजदीकी परिचय के दायरे में। बाकी बारात कानपुर से। अब मैं मना ही क्यों करता ?
तो आज बारात से लौट आया। मई माह की भयंकर गर्मी के बावजूद मन शीतल हुआ। प्रस्थान से लेकर उत्तर प्रदेश समाप्त होने तक ऐसा नहीं लगा था कि एक साथ दो बारातें चलेंगी - एक बाहर और एक मन में। लेकिन चलीं और खूब चलीं। अंदर वाली बारात वापसी में कहीं छूट गई या रात के अंधेरे में कहीं बिला गई। हो सकता है कि छूट ही गई हो। लेकिन छूटा हुआ मान लेना भी ठीक नहीं क्योंकि यादें तो आई हैं। खूब झकझोरा था जाते समय उन्होंने और पता नहीं कितना पीछे ले गई थीं। बहुत से चरित्र खयालों में आते - जाते रहे । साथ के बाराती राजनीतिक बातों और ताश में रम रहे थे और मैं अंदर के बारातियों से संवाद में।अमूमन जैसा होता है, ट्रेन दो-ढाई घंटे लेट हो गई थी। मुगलसराय (अब दीनदयाल उपाध्याय नगर) रात में निकल जाना चाहिए था, लेकिन सुबह हो गई थी वहां पहुंचते-पहुंचते। रात में निकल गया होता तो अंदर की बारात नहीं बनती। मुगलसराय से मेरा कोई नाता नहीं, सिवाय इसके कि एक बड़ा जंक्शन है जिसके बारे में बचपन से सुनता आ रहा था, जब ट्रेन को चित्र के अलावा कहीं देखा ही नहीं था। ऊपर की बर्थ से उतरकर नीचे खिड़की के साथ बैठ चुका था। यह मालूम था कि मुगलसराय के बाद गाजीपुर जनपद आएगा और उसके बाद हम बिहार में प्रवेश कर जाएंगे। गाजीपुर से भी मेरा कोई व्यक्तिगत रिश्ता नहीं रहा है। पर रिष्तों का क्या, कहीं भी और कभी भी बन जाते हैं। विक्रमशिला चलती रही और मैं पूर्वांचल की सुबह देखता रहा। खेतों की ओर जाती गाय-भैंसें, उछलकूद करती बकरियां, षौच के लिए जाते आलसी और यत्र-तत्र बाड़ से घिरी जा़यद की फसलें।
गाड़ी की गति थोड़ी थमी। जमनियाँ। पहला स्टेशन जिसने मेरे मन-मस्तिश्क पर दस्तक दी। जमनियाँ से मेरा कोई निजी परिचय नहीं, कोई रिश्ता नहीं पर समाया है बहुत गहरे तक। इसे मैं अपनी साहित्यिक अभिरुचि का पहला पड़ाव मानता हूँ। बी.ए. के दिनों में डॉ. शिवप्रसाद सिंह का उपन्यास अलग-अलग बैतरणीहाथ लग गया था। परीक्षा के बाद समयकर्तन की इच्छा से कुछ पठनीय ढूंढ रहा था कि इससे सामना हो गया। बिलकुल पुराना संस्करण, मोटा आकार। इतना अधिक पढ़ने का साहस तो नहीं था, लेकिन शुरू हो गया। यहीं से जमनियाँ ये परिचय हुआ और फिर प्रगाढ़ता।
एक स्थान के रूप में जमनियाँ अलग-अलग बैतरणीके केंद्र में है। शिवप्रसाद सिंह ने इसके कथानक में ग्रामीण जीवन के न जाने कितने रंग और कितने मिथक पिरोये हैं। जमनियाँ की गोद में समाया नाचिरागी मौजाकरैता पूरे बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व करता है। स्वातंत्र्योत्तर उत्तर भारत के गांवों में बदलते परिवेश, टूटते मिथकों, दरकते रिश्तों तथा विखंडित होती परंपराओं का शब्दचित्र है यह उपन्यास। ग्रामीण परिवेश में घुसती स्वार्थी राजनीति, सामंतवाद की टूटन, उसे बचाए रखने की जद्दोजहद, विषैले होते ताल्लुकात, उन्हीं में संकोच तले विकसित होते प्रेम संबंध और खांटी ग्रामीण मानसिकता का जो निरूपण अलग-अलग बैतरणीमें मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। सच तो यह है कि यह पचास से लेकर अस्सी के दशक तक के गांवों की डाक्यूमेंट्री है। शायद ही किसी प्रकार का ग्रामीण चरित्र होगा जो इस कथा का हिस्सा बनने से रह गया होगा। जमींदार जैपाल सिंह, बुझारथ, बीसू धोबी, दयाल महराज, सुरजू सिंह, विपिन, पुष्पा, कनिया, पटनहिया भाभी, जग्गन मिसिर, डॉ. देवकांत, मास्टर शशिकांत, खलील मियाँ और न जाने कितने जीवंत चरित्र पाठक के मन में स्थायी निवास बना लेते हैं। न जाने कितने प्रसंगों में डॉ. देवकांत, विपिन, जग्गन मिसिर और मास्टर षशिकांत के माध्यम से गांव की स्थिति पर सार्थक, सटीक और गंभीर विमर्श चलाया है उपन्यासकार ने। कोई भी तबका लेखक की नज़रों से बच नहीं पाया है।
बहुत दिनों तक गूँजता रहा था यह उपन्यास मेरे अंदर। उसका हर पात्र मुझे अपने गांव में दिखाई देता था। विशेषतः जग्गन मिसिर, बुझारथ, सुरजू सिंह तो साक्षात घूमते हुए दिखाई देते थे। करैता से पलायन करने वाला हर चरित्र जमनियाँ होकर ही जाता है। बाद में पता चला कि शिवप्रसाद सिंह की माध्यमिक शिक्षा जमनियाँ में हुई थी। उस क्षेत्र को उन्होंने जिया था और उसे ही ज्यों का त्यों उतार दिया था अलग-अलग बैतरणीमें।
बाद में उनके लिखे दो और उपन्यास पढ़ने को मिले - गली आगे मुड़तीहै तथा औरत। लेकिन मन में चढ़ा था तो केवल अलग-अलग बैतरणीही। गोरखपुर में अंगरेजी में एम. ए. करते समय मैंने उन्हें एक पत्र भी लिखा था जिसका जवाब लौटती डाक से आया था। एक दो पत्र और आए होंगे लेकिन वे कहां खो गए, याद नहीं। तब नहीं मालूम था कि अक्षरों की दुनिया में अपना प्रवेश भी होगा, भले ही एक अकिंचन के रूप में !
तो जमनियाँ स्टेशन आया और चला गया। अंदर ही अंदर अलग-अलग बैतरणीकी यात्रा चलती रही। इतने में भदौरा स्टेशन आ गया। एक पल को कुछ झटका सा लगा। क्या मैं भदौरा को भी जानता हूँ ? कहाँ और कब देखा ? याद आया - शायद यहीं के अपने अग्रज मित्र, आत्मीय नवगीतकार ओम धीरज जी हैं। वे गाजीपुर के ही हैं। गाजीपुर, बनारस और आजमगढ़ में बहुत सारे साम्य हैं। भाषा, संस्कृति, खान-पान और व्यवहार में शायद ही कोई अंतर हो इन जिलों में। हाँ, वे इसी इलाके के हैं। ओम धीरज जी के तीनों नवगीत संग्रहों - बेघर हुए अलाव, सावन सूखे पाँव और बँधे नाव किस ठाँव से मैं ठीक से गुज़र चुका हूँ। इन पर समीक्षा भी लिखी है मैंने। ओम धीरज के नवगीत यहां की मिट्टी, मिठास और मूल्यों को लेकर चलते हैं। एक में कहा जाए तो पकी इमली सा स्वाद होता है इनका। कभी-कभी लगता है कि ओम धीरज जी ने स्व0 शिवप्रसाद सिंह की आंचलिक गद्य परंपरा निहायत खूबसूरती और सामासिकता से अपने नवगीतों में ढाल लिया है। पूरा एक कालखंड और भौगोलिक अंचल बोलता है धीरज जी के नवगीतों में। नवगीतों की दुनिया में ओम धीरज जी निश्चित रूप से एक सशक्त हस्ताक्षर हैं। रही-सही कसर उनका स्वभाव और व्यक्तिगत मित्रता पूरी कर देती है। ट्रेन तो नहीं रुकी भदौरा में, लेकिन मन रुका रहा और देखता रहा उनके नवगीतों को।
अब गहमर आ गए थे हम। गहमर से भी मेरा रिश्ता कुछ ऐसा ही है। लगाव गहमर से नहीं, गहमरी से है। भोजपुरी के बड़े आत्मीय कवि स्वर्गीय भोलानाथ गहमरी। उन्होंने गहमर को खुद से बड़ा मानकर अपने नाम के साथ जोड़ा लेकिन बड़ा हो गया गहमरी। बड़ा सुखद लगता है मुझे कि अपने देश में कुछ जगहें ऐसी हैं जो किसी कवि या लेखक के नाम से जुड़कर प्रसिद्ध हुई हैं। मैं भोलानाथ गहमरी को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता। शायद जान भी नहीं सकता था।
सत्तर और अस्सी का दशक आकाशवाणी युग था। रेडियो मनोरंजन का सबसे बड़ा और उपयोगी साधन था, हालांकि यह भी सर्वसुलभ नहीं था। उन दिनों पूर्वी उत्तरप्रदेश और भोजपुरी भाशी बिहार के सभी आकाशवाणी केंद्रों से मोहम्मद खलील के लोकगीत गूँजा करते थे। षाम होते ही खेती-बारी, कृशि जगत या गाँव की ओर जैसे कार्यक्रम शुरू हो जाते। इनमें कृषि विकास की तकनीक सिखाई जाती थी। स्वयं समर्थ बनने के लिए कृषि उत्पादन बढ़ाने पर जोर था। कार्यक्रम के बीच में एक लोकगीत जरूर प्रस्तुत किया जाता था।
पिताजी आकाशवाणी का गोरखपुर या वाराणसी केंद्र समयानुसार लगाकर बैठ जाते। खेती के बारे में उतनी रुचि नहीं रहती थी जितनी एक भोजपुरी लोकगीत सुनने की अभिलाषा। ऐसे में किसी दिन जब मोहम्मद खलील का गीत बज जाता तो जैसे सबकुछ सार्थक हो जाता। गीत होते समय किसी का बोलना पूरी तरह निषिद्ध होता। सारा वातावरण जैसे झूम उठता और रस की बरसात होने लगती। कवने खोंतवा में लुकइलू अहि रे बालम चिरई’, ‘छलकल गगरिया मोर निरमोहियाया फिर अंगुरी में डँसले बिया नगिनिया हो ये ननदो दियना जराइ दाउस समय के सुपरहिट गीत थे। मैं भी इन गीतों का दीवाना था। मोहम्मद खलील की आवाज और गायकी में एक जादू था, एक तिलिस्म था और एक सूफियाना अंदाज। वे मेरी किशोरावस्था या नवयौवनावस्था के दिन थे। हमारे लिए मुख्यतः गायक ही महत्त्वपूर्ण होता था, कवि या गीतकार नहीं। कुछ दिनों बाद जानकारी हुई थी कि कवने खोंतवा में लुकइलूतथा ले ले अइहा बालम बजरिया से चुनरीके गीतकार गाजीपुर, गहमर के कवि-गीतकार भोलानाथ गहमरी थे। ऐसे न जाने कितने गीत गहमरी ने लिखे। उनके गीतों में भोजपुरी आत्मा बसती थी, संवेदनाएं फड़कती थीं और भाव सीधे दिल से जुड़ जाते थे। लेकिन यदि उन्हें मोहम्मद खलील का स्वर नहीं मिलता तो शायद वे खंडहर के गुलाब ही रह जाते। अपना स्वर देकर खलील ने उन गीतों को अमर कर दिया। ये गहमर उन्हीं गहमरी की थाती है, मुझे तो जुड़ना ही है। हाँ, दुख भी हुआ। मेरे साथ तमाम बुद्धिजीवी और उच्चशिक्षित लोग थे, लेकिन शायद ही कोई गहमरी से जुड़ा हो। बस चर्चा राजनीति की या फिर मशगूलियत ताश के पत्तों में।
खंडहर के गुलाब तो मोहम्मद खलील भी रह गए। पूर्वांचल के न जाने कितने गीतकारों को उन्होंने स्वर दिया या होठों से छूकर गीतों को अमर कर दिया। छपरा के पं. महेंदर मिसिर हों या बलिया के पं. सीताराम द्विवेदी, उनके गीतों को विस्तार दिया मोहम्मद खलील ने ही। महेंदर मिसिर के गीत मार्मिकता की हद तक मार करते थे। वे जनकवि थे और लोगों के दिल तक पहुंचते थे। अंगुरी में डंसले बिया नगिनिया होने महेंदर मिसिर को बड़ी प्रसिद्धि दिलाई। जब मोहम्मद खलील इस गीत को गाते तो सन्नाटा पसर जाता, लगता जैसे नागिन सबके कलेजों पर लोट रही हो। इस दर्द में गिरमिटया हो जाने जैसा दर्द और घातक प्रहार करता। वैसे भी महेंदर मिसिर के गीत जनपीड़ा से जुडे हुए थे। उन दिनों उनका एक गीत बहुत ही प्रसिद्ध हुआ था - टुटही मड़इया महलिया से पूछे, घास झुलसानी हरियलिया से पूछे, का हमरो दिनवाँ बहुरिहैं की नाहीं। मेरी जानकारी के अनुसार इस गीत को मोहम्मद खलील ने नहीं गाया था। कवनो जतन बता के जइहा, कइसे दिन बीती रामको किंचित परिवर्तन के साथ शारदा सिन्हा ने गाया था। इसके अलावा यह गीत उधर की नौटंकी और नाच कार्यक्रमों में बहुत लोकप्रिय हुआ था। महेंदर मिसिर के गीतों का जमाना भोजपुरी की बढ़ती अश्लीलता में कहीं बह गया।
मोहम्मद खलील भोजपुरी गायक ही नहीं थे, वे भोजपुरी संस्कृति और परंपरा थे। उन्होंने एक भी अश्लील गीत नहीं गाया। पं. सीताराम द्विवेदी का लिखा गीत छलकल गगरिया मोर निरमोहियामील का पत्थर साबित हुआ था। जब भी मोहम्मद खलील के स्वर में यह गीत बजता तो सब कुछ स्थिर हो जाता। मोहम्मद खलील धर्म - संप्रदाय से ऊपर थे। उनके स्वर में भोजपुरी आत्मा बसती थी। उनका गाया सुमिरीला शारदा भवानी, पत राखीं महरानीभोजपुरी क्षेत्र की लोकप्रिय सरस्वती वंदना थी जो अनेक अवसरों पर गाई जाती थी। रेलवे में साधारण से पद पर कार्यरत मोहम्मद खलील मधुमेह के चलते असमय कालग्रस्त हो गए। उनके गीतों के कैसेट या सीडी बाजार में लाए ही नहीं गए। एक-दो बार मैंने भी आकाशवाणी गोरखपुर से प्रयास किया लेकिन सफलता नहीं मिली। न अब वे गीत सुनने वाले रहे और न गाने वाले। अश्लीलता के इस युग में मोहम्मद खलील, महेंदर मिसिर या भोलानाथ गहमरी किस बूते टिकते ? पच्चीस-तीस की उम्र तक पहुँचती नई पीढ़ी तो इनके नाम से भी परिचित नहीं। लेकिन इधर सुखद ये रहा कि आखर भोजपुरी नामक किसी संस्था ने इन गीतों कहीं से प्राप्त करके यू ट्यूब पर अपलोड किया है। वही आवाज, वही साज। बहुत अच्छा लगा। पुरबिया तान नामक किसी संस्था ने चंदन तिवारी से इनके कई गीत ढंग से गवाए हैं। कभी-कभी उम्मीद जागती है कि चंदन तिवारी और मैथिली ठाकुर जैसी नवोदित गायिकाएं इस परंपरा को जीवित रखेंगी।
विचारों तथा यादों की शृंखला भागती हुई कर्मनाशा तक आ गई। कर्मनाशा भी मेरी यादों के तहखाने में कैद है। इसलिए नहीं कि यह एक पौराणिक नदी है और त्रिशंकु की लार से निकली है। इसलिए भी नहीं कि इसमें नहाने से समस्त अर्जित पुण्य नष्ट हो जाता है और इसलिए भी नहीं कि जब इसमें बाढ़ आती है तो यह मानुश बलि लेकर ही जाती है। मेरी यादों में यह एक बार पुनः शिवप्रसाद सिंह की कहानी कर्मनाशा की हारके कारण बसी है। इस कहानी का पभाव इतना अधिक पड़ा था कि मुझे कर्मनाशा सदैव हारी हुई ही दिखी है। इंटरमीडिएट के पाठ्यक्रम में इस कहानी को पढ़ने का मौका मिला था। अंधविश्वास, जातीय भेद और तुगलकी फरमान को जिस तरह यह कहानी तोड़ती है, उसमें कर्मनाशा की हार होनी ही है।
कर्मनाशा उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा निर्धारित करती है। नदी के पश्चिम उत्तर प्रदेश का गाजीपुर जिला है और पूरब में बिहार का आरा। गाजियाबाद से गाजीपुर तक फैले उत्तर प्रदेश को कर्मनाशा अलग करती है। चौड़ाई तो अधिक नहीं है, किंतु गहराई है जिससे नदी डरावनी लगती है। न जाने वह कौन सा मिथक या मानसिकता है जो एक नदी को पुण्यनाशिनी का विशेशण दे देता है। कर्मनाशा का उल्लेख रामचरित मानस में कई बार आता है और प्रायः नकारात्मक अर्थ में ही आता है। लेकिन अयोध्याकांड में तुलसीदास लिखते हैं - करमनास जल सुरसरि परई, कहहु तासु को सीस न धरई। अर्थात कर्मनाशा का जल (जो पापदायक है) गंगा में मिलने के बाद षीश पर धारण करने योग्य हो जाता है। समझ में नहीं आता कि जो नदी इतने लोगों को जीवन देने का कार्य करती है, वह कर्मनाशा कैसे हो सकती है?
क्रमशः बक्सर और डुमराँव आते हैं। डुमराँव उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ से जुडा़ है। आगे जाता हूँ तो आरा जिला आता है। वैसे तो आरा एक भोजपुरी फिल्मी गाने में नायिका की कमर के साथ हिलता हुआ दिखाया गया है जिसके साथ छपरा जिला भी हिलता है। लेकिन मेरा इससे कुछ लेना-देना नहीं है। मेरे अग्रजवत मित्र और यशस्वी संगीतज्ञ पं0 विजयशंकर मिश्र जी यहां आया करते हैं और प्रायः जिक्र भी किया करते हैं। आरा से उनका विशेष लगाव है। आरा एक ऐतिहासिक जिला है। यह वीर कुँवर सिंह का कर्मक्षेत्र है जहां उन्होंने अंगरेजों को मात दी थी, भले ही कुछ समय के लिए।
अब दानापुर आता है। दानापुर मेरी यादों का एक सुखद प्रेत है। न तो मैं कभी यहां आया हूँ और न इससे मेरा प्रत्यक्ष संबंध है। बस कुछ यादें जुड़ी हैं पिताजी के कारण। उन्हीं से मैंने यह नाम सुना था। तब मैं दस वर्श से अधिक का नहीं रहा होऊँगा। शायद कम ही। सत्तर का दशक था वह। अपने जिला मुख्यालय आजमगढ़ का भी मुँह नहीं देखा था मैंने। अभावों के दिन थे। हिस्से में यदि आवश्यकता से अधिक कुछ था तो माता-पिताजी, बड़ी बहन दीदीएवं बड़े भाई भइयाका प्यार। अभावों का हमला मेरे ऊपर सबसे बाद में होता था, या प्रायः नहीं भी हो पाता था। मेरी बड़ी बुआ कलकत्ता रहती थीं। उनका हमें बहुत घमंड रहता था, पता नहीं क्यां। शायद समृद्ध थीं, इसलिए। उनके बड़े बेटे पटना में किसी अच्छे पद पर थे। बुआजी शायद पटना आई हुई थीं और उन्होंने पत्र लिखकर पिताजी को बुलाया था। क्यों, ये मालूम नहीं। पिताजी अब होते तो जरूर पूछता और पूरी कहानी पूछता। वे किस्सागोई में बहुत माहिर थे। सो, पिताजी पटना गए थे। वादा था कि तीन-चार दिन में लौट आएंगे। हफ्ते के आस - पास निकल गए और वे नहीं आए। मैं हर शाम उनकी राह देखता। मैं ही क्यों, पूरा परिवार देखता। कुल पांच जने का परिवार एक बड़ी सी बखरी में रहता जिसकी संभाल भी मुश्किल हो रही थी। गाँव के बाहर घर था। शाम होते ही सियारों की हुआँ-हुआँ षुरू हो जाती। यदि रात अंधेरी हो तो चोरां का आतंक ऊपर से। ऐसे में घर में अकेली माँ और अधिकतम पंद्रह साल तक के बच्चे।
उदासी बढ़ने लगी थी। न तो फोन का जमाना और न संदेश की सुविधा। पता नहीं क्या हुआ पिताजी को ! भइया-दीदी तो कम पूछते, मैं बहुत पूछता उनके बारे में। कब आएंगे बबुआ ? क्यों नहीं आ रहे हैं ? और अम्मा का वही धीरज भरा जवाब कि आ जाएंगे। हफ्ता बीतते-बीतते बहुत सी आशंकाएँ घिर आई थीं। मेरा कलेजा मुँह को आ जाता। अपने छोटे से दिल से भगवान को बहुत मनाता कि बबुआ वापस आ जाएँ। माँ दिलासे के लिए कहतीं कि बहुत सामान लेकर आएंगे तुम्हारे लिए, तो मुझे बहुत बुरा लगता। कुछ नहीं चाहिए मुझे। लेकिन तब मैं शायद ही समझता रहा होऊँगा कि मुझसे ज्यादा दुखी और परेशान तो अम्मा ही होंगी।
पिताजी उस दिन शाम को आए थे। राह देखना सफल हुआ था मेरा। घर के पिछवाड़े थे तभी दौड़कर चिपट गया था। पहली बार ऐसा हुआ था कि उनका लाया कुछ भी मुझे अच्छा नहीं लगा था। अच्छा लगा था तो बस उनका वापस आना। रात में उन्होंने अपनी शैली में यात्रा संस्मरण सुनाया था। यह कि बुआ जी ने जबरदस्ती रोक लिया था। यह भी नहीं सोचा था कि बच्चों पर क्या बीत रही होगी। वह जमाना जबरदस्ती रोके जाने का था। और हाँ, पिताजी दानापुर में किसी संकट में फंस गए थे। मुश्किल से जान बची थी। अब याद नहीं, शायद चोरों-ठगों का गिरोह पीछे लग गया था। तबसे दानापुर यादों में बसा रहा है। दानापुर पिताजी की याद ताजा करा गया। न जाने किस जगह वे संकट में फंसे थे, कैसे फंसे थे, इसका नाट्य रूपांतरण मन ही मन होने लगा था।
भागलपुर तक पहुंचने में विक्रमशिला ने पौन तीन बजा दिए थे। वहाँ से उतरकर हम नाथ नगर गए जहां जनवासे की व्यवस्था थी। व्यवस्था अच्छी थी, अच्छा लगा।
प्रेम प्रभाकर जी एवं भाभी जी के साथ मैं  
भागलपुर जाने के पीछे केवल मित्र का आग्रह, बिहार की संस्कृति-परंपरा एवं विवाह देखना ही नहीं था। भागलपुर से एक गहरा लगाव वरिश्ठ साहित्यकार, आलोचक, अध्येता और भागलपुर विष्वविद्यालय में हिंदी विभाग में प्रोफेसर साहित्यिक मित्र प्रेम प्रभाकर जी के कारण भी है। हम लोगों के संपर्क में आए लंबा अरसा नहीं हुआ है, लेकिन वैचारिक सहमति एवं साहित्य ने बहुत नजदीक कर दिया है। भागलपुर जाने के पीछे यह आकर्षण कम नहीं था।
शाम को प्रेम प्रभाकर जी ने मुझे लेने के लिए अपने एक शोधछात्र प्रकाश जी को भेज दिया था। प्रकाश बड़े आज्ञाकारी एवं सरल छात्र हैं। प्रभाकर जी के घर जाकर मुझे लगा ही नहीं कि इनके यहां मैं पहली बार आ रहा हूँ। मैं जिस सरलता की तलाश में रहता हूँ, वह प्रभाकर जी के यहां साकार रूप में बैठी है। बहुत देर तक साहित्यिक एवं पारिवारिक चर्चा होती रही। साथ में भाभी जी (श्रीमती प्रभाकर जी) भी चर्चा में भाग लेती रहीं। आना जरूरी था, आखिर बाराती बनकर गया था। शादी में भी भागीदारी कैसे न निभाता ? चलते समय प्रेम प्रभाकर जी ने अपनी आलोचनात्मक पुस्तक हिंदी कहानी का नवाँ दशक और कृषककी प्रति भेंट की। यह अपने विषय की अनूठी पुस्तक है। इस विषय पर शायद ही शोध हुआ होगा। पुस्तक प्रथम दृष्टि में ही एक सार्थक प्रयास लगती है। मिलना तो और भी साहित्यकारों से था, ऐसा आग्रह भी था, लेकिन समय को कौन रोक पाया है।


 शादी में शामिल होकर अगली दोपहर दिल्ली की ट्रेन पकड़ी। वापसी में कुछ भी विशेष नहीं रहा। एकाध घटना जरूर ऐसी हुई कि जिक्र करना अच्छा रहेगा लेकिन जिक्र न करना उससे भी अच्छा।
(जून 01, 2019)