Saturday, 18 February 2017

चर्चा में ‘समाज का आज’

नरेश दाधीच
जयपुर  पीस फाउण्डेशन के तत्वावधान में आज मानसरोवर स्थित उनके संगोष्ठी कक्ष में डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल की नव प्रकाशित पुस्तक समाज का आज पर चर्चा गोष्ठी आयोजित की गई. प्रारम्भ में फाउण्डेशन के अध्यक्ष प्रो. नरेश दाधीच ने पुष्प गुच्छ देकर लेखक का स्वागत किया  और फिर कृतिकार डॉ अग्रवाल ने अपनी पुस्तक के बारे में जानकारी दी. उन्होंने बताया कि मूलत: एक अपराह्न दैनिक के स्तम्भ के रूप में लिखे गए ये आलेख समकालीन देशी-विदेशी समाज की एक छवि प्रस्तुत करते हैं. डॉ अग्रवाल ने कहा कि ये लेख विधाओं की सीमाओं के परे जाते हैं और बहुत सहज अंदाज़ में हमारे समय के महत्वपूर्ण सवालों से रू-ब-रू कराने  का प्रयास करते हैं. कृति चर्चा की शुरुआत की जाने-माने पत्रकार श्री राजेंद्र बोड़ा ने. उनका कहना था कि यह किताब बेहद रोचक है और हल्के फुल्के अंदाज़ में बहुत सारी बातें कह जाती हैं. क्योंकि ये लेख एक अखबार  के लिए लिखे गए हैं इसलिए इनमें अखबार की ही तर्ज़ पर इंफोटेनमेण्ट है‌ यानि सूचनाएं भी हैं और मनोरंजन भी. 

बोड़ा ने किताब की भाषा की रवानी की विशेष रूप से सराहना की और यह भी कहा कि इन लेखों में लेखक का सरल, सौम्य व्यक्तित्व झलकता है. लेकिन उनका यह भी मत था कि इस किताब में जो सच उजागर हुआ है वह समाज के एक वर्ग विशेष का ही सच है, पूरे समाज का नहीं है. यहां मज़लूम  और ग़रीब वर्ग सिरे से गायब है. लेकिन उनका यह भी कहना था कि लेखक सर्वत्र मानवीय पक्ष के साथ खड़ा नज़र आता है. श्री बोड़ा का यह भी विचार था कि इस किताब  के बहुत सारे- करीब चालीस-  लेख प्रश्न चिह्न पर ख़त्म होते हैं, और लगता है कि लेखक खुद कोई स्टैण्ड नहीं ले रहा है. लेकिन उनका एक मत यह भी था कि लेखक अपनी बात कहता है और निर्णय पाठक पर छोड़ देता है. श्री बोड़ा का कहना था कि इन लेखों में कोई भी पीड़ा सघन रूप से अभिव्यक्त नहीं हो पाई है, उसकी सूचना मात्र है. फिर भी, किताब की पठनीयता की उन्होंने उन्मुक्त सराहना की. 

श्री बोड़ा की बात को आगे बढ़ाया वरिष्ठ कवि श्री नंद भारद्वाज ने. उन्होंने कहा कि आकार इन लेखों की बहुत बड़ी सीमा है. विषय जैसे ही खुलने लगता है, लेख समाप्त हो जाता है. लेकिन लेखक के स्टैण्ड की बात पर उनका कहना था कि मूल्यों के स्तर पर लेखक लोकतांत्रिक स्टैण्ड लेता है. वह अपनी बात कहता है और फैसला पाठक पर छोड़ देता है. वह भले ही कोई निर्णय न दे, विचार को ज़रूर प्रेरित करता है. श्री  भारद्वाज ने इस किताब की दो ख़ास बातों को रेखांकित किया. एक तो यह कि लेखक संस्कृति की अच्छाइयों को उभारता है, और दूसरी यह कि वह बदलावों, विशेष रूप से तकनीक में आ रहे बदलावों के प्रति सहानुभूति पूर्ण नज़रिया रखता है.

वरिष्ठ रचनाकार और साहित्यिक त्रैमासिकी अक्सरके सम्पादक डॉ हेतु भारद्वाज का  कहना था कि यह किताब अखबार और लेखक के रिश्तों पर विचार करने की ज़रूरत महसूस कराती है. उनका सवाल था कि क्या अख़बार लेखक काइस्तेमाल करता है, और अगर  लेखक कोई स्टैण्ड लेता है तो अखबार का रुख क्या होगा. उन्होंने लेखक से चाहा कि वो कभी ऐसा भी कुछ लिखकर देखे जो अखबार को स्वीकार्य न हो. चर्चा में सहभागिता करते हुए कथाकार और विमर्शकार हरिराम मीणा ने कहा कि हर कॉलम की अपनी शब्द सीमा होती है और लेखक को उस सीमा के भीतर रहना होता है. उन्होंने कहा  कि इस किताब के लेख बहुत रोचक और समसामयिक हैं. उनका यह भी मत था कि लेखक कोई उपदेशक नहीं होता कि वह अपने पाठक को रास्ता बता दे. अंतिम सत्य उसके पास भी नहीं होता है. पहले उठे एक मुद्दे के संदर्भ में उन्होंने कहा कि लेखक जिस समाज को जानता है, उसी के बारे में तो लिखता है. किसी भी लेखक से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह समाज के उन हिस्सों के बारे में भी  लिखेगा  जिन्हें वो जानता ही नहीं है. साहित्य समर्थाकी सम्पादक कथाकार नीलिमा टिक्कू का कहना था कि इस किताब के लेख ज्वल्लंत समस्याओं को उठाते और पाठक को उद्वेलित करते हैं.न्यूज़ टुडैके पूर्व सम्पादकीय प्रभारी, जिनके कार्यकाल में ये आलेख प्रकाशित हुए थे, श्री अभिषेक सिंघल का कहना था कि अखबारी लेखन और साहित्य में स्वभावत:  एक फासला होता है, और फिर अगर वह अखबार सांध्यकालीन हो तो यह फासला और बढ़ जाता है क्योंकि इसका पाठक वर्ग भिन्न होता है. उन्होंने इस कॉलम के लिए अपनी मूल योजना से परिचित कराते हुए बताया कि हम चाहते थे कि  समाज के यथार्थ से आंख न मूंदी जाए, लेकिन उसे सहज शैली और सरल भाषा में प्रस्तुत किया जाए. 

सिंघल ने इस बात पर प्रसन्नता ज़ाहिर की कि उनके अखबार  में छपे ये लेख अब पुस्तकाकार उपलब्ध हैं और इन्हें पढ़ा और सराहा जा रहा है. चर्चा का समापन करते हुए राजनीति विज्ञानी डॉ नरेश दाधीच ने कहा कि इस किताब के लेखों की भाषा नए प्रकार की है और वह उत्तर आधुनिक है. यह भाषा विषयों द्वारा निर्मित सीमाओं का अतिक्रमण करती है और कभी-कभी यह आभास देती है जैसे यह हरिशंकर परसाई  की भाषा का उत्तर आधुनिक संस्करण है. एक तरह से तो इस किताब की भाषा आने वाले समय की हिंदी कैसी हो, इसका मानक रूप प्रस्तुत करती है. भाषा की सरसता और लचीलेपन के अलावा उन्होंने विषयों  के वैविध्य की भी सराहना  करते हुए और विशेष रूप से किताब के अंतिम लेख का विस्तृत हवाला देते हुए यह शिकायत की कि लेखक पूरी घटना बता कर भी उसका अंत नहीं बताता है.

इसी बात के जवाब से अपनी टिप्पणी की शुरुआत करते हुए लेखक डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कहा कि यह शिल्प उन्होंने आज की कहानी से लिया है जो प्राय: ओपन एण्डेड होती है और जहां कथाकार पाठक से अपेक्षा करता है कि वह अंत की कल्पना खुद कर लेगा. उन्होंने विभिन्न वक्ताओं द्वारा उठाए गए मुद्दों पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी. उनका कहना था कि अखबार ने कभी उनकी अभिव्यक्ति पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया. इस्तेमाल वाली बात पर अपने चिर परिचित हल्के फुल्के अंदाज़ में उन्होंने कहा कि इस्तेमाल तो सभी एक दूसरे का करते हैं. अगर अखबार लेखक का इस्तेमाल करता है तो लेखक भी अपनी बात कहने के मंच के तौर पर अखबार का इस्तेमाल करता है.

इस संगोष्ठी में जयपुर  के  अनेक  प्रमुख साहित्यकार-पत्रकार जैसे फारूक आफरीदी, हरीश करमचंदानी, गोविंद माथुर, अनिल चौरसिया, एस भाग्यम शर्मा, रेखा गुप्ता, स्मिता विमल, रंजना त्रिखा, प्रो. सुल्ताना, कल्याण प्रसाद वर्मा, अशोक  चतुर्वेदी, सम्पत सरल, बनज कुमार बनज, माया मृग, चंद्रभानु भारद्वाज, हनु रोज, और अनेक सुधी साहित्य रसिक उपस्थित थे.


Tuesday, 14 February 2017

गंगा-जमुनी तहज़ीब के दुश्मन कौन?

इष्ट देव सांकृत्यायन 
कहने के लिए पद्मावती को लेकर उठा विवाद थम गया. लेकिन यह बस थमा ही है, ख़त्म नहीं हुआ. क्योंकि जो विवाद एक बार उठ जाता है, वह कभी ख़त्म नहीं होता. उसके मूलभूत तत्त्व, जो विवाद के कारण होते हैं, बिलकुल निचले तल पर जाकर कहीं बैठ जाते हैं. वे समय-समय पर नए-नए रूपों में उभरते और समाज को दूषित करते रहते हैं. विवाद के हर दौर में पक्ष-विपक्ष की ओर से तर्कों के रूप में कई ऐसी बातें आ जाती हैं जो समाज के किसी तबके के थोथे अहंकार को बढ़ाती हैं और किसी के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाती हैं. यह आशंका उस समाज में बहुत अधिक होती है जहाँ बुद्धिजीवियों के रूप में मौजूदा या पूर्ववर्ती सत्ता के वकील होते हैं. जिनका काम नीर-क्षीर विवेक के ज़रिये किसी सत्य तक पहुँचना नहीं, केवल अपने-अपने पोषकों की सत्ता या प्रभाव को जैसे-तैसे बचाए रखने के लिए थोथे तर्क गढ़ना होता है.

लोकतंत्र में सत्ता या प्रभाव का मूल स्रोत वोट होता है. वोट पाने के लिए समाज के कल्याण के लिए जो काम किए जाने की ज़रूरत है, उसका भारतीय राजनीति में शुरू से ही सर्वथा अभाव है. इसीलिए ऐसी कोई नीति नहीं बनाई जाती जिससे सबमें अपने भोजन-कपड़े-मकान के इंतज़ाम की आत्मनिर्भरता के साथ-साथ लैप्टॉप-टैब्लेट ख़रीदने की औकात आ सके. यहाँ यह सब वोट के बदले बाँटे जाने की घोषणाएँ की जाती हैं और न जाने हमारा तंत्र किस नज़रिये से देखता है कि यहाँ यह सब वोट के बदले दिए जाने वाले प्रलोभन के तौर पर नहीं देखे जाते. तंत्र की तो ख़ैर छोड़िए, इसी से यह भी पता चलता है कि हमारे ये तथाकथित बुद्धिजीवी कितनी ईमानदारी और तत्परता से अपनी ज़िम्मेदारी निभा रहे हैं जो जनता में उसके अपने व्यापक स्वार्थ की सही समझ और आत्मसम्मान भी पैदा नहीं कर सके. ये केवल बंद कमरों में बैठकर देश के वास्तविक इतिहास को नकारने या एयरकंडीशंड सभागारों में देश की सीमाओं को लेकर नए-नए विवाद खड़े करने में लगे रहते हैं. इनकी ज़बान हिलते ही पता चल जाता है कि अपना देश इनके लिए केवल साधन और सुविधाप्रदाता है, जनता केवल उपयोग की वस्तु है. वस्तुतः जुड़ाव तो इनका कहीं और से है. ऐसे बुद्धिजीवी किसी भी समाज के लिए उन तत्त्वों से ज़्यादा ख़तरनाक हैं, जिन्हें अराजक कहा जाता है.

यह पूरा विवाद ऐसी ही बौद्धिक अराजकता का नतीजा है. कला और कल्पनाशीलता के नाम पर केवल अपरिमित नहीं, आपराधिक छूट इनकी ही ज़रूरत है. हिंदी सिनेमा ने अपने इतिहास में कितनी रचनात्मकता दिखाई है और किन ईमानदार लोगों की कृपा पर पला है, यह बताने की ज़रूरत नहीं है. गुण का विरोध मात्रा से करने का बीभत्स याराना पूँजीवादी तरीक़ा ही बंबइया सिनेमा उर्फ़ बॉलीवुड की पहचान है. जैसा कि अब बन गए बॉलीवुड नाम से ही ज़ाहिर है, कथ्य के स्तर पर यह केवल हॉलीवुड का उच्छिष्ठ है. लागत के स्रोत की बात करें तो यह उन्हीं ईमानदारों से आती रही है जिनके ख़िलाफ़ अस्सी-नब्बे के दशक में सबसे ज़्यादा फिल्में बनीं. वो सारी मलिन बस्तियाँ उजाड़ने में हिंदी बॉलीवुड के आश्रयदाता ही सबसे आगे रहे हैं, जिनका प्रतिनिधित्व इनकी फिल्मों का एंग्री यंग मैन ब्रांड हीरो करता रहा है. आप जानते ही हैं कि किस तरह इनका एंग्री यंग मैन परदे पर पूँजीपतियों और राजनेताओं के विरोध का स्वांग करते-करते ख़ुद पूँजीपति से लेकर मंत्री तक बन जाता है. फिल्मी कलाकारों पर अवैध असलहे रखने से लेकर पारिवारिक संबंधों  में धोखाधड़ी तक के मुकदमों की तो छोड़िए, आपने यह भी देखा है कि कैसे एक मुंबइया हीरो फुटपाथ पर सोए अमीरों के सीने पर गाड़ी चढ़ाकर दनदनाते हुए निकल जाता है. आप भूले नहीं होंगे कि कैसे दुबई या लाहौर में बैठे महान संत पर्दे के शेर को चिकना कहते हैं और उनके सामने वह दीन-हीन सा रिरियाता नज़र आता है. ऐसे ही रचनाधर्मियों के पक्ष में खड़े जनधर्मियों को जब मैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और रचनात्मक छूट की झंडाबरदारी करते देखता हूँ तो घिन सी आने लगती है.

रचनात्मक छूट के नाम पर अपने को पूँजीवाद के धुर विरोधी बताने और हर बात पर अमेरिका के ख़िलाफ़ झंडा उठा लेने वाले बुद्धिजीवी भी हॉलीवुड के उद्धरण देते नहीं थकते. दुनिया जानती है कि केवल मुनाफ़ा कमाने की होड़ में लगा भारत का पूँजीपति वर्ग अपने पूरे प्रोडक्शन पर भी उतना ख़र्च नहीं करता जितना हॉलीवुड केवल रिसर्च में लगा देता है. न्यूनतम लागत में अधिकतम मुनाफ़े की इसी होड़ से इनकी ज़िम्मेदारी का पता चलता है. कल्पनाशीलता और रचनात्मक छूट के नाम पर ये किसी भी देश के इतिहास के साथ वही करेंगे जो हीरोइन बनने के सपने सँजोए मुंबई पहुँची किसी भोली-भाली क़सबाई लड़की के साथ करते हैं. कास्टिंग काउच शब्द किसी व्याख्या का मोहताज नहीं है. उसी तर्ज पर ये पहले तो एक असभ्य, कायर और धूर्त लुटेरे के सपने में एक स्वाभिमानी स्त्री को उसके साथ रोमैंस करते दिखाएंगे. उस स्त्री को जिसने उसके हाथ लगने की तुलना में अपने प्राणों की आहुति देना बेहतर समझा. जब समाज इस पर कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं करेगा या उसकी प्रतिक्रिया दबा दी जाएगी तब आगे चलकर ये उसी स्त्री को उसी लुटेरे के साथ जोड़कर कोई प्रेम कहानी ही बना देंगे.

यही नहीं, बाद में कोई ऐसा स्वनामधन्य इतिहासकार, जिसका इतिहासकार होना किसी गिरोहबाज़ी के परिणास्वरूप हुई एक ऐतिहासिक दुर्घटना होगा और जो लोक में सदियों से रची-बसी गाथाओं को कपोलकल्पना मानता होगा, इनकी फिल्मी कहानी के आधार पर एक रक्तपिपासु समलैंगिक लुटेरे को न केवल एक आदर्श प्रेमी बल्कि महान प्रजापालक लोककल्याणकारी सम्राट बना कर पेश कर देगा. ये अलग बात है कि पद्मावती क्या, मौक़ा मिले तो जायसी तक को ये काल्पनिक घोषित कर देंगे. गोएबल्स के निर्लज्ज चेले याराना पूँजीवाद के सहयोगी प्रचार तंत्र का भरपूर उपयोग करते हुए अपने गढ़े झूठ को सत्य की जगह स्थापित करने के लिए अंग्रेज़ी में किताब लिखेंगे. जुगाड़ तंत्र के बल पर भारतीय इतिहास के ज्ञान से सर्वथा वंचित और भारत को हर हाल में नीचा दिखाने को तत्पर अपने किसी विदेशी आका से पुरस्कार ले लेंगे. यहाँ की सरकारों की इच्छाशक्ति के प्रतीकस्वरूप भरे पड़े बेरोज़गारों या किसी गिरोहबाज़ की कृपा से रोज़गारशुदा बने अपने कृपाकटाक्ष के चिर आकांक्षियों से उसका भरपूर सकारात्मक और विरोधात्मक प्रचार करवा लेंगे. इस प्रचार से आक्रांत भारतीय जन का कोई वर्ग अहंकार, तो कोई कुंठा से थोड़ा और ग्रस्त हो जाएगा. इसकी मदद से वैमनस्य फैलाकर ये समाज को बाँटने में थोड़ा और आगे बढ़ जाएंगे.

पद्मावती के अस्तित्व से जो इनकार कर चुके हैं, वे एक-न-एक दिन मलिक मुहम्मद जायसी, शेख़ फ़रीद, हज़रत निज़ामुद्दीन, बुल्ले शाह और दूसरे सूफ़ियों व संतों के अस्तित्व से भी इनकार करेंगे ही. क्योंकि ये जो करना चाहते हैं, सूफी और संत उस मार्ग में सबसे बड़ी बाधा हैं. वह सूफ़ी और संत ही हैं जिन्होंने भारत में गंगा-जमुनी तहज़ीब के प्रवाह को बनाए रखने में अपना जीवन होम कर दिया. इसके लिए सूफ़ी और संत किसी शाह के वज़ीफ़ाख़्वार नहीं बने. वज़ीफ़ाख़्वार बनकर किसी संस्कृति, इतिहास या जन के साथ न्याय किया भी नहीं जा सकता. क्योंकि वजीफ़ाख़्वार किसी का भी हो, उसे लढ़िये की तरह एक तरफ़ उल्ल होना ही पड़ता है.

ज़रा सोचिए, जायसी चाहते तो क्या वे पद्मावत की कहानी को आध्यात्मिक टर्न देते हुए ही वह नहीं कर सकते थे जो भंसाली ने किया? उन्होंने ऐसा नहीं किया. उसी सत्य को अपना सत्य माना जो उनके समय के जनगणमन में अंतःसलिला धारा की तरह प्रवहमान था. यही वजह है कि उनके समय और बाद के कई धुरंधर बह गए, लेकिन जायसी, बुल्लेशाह, रसखान और उनके जैसे दूसरे रचनाकार लोक की स्मृति में रचे-बसे रहे. काँटों की राह पर ज़िंदगी गुज़ार देने वाले ये रचनाकार आज के पाँचसितारा छाप जनधर्मी बुद्धिजीवियों की राह के सबसे बड़े काँटे हैं.

जायसी जैसे रचनाकारों के भारत की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बने रहते इनकी सफलता केवल कुछ लोगों को हिंदू-मुसलमान बना देने तक ही सीमित रहेगी. मैंने देखा कि सोशल मीडिया पर किस तरह कुछ लोग अपने को हिंदू या मुसलमान बनाते हुए पद्मावती के बहाने जोधा-अकबर, फ़िरोजा-वीरमदेव, जहाँआरा-शत्रुसाल से लेकर धरमन बीबी और बाबू कुँवर सिंह के प्रेम तक के मसले उठाकर एक-दूसरे को ललकारते रहे. धुर पुरुषवादी मानसिकता से आक्रांत लोगों में से किसी के लिए विकृत यौन मानसिकता का वहशी दरिंदा आदर्श हो गया तो किसी के लिए दो ऐतिहासिक पात्रों का पवित्र प्रेम एक-दूसरे को नीचा दिखाने का माध्यम बन गया. अगर इसे संस्कृति मान लिया जाए तो फिर विकृति क्या होगी?

पंथनिरपेक्षता का पाखंड रचने वालों ने यह स्थापित करने की पुरज़ोर साजिश रची कि भारत का मुसलमान पूर्वज के रूप में अपनी प्रेरणा उन्हीं लुटेरे और रक्तपिपासु आक्रांताओं से ग्रहण करता है, जिनके मनुष्य होने पर मनुष्यता शर्मिंदा है. इन आक्रांताओं से बहुत पहले अध्यात्म के संदेश लेकर आए सूफियों को उसने विस्मृति के हवाले कर दिया है. लेकिन आमजन का ऐसा मान लेना उतनी ही बड़ी ग़लती होगी जितना कि यह सोचना कि भारत का हिंदू अपनी प्रेरणा कंस, जरासंध, दुशासन या जयचंद जैसे कुपात्रों से लेता है.  मेरे मुसलमान दोस्तों में तो एक भी ऐसा नहीं जो खिलजी, गोरी या ग़ज़नी को अपना  प्रेरणास्रोत मानता हो. वे तो जायसी, फरीद और बुल्ले शाह को ही याद करने वाले हैं. मीर, ग़ालिब और  फ़िराक़ के उद्धरण देने वाले हैं. फिर हर राजनीतिक खेमे और उनके झंडाबरदार विद्वानों की ओर से यह स्थापित करने की साजिश क्यों रची जा रही है?

इसे इसी स्वांग के मार्फ़त समझने की ज़रूरत है. झापड़ पड़ने और फेसबुक-ट्विटर पर मिली गालियों के बाद आख़िरकार भंसाली इस पर राज़ी हो गए कि वह फिल्म में कोई रोमैंस सीन नहीं डालेंगे. पता नहीं उनका मानना कितना सच है और कितना निबाहा जाएगा. यह भी कि करणी सेना की मंशा के पीछे कितना आत्मगौरव और कितना न्यस्त स्वार्थ है. लेकिन एक बात तो तय है कि वह फिल्म बना रहे हैं और एक-दो चाटों के बदले मुफ़्त में उन्हें जो प्रचार मिला, वह करोड़ों रुपये विज्ञापन पर ख़र्च कर भी नहीं मिल पाता.

करणी सेना और ऐसे ही अन्य आत्मगौरववादी भले इसे अपनी जीत मानें, लेकिन विजय यह वास्तव में याराना पूँजीवाद की ही है. वह याराना पूँजीवाद ही है जिसके लिए वज़ीफ़ाख़्वार विद्वज्जन रचनात्मक छूट और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का नारा ही नहीं, पद्मावती के एक काल्पनिक पात्र होने की कपोलकल्पित स्थापना तक लेकर आ गए थे. एक बार के लिए यह तो माना जा सकता है कि करणी सेना के लोग बिना सोचे-समझे इस जाल के हिस्से बन गए हों. लेकिन, कलात्मक कल्पनाशीलता के ध्वजवाहक वे विद्वज्जन जो दिन-रात पूँजीवाद की बखिया ही उधेड़ते रहते हैं, इस क्षुद्र ज्ञान से वंचित होंगे, यह मेरी कल्पना से बाहर है. उनसे अनजाने में कोई ग़लती नहीं हुई है. वे अच्छी तरह जानते हैं कि फिल्म बनाने वाले कितने ग़रीब होते हैं, इसके लिए पूँजी कहाँ से आती है और उसकी भरपाई की शर्तें क्या होती हैं. अब यह आपको सोचना होगा कि वे सब जान-बूझकर ऐसा क्यों करते हैं? यह भी कि भारत की गंगा-जमुनी तहजीब को नष्ट करने की साजिश रचने वाले कौन हैं और इसके पीछे उनके उद्देश्य क्या हैं?

Sunday, 5 February 2017

इति सिद्धम


इष्ट देव सांकृत्यायन

विषयों में एक विषय है गणित. इस विषय के भीतर भी एक विषय है रेखागणित. ऐसे तो इस विषय के भीतर कई और विषय हैं. अंकगणित, बीजगणित, त्रिकोणमिति, लॉगरिथ्म, संख्यिकी, कलन आदि-आदि, मने विषयों की भरमार है यह अकेला विषय. इस गणित में कई तो ऐसे गणित हैं जो अपने को गणित कहते ही नहीं. धीरे से कब वे विज्ञान बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता. हालाँकि ऊपरी तौर पर विषय ये एक ही बने रहते हैं; वही गणित. हद्द ये कि तरीक़ा भी सब वही जोड़-घटाना-गुणा-भाग वाला. अरे भाई, जब आख़िरकार सब तरफ़ से घूम-फिर कर हर हाल में तुम्हें वही करना था, यानि जोड़-घटाना-गुणा-भाग ही तो फिर बेमतलब यह विद्वता बघारने की क्या ज़रूरत थी! वही रहने दिया होता. हमारे ऋषि-मुनियों ने बार-बार विषय वासना से बचने का उपदेश क्यों दिया, इसका अनुभव मुझे गणित नाम के विषय से सघन परिचय के बाद ही हुआ.

जहाँ तक मुझे याद आता है, रेखागणित जी से मेरा पाला पड़ा पाँचवीं कक्षा में. हालाँकि जब पहली-पहली बार इनसे परिचय हुआ तो बिंदु जी से लेकर रेखा जी तक ऐसी सीधी-सादी लगीं कि अगर हमारे ज़माने में टीवी जी और उनके ज़रिये सूचनाक्रांति जी का प्रादुर्भाव हो गया होता तो कोई भरोसा नहीं कि उस उम्र में ही मैं उन पर मर-मिटा होता. चूँकि बिना पटरी के भी सीधी रेखा जी को खींचना मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं थी, इसलिए अपने सहपाठियों की तुलना में शुरू-शुरू में मैं थोड़ा आगे ही चल रहा था. सामान्य परिचय के बाद जब रेखाजी ने थोड़ा इठलाना-बल खाना शुरू किया, तो भी मुझे अच्छा ही लगा. हालांकि बीच-बीच में कुछ त्रिकोण, चतुर्भुज, पंचकोण, षटकोण आदि लोगों से पाला पड़ा और वे लोग अगर अच्छे नहीं तो कुछ ख़ास बुरे भी नहीं लगे, क्योंकि थे तो ये सब रेखा जी लोगों के ही खेल. और रेखा जी को सीधे-टेढ़े हर तरह से खींचना मुझे आता था. लेकिन जैसे-जैसे मेरा परिचय इनसे सघन होता गया, वैसे ही वैसे इनके सीधेपन से मेरा विश्वास उठता गया. पता चला कि ये तो लंब के रूप में बिलकुल सीधी खड़ी होते हुए भी इठलाती हैं, आधार के रूप में लेटी हुई भी बल खाती हैं और कर्ण के रूप में ऊपर जाते हुए भी अपने पर भरोसा करने वाले को नीचे गिरा देती हैं.

रेखा जी और उनसे संबंधित गणित के बारे में यह सब मैं तब जान पाया जब सातवीं कक्षा में पहुँचा. सातवीं कक्षा में आधा समय बीत जाने यानि छमाही परीक्षा के बाद मालूम हुआ कि अब मामला केवल बिंदु जी और रेखा जी को बनाने-बिगाड़ने तक ही सीमित नहीं रहा, अब तो सिद्ध करना पड़ेगा. और सिद्ध करने के लिए जिस तरह की बेसिर-पैर की बातें सामने होती थीं, उनसे उलझना नाथों-सिद्धों की इहलोक-परलोक की उलझनों से भी बड़ी उलझन थी. समझ ही न आता था कि इस उलझन को सुलझाएँ कैसे. इस विषय का असली चरित्र उजागर होते ही विषयासक्ति संबंधी ऋषियों के आप्तवचन मेरे निजी अनुभव का हिस्सा बनने लगे.

सिद्ध करिए कि अगर दो रेखाएँ एक-दूसरे को काटें तो उन पर ऊर्ध्वाधर बनने वाले कोण बराबर होंगे. अमाँ यार, काटेंगी रेखा जी लोग एक-दूसरे को और बनेंगे कोण. अब वो बराबर हों या छोटे-बड़े, ये सिरदर्द है रेखा जी लोगों का या फिर कोण लोगों का. उनके पचड़े में एक सीधे-सादे बच्चे को क्यों फँसा रहे हो? 


निर्मेय, प्रमेय और रचना जी का खेल जब शुरू हुआ तब समझ में आया कि अधिकतर छात्रों में ग्यारहवीं तक पहुँचते-पहुँचते गणित के नाम से ही दिमाग़ी बुख़ार के लक्षण क्यों दिखने लगते हैं. अजब-ग़जब सवाल होते थे और हर सवाल की शुरुआत ही ‘सिद्ध करिए’ से होती थी. सिद्ध करिए कि अगर एक किरण एक रेखा पर खड़ी हो तो उस पर बनने वाले दो कोणों का जोड़ 180 अंश होगा. अरे भाई, खड़ी होंगी किरण जी और वह भी रेखा जी पर, तो उनसे बनने वाले जो भी कोण होंगे उनका जोड़ या टूट जो भी हो, वो उनका सिरदर्द है न, मुझ बच्चे की जान क्यों ले रहे हो? अब दूसरा सवाल देखिए. सिद्ध करिए कि अगर दो रेखाएँ एक-दूसरे को काटें तो उन पर ऊर्ध्वाधर बनने वाले कोण बराबर होंगे. अमाँ यार, काटेंगी रेखा जी लोग एक-दूसरे को और बनेंगे कोण. अब वो बराबर हों या छोटे-बड़े, ये सिरदर्द है रेखा जी लोगों का या फिर कोण लोगों का. उनके पचड़े में एक सीधे-सादे बच्चे को क्यों फँसा रहे हो? या फिर सिद्ध करिए कि एक रेखा के समानांतर चाहे जितनी रेखाएँ खींची जाएँ सभी समानांतर होंगी. श्रीमान जी, ये मामला रेखा जी लोगों को आपसी मामला है, नितांत निजी टाइप. वो आपस में निपट लेंगी. हम बालक इसमें क्या कर सकते हैं? अब मान लीजिए कि अगर वो समानांतर न भी हों तो हम उनका बिगाड़ क्या लेंगे?

अव्वल तो बात यह कि सब सिद्ध करने का फ़ायदा ही क्या? क्या हमारे सिद्ध न करने से वो रेखा जी लोग एक-दूसरे को काटने-पीटने लगेंगी जो आपके सवाल में समानांतर हैं? या फिर वो रेखा जी लोग समानांतर हो जाएंगी जो अभी तक एक-दूसरे को काट रही थीं? रहेंगी तो वो वही जो हैं, फिर हमारे सिद्ध कर देने या न कर पाने से क्या फ़र्क़ पड़ता है? लेकिन नहीं साहब, न सिद्ध कर पाने वाले बच्चे के नंबर तो गुरुजी लोग ऐसे काटते थे कि रेखा जी लोग भी एक-दूसरे को क्या काटती रही होंगी. हमारे ज़माने के गुरुजी लोग भी क्या ग़ज़ब के अत्याचारी थे. एक-एक नंबर ऐसे जोड़-घटा कर दिया करते थे, गोया अपने पीएफ से निकालकर दे रहे हों. ख़ैर, अपने कुछ साथियों की तुलना में मुझे इस विषय की वासना से मुक्ति तो जल्दी ही मिल गई, लेकिन इनके मूलभूत कर्म यानी ‘सिद्ध करने’ से मेरी वितृष्णा बढ़ती ही चली गई.
हिरन जी तो उस दिन शेर जी की मैरिज एनिवर्सरी की पार्टी में थे. उधर आए ही नहीं, इन्हें गोली कैसे लग गई. असल में उस दिन कुत्ता जी लोगों को खाना कम पड़ गया तो उन्होंने हिरन जी की पार्टी मना ली. ये देखिए योर आनर, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लिखा है कि हिरन जी के बचे हुए लेग पीस में मीट मसाला लगा हुआ था. 

जैसे-जैसे जीवन का अनुभव बढ़ा मैं समझ पाया कि ‘सिद्ध करने’ का काम कितना निस्सार, निरर्थक और निरुपयोगी है. लगभग उतना ही जितनी कि वकालत या राजनीति. मुझे पूरा विश्वास हो गया कि इस विषय को ग़लत जगह लगा दिया गया है. हमारे समय में रेखागणित जी के ऊँचे सवालों से उन्हीं बच्चों का पाला पड़ता था जिनका इरादा गणितज्ञ, वैज्ञानिक या इंजीनियर आदि बनने का होता था. वकील लोग आर्ट साइड पढ़ के बन जाया करते थे और राजनीति के लिए तो आप जानते ही हैं. ख़ैर, क्या पता इंजीनियरों को भी बालू-सीमेंट-ईंट-छड़ वग़ैरह के बीच कहीं कुछ सिद्ध करना ही पड़ता हो. लेकिन अव्वल तो वकील के लिए यह उपयोगी है. इसलिए क्योंकि उन्हें कुछ भी सिद्ध करने की निस्सारता बहुत अच्छी तरह पता है. वे जानते हैं कि जिसे क़त्ल करते सबने देखा है, सिद्ध करके ही मानना है कि उसके पास तो छर्रा ही नहीं था, बंदूक कहाँ से ले आया. हिरन को अगर गोली लगी है तो साबित करना है कि जी हिरन जी तो उस दिन शेर जी की मैरिज एनिवर्सरी की पार्टी में थे. उधर आए ही नहीं, इन्हें गोली कैसे लग गई. असल में उस दिन कुत्ता जी लोगों को खाना कम पड़ गया तो उन्होंने हिरन जी की पार्टी मना ली. ये देखिए योर आनर, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में लिखा है कि हिरन जी के बचे हुए लेग पीस में मीट मसाला लगा हुआ था.

विद्वान वकील जी लोग यह सब सिद्ध करके सिर्फ़ अपनी ही इज़्ज़त नहीं बढ़ाते, बड़े-बड़े लोगों को बाइज़्ज़त बरी भी करा ले जाते हैं. ऐसा वे इसीलिए करते हैं कि अगर वह यह बात सिद्ध नहीं करेंगे तो दूसरे वकील साहब सिद्ध कर देंगे. अगर दूसरे वकील साहब भी सिद्ध न कर सके तो मुक़दमा ही इतना खिंच जाएगा कि कुछ सिद्ध होने से पहले ही ‘इज़्ज़तदार मुल्जिम जी’ चुनाव लड़ लेंगे और फिर जनता जनार्दन जी उनकी निर्दोषता पर अपने वोट की मुहर लगा कर सिद्ध कर देंगी कि इज़्ज़त से ज़्यादा इज़्ज़तदार तो अपने नेताजी ही हैं, जिन्हें आपने फ़िलवक़्त मुल्जिम जी बना रखा है. कृपा करके इन्हें बाइज़्ज़त बरी कर दें. और अगर इतने पर भी कोई माननीय और विद्वान न्यायाधीश जी न पसीजे तो तय मानिए कि तारीख़-पर-तारीख़-दर-तारीख़ मुक़दमा इतना लंबा खिंच जाएगा कि इज़्ज़तदार मुल्जिम जी भी बेग़ैरत भुक्तभोगी की ही तरह इस असार संसार को ‘सिद्ध करने’ की प्रक्रिया जैसा ही निस्सार समझते हुए, इस दुनिया से ही बाइज़्ज़त बरी हो जाएंगे. अब बताइए, इस सिद्ध करने का कोई मतलब है क्या? नहीं न! इति सिद्धम.

Saturday, 28 January 2017

भारतीय इतिहास पर एसिड अटैक

इष्ट देव सांकृत्यायन
अगर भंसाली ने अपनी फिल्म में ऐसा कुछ दिखाने की कोशिश की है, जैसा बताया जा रहा है तो इसे क्या माना जाए? यह भारतीय इतिहास के स्थापित तथ्यों के साथ खिलवाड़ नहीं, बलात्कार जैसा है. इतिहास के सीने में खंजर भोंकने जैसा है. क्या दुनिया का कोई और देश अपने इतिहास के स्थापित तथ्यों के साथ कला के नाम पर ऐसा कुछ करने की इजाजत देता है? भारतीय इतिहास और जन ऐसी इजाजत क्यों देगा? उससे यह मूर्खतापूर्ण अपेक्षा क्यों की जानी चाहिए? क्या यह वैसा ही जघन्य अपराध नहीं है जैसे बलात्कार या छेड़छाड़ के किसी मामले में अपराधी को उसके अत्याचारों की शिकार लड़की का प्रेमी बताया जाए? क्या यह् पद्मावती की चरित्र हत्या जैसा मामला नहीं है? यह कौन करता है? वे टुच्चे वकील जिनका पेशा ऐसे घटिया लोगों की पक्षधरता करके ही चलता है. जिनके बारे में माना जाता है कि नैतिकता, मानवता और जीवन के उदात्त मूल्यों से उनका कोई लेना-देना नहीं है. क्या कला का धंधा करने वाले उन वकीलों से भी ज़्यादा गए-गुज़रे हो गए हैं? क्या इनका कोई दीन-ईमान नहीं रह गया है? क्या यह न केवल भारतीय इतिहास, बल्कि भारतीय जन से भी विश्वासघात जैसा नहीं है? क्या कला इसीलिए होती है?


भारतीय इतिहास पर एसिड अटैक का यह दौर बहुत लंबे समय से चला आ रहा है. यह बार-बार समय और जगह बदल-बदल कर भिन्न-भिन्न रूपों में होता आ रहा है. सही कहें तो इस प्रवृत्ति को पिछले 70 वर्षों में सत्ता प्रतिष्ठान ने जान-बूझकर बढ़ावा दिया है. एक समुदाय के मिथकों-प्रतीकों के साथ जब भी कुछ बेहूदी हरकत की गई तो उसके विरोध को ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन’ बताकर लगभग बर्बरता से दबा दिया गया. यहाँ तक कि एक टुच्चा पेंटर बार-बार अदालत के सम्मन की अनदेखी करता रहा और जब उसके ख़िलाफ़ वारंट कट गया तो इसे इमरजेंसी से भी भयावह बताया गया. क्या यह वही मानसिकता नहीं है जो ‘अफ़जल हम शर्मिंदा हैं/तेरे क़ातिल ज़िंदा हैं’ का नारा लगाते हुए देश के माननीय उच्चतम न्यायालय को क़ातिल बताने में भी संकोच नहीं करती? उस पर तुर्रा ये कि यही संविधान में सबसे बड़े आस्था रखने वाले भी हैं. बाक़ी लोग संविधान की ऐसी-तैसी कर रहे हैं. यह बताने वाले वही लोग थे जिन्हें तसलीमा नसरीन, सलमान रुश्दी, एम.ए.खान, तारिक़ फ़तह, हसन निसार के नाम पर साँप सूँघ जाता है. वहीं दूसरी ओर शर्ले एब्दो की घटना पर चुप्पी साध ली गई. क्यों?


उस ख़ास वर्ग की यह चुप्पी बहुत दिनों तक सधी नहीं रही. थोड़े दिनों बाद जब हल्ला थम गया तो मुखर हुई और मुखर इस रूप में हुई कि ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कोई तो सीमा होनी चाहिए’. फेसबुक-ट्विटर पर इस तरह की अभिव्यक्तियों की भरमार हो गई. यह सीमाएँ बताने वाले भी वही थे, जो एक टुच्चे पेंटर के मामले में अभिव्यक्ति की अनंत स्वतंत्रता के बड़े भारी पैरोकार बने फिर रहे थे. क्या इस मानसिकता को आप ‘दोगली’ के अलावा कोई और संज्ञा दे सकते हैं?


उस ख़ास समुदाय के ही संबंध में इन्हें सीमाएँ क्यों याद आती हैं? केवल इसलिए न कि वह इनकी उस चक्रव्यूह रूपी चुनौती के षड्यंत्र को स्वीकार नहीं करता जिसे ये संवाद या बहस या विमर्श कहते हैं! वह बात करने की एक ही भाषा जानता है और वह है बंदूक. जो इनसे बात करने की कोशिश करते हैं उन्हें ये पहले तो दकियानूस करार देते हैं और फिर बहस का मैदान छोड़कर भाग जाते हैं. अपनी एक ख़ास खोल में छिपे हुए वहीं से भौं-भौं करते रहते हैं. ग़लती से कोई इनका सुरक्षा घेरा तोड़कर भीतर घुस गया और वहाँ इनसे बहस करने बैठ गया तो पहले तो उसके तथ्यगत सही तर्कों को सुनने से ही इनकार कर देते हैं और फिर उस पर कुतर्कों की बौछार कर देते हैं. इस पर भी कुछ रह गया तो देश भर के अख़बारों-टीवी चैनलों में रंगे सियारों की तरह हुआँ-हुआँ शुरू कर देते हैं. इसके बाद चारा क्या बचता है?


साहित्य में यह बात बार-बार कही जाती रही है कि ऐतिहासिक उपन्यास इतिहास नहीं होता. लेकिन साथ ही यह भी कहा जाता रहा है कि ऐतिहासिक उपन्यास की अपनी सीमाएँ होती हैं. साफ़ अर्थ है कि साहित्य में कल्पना के पुट के नाम पर इतिहास के तथ्यों के साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता. इसकी अनुमति स्वयं साहित्य भी नहीं देता. ऐसा केवल हिंदी या भारतीय साहित्य में नहीं है, दुनिया भर का साहित्य इस धारणा को मान्यता देता है. वह इस धारणा को मान्यता इसलिए देता है क्योंकि अगर ऐसा न किया गया तो साहित्य और इतिहास के बीच बड़ी अराजक स्थिति उत्पन्न हो जाएगी. जो न तो साहित्य के लिए ठीक होगी, न इतिहास के लिए और न ही समाज के लिए. इसके बावजूद भारतीय साहित्य में ऐसी छूट ली गई है और वह छूट लेने वाले कोई दूसरे नहीं, वही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर साहित्य को अपनी कुंठाओं का उगालदान बनाने वाले हैं. आज वही गिरोह है जो सिनेमा में करोड़ों की लागत लगाकर अरबों का मुनाफ़ा कमाने वाले ग़रीब संजय लीला भंसाली के पीछे एक बार फिर खड़ा हो गया है. क्या अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य की इस पैरोकारी और इस कलावाद पर आपको हँसी नहीं आती?


मुझे सिनेमा को इतिहास संबंधी अपनी कुंठाओं का उगालदान बनाने वालों पर जूते पड़ने का कोई अफ़सोस नहीं है. हाँ, अफ़सोस इस बात का है कि ये जूते मारने वाले अभी तक या तो केवल क्षणिक आवेश के शिकार साबित हुए हैं या फिर भाड़े के कुत्ते. जो अंततः इन ग़रीब खरबपतियों के लिए मुनाफ़ा बढ़ाने वाले औजार ही साबित होते हैं. अगर करणी सेना इसे इतिहास और स्त्री की अस्मिता के साथ खिलवाड़ का मामला बनाकर अदालत तक न ले गई और अदालत से यह फिल्म बनने पर रोक न लगवा सकी तो उसे भी भाड़े का कुत्ता ही माना जाएगा.

Thursday, 26 January 2017

Mahrajganj Of Azamgarh





आधुनिकता और महराजगंज

--हरिशंकर राढ़ी 

महराजगंज बाजार और पूरे क्षेत्र की यह विशिष्टता उल्लेखनीय है कि इक्कीसवीं सदी के लगभग दो दशक पार
कर लेने के बावजूद यहां अभी पश्चिमीकरण और बनावटीपन नहीं आया है। यह कहा जा सकता है कि जितना विकास राजमार्गों और जिला मुख्यालयों के पास वाले कस्बों का हुआ, उसकी तुलना में महराजगंज काफी
नया चौक  महराजगंज  पर  पंडित लक्ष्मी कान्त मिश्र की प्रतिमा 
पिछड़ा ही है । अभी तक इस क्षेत्र में कोई सिनेमा हॉल, ऑडीटोरियम, स्टेडियम या बड़ा सार्वजनिक सभा स्थल भी नहीं है। यदि महराजगंज बाजार का व्यापार देखा जाए तो किसी भी बड़े कस्बे से टक्कर ले सकता है। बड़ी गल्ला मंडी, सब्जी मंडी, मशीनरी, भवन निर्माण सामग्री और जीवनोपयोगी पदार्थों का एक विशाल बाजार है यहां। महराजगंज से उत्तर लगभग 12 किलोमीटर की दूरी, यानी घाघरा के तट तक कोई दूसरा बड़ा बाजार नहीं है और समस्त बड़ी खरीदारियां लोग यहीं से करते हैं। पश्चिम में राजे सुल्तान पुर, दक्षिण में कप्तानगंज और पूरब में सरदहा तथा बिलरियागंज बाजार जरूर हैं लेकिन बड़ी खरीदारी के लिए अभी महराजगंज थोकमंडी जैसी भूमिका रखता है।इस सबके बावजूद महराजगंज का विकास नहीं हुआ। राजनैतिक कमजोरी, मुख्य मार्ग से दूर होना और रेलमार्ग से अतिदूर होना इसके लिए सबसे बड़ा अभिशाप है। कुछ तो यहां के लोगों की सीधी-सादी जीवन शैली और सरलता के कारण है। न जाने कितने बड़े व्यापारी, डॉक्टर और अन्य प्रमुख लोग अपनी दूकानों और बाजार की सड़कों पर नितांत घरेलू कपड़ों - लुंगी-बनियान-गमछा या तुड़ी-मुड़ी धोती में सहज भाव से मिल जाएंगे। चेहरे और दिल में वही अपनापन, मजाक और राजी-खुशी की चिंता करते, पान की पीकें मारते या चुक्कड़ में चाय पीते । लुंगी के ऊपर जेब वाली बनियान (औरेबकट) में नोटों की गड्डी होगी लेकिन आप उन्हें अति सरल साधारण किसान से अधिक होने का अनुमान नहीं लगा पाएंगे।
नया चौक  महराजगंज        छाया : राजनाथ मिश्र
‘‘काहो गुरू, का हालि हौ ? मजे में बाटा न?’’ जैसे जुमले यहां-वहां उछलते मिल जाएंगे। जिस भी हलवाई की दूकान में बैठने की जगह है, वहां लोग बैठे राजनीति, सुख-दुख और हंसी मजाक करते मिल ही जाएंगे। काम की चिंता नहीं, मर जाएंगे तो कौन सा लेके जाना है। महराजगंज देश के उन कुछ चुनिंदा बाजारों में है जहां ग्राहकों से अधिक महत्त्व यार-दोस्तों और नियमित बैठक करने वालों को मिलता है। सामान अन्य बाजारों की तुलना में आश्चर्यजनक रूप से सस्ते। शायद क्षेत्र की क्रयशक्ति और सादगी का प्रभाव होगा। उतना ही चाहिए जितने में काम चल जाए। सांई इतना दीजिए जामें कुटुम समाय।  

बाजार का मुख्य स्थान तो अब नया चौक ही माना जाता है किंतु अब बाजार की सीमा में कई चौक हो गए हैं। बजरंग चौक का विकास सर्वाधिक हुआ है। सहदेवगंज मोड़, थाना चौक और भैरोजी मोड़ भी भीड़ इकट्ठा कर रहे हैं। महराजगंज में ब्लॉक मुख्यालय भी है। बैंक हैं, विद्यालय हैं किंतु अच्छे चिकित्सक और अस्पताल की कमी बहुत खलती है। इसके अतिरिक्त रोडवेज बसों का नेटवर्क भी बहुत ही दयनीय स्थिति में है जिसके परिणामस्वरूप आवागमन की दिक्कतें हद पार कर जाती हैं। टैक्सीवालों के जिम्मे पूरी परिवहन व्यवस्था है और वे दादागीरी से बाज नहीं आते। बिलरियागंज, कप्तानगंज, आजमगढ़, राजेसुल्तानपुर और सरदहा के लिए टैक्सीवालों ने नंबर व्यवस्था कर ली है और जबतक उनकी गाड़ी ठसाठस नहीं भर जाती, वे हिल नहीं सकते। चलिए, गाड़ी तो आपने भूसे जैसी भर ली, किराया तो वाजिब रखिए। पर नहीं जनाब, यहां 7 किमी का किराया 15 रुपये है। अब कर ही क्या सकते हैं आप?


पूरे बाजार क्षेत्र में कोई भी ऐसी विशाल इमारत नहीं है जिसका जिक्र किया जा सके। अब महराजगंज टाउन एरिया की श्रेणी में है। टाउन एरिया के नाम पर सफाई की व्यवस्था तो दिखती है, पटरी दूकानदारों से और बाहरी व्यापारियों से तहबाजार भी वसूली जाती है किंतु कोई नगरीय सुविधा अभी तक दृष्टिगत नहीं होती है। सड़कों की स्थिति पहले की तुलना में सुधरी है। बाजार की सीमा का विस्तार हुआ है। यह विस्तार बिलरियागंज रोड और राजेसुल्तान पुर रोड पर अधिक है। महराजगंज से भैरोजी का अंतर और सीवान समाप्त सा हो गया है। जबसे छोटी सरयू पर पक्का पुल बना और देवारा सहदेवगंज की सड़क पक्की बनी, इधर भी महराजगंज कस्बे ने अपना पैर फैलाया है।  
नया चौक  महराजगंज        छाया : राजनाथ मिश्र

                                 
इतिहास सिमट रहा है महराजगंज का। कौन इसे संभाले। महराजगंज की पुरातनता और गौरव की प्रतीक संस्थाएं धूल फांक रहीं हैं। महराजगंज इंटर कॉलेज, जो कभी अपनी अच्छी पढ़ाई, दिग्गज अध्यापकों और सख्त अनुशासन के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध था, अपनी सारी गरिमा खो चुका है। सरकारी विद्यालयों की स्थिति, छात्र अनुशासन और अध्यापकों की स्थिति पर क्या कहा जाए। नए-नए तथाकथित अंगरेजी स्कूल खुल रहे हैं और वे अपनी दूकानदारी अयोग्य अध्यापकों के दम पर खूब चला रहे हैं।

महराजगंज बाजार की रामलीला और दशहरा भी कभी बहुत भीड़ बटोरता था। बजरंग चौक के पास दशहरे के दिन राम-रावण युद्ध हम बच्चों के लिए बहुत बड़ा मनोरंजन हुआ करता था। हमारे मन में तब दशहरे के दिन के मेले में रावण की भूमिका निभाने वाले उस गुप्ता जी के प्रति बहुत बड़ा आकर्षण होता था। उनका चलना, गरजना, तलवार भांजना और राम को ललकार बहुत ही प्रभावी लगता था। सुना है कि अब उनका निधन हो गया है।
पोखरा,  बजरंग चौक,  महराजगंज                          छाया : राजनाथ मिश्र
प्राचीन धरोहरों में बाजार के पूरब और पश्चिम में स्थित दो पोखरों को भी शामिल किया जा सकता है। एक छोटा किंतु गहरा पोखरा महराजगंज इंटर कॉलेज के सामने था, छात्र जीवन में हम मध्यावकाश में पोखरे की सीढ़ियों पर बैठकर मछलियां देखते और बातें करते। सुना है कि पोखरा सूख गया है और कुछ दिन में उस पर कोई इमारत बन जाएगी। कौन पूछता है इन्हें अब !
दूसरा पोखरा बजरंग चौक के पश्चिम देवतपुर मार्ग पर है। समय ऐसा बदला कि जिस चौक की पहचान पोखरे के नाम पर होनी चाहिए थी, उस पोखरे की पहचान अब चौक के नाम से होने लगी है। तब कोई बजरंग चौक नहीं होता था। पोखरे से होकर अक्षयबट और विशुनपुर (राढ़ी का पूरा) के उत्तरी छोटे टोले को रास्ता जाता था। इस पोखरे के पास का राढ़ियों का टोला पोखरे से ही नामित किया जाता था। लोग सहज भाव से इसे ‘पोखरवा पर क फलांने’ कहकर परिचय देते। श्री जे0के0 मिश्र के अनुसार महराजगंज के दोनों पोखरे आजमगढ़ के किसी अग्रवाल ने बनवाए थे। पहले वह अग्रवाल परिवार महराजगंज में ही रहता था, कालांतर में वह आजमगढ़ शहर में बस गए। पोखरों पर कोई शिलापट या नामोल्लेख नहीं है जिससे कि पता चले कि वह महानुभाव कौन थे।
समय बदला। पानी के लिए हैंडपंप हो गए। सिंचाई के लिए नहरें और ट्यूबवेल। फिर इन पोखरों की उपयोगिता
ही क्या रही और उपयोगिता नही तो इन पुरखों को संभाले कौन और क्यों? एक समय का सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतीक यह पोखरा ध्वंश की स्थिति में है। सीढ़ियां टूट रही हैं, चारो ओर से अवांछित घासें उगी हुईं, जल में काई लगी हुई है और सौंदर्य से वंचित। न जाने लोगों का सौंदर्यबोध समाप्त हो गया है या प्रकृति में ही सौंदर्य न रह गया हो।शहरों में लोग ऐसे जलस्रोतों के आसपास बैठे मिल जाते हैं। शायदकोई कवि, साहित्यप्रेमी, दार्शनिक, वैरागी या प्रेमी होता तो इन सीढ़ियों पर बैठकर खुद से, किसी मित्र से या किसी मानसिक मूर्ति से बातें करता।
पोखरा,   बजरंग चौक,  महराजगंज      छाया : राजनाथ मिश्र
महराजगंज को अभी पिछड़ा माना जा सकता है, किंतु सुखद यह है कि यहां के विचारों पर पश्चिमीकरण का घातक हमला नहीं हुआ है। परिवर्तन आया है, सामाजिक और नैतिक क्षरण हुआ है, लेकिन अन्य जगहों की तुलना में कम। अपराध भी होते हैं किंतु सामान्यतः अभी सामाजिकता और संबंध बचे हुए हैं और मानवीय मूल्यों की पूरी तरह मौत नहीं हुई है। बाजार में हिंदू और मुसलमान भी हैं, लेकिन सांप्रदायिकता जैसी कोई चीज नहीं। हिंदुओं की दूकान के ग्राहक मुस्लिम और मुसलमानों के हिंदू। आपसी भाई चारा और शादी-व्याह, सुख-दुख में उठना -बैठना और खान-पान। दंगों के देश में पूरी तरह अमन और शांति का कस्बा महराजगंज। चाय-समोसे, जलेबी, पकौड़ी और टिक्की की खुशबू उड़ाता महराजगंज, पटरियां पर दूकान लगाए महराजगंज और संबंध निभाता महराजगंज। बहुत अधिक भौतिक विकास न पाने वाला महराजगंज फिर भी बहुत अच्छा, बहुत सुंदर है।










Thursday, 19 January 2017

कविता [] राकेश सोहम

चुनाव आ गए 
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वे फिर द्वारे आ गए
भैया चुनाव आ गए।

पिछले  बार  हंसे  थे
घर के भीतर घुसे थे
अम्मा के पाँव पड़े थे
बाद में कहाँ बिला गए ?

भैया चुनाव आ गए .......

अब की बार न भूलेंगे
आनंद के झूले झूलेंगे
दद्दा  जी  न  कूलेंगे
हाथ जोड़कर जता गए !

भैया चुनाव आ गए .......

Wednesday, 21 December 2016

Mahraj ganj: Azamgarh

महराजगंज बाज़ार
                    -हरिशंकर राढ़ी 


 महराजगंज की स्थिति को लेकर पिछले लेख में लिखी गई बातें तथ्यपरक साबित हो रही हैं। विशुनपुर की तुलना में महराजगंज नया है और यह गाँव विशुनपुर की भूमि पर बसा है। यह बात स्थानीय लोग तो मानते ही हैं, सरकारी अभिलेखों से भी सिद्ध होती है। वैसे भी महराजगंज बाजार की अधिकांश जमीन विशुनपुर के राढ़ियों के खेत की है और अभी भी उनकी जमीन में बहुत सी दूकाने किराए पर चल रही हैं। हाँ, समय के साथ एक बड़ा हिस्सा क्षेत्रीय लोगों ने खरीद लिया है और अब इनका वर्चस्व कम होता जा रहा है। आजमगढ़ गजेटियर के एक अंक में महराजगंज के बारे में कुछ सूचना उपलब्ध है। इस सूचना के अधिकांश भाग को तथ्यपरक माना जा सकता है। आजमगढ़ गजेटियर इस अंक के पृष्ठ 244  पर लिखता हैः
The town is situated in mauza Bishanpur on the banks of the Chhoti Sarju. Close to it is a famous old Hindu shrine of Bhairo and Bishanpur has probably long been inhabitated mauza. The name of Mahrajganj however is of comparatively recent origin having been given to it, it is said, by one of the Rajas of Azamgarh……

The shrine of Bhairo is also known as Deotari, and it is alleged by the attendant Brahmans to have been a gate of the ancient city of Ajodhya, from which it is now forty kos distant. At this shrinre a small fair is held every month of the day of the full moon; but on the tenth day of the light half of Jeth, a very much larger fair is celebrated, which is attended by several thousands of people.
(Azamgarh Gazetteer, Vol XXXIII, of the District Gazetteer of the United Province of Agra and Oudh, Edited and Compiled by DRAKE –BROCKMAN – ICS. Published in 1911)
Naya Chowk Mahraj Ganj
इस पृष्ठ के आवश्यक अंशों का अनुवाद यहां दिया जा रहा है--
”यह नगर छोटी सरजू के तट पर मौजा बिशनपुर में स्थित है। इसके निकट भैरों का प्रसिद्ध और पुराना हिंदू देवालय है और संभवतः बिशनपुर एक प्राचीन रिहायसी मौजा है। हालाँकि अपेक्षाकृत महराजगंज नया है और कहा जाता है कि इसकी स्थापना आजमगढ़ के किसी राजा ने की थी।
इस पेज पर कुछ आँकड़े भी दिए हैं। हालाँकि गजेटियर के इस कथन से सहमत होने का कोई आधार नहीं बनता है कि महराजगंज आजमगढ के किसी राजा ने की थी। ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता कि महराजगंज की स्थापना किसी राजा ने की हो। यदि ऐसा होता तो कोई राजकीय भवन या निशान जरूर मिलता। वैसे भी महराजगंज का स्थापत्य किसी योजनाबद्ध ढंग से हुआ नहीं लगता। इसलिए यह चर्चा कि महराजगंज का नामकरण राढ़ी जिन्हें ब्राह्मणत्व एवं शौर्य के कारण ‘महराज’ कहा जाता था, के आधार पर हो सकता है।
महराजगंज क्षेत्र औद्योगिक उत्पादों के लिए कभी भी प्रसिद्ध नहीं रहा। हाँ, यह बाजार व्यापार के मामले में अग्रणी था। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में मऊ, मुबारकपुर जैसी जगहों से कपड़ा यहां आता था और लखनऊ, फर्रूखाबाद तथा अन्य पश्चिमी शहरों में इसकी आपूर्ति की जाती थी। उस समय चेतू नामक  कोई बड़ा व्यापारी इस बाजार में था जिसका जिक्र गजेटियर में आता है।
गजेटियर के प्रकाशन के समय सन् 1911 में इस बाजार में महराजगंज में थाना, पोस्ट ऑफिस, मवेशीखाना और एक उच्च प्राथमिक विद्यालय था। ये सभी आज भी इस बाजार में किंतु मवेशीखाना शायद अब नहीं है। मेरे बचपन में था, कुछ बिगडैल लोग किसी का पशु अपने खेत में चरता हुआ पाते तो उसे मवेशीखाने में ढकेल आते और पशु के मालिक को जुर्माना देकर अपना पशु छुड़ाना पड़ता था। जमाना गरीबी का था, इसलिए जुर्माने की रकम का इंतजाम मुश्किल से होता था। कभी-कभी तो लोगों का जेवर भी बंधक रखना पड़ता है। मवेशीखाने की बात आती है तो प्रेमचंद के ‘दो बैलों की कथा‘ का प्रसंग बरबस याद आ जाता है।
थाना तब भी था। अंगरेजी सरकार के जमाने में थाने का बहुत बड़ा खौफ होता था। खौफ आज भी है और सज्जनों में ज्यादा है। तब महराजगंज थाना इस समय के प्राइमरी विद्यालय की जगह पर था। आज जहां है, वह तब के पड़ोसी गांव प्रताप पुर का क्षेत्र है। सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान महेशपुर के स्वतंत्रता सेनानी स्व0 श्री लक्ष्मीकांत मिश्र इस थाने को फूँकने के लिए पहुंच गए थे। श्री जे0के0 मिश्र के मुताबिक वे एक बोझ सरपत सिर पर रखे थाने के गेट पर पहुंचे और बोले कि मैं थाना फूँकने आया हूँ, जो करना हो करो। गोली खाने तक को तैयार हो गए। उनकी इस हिम्मत पर थानेदार तक सहम गया। खैर थाना तो नहीं फूँक पाए, पुलिस ने पकड़ा, पीटा और चालान कर दिया। किंतु उनके इस कृत्य ने अंगरेजी सरकार के खिलाफ महराजगंज क्षेत्र में बिगुल बजा दिया। उनके साथ कुछ क्षेत्रीय युवा स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े जिसमें देवारा क्षेत्र के मल्लू सुराजी और नहरूमपुर (देवारा कदीम) के कुछ लोग थे जिनका नाम ठीक से याद नहीं। इन लोगों को क्षेत्र में सुराजी कहा जाने लगा। आजादी के बाद भी सामाजिक क्षेत्र में इनका योगदान जारी रहा। अब इनमें कोई भी जीवित नहीं रहा जो इतिहास के विषय में कुछ और बता सके।
गजेटियर के हिसाब से 1881 में महराजगंज की जनसंख्या 2882 थी और सन् 1891 में 2019 रह गई थी। सन् 1911 में यहा कुल 1568 हिंदू और 624 मुसलमान थे।
आज यह बाजार बहुत विकसित हो चुका है और नगर क्षेत्र के अंतर्गत संचालित होता है। महराजगंज बाजार के अतिरिक्त विशुनपुर भी इसी में सम्मिलित है। नई सड़क और नया चौक बनने के पहले पुराना चौक ही मुख्य केंद्र था। कप्तानगंज , आजमगढ़ और जीयनपुर के लिए तांगे (इक्के) यहीं से चलते थे। किसी समय फेंकू का तांगा प्रसिद्ध था। चौक के दक्षिण बैलगाड़ियां खड़ी होती थीं जहां से दूर के बाजारों में अनाज की आपूर्ति होती थी। तब छोटी सरयू में भी पानी होता था और नाव से भी व्यापार होता रहता  था।
Naya Chowk, Mahraj Ganj
साधन सीमित थे। अंधेरा होते ही रास्ता चलना दूभर हो जाता था। मौसम मानसून का हो तो महेशपुर की ओर जाना बड़ी समस्या थी। पूरा क्षेत्र देवारा था। सड़क थी नहीं और कच्चा रास्ता था जिसमें पानी भर जाता था। दोनों तरफ से सरपत की बाड़, सांपों का साम्राज्य और देर होते ही नाव का न मिलना किसी भयंकर त्रासदी से कम नहीं होता था। चौड़े रास्ते भी बैलगाड़ियों की चौड़ाई के होते थे जिन्हे खोर कहा जाता था। अब न खोर रहे और न खोर में रहने वाले लोग जो जान पर खेलकर संबध निभाते थे और अभावों को अपना जीवन दर्शन बना लेते थे। अब तो विकसित समाज है जिसमें अधिक धन और सुविधासंपन्न ही ‘मनुष्य‘ है, मानवता का क्या करना है ? सो बाजार विकसित हो रहे हैं....
भैरो जी के विषय में गजेटियर लिखता है-
भैरों जी देवस्थान को देवतरी के नाम से भी जाना जाता है और यहां के परिचारक ब्राह्मणों के अनुसार यह प्राचीन अयोध्या नगर का द्वार है, जो यहां से 40 कोस दूर है। इस देव स्थान पर हर माह की पूर्णिमा को एक छोटा मेला लगता है किंतु  जेठ माह के शुक्लपक्ष की दशमी को बहुत बड़ा मेला लगता है जिसमें हजारों लोग शामिल होते हैं...
भैरो जी और महराजगंज की प्राचीनता और सभ्यता पर प्रश्न तो नहीं उठाए जा सकते, हां इन्हें उतनी प्रसिद्धि नहीं मिली जिसके हकदार ये थे। संभवतः पिछड़ा क्षेत्र और मुख्यमार्ग पर न होना ही इसका बड़ा कारण हो...
शेष अगली किश्त में...